मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध विपक्ष द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन में एकजुटता का अभाव है। अब तक दिल्ली में जो विरोध प्रदर्शन, धरना और गिरफ़्तारियाँ हुईं उनमें कांग्रेस ही आगे - आगे रही जिससे सभी कैमरे राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा पर ही केंद्रित रहे। उन्होंने भी हर वह तरीका आजमाया जिससे सुर्खियों में रहें। आज की राजनीति में वह दौर नहीं रहा जब सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष में वैचारिक मतभेदों के बावजूद परस्पर सम्मान का भाव था। विरोध भी सांकेतिक ज्यादा होता था। बड़े - बड़े आंदोलन दिल्ली में हुए , लाखों की रैलियां निकलीं किंतु कुछ अपवाद छोड़कर पुलिस एवं प्रशासन को वह सब नहीं झेलना पड़ा जो अब दिखाई दे रहा है। 6 मार्च 1975 को दिल्ली में लाल किले से बोट क्लब तक विशाल रैली निकाली गई जिसमें सी.पी.आई को छोड़कर समूचा विपक्ष शामिल हुआ और देश भर से लाखों लोग आये। हालांकि उसमें चौ. चरण सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, मधु लिमये, जॉर्ज फर्नांडीज और चंद्रशेखर जैसे दिग्गज शामिल थे किंतु नेतृत्व जयप्रकाश नारायण और आचार्य कृपालानी को दिया गया। बोट क्लब पर हुई सभा को भी उन दोनों ने ही संबोधित किया। लोकसभा भंग करने की मांग वाला ज्ञापन लोकसभा अध्यक्ष गुरदयाल सिंह ढिल्लों को वे दोनों दे आये और आयोजन खत्म हो गया। उस दिन यदि मंच से संसद भवन में घुसने का आह्वान किया जाता तो वही सब होना तय था जो कई दशकों बाद श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में देखने मिला। लेकिन लाखों के जनसमूह में किसी का भी पुलिस से विवाद नहीं हुआ। आज वैसे आंदोलन की कल्पना नहीं की जा सकती। राहुल गाँधी बैरिकेटिंग पर चढ़ गए तो उसे बड़ी घटना बताया जा रहा है। प्रियंका सड़क पर लेटकर खुद को क्रांतिकारी साबित करने के प्रयास में हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त से मिलने का समय मांगे बिना चुनाव आयोग में घुसने से रोकने पर आकाशवाणी परिसर में जबरन घुसकर घंटों बैठे रहना ये दर्शाता है कि मुद्दे के प्रति गंभीरता की बजाय अपनी छवि चमकाने का अभियान चलाया जा रहा है। किसी भी बड़े आंदोलन का कोई चेहरा या नेता होता है। लेकिन अभी तक वोट चोरी के विरोध में चल रहे इस विरोध का नेता कौन है और विपक्षी दलों एवं संगठनों के बीच समन्वय कायम करने की जिम्मेदारी किसके पास है, ये कोई नहीं जानता। यही वजह है कि समाजवादी पार्टी एक दिन पहले आंदोलन में नजर आई किंतु दूसरे दिन नदारत हो गई। और जो सबसे बड़ी कमी नजर आ रही है वह है कुछ विपक्षी दलों द्वारा अलग खिचड़ी पकाना। इनमें आम आदमी पार्टी प्रमुख है जो पंजाब और गुजरात में कांग्रेस की प्रतिद्वंदी है। तमिलनाडु की द्रमुक भी आंदोलन से दूर है। उसकी वजह राहुल गाँधी द्वारा उसके साथ गठबंधन को तोड़कर मुख्यमंत्री जोसेफ विजय की पार्टी को समर्थन देना है। इसी तरह जंतर मंतर पर धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग को लेकर आंदोलन कर सुर्खियों में आई कॉकरोच जनता पार्टी भी समानांतर आंदोलन चला रही है। उसके द्वारा 10 तारीख को जंतर मंतर पर बड़ा प्रदर्शन करने की घोषणा से आंदोलन के कई धड़ों में बंट जाने की आशंका है। ये भी स्पष्ट है कि आम आदमी पार्टी और कॉकरोच जनता पार्टी में संगामित्ती है। अनेक वामपंथी संगठन भी उनके साथ हैं। दूसरी तरफ अखिलेश यादव बजाय दिल्ली में मौजूद रहने के अयोध्या में प्रचार कर रहे हैं। कांग्रेस की परेशानी ये है कि विपक्ष में बड़े चेहरों का अभाव है। ममता बैनर्जी और उद्धव ठाकरे की चमक खत्म हो चुकी है। लालू प्रसाद यादव की साख और स्वास्थ्य दोनों खराब हैं । ऐसे में आंदोलन का न तो कोई स्वरूप बन पा रहा है न ही विपक्षी एकजुटता नजर आ रही है। इसलिए इसकी आयु ज्यादा नहीं लगती। देखने वाली बात ये होगी कि क्या 10 तारीख को कॉकरोच जनता पार्टी अपने पिछले प्रदर्शन को दोहरा सकेगी ? यदि वह ऐसा कर सकी तब इस आंदोलन की बागडोर कॉकरोच जनता पार्टी के पास जाने की पूरी - संभावना है जो श्री गाँधी को स्वीकार्य नहीं होगा। ये देखते हुए आने वाले कुछ दिनों में इस आंदोलन की दिशा और दशा दोनों तय होंगी। यदि समूचा विपक्ष एक मंच पर नहीं आया तो फिर इस मुहिम का अंजाम तक पहुंचना मुश्किल है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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