अचानक सब शांत हो गया। दो नेताओं के जेल जाने के बाद कॉकरोच जनता पार्टी के प्रमुख अभिजीत दिपके अपने कार्यकर्ताओं को परिवार के लिए समय निकालने की समझाइश देते सुने जा रहे हैं। दूसरी तरफ वोट चोरी आंदोलन को जिंदा रखने वाले राहुल गाँधी गोवा में गरजने के बाद निजी काम से वियतनाम चले गए । वैसे भी त्यौहारों के समय किसी जनांदोलन को जीवंत रखना मुश्किल होता है। शायद यही सोचकर कॉकरोच और काँग्रेस दोनों ने आंदोलन को विराम दे दिया । हालाँकि काँग्रेस द्वारा 1 नवम्बर को दिल्ली के रामलीला मैदान में मुख्य चुनाव आयुक्त विरोधी महारैली आयोजित करने की घोषणा की जा चुकी है क्योंकि उसके बाद फिर दीपावली की तैयारियां शुरू होने से बड़े आंदोलन की गुंजाइश नहीं रहेगी। दरअसल श्री गाँधी सहित अन्य विपक्षी नेताओं के सर्वोच्च न्यायालय परिसर में जुलूस लेकर पहुँचने पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत द्वारा नाराजगी व्यक्त करने और तमाम नेताओं को नोटिस भेजे जाने के बाद विपक्षी नेताओं की अकड़ में कमी आ गई। उन्हें ये महसूस होने लगा कि न्यायपालिका विशेष रूप से सर्वोच्च न्यायालय से टकराव भारी पड़ सकता है। विपक्ष के तेवर ठंडे पड़ने का सबसे बड़ा कारण बना आइसा अध्यक्ष नेहा बोरा द्वारा ज्ञानेश कुमार विरोधी आंदोलन को बांग्लादेश में हुए युवा आंदोलन से प्रेरित बताये जाने से जिसके कारण शेख हसीना को जान बचाकर भारत आना पड़ा। रही सही कसर पूरी कर दी वरिष्ट अधिवक्ता प्रशांत भूषण द्वारा इस आंदोलन के जरिये सरकार बदलने की शेखी बघारे जाने से। इन दोनों के बड़बोलेपन की वजह से विपक्ष की आक्रामकता को जबर्दस्त धक्का लगा। इसका प्रमाण तब मिला जब कॉकरोच जनता पार्टी प्रमुख अभिजीत ने ये सफाई दी की कि इस आंदोलन को बांग्लादेश या नेपाल में हुए युवा आंदोलन से जोड़ना गलत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका उद्देश्य सरकार को नहीं अपितु ज्ञानेश कुमार को हटाने तक ही सीमित है। काँग्रेस की तरफ से शशि थरूर ने भी नेहा बोरा तथा प्रशांत भूषण के बयानों से असहमति व्यक्त करते हुए आंदोलन के जरिये सरकार को हटाने जैसी किसी भी कोशिश का खंडन किया। अन्य विपक्षी नेताओं के अलावा जो गैर राजनीतिक तबका ज्ञानेश कुमार के विरोध में चल रहे विपक्षी आंदोलन को भावनात्मक समर्थन दे रहा था वह भी बांग्लादेश जैसी अराजकता से प्रेरणा लेने और सरकार हटाने के लिए खूनखराबा हो जाने की बात कहे जाने से बिदक गया। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि नेहा बोरा और प्रशांत भूषण द्वारा जोश में होश खो बैठने और बेहद गैर जिम्मेदाराना बयान दिये जाने से विपक्षी आंदोलन के सामने छवि का संकट खड़ा हो गया। भाजपा ने भी बिना देर लगाए नेहा और श्री भूषण के उल्लिखित बयानों के आधार पर ये आरोप लगाना शुरू कर दिया कि विपक्ष भारत में बांग्लादेश जैसा हिंसात्मक वातावरण बनाकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुनी हुई सरकार को अपदस्थ करना चाह रहा है जिसकी वजह से देश अराजकता के मकड़जाल में फंसकर रह जाएगा। नरेंद्र मोदी को पानी पी - पीकर गालियाँ देने वाले कतिपय यू - ट्यूबर पत्रकारों ने भी माना कि इस आंदोलन को बांग्लादेश से प्रेरित और सरकार हटाने से जोड़ना आत्मघाती कदम है। इन्हीं सब वजहों से आंदोलन का पैनापन कम हो गया और बीते कुछ महीनों के बाद विपक्ष को रक्षात्मक होना पड़ा। परिणाम ये हुआ कि आंदोलन से जुड़े संगठन नेहा बोरा और प्रशांत भूषण से दूरी बनाने लगे। उन सबकी समझ में ये बात आ गई है कि भारत की जनता किसी भी स्थिति में हिंसा की राजनीति को स्वीकार नहीं करेगी। देखना ये है अब ये आंदोलन किस तरह आगे बढ़ेगा क्योंकि अपनी ढपली, अपनी राग के चलते उसमें बिखराव खुलकर सामने आ चुका है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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