सोमवार की शाम दिल्ली में जो राजनीतिक ड्रामेबाजी हुए उससे स्पष्ट है कि विपक्ष द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध छेड़ा गया अभियान अपनी गंभीरता खो बैठा है। राष्ट्रपति ने उनसे मिलने आए विपक्षी नेताओं से वोट चोरी के प्रमाण मांगे किंतु उन्हें देने के बजाय सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात का समय माँगा गया। जबकि विपक्ष के साथ जुड़े तमाम दिग्गज अधिवक्ता ये बात अच्छी तरह जानते थे कि न्यायाधीश कभी राजनीतिक प्रतिनिधिमंडल से नहीं मिलते। इसीलिए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने वह अनुरोध ठुकराते हुए याचिका के जरिये अपना पक्ष रखने की सलाह दी। कल विपक्ष का मार्च सर्वोच्च न्यायालय तक ले जाने का जो ऐलान किया गया था उसका निहित उद्देश्य भी खतरनाक है क्योंकि 11 विपक्षी नेताओं द्वारा चुनाव आयोग के विरुद्ध याचिकाएं पेश किये जाने के बाद सर्वोच्च न्यायालय के सामने प्रदर्शन अर्थहीन हो चला था । परंतु स्टंटबाजी को ही राजनीति समझने वाले राहुल गाँधी अन्य विपक्षी नेताओं के साथ देर शाम छापामार शैली में उसके परिसर में घुस गए। बहाना था याचिका संबंधी औपचरिकताओं को पूरा करना। लेकिन उनके पीछे हजारों लोग भी आ गये । अप्रत्याशित रूप से आई बड़ी भीड़ की वजह से सर्वोच्च न्यायालय की सुरक्षा खतरे में पड़ गई। धक्का - मुक्की में अनेक लोग घायल भी हुए। कुछ देर की तमाशेबाजी के बाद हालांकि हुजूम लौट गया किंतु जाते - जाते ये संकेत दे गया कि अब विपक्ष न्यायपालिका को भी बलि का बकरा बनाने की योजना बना चुका है। दरअसल राष्ट्रपति पर दबाव बनाने का कोई अवसर तो विपक्ष को मिला नहीं। इसीलिए उसने श्री सूर्यकांत से मिलकर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना चाहा कि यदि विपक्ष की बात नहीं मानी गई तब ज्ञानेश कुमार जैसी घेराबंदी उनकी भी होगी । लेकिन वे इस चाल को भाँप गए और उन्होंने विपक्ष द्वारा भेजे गए मुलाकात के आवेदन का विधिवत जवाब देते हुए वैधानिक रास्ते पर चलने की नसीहत दे डाली। ये निश्चित तौर पर राहुल गाँधी के लिये बड़ा झटका था। इसीलिए याचिकाएं प्रस्तुत होने के बाद शाम के समय जब सर्वोच्च न्यायालय बन्द हो चुका था तब बड़े जुलूस के साथ उसके परिसर में किये गये शक्ति प्रदर्शन के पीछे न्यायपालिका को ये संदेश देने का उद्देश्य था कि भारत में भी बांग्लादेश और नेपाल जैसी अराजकता की जमीन तैयार है। यद्यपि अभी तक सर्वोच्च न्यायालय के विरुद्ध कोई टीका - टिप्पणी करने से परहेज किया जाता रहा किंतु हजारों की भीड़ के साथ सर्वोच्च न्यायालय के प्रांगण में बेवजह या यूँ कहें कि बलात प्रवेश में वे तमाम धमकियाँ छिपी हुई हैं जिन्हें बोल या लिखकर देना संभव नहीं था। उसके पहले दोपहर में श्री गाँधी तांडव और शिव जी की बारात जैसी बातों के जरिये भावी कार्यप्रणाली का स्वरूप संवाददाता सम्मेलन में जाहिर कर चुके थे। सर्वोच्च न्यायालय के भीतर हजारों की भीड़ शिव जी की बारात जैसी ही थी जिसके जरिये न्यायपालिका को तांडव का पूर्वाभ्यास करा दिया गया। प्रख्यात अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने तो क्रांति के जरिये तख्ता पलटने और खूनखराबे जैसी डरावनी टिप्पणियां तक कर डालीं । जिस प्रकार वामपंथी छात्र संगठन इंडिया गठबंधन और कॉकरोच जनता पार्टी दोनों के आंदोलनों में खुलकर शामिल हो रहे वह भी आँखें खोल देने वाला है क्योंकि जंगलों से नक्सलियों का सफाया हो जाने के बाद से शहरों में छिपे दिमागी नक्सली अराजकता फैलाने के रास्ते तलाश रहे हैं। चूंकि अब विपक्ष खुद सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएँ लगा चुका है इसलिए उसकी रणनीति चुनाव आयोग से आगे बढ़कर सर्वोच्च न्यायालय और विशेष रूप से मुख्य न्यायाधीश श्री सूर्यकांत को लक्ष्य बनाने की होगी। एक वर्तमान न्यायाधीश ने हाल ही में जिस प्रकार चुनाव आयोग के विरुद्ध सार्वजनिक मंच पर टिप्पणियाँ कीं उनसे विपक्ष को ये आभास हो गया कि न्यायपालिका में भी उसके शुभचिंतक हैं। ऐसे में मनमाफिक राहत न मिलने पर श्री सूर्यकांत को भी ज्ञानेश कुमार की तरह घेरने का प्रयास किया जाए तो आश्चर्य नहीं होगा।
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