Saturday, 10 October 2026

अदालती फैसले के बाद भी म.प्र में उलझा रहेगा ओबीसी आरक्षण मुद्दा



लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार म.प्र उच्च न्यायालय ने  उस अध्यादेश को असंवैधानिक मानते हुए रद्द कर दिया जिसके जरिये वर्ष 2019 में प्रदेश में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार ने ओबीसी के लिए सरकारी नौकरियों के साथ ही उच्च शिक्षा में 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया था। उस फैसले के विरुद्ध उच्च न्यायालय में दर्जनों याचिकाएं दायर की गईं। वहीं ओबीसी समाज का संगठन उसके पक्ष में खड़ा हो गया। सात वर्ष तक ये मामला अदालत में उलझा रहा। कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक आरोप -  प्रत्यारोप का अंतहीन सिलसिला भी चला। कांग्रेस का कहना था कि उसने ओबीसी के हित में निर्णय लिया था किंतु 2020 में कमलनाथ सरकार गिर जाने के बाद सत्ता में लौटी शिवराज सिंह चौहान की सरकार अदालत में उस फैसले के पक्ष में समुचित तथ्य पेश नहीं कर पाई। सही बात तो ये है कि कमलनाथ सरकार ने भी संवैधानिक बंदिशों का ध्यान रखे बिना राजनीतिक लाभ उठाने के लिए ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने के लिए अध्यादेश जारी किया। कांग्रेस के पास कानूनी दिग्गजों की लंबी फौज होने के बाद भी पता नहीं कमलनाथ जैसे होशियार व्यक्ति ने इस बात को क्यों नजरंदाज किया कि  सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक इंद्रा साहनी वाद (1992) के फैसले के अनुसार, सामान्य परिस्थितियों में सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसदी ही रहेगी। कमलनाथ सरकार के उस अध्यादेश का सवर्ण जातियों के अलावा अन्य आरक्षित समुदायों द्वारा भी विरोध किया गया। चूंकि उच्च न्यायालय इस पर स्थगन जारी कर चुका था इस कारण सरकारी चयन परीक्षाओं में चयनित अभ्यर्थियों के नियुक्ति पत्र  के अलावा विभागीय पदोन्नतियां रुकी पड़ी थीं। प्रकरण  सर्वोच्च न्यायालय भी गया जिसने उच्च न्यायालय को निश्चित समय सीमा में निपटारे का निर्देश दिया। अन्यथा ये मामला अभी भी विचाराधीन ही रहता। गत माह  इंदौर में आयोजित छात्रों की गूँज कार्यक्रम में एक युवती ने नियुक्ति पत्र न मिलने की शिकायत कांग्रेस नेता राहुल गाँधी से की जिस पर उन्होंने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पत्र लिखकर  कहा कि  चयनित प्रत्याशियों को नौकरी प्रदान की जाए। लेकिन उच्च न्यायालय ने उक्त अध्यादेश रद्द करते हुए नई नियुक्तियों में ओबीसी को पूर्ववत आरक्षण जारी रखने की व्यवस्था के बावजूद  ओबीसी वर्ग के उन लोगों की नौकरी सुरक्षित रखने का निर्देश दिया जिन्हें इस दौरान 27 फीसदी आरक्षण के अंतर्गत नियुक्ति मिली थी। गत दिवस आये फैसले के बाद कांग्रेस और भाजपा के बीच बयानों के बाण फिर चलने लगे हैं। सरकार के साथ ही कांग्रेस और ओबीसी महासंघ भी सर्वोच्च न्यायालय जाने की बात कह रहा है। हालांकि सभी जानते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय अपने पूर्व फैसले को पलटने जैसा कदम शायद ही उठायेगा किंतु राजनीतिक मजबूरियों के चलते ऐसे मामलों में सच्चाई को अनदेखा करने का चलन बन चुका है। जनसंख्या के आधार  पर आरक्षण का प्रतिशत तय करने की बात भी इसलिए अव्यवहारिक है क्योंकि तब तो उसका आंकड़ा 80 फीसदी या उससे भी ज्यादा हो सकता है। लेकिन वोट बैंक की राजनीति के बढ़ते प्रभाव के कारण राजनीतिक दलों के अलावा जो जातीय संगठन हैं वे भी दबाव समूह के तौर पर मैदान में कूद पड़ते हैं। म.प्र में 2003 से अब तक जितने भी मुख्यमंत्री बने उनमें 15 माह  सत्ता में रहे कमलनाथ को छोड़कर उमाश्री भारती, बाबूलाल गौर, शिवराज सिंह चौहान और वर्तमान में डॉ. मोहन यादव सभी ओबीसी समुदाय के हैं। इस वर्ग में अच्छी पैठ के कारण भाजपा नहीं चाहेगी कि उस पर ओबीसी विरोधी होने का आरोप लगे। इसी तरह कांग्रेस के लिए भी इस मुद्दे को जीवित रखना मजबूरी है। जातीय संगठनों को भी अपना प्रभाव जताने के लिए ऐसे मामलों में कूदना पड़ता है। चूंकि इन सबका असर चुनावों पर पड़ता है इसलिए न किसी को संविधान के सम्मान की चिंता है और न ही न्यायपालिका का लिहाज। ये देखते हुए कहना गलत न होगा कि म.प्र में ओबीसी आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाकर 27 प्रतिशत किये जाने संबंधी उक्त विवाद सर्वोच्च न्यायालय के अलावा राजनीति के मैदान में भी नजर आता रहेगा। हालांकि इससे पिछड़ी जातियों का कितना हित संवर्धन होगा इसकी चिंता किसी को नहीं रहती क्योंकि इन जातियों के नेता और उनके परिवारजनों का पिछड़ापन तो कब का दूर हो चुका है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


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