मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के त्यागपत्र को लेकर दिल्ली में चलाया जा रहा आंदोलन दिशाहीन होते हुए औचित्य खोने लगा है। पहले कुछ दिन इंडिया गठबंधन ने मोर्चा संभाला जिसमें कांग्रेस सहित तृणमूल, सपा, माकपा शिवसेना (उद्धव) सहित कुछ पार्टियों ने शिरकत की लेकिन द्रमुक और आम आदमी पार्टी के साथ ही कॉकरोच जनता पार्टी दूर रहीं। लेकिन जब पूरा श्रेय राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा लूटने लगे तब गठबंधन के घटकों में निराशा आने लगी। पंजाब के आगामी चुनाव को ध्यान में रखते हुए आम आदमी पार्टी ने भी कांग्रेस के साथ आने से परहेज किया। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा 10 तारीख को दिल्ली में जो आंदोलन किया उसमें अरविंद केजरीवाल ने गिरफ्तारी देकर ये बता दिया कि राहुल का नेतृत्व उन्हें मंजूर नहीं। इसी तरह इस आंदोलन में ममता बैनर्जी और केरलम के पूर्व मुख्यमंत्री विजयन द्वारा गिरफ्तारी देना दर्शाता है कि तृणमूल और वामपंथियों को श्री गाँधी की क्षमता पर विश्वास नहीं है। वैसे उन्होंने राहुल के साथ धरना - प्रदर्शन और गिरफ्तारी में भी शिरकत की थी। बावजूद उसके वे कॉकरोच जनता पार्टी के बुलावे पर पहुंचे। इससे भी बड़ी बात ये हुई कि 10 अक्टूबर को राहुल दिल्ली से हजारों कि.मी दूर चेन्नई जा पहुंचे। जहाँ उन्होंने छात्रों की गूँज कार्यक्रम आयोजित कर रखा था। वहाँ भी विपक्ष की फूट देखने मिली जब वे पुराने साथी पूर्व मुख्यमंत्री स्टालिन की नाराजगी दूर करने की बजाय मुख्यमंत्री जोसेफ विजय से मिलने जा पहुंचे। राहुल का उस दिन दिल्ली में न होना उस श्रेष्ठता भाव का प्रमाण है जिसके कारण इंडिया गठबंधन आज तक एकजुट न हो सका। सरकार को ये बात अच्छी तरह समझ में आ गई और इसीलिए उसने कॉकरोच के आंदोलन को जमने ही नहीं दिया। ये भी देखने मिला कि शुरुआती रस्म अदायगी के बाद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी दिल्ली में समय खराब करने के बजाय उ.प्र चुनाव की तैयारियों में समय लगाना बेहतर समझा। आज होने वाले मार्च में भी उनका शामिल होना अनिश्चित है। एक बात ये भी कि इंडिया गठबंधन के आंदोलन में जहाँ सांसदों और बड़े चेहरों का बाहुल्य है वहीं कॉकरोच जनता पार्टी के बुलाने पर नई पीढ़ी आती है। ये बात अलग है कि वह आंदोलन आकार नहीं ले सका। इसी तरह नेहा बोरा नामक वामपंथी छात्र नेता ने भी कांग्रेस की बजाय कॉकरोच के साथ खड़े होना बेहतर समझा। धीरे - धीरे ये अवधारणा विपक्ष के भीतर स्थापित होती जा रही है कि इस आंदोलन को वैसी सफलता नहीं मिलेगी जैसी अपेक्षा थी। इसका सबसे बड़ा कारण ज्ञानेश कुमार का संवैधानिक पद पर होना है। इसीलिए उन पर बनाये जा रहे दबाव का असर नहीं दिख रहा। इसका प्रमाण विपक्ष के 200 सांसदों को मिलने का समय नहीं दिया जाना है। हालांकि राहुल गाँधी सहित अनेक विपक्षी नेताओं ने राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू से मुलाकात कर मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध आरोप पत्र सौंपा। लेकिन उन्होंने भी प्रमाण दिये जाने की शर्त पर कार्रवाई का दिलासा देकर उनको विदा कर दिया। उसके बाद विपक्ष की ओर से सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से मिलने का समय मांगा गया। लेकिन उन्होंने भी ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग संबंधी याचिकाओं के विचाराधीन होने के आधार पर मिलने से मना कर दिया। ऐसे में अब विपक्ष , विशेष रूप से कांग्रेस के अवसर सिमट रहे हैं। उसे मालूम है संसद में महाभियोग लाकर ज्ञानेश कुमार को हटाना नामुमकिन है। राष्ट्रपति ने हालांकि विपक्षी प्रतिनिधिमंडल से सौजन्य भेंट तो की किंतु साथ ही सबूत भी मांग लिया। मुख्य न्यायाधीश द्वारा मिलने से इंकार कर देने के बाद अब आंदोलन को लंबा खींचना मुश्किल होता जायेगा। नवरात्रि शुरू होने से आंदोलन का माहौल नहीं है। और दशहरा - दीपावली सीजन के कारण बाजारों में भीड़भाड़ बढ़ेगी। नवंबर के बाद विवाह के मुहूर्त हैं और दिसम्बर आते - आते उ.प्र , पंजाब और उत्तराखंड चुनाव की तैयारियां जोर पकड़ लेंगी। इन सब परिस्थितियों को भांपकर ही सरकार भी झुकने को तैयार नहीं दिख रही। कुल मिलाकर इस मुद्दे पर विपक्ष के हाथ खाली रहने की संभावना ही अधिक है। रही बात कॉकरोच जनता पार्टी की तो ये बात साबित हो चुकी है कि वह आम आदमी पार्टी की मानस पुत्री ही है जिसे पैदा ही अशांति फैलाने किया गया है। ऐसे में न्यायपालिका ही कोई धमाका कर दे तो बात अलग वरना कुछ होता नहीं दिखता।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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