फैसले लेना और फिर उसे ठंडे बस्ते में डाल देने वाले व्यक्ति की विश्वसनीयता खत्म हो जाती है। इसी तरह धमकी देकर कदम पीछे खींच लेने वाला अपना रुतबा गँवा बैठता है। उक्त दोनों बातें अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पर सटीक बैठती हैं। जबसे वे दोबारा राष्ट्रपति बने तबसे पूरी दुनिया को बेवजह परेशानी में डालते रहते हैं। ऊलजलूल निर्णय लेकर वे पहले तो किसी भी देश पर बिना वजह रौब दिखाने लगते हैं । लेकिन वह दबाव में नहीं आया तब अपने फैसले को रोकने का बचकाना रवैया दिखाने में भी पीछे नहीं रहते। अमेरिका का व्यापार घाटा कम करने के लिए उन्होंने तमाम देशों पर टैरिफ (आयात शुल्क) की दरें बढ़ा दीं। इनमें भारत और चीन प्रमुख है। इनसे ट्रम्प की नाराजगी का कारण रूस से कच्चा तेल खरीदना है। ट्रम्प का कहना है इसकी वजह से रूस को यूक्रेन के साथ लड़ाई लम्बी खींचने में सहायता मिलती है। टैरिफ की दरें 10 से बढ़ाकर 25 फीसदी तक की गईं। हालांकि चीन के प्रति ट्रम्प वैसी सख्ती नहीं दिखा सके क्योंकि उसके पास उन खनिजों का भंडार है जिनकी आपूर्ति रुक जाने से अमेरिका की अर्थव्यवस्था का भट्टा बैठ जाएगा। इसीलिए ज्योंही चीन ने उनका निर्यात रोकने की धमकी दी त्योंही ट्रम्प के तेवर ठंडे पड़ गए। गत माह उन्होंने भारत और चीन पर रूस से कच्चा तेल खरीदी जारी रखने के कारण 100 फीसदी टैरिफ लगाने सम्बन्धी निर्णय अमेरिकी संसद से पारित करवाकर दबाव बढ़ाने की चाल चली। इसके लिए 18 अक्टूबर तक की मोहलत भी दी। लेकिन न चीन झुका और न ही भारत। उल्टे अमेरिका में डीजल - पेट्रोल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आने से जनता की नाराज़गी बढ़ने से ट्रम्प की चिंता बढ़ गई। उल्लेखनीय है 3 नवंबर को अमेरिका में मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं। अमेरिकी कांग्रेस( संसद) के निचले सदन की सभी 435 सीटों और ऊपरी सदन सीनेट की 100 में से 35 सीटों पर चुनाव होना है। इसके अलावा, 36 राज्यों में गवर्नर पद के चुनाव और कई स्थानीय चुनाव भी निर्धारित हैं। इसे मध्यावधि चुनाव इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के बीच में होता है। अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव चार साल में होता है, जबकि प्रतिनिधि सभा के सदस्यों का कार्यकाल दो साल का होता है। सीनेटर छह साल के लिए निर्वाचित होते हैं, इसलिए हर दो वर्ष में सीनेट की करीब एक-तिहाई सीटों पर चुनाव होता है। यद्यपि इन चुनाव परिणामों से ट्रम्प की गद्दी पर असर नहीं पड़ेगा किंतु संसद में उनकी पार्टी को बहुमत न मिला तब उनके लिए अपनी नीतियों और निर्णयों को मंजूर करवाना कठिन होगा। इसीलिए वे डीजल - पेट्रोल की उछलती कीमतों से परेशान थे। ईरान से युद्ध के लिए अमेरिकी जनता ट्रम्प की नीतियों को जिम्मेदार मान रही है। जनमत सर्वेक्षणों में उनकी लोकप्रियता भी लगातार घटती जा रही थी। घरेलू मोर्चे पर हालत खराब होते देख ट्रम्प ने बहुत बड़ी पलटी मारी जिससे रूसी तेल खरीदने को लेकर भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ का खतरा फिलहाल टल गया है। उन्होंने रूस से होने वाले ऊर्जा निर्यात से जुड़े प्रतिबंधों, पाबंदियों और शुल्कों को लागू करने से छूट दे दी है। यह कदम तब उठाया गया है जब ट्रम्प ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ एक समझौता किया जिसके अनुसार रूस शुरुआत में 300,000 टन से ज्यादा डीजल अमेरिका को बेचेगा और इसके बाद नवंबर और आने वाले महीनों में और खेप भेजी जाएंगी। ट्रम्प ने हालांकि 100 टैरिफ लगाने का अधिकार सुरक्षित रखा है लेकिन अमेरिका जिस प्रकार आर्थिक संकट में घिरता जा रहा है उसे देखते हुए ट्रम्प दोबारा इस दिशा में आगे बढ़ेंगे इसकी संभावना कम ही है। और यदि 3 नवम्बर को होने जा रहे चुनाव के नतीजे विरुद्ध गए तब उनकी अकड़ में भी निश्चित तौर पर कमी आयेगी। सबसे बड़ी बात ये हुई कि उनके दबाव के आगे भारत ने जिस तरह झुकने से इंकार किया उसने उनके गणित को बिगाड़ दिया। जब भी रूस से कच्चे तेल खरीदने पर टैरिफ बढ़ाने की धमकी अमेरिका ने दी , भारत ने साफ कह दिया कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए किसी भी देश से खरीदी करता रहेगा। प. एशिया में संकट के कारण नये स्रोत तलाशने के बावजूद रूस से कच्चे तेल का आयात कम होने की बजाय बढ़ाकर भारत ने ट्रम्प की हेकड़ी निकाल दी। इसके अलावा ट्रेड डील के मामले में भी झुकने से मना कर दिया। ट्रम्प द्वारा 100 फीसदी टैरिफ का फैसला वापिस लेना भारतीय विदेश नीति की बड़ी सफलता है। इससे स्पष्ट हो गया कि दुनिया झुकती है झुकाने वाला चाहिए।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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