कुछ वर्ष पहले जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में आंदोलनजीवी शब्द का उपयोग किया तब विपक्ष ने इस पर खूब बवाल मचाया। उसका कहना था कि प्रधानमंत्री ने उन लोगों का मजाक बनाया जो जनहित के लिए आवाज उठाते हैं। लोकतंत्र में जनांदोलन अपनी मांगों को रखने के साथ ही सरकार के विरोध का प्रचलित तरीका है। भारत के स्वाधीनता संग्राम ने पूरे विश्व को ये सिखाया कि हिंसा का सहारा लिए बिना भी ब्रिटिश सत्ता जैसी वैश्विक शक्ति को झुकाया जा सकता है। भारत की आजादी के बाद अनेक देशों ने शांतिपूर्ण अहिंसक आंदोलन के जरिये विदेशी दासता से मुक्ति हासिल की। दक्षिण अफ्रीका के नेल्सन मंडेला तो लगभग तीन दशक तक कारागार में रहने के बाद भी अहिंसक आंदोलन के महानायक बनकर राष्ट्रपति बने। भारत में तो राजनीति और आंदोलनों का चोली दामन का साथ रहा है। आजादी के आंदोलन में शामिल अग्रणी पंक्ति के अनेक नेता जहाँ सत्ता प्रतिष्ठान के शीर्ष पर विराजमान हुए वहीं उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर ब्रिटिश हुकूमत से लड़ने वाले उतने ही लोकप्रिय और सम्मानित नेताओं ने सैद्धांतिक विरोध के चलते विपक्ष में बैठना पसंद किया। विपक्ष में रहते हुए कुछ नेता श्रमिकों के हितों में संघर्ष के रास्ते पर चले तो कुछ ने कर्मचारियों , किसानों और छात्रों के संगठन भी बनाये। सभी क्षेत्रों के लोगों ने अपनी मांगों के लिए हड़ताल, धरना, प्रदर्शन, रैली अनशन जैसे तरीके अपनाये। राजनीतिक दलों द्वारा भी ग्रामीण क्षेत्र से लेकर तो राजधानी दिल्ली तक में आंदोलनों के जरिये शक्ति प्रदर्शन किया। लेकिन समय के साथ उनका स्तर गिरने से अनुशासनहीनता का बोलबाला हो गया। वाजिब मांगों के बजाय अनुचित दबाव बनाने की प्रवृत्ति जोर पकड़ने लगी। इसके लिए राजनीतिक दलों को दोष देना गलत नहीं होगा जिन्होंने किसी आंदोलन के पीछे छिपे निहित उद्देश्यों को जांचे बिना ही अपने फायदे के लिए उसका समर्थन किया। हालांकि ये स्वीकार करना होगा कि आंदोलनों से कर्मचारियों, मजदूरों और किसानों की स्थिति में सुधार हुआ किंतु दूसरी तरफ इसका लाभ संगठित क्षेत्र को ही मिलता रहा। अर्थात दबाव समूह से जुड़ा तबका तो अपनी बात मनवाने में कामयाब हो गया किंतु बहुत बड़ा वर्ग असंगठित होने से वंचितों की श्रेणी में जीने बाध्य है। यही विसंगति देश के सामने मौजूद अनेक समस्याओं की जड़ है। और इसीलिए आंदोलनों के प्रति व्यक्त की जाने वाली भावनाएं बदलने लगीं। हमारे देश में दो बड़े जनांदोलनों के बाद केंद्रीय सत्ता बदली।। इनमें जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुआ संपूर्ण क्रांति आंदोलन जिसके कारण आपातकाल लगा और जब चुनाव करवाये गए तब इंदिरा गाँधी को सत्ता गँवाना पड़ी। उसी तरह अन्ना हजारे द्वारा लोकपाल की स्थापना के लिए किये आंदोलन ने डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार के जाने का रास्ता बनाया। लेकिन बीते कुछ सालों में देश जिस तरह के आंदोलन देख रहा है उनमें जनहित की आड़ में देशहित को नुकसान पहुंचाने का जो खेल हो रहा है वह खतरनाक है। चाहे मुद्दा किसानों का हो, दलितों या पिछड़ों का हो, कर्मचारी - श्रमिकों का या छात्रों का। उसके समर्थन में कुछ घिसे - पिटे चेहरे आगे - आगे घूमते दिख जाएंगे। कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली की सीमा पर साल भर चले धरने और शाहीन बाग में सड़क घेरकर किये आंदोलन को प्रोत्साहन और समर्थन देने एक वर्ग विशेष की सक्रियता चर्चा का विषय बनी। जंतर मंतर पर हुए हालिया आंदोलन के दौरान भी वही लोग मौजूदगी दर्ज करवाते नजर आये । उसी तरह नीट परीक्षा के पेपर लीक होने वाले मामले से शुरू होकर मुख्य चुनाव आयुक्त के त्यागपत्र और एसआईआर रद्द करने के लिए हो रहे आंदोलन में भी अनेक समान चेहरे देखे जा सकते हैं। कभी - कभी तो लगता है इन लोगों की रोजी - रोटी ही आंदोलनों से जुड़ी हुई है। और इसीलिए इन आंदोलनों का स्वरूप बिखरा - बिखरा नज़र आता है। किसान आंदोलन, शाहीन बाग और अब चुनाव आयोग के विरुद्ध सड़कों पर उतरे लोगों के साथ चंद ऐसे लोग अनिवार्य रूप से जुड़ गए हैं जिन्हें आंदोलनजीवी कहा जाना सर्वथा उचित है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने कॉकरोच जनता पार्टी के दो नेताओं की उम्र जानने के बाद कटाक्ष किया कि वे जेन जी नहीं हैं। कुल मिलाकर ये देखने मिल रहा है कि जनांदोलन के नाम पर कुछ ऐसे पेशेवर लोग खुद को नेता साबित करने में लगे हुए हैं जिन्हें जनता धूल चटा चुकी है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि इन्हीं धंधेबाजों की वजह से आंदोलन अपनी साख खो बैठते हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
No comments:
Post a Comment