Thursday, 22 October 2026

कॉकरोच जनता पार्टी का खोखलापन सामने आ गया



कॉकरोच जनता पार्टी के बारे में अवधारणा थी कि इसका सबसे बड़ा नेता अभिजीत दिपके है जिसने देश के मुख्य न्यायाधीश  द्वारा युवकों को लेकर कॉकरोच शब्द का उपयोग किये जाने की प्रतिक्रिया स्वरूप अमेरिका में बैठे - बैठे इस पार्टी का सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर गठन किया। देखते - देखते आभासी माध्यम पर  करोड़ों लोग उससे जुड़ गए जिनमें अधिकतर युवा ही थे। जून में अभिजीत  भारत लौटे। उस समय नीट परीक्षा के पेपर लीक हो जाने से दुखी होकर कुछ छात्रों द्वारा आत्महत्या किये जाने से छात्र और युवाओं में गुस्सा था। यद्यपि कांग्रेस  उस मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन करते हुए उस समय के  शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग कर रही थी। लेकिन सरकार ने उसे नजरंदाज कर दिया। यदि उसी समय उनको मंत्रीपद से हटा दिया जाता तब  शायद कॉकरोच जनता पार्टी को मौका नहीं मिलता। लेकिन अभिजीत जब अमेरिका से आये तब सरकार ने  उन्हें जरूरत से ज्यादा महत्व देते हुए जंतर मंतर पर सभा की अनुमति दे दी। उनके साथ अचानक सौरव दास और आशुतोष रांका नामक दो और युवक सामने आए जिनके बारे में लोगों को कुछ पता नहीं था। उसी सभा में श्री प्रधान के त्यागपत्र के लिए लिए  अंतिम तिथि तय करते हुए आंदोलन की चेतावनी भी दी गई। त्यागपत्र न होने पर जंतर मंतर में धरना शुरू हुआ। जिसमें जेएनयू की टुकड़े - टुकड़े गैंग और आम आदमी पार्टी खुलकर सामने आ गईं। धीरे - धीरे स्पष्ट हो गया कि अभिजीत , सौरव और आशुतोष आम आदमी पार्टी के लिए काम करते  रहे हैं। बहरहाल शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र सहित कुछ और मांगों पर केंद्र से समझौता होने पर आंदोलन समाप्त हो गया और  कॉकरोच जनता पार्टी ने राजनीति से दूर रहकर दबाव समूह के तौर पर शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त समस्याओं और विसंगतियों को दूर करने हेतु काम करने का ऐलान किया। उसके नेता विद्यालयों के निरीक्षण जैसे कामों में जुट गये। हालांकि सरकार को धमकाना उनकी आदत सी बन गई। इसी समय एक अखबारी रिपोर्ट के आधार पर विपक्षी पार्टियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के त्यागपत्र के लिए आंदोलन छेड़ दिया। अभी तक शिक्षा जगत तक खुद को सीमित रखने वाली कॉकरोच जनता पार्टी  भी बहती गंगा में हाथ धोने दिल्ली में सक्रिय हो गई। उसे लगा कि श्री प्रधान के त्यागपत्र की तर्ज पर वह ज्ञानेश कुमार का त्यागपत्र भी करवा लेगी। लेकिन इस बार उसका आकलन गलत हो गया। दूध से जली सरकार ने छाछ फूंककर पीने की कहावत चरितार्थ करते हुए जो मोर्चेबंदी की उसमें कॉकरोच जनता पार्टी उलझ गई। निषेधाज्ञा तोड़ने पर हिरासत में लिए जाने के बाद शांति भंग न करने का लिखित वचन पत्र देकर उसके तीनों नेता बाहर तो आ गए किंतु जंतर मंतर को प्रतिबंधित किये जाने के बावजूद भी वहाँ तिरंगा यात्रा निकालने का दुस्साहस कर बैठे। अभिजीत को तो पहले ही   गिरफ्तार कर छोड़ भी दिया गया किंतु सौरव और आशुतोष  बैरिकेड लाँघकर प्रतिबंधित क्षेत्र में तिरंगा लेकर पहुंचे तो गिरफ्तार करने के बाद जेल भेज दिये गए। सप्ताह पर बाद गत दिवस दोनों जमानत पर रिहा तो हो गए किंतु मामला क्राइम ब्रांच को दिये जाने से जाँच के शिकंजे में फंस गए। आज ही उन्हें क्राइम ब्रांच ने बुलावा भेज दिया। पूरे देश को जंतर मंतर बना देने की डींग हांकने वाले कॉकरोच नेता अब अपने बचाव में लग गए हैं। अभिजीत सफाई देते फिर रहे हैं कि पार्टी का उद्देश्य ज्ञानेश कुमार का त्यागपत्र ही है। सरकार बदलने और बांग्लादेश तथा नेपाल में हुए आंदोलनों से उसे कुछ लेना देना नहीं है। और तो और वे यहाँ तक बोल गए कि पार्टी के बड़े नेता सौरव दास और आशुतोष रांका  हैं , वे तो उनके आदेशानुसार काम करते हैं। उनका ये बयान रहस्यमय है। श्री प्रधान के त्यागपत्र के मामले में सरकार को झुकाने में सफलता मिलने से सातवें आसमान पर उड़ने लगे सौरव और आशुतोष की सारी अकड़ उच्च न्यायालय ने निकालते हुए उन्हें जेन जी मानने से ही इंकार करते हुए जो फटकार लगाई उसके बाद इस पार्टी का खोखलापन उजागर हो गया। असल में उसके तीनों नेता खुद को कानून से ऊपर समझने की गलती कर गए। उनके जेल जाने का विरोध करती  युवाओं की फौज कहीं नजर नहीं आई जिसका संकेत साफ है। आम आदमी पार्टी छोड़कर बाकी के राजनीतिक दल  इस नई नवेली पार्टी के कानूनी पचड़ों में फंस जाने से मन ही मन खुश हैं क्योंकि ये  एकला चलो की नीति पर चल रही थी। अब इज्जत बचाने के लिए अभिजीत, सौरव और आशुतोष अपने  गॉड फादर अरविंद केजरीवाल की शरण में जाएंगे किंतु जिस तरह काठ की हांडी दोबारा नहीं चढ़ती ठीक वैसे ही कॉकरोच जनता पार्टी भी जुलाई जैसा आंदोलन दोबारा खड़ा नहीं कर पाएगी क्योंकि उसके पास न तो कोई सैद्धांतिक आधार है और न ही संगठनात्मक ढांचा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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