Friday, 23 October 2026

बद्र समझौता : ईरान के विरुद्ध मुस्लिम देशों की मोर्चेबंदी



अगस्त माह में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने मिलकर  मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट हस्ताक्षरित किया था। इसे इस्लामिक नाटो नाम दिया गया क्योंकि इसके तहत किसी एक देश पर हुआ सशस्त्र हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा । जैसी कि नाटो नामक संगठन में व्यवस्था है जिसका नेतृत्व अमेरिका करता है। इसका गठन शीतयुद्ध के दौर में सोवियत संघ के विरोध में किया गया था। इसके तहत जरूरत पड़ने पर परमाणु और मिसाइल सुरक्षा के साथ-साथ साझा सैन्य ट्रेनिंग और खुफिया जानकारी  का लेनदेन भी शामिल है। इसके मुकाबले सोवियत संघ द्वारा वारसा पैक्ट नामक ऐसी ही संधि की गई थी। इन दोनों के अलावा एक तीसरा संगठन गुट निरपेक्ष सम्मेलन के नाम से बना जो उक्त नाटो और वारसा दोनों संधियों से अलग था। इसके नेता के तौर पर भारत के पं. जवाहरलाल नेहरू, यूगोस्लाविया के मार्शल टीटो, मिस्र के  कर्नल नासेर और इंडोनेशिया के सुकर्णों थे। सोवियत संघ के विघटन के बाद शीतयुद्ध की समाप्ति हो गई। इसके बाद उदारीकरण के अंतर्गत विश्व व्यापार संगठन अस्तित्व में आया जिसके कारण समूचा विश्व एक बड़े बाजार में तब्दील हो गया। यहाँ तक कि चीन जैसे कट्टर साम्यवादी देश ने भी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के प्रभाव में आकर अपने दरवाजे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खोल दिये। इसके बाद चीन भी अमेरिका की टक्कर में एक आर्थिक महाशक्ति के तौर पर उभर गया। इसके साथ ही उसने सैन्य महाशक्ति के रूप में भी खुद को स्थापित कर लिया। इसके चलते दुनिया का शक्ति संतुलन भी बदलने लगा। धीरे - धीरे और शक्ति केंद्र भी अपनी जगह बनाते चले गए। लेकिन शीतयुद्ध के भयावह दौर से निकलकर दुनिया में आर्थिक विकास की होड़ बीते तीन दशकों में देखने मिली जिसमें अमेरिका के साथ ही चीन, भारत, ब्राज़ील, और द. अफ्रीका जैसे नये खिलाड़ी मैदान में नजर आने लगे। इसकी वजह से अमेरिका की चौधराहट को चुनौती मिलने लगी। लेकिन  अचानक दुनिया दो ऐसी लड़ाइयों में उलझ गई जिनकी वजह से सब उलट - पुलट हो गया। पहले रूस - यूक्रेन और फिर अमेरिका - ईरान के बीच चल रहे युद्ध ने सभी स्थापित संतुलन बिगाड़ दिये। रही - सही कसर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सनकीपन ने पूरी कर दी। रूस - यूक्रेन युद्ध तो एक क्षेत्र विशेष तक सीमित है लेकिन ईरान ने अमेरिका और इजरायल के हमले के प्रत्युत्तर में जवाबी हमला करते हुए अन्य इस्लामिक देशों तक फैला दिया। ये एक अभूतपूर्व स्थिति है क्योंकि इसके पहले तक इजरायल के विरुद्ध समूचा इस्लामिक जगत एकजुट हो जाता था। लेकिन इस जंग ने इस्लामिक देशों में भी गुटबाजी पैदा कर दी। मक्का पैक्ट इसी की उपज थी। लेकिन सऊदी अरब के विरुद्ध हूती हमलों को जिस प्रकार ईरान समर्थन दे रहा है और अमेरिका सहित अन्य पश्चिमी देशों ने मदद से हाथ पीछे खींचे उसके कारण कुछ इस्लामिक देशों में सैन्य आत्मनिर्भरता की भावना जागी जिसका प्रमाण गत दिवस कतर की राजधानी दोहा में पाकिस्तान, तुर्किये, कतर और इंडोनेशिया द्वारा किया गया बद्र समझौता है जिसके तहत ये देश मिलकर हथियार और सैन्य तकनीक का साझा उत्पादन करेंगे। इसका उद्देश्य हथियारों के लिए पश्चिमी देशों पर निर्भरता घटाना, आपसी रक्षा उद्योग को बढ़ावा देना और सैन्य तकनीक का आदान-प्रदान करना है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बद्र समझौते से ये  आने वाले समय में वैश्विक स्तर पर एक नया रक्षा समीकरण बन सकता है।  विचारणीय बात ये है कि क्या ये केवल ईरान से बचाव के लिए बना या इजरायल के विरुद्ध भी इसका उपयोग होगा। इससे भी बड़ी बात ये है कि तुर्किये और पाकिस्तान के कारण इससे भारत को भी सतर्क रहना पड़ेगा। दूसरी बात ये है कि अमेरिका इसे लेकर क्या रवैया अपनाता है क्योंकि वह नहीं चाहेगा कि सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान सैन्य आत्मनिर्भरता हासिल करें अन्यथा उसका अपना धंधा चौपट हो जायेगा। भारत को भी इस नये समझौते के जवाब में कुछ न कुछ करना होगा क्योंकि वह खुद हथियारों के निर्यातक के रूप में उभर रहा है। देखने वाली बात ये भी होगी कि इसके बाद इस्लामिक देशों के संगठन का क्या होगा क्योंकि ईरान ने उसकी जड़ें हिला दी हैं। कुल मिलाकर दुनिया का शक्ति संतुलन जिस तरह बदल रहा है उसमें बद्र समझौता एक नये अध्याय की शुरुआत कहा जा सकता है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी




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