इजरायल के आम चुनाव संपन्न होने के बाद जो एग्जिट पोल आ रहे हैं उनमें से ज्यादातर का मानना है की प्रधानमंत्री नेतन्याऊ सत्ता से बाहर होने जा रहे हैं। उनके मुकाबले पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइज़ेनकोट मजबूत स्थिति में नज़र आ रहे हैं।गत दिवस संपन्न मतदान के बाद अनेक चुनाव सर्वेक्षण एजेंसियों सहित स्वतंत्र राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, मुकाबला बेहद कड़ा है और किसी को भी स्पष्ट बहुमत की संभावना नहीं दिख रही है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के गठबंधन में शामिल दक्षिणपंथी और अति-रूढ़िवादी दलों के गुट को लगभग 52 सीटें मिलने का अनुमान है जिसमें उनकी अपनी लिकुड पार्टी को 27 सीटें मिल सकती हैं। वहीं दूसरी तरफ पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइज़ेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गुट को लगभग 49 सीटें मिलने का अनुमान है। इस चुनाव में अरब अल्पसंख्यक पार्टियों के प्रदर्शन पर सबकी निगाहें लगी हैं जिन्हें करीब 19 सीटें मिलने की संभावना है। इजरायल की संसद में कुल 120 सदस्य होते है। ऐसे में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की आवश्यकता होती है।यद्यपि परिणाम 4 नवम्बर तक आयेंगे किंतु प्रारंभिक संकेतों के आधार आंकड़ों के आधार पर न तो नेतन्याहू का गुट और न ही विपक्ष अकेले दम पर बहुमत का आंकड़ा छू पा रहा है। जो स्थितियाँ बनती दिख रही हैं उनमें सत्ता हासिल करने के लिए दोनों नेताओं को छोटी पार्टियों के समर्थन की आवश्यकता होगी। इजरायल की राजनीति पर बीते चार साल से चले आ रहे युद्ध की छाया साफ नजर आ रही है। वहाँ की जनता युद्ध से घबराती नहीं है लेकिन एक वर्ग का मानना है कि चुनाव के बाद नई सरकार के गठन में अनेक समीकरण देखने मिल सकते हैं। पहली संभावना यह है कि आइज़ेनकोट उन अन्य पार्टियों के साथ हाथ मिला लें जो किसी भी कीमत पर नेतन्याहू को सत्ता से हटाने पर आमादा हैं। इन पार्टियों में वामपंथी और दक्षिणपंथी नेता शामिल हैं। हालांकि इनके बीच कई मुद्दों पर मतभेद हैं, लेकिन नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के नाम पर वे साथ आने राजी हैं। बावजूद इसके ऐसा गठजोड़ आसान नहीं हो सकता क्योंकि इन पार्टियों को यह तय करना होगा कि प्रधानमंत्री किसे बनाएं और नई सरकार की नीतियाँ कौन सी होंगी। एक संभावित समीकरण ये भी है कि नेतन्याहू और उनके सहयोगी विपक्षी दलों पर निर्भर हुए बिना सरकार बनाने के लिए पर्याप्त सीटें जीत लें जबकि इससे इतर बनने वाली स्थिति राजनीतिक गतिरोध की है, जिसमें नेतन्याहू के गठबंधन और विपक्ष दोनों को सरकार बनाने के लिए आवश्यक 61 सीटें नहीं मिलेंगी। ऐसे में विपक्ष को अधिक सीटें मिलने पर भी, उसके दल सरकार बनाने में सहयोग करने से पीछे हट सकते हैं। इसी तरह कुछ दक्षिणपंथी दल , अरब दलों के साथ सहयोग करने से मना कर सकते हैं। प्रधानमंत्री के नाम पर भी उनमें मतभेद उभर सकते हैं। स्मरणीय है 2019 से 2022 के बीच इजरायल को पांच चुनाव देखने पड़े क्योंकि विभिन्न दलों में सरकार बनाने के लिए एक राय नहीं बन पाती थी। कुछ विश्लेषक एक और विकल्प की बात कर रहे हैं जो अल्पमत सरकार का है। ऐसी स्थिति में, आइज़ेनकोट या कोई अन्य विपक्षी नेता अरब पार्टियों को गठबंधन से बाहर रखकर उनके समर्थन से सरकार बनाने की कोशिश कर सकता है।पूरे परिणाम घोषित होने के बाद राष्ट्रपति इसहाक हर्ज़ोग विभिन्न दलों के नेताओं से मुलाकात करेंगे और उनसे पूछेंगे कि वे अगली सरकार का नेतृत्व करने के लिए किसका समर्थन करते हैं। इसके बाद वे उस उम्मीदवार का चयन करेंगे जिसके बारे में उन्हें लगता है कि गठबंधन सरकार बनाने की सबसे अच्छी संभावना है। उस उम्मीदवार को अन्य दलों से बातचीत करनी होगी और सरकार बनाने के लिए पर्याप्त समर्थन जुटाना होगा। इन चर्चाओं में कई सप्ताह या महीने भी लग सकते हैं। इस बार रिकार्ड तोड़ मतदान के कारण भी परिणामों का अनुमान लगाना मुश्किल हो गया है। इस चुनाव को लेकर इजरायल में जितनी उत्सुकता है उतनी ही भारत में भी है क्योंकि वर्तमान प्रधानमंत्री नेतन्याहू और नरेंद्र मोदी के बीच काफी नजदीकी रिश्ते हैं। इसके कारण दोनों देशों की दोस्ती मजबूत हुई। भारत के प्रमुख रक्षा सहयोगी के रूप में इजरायल की गिनती होती है। ऐसे में नेतन्याहू यदि हटते हैं तब सवाल खड़ा होगा कि क्या उनके उत्तराधिकारी के साथ भी भारत की जुगलबन्दी इसी तरह जारी रहेगी या उसमें अंतर आयेगा। लेकिन इजरायल के लिए भारत से बेहतर रणनीतिक तालमेल रखना उतना ही जरूरी है जितना हमारे लिए। भारत उसके रक्षा उपकरणों सहित अन्य तकनीकी उत्पादों का बड़ा खरीददार है। साथ ही इजरायल के प्रति आम भारतीय के मन में हमदर्दी है। प. एशिया की मौजूदा स्थिति में इजरायल को भारत के समर्थन की बेहद जरूरत है। हालांकि किसी निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए नई सरकार के बनने की प्रतीक्षा करनी होगी।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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