हालांकि कुछ राज्यों में हुए स्नातक और शिक्षक श्रेणी के विधान परिषद चुनाव परिणामों के आधार पर कोई बड़ी भविष्यवाणी करना तो जल्दबाजी होगी परंतु राष्ट्रीय पार्टी होने से कांग्रेस और भाजपा के लिए देश के किसी भी हिस्से में मिली जीत या हार मायने रखती है। उस दृष्टि से उ.प्र, बिहार और महाराष्ट्र में भाजपा को जैसी सफलता मिलनी चाहिए थी वैसी नहीं मिलना उसके लिए चिंता का विषय है। उ.प्र में भले ही उसने पिछला प्रदर्शन दोहराया किंतु प्रधानमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी और रक्षा मंत्री के गढ़ लखनऊ में समाजवादी पार्टी से मिली हार उसके लिए शोचनीय है। यद्यपि 11 में से 6 सीटें जीतकर भाजपा ने यथास्थिति बनाये रखी परंतु सपा का 3 से 5 पर आ जाना अखिलेश यादव के लिए उत्साहवर्धक है। इस चुनाव में शिक्षक और स्नातक वर्ग के मतदाता होने से इसे सुशिक्षित लोगों का चुनाव कहा जाता है। उस लिहाज से भाजपा के लिए ये एक चेतावनी हैं जो योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में तीसरी बार सरकार बनाने के प्रति आश्वस्त नजर आ रही है। यद्यपि अभी तक जितने भी चुनाव पूर्व सर्वेक्षण हुए वे योगी सरकार की वापसी के संकेत दे रहे हैं। लेकिन गत लोकसभा चुनाव में उ.प्र ने ही भाजपा को स्पष्ट बहुमत से वंचित कर दिया था। इसलिए विधान परिषद चुनाव में सपा का प्रदर्शन विधानसभा चुनाव में कड़े मुकाबले का संकेत कहा जा सकता है। पड़ोसी राज्य बिहार में यद्यपि भाजपा और जनता दल (यू) ने 8 में से 4 सीटों पर जीत हासिल की वहीं एक लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद और एक प्रशांत किशोर की जनसुराज के खाते में गई जबकि शेष दो पर निर्दलीय जीते। राजद का एक सीट पर सिमटना भाजपा के लिए संतोषजनक हो सकता है किंतु जनसुराज का एक सीट जीतना बिहार में नये विकल्प की संभावना को बल देता है। 2 निर्दलीयों की जीत भी सत्तारूढ़ भाजपा - जनता दल (यू) के लिए चेतावनी है। तीसरे राज्य महाराष्ट्र से भी भाजपा के लिए अच्छी खबर नहीं आई जहाँ 1 सीट उसे और 1 सहयोगी शिवसेना ( शिंदे) के हाथ लगी किंतु शेष 3 सीटों में से 2 एनसीपी (शरद पवार ) को मिलीं। वहीं पूरे देश में कांग्रेस को केवल नागपुर में सफलता मिली जो भाजपा के लिए बड़ा झटका है क्योंकि वह केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी और मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस का गृहनगर है । यद्यपि कर्नाटक में भाजपा ने 4 में से 3 और उसके सहयोगी जनता दल ( सेकुलर ) ने 1 सीट जीतकर सत्तारूढ़ कांग्रेस को चारों खाने चित्त कर दिया। इस प्रकार उम्मीद से कम प्रदर्शन करने के बाद भी भाजपा ने खुद 13 और उसके सहयोगियों ने 3 सीटें जीतकर 16 का आंकड़ा छू लिया वहीं कांग्रेस 1 पर सिमटी रही जबकि उसके सहयोगी 3 सीटें जीते। संसद के दोनों सदनों में मुख्य विपक्षी दल होने के बाद भी कांग्रेस का इन चुनावों में बुरी तरह हारना उसके लिए निरशाजनक है। उ.प्र, बिहार और महाराष्ट्र में भले ही भाजपा और उसके सहयोगी दलों के पास सत्ता है लेकिन कर्नाटक में सरकार होने के बावजूद काँग्रेस का दयनीय प्रदर्शन उसकी जमीनी कमजोरी का प्रमाण है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के लिए तो ये बेहद शर्मनाक है क्योंकि कर्नाटक उनका गृहराज्य है। राहुल गाँधी जितने जोरशोर से केंद्र सरकार के विरुद्ध आवाज उठा रहे हैं उसके बाद भी पार्टी शासित राज्य में खाली हाथ रहना निश्चित तौर पर उसके लिए चिंतन का विषय है। विशेष रूप से इसलिए क्योंकि मोदी सरकार के विरोध में विपक्ष इतना आक्रामक पहली बार हुआ और जंतर मंतर पर हुए आंदोलन से भाजपा पहली बार रक्षात्मक नजर आई। उक्त परिणामों के बाद भाजपा ने कांग्रेस पर तंज कसते हुए सवाल किया कि विधान परिषद के चुनाव तो ईवीएम से नहीं हुए ,अपितु उनमें मतपत्रों का उपयोग हुआ। बावजूद उसके वह क्यों बुरी तरह हारी? स्मरणीय है कांग्रेस आये दिन भाजपा को ईवीएम की बजाय मतपत्रों से चुनाव करवाने की चुनौती दिया करती है। क्षेत्रीय पार्टियों का दायरा तो सीमित होता है किंतु भाजपा - कांग्रेस के लिए छोटा - बड़ा हर मुकाबला महत्वपूर्ण है। उस दृष्टि से भाजपा के लिए उक्त चुनाव परिणाम जहाँ खुशफहमी से बाहर आने का संकेत हैं वहीं कांग्रेस के लिये मुंगेरीलाल के हसीन सपने देखने के बजाय जनता से जुड़ाव बढ़ाने का जनादेश।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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