जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अपनी दूसरी शादी का जश्न पूरी तरह मना पाते उसके पहले ही उनकी सरकार पर खतरे के बादल मंडराने लगे। लगभग 25 विधायक और कुछ सांसदों सहित पार्टी के अनेक नेता बगावत पर उतारू हैं। मंत्रीमंडल में ताजा फेरबदल के बाद सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर गंभीर राजनीतिक संकट खड़ा हो गया है। बगावत पर उतारू विधायकों ने पार्टी नेतृत्व को दो सप्ताह का समय देते हुए मांग रखी है कि पूरे मंत्रिमंडल का फिर पुनर्गठन किये जाने के अलावा मुख्यमंत्री के नजदीक माने जाने वाले सलाहकार नासिर असलम वानी के अलावा बाकी सलाहकारों को पदमुक्त किया जाए। सरकार द्वारा लिए जाने वाले महत्वपूर्ण फैसलों में विधायकों के साथ समुचित विचार - विमर्श किये जाने का भी दबाव बनाया जा रहा है। विद्रोह पर आमादा विधायकों का आरोप है कि सत्ता में आने के बाद उमर अब्दुल्ला धारा 370 और जम्मू कश्मीर के विशेष दर्जे से जुड़े चुनावी वादों पर केंद्र सरकार के सामने राज्य का पक्ष मजबूती से नहीं रख सके। राजधानी श्रीनगर से पार्टी सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेंहदी ने भी मुख्यमंत्री उमर और उनके पिता डॉ. फारूक अब्दुल्ला पर धारा 370 को बहाल करवाने के वायदे से मुकरने का आरोप लगाते हुए नेशनल कॉन्फ्रेंस छोड़ने के अलावा लोकसभा सदस्यता से इस्तीफे का ऐलान करते हुए सनसनी मचा दी। हालांकि पार्टी के अंतरिम अध्यक्ष शौकत मीर सहित कुछ और नेताओं का दावा है कि असन्तुष्टों से बातचीत के जरिये मामला सुलझा लिया जाएगा और पार्टी एकजुट बनी रहेगी। वैसे तो ऊपरी तौर पर इस नाराजगी की वजह मंत्रीमंडल में स्थान नहीं मिलना माना जा रहा है। लेकिन असली कारण मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की लचर कार्यशैली के अलावा उनका सामंतवादी व्यवहार भी है। सत्ता में वापसी के समय तो वे बड़ी ऊँची - ऊंची बातें किया करते थे। जिनमें धारा 370 और राज्य को विशेष दर्जे की बहाली के अलावा केंद्र शासित राज्य की स्थिति समाप्त कर पूर्ण राज्य का दर्जा दोबारा हासिल करना था। समय - समय पर उमर और उनके पिता पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला केंद्र से टकराव का इरादा व्यक्त करते रहते हैं , लेकिन उसकी हिम्मत नहीं बटोर सके। इसका कारण केंद्र का सख्त रवैया है। अब्दुल्ला परिवार का ये दोगलापन नई बात नहीं है। फारुख के पिता शेख अब्दुल्ला ने जम्मू कश्मीर में अलगाववाद के बीज बोये थे। दुर्भाग्य से पं. जवाहर लाल नेहरू उन पर आँख मूँदकर भरोसा करते रहे । उनके शेख अब्दुल्ला प्रेम ने इस सीमावर्ती राज्य को ऐसा नासूर बना दिया जो आजादी के आठ दशक बाद भी समस्या बना हुआ है। अब्दुल्ला परिवार के सामंतवादी व्यवहार की वजह से ही नेशनल काँफ्रेंस से कई नेता निकले जिनमें मुफ्ती मो. सईद प्रमुख थे जिन्होंने पीडीपी नामक पार्टी बनाई।। लेकिन वह भी नेशनल काँफ्रेंस के नक्शे कदम पर चलते हुए परिवारवाद के शिकन्जे में फंस गई। मुफ्ती की बेटी मेहबूबा मुफ्ती भी मुख्यमंत्री बनीं । इन दोनों परिवारों ने बारी - बारी से मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी के लोगों को भारत के विरुद्ध भड़काकर अपना राजनीतिक प्रभुत्व बनाये रखा । वहीं जम्मू क्षेत्र की जमकर उपेक्षा की क्योंकि वह हिन्दू बहुल है। मोदी सरकार ने धारा 370 हटाने के साथ ही परिसीमन के जरिये इस संतुलन को समाप्त किया जिसके कारण भाजपा मजबूत विपक्ष के तौर पर उभरी। नेशनल काँफ्रेंस के भीतर बगावत की लहरें और ऊँची उठेंगी या शांत कर दी जाएंगी ये कहना कठिन है लेकिन इसे अब्दुल्ला परिवार की चौधराहट के खात्मे की शुरुआत माना जा सकता है। मुफ्ती खानदान पहले ही ढलान पर है। फारुख जब तक जीवित हैं तब तक भले ही उमर की सियासत कायम रहे किंतु मौजूदा संकट से अब्दुल्ला परिवार का भविष्य भी खतरे में आ गया है। जम्मू कश्मीर में हुए बड़े बदलावों के बाद नये शक्ति केंद्रों के उभरने की संभावना बढ़ रही है किंतु घाटी में होने वाली किसी भी हलचल पर केंद्र को नजर रखनी होगी क्योंकि वहाँ अलगाववाद के बीज सर्वत्र बिखरे पड़े हैं जो समय - समय पर अंकुरित हो जाते हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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