Saturday, 5 September 2026

प्रधानमंत्री हेतु विजय का नाम उछलने से कांग्रेस में बेचैनी



अभिनेता से नेता बने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय का राजनीति में उतरना और फिर विधानसभा चुनाव में उनकी नवगठित पार्टी का बहुमत के करीब पहुंचना नाटकीयता से भरी किसी तमिल फिल्म का एहसास करा गया। बीते छह दशकों से तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज होते रहे द्रमुक और अन्ना द्रमुक जैसे मजबूत स्तंभों को विजय की पार्टी टीवीके ने  एक झटके में धराशायी कर दिया। यहाँ तक कि पिछली सरकार के मुख्यमंत्री  स्टालिन तक चुनाव हार गए। ये परिणाम इसलिए और चौंकाने वाला रहा क्योंकि जो काम कांग्रेस और भाजपा  नहीं कर पाईं वह विजय ने चंद महीनों के भीतर कर दिखाया। हालांकि वे बहुमत से थोड़ा पीछे रहे किंतु कांग्रेस , द्रमुक से गठबंधन तोड़ विजय को टेका लगाते हुए सरकार में हिस्सेदार भी बन बैठी। अन्ना द्रमुक के भी कुछ विधायक समर्थन में आ गए। मुख्यमंत्री बनते ही विजय ने फिल्मी अंदाज में लोक -लुभावन फैसलों की बौछार लगाते हुए  सरकार का खजाना खोल दिया।  विधायकों का वेतन बढ़ाने के अलावा उन्हें नई कारें देकर वे अपनी सरकार को स्थायित्व देने में भी जुट गए। यहाँ तक तो सब ठीक था किंतु विजय के अचानक उभार से पार्टी में  मांग उठने लगी कि उनको आगामी लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर पेश किया जाए। खुद मुख्यमंत्री इस मांग से सहमत हैं  या नहीं, ये फिलहाल स्पष्ट नहीं हो सका किंतु इससे उनके सहयोगी दल  कांग्रेस की बेचैनी बढ़ गई जो राहुल गाँधी के अलावा और किसी को प्रधानमंत्री बनाये जाने के बारे  में सुनना भी पसंद नहीं करती। इसीलिए  राज्य के पर्यटन मंत्री और कांग्रेस नेता राजेश कुमार ने एक  बयान में  स्पष्ट कर दिया है कि यदि गठबंधन 2029 में प्रधानमंत्री पद के लिए राहुल गांधी का समर्थन नहीं करता है, तो विजय कैबिनेट में शामिल कांग्रेस के दोनों मंत्री अपने पद से इस्तीफा दे देंगे। उल्लेखनीय है टीवीके के नेता आधव अर्जुन और सरथकुमार ने खुले तौर पर शीर्ष पद के लिए विजय का समर्थन किया है, जबकि तूतीकोरिन में पीएम के लिए विजय का समर्थन करने वाले पोस्टर भी सामने आए हैं, जिससे यह विवाद और गहरा गया है। तमिलनाडु में अभिनेता रहते हुए ही विजय के सैकड़ों प्रशंसक क्लब और हजारों व्हाट्स एप ग्रुप बन गए थे। उंन्होंने पार्टी तो चुनाव से कुछ पहले ही बनाई थी परंतु उक्त क्लबों और व्हाट्स एप के जरिये अपना जनाधार स्थापित करने का काम  काफी पहले से शुरू कर रखा था और इसके लिए महंगी पेशेवर एजेंसियों की सेवाएं ली गई । मतदान  उपरांत जब एक्सिस माय इंडिया नामक सर्वेक्षण एजेंसी  ने टीवीके के सबसे बडी पार्टी बनने की भविष्यवाणी की तो समूचा राजनीतिक जगत चौंक गया।  बहरहाल धमाकेदार जीत और फिर बिना मांगे कांग्रेस सहित वामपंथी और अन्ना द्रमुक के एक खेमे का समर्थन मिलने से विजय का उत्साह बढ़ गया। इसीलिए उन्होंने मुफ्त उपहारों और सुविधाओं के जरिये अपना जनाधार पुख्ता करने के साथ ही तमिल भावनाओं को उभारने  का अभियान शुरू कर दिया। केन्द्र से टकराने में भी वे संकोच नही कर रहे। लेकिन अचानक प्रधानमंत्री के लिए उनका नाम पार्टी के भीतर से उछाला जाना इस बात का संकेत है कि उनकी महत्वाकांक्षा हिलोरें मारने लगी हैं। शायद उन्हें ये लग रहा है कि यदि वे प्रधानमंत्री पद के लिए दावा ठोककर 2029 के लोकसभा चुनाव में उतरते हैं तब वे  दक्षिण भारत का चेहरा बनकर उत्तर और दक्षिण भारत के बीच विभाजन करवाने में सफल हो जाएंगे। हालांकि अतीत में पी.वी नरसिम्हा राव और एच. डी देवगौड़ा के रूप में दक्षिणी भारत से दो प्रधानमंत्री बन चुके हैं किंतु वे समूचे दक्षिण भारत का चेहरा नहीं बन सके। विजय को लगता है युवा होने से वे नई पीढी़ के मतदाताओं को अपने पक्ष में गोलबंद कर सके तब प्रधानमंत्री पद के लिए जनता के सामने तीन विकल्प होंगे जिनमें दो उत्तर भारत से होने की वजह से दक्षिण की राजनीतिक उपेक्षा का मुद्दा गरमाया जा सकेगा। इसीलिए काँग्रेस में घबराहट फैल गई। मंत्रियों के अलावा पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम के सांसद पुत्र कार्ति ने भी टीवीके की उक्त मांग के विरुद्ध बयान दे दिया। खबर है काँग्रेस का शीर्ष नेतृत्व विजय से बात करने वाला है। अभी तक टीवीके द्वारा कोई स्पष्टीकरण न दिये जाने से काँग्रेस चिंता में है क्योंकि उसके दूर हो जाने पर भी राज्य सरकार को खतरा नहीं है। क्या होगा ये अभी पक्का नहीं है किंतु तमिलनाडु की राजनीति में फॉर्मूला फिल्म जैसे उतार - चढ़ाव शुरू हो जाने से उसके अंत के प्रति उत्सुकता बढ़ रही है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


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