Wednesday, 4 November 2026

मूर्खतापूर्ण फैसले ले डूबे ट्रम्प को : भारत का विरोध महंगा पड़ा



अमेरिका में हुए मध्यावधि चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की जबरदस्त झटका लगा है। विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने उच्च सदन सीनेट में स्पष्ट बहुमत के साथ ही संसद के निम्न सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में भी  बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया है। ज्यादातर राज्यों के गवर्नर भी डेमोक्रेटिक पार्टी के चुने गए हैं। यद्यपि अमेरिका का इतिहास बताता है कि पिछले  21 मध्यावधि चुनावों में 19 में राष्ट्रपति की पार्टी हारी।  दूसरी बार राष्ट्रपति  बनते समय ट्रम्प लोकप्रियता के शिखर पर थे। उन्हें युवाओं सहित सभी वर्गों का समर्थन प्राप्त हुआ था। अमेरिका को फिर से महान बनाने का जो नारा उन्होंने उछाला उसका जबरदस्त प्रभाव हुआ।  अमेरिकी युवाओं को रोजगार के ज्यादा अवसर प्रदान करने के लिए अवैध प्रवासियों को बाहर करने  का वायदा भी कारगर रहा ।अर्थव्यवस्था में आ रही गिरावट को रोकने संबंधी  चुनावी वायदे के बल पर ट्रम्प ने  दोबारा व्हाइट हाऊस पर कब्जा किया। उनकी जीत में भारतवंशी प्रवासियों का महत्वपूर्ण योगदान था। उन्होंने जिन जे.डी वेंस को उपराष्ट्रपति हेतु चुना उनकी पत्नी भी भारतीय मूल की हिंदू हैं। चुनाव जीतने के बाद उन्होंने अपने सचिवालय में जब बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोगों को नियुक्त किया तब ये अवधारणा और मजबूत हुई कि वे भारत के प्रति उस दोस्ताने को जारी रखेंगे जो  पहले कार्यकाल में देखने मिला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनके निजी रिश्तों को देखते हुए भारत को उनसे काफी उम्मीदें थीं किन्तु पदभार ग्रहण करते ही उन्होंने उन पर पानी फेर दिया। सबसे पहले तो भारत  से होने वाले आयात पर  मनमर्जी का टैरिफ थोपने की  हरकत की। उसके बाद ऑपरेशन सिंदूर के समय युद्धविराम का झूठा श्रेय लूटने की जबरिया कोशिश की। लेकिन हद तब हो गई जब उन्होंने पाकिस्तान की पीठ पर हाथ रखते हुए भारत के हितों के विरुद्ध तमाम फैसले लिए। वहाँ के सेनाध्यक्ष आसिफ मुनीर को व्हाइट हाउस बुलाकर भोज देने के पीछे उनका मकसद भारत को चिढ़ाना ही था। भारतीय प्रवासियों को हथकड़ी लाकार वापस भेजने जैसे उनके फैसले निश्चित तौर पर दोस्ती के सर्वथा विपरीत थे। रूसी तेल न खरीदने का दबाव बनाकर वे भारत को घुटनाटेक करवाने के लिए टैरिफ की दरें बढ़ाते चले गए। उनका सोचना था कि प्रधानमंत्री मोदी उनसे मिलने वॅाशिंगटन आयें किंतु ऐसा नहीं होने पर वे और खुर्रा गए। हालांकि केवल भारत के प्रति उनका व्यवहार दुर्भावनापूर्ण नहीं रहा। यूरोपीय देशों से अमेरिका के मैत्रीपूर्ण रिश्तों को भी ट्रम्प ने बिगाड़ दिया। ग्रीनलैंड पर कब्जे की उनकी धमकी से तो अमेरिका और यूरोप के बीच युद्ध का खतरा तक पैदा हो गया। कैनेडा पर कब्जे की मंशा जताने से भी वे बाज नहीं आए। और वेनेजुएला के राष्ट्रपति को सपत्नीक उठवाकर अमेरिका के जेल में डालकर तो उन्होंने सारे कूटनीतिक नियम तोड़ दिये। नोबल पुरस्कार के लिए भीख मांगने जैसे  अंदाज से जहाँ उनकी खिल्ली उड़ी वहीं न मिलने पर ऊटपटांग बयान देकर वे अपनी भद्द पिटवाते रहे। लेकिन ईरान के साथ जारी युद्ध में  उनकी मूर्खता का चर्मोत्कर्ष सामने आया । पूरी ताकत लगाने के बाद भी वे ईरान को झुकाने में कामयाब नहीं हो सके । उल्टे प. एशिया में अमेरिका के मित्र राष्ट्रों की ईरान ने जमकर ठुकाई कर दी। इसकी वजह से समूचा विश्व तो ऊर्जा संकट का सामना कर ही रहा है खुद अमेरिका भी उसकी चपेट में आ गया। ट्रम्प के सनकीपन की वजह से अमेरिका की आर्थिक स्थिति बजाय सुधरने के और बिगड़ चुकी है। कुल मिलाकर अपने दूसरे कार्यकाल में डोनाल्ड ट्रम्प आर्थिक, सैनिक और कूटनीतिक सभी मोर्चों पर बुरी तरह असफल साबित हुए। इसी वजह से जनता में उनके प्रति नाराजगी बढ़ती चली गई जिसका प्रमाण ये परिणाम हैं। ऐसे में  कहना गलत नहीं होगा कि जिस प्रकार उनकी जीत में भारतीय समुदाय का समर्थन बड़ा कारण रहा उसी तरह उनकी इस हार में भी वहाँ बसे भारतीय मूल के मतदाताओं का हाथ है। संसद के दोनों सदनों में बहुमत गँवा देने के बाद ट्रम्प की अकड़ में कमी आयेगी या खिसियाहट में वे  और ज्यादा मूर्खताएं करेंगे ये तो आने वाला समय बताएगा किंतु अमेरिकी मतदाताओं ने उनकी नाक में जो नकेल डाल दी उसके बाद वे पहले जैसी दादागिरी कर सकेंगे इसमें संदेह है। भारत की दृष्टि से ये परिणाम शुभ संकेत हैं । अमेरिका के साथ ट्रेड डील, टैरिफ और वीजा जैसे लंबित मुद्दे जल्द सुलझ सकते हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि ट्रम्प को भारत की अहमियत समझ में आ गई।   


- रवीन्द्र वाजपेयी 




 

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