Tuesday, 5 December 2017

राहुल की ताजपोशी : ये तो होना ही था

आखिरकार वह हो गया जो होना ही था । राहुल गांधी कांग्रेस के विधिवत अध्यक्ष बन गए। भले ही औपचारिक घोषणा के लिए कुछ दिन इंतज़ार करना पड़े लेकिन एक ही नामांकन पत्र आने से उनका निर्वाचन संदेह से परे है । उनके अध्यक्ष बनने पर भाजपा नेताओं विशेष रूप से प्रधानमंत्री द्वारा छोड़े जा रहे व्यंग्य बाण पूरी तरह अनावश्यक और औचित्यहीन हैं क्योंकि यह कांग्रेस का आंतरिक मसला है । भाजपा में अमित शाह को जिस तरह पार्टी अध्यक्ष बनाया गया वह तरीका भी कोई लोकतांत्रिक नहीं था । आम तौर पर लगभग प्रत्येक राजनीतिक दल में शीर्ष नेतृत्व का चयन इसी तरह होने लगा है । या तो परिवार का मुखिया सब कुछ तय कर देता है या कुछ लोगों का समूह। कांग्रेस को इस बात के लिए अवश्य कटघरे में खड़ा किया जा सकता है कि उसने स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान पूरे देश को एकजुट करने वाली पार्टी को एक परिवार की मिल्कियत बनाकर रख दिया । इसका दुष्परिणाम विभिन्न दलों में वंशवाद के स्थापित होने के तौर पर सामने आने लगा । तमिलनाडु में द्रमुक, महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी, उप्र में समाजवादी पार्टी  और लोकदल, बिहार में राजद, हरियाणा में इंडियन नेशनल लोकदल, जम्मू कश्मीर में पीडीपी एवं नेशनल कांफ्रेंस, पंजाब में अकाली दल के अलावा बसपा में भी आंतरिक लोकतंत्र का पूरी तरह अभाव है । ये सभी पार्टियां या तो एक परिवार या एक व्यक्ति की निजी सम्पत्ति बनकर रह गईं हैं । जिस किसी ने इस एकाधिकार के  विरोध में बोलना तो दूर सोचने तक की हिमाकत की उसे या तो बाहर कर दिया गया या फिर वह हाशिये पर रहने के लिए मजबूर कर दिया गया । देश की राजनीतिक जमात में सबसे नई कही जाने वाली आम आदमी पार्टी तो अपने जन्म के पांच वर्ष पूरे करने के पहले ही टूटन का शिकार हो गई । उसके कई संस्थापक सदस्य धक्के मारकर बाहर कर दिए गए । डॉ. कुमार विश्वास अभी तक तो भीतर ही हैं लेकिन वे भी कब निकल आएं या निकाल दिए जाएं कहना मुश्किल है । इन उदाहरणों को देखते हुए कांग्रेस को परिवार या कुनबेवाद के आरोप से बरी करना पड़ता है  लेकिन ये कहना न गलत है न अनुचित कि अपनी विशिष्ट स्थिति का लाभ उठाकर पहले नेहरू और फिर उनकी पुत्री के गांधी परिवार ने देश में वंशवादी लोकतंत्र की बुनियाद रखते हुए उसे मजबूत इमारत का रूप दे दिया । रोचक बात ये है कि इसकी शुरुवात महात्मा गांधी के सामने हो गई जब कांग्रेस के करांची अधिवेशन में पं मोतीलाल नेहरू के बाद कांग्रेस अध्यक्ष की कमान उनके युवा पुत्र पं जवाहरलाल नेहरू को सौंपी गई । आज़ादी के बाद नेहरू जी ने अपनी बेटी इंदिरा गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनवाने के लिए यू एन ढेबर को इस्तीफा देने बाध्य कर दिया था । यद्यपि उसके बाद अनेक नेता कांग्रेस प्रमुख बने लेकिन इंदिरा जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से कांग्रेस धीरे-धीरे उनकी पारिवारिक संपत्ति बनती गई । राजीव गांधी की मृत्यु के बाद के कुछ वर्षों में पीवी नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी का कार्यकाल छोड़ दें तो उसके पहले और फिर बाद में कांग्रेस और गांधी परिवार समानार्थी बने हुए हैं । स्व. अर्जुन सिंह ने एक बार कहा था कि गांधी परिवार पार्टी को एकजुट रखने वाली ताकत है । ये बात सच भी ही किन्तु दुखद भी कि देश की सबसे पुरानी पार्टी में नेतृत्व की फसल इतनी कमजोर है कि चाहे . अनचाहे वह एक परिवार के आगे सोचने की क्षमता ही खो चुकी है । राहुल की ताजपोशी से किसी को खुशी हो या एतराज किन्तु आश्चर्य किसी को नहीं हुआ क्योंकि जब भी होता यही होता । बस प्रश्न ये है कि इसके लिए इतना इन्तजार क्यों किया गया घ् कांग्रेस में आखिरी बगावत सोनिया जी के विदेशी मूल को लेकर शरद पवार ने की थी । उसके बाद से आज तक कोई मुंह खोलने की हिम्मत नहीं कर सका । राहुल बीते कई सालों से पार्टी के उपाध्यक्ष बने रहकर शीर्ष पर बैठे हैं । भले ही सोनिया जी अध्यक्ष कहलाती रहीं किन्तु शक्ति का वास्तविक केंद्र तो राहुल ही थे । उस लिहाज से केवल उनका पदनाम बदल गया लेकिन हैसियत वही है । अब उनके प्रदर्शन को लें तो अभी तक वे ऐसा कुछ नहीं कर सके जो उनकी पदोन्नति का कारण माना जाए। उल्टे उनके नेतृत्व में कांग्रेस अपनी सबसे बुरी स्थिति में आ खड़ी हुई। उप्र में तो वह पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुकी है वहीं बिहार में लालू  यादव सरीखे नेता के रहमोकरम पर है। राहुल के होते राज्य दर राज्य कांग्रेस खोती चली गई । पंजाब छोड़ अभी तक कोई सफलता उनके कार्यकाल की नहीं रही । मौजूदा संभावना गुजरात में दिख रही है जहाँ राहुल पूरे फार्म में नजर आ रहे हैं लेकिन वहां भी कांग्रेस की उम्मीदें राहुल की बजाय हार्दिक पटैल पर टिकी हैं । यदि पाटीदार मतदाता थोक में नहीं पलटे तो गुजरात फिर भाजपा की झोली में चला जाएगा जो राहुल के लिए सिर मुंड़ाते ओले पडऩे जैसा होगा क्योंकि हिमाचल तो हाथ से निकलना तय लग रहा है । हां गुजरात यदि कब्जे में आ जाए तब तो राहुल मुकाबले में  होंगे वरना उनकी ताजपोशी कांग्रेस के पतन का कारण बने बिना नहीं रहेगी । वे पार्टी के संगठन को क्या रूप देते हैं और प्रादेशिक क्षत्रपों की गुटबाजी को किस तरह खत्म कर पाते हैं उस पर काफी कुछ निर्भर होगा । सबसे बड़ी बात ये है कि क्या वे कांग्रेस में अधिकारों का विकेंद्रीकरण कर सकेंगे जिसकी बात वे कहते तो रहे किन्तु कर नहीं सके । बहरहाल राहुल गांधी के रूप में कांग्रेस में नए युग की शुरूवात की बात कहना गलत है क्योंकि राहुल युग तो कई वर्षों पहले ही शुरू हो चुका था । बदलाव केवल इतना हुआ कि अब सोनिया जी को कांग्रेस अध्यक्ष नहीं कहा जावेगा । राहुल पार्टी को दोबारा केंद्र की सत्ता में ला सकेंगे या नहीं ये सोचना फिलहाल उतना महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि आज की जरूरत एक मजबूत विपक्ष की है । यदि राहुल कांग्रेस को बतौर विपक्ष अपने दायित्व का सही तरीके से निर्वहन करने लायक बना सके तो माना जाएगा उन्होंने अपने चयन को सार्थक कर दिया वरना 2019 के पूर्व पार्टी में या तो विभाजन होगा या बड़े पैमाने पर भगदड़ । गुजरात चुनाव देश की राजनीतिक दिशा  के साथ ही राहुल गांधी का भविष्य भी काफी हद तक तय कर देंगे । उस लिहाज से पार्टी अध्यक्ष पद पर उनके पूर्णकालिक चयन की टाइमिंग बेहद महत्वपूर्ण है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 4 December 2017

सामयिक : रवीन्द्र वाजपेयी राहुल :अंकलनुमा चेहरों से मुक्ति पर काफी कुछ निर्भर

राहुल गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष बनना सुनिश्चित है। वे कितने सफल रहेंगे ये कहना फिलहाल कठिन है क्योंकि बतौर उपाध्यक्ष वे कुछ खास नहीं कर सके । पार्टी का महामन्त्री बनते ही उन्होनें युवा नेताओं की टीम बनाई थी । उम्मीद रही कि वे उन जनधारविहीन दरबारी नेताओं से कांग्रेस को मुक्ति दिलवाएंगे जो वक़्त के साथ चलने में समर्थ नहीं हो सके । कहते हैं ये नेता ही सोनिया जी पर दबाव डालकर उनकी ताजपोशी टलवाते रहे । अब जबकि श्रीमती गांधी अस्वस्थतावश पार्टी का बोझ सम्भालने में खुद को सक्षम अनुभव नहीं कर रहीं तब जाकर अध्यक्ष पद पूरी तरह से राहुल को सौंपने का निर्णय किया गया ।

उप्र में अखिलेश यादव के साथ गठबंधन करने का उनका निर्णय बेहद नुकसानदायक रहा । बावजूद उसके राहुल ने गुजरात में वही खतरा मोल लिया है।
अध्यक्ष बनते ही उन्हें गुजरात की चुनौती से रूबरू होना पड़ेगा । यदि कांग्रेस ने वहां सरकार बनाली तब राहुल निश्चित रूप से 2019 के फाइनल मैच हेतु वापसी कर पाएंगे लेकिन परिणाम विपरीत आने पर उनकी राह में नई नई मुसीबतें आकर खड़ी हो जायेंगीं।
वैसे अभी तक उनका गुजरात अभियान प्रभावशाली रहा है। चूंकि वहां मुकाबला सीधा भाजपा से है इसलिए उप्र की तरह विरोधी मत बंटने का खतरा नहीं है ।
राहुल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे अपने सहयोगियों का चयन किस तरह करते हैं क्योंकि कांग्रेस की मौजूदा टीम में बड़े नाम वाले कई ऐसे नेता हैं जो अब बोझ बन चुके हैं।
इन अंकलनुमा चेहरों की छंटनी वे किस तरह कर पाएंगे ये देखने वाली बात होगी।
वैसे वंशवाद की चर्चा को निरर्थक मानकर छोड़ दें तब भी ये कम विचारणीय नहीं है कि  इतनी पुरानी पार्टी एक परिवार पर ही इतनी आश्रित क्यों है??

चिकित्सक : पेशे की पवित्रता पर अविश्वास का घेरा

बीते सप्ताह बेंगलुरु में डॉक्टरों और चिकित्सकीय जांच केंद्रों के बीच कमीशनबाजी का जो आदान- प्रदान उजागर हुआ वह कोई नई बात नहीं है। आयकर छापों के दौरान जो तथ्य उजागर हुए उनके मुताबिक डॉक्टरों द्वारा कराई जाने वाली तमाम जांच चाहे वे पैथालाजी से जुड़ी हों या रेडियोलॉजी से , सभी में डॉक्टरों को जबरदस्त कमीशन पहुंचाया जाता है, जो न केवल अवैधानिक अपितु अनैतिक भी माना जाता है। पढ़ाई करने के उपरांत जब कोई डॉक्टर प्रैक्टिस हेतु मेडीकल काउंसिल ऑफ इंडिया में पंजीयन करवाता है तब उसे जो शपथ लेनी होती है यदि उसका पालन चिकित्सक करने लगें तो आज चिकित्सा क्षेत्र में जो लूटमार चल पड़ी है वह लुप्त हो सकती है लेकिन अफसोस की बात है कि पैसा कमाने की हवस ने चिकित्सा जगत से सेवाभाव को पूरी तरह से खत्म कर दिया। यद्यपि अपवाद स्वरूप ऐसे चिकित्सक भी हैं जिन्होंने पेशे की पवित्रता और मानवीय संवेदनाओं को जीवित रखा है परंतु उनकी मौजूदगी हजारों में एक के अनुपात में होगी। इसी तरह शायद ही कोई पैथालॉजी और एक्सरे, सोनोग्राफी,सीटी स्कैन और एमआरआई सेंटर होगा जो चिकित्सकों को कमीशन न बांटता हो । बेंगलुरु में आयकर छापों के दौरान जो जानकारी निकलकर आई उससे ये स्थापित हो गया कि चिकित्सा जगत अब पूरी तरह से व्यवसायिक हो चुका है जिसका उद्देश्य पीडि़त मानवता की नि:स्वार्थ सेवा न होकर केवल और केवल अधिक से अधिक पैसा बटोरना रह गया है। डॉक्टरों और जाँच केंद्रों के बीच कमीशन का धंधा दवा निर्माता फार्मा कम्पनियों तक फैला हुआ है। सरकार और न्यायालय इस बारे में समय-समय पर काफी बंदिशें लगाते रहे हैं लेकिन ज़मीनी स्तर पर कोई सुधार नहीं हुआ और मौजूदा सूरते हाल में होने की संभावना भी नहीं है। दवा कम्पनियां अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन चिकित्सकों को देती हैं। उसकी भरपाई होती है आम जनता से दवाइयों के दाम बढाकर। कुल मिलाकर जिस पेशे पर इंसान की जान बचाने का दायित्व हो, वही एक संगठित गिरोह बनकर लोगों की मजबूरी का अनुचित लाभ उठाए, इससे अधिक शर्मनाक बात या पाप और भला दूसरा क्या होगा? आज भी देश के विभिन्न हिस्सों में ऐसे चिकित्सक मौजूद हैं जो मरीजों से नाममात्र की फीस लेकर उन्हें सस्ती जेनेरिक दवाएं लिखकर उनका शोषण होने से बचाते हैं। यही नहीं तो कमीशन की लालच में अनावश्यक जाँच कराने से भी उन्हें परहेज रहता है। पैसा बटोरने की वासना के चलते ही सामान्य की बजाय सिजेरियन प्रसव करने का कारोबार चरम पर है। इस लूटमार को रोकने के लिए सामाजिक और न्यायालयीन स्तर पर अपने-अपने ढंग से प्रयास हो चुके हैं लेकिन ले देकर स्थिति वही ढाक के तीन पात वाली बनी हुई है। आये दिन निजी अस्पतालों में लोगों का उत्पात आम बात होती जा रही है। इन सभी के चलते कभी सम्मान एवं श्रद्धा के पात्र रहे चिकित्सक अब सेवा प्रदाता (सर्विस प्रोवाइडर) बनकर रह गए हैं जिनके विरुद्ध मरीज उपभोक्ता फोरम जाने में भी नहीं हिचकते। भारत सरीखे देश में जहां सरकारी चिकित्सा सेवाएं खुद ही बीमार हों वहां आम जनता निजी डॉक्टरों और अस्पतालों के रहमो करम पर निर्भर रहने मजबूर है। लेकिन वहां उसे ग्राहक समझकर बेशर्मी की सारी हदें तोड़कर होने वाली मुनाफाखोरी से सामना करना पड़ता है। ये बात पूरी तरह सत्य और प्रमाणित है कि इस तरह की प्रवृत्ति को कानून से रोकना नामुमकिन है। बेहतर होगा अगर डॉक्टर्स स्वयं होकर अपनी बिरादरी के दामन पर लगे दाग दूर करने का प्रयास करें। चिकित्सक को भगवान मानने वाले आज भी कम नहीं हैं लेकिन जिस तरह धर्म की आड़ में अनैतिकता को पालने पोसने वालों का पर्दाफाश आये दिन होने लगा है वही स्थिति भगवान स्वरूप माने जाने वाले चिकित्सक समुदाय की बन गई है। पढ़ -लिखकर पैसा कमाना अपराध नहीं होता लेकिन व्यक्ति को अपने पेशे का मकसद सदैव ध्यान में रखना चाहिये। चिकित्सकों के बारे में एक पोस्टर पर लिखा था कि मैंने ईश्वर में विश्वास करना नहीं छोड़ा अपितु उसे डॉक्टर में स्थानांतरित कर दिया है। अब ये देखना डॉक्टरों का नैतिक दायित्व है कि वे इस विश्वास की रक्षा किस प्रकार करते हैं? वर्तमान स्थिति में तो उनके प्रति विश्वास निरंतर घटता चला जा रहा है जिसके लिये उनकी बिरादरी ही उत्तरदायी कही जाएगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 2 December 2017

उप्र के नतीजे गुजरात को प्रभावित कर सकते हैं

उप्र में स्थानीय निकाय के चुनाव नतीजों में कितने भी किन्तु-परन्तु लगाए जावें लेकिन ये स्वीकार करना ही होगा कि योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में चल रही राज्य सरकार के प्रति जनमानस में भरोसा कायम है। ये स्थिति विकल्पहीनता का भी परिचायक कही जा सकती है क्योंकि शहरी क्षेत्रों में मतदाताओं  ने जहां भाजपा को भरपूर समर्थन दिया वहीं कस्बाई और ग्रामीण क्षेत्रों में वह सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी अपनी लहर नहीं चला सकी। चूंकि सपा,बसपा और कांग्रेस से जनता का मोह पूरी तरह से भंग हो चुका था इसलिए उसने निर्दलीयों पर जमकर मेहरबानी की। इससे ये भी पता चलता है कि बड़े शहरों को छोड़ दें तो बाकी जगहों पर स्थानीय चुनावों में राजनीतिक प्रतिबद्धता की बजाय लोगों ने निजी अथवा जातिगत सम्बन्धों को महत्व दिया जो छोटे स्तर पर सहज स्वाभाविक भी है। पार्टी टिकिट हासिल न कर पाने वाले उम्मीदवारों द्वारा  निर्दलीय लड़ा जाना नई बात कतई नहीं है और उस दृष्टि से उप्र के कस्बाई और ग्रामीण क्षेत्रों में राजनीतिक दलों की तुलना में निर्दलीयों की जीत ये भी साबित करती है कि भाजपा से नाराज या उसके वैचारिक विरोधी ने भी सपा,बसपा और कांग्रेस को बतौर विकल्प नहीं चुना। उप्र के स्थानीय निकाय चुनाव ऐसे समय हुए जब भाजपा गुजरात चुनाव में बुरी तरह फंसी हुई है। जीएसटी और पाटीदार आंदोलन के मिले जुले प्रभाव ने कांग्रेस में ये आत्मविश्वास भर दिया कि वह नरेंद्र मोदी के गढ़ को ध्वस्त कर 2019 के महासंग्राम में विजेता बनकर उभर सकती है। राहुल गांधी भी अपनी पिछली चुनावी  असफलताओं को गुजरात जीतकर धो देने में जुटे हैं। भले ही भाजपा गुजरात में फिर सरकार बना ले, जैसा तमाम सर्वेक्षण बता रहे हैं, लेकिन ये कहना पूरी तरह सच होगा कि राहुल के आक्रामक तेवरों ने उसे चिंतित तो कर ही दिया है। यदि पाटीदार वोट पूरी तरह हार्दिक के बताए मुताबिक भाजपा के विरोध में चले गए तब हिंदुत्व की प्रयोगशाला भाजपा के हाथ से जा सकती है किन्तु उप्र के ताजा चुनाव परिणामों ने ये बता दिया कि कम से कम जीएसटी को लेकर तो जनमानस में वैसी नाराजगी नहीं है जैसी सतह पर दिखाई देती है। यदि जीएसटी को लेकर मतदाता भाजपा के विरोधी होते तो उप्र के शहरी क्षेत्रों में भाजपा की आंधी नहीं चलती। इन परिणामों को योगी सरकार के पक्ष में विश्वास मत का नाम भले न दें लेकिन इतना तो कह ही सकते हैं कि उप्र की जनता अभी योगी शासन से नाराज नहीं है और भाजपा को पूरा अवसर देना चाहती है। यूँ भी कह सकते हैं कि सपा, बसपा और कांग्रेस चूंकि टक्कर देने की स्थिति में नहीं थीं? इसलिए लोगों ने भाजपा को चुनने में ही समझदारी समझी। इस चुनाव में बसपा पहली मर्तबा चिन्ह पर लड़ी और अलीगढ़-मेरठ दो नगर निगमों में उसका महापौर जीत गया जबकि सपा -कांग्रेस खाली हाथ रह गए। बसपा का ये उभार ही सपा-कांग्रेस को खा गया। मुस्लिम-दलित समीकरण ने अलीगढ़ और मेरठ में जो नतीजे दिए वे सपा के यादव-मुस्लिम गठजोड़ पर भारी पडऩे से अखिलेश यादव की पेशानी पर भविष्य को लेकर चिंता की लकीरें उभरना लाजमी है। दरअसल मायावती ने नगरीय निकाय चुनाव में उतरने का फैसला काफी सोच समझकर किया था। लोकसभा में शून्य और विधानसभा में दो दर्जन से भी कम पर सिमट जाने से बसपा उप्र में अप्रासंगिक होने के कगार पर आ गई थी। यदि मायावती इस चुनाव से दूर रहतीं तब शायद दलित वोट बैंक के इधर-उधर छिटकने का खतरा और बढ़ जाता। चुनाव परिणामों ने बसपा के अस्तित्व को तो बचाया ही उसे बतौर विकल्प भी स्थापित कर दिया। सपा ने ये चुनाव आधे अधूरे मन से लड़ा वरना उसकी स्थिति कुछ सुधर सकती थी। भाजपा को लोकसभा और विधानसभा चुनाव की अभूतपूर्व कामयाबी के बावजूद शहरी पार्टी माना जाता है। 2012 में अखिलेश की जबरदस्त कामयाबी के बाद हुए निकाय चुनाव में भी 12 से 10 महापौर भाजपा के जीते थे लेकिन इस बार भगवा पार्टी ने नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों में भी सपा,बसपा और कांग्रेस से अधिक सीटें जीतकर अपने जनाधार के विस्तार का प्रमाण दे दिया। बड़ी संख्या में विजयी अधिकतर निर्दलीय भी देर-सवेर भाजपा से जुड़ जाएंगे क्योंकि अपना वजूद बनाए रखने उन्हें सत्ता की ज़रुरत पड़ेगी। कल के परिणामों ने कांग्रेस की दयनीय स्थिति को फिर उजागर कर दिया। यहां तक कि सोनिया गांधी और राहुल के  निर्वाचन क्षेत्र क्रमश: रायबरेली और अमेठी तक में उसकी लुटिया डूब गई। कुल मिलाकर  उप्र के मतदाताओं का भाजपा पर भरोसा कायम है। कम से कम ये तो मानना ही पड़ेगा कि सपा,बसपा और कांग्रेस को उपकृत करने की उसकी इच्छा तो कतई नहीं है। लेकिन भाजपा के लिए भी नई चुनौती खड़ी कर दी इन नतीजों ने। नीचे से लेकर ऊपर तक उसकी सत्ता होने से उप्र के विकास में किसी भी तरह की बहानेबाजी जनता नहीं सुनेगी। योगी शासन अभी तक अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर सका है। कानून व्यवस्था की स्थिति खराब होने के साथ ही विकास कार्य भी ठप्प हैं। संकल्प पत्र में किये गए वायदे भुला से दिए गए हैं। हो सकता है मुख्यमंत्री सहित अन्य नेता निकाय चुनाव में उलझे रहने से प्रशासन पर अपेक्षित ध्यान न दे सके हों लेकिन अब उन्हें तेजी से काम करना होगा क्योंकि 2019 में उप्र से अधिकतम सीटें जीतने का पिछला कारनामा दोहराए बिना भाजपा की केंद्र में वापिसी झमेले में पड़ सकती है। रही बात इन नतीजों का गुजरात पर असर पडऩे की तो इससे कांग्रेस का हौसला तो ठंडा पड़ेगा ही, वहीं भाजपा में मतदान के पहले चरण के पूर्व जबर्दस्त आत्मविश्वास का संचार हो गया। उप्र के शहरी इलाकों में मिली जबरदस्त सफलता ने जीएसटी के विरोध का डर भाजपा के मन में कम कर दिया होगा क्योंकि उससे प्रभावित होने वाले व्यापारी और उद्योगपति शहरों में ही बसे होते हैं। राहुल गांधी गुजरात में धूमकेतु की तरह उभरने की कोशिश भले करते रहे किन्तु अमेठी में कांग्रेस का सूपड़ा साफ  होने से अंतिम दौर के प्रचार में भाजपा को उनके पर कतरने का भरपूर अवसर मिल गया। हार्दिक,अल्पेश और जिग्नेश की तिकड़ी का मनोबल भी कल के बाद कुछ कमजोर तो पड़ेगा ही क्योंकि उप्र के मतदाताओं ने जाति की दीवारों को एक बार फिर धक्का देने की चतुराई दिखाई है। अयोध्या, काशी और मथुरा नगरनिगम पर भाजपा के कब्जे ने राममंदिर की चर्चा को फिर बल प्रदान कर दिया। डॉ सुब्रमण्यम स्वामी का बयान इसीलिए काफी प्रसांगिक है। विधानसभा चुनाव का श्रेय तो मोदी-शाह के नाम रहा लेकिन स्थानीय निकायों  में उल्लेखनीय सफलता के बाद योगी आदित्यनाथ हिंदुत्व के नए प्रतीक चिन्ह बनकर उभरे हैं। अंत में एक बात और जो महज संयोग हो सकती है कि उप्र विधानसभा चुनाव के कुछ दिन पूर्व महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा ने शानदार जीत हासिल की थी जिसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव उप्र पर पड़ा माना गया। अब गुजरात में मतदान के हफ्ते भर पहले उप्र के निकाय चुनाव में भाजपा की जोरदार सफलता भी वही काम कर गई तो भाजपा के लिए ये संयोग एक बार फिर सुखद साबित होगा।  वहीं दूसरी ओर राहुल गांधी की बतौर पार्टी अध्यक्ष ताजपोशी के चंद रोज पहले अमेठी में कांग्रेस की फजीहत उनके लिए अपशकुन कहा जा सकता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 1 December 2017

आर्थिक मोर्चे से अच्छी खबर

देश भर में सर्वाधिक कोसे जाने वाले वित्त मंत्री अरुण जेटली को लंबे समय बाद मुस्कुराने का अवसर मिला। वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही के जो नतीजे आये उनके अनुसार  विकास दर बढ़कर  6.3 फीसदी हो गई। मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र ने तो 7 प्रतिशत का आँकड़ा छू लिया। नोटबन्दी और उसके बाद दूबरे में दो आसाढ़ की कहावत को चरितार्थ करते हुए आया जीएसटी आर्थिक विकास के लिए न केवल गतिरोधक अपितु गड्ढा साबित हुआ। हॉलांकि विपक्ष इसके लिए प्रधानमंत्री को घेरता रहा है लेकिन आम जनता की नजऱ में श्री जेटली सबसे बड़े खलनायक बन गए। यद्यपि सरकार भरोसा दिलाती रही कि कारोबारी मन्दी अस्थायी है लेकिन न जनता को उसके आश्वासन विश्वसनीय लगे और न ही उद्योग-व्यापार जगत को। ताज़ा आँकड़े निश्चित रूप से उत्साहवर्धक हैं किंतु जानकारों का कहना है कि दीपावली सीजन के कारण जुलाई-सितम्बर के दौरान मांग बढ़ी जिसने विकास दर में वृद्धि का रास्ता साफ किया। गुजरात चुनाव में कांग्रेस ने जीएसटी को बड़ा मुद्दा बनाते हुए वहां के व्यापार-उद्योग जगत को लुभाने का दांव चला था। उसकी वजह से भाजपा रक्षात्मक भी हुई लेकिन गत दिवस जारी आँकड़े उसके लिए संजीवनी समान हैं। हालांकि राजकोषीय घाटे में बढ़ोतरी ने शेयर मार्केट में निवेशकों को निराश किया किन्तु ये सच है कि जीएसटी के साथ जुड़ी शुरुवाती परेशानियां ज्यों-ज्यों दूर होती जा रही हैं त्यों-त्यों कारोबारियों की अड़चनें भी कम होने लगी हैं। उम्मीद की जानी चाहिये कि अगली तिमाही के आँकड़े और अच्छे होंगे। वित्त मंत्री श्री जेटली ने जीएसटी की दरों में और कमी का संकेत देकर कारोबारी जगत को अच्छे दिन आने का जो भरोसा दिया वह सरकार के बढ़ते आत्मविश्वास का परिचायक है। अब देखना ये है कि विकास दर में वृद्धि का ये सिलसिला स्थायी हो पाता है या नहीं?

-रवीन्द्र वाजपेयी

मप्र : विकास के आँकड़ों पर भारी दुष्कर्म

एक तरफ  तो मप्र में दुराचारी को फांसी पर लटकाने जैसा कानून बनाने की कवायद चल रही है वहीं दूसरी तरफ  राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट आ गई जिसके अनुसार मप्र दुष्कर्म के मामले में देश के अन्य राज्यों से आगे है। जिस प्रदेश को शान्त मानकर अन्य प्रांतों से आये लोग यहां स्थायी तौर पर बसने को लालायित रहते हों वह यदि महिलाओं के साथ दुष्कर्म के मामले में सबसे आगे हो तो इससे ज्यादा शर्मनाक क्या होगा? शिवराज सरकार दावा करती है कि उसने प्रदेश को विकास की राह पर तेज गति से आगे बढ़ाया है। काफी हद तक ये सही भी है लेकिन केवल आर्थिक विकास को ही सब कुछ नहीं माना जा सकता क्योंकि जिस राज्य में महिलाएं सुरक्षित न हों वहां आर्थिक समृद्धि के बावजूद अराजकता का साम्राज्य हो जाता है। एक समय था जब मप्र के चम्बल सम्भाग में डाकुओं का आतंक हुआ करता था। बुन्देलखण्ड में भी बाहुबलियों की परंपरा रही है किंतु शेष अंचलों में आम तौर पर कानून व्यवस्था औसतन संतोषजनक होती थी।  भले ही तब मप्र बीमारू राज्य कहलाता हो लेकिन अपराधों के आंकड़ों के लिहाज से वह उप्र और बिहार से काफी पीछे रहा करता था। जो ताजा रिपोर्ट आई उसमें महिलाओं के साथ दुष्कर्म के प्रकरणों में प्रदेश का उप्र से भी आगे निकल जाना ये साबित करने के लिए काफी है कि भले ही प्रदेश में आर्थिक माहौल बेहतर हुआ हो लेकिन मानसिकता के स्तर पर विकृति बढ़ी है जो चिंता और चिंतन दोनों का विषय है। भोपाल में बीते दिनों हुई घटना के उपरांत मुख्यमंत्री ने अभूतपूर्व संवेदनशीलता दिखाते हुए दुष्कर्मी को सजा ए मौत दिलाने का कानून बनाने की पहल कर डाली किन्तु मात्र इतने से ही दुराचारियों की मनोवृति बदल जाएगी ये विश्वास करना मूर्खता होगी। आज जब समाज में खुलापन आता जा रहा हो तब यौन अपराधों का बढऩा समाजशास्त्रियों के लिए मनन का विषय है। चोरी, डकैती, लूटपाट जैसे अपराधों के पीछे गरीबी वजह मानी जा सकती है। हत्या अथवा मारपीट की वजह व्यक्तिगत रंजिश भी होती है लेकिन किसी महिला के साथ दुष्कर्म करने का कारण विकृत मानसिकता ही है, जिसे केवल कानून बनाकर बदलना नामुमकिन है। इस संबंध में किसी एक तबके से अपेक्षा करने की बजाय सामूहिक दायित्वबोध जगाने की जरूरत है। शिवराज सरकार को चाहिए कि वह इस बारे में सामजिक स्तर पर जागरूकता लाने की मुहिम चलाए। जिस तरह प्रधानमन्त्री के स्वच्छता मिशन को एक आंदोलन के तौर पर संचालित किया जा रहा है वैसी ही सक्रियता दुष्कर्म के विरोध में हो तो स्थिति में सुधार की उम्मीद की जा सकती है। माता-पिता का भी ये फर्ज होता है कि वे अपने बेटों को लाड़-प्यार करने के साथ ही इस बात की सीख भी दें कि लड़कियों के साथ किस तरह पेश आया जाए। सरकार की अपनी सीमाएं होती हैं और दण्ड प्रक्रिया की अपनी। ऐसे में समाज , विशेष रूप से परिवार नामक इकाई की ये आधारभूत जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने नौनिहालों को सभ्य और संस्कारवान बनाएं वरना बीमारू राज्य के कलंक से उबरने के बाद भी मप्र की गिनती मानसिक रोगियों के प्रांत के तौर पर होती रहेगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी