Saturday, 9 December 2017

चलो किसी ने तो पुरूषों पर दया की --------------------------------- ------



मामला जितना रोचक है उतना ही गम्भीर भी। सर्वोच्च न्यायालय ने एक अर्जी पर विचार करते हुए केंद्र सरकार के गृह विभाग को नोटिस भेजकर पूछा है कि किसी विवाहित महिला द्वारा किसी परपुरुष के साथ आपसी सहमति से भी शारीरिक सम्बंध बनाए जाने पर उसका पति यदि शिकायत कर दे तो परपुरुष के विरुद्ध व्यभिचार का प्रकरण बन जाता है तब पति को धोखा देने वाली पत्नी को भी क्यों न व्यभिचार का आरोपी माना जाए ? न्यायालय ने इसी सम्बन्ध में एक और मुद्दा उठाया है। मौजूदा कानून के प्रावधान के अनुसार पत्नी यदि अपने पति की सहमति या अनुमति से परपुरुष के साथ शारीरिक संबंध बनाती है तो वह व्यभिचार नहीं माना जाता। न्यायालय ने इसे लैंगिक भेदभाव की संज्ञा देते हुए कहा है कि यह प्रावधान पत्नी को पति की सम्पत्ति जैसा बनाता है जो अनुचित है , अत: इसमें भी बदलाव किया जावे। विवाहित महिला द्वारा अन्य पुरुष से विवाहेतर सम्बन्ध रखे जाने की शिकायत भी केवल पति ही कर सकता है, अन्य रिश्तेदार नहीं। इसके ठीक उलट यदि पति किसी अन्य महिला से उसकी सहमति से शारीरिक सम्बन्ध रखे तो पत्नी इस आधार पर केवल तलाक़ ले सकती है, उस पर व्यभिचार का मामला नहीं बनता। न्यायालय ने मौजूदा कानून में जहां पत्नी को पति की संपत्ति जैसा माने जाने पर ऐतराज व्यक्त किया वहीं  बिना पति की सहमति से परपुरुष से शारीरिक सम्बन्ध बनाने वाली महिला  को भी व्यभिचार का दोषी बनाने का प्रावधान कानून में रखने हेतु गृह मंत्रालय से कहा है। न्यायालय का ये कहना काफी तर्कसंगत है कि जो विवाहित महिला पति की सहमति लिए बगैर अन्य किसी पुरुष से शारीरिक सम्बन्ध बनाती है वह भी व्यभिचार के लिए बराबरी की दोषी होनी चाहिए। न्यायालय ने इस बात पर भी आश्चर्य जताया कि इस तरह के मामले में केवल महिला का पति ही शिकायत कर सकता है। उसके बेटे-बेटी तक अपनी माँ के विवाहेतर अवैध संबंधों पर आपत्ति नहीं  कर सकते। अदालत ने व्यभिचार के मामले में केवल पुरुष को दोषी माने जाने संबंधी प्रावधान को संशोधित कर महिला को भी व्यभिचारी मानने की जो मंशा जाहिर की उसकी आवश्यकता और औचित्य से इंकार नहीं किया जा सकता। इसी के साथ महिला पर पति के एकाधिकार को भी आधुनिक संदर्भों में सही नहीं माना। केंद्र सरकार सर्वोच्च न्यायालय के नोटिस पर क्या जवाब देता है और सम्बंधित कानून में न्यायालय की अपेक्षानुरूप किस तरह संशोधन करता है , इस पर सभी की निगाहें लगी रहेंगी। वैसे सर्वोच्च न्यायालय ने जो सवाल उठाए  वे सामाजिक स्तर पर भी विचारणीय हैं। विवाहेतर संबंध भारतीय समाज में कानूनी से ज्यादा नैतिकता की दृष्टि से अपराध की श्रेणी में माने जाते हैं। परिवार नामक इकाई पति-पत्नी के आपसी विश्वास और समर्पण पर टिकी होती है जिसमें किसी एक के द्वारा मर्यादाओं के उल्लंघन का दुष्परिणाम पूरे परिवार को भोगना पड़ता है। भारतीय संस्कृति  अनेकानेक विपरीत परिस्थितियों में भी यदि अक्षुण्ण रही तो उसकी वजह परिवार ही है जहां संस्कारों का बीजारोपण होने के साथ ही हर रिश्ते से जुड़े कर्तव्यबोध का आभास कराया जाता है। यदि ऐसा न होता तो सैकड़ों बरस की गुलामी में भारतीयता पूरी तरह लुप्त हो गई होती। सर्वोच्च न्यायालय ने भले ही गृह मंत्रालय से सवाल-जवाब किये हों किन्तु समूचे समाज को इसका संज्ञान लेना चाहिए क्योंकि ऐसे मामलों में सामाजिक दबाव कहीं बेहतर तरीके से काम करता है। जिसे अब पुराना जमाना कहा जाता है उसमें सामाजिक व्यवस्था बहुत सुदृढ़ होती थी। जिसके अंतर्गत इस तरह के मामलों में निर्णय और न्याय किये होता था। आदिवासी और दलित जातियों में कई जगह आज भी सामाजिक पंचायतें पारिवारिक मसलों पर जो फैसला कर देती हैं वे बंधनकारी होते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने जिस सन्दर्भ में गृह मंत्रालय को नोटिस जारी किया वह बेहद सामयिक है क्योंकि महिला की सहमति से हुए व्यभिचार के लिए केवल पुरुष को कसूरवार मान लेना न्याय की कसौटी पर खरी उतरने वाली बात कतई नहीं लगती। वहीं पत्नी को पति की निजी संपत्ति मानने की प्रवृत्ति पर भी न्यायालय की पैनी दृष्टि स्वागतयोग्य है। विवाहेतर सम्बन्धों की बढ़ती खबरों के बीच सर्वोच्च न्यायालय का यह क़दम निश्चित रूप से एक बड़े बदलाव का आधार बन सकता है जिसमें समान अपराध के लिए केवल पुरुष वर्ग को दोषी मान लेने के बजाय महिलाओं को भी बराबरी से कसूरवार मानने का प्रावधान यदि हो सके तो समाज में नैतिकता का जो ह्रास हो रहा है उसमें  कुछ हद तक तो कमी लाई ही जा सकती है। महिला सशक्तीकरण की चर्चाओं के बीच पुरुषों को संरक्षण देने का यह प्रयास सही दिशा में सही कदम है। पुरुषों की बराबरी के लिए आतुर महिलाओं को दंड प्रक्रिया में भी बराबरी मिलना बहुप्रतीक्षित भी है और अपेक्षित भी। इस संबंध में यह बात पूरी तरह विचारणीय है कि महिला किसी भी परिवार का आधार होती है। कहावत है कि पिता यदि मस्तिष्क तो माँ हृदय का रूप है। यही वजह है कि भारतीय समाज में महिला को देवी मानकर प्रतिष्ठित किया गया। तथाकथित आधुनिकता और नारी स्वातंत्र्य के पश्चिमी प्रवाह में वर्जनाहीन नारीत्व की जो सोच भारतीय समाज में भी घुस रही है वही नई-नई समस्याओं का कारण है। महिलाओं को मध्ययुगीन स्थिति में रखना तो असंभव है किन्तु उनके प्रति सम्मान और करुणा का भाव तभी तक बना रह सकता है जब तक वे अपने प्रकृति प्रदत स्वभाव के अनुरूप आचरण करें। स्वतंत्रता और स्वच्छंता के बीच का अंदर नारी और पुरुष दोनों के लिए एक समान होना चाहिए।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 8 December 2017

मणिशंकर : हिंदी ही नहीं दिमाग भी कमजोर है

मणिशंकर अय्यर की हिंदी कमजोर है ये बात भले ही मान ली जाए किन्तु अब तो लगता है विदेश सेवा से राजनीति में आया ये पूर्व केंद्रीय मंत्री दिमाग से भी कमजोर है। 2014 के लोकसभा चुनाव के पूर्व नरेंद्र मोदी के चाय बेचने पर उनकी व्यंग्यात्मक टिप्पणी के कारण कांग्रेस को काफी नुकसान उठाना पड़ा था। यदि श्री अय्यर में तनिक भी समझदारी होती तब वे प्रधानमंत्री को नीच किस्म का व्यक्ति कहने की मूर्खता न करते। गुजरात में पहले चरण के मतदान के दो दिन पूर्व उनकी जुबान से निकले चन्द शब्दों ने पूरी कांग्रेस को पिछले पाँव पर जाने बाध्य कर दिया। श्री मोदी ऐसे हमलों पर पलटवार करने में सिद्धहस्त हैं सो उन्होंने बिना देर गंवाए श्री अय्यर के बयान को भुनाना शुरू कर दिया। उनके पीछे पूरी भाजपा दाना-पानी लेकर मणिशंकर के साथ ही कांग्रेस और गांधी परिवार को कठघरे में खड़ा करने में जुट गई। सोनिया गांधी द्वारा मौत का सौदागर , प्रियंका वाड्रा द्वारा नीच राजनीति और राहुल द्वारा खून की दलाली जैसी जो टिप्पणियां अतीत में प्रधानमन्त्री के लिये की गईं थीं उन सबका हवाला देते हुए ये साबित करने का अभियान शुरू कर दिया गया कि कांग्रेस आदतन श्री मोदी को अपमानित करती आई है। ये पहला  अवसर नहीं है जब प्रधानमंत्री के प्रति अभद्र भाषा का इस्तेमाल हुआ हो लेकिन कभी किसी कांग्रेसी के विरुद्ध कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं हुई। मणिशंकर तो वैसे भी आँय- बांय बकने के लिए कुख्यात रहे हैं।  चुनाव के पहले श्री मोदी को मौत का सौदागर और नीच राजनीति करने वाला कहने का अपराध तो क्रमश: सोनिया जी और प्रियंका ने भी किया किन्तु गांधी परिवार की कांग्रेस में सौ खून माफवाली स्थिति होने से किसी ने उस पर एतराज नहीं किया। सर्जिकल स्ट्राइक पर राहुल की टिप्पणी बेहद आपत्तिजनक होने पर भी पार्टी ने कोई ध्यान नहीं दिया लेकिन मणिशंकर फिलहाल कांग्रेस में पूरी तरह हाशिये पर हैं। गृहराज्य तमिलनाडु में भी उनकी कोई सियासी पकड़ नहीं बची। इसीलिए राहुल गांधी ने बिना देर लगाए उन्हें श्री मोदी से माफी मांगने कहा और फिर पार्टी से निलंबित कर दिया। लगे हाथ भाजपा को ये चुनौती भी दे डाली कि वह भी अपने उन नेताओं पर वैसी ही कार्रवाई करे जिनकी जुबान से आये दिन गांधी परिवार के प्रति तीखी और अशालीन टिप्पणियां की जाती हैं। कांग्रेस द्वारा श्री अय्यर का निलंबन निश्चित रूप से एक स्वागतयोग्य कदम है लेकिन इसके पीछे राजनीति को साफ-सुथरा बनाने की इच्छा से ज्यादा मज़बूरी काम कर रही थी। अगर गुजरात का चुनाव चरमोत्कर्ष पर न होता तब शायद श्री अय्यर के विरुद्ध कार्रवाई में इतनी तत्परता न दिखाई जाती। टीवी चैनलों में इस विषय पर हुई बहस के दौरान कांग्रेस के अधिकतर प्रवक्ता बजाय अपराधबोध के उल्टे भाजपा नेताओं द्वारा की गईं टिप्पणियों का हवाला देते हुए ये साबित करने का प्रयास करते देखे गए कि अपशब्दों के प्रयोग की शुरुवात भाजपा की तरफ  से हुई थी। खैर, अब तो जो होना था हो चुका। श्री अय्यर की जुबान से निकला ज़हर जितना नुकसान करना था कर गया। उनका निलंबन क्यों किया गया ये भी सब समझते हैं। 2007 में गुजरात चुनाव के अंतिम चरण में सोनिया जी द्वारा श्री मोदी को जो उस समय मुख्यमंत्री हुआ करते थे, मौत का सौदागर कह दिया गया। उस बयान को मोदी जी ने जिस तरह भुनाया उसकी यादें काँग्रेस भूली नहीं थी। यही वजह रही कि उसने मणिशंकर पर गाज गिराने में ज्यादा देर नहीं लगाई लेकिन जिस तरह धनुष से निकला तीर और जुबान से निकले शब्द कभी लौटकर नहीं आते ,  ठीक उसी तरह श्री अय्यर द्वारा प्रधानमंत्री को नीच व्यक्ति कहे जाने पर कितनी भी सफाई या कार्रवाई की जाए वे शब्द  तो सियासी वायुमण्डल में मंडराते ही रहेंगे। लेकिन इससे हटकर अब जरा इस पर भी ध्यान दिया जावे कि  राजनीति में मर्यादा की लक्ष्मण रेखाएं अप्रासंगिक क्यों होती जा रहीं हैं? एक दौर वह भी था जब संसद में तीखी बहस और आरोप प्रत्यारोप के बाद नेहरु जी, डॉ.लोहिया को चाय पीने बुलवाते थे। नेहरू जी की मृत्यु पर संसद में अटल जी का श्रद्धांजलि भाषण तत्कालीन राजनीति में संस्कारों की मौजूदगी का श्रेष्ठतम उदाहरण था। उस दौर की सियासत सिद्धांतों पर आधारित थी इसलिए उसमें शालीनता और शिष्टाचार की चिन्ता की जाती थी लेकिन सत्तर के दशक से सियासत पूरी तरह सत्ता केंद्रित होती गई। आपातकाल के बाद जन्मी राजनीति में विरोध की जगह शत्रुता के भाव ने ले ली और फिर जो होता गया उसी का परिणाम है आज की स्तरहीन राजनीति , जिसमें सिद्धांतों और आदर्शों की जगह अवसरवाद और येन केन प्रकारेण सत्ता हथियाने के लिए होने वाले षडयंत्रों ने ले ली है। मणिशंकर अय्यर अकेले राजनेता नहीं हैं जिनकी जुबान सदैव फिसला करती है। जो भाजपा कल रात तक कांग्रेस को कोसती रही उसमें भी कुछ नेता ऐसे हैं जो बोलते समय सारी मर्यादाएं भूल जाते हैं। गांधी परिवार के प्रति भी अनावश्यक और अशालीन टिप्पणियां सदैव की जाती रहीं हैं। श्री अय्यर के निलंबन के साथ ही कांग्रेस द्वारा भाजपा से भी वैसी ही अपेक्षा करना गलत नहीं है लेकिन गुजरात चुनाव सिर पर न होता और प्रधानमंत्री को नीच कहने से होने वाले नुकसान का डर न होता तो राहुल , मणिशंकर के पिछले बयानों की तरह इसे भी नजरंदाज कर चुके होते। गुजरात चुनाव में कांग्रेस अभी तक बेहद हमलावर थी लेकिन पहले मनीष तिवारी द्वारा राहुल को जनेऊधारी ब्राह्मण बताना और फिर श्री अय्यर द्वारा श्री मोदी को नीच कह देने से पूरी पार्टी को रक्षात्मक होना पड़ गया। कपिल सिब्बल ने सर्वोच्च न्यायालय में अयोध्या मामले को लेकर जो बचकानी हरकतें कीं उनकी वजह से गुजरात चुनाव में भाजपा  को मन्दिर मुद्दा जि़ंदा करने का मौका मिल गया था। लम्बे समय बाद गुजरात की लड़ाई में मजबूत नजऱ आ रही कांग्रेस अचानक पिछडऩे की स्थिति में आ गई। बचे हुए प्रचार में प्रधानमंत्री सहित पूरी भाजपा और आक्रामक होकर उतरेगी। तमाम चुनाव सर्वेक्षणों का औसत भाजपा की सत्ता में वापिसी के संकेत दे रहा है। अभी तक एक भी सर्वेक्षण एजेंसी ने कांग्रेस को बहुमत मिलने का अनुमान नहीं लगाया किन्तु 18 दिसंबर को यदि परिणाम कांग्रेस के विरुद्ध गए तो उसके लिए दोषी राहुल नहीं अपितु कपिल सिब्बल और उससे भी ज्यादा तो मणिशंकर अय्यर माने जाएंगे जिनकी जुबान ने गुजरात चुनाव की गर्मी को गन्दगी में बदल दिया। भाजपा और कांग्रेस सहित अन्य राजनीतिक दलों के लिए भी ये सोचने का समय आ गया है कि  सियासत में शालीनता की पुनस्र्थापना किस तरह की जाए वरना लोकतन्त्र के प्रति आस्था और रहा-सहा विश्वास भी जाता रहेगा। अच्छे लोगों से राजनीति में आने की अपेक्षा तो सभी करते हैं लेकिन इस तरह के घटिया माहौल में कोई भी अच्छा इंसान उसका हिस्सा नहीं बनना चाहेगा। पता नहीं गुजरात चुनाव के बाद राजनेता इस तरह के ओछेपन को याद भी रखेंगे या सब भूलकर अगले चुनाव के लिए नई नई गालियों और अपशब्दों के प्रयोग की रिहर्सल करने में जुट जाएंगे ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 7 December 2017

येरुशलम: ट्रम्प ने आग में घी डाला

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा येरुशलम को इसरायल की राजधानी घोषित करने जैसा कदम पश्चिम एशिया के तनाव को और बढ़ा सकता है । ऐसे समय जब सीरिया संकट के चलते समूचा अरब जगत और काफी हद तक दुनिया का बड़ा भाग परेशानी से गुजर रहा हो ऐसी स्थितियों में ट्रम्प का ये एकतरफा ऐलान फ्लिस्तीनी मसले को नए सिरे से गर्मी प्रदान करने वाला हो सकता है । येरुशलम इसाई , यहूदी और इस्लाम तीनों धर्मावलम्बियों की आस्था का केंद्र है । 1967 के युद्ध में इसरायल ने इसे कब्जा लिया था । हालांकि यासेर अराफात के बाद फ्लिस्तीनी संघर्ष की धार कमजोर पड़ गई लेकिन मुस्लिम जगत को इस ऐतिहासिक शहर पर यहूदियों का एकाधिकार गंवारा नहीं होगा । आपसी लड़ाई में उलझे रहने से मुस्लिम देश इसरायल से पंगा लेने की स्थिति में नहीं हैं । सम्भवत: इसी का लाभ उठाकर ट्रम्प ने उक्त कदम उठा लिया लेकिन रूस और चीन इसे किस तरह  देखते हैं ये महत्वपूर्ण रहेगा । दूसरी तरफ  इसरायल के पड़ोसी अरब देश भी अमेरिका के इस चौंका देने वाले फैसले से भयभीत हो गए होंगे । सऊदी अरब और मिस्र की प्रतिक्रिया भी देखने लायक होगी । कुल मिलाकर कहें तो ट्रम्प का यह ट्रम्प कार्ड पश्चिम एशिया की कूटनीतिक और सामरिक परिस्थितियों में अमेरिका के वर्चस्व को स्थापित करने में कारगर भी हो सकता है लेकिन इससे वहां अन्य महाशक्तियों के हस्तक्षेप की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता। लगता है उत्तर कोरिया के सनकी तानाशाह की तरह राष्ट्रपति ट्रम्प को भी बिना बवाल मचाए चैन नहीं आता । आईएसआईएस के आतंक से जल रहे अरब जगत के लिए येरुशलम सम्बन्धी अमेरिकी राष्ट्रपति का ऐलान आग में घी डालने जैसा ही है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

दिग्गी की कमी दूर कर दी कपिल ने



कपिल सिब्बल बड़े और कामयाब वकील हो सकते हैं किन्तु  राजनीति में बेहद कच्चे हैं । अतीत में भी वे अपनी कथनी और करनी  से कई मर्तबा कांग्रेस को मुसीबत में डाल चुके थे लेकिन परसों सर्वोच्च न्यायालय में अयोध्या विवाद की सुनवाई  २०१९ तक टालने की दलील को लेकर उनकी जो फज़़ीहत हुई उसके कारण गुजरात चुनाव में कांग्रेस को पूरी तरह रक्षात्मक होना पड़ गया । हालांकि श्री सिब्बल की दलीलों को उनके पेशे से जुड़ा बताकर पार्टी पहले ही पल्ला झाड़ चुकी थी लेकिन कल सुन्नी            वक्फ बोर्ड द्वारा उनके तर्कों से असहमति व्यक्त किये जाने के बाद से शुरू हुई सियासत ने श्री सिब्बल को हंसी का पात्र तो बनाया ही पूरी कांग्रेस पार्टी को भी बेमतलब ऐसे जाल में उलझा दिया जिससे निकलते-निकलते गुजरात चुनाव का पहला चरण सम्पन्न हो चुका होगा । कल रात तक यही संशय बना रहा कि सिब्बल साहब आखिर किस पक्षकार के वकील बनकर सर्वोच्च न्यायालय में मन्दिर मामले की सुनवाई टलवाने के लिए हाथ पांव मारते रहे? पहले वक्फ बोर्ड ने उनकी दलीलों से असहमति जताई किन्तु जब लगा कि उससे गुजरात में भाजपा को बिना मांगें मन चाही मुराद मिल गई तो फौरन पलटी मारकर श्री सिब्बल की दलीलों का समर्थन भी कर दिया गया । मुस्लिम संगठनों की ओर से आये परस्पर विरोधी अलग-अलग बयानों ने रही-सही कसर पूरी कर दी । जब तक स्थिति संभलती तब तक भाजपा के प्रवक्ता से लेकर तो प्रधानमंत्री तक ने श्री सिब्बल के बहाने कांग्रेस को चक्रव्यूह में घेर लिया । जब तक ये स्पष्ट हुआ कि सिब्बल साहब अयोध्या विवाद के मूल पक्षकार स्व.हाशिम अंसारी के पुत्र इक़बाल की ओर से पेश हुए तब तक तो मामला पूरे  तौर पर गड्डमगड्ड हो चुका था और किसी को समझ नहीं आया कि कौन सही और कौन गलत है ? लेकिन इतना तो साफ  हो ही गया कि समूचे विवाद की जड़ श्री सिब्बल ही थे जिन्हें कांग्रेस पार्टी न तो गलत कह पा रही थी और न ही सही । मुस्लिम संगठनों की ओर से भी हड़बड़ाहट में जिस तरह की सफाई या प्रतिक्रियाएँ  आईं उन सबने भी भाजपा को हमलावर होने का वह अवसर दे दिया जिसकी वह बेसब्री से प्रतीक्षा कर रही थी । कुछ लोग कल के घटनाक्रम के दौरान कहते सुने गए कि ऊल जलूल बयान देकर पार्टी को मुसीबत में फंसाने वाले दिग्विजय सिंह के नर्मदा परिक्रमा पर रहने से कांग्रेस काफी राहत महसूस कर रही थी लेकिन गुजरात में मतदान के प्रथम चरण के ठीक पहले कपिल सिब्बल ने जो गैर जिम्मेदाराना काम कर दिया उसने दिग्विजय सिंह की कमी दूर कर दी । ये सवाल केवल गुजरात चुनाव  ही नहीं अपितु उसके बाद भी पूछा जाएगा कि श्री सिब्बल ने अयोध्या विवाद की सुनवाई टालने की दलील किसके कहने से दी थी क्योँकि मुस्लिम संगठन भी कह रहे हैं कि वे शीघ्र  निपटारा चाहते हैं । चूँकि श्री सिब्बल ने जो कुछ कहा वह अदालती बहस का हिस्सा था इसलिए कांग्रेस उन पर कोई कार्रवाई भले न करे किन्तु पार्टी अध्यक्ष का कार्यभार सम्भालने जा रहे राहुल गांधी को बंदरों के हाथ से उस्तरा छीनने का साहस दिखाना होगा वरना  जरूरत से ज्यादा अक्ल रखने वाले महानुभाव अच्छी  भली पक रही खीर में हींग बघारने जैसी हरकतें दोहराते रहेंगे ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 6 December 2017

सिब्बल ने भाजपा को बैठे-बिठाए मुद्दा दे दिया


1950 में जमीन के दावे को लेकर प्रस्तुत मुकदमे का फैसला अगर अपेक्षित समय में हो जाता तो वह इतने बड़े विवाद की वजह नहीं बन पाता। राम जन्मभूमि को लेकर शुरू हुआ झगड़ा यदि राजनीति के झमेले में फंसकर रह गया तो उसके लिए न्यायपालिका भी कम कसूरवार नहीं है जो इस संवेदनशील प्रकरण पर फैसला सुनाने में आगे पीछे सोचती रही । कुछ साल पूर्व इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अयोध्या में विवादित भूमि को तीन हिस्सों में बांटने का फैसला सुनाने की हिम्मत दिखाई लेकिन तब तक संबंधित सभी पक्ष अपनी स्थिति  से पीछे न हटने की हद तक आ चुके थे, लिहाजा मामला सर्वोच्च न्यायालय में बतौर अपील जा पहुंचा । उसने भी इतने साल व्यर्थ गंवा दिए । कुछ समय पहले 5 दिसम्बर से नियमित सुनवाई करते हुए इसके निपटारे का निर्णय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लिया गया । उम्मीद बंधी थी कि देर आए दुरुस्त आए की तर्ज पर अब यह प्रकरण अदालत सुलझा देगी । इस बारे में उल्लेखनीय तथ्य ये है कि लगभग सभी पक्ष अब ये कहने लगे हैं कि वे अदालत के निर्णय को मान लेंगे । न्यायालय द्वारा आपसी सुलह का सुझाव भी दिया गया था किंतु बात नहीं बनी। बीच - बीच में कुछ लोग मध्यस्थता करने की नीयत से आगे बढ़े लेकिन कोई भी पक्ष टस से मस नहीं हुआ । ताज़ा कोशिश श्री श्री रविशंकर की रही जिसका कोई फल नहीं निकला । ले देकर सभी की उम्मीदें सर्वोच्च न्यायालय पर टिक गईं किन्तु गत दिवस सुनवाई शुरू होते ही सुन्नी वक्फबोर्ड के वकील कपिल सिब्बल ने सुनवाई  2019 के लोकसभा चुनाव तक टालने का दबाव डालते हुए कहा कि चूंकि भाजपा ने 2014 के चुनावी घोषणा पत्र में राममंदिर बनाने की बात कही थी इसलिए प्रकरण का निपटारा होने से उसे आगामी लोकसभा चुनाव में सियासी लाभ मिल सकता है । जब अदालत ने इसे नहीं माना तब दस्तावेज़ों को पढऩे के लिए समय की मांग की गई जिस पर अदालत ने 8 फरवरी की तारीख तय कर दी, जिसके बाद नियमित सुनवाई की जावेगी। मुस्लिम पक्षकारों की ओर से वकीलों के सभी तर्क प्रकरण को टाले रखने की कोशिश करते लगे जबकि न्यायाधीशों ने उनकी हर कोशिश को विफल करते हुए इस बहुचर्चित प्रकरण को अंतिम रूप से हल करने की प्रतिबद्धता दोहराई। 8 फरवरी तक सभी पक्षों के वकीलों को  दस्तावेजों का आदान-प्रदान और अध्ययन करने की हिदायत भी दे दी गई। प्रधान न्यायाधीश ने व्यक्तिगत रुचि लेकर इस विवाद को निपटाने की जो पहल की बजाय उसका स्वागत करने के बजाय न्यायालय के भीतर राजनीतिक भाषणबाजी करने के श्री सिब्बल के प्रयास का औचित्य किसी भी समझदार इंसान  को रास नहीं आया।  चूंकि वे कांग्रेस के बड़े नेता भी हैं इसलिए उनकी अदालती जिऱह को काँग्रेस के दृष्टिकोण से जोड़ते हुए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कटाक्ष कर दिया कि एक तरफ  तो राहुल गांधी गुजरात के मंदिरों में जा-जाकर मत्था टेक रहे हैं वहीं दूसरी तरफ  उनकी पार्टी के वरिष्ठ नेता सर्वोच्च न्यायालय में मन्दिर मामले की सुनवाई रुकवाने के लिए एढ़ी-चोटी का जोर लगाए पड़े हैं । हालांकि कांग्रेस ने तुरंत श्री सिब्बल के तर्कों को उनके पेशे से जुड़ा बताते हुए उससे पल्ला झाड़ लिया किन्तु दूसरी तरफ  ये भी सच है कि भले ही न माने लेकिन कांग्रेस अयोध्या मसले पर सदैव इस बात को लेकर चिंतित रहती है कि इसका फायदा भाजपा को न मिले । दूसरी तरफ  वह भाजपा को मन्दिर बनाने का वायदा पूरा न कर पाने के लिए कटघरे में भी खड़ा करती है । वाजपेयी सरकार  जाने के उपरांत दस वर्ष का समय कांग्रेस को मिला था । वह चाहती तो उस दौरान मन्दिर विवाद को किसी अंजाम तक पहुंचाकर भाजपा से उसका ब्रह्मास्त्र छीन सकती थी लेकिन न तो उसने साहस दिखाया न ही राजनीतिक चातुर्य । अब जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने तत्परता के साथ इस विवाद को निपटाने के लिए कदम आगे बढ़ाए तब उसे महज इस गरज से रोकना कि उससे भाजपा लाभान्वित हो जाएगी , अव्वल दर्जे की गैर जिम्मेदाराना सोच है । सर्वोच्च न्यायालय हिंदुओं के पक्ष में फैसला देगा जिससे भाजपा को आगामी लोकसभा चुनाव में वोटों की भरपूर फसल काटने का अवसर मिल जाएगा, जैसी आशंका मुस्लिम पक्षकारों के मन में बैठ गई या फिर ये सब श्री सिब्बल के अपने दिमाग की उपज है ये तो वे ही बता सकते हैं किंतु इस विवाद को अदालती फैसले से निपटाने का ये सबसे सही समय है क्योंकि सत्ता में होने के कारण भाजपा के लिए भी कतिपय मर्यादाओं का पालन करना बाध्यता है । एक बात और भी इस सम्बंध में विचारणीय है कि जब ज़मीन के तीन बराबर हिस्से करने के अलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय को किसी भी पक्ष ने मंजूर नहीं किया और मन्दिर के बगल में या कुछ दूर हटकर मस्जि़द बनाने के लिए मुस्लिम राजी नहीं हैं तब भविष्य में आने वाले न्यायालयीन निर्णय को सभी पक्ष सिर झुकाकर स्वीकार कर लेंगे इसकी क्या गारंटी है ? कांग्रेस माने या नहीं किन्तु कल सर्वोच्च न्यायालय  में श्री सिब्बल की दलीलों ने गुजरात चुनाव में मन्दिर मुद्दे को भुनाने का अवसर बैठे-बिठाए  भाजपा को दे दिया । एक कहावत है कि सही निर्णय भी यदि उपयुक्त समय पर न लिया जाए तो उसका समुचित लाभ नहीं हो पाता । राम मन्दिर विवाद के बारे में भी यही हो रहा है । भाजपा और उसके विरोधी दोनों एक दूसरे पर राजनीति करने का आरोप लगाते रहते है किन्तु कभी भी ये देखने में नहीं आया कि उन सबने मिल बैठकर सभी पक्षों में सहमति बनाने के कोशिश की हो । भाजपा यदि मंदिर के बहाने हिन्दू ध्रुवीकरण करती है तो अन्य पार्टियों ने बाबरी ढांचे की याद दिला-दिलाकर मुस्लिम मतदाताओं को अपनी तरफ खींचने का कोई अवसर नहीं गंवाया । अच्छा हुआ सर्वोच्च न्यायालय ने श्री सिब्बल की जिऱह को नामंजूर करते हुए 8 फवरी की तारीख मुकर्रर कर दी । आगामी लोकसभा चुनाव के पहले तक ये मसला यदि अदालत निपटा दे तो ये उसका बड़ा एहसान होगा क्योंकि अयोध्या में यथास्थिति बनी रहने तक रामलला के प्रस्तावित मन्दिर तथा मस्जि़द का पुनर्निर्माण वोटों की एटीएम मशीन बने रहेंगे । कांग्रेस को चाहिये वह श्री सिब्बल के अदालती तर्कों से खुद को अलग ही न करे अपितु आगे बढ़कर कहे कि वह नियमित सुनवाई के जरिये प्रकरण के शीघ्रातिशीघ्र निराकरण के पक्ष में है। इस मामले को राजनीतिक और धार्मिक नज़रिए की बजाय भूमि स्वामित्व के दावे-प्रतिदावे के तौर पर देखा जाए तो ये जल्दी निबट जाएगा वरना 67 साल तो मुकदमे को चलते और आज 25 साल बाबरी ढाँचे को गिरे हो गए । यदि श्री सिब्बल की तरह अड़ंगेबाजी लगाई जाती रही तब ये मामला भी कश्मीर विवाद जैसा बन जाएगा । शिया मुस्लिमों ने अपनी तरफ  से जो सदाशयता दिखाई है वह इस प्रकरण में निर्णायक हो सकती है । शायद श्री सिब्बल और उनके पक्षकार इसी से भयभीत होकर मामले को टांगे रखना चाहते होंगे किन्तु वे इस बात से बेखबर हैं कि ऐसा करने से मुसलमानों का कितना नुकसान होता है और भाजपा सहित अन्य हिन्दू संगठनों को अपने वोट बैंक को एकजुट रखने का अवसर भी बिना मांगे मिल जाता है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी