Thursday, 6 September 2018

वरना रूठने-मनाने का सिलसिला चलता रहेगा

कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला पार्टी के सबसे मुखर नेताओं में से हैं। राहुल गांधी को जनेऊधारी ब्राह्मण बताने का काम उन्हीं ने किया था। गत दिवस उन्होंने हरियाणा में ब्राह्मणों के एक कार्यक्रम में कहा कि कांग्रेस का डीएनए ब्राह्मणों से मिलता है। इसके आगे वे ये भी बोल गए कि यदि पार्टी सत्ता में आई तो हरियाणा में ब्राह्मण विकास बोर्ड बनाया जावेगा तथा उन्हें 10 प्रतिशत आरक्षण दिलवाने का प्रयास भी किया जाएगा। हालांकि किसी अन्य कांग्रेस नेता ने उनके बयान से रजामंदी नहीं दिखाई। ये भी माना जा सकता है कि ये उनकी निजी राय होगी क्योंकि भले ही राहुल गांधी कितने भी हिन्दू हो रहे हों परन्तु कांग्रेस में इतना साहस फिर भी नहीं होगा कि वह सवर्णों में से भी किसी एक जाति विशेष को अतिरिक्त सुविधाओं का वायदा कर सके। इस संबंध में उल्लेखनीय है कि सवर्ण समाज की अन्य जातियां भी अपने लिये आरक्षण जैसी सुविधाएं मांग रही हैं। दरअसल ये मुद्दा अब सभी राजनीतिक दलों के गले की हड्डी बन गया है। सवर्णों द्वारा अनु. जाति/जनजाति कानून को दोबारा लागू किये जाने के लिए किये जा रहे विरोध पर भाजपा का सरकार में होने के कारण चुप रहना तो समझ में आ रहा है परन्तु कांग्रेस के तमाम बड़े नेता न तो खुलकर सवर्णों के समर्थन में खड़े होने की हिम्मत दिखा पा रहे हैं और न ही विरोध में। म.प्र. में जहां सवर्णों के आंदोलन को लेकर जबर्दस्त सक्रियता है वहां भी कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया अनु.जाति/जनजाति कानून को लेकर टिप्पणी करने से बच रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस के बड़े नेता बोलने से परहेज कर ये संकेत दे रहे हैं कि बर्र के छत्ते में पत्थर मारने की हिम्मत उनमें नहीं है। कुल मिलाकर जैसी आशंका थी इस कानून के कारण उत्पन्न असंतोष ने आरक्षण नामक व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों को एक बार फिर उजागर कर दिया है। संविधान सभा ने अनु.जाति/जनजाति के लोगों को शिक्षा एवं नौकरी में आरक्षण देने की व्यवस्था एक निश्चित समय सीमा के लिए की थी। बाद में राजनीतिक कारणों से उसे बढ़ाया जाता रहा। वजह ये बताई गई कि सदियों से वंचित रहने वाले दलित एवं आदिवासी वर्ग के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक उत्थान का उद्देश्य पूरा नहीं हो सका लेकिन आरक्षण का जो स्वरूप बनता गया उसे देखते हुए तो वह मकसद कभी पूरा नहीं हो सकेगा। इसकी बड़ी वजह ये रही कि सभी राजनीतिक दलों ने आरक्षण को वोट की राजनीति का औजार बना लिया। वंचित वर्ग के चंद नेता तो प्रगति के चरम पर पहुंच गए परन्तु अधिकतर समाज आज भी बदहाली में जीने मजबूर हैं। आजादी के 71 वर्ष पूर्ण होने के बाद भी यदि देश की बड़ी आबादी को उसका हिस्सा नहीं मिल सका तो इसके लिए सत्ता में बैठ चुकी हर पार्टी और उसके नेता जवाबदार हैं। भारत के बाद आजाद हुए तमाम छोटे-छोटे देश हमसे कई गुना आगे निकल गए। द्वितीय विश्वयुद्ध में परमाणु हमले का शिकार जापान तो प्रगति के उच्चतम शिखर तक जा पहुंचा। दक्षिण कोरिया, मलेशिया, सिंगापुर, वियतनाम आदि आकार में भारत से बहुत छोटे हैं किन्तु आर्थिक विकास के पैमाने पर उनकी उपलब्धियां काबिले गौर हैं। रही बात आबादी की तो चीन ने इस समस्या को भी अपनी संपत्ति बनाकर विश्व शक्ति बनने की हैसियत हासिल कर ली। उक्त किसी भी देश में जाति अथवा धर्म के नाम पर न तो किसी के साथ भेदभाव किया जाता है और न ही किसी को विशेषाधिकार प्राप्त है। विकास के लिए सभी को समान अवसर और सुविधाएं सरकार देती है परन्तु योग्यता के साथ कोई समझौता या रियायत नहीं मिलती। हमारे देश की स्थिति इससे सर्वथा भिन्न है जहां आरक्षण के नाम पर समाज के एक बड़े वर्ग की उद्यमशीलता को धीरे-धीरे खत्म करते हुए उन्हें पूरी तरह राज्याश्रित बनाकर रख दिया गया। भले ही मुट्ठी भर लोग उससे लाभान्वित हो गए हों किन्तु गुणवत्ता की कसौटी पर खरे नहीं उतरने की वजह से उन्हें अपेक्षित सम्मान नहीं हासिल हो सका। वरना सात दशक तक आरक्षण नामक सुविधा के कारण तो अनु.जाति/जनजाति का पिछड़ापन दूर हो जाना चाहिए था। यही स्थिति अन्य पिछड़ी जातियों को लेकर बनी जिन्हें 1990 में मंडल आयेाग के जरिये आरक्षण रूपी झुनझुना तो थमा दिया गया परन्तु दूसरी तरफ मुक्त अर्थव्यवस्था और उदारीकरण के नाम पर सरकारी नौकरियां घटती चली गईं। यही वजह है कि अब आरक्षित समुदाय के नेता निजी क्षेत्र में भी आरक्षण हेतु दबाव बनाने लगे हैं। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि आरक्षण का लाभ उठाकर अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार कर लेने वालों का भी एक अभिजात्य वर्ग बन चुका है जो अपने समुदाय की बजाय केवल अपने परिवार के उत्थान में जुटा हुआ है। अब जबकि ये साबित होता जा रहा है कि आरक्षण इलाज की बजाय बीमारी बन गया है तब इसका स्थायी इलाज तलाशना समूची राजनीतिक बिरादरी की सामूहिक जिम्मेदारी बन जाती है। स्वर्ण नाराज हैं तो ब्राह्मणों की मिजाजपुर्सी शुरू कर दी जाए इससे कुछ हासिल होने वाला नहीं है। बेहतर हो आरक्षण के समर्थन और विरोध में हो रहे आंदोलनों से निपटने के लिए तदर्थ उपाय तलाशने की बजाय ऐसी व्यवस्था की जावे जिससे समाज को टुकड़े-टुकड़े होने से बचाया जा सके। भाजपा और कांग्रेस ही नहीं बल्कि दलितों और पिछड़ों की सियासत कर रही अन्य पार्टियों को भी ये समझ लेना चाहिए कि मौजूदा विरोध केवल अनु.जाति/जनजाति कानून को दोबारा लागू करने का नहीं है। असली वजह आरक्षण है जिसके कारण सवर्ण समुदाय की नई पीढ़ी योग्यता के बावजूद भी अवसरों से वंचित होने के कारण कुंठा और आक्रोश का शिकार हो रही है। 21वीं सदी में केवल जाति के आधार पर किसी को पीछे धकेलने की कुप्रथा के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता लेकिन इसके साथ ही योग्यता को दरकिनार रखते हुए उसके उत्थान का प्रयास भी कालांतर में नुकसानदेह ही होगा। यही वजह है कि आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था की खुलेमन से समीक्षा करते हुए उसका ऐसा विकल्प ढूंढना चाहिए जो भेदभाव रहित समाज की रचना में सहायक साबित हो। वरना एक को मनाने के प्रयास में दूसरे का रूठने का मौजूदा सिलसिला जारी रहेगा और चुनावी लाभ हानि के फेर में समाज को जातीय संघर्ष की आग में झुलसाता रहेगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 5 September 2018

नेतृत्व विहीन गुस्सा कितना प्रभावी होगा


6 सितंबर को अनु.जाति/जनजाति कानून के विरोध में आयोजित भारत बंद को लेकर शासन-प्रशासन काफी सतर्क हैं। ये बंद कितना कामयाब होगा इसका अंदाज लगाना कठिन है क्योंकि सवर्णों और पिछड़ी जातियों की इस गोलबंदी का कोई संगठित स्वरूप अब तक नहीं बन पाया है। यद्यपि जनभावनाओं के कारण विभिन्न राजनीतिक दलों के भीतर उक्त कानून के विरुद्ध सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है परन्तु जैसा विरोध या गुस्सा आम जनता के बीच महसूस किया जा रहा है वैसा राजनीतिक पार्टियों के भीतर बैठे सवर्ण तथा ओबीसी नेताओं में नजर नहीं आने से अपेक्षित दबाव बनता नहीं दिखाई दे रहा। हालांकि भाजपा के वरिष्ठ नेता कलराज मिश्र ने जरूर मुंह खोला वहीं म.प्र. के कांगे्रस विधायक गोविन्द सिंह ने भी दबी जुबान विरोध जताया है किन्तु उनके अलावा ऐसा कोई नेता नजर नहीं आ रहा जिसमें उक्त कानून के विरुद्ध बोलने की हिम्मत हो। बसपा सुप्रीमो मायावती के प्रमुख सलाहकार कहे जाने वाले सतीशचन्द्र मिश्र जैसे व्यक्ति में भी साहस नहीं है कि वे अधिवक्ता होते हुए भी उक्त कानून के उन विवादास्पद प्रावधानों के विरोध में अपने तर्कों के साथ सामने आयें जिनके कारण सवर्ण एवं पिछड़ी जातियों में भय मिश्रित रोष है। सही बात तो ये है कि सरकार चाहे किसी भी दल की क्यों न हो वह आगामी चुनाव को ध्यान में रखते हुए ही निर्णय करती है। मोदी सरकार को भी यदि जल्दी चुनाव का सामना नहीं करना होता तब वह सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को उलट-पुलट करने में इतनी तत्परता नहीं दिखाती। वहीं कांगे्रस सहित अन्य विपक्षी दल भी भाजपा को दलित विरोधी साबित करने में जल्दबाजी नहीं करते। चूंकि सभी पार्टियों में अनु.जाति/जनजाति के वोट हासिल करने का लालच है इसलिए खुलकर सच्चाई को स्वीकार करने की हिम्मत कोई नहीं दिखा पा रहा। यही वजह है कि अब दलीय दायरे से बाहर विरोध सामने आया है। ये भी उतना उग्र न होता यदि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद अनु.जाति/जनजाति की ओर से हिंसक विरोध न हुआ होता।  कुल मिलाकर जो स्थिति सामने आ रही है वह बेहद विरोधाभासी है क्योंकि लगभग सभी पार्टियां इस संबंध में मौन हैं जो उनकी सहमति का प्रमाण माना जाएगा। आरक्षण संबंधी विवाद पर भी सवर्ण नेता चूंकि जुबान खोलने की हिम्मत नहीं दिखाते इसलिए सवर्ण समुदाय पूरी तरह से नेतृत्वविहीन है। आजादी के बाद पं. नेहरू की सरकार ने अनु.जाति/जनजाति के लिए आरक्षण की व्यवस्था की थी वहीं 1989 में बनी ठाकुर विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने पिछड़ी जातियों के नेताओं के दबाव में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कर ओबीसी आरक्षण रूपी सौगात दी। उक्त दोनों प्रधानमंत्री संयोग से क्रमश: ब्राह्मण और क्षत्रिय थे। ऐसी स्थिति में अगड़ी जातियों के भीतर वर्तमान में जो गुस्सा है उसका कोई संगठित स्वरूप नहीं होने से राजनीति पर उसका कितना असर हो सकेगा ये अंदाज लगा पाना कठिन है। मंडल लागू होने पर देश के कई हिस्सों में युवा लड़के-लड़कियों ने आत्मदाह तक कर लिया परन्तु क्षणिक उन्माद के बाद वह आंदोलन ठंडा पड़ गया। सही बात ये है कि अनु.जाति/जनजाति और ओबीसी वर्ग के जो भी नेता राजनीतिक या अन्य क्षेत्रों में सक्रिय हैं वे अपने समुदाय के हितों पर चोट होते ही ऊंची आवाज में विरोध करने पर आमादा हो जाते हैं किन्तु ऊंची कहलाने वाली जातियों में दूर-दूराज तक एक भी नेता नहीं है जो अपने राजनीतिक हितों को ताक पर रखकर अपनी जाति या समुदाय के लिए खड़ा होने की हिम्मत दिखा सके। इसी का परिणाम है कि भाजपा और कांगे्रस दोनों के बड़े, मझोले या छोटे किस्म के नेताओं में से सभी मौजूदा विवाद पर मुुंह छिपाए घूम रहे हैं। अपनी पार्टी की बैठक में भले ही वे कार्यकर्ताओं को ये समझाईश दे रहे हों कि कोई नया कानून नहीं बना बल्कि पुराना ही चला आ रहा है लेकिन अब तक एक भी प्रमुख नेता सवर्ण समुदाय के गुस्से पर पानी डालने की हिम्मत नहीं कर पाया क्योंकि वे सभी कहीं न कहीं अपराध बोध से ग्रसित हैं। जाति के नाम पर अपनी नेतागिरी चमकाने वाले अनु.जाति/जनजाति और ओबीसी वर्ग के नेताओं में भी इतनी दम नहीं है कि वे सवर्ण समाज के लोगों से संवाद स्थापित कर उन्हें बतायें कि केन्द्र सरकार द्वारा जिस कानून को लागू किया गया है उससे डरने की कोई बात नहंीं है। इस वजह से अब दोनों तरफ से अविश्वास की खाई निरंतर चौड़ी होती जा रही है। राजनीतिक नेताओं की रुचि चाहे वे सत्ता में हों या विपक्ष में, केवल वोट कबाडऩे में बची है चाहे उसके लिए पूरे समाज को आपस में लड़वा ही क्यों न दिया जावे। ये हालात कोई शुभ संकेत नहीं है। धजी का साँप बनाने वाले तो अपना खेल दिखा ही रहे हैं वहीं आग को बुझाने की बजाये उसमें पेट्रोल छिड़कने वाली ताकतें परदे के पीछे से सक्रिय हैं। चुनाव सन्निकट होने से राजनीतिक पार्टियां अपने-अपने हित साधने में लगी हैं। सवर्ण समुदाय को लगता है कि उसको घर की मुर्गी दाल बराबर मान लिया गया है। ये सही भी है क्योंकि उसके गुस्से का संज्ञान लेने की किसी को न चिंता है और न ही फुर्सत। इसका असर आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनाव पर कितना पड़ेगा और कौन सी पार्टी नफे या नुकसान में रहेगी इससे भी बड़ा विचारणीय प्रश्न ये है कि समाज को जातिगत आधार पर विभाजित करने के बाद इस देश का क्या होगा? सीमा पार बैठे दुश्मन ये देखकर मन ही मन हर्षित हो रहे होंगे कि उनका काम वे ही लोग कर रहे हैं जिनके जिम्मे इस देश की एकता और अखंडता की रक्षा करना है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 4 September 2018

आंतकवाद और नक्सलवाद के बाद जातिवाद का खतरा


मप्र की राजनीति में चुनावी माहौल का एहसास पूरी तरह होने लगा है। अभी तक तो केवल नेताओं के स्तर पर ही सक्रियता नजर आ रही थी परन्तु अब जनता भी सड़कों पर उतरने लगी है। पदोन्नति में आरक्षण से भन्नाया सवर्ण समुदाय अनु.जाति/जनजाति कानून को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रद्द किये जाने के बाद दोबारा जस का तस लागू किये जाने के बाद जबर्दस्त गुस्से से भरकर नेताओं से तू-तड़ाक पर उतर आया है। शुरू-शुरू में तो कांग्रेस मन ही मन खुश थी कि सवर्ण वोट बैंक भाजपा की झोली से बाहर आ रहा है परन्तु बीते दो-तीन दिनों में उसके नेताओं के विरूद्ध भी सवर्ण समाज ने गुस्से का प्रगटीकरण कर इस बात का संकेत दिया कि अपनी उपेक्षा से नाराज होकर दबाव बनाने का ये मौका वह हाथ से नहीं जाने देगा। आरक्षण के मामले में अब तक जो पिछड़ी जातियां सवर्णों से दूर रहा करती थीं वे भी अनु. जाति/जनजाति कानून को दोबारा लागू किये जाने के कारण उनके साथ आ खड़ी हुई हैं जिससे समाज में जातिगत आधार पर दो खेमेबाजी स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आ गई हैं। इस विवाद का एक रोचक पहलू ये भी है कि म.प्र. के आदिवासी समुदाय में अलग खिचड़ी पकने लगी है तथा गोंगपा के अलावा जयस नामक संगठन अनु. जातियों से हटकर अपने वोट बैंक की ताकत दिखाने में जुटा हुआ है। इससे भाजपा के माथे पर पसीने की बूंदें छलकना स्वाभाविक है क्योंकि सवर्ण और पिछड़े वर्ग के बीच उसका जनाधार बेहद मजबूत हो चला था वहीं दलित व आदिवासी समुदाय में भी वह तेजी से पकड़ मजबूत कर रही थी। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जब अनु. जाति/जनजाति कानून के उस प्रावधान को रद्द कर दिया गया जिसके अंतर्गत उत्पीडऩ की शिकायत पर आरोपी की बिना जांच किये ही गिरफ्तारी की व्यवस्था थी तब आदिवासी तो उतने मुखर नहीं हुए किन्तु दलित वर्ग ने न सिर्फ म.प्र. वरन् अन्य प्रदेशों में भी उत्पात मचा दिया था। इसकी वजह से कई जगह हिंसक घटनाएं हुईं तथा कुछ लोग मारे भी गए। केन्द्र सरकार पर दलित विरोधी होने का चौतरफा आरोप लगाने में विपक्षी दल लाभबंद हो गए वहीं सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर भी सरकार से अलग होने की धमकियां सुनाई देने लगीं। अंतत: मोदी सरकार ने रद्द किये गये कानून को पुनर्जीवित कर दिया। भाजपा को लगा था कि ऐसा करने से वह दलित और आदिवासी वर्ग को प्रसन्न कर चुनावी वैतरणी पार करने के प्रति आश्वस्त हो जायेगी किन्तु इसी बीच पदोन्नति में आरक्षण का समर्थन करने से सवर्ण समाज में नाराजगी और बढ़ गई। अब स्थिति ये है कि भाजपा के साथ ही कांग्रेस और अन्य पार्टियां भी आरक्षण के साथ ही दलित-आदिवासी वर्ग को मिल रहे कानूनी संरक्षण के मुद्दे पर कटघरे में खड़ी हो गई है। अनु. जाति/जनजाति कानून में किये गये बदलाव से क्षुब्ध पिछड़े वर्ग की जातियों के भी सवर्णो के साथ सड़कों पर उतर जाने से जातिगत विभाजन और गहरा हो गया है। हो सकता है ये स्थिति फिलहाल जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हों केवल वहीं दिखाई दे रही हो परन्तु ये आशंका गलत नहीं है कि लोकसभा चुनाव करीब आने तक ये पूरे देश में समान रूप से फैल जायेगी क्योंकि पहले कांग्रेस और उसके बाद अब भाजपा भी जिस तरह जातिगत वोट बैंक के मकडज़ाल में उलझ गई है उसकी वजह से जिस जाति प्रथा को मिटाने का संकल्प राजनीतिक पार्टियां लेती थीं वही उनकी रणनीति का प्रमुख हिस्सा बन बैठी। दुर्भाग्य की बात ये है कि सही को सही कहने का साहस राजनेताओं में समाप्त हो गया है। केवल सत्ता में बने रहने के लिये जिस तरह के समझौते किये जाते रहे उनका असर खुलकर सामने आने लगा है। न्यायपालिका की गरिमा एवं स्वतंत्रता के लिये चिंता व्यक्त करने वाली राजनीतिक बिरादरी उसके हर उस निर्णय को पलटने एकजुट हो जाती है जिससे वोट बैंक प्रभावित होता है। चूंकि देश और प्रदेश की सत्ता पर भाजपा आसीन है इसलिये जनता के गुस्से की पहली शिकार वही हो रही है किन्तु जनाक्रोश की लपटों में अन्य दलों के दामन भी झुलसे बिना नहीं रहेंगे। समझने वाली बात ये है कि चुनावी जीत-हार ही देश का भविष्य नहीं बनातीं वरना ऐतिहासिक जनादेश प्राप्त करने वाले नेता और पार्टियां भी जनअपेक्षाओं को पूरा कर पाने में विफल न हुए होते। सत्ता की हवस में तदर्थवादी नीतियों एवं सिद्धान्तहीन समझौतों की वजह से जो दुर्गति कांग्रेस की हुई वही भाजपा की होती दिख रही है। क्षेत्रीय दल भी अधिकतर जातीय और क्षेत्रीय भावनाएं भड़काकर देश के हितों की उपेक्षा करने से नहीं चूकते। इन सबका ही परिणाम है कि सवर्ण समाज जहां उसका हक छिनने से नाराज होकर आंदोलित है वहीं दलित एवं आदिवासी इस बात से असंतुष्ट हैं कि उन्हें जितना देने का वायदा था वह पूरा नहीं किया गया। म.प्र. में बीते दो-तीन दिनों से न तो शिवराज सिंह चौहान के विकास संबंधी दावे मुद्दा रह गए हैं और न ही कांग्रेस द्वारा भाजपा सरकार पर लगाए जाते रहे भ्रष्टाचार के आरोप। इनसे सर्वथा हटकर पदोन्नति में आरक्षण तथा अनु.जाति/जनजाति कानून को दोबारा लागू किये जाने को लेकर सवर्णों का आंदोलन राजनीति पर हावी हो गया है। विडंबना ये है कि न भाजपा और न ही कांग्रेस में इतना नैतिक साहस है कि वे खुलकर किसी एक तरफ बोल सकें क्योंकि सवर्णों का पक्ष लेने पर दलित और आदिवासी वोट बैंक के नाराज होने का खतरा है वहीं इसकी उल्टी नीति पर चलने पर सवर्णों के गुस्से से बचना मुश्किल हो जायेगा। इस स्थिति के लिये दोनों प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियां किसी और को कसूरवार नहीं ठहरा सकती क्योंकि जातिवाद के नाम पर जहर के जो बीज कांग्रेस ने बोए उन्हें ही खाद, पानी देकर  भाजपा ने भी बड़ा कर दिया। जहां तक बात बसपा, गोंगपा और जयस जैसों की है तो उन्हें भी इन्हीं बड़ी पार्टियों ने दूध पिलाकर बड़ा किया और ये उन्हीं की राजनीतिक चालों से जन्मी थीं। चुनावों के शुरू में ही जो विषाक्त वातावरण बनने लगा है वह मतदान होते तक क्या रूप लेगा ये सोचकर चिंता से ज्यादा डर सताने लगा है। आतंकवाद और नक्सलवाद को तो मान लें कि पाकिस्तान और चीन ने पनपाया किन्तु देश को गृहयुद्ध की कगार पर ला खड़े करने वाले जातिवाद के लिये तो हमारे ही देश के राजनीतिक नेता और पार्टियां पूरी तरह दोषी हैं। लेकिन जनता भी करे तो क्या करे क्योंकि उसकी स्थिति आसमान से टपके और खजूर पे अटके वाली होकर रह गई है। यदि भाजपा-कांग्रेस को देश की रत्ती भर भी फिक्र है तो जिस तरह उन दोनों ने मिलकर अनु.जाति/जनजाति कानून को दोबारा लागू करवाने में एकजुटता दिखाई वैसी ही आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था शुरू करने के लिए दिखाएं वरना स्थिति इतनी बिगड़ जाएगी जिसे संभालना किसी के बस में नहीं रहेगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 1 September 2018

विकास दर : इतराने से बचें

देश से प्यार करने वाले हर व्यक्ति को ये जानकर हर्ष हुआ होगा कि मौजूदा वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में विकास दर ने अनुमानों से बेहतर प्रदर्शन करते हुए 8.2 फीसदी का आंकड़ा छू लिया। सरकारी दावे के साथ-साथ उद्योग जगत ने भी ये माना है कि नोटबंदी  के झटके से अर्थव्यवस्था उबर चुकी है वहीं जीएसटी को लेकर उत्पन्न हुई शुरूवाती अड़चनें भी क्रमश: दूर होती जा रही है जिससे पटरी से उतरती दिख रही अर्थव्यवस्था फिर संभलकर रफ्तार पकडऩे लगी है। इस चमत्कारिक नतीजे के बाद अर्थशास्त्री ये अनुमान लगाने लगे हैं कि वित्तीय वर्ष 18-19 में विकास दर 7.5 फीसदी तक रह सकती है जो वैश्विक परिदृश्य को देखते हुए बहुत बड़ी बात है। सबसे उल्लेखनीय चीज है मैन्युफैक्चरिंग, निर्माण तथा कृषि क्षेत्र में वृद्धि होना क्योंकि इन्हीं के माध्यम से सर्वाधिक रोजगार सृजन होता है। विगत दो वर्षो से खेती काफी मार खा रही थी जिसकी वजह से अर्थव्यवस्था की स्थिति बेहद चिंताजनक होने लगी थी। बड़ी संख्या में किसानों की आत्महत्या की वजह से केन्द्र व राज्य सरकारों के प्रति नकारात्मक छवि भी बन गई थी। कृषि क्षेत्र आज भी सर्वाधिक रोजगार देता है। उसके बाद निर्माण क्षेत्र है। इन दोनों की दशा बिगडऩे की वजह से ही अच्छे दिन के दावे उपहास का पात्र बन गये। बची-खुची कसर कल-करखानों में उत्पादन घटने के तौर पर सामने आई। नोटबंदी के हमले से जैसे-जैसे उबरा मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर जीएसटी के फेर में उलझकर ठहराव का  शिकार होकर रह गया। बेरोजगारी के आंकड़े सरकार की आर्थिक नीतियों की विफलता का मापदंड बन गये। खैर, अपै्रल से जून की तिमाही के परिाणामों ने पूरे देश का उत्साह बढ़ाया है। भले ही जमीनी स्तर पर इसे महसूस करने में थोड़ा समय लगे किन्तु नरेन्द्र मोदी के कटु आलोचक भी ये तो मानते ही हैं कि उनकी आर्थिक नीतियां दूरगामी लक्ष्यों पर आधारित हैं जिनके परिणाम तात्कालिक भले न नजर आएं किन्तु वे अर्थव्यवस्था के आधार को मजबूती प्रदान करने वाले हैं। लेकिन कच्चे तेल की कीमतों में निरंतर उछाल से पेट्रोल-डीजल का महंगा होता जाना तथा डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का रिकॉर्ड स्तर तक गिरना विकास दर के खूबसूरत आंकड़े को विरोधाभासी बना देता है। यद्यपि कच्चा तेल और उससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली उथलपुथल से डॉलर निरंतर महंगा होता जा रहा है लेकिन सरकारी स्तर पर इस संबंध में समुचित स्पष्टीकरण नहीं आने से उसकी लाचारी उजागर हो रही है। वैसे इस सबके बीच एक संकेत उम्मीदें जगाने वाला है और वह है विदेशी निवेश की आवक में वृद्धि। जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण शेयर बाजार के सूचकांक में रोजाना आ रहा उछाल है किन्तु केन्द्र सरकार के आर्थिक नियोजकों को पहली तिमाही की विकास दर के आंकड़े से आत्ममुग्ध होने की बजाय इस बात की चिंता करनी चाहिए कि कारोबारी जगत में बना उत्साहजनक वातावरण निरंतर बना रहे। बीते कुछ महीनों में जीएसटी में किये गये सकारात्मक बदलावों से भी उद्योग-व्यापार जगत को राहत मिली है किन्तु अभी और सरलीकरण की जरूरत है। जैसे संकेत आ रहे हैं उनके अनुसार इस या अगले महीने पेट्रोल-डीजल को भी जीएसटी के दायरे में लाने संबंधी फैसला हो सकता है। ऐसा होने पर अर्थव्यवस्था में और भी उछाल हो सकेगा ऐसा अर्थशास्त्री एकमत से कह रहे हैं। बेहतर होगा कि जिस तरह निराशाजनक आंकड़ों के समय सरकार ने धैर्य नहीं खोया ठीक उसी तरह जो आंकड़े गत दिवस आये हैं उन्हें स्थायी मानकर उछलने की बजाय ये देखते रहने की जरूरत है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली उठापटक और उससे उत्पन्न अनिश्चितता से भारतीय अर्थव्यवस्था कैसे सुरक्षित रह सकती है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

तारीफ में कंजूसी कैसी

मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर अपने बयानों के लिये काफी चर्चित रहते हैं। गत दिवस भोपाल में छिंदवाड़ा के विकास संबंधी एक पुस्तक के विमोचन पर उन्होंने पूर्व केन्द्रीय मंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ की तारीफ करते हुए कहा कि भोपाल को नर्मदा का पानी कमलनाथ की वजह से मिला। उल्लेखनीय है श्री नाथ छिंदवाड़ा के सांसद भी हैं। श्री गौर के अनुसार केन्द्रीय मंत्री के रूप में कमलनाथ ने भोपाल सहित प्रदेश की विकास परियोजनाओं के लिये हर संभव सहायता दिलवाई थी। विधानसभा चुनाव के चंद महीनों पहले भाजपा के वरिष्ठतम नेता द्वारा कमलनाथ की प्रशंसा करने का राजनीतिक परिणाम सर्वविदित है और इसीलिये उनकी पुत्रवधु तथा भोपाल की पूर्व महापौर कृष्णा गौर ने ही ससुर साहेब के बयान से अहसमति व्यक्त कर दी। भाजपा इसे उनकी निजी राय कहकर पल्ला झाड़ सकती है किन्तु श्री गौर ने एक गैर राजनीतिक समारोह में यदि विरोध पक्ष के किसी नेता के अच्छे काम की प्रशंसा कर दी तो इसे सामान्य तौर पर लिया जाना चाहिए। कांग्रेस की नीतियों के बारे में तो उन्होंने कुछ नहीं कहा। कमलनाथ की व्यक्तिगत प्रशंसा यदि तथ्यों पर आधारित है तो उसे सहज रूप में लिया जाना चाहिए। संघीय सरकार का एक मंत्री यदि राज्य की किसी परियोजना के लिये धन उपलब्ध कराए तो ये उसका कत्र्तव्य है वहीं सैद्धांतिक विरोध के बावजूद यदि राज्य का मंत्री रहा नेता उस सहयोग की खुलकर प्रशंसा करे तो ये उसकी सौजन्यता है जो संघीय ढाँचे और लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है। यूं भी गौर साहेब उम्र के जिस पड़ाव पर पहुंच चुके हैं उसमें इस तरह की स्पष्टवादिता अनपेक्षित नहीं है। बेहतर हो अन्य नेता भी उनसे पे्ररणा लें। यदि किसी ने कोई सराहनीय कार्य किया है तो फिर तारीफ में कंजूसी कैसी। फिर चाहे वह राजनीतिक तौर पर विरोधी ही क्यों न हो?

-रवीन्द्र वाजपेयी