Tuesday, 11 September 2018

पेट्रोल-डीजल : पल्ला झाड़ने से काम नहीं चलेगा


पेट्रोल-डीजल के आसमान छू रहे दामों के विरोध में कांगे्रस द्वारा आहूत भारत बंद में 21 छोटे-बड़े दल भी साथ आये। यद्यपि बीते सप्ताह अनु. जाति/जनजाति कानून के विरोध में आयोजित बंद की तरह कल स्वस्फूर्त समर्थन नहीं दिखा। यदि बंद करवाने हेतु टोलियां नहीं निकलतीं तो सुबह से ही बाजार खुले रहते। टीवी चैनलों के जरिये देश के विभिन्न हिस्सों में जबरन बंद कराने के लिए की गई तोडफ़ोड़ के दृश्य भी देखने मिले। इसके जरिये कांगे्रस और उसके साथ आए विपक्षी दलों ने खुद को निष्क्रियता के आरोप से बरी जरूर कर लिया। सत्तारूढ़ भाजपा ने एक तरफ तो ये कहते हुए राजनीतिक हमला बोला कि पिछली यूपीए सरकार के दौरान दस सालों में दाम जिस अनुपात में बढ़े उस तुलना में बीते साढ़े चार साल में उनमें वृद्धि नहीं हुई। दूसरी तरफ सरकार की तरफ से सफाई दी गई कि मूल्य वृद्धि चूंकि अंतर्राष्ट्रीय कारणों से हो रही है अत: वह उसे रोक पाने में पूरी तरह लाचार है। उसका ये तर्क गलत नहीं है क्योंकि कच्चे तेल की कीमतों में आ रहा उछाल अमेरिका द्वारा चलाए जा रहे ट्रेड वार के कारण हो रहा है जिसके पीछे ईरान पर लगाए गए प्रतिबंध भी हैं जिसने भारत को मिल रहे सस्ते कच्चे तेल का रास्ता रोक दिया। इस पूरे खेल में केन्द्र सरकार की इस मजबूरी को स्वीकार कर भी लें कि यदि पेट्रोल-डीजल पर एक्साईज व अन्य कर घटाए जाते हैं तब उसके राजस्व में कमी आयेगी जिसका असर सीधे विकास कार्यों पर पड़ेगा लेकिन जैसी जानकारी आ रही है उसके अनुसार तो कच्चे तेल की कीमतें बढऩे से आम जनता की जेब भले ही हल्की होती हो परन्तु केन्द्र और राज्य दोनों का खजाना भरता है क्योंकि इन वस्तुओं पर लगने वाले करों की राशि बिना कुछ किए बढ़ती जाती है। अधिकृत तौर पर प्राप्त आंकड़ों ने भी ये बात स्पष्ट कर दी है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि से केन्द्र और राज्यों का भंडार लबालब हो गया है। ऐसे में जब केन्द्र सरकार कर घटाने पर अपनी कमाई कम होने का तर्क देती है तब वह ये तथ्य छिपा लेेती है कि पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले कर प्रति लिटर के हिसाब से न होकर प्रतिशत के आधार पर हैं। इसलिए जब दाम बढ़ते हैं तब उसी अनुपात में कर की राशि भी बढ़ जाती है। वहीं यदि केन्द्र व राज्य ये तय कर दें कि एक्साईज तथा वैट आदि की राशि प्रति लिटर निश्चित रहेगी तब उपभोक्ता दोहरी मार से बच जायेगा। इस दृष्टि से देखें तो विकास कार्य रुक जाने का बहाना गले नहीं उतरता लेकिन सरकार चाहे केन्द्र की हो या राज्यों की, दोनों अपना आर्थिक प्रबंधन सुधारने की बजाय आम जनता को निचोडऩे पर आमादा हैं। कांगे्रस एवं अन्य विपक्षी दलों ने पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दामों पर केन्द्र और भाजपा को कठघरे में खड़ा कर अपना फर्ज तो निभा दिया परन्तु भाजपा विरोधी पार्टियों द्वारा शासित राज्य आम जनता को राहत देने की दरियादिली क्यों नहीं दिखा रहे इस प्रश्न का उत्तर भी दिया जाना चाहिए। राजस्थान की वसुंधरा सरकार ने इस दिशा में पहल की क्योंकि विधानसभा चुनाव सिर पर हैं तथा तमाम सर्वेक्षण वहां भाजपा की हालत खस्ता होने की बात कह रहे हैं। आन्ध्र के मुख्यमंत्री चन्द्राबाबू नायडू ने भी गत दिवस राजस्थान का अनुसरण किया लेकिन इसका कारण भी चुनाव निकट होना ही है। अन्य कुछ राज्यों से भी ऐसी खबरें तो आ रही हैं किन्तु अभी तक उनकी पुष्टि नहीं हो सकी। पहले उम्मीद की जा रही थी कि जीएसटी काउंसिल अगली बैठक में पेट्रोल-डीजल को भी अपने दायरे में लाकर उनकी कीमतों को कम करने का कदम उठायेगी किन्तु केन्द्र और राज्यों से मिल रहे संकेतों ने उस उम्मीद को झटका दे दिया है। तीन दिन पहले ही पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने इसका इशारा किया था किन्तु ऐसा लगता है कि केन्द्र सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर या तो अंतर्विरोध का शिकार है या फिर अनिर्णय का। कांगे्रस के पास यद्यपि पंजाब और कर्नाटक दो प्रमुख राज्यों की सत्ता है परन्तु विपक्षी दलों की बंगाल, उड़ीसा, तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी में जो सरकारें हैं वे भी पेट्रोल-डीजल पर चल रही सरकारी लूटमार में शामिल हैं। केन्द्र द्वारा वसूले जाने वाले एक्साईज में से 42 फीसदी हिस्सा राज्यों को मिलता है जिसमें निरंतर वृद्धि होती जा रही है। ऐसे में जबकि पूरी अर्थव्यवस्था चौपट होती दिख रही है तथा डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में रोजाना आ रही गिरावट से देश का मनोबल एवं सम्मान टूटने के कगार पर आ गया हो तब केन्द्र और राज्यों को मिलकर पेट्रोल-डीजल पर लगने वाली एक्साईज तथा वैट की राशि प्रति लिटर के आधार पर निश्चित कर देनी चाहिए जिससे कि मूल्य वृद्धि के कारण आम उपभोक्ता पर दोहरी मार न पड़े। दूसरी तरफ सरकार को ये भी सोचना चाहिए कि वह स्वयं भी पेट्रोल-डीजल की बहुत बड़ी उपभोक्ता है। कीमतें बढऩे से उसका अपना परिवहन व्यय भी तो उसी अनुपात में बढ़ जाता है। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि कच्चे तेल की कीमतों पर भले ही केन्द्र सरकार का नियंत्रण न हो परन्तु वह उस पर लग रहे करों के बोझ को इस तरह तो घटा सकती है जिससे उसके राजस्व में कमी नहीं आए वहीं जनता पर भी अनावश्यक अतिरिक्त भार न आए। वैसे सही बात ये है कि केन्द्र सरकार ने इस मामले में तबियत से बेईमानी की है। अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में जब कच्चे तेल की कीमतें औंधे मुंह गिरती जा रही थीं तब पहले तो पिछले घाटे के नाम पर मूल्य नहीं घटाए गए। जब वह पूरा होने को आ गया तब कहा जाने लगा कि भविष्य में दाम बढऩे पर सरकार इसी अतिरिक्त कमाई में से जनता को राहत देगी लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में केन्द्र और उसकी आड़ में लगभग सभी राज्य सरकारें जिस बेहयाई से पेट्रोल-डीजल पर मुनाफाखोरी के कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं वह अभूतपूर्व तो है ही, बेहद दुखदायी भी है। कांगे्रस यदि इस मुद्दे पर राजनीतिक नफे-नुकसान से ऊपर उठकर सोचती तो उसे पहले ही आंदोलन करना चाहिए था परन्तु चूंकि उसके अध्यक्ष राहुल गांधी अपनी निजी यात्रा पर मानसरोवर गए हुए थे इस वजह से वह केवल जुबानी तीर छोड़ती रही। जब वे लौट आए तब भारत बंद करवाया गया किन्तु न कांगे्रस शासित और न ही आन्ध्र को छोड़कर अन्य किसी गैर भाजपाई शासन वाले राज्य ने अब तक कर घटाने की सौजन्यता दिखाई है। इससे पता चलता है कि सारा खेल सियासी है। केन्द्र सरकार ने भले ही वैश्विक उठापटक का बहाना बनाकर अपना पिंड छुड़ाने की कोशिश की हो किन्तु ऐसा करना मैदान छोडऩे जैसा ही है। रुपये की विनिमय दर में निरंतर गिरावट तथा पेट्रोल-डीजल की अनियंत्रित होती कीमतों के लिए अंतर्राष्ट्रीय कारण नि:संदेह जिम्मेदार हैं परन्तु जिस तरह प्राकृतिक आपदाएं रोकना अपने बस में नहीं होने पर भी सरकार प्रभावित लोगों को राहत पहुंचाने के हरसंभव प्रयास करती है ठीक वैसे ही आर्थिक विपदाओं के समय भी कोई आपदा प्रबंधन तो होना ही चाहिए। यदि है तो वह कहीं नजर नहीं आ रहा और नहीं है तो क्यों नहीं, इसका उत्तर देश मांग रहा है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 10 September 2018

मोदी-शाह बेशक भारी लेकिन...


बीते दो दिनों में एक बात तो स्पष्ट हो गई कि 2019 का लोकसभा चुनाव भाजपा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की जुगल जोड़ी की अगुआई में ही लड़ेगी । राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में संगठन चुनाव टालने का फैसला होने के बाद भाजपा ने चुनावी चुनौती के लिए खुद को तैयार बताते हुए दावों और उम्मीदों के ऊंचे पहाड़ खड़े कर दिए । श्री शाह ने तो 50 साल तक भाजपा शासन के चलने का विश्वास जता दिया वहीं बकौल श्री मोदी विपक्ष अपनी भूमिका में पूरी तरह विफल रहा है। भाजपा की उम्मीदें विपक्ष द्वारा प्रधानमंत्री के लिए कोई सर्वमान्य चेहरा तय न कर पाने के कारण और बुलंद हो रही हैं । तमाम सर्वेक्षणों में प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत लोकप्रियता अपने प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में बहुत ज्यादा होने से भाजपा को लग रहा है कि 2019 में 2004 के दोहराये जाने की आशंका झूठ साबित होगी और नरेंद्र मोदी फिर एक बार का नारा वास्तविकता में बदल जावेगा ।  गत दिवस श्री मोदी ने अजेय भारत, अटल भाजपा का नारा उछालकर अपने हौसले का प्रदर्शन किया वहीं अमित शाह ने उपस्थित भाजपा नेताओं को ये भरोसा दिलाया कि विजय सुनिश्चित है । उन्होंने जीत के नुस्खे भी सिखाए ऐसा बताया जा रहा है । इसमें तो कोई दो मत नहीं है कि अटल -आडवाणी की जोड़ी ने जहां भाजपा को काँग्रेस का मुख्य प्रतिद्वंदी बनाया वहीं मोदी-शाह ने उसे अखिल भारतीय स्तर तक विस्तार देकर देश की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में स्थापित करते हुए उन क्षेत्रों तक में मजबूती से खड़ा कर दिया जहां भाजपा का नाम तक लोग नहीं जानते थे । पूर्वोत्तर में जिस आक्रामक अंदाज में भाजपा ने कदम बढ़ाए वह अमित शाह की दुस्साहसिक राजनीतिक शैली का ही परिणाम रहा । 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में उप्र में भाजपा को मिली अप्रत्यशित सफलता के पीछे श्री शाह की कुशल मैदानी रणनीति ही जिम्मेदार रही वरना तो उस सूबे में भाजपा हॉशिये से बाहर आ चुकी थी । यद्यपि मोदी-शाह की जुगलबंदी को दिल्ली ,बिहार और हाल ही में कर्नाटक रूपी झटके भी  लगे लेकिन उसने खोया कम पाया ज्यादा इसलिये भारतीय राजनीति में उनकी धाक और भय दोनों इस कदर व्याप्त हो गए कि सांप -नेवले जैसे रिश्तों वाले सपा-बसपा सरीखे दल भी एक साथ आने पर बाध्य हो गए। बावजूद इसके भाजपा यदि पूरी तरह श्री मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व और श्री शाह की रणनीति के भरोसे निश्चिंत होकर बैठी रही तब भले ही 2004 जैसी स्थिति 2019 में न दोहराई जा सके किन्तु 2014 जैसा चमत्कार भी होना भी असम्भव दिखाई दे रहा है बशर्ते प्रधानमंत्री अपने तरकश से कोई ब्रह्मास्त्र निकालकर विपक्ष को हतप्रभ न कर दें। इस बारे में विचारणीय बात ये है कि तब स्व.अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार के विरुद्ध जनता के मन में  ऐसा कोई गुस्सा नहीं था जैसा आज भाजपा समर्थकों के मन में दिखाई दे रहा है । इसकी एक वजह ये भी थी कि वाजपेयी सरकार आसमानी वायदे करके सत्ता में नहीं आई थी । इसके ठीक उलट नरेंद्र मोदी ने अच्छे दिन के नाम पर न जाने क्या - क्या करने का वायदा किया जिन्हें अब जुमला कहकर उनका मजाक उड़ता है । बीते दिनों अनु जाति/जनजाति कानून को लेकर पूरे देश में जो आक्रोश परिलक्षित हुआ उससे ये बात उभरकर सामने आ गई कि प्रधानमंत्री को सत्ता में लाने वाला परंपरागत मतदाता वर्ग भी अपनी नाराजगी व्यक्त करने में किसी तरह का लिहाज नहीं करेगा । हिंदुत्व और प्रखर राष्ट्रवाद के नाम पर धु्रवीकरण का गणित जातिवाद के जाल में उलझता दिख रहा है । पेट्रोल - डीजल की अनियंत्रित कीमतें सरकारी अर्थप्रबन्धन की दिशाहीनता एवम लचरपन को उजागर कर रही है। भले ही विपक्ष का धु्रवीकरण अभी तक आकार न ले सका हो किन्तु उसे हवा में उड़ा देना भी घातक हो सकता है। यही वजह है आज के परिदृश्य में तो मोदी-शाह के आत्मविश्वास को वास्तविक मानना सही नहीं लगता । रास्वसंघ की ओर से भी ये कहा जा रहा है कि 2019 में भी मोदी सरकार की वापिसी होगी क्योंकि जनता प्रधानमंत्री को चाहती है। ये आशावाद आधारहीन नहीं है किंतु उसे भी ये तो मानना होगा कि हिन्दू समाज के भीतर भी इस समय मानसिक द्वंद चल रहा है । यद्यपि अभी भी प्रधानमंत्री की मेहनत और ईमानदारी के प्रति विश्वास कायम है वहीं भाजपा को काँग्रेस से बेहतर मानने की मानसिकता भी खत्म नहीं हुई परन्तु उसमें पहले जैसा भाव नहीं रहा । यही वजह है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा हिंदुत्व के प्रति दिखाया जा रहा रुझान मतदाताओं के एक वर्ग को आकर्षित कर रहा है । कुल मिलाकर ये तो कहा ही जा सकता है कि प्रधानमंत्री और अमित शाह मिलकर सब पर भारी पड़ते हैं किंतु कभी - कभी ताकतवर पहलवान भी जरा सी चूक से कमजोर प्रतिद्वंदी से मात खा जाता है और भाजपा को इसी से बचना होगा । संचार क्रांति के इस युग में कुछ महीने भी बहुत होते हैं चुनावी बाजी पलटने के लिए । उस दृष्टि से अभी भी मोदी सरकार को एक कार्यकाल और मिलने की उम्मीद खत्म नहीं मानी जा सकती लेकिन उसकी गारन्टी देना भी सही नहीं है । यदि जैसा मोदी-शाह ने कहा वैसा करते हुए 2019 जीतना है तो बिना देर किए ताबड़तोड़ उपाय करने होंगे जिससे जनता का डोलता विश्वास फिर हासिल किया जा सके । चुनावी गणित में महारत रखने वालों को लगता है कि आने वाले दिनों में प्रधानमंत्री बाजी अपने पक्ष में पलटने के लिए कुछ न कुछ करेंगे लेकिन ये भी सही है कि उनके पास समय कम है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 8 September 2018

जीएसटी आसान नहीं लेकिन दूसरा उपाय भी नहीं

पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने कहा है कि पेट्रोल-डीजल को भी जीएसटी के दायरे में लाना जरूरी हो गया है जिससे उनके दाम घटें तथा जनता को राहत मिले। मंत्री जी को ये अक्ल इतनी देर से क्यों आई ये विश्लेषण का विषय हो सकता है किन्तु इस तरह की समझाईश तो औसत से भी कम बुद्धि रखने वाला व्यक्ति सरकार को देता आ रहा है। इस विषय पर केन्द्र सरकार राज्यों पर जिम्मेदारी डालती रहती है वहीं राज्य कहते हैं कि केन्द्र एक्साईज घटाकर दाम कम करने में मदद दे। कुल मिलाकर दोनों ही स्तरों पर जमकर मुनाफाखोरी का आलम है। जो विपक्षी दल केन्द्र सरकार को पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दामों के लिए कसूरवार ठहरा रहे हैं उनके शासित राज्यों में भी भारी भरकम टैक्स पेट्रोलियम पदार्थों पर लगाया जा रहा है। वैट की दरें भी भिन्न-भिन्न हैं। कुछ राज्यों में पेट्रोल-डीजल पर तरह-तरह के अधिभार लगाकर जनता की जेब काटी जा रही है। ये देखकर लगता है कि अपना खजाना भरने के लिए केन्द्र और राज्य दोनों को पेट्रोल-डीजल सबसे आसान जरिया लगते हैं क्योंकि इनके बिना क्या आम और क्या खास सभी की जिंदगी ठहर सी जाती है। अब जबकि केन्द्र सरकार को आगामी लोकसभा चुनाव की चिंता सताने लगी है तथा आर्थिक मोर्चे पर अर्जित तथाकथित उपलब्धियां भले ही अर्थशास्त्रियों को रास आ रही हों परन्तु आम जनता के पल्ले वे नहीं पड़ रहीं तब पेट्रोलियम मंत्री का पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने संबंधी बयान यदि सुर्खियां नहीं पा सका तो उसकी वजह सरकार की विश्वसनीयता में कमी आना है। बीच-बीच में वित्तमंत्री अरुण जेटली ने दो टूक कहा कि विकास संबंधी कार्यों के लिए जनता को ज्यादा कर देने के लिए तैयार रहना चाहिए। लेकिन धीरे-धीरे सरकार में बैठे लोगों को भी ये महसूस होने लगा कि आम जनता को वित्तमंत्री की बौद्धिक बातें समझ में नहीं आतीं तथा पेट्रोल-डीजल की आसमान छूती कीमतें मोदी सरकार की बड़ी विफलताओं में शुमार हो रही हैं। जीएसटी के कारण अर्थव्यवस्था में सुधार के दावों के आधार पर आम जनता को लगता था कि पेट्रोल-डीजल भी इसके अंतर्गत आ जायेंगे तो दाम अधिकतम 45-50 रु. प्रति लीटर ही रहेंगे परन्तु लगभग सवा साल बीतने के बाद भी न तो केन्द्र और न ही राज्य सरकारें इस बाबत मन बना सकीं तथा जीएसटी काउंसिल में सर्वसम्मति के अभाव में राज्यों को होने वाले घाटे की भरपाई के नाम पर इसे टाला जाता रहा। बीच-बीच में ये भी सुनाई दिया कि केन्द्र सरकार पेट्रोल-डीजल पर भारी-भरकम कराधान के माध्यम से भरपूर कमाई करने के बाद चुनाव आने के पहले उनकी कीमतें घटाने के लिए जीएसटी रूपी उपाय इस्तेमाल करेगी जिससे मतदान का दिन आते-आते तक मतदाता पुराना गुस्सा भूलकर सत्तारूढ़ पार्टी के पक्ष में बटन दबा दे। वैसे ये सोच कोई पहली मर्तबा नहीं नजर आई है। हमारे देश में सरकार में बैठे लोगों की नजर हर समय वोट कबाडऩे पर लगी रहती है। उन्हें ये लगता है कि चार-साढ़े चार साल तक जनता को चक्की में पीसने के बाद आखिरी के कुछ महीनों में उसे लालीपॉप देकर फुसलाया जा सकता है। बेशक ये फार्मूला अब तक चला भी लेकिन अब वक्त बदल चुका है। संचार क्रांति के बाद अब सरकार की मंशा का प्रगटीकरण होते देर नहीं लगती। सोशल मीडिया के आगमन के उपरान्त तो भले चुनाव पाँच वर्ष में एक मर्तबा होते हों परन्तु सरकार ही नहीं अपितु विपक्ष के क्रिया-कलापों की समीक्षा भी निरंतर चलती रहती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तो स्वयं सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय रहते हैं। ऐसे में उन्हें पेट्रोल-डीजल के दामों में नित्य प्रति हो रही वृद्धि पर जनता के गुस्से का पता न चल रहा हो ये विश्वास करना कठिन है लेकिन संभवत: श्री मोदी भी ये मानकर चल रहे हैं कि जब तक मौका मिले जनता को चूस लो और जब लगेगा कि अब और संभव नहीं है तब जीएसटी में उन्हें शामिल कर दामों को नीचे उतारकर अच्छे दिन आने का ढोल पीटा जायेगा। राजनीतिक तौर पर देखें तो सत्ता में बैठे लोगों की सोच गलत नहीं है, क्योंकि बीते सात दशकों में मतदाता को ऐसे ही बेवकूफ  बनाया जाता रहा है परन्तु अब पहले जैसी बात नहीं रही तथा जनता छोटी-छोटी बातों का भी संज्ञान लेने लगी है और उस दृष्टि से पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि ने मोदी सरकार की साख और धाक को जबर्दस्त क्षति पहुंचाई है ये कहना गलत नहीं होगा। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का बहाना भी अब काम नहीं कर रहा क्योंकि देश से पेट्रोल-डीजल का निर्यात लगभग आधी कीमत पर होने की जानकारी मिलने से ये बात सामने आ गई कि केन्द्र तथा राज्य दोनों मिलकर जनता की मजबूरी का बेजा फायदा उठाने में जुटे हैं। पेट्रोलियम मंत्री श्री प्रधान जीएसटी संबंधी बयान को कितना लागू करवा सकेंगे ये बड़ा प्रश्न है क्योंकि पेट्रोल-डीजल को यदि उसके अंतर्गत लाया जाता है तब केन्द्र के राजस्व का तो जो होगा सो होगा ही किन्तु राज्यों की तिजोरियों में रोज आने वाला धन का प्रवाह रुक जाएगा और तब वे इसके लिए कैसे राजी होंगे तथा उनके घाटे की भरपाई किस तरह होगी इस प्रश्न का समुचित उत्तर तलाशे बिना बात आगे बढ़ेगी ये आसान नहीं लगता। लेकिन ऐसा करना मोदी सरकार और भाजपा दोनों की मजबूरी बन गई है क्योंकि लोकसभा चुनाव के पहले ही कुछ राज्यों के चुनाव होने वाले हैं जिनमें भाजपा शासित प्रमुख हैं। मौजूदा स्थिति में पार्टी को सत्ता में वापसी बेहद कठिन लग रही है। यदि ये राज्य हाथ से खिसक गए तब फिर एक बार मोदी सरकार का नारा हवा-हवाई होकर रह जाएगा। राजनीतिक मोर्चे पर चारों तरफ  से घिरने के बाद प्रधानमंत्री के पास भी पेट्रोल-डीजल को जीएसटी में लाने के सिवाय कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है। यदि अभी भी केन्द्र सरकार ऐसा करने की इच्छा शक्ति नहीं दिखाती तब ये मानकर चलने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि या तो सरकार में बैठे लोग मदमस्त हो चुके हैं या फिर उनकी सोचने-समझने की शक्ति ही खत्म हो चुकी है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 7 September 2018

समलैंगिकता : लेकिन समाज मान्यता नहीं देगा

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की विद्वता पर संदेह करना तो पूरी तरह अनुचित होगा परन्तु ये कहना भी गलत नहीं है कि हर मामला कानून के जरिये नहीं सुलझाया जा सकता। यही वजह है कि समलैंगिक संबंधों को लेकर गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ द्वारा दिया गया फैसला भले ही अप्राकृतिक यौन संबंधों को सहज मानने वालों को खुशी दे गया हो परन्तु भारतीय समाज का आम जनमत इस फैसले को मन से स्वीकार शायद ही कर सके। इसकी सबसे बड़ी वजह यौन स्वछंदता को लेकर भारतीय मानसिकता है जो निजी इच्छाओं की अपेक्षा नैतिकता के उन मानदंडों पर आधारित है जो गहन अध्ययन के बाद तय किये गये वरना कामसूत्र के रचयिता के देश में यौन वर्जनाओं का पालन करना आश्चर्यजनक कहा जा सकता है। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय के तीन न्यायाधीशों की पीठ ने दंड विधान संहिता की धारा 377 को समाप्त नहीं किया। दो वयस्कों के बीच सहमति से बने यौन संबंधों की अनुमति तो उसने दी परन्तु अवयस्क, असहमति और पशुओं के साथ यौन संबंधों को अब भी अपराध की श्रेणी में रखा गया है। समलैंगिक संबंध भारतीय समाज में घृणा की निगाह से देखे जाते रहे हैं। इनसे जुड़े लोगों का उपहास भी होता था किन्तु पश्चिमी सभ्यता के रंग में रंगे कतिपय लोगों ने जब बजाय छिपाने के इसे खुलकर स्वीकार करना शुरू किया तब यह सार्वजनिक विमर्श का विषय बना लेकिन तमाम बड़ी और नामी-गिरामी हस्तियों द्वारा स्वयं को समलैंगिकता का समर्थक घोषित किये जाने के बाद भी समाज की मानसिकता नहीं बदली जा सकी तो उसकी सीधी-सीधी वजह ये है कि जो अप्राकृतिक है उसे महज चंद लोगों की स्वतंत्रता और मौलिक अधिकार के नाम पर स्वीकृत अथवा मान्य नहीं किया जा सकता क्योंकि ऐसा करना समाज के सामूहिक विवेक पर ही प्रश्नचिन्ह उपस्थित करता है। यही वजह है कि सर्वोच्च न्यायालय भी धारा 377 को पूरी तरह रद्द करने की हद तक नहीं बढ़ सका वरना यौन रूझान को प्राकृतिक और जैविक घटना मानते हुए मानसिक विकार से परे बताने के बाद भी समलैंगिक विवाह की अनुमति नहीं दी जा सकी। इसी तरह पशुओं के साथ यौन संबंधों को भी स्वीकृति नहीं दी गई जबकि सदियों पहले बने खजुराहो के विश्व प्रसिद्ध मंदिरों की बाहरी दीवारों पर उसका अवलोकन किया जा सकता है। इस बारे में रोचक बात ये है कि जिस समलैंगिकता को पश्चिमी समाज में स्वीकृति मिलने पर भारत में भी जायज ठहराने का अभियान चला उस पर रोक भी डेढ़ शताब्दि पहले अंगे्रजी सत्ता ने ही लगाई थी। 21वीं सदी का भारत इस हद तक तो बदला है कि लगभग सभी राजनीतिक दलों ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को मानवीय स्वतंत्रता एवं मौलिक अधिकारों के नाम पर उचित ठहराया परन्तु फिल्मी कलाकारों सहित अन्य विशिष्ट हस्तियां जिनमें लेखक और बुद्धिजीवी भी हैं, ने समलैंगिक संबंधों को कानूनी मान लेने पर जिस प्रकार खुलकर हर्ष व्यक्त किया वह इस बात का संकेत है कि समाज का एक हिस्सा चाहे वह छोटा ही क्यों न हो अपनी विशिष्ट छवि बनाये रखने के लिए लीक से हटकर चलने का दुस्साहस करने लगा है। नि:संतान दंपत्तियों द्वारा शिशु गोद लेने या किराये की कोख से संतान प्राप्त करना तो समझ में आता है परन्तु कतिपय सेलिब्रिटी द्वारा विवाह किये बिना ही किराये की कोख से संतान हासिल करने जैसी खबरें इस बात का संकेत है कि कुछ लोगों को प्रचलित मान्यताएं तोडऩे में ही सुख की अनुभूति होती है। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला एक सीमित वर्ग की इच्छाओं को कानूनी मान्यता देने का साधन भले बन जाए तथा बहुत सारी बातें परदे से बाहर आने लगें परन्तु सवाल ये है कि क्या समाज इसे उतने खुले दिल से स्वीकार करेगा जितनी आसानी से सर्वोच्च न्यायालय ने उस पर सहमति देते हुए अपने ही पूर्व फैसले को पलट दिया। इस फैसले के बाद अप्राकृतिक संबंधों में सहमति का लाभ लेकर देह व्यापार का नया सिलसिला भी शुरू हो सकता है। कुल मिलाकर ऐसे विषय केवल कानून के भरोसे छोड़कर बैठ जाना समाज के लिए भी उचित नहीं है। किसी पुस्तक या फिल्म में सामाजिक मान्यताओं और परंपराओं के विरुद्ध की गई अभिव्यक्ति पर पूरे देश में बवाल मचा देने वाले लोग ऐसे मामलों में चुप क्यों हो जाते हैं? देश की सरकार का भी सर्वोच्च न्यायालय में निर्विकार बना रहना समझ से परे है। यौन व्यवहार निश्चित रूप से जैविक एवं प्राकृतिक प्रवृत्ति है। आदिम अवस्था के आगे मनुष्य के उद्विकास की जो प्रक्रिया चली उसमें एक व्यवस्थित समाज की आवश्यकता को देखते हुए ही परिवार नामक इकाई का जन्म हुआ। विश्व के अलग-अलग हिस्सों की भौगोलिक स्थितियां और उनसे वहां के निवासियों पर पडऩे वाले मनोवैज्ञानिक तथा शारीरिक प्रभाव के अनुरूप ही सामाजिक मान्यताएं और नियम बनाए गए। उनमें समयानुसार सुधार एवं बदलाव होना तो पूरी तरह उचित कहा जाएगा किन्तु चंद लोगों द्वारा स्वच्छंदता को स्वतंत्रता का नाम देने की जिद पकड़ लेने पर उसे यदि उनका मौलिक अधिकार मान लिया जाए तो फिर आने वाले समय में जो समस्याएं उत्पन्न होने का खतरा है उसे न तो सर्वोच्च न्यायालय के परम विद्वान न्यायाधीश समझ पाए और न ही देश के स्वनामधन्य नेता। रही बात पेज थ्री संस्कृति के ब्रांड एम्बैसेडर बने अपसंस्कृति के प्रणेताओं की तो वे विकृति को संस्कृति मानने की मानसिकता से ग्रसित हैं। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का आधार चूंकि स्वतंत्रता एवं मौलिक अधिकार हैं इसलिए आने वाले समय में तमाम ऐसे दूसरे मामलों पर भी उसे विचार करने बाध्य होना पड़ेगा जो अभी तक गंदी बात समझे जाते रहे। कल ज्योंही फैसला आया त्योंही सोशल मीडिया पर उस संबंध में जिस तरह की प्रतिक्रियाएं आईं उनका संज्ञान सर्वोच्च न्यायालय को जरूर लेना चाहिए। अधिकतर में ये कहा गया कि देश धारा 370 पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की अपेक्षा कर रहा था परन्तु उसने 377 को प्राथमिकता दे डाली। और भी बहुत सी बातें कही गईं किन्तु कुल मिलाकर देश का जनमानस इस फैसले से न सहमत है और न ही संतुष्ट, क्योंकि उसे इस बात की आशंका है कि समलैंगिकता को कानूनी संरक्षण मिलने से समाज में अनैतिक गतिविधियों की बाढ़ आ जाएगी जो नए विवादों की वजह बन सकती है।

-रवीन्द्र वाजपेयी