Wednesday, 18 December 2019

कमलनाथ: बाधा दौड़ का पहला चरण पूरा



मप्र की कमलनाथ सरकार ने अपना एक वर्ष पूरा कर लिया। यह निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है क्योंकि गत वर्ष राज्य में त्रिशंकु विधानसभा बनने के बाद सपा,बसपा और निर्दलीय विधायकों के समर्थन से बनी इस सरकार के स्थायित्व पर पहले दिन से ही शंका के बादल मंडराते रहे। भाजपा की तरफ से लगातार ये आभास करवाया जाता रहा कि वह जिस दिन चाहे सत्ता पलट देगी। लेकिन धीरे-धीरे अनिश्चितता के बादल छंटने से  पार्टी नेताओं के बड़बोलेपन में भी कमी आती गई। हाल ही में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सार्वजानिक तौर पर ये कह  दिया कि कमलनाथ सरकार को गिराने की कोई कोशिश नहीं की जा रही। यद्यपि नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव आये दिन मुख्यमंत्री को अपने विधायक गिनते रहने की सलाह देते रहते हैं लेकिन कुछ महीने पहले भाजपा के दो विधायकों द्वारा पाला बदल लिए जाने के बाद से पार्टी आक्रमण भूलकर बचाव की मुद्रा में आ गई। उससे भी बड़ी बात ये रही कि कमलनाथ सरकार ने भाजपा सरकार के समय के अनेक ऐसे, मामलों की जाँच शुरू करवा दी जिनमें भ्रष्टाचार होने की आशंका है। कुछ गिरफ्तारियां भी की गईं जिनसे पूर्व मंत्री और भाजपा के चहेते अधिकारी ही नहीं बल्कि शिवराज सिंह तक दबाव में आ गये। हनीट्रैप नामक खुलासे के बाद तो भाजपा में और भी डर बैठ गया। उसके अनेक नामी-गिरामी नेताओं के उस काण्ड में लिप्त होने की खबरों ने पार्टी की आक्रामकता पर एक तरह से लगाम लगा दी। यही वजह रही कि शुरुवाती महीनों में रोजाना सरकार गिराने की जो धमकियां सुनाई देती थीं वे नेपथ्य में चली गईं। हालांकि कांग्रेस के अपने घर का माहौल भी बहुत अच्छा नहीं रहा। उमंग सिंगार और दिग्विजय सिंह के बीच हुआ विवाद सार्वजनिक होने से सरकार और पार्टी दोनों को शर्मनाक स्थिति से गुजरना पड़ा। विभिन मंत्रियों के बीच भी टकराव देखने मिला। गुना के पूर्व सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के असंतुष्ट होने को लेकर  तरह-तरह की चर्चाएं चली आ रही हैं। कमलनाथ की जगह नए प्रदेश अध्यक्ष के नाम पर भी खींचातानी है। बीच-बीच में श्री सिंधिया के भाजपा के साथ आने की अटकलें भी व्यक्त की गईं किन्तु ऐसा कुछ हुआ नहीं। भाजपा वाले ये शिगूफा भी छोड़ते रहे कि महाराष्ट्र से फुर्सत होते ही नरेंद्र मोदी और अमित शाह आपरेशन मप्र में जुटेंगे लेकिन महाराष्ट्र में मात खाने के बाद भाजपा अपना घर बचाने में जुट गयी। ये भी सुनने में आता रहा है कि मोदी-शाह मप्र में शिवराज की जगह किसी और की ताजपोशी चाहते हैं किन्तु कोई उपयुक्त और सक्षम नेता नजर नहीं आने की वजह से कदम आगे नहीं बढ़ा पा रहे। एक चर्चा ये भी है कि प्रधानमंत्री के बेहद निकटस्थ कहे जाने वाले उद्योगपति गौतम अडानी के कमलनाथ से भी उतने ही मधुर संबंध हैं। मप्र की सरकार को बचाए रहने में अडानी की भूमिका भी बताई जा रही है। वास्तविकता जो भी हो लेकिन राजनीतिक दृष्टि से देखें तो कमलनाथ ने न सिर्फ भाजपा को ठंडा कर  दिया बल्कि अपनी पार्टी के भीतर उठ रहे विरोध के स्वरों को भी शांत करने  में वे सफल रहे। रही बात सरकार द्वारा वायदे पूरे करने की तो ये बात सही है कि किसानों के कर्जे माफ करने के वायदे में सरकार सफल नहीं रही जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में उसे लेकर असंतोष बढ़ा है लेकिन प्रशासनिक स्तर पर उनकी सरकार ने जमीन जायजाद के व्यवसाय से जुडी अड़चनों को दूर करने संबंधी जो निर्णय किये उनका काफी स्वागत हुआ। कालोनियों के नियमितीकरण,उद्योग हेतु भूमि के उपयोग के नियमों का सरलीकरण और हाल ही में माफिया के विरुद्ध जंग शुरू करने जैसे फैसलों की आम तौर पर प्रशंसा हो रही है। वहीं पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ाने का  फैसला इस सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ाने वाला रहा। आर्थिक मोर्चे पर भी बेहतर प्रबन्धन की दिशा में अपेक्षित कार्य नहीं हो सका। भले ही मुख्यमंत्री पिछली सरकार पर खजाना खाली कर जाने की तोहमत लगाएं किन्तु कमलनाथ की पृष्ठभूमि और अनुभव देखते हुए ये माना जाता था कि वे आर्थिक दृष्टि से प्रदेश की सेहत सुधार्रेंगे। हालांकि इंदौर में हुए निवेशक सम्मलेन की सफलता को लेकर काफी ढोल पीटे गये किन्तु ऐसे आयोजनों के पिछले नतीजे देखते हुए ज्यादा उम्मीदें लगाना व्यर्थ ही है। जहां तक बात कानून व्यवस्था की है तो इस मोर्चे पर भी प्रदेश सरकार का कामकाज औसत ही रहा। लेकिन शिवराज सरकार की जांच करवाने के बावजूद वे अपने राज में भ्रष्टाचार को रोक नहीं सके। विशेष रूप से स्थानान्तरण उद्योग को लेकर सरकार के दामन पर छींटे पड़ते रहे। इस संबंध में ये चौंकाने वाली बात है कि बीते पूरे साल भर स्थानान्तरण का सिलसिला चलता रहा। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है इस सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि इसका टिके रहना है। बाकी मामलों में पिछली सरकार और इसमें विशेष अंतर नहीं किया जा सकता। देखने वाली बात ये होगी कि सरकार का स्थायित्व सुनिश्चित  हो जाने के बाद अब मुख्यमंत्री किस तरह काम करते हैं। उनकी अगली अग्नि परीक्षा स्थानीय निकाय चुनावों में होगी। लोकसभा के दंगल में चारों खाने चित्त हो जाने के बाद भी श्री नाथ ने अपनी सरकार को बचाए रखा लेकिन स्थानीय चुनावों में भाजपा से उनका कड़ा  मुकाबला होगा। एक बात और भी उनके लिए परेशानी उत्पन्न कर सकती है और वह है निगम मंडलों तथा प्राधिकरणों में नियुक्ति नहीं होना। आज की राजनीति में नीति और सिद्धांत तो रहे नहीं इसलिए कब क्या हो  जाए कहना कठिन है लेकिन इतना तो कहा  ही जा सकता है कि कमलनाथ ने बाधा दौड़ का पहला चरण सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है जिससे उनका आत्मविश्वास निश्चित रूप से बढ़ा होगा। रही बात भाजपा से मिलने वाली संभावित चुनौती की तो ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि पार्टी एक साल पहले  मिली पराजय से उबर नहीं सकी है और बजाय मजबूत होने के उसके भीतर खींचातानी बढ़ी है। शिवराज सिंह और प्रदेश संगठन दोनों में सामंजस्य भी पहले जैसा नहीं रहा। उस आधार पर कहा  जा सकता है कि कमलनाथ सरकार पर अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरने का आरोप लगाने वाली भाजपा भी बतौर विपक्ष अपनी भूमिका का निर्वहन सही  तरीके से नहीं कर सकी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 17 December 2019

ओशो ने कर्मभूमि जबलपुर को क्यों छोड़ा-


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मप्र सरकार, जबलपुर टूरिज्म प्रमोशन काउन्सिल और स्थानीय जिला प्रशासन के सहयोग से मनुष्य के रूप में जन्म लेने के बाद भगवान कहलाने वाले आचार्य रजनीश की स्मृति में बीते सप्ताह हुआ त्रिदिवसीय आयोजन हर दृष्टि से प्रशंसायोग्य था। उसका विधिवत प्रचार - प्रसार भी हुआ और संस्कारधानी के समाचार माध्यमों ने भी दुनिया भर में लाखों लोगों को अपने विचारों से प्रेरित और प्रभावित करने वाले उस विलक्षण व्यक्तित्व को समुचित सम्मान दिया। कालान्तर में रजनीश ने ओशो नाम धारण किया और आज की दुनियां उन्हें इसी नाम से ज्यादा जानती भी है। जबलपुर ओशो की कर्मभूमि रही है। सागर में उनकी शिक्षा हुई और उसके उपरांत वे जबलपुर आ गये और स्थानीय शास. महाकोशल कला महाविद्यालय में दर्शन शास्त्र के अध्यापक बने। इसी शहर में उन्होंने अपनी विचारयात्रा का विधिवत शुभारंभ किया। आज भी सैकड़ों ऐसे महानुभाव हैं जिन्होंने तब के रजनीश और आज के ओशो को निकट से देखा और जाना। बड़े फुहारे पर संत तारण तारण जयंती के आयोजन का मंच संचालन करते युवा रजनीश की स्मृति भी बहुतों के मन - मष्तिष्क में सजीव है। उनके प्रवचन और आनंदमय जीवन की कला सिखाने वाले शिविर के अनुभव भी इस शहर के सैकड़ों लोगों को याद हैं। उनकी सोच धारा के विरुद्ध तैरने की रही जिस वजह से वे जितने पूजित हुए उतने ही विवादित भी। इसीलिए उनके आकर्षण में बंधे सभी लोग उनके साथ स्थायी तौर पर नहीं जुड़ सके। जिन्होंने युवा रजनीश को मंच दिया उनमें से भी अनेक जल्द ही उनसे परहेज करने लग गये। समाज में विचार क्रांति की मशाल जलाने वालों के साथ इस तरह का व्यवहार तो सुकरात के दौर से ही होता आया है। ऐसे में रजनीश के प्रति उपजा आकर्षण अनायास यदि विकर्षण में तब्दील हो गया तो उसे अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता। और फिर उस समय का जबलपुर तथा निकटवर्ती इलाका वैचारिक दृष्टि से अपनी पारंपरिक सोच के विरुद्ध एकाएक विद्रोह का साहस भी नहीं रखता था। बावजूद इसके कि वह दौर राजनीति , साहित्य , पत्रकारिता , शिक्षा और संस्कृति के लिहाज से इस शहर का स्वर्णयुग माना जाता है। कहने का आशय ये कि उस समय का जबलपुर हर उस मापदंड पर खरा उतरता था जो किसी दार्शनिक की चिंतन धारा को बहने के लिए समुचित और सरल रास्ता उपलब्ध कराता। लेकिन रजनीश ने अचानक ये शहर छोड़ दिया और ऐसा छोड़ा कि दोबारा कभी उसकी सुध नहीं ली। मौलश्री का वह वृक्ष हो या नगर के इर्दगिर्द के वे निर्जन स्थान जहां युवा रजनीश ने ध्यान और ज्ञान के अभिनव प्रयोग किये, वे सब उनकी बाट जोहते हुए निराश हो गये। प्रश्न ये है कि रजनीश ने अपनी ये कर्मभूमि छोड़ी तो छोड़ी क्यों? वे कोई व्यवसायी तो थे नहीं जो व्यापार के फैलाव के लिए संभावना वाली जगह जाकर स्वयं को स्थापित करते। भले ही उनका सन्यास आम धारणा के अनुरूप नहीं रहा लेकिन उन्होंने अपनी जीवन यात्रा को जिस मार्ग पर अग्रसर किया वह था तो सन्यास का ही। फिर भी रजनीश ने हिमालय की तलहटी , नदी का किनारा या ऐसी ही किसी निर्जन जगह का चयन नहीं किया। संस्कारधानी छोडकर वे जा पहुचे मायानगरी मुम्बई और उसके बाद की उनकी यात्रा अमेरिका होते हुए पुणे में आकर ठहर गयी और वहीं बीसवीं सदी के इस विलक्षण विचारक ने ओशो के नाम से पृथ्वी नामक इस गृह की यात्रा को पूर्ण किया और लौट गए उस अनजान जगह जो आज भी दुनिया का सबसे बड़ा रहस्य है। रजनीश कम उम्र में चले गये। लेकिन अपना काम पूरा कर गए। उन जैसी विभूतियों की जिन्दगी लम्बी नहीं, बड़ी होती है। ऐसे लोग खुद के लिए कुछ कमाते नहीं लेकिन लुटाते दोनों हाथों से हैं। लेकिन इस मामले में रजनीश विरोधाभासी थे। उन्होंने ज्ञान भी अर्जित किया और धन भी। वैराग्य की चरम अवस्था और जीवन में अनवरत आनन्द की विधि से पूरी दुनिया को अवगत करवाने वाले ओशो के पास वह सब था जिसे देखकर उनके समकालीन धनकुबेर तक आश्चर्यचकित हो जाते थे। हर पल यहाँ जी भर जियो उनका उपदेश था। अपनी इच्छाओं को दबाकर घुटन में जीने की बजाय उनकी उन्मुक्त अभिव्यक्ति की अनुमति देने के साथ ही वे अपने प्रशंसकों और अनुयायियों को महावीर, बुद्ध , कन्फ्युशियस ही नहीं अपितु राम और कृष्ण के व्यक्तित्व और कृतित्व की वस्तुपरक व्याख्या से मन्त्रमुग्ध कर देते थे। उनकी स्मृति में आयोजित संदर्भित समारोह में उनका स्मरण वास्तविकता और औपचारिकता दोनों ही तरीके से हुआ। कुछ लोगों को ओशो जबलपुर के नये ब्रांड एम्बेसेडर लगने लगे। उनके नाम को अनेक तरीकों से भुनाने के प्रयास भी अपनी चिरपरिचित शैली में शुरू हो गये हैं। भंवरताल स्थित मौलश्री वृक्ष मानो बुद्ध के बोधि वृक्ष का आधुनिक अवतार बन गया। देश विदेश से आये ओशो प्रेमियों ने उनकी शान और श्रद्धा में विचार रखे। ग्लैमर का तड़का भी लगा और ओशो द्वारा सुझाई गयी आनंदमय जीवनशैली का भी प्रगटीकरण हुआ। ओशो को भुलाने और समुचित सम्मान नहीं दिए जाने के लिए प्रायश्चियत करते हुए भूल सुधार की कसमें भी खाई गईं। चूंकि समूचे आयोजन को सरकारी सहयोग और संरक्षण प्राप्त था इसलिए केंद्र और राज्य के मंत्रियों के अलावा भी विभिन्न हस्तियाँ पधारीं। कार्यक्रम में देश के कोने-कोने और विदेश से ओशो भक्तों की भारी भीड़ उमडऩे की वजह से दर्शकों/श्रोताओं की समस्या का स्वत: समाधान हो गया अन्यथा पूरे आयोजन में जबलपुर की जनता का अभाव था। बेहतर होता यदि जबलपुर के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों को बुलाकर एक संगोष्ठी कराई गई होती। बावजूद इसके ओशो की स्मृति में वह सब हुआ जो ऐसे आयोजनों में परम्परागत तौर पर होता है। लेकिन एक प्रश्न किसी ने नहीं छेड़ा कि क्या वजह रही जो रजनीश ने अपनी कर्मभूमि को त्यागकर दोबारा इसकी तरफ  मुड़कर नहीं देखा। संभवत: रजनीश ने ही ये कहा था कि गौतम बुद्ध का सामना एक दिन अचानक उनकी पत्नी यशोधरा से हो गया। यशोधरा ने उनसे पूछा कि क्या जो कार्य वे कर रहे हैं उसे घर में रहते हुए नहीं किया जा सकता था, और बुद्ध निरुत्तर होकर रह गए।  क्या कभी किसी ने ऐसा ही सवाल रजनीश से भी पूछा कि क्या वे जबलपुर में रहकर ओशो नहीं बन सकते थे ? ओशो स्मृति में हुआ आयोजन हर दृष्टि से सफल और सार्थक रहा किन्तु अपने रजनीश के प्रति श्रद्द्धावनत होते हुए यदि संस्कारधानी दुनिया भर से आये ओशो भक्तों को उस हकीकत से भी अवगत करवा देती जिसके चलते वह क्रांतिकारी विचारक अपनी कर्मभूमि से मुंह मोड़कर चलता बना, तब शायद उस मौन अपराधबोध से उसे मुक्ति मिल जाती जो अनेक दशकों से उसके मन को कचोटता रहा है। वैसे इस शहर के बारे में एक सबसे कड़वी टिप्पणी है कि ये उस नागिन की तरह है जो अपने अंडे खुद होकर खा जाती है। शायद रजनीश की छठी इन्द्रिय उस खतरे को भांप गई थी। चलो, फिर भी अच्छा हुआ जो वे सशरीर न सही लेकिन बतौर आयोजन की विषयवस्तु बनकर लौटे तो। यूँ भी बहुत कम दार्शनिकों का मूल्यांकन उनके जीवन काल में हो पाता है। रजनीश को तो चलते, फिरते और बोलते हुए देखने वाले अभी जीवित हैं। आज की संस्कारधानी के पास भी फिराक गोरखपुरी के शब्दों में ये कहने का अधिकार तो कम से कम है ही कि :-
आने वाली नस्लें तुम पर फक्र करेंगी हम - असरो,
जब उन्हें ध्यान आयेगा कि तुमने ओशो को देखा है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

जामिया मिलिया : छात्रों के कन्धों का इस्तेमाल



महात्मा गांधी ने स्वाधीनता संग्राम के दौरान अनेक बार अपने आन्दोलन को हिंसा होने पर स्थगित कर दिया था। गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने भी दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया विवि में पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई के विरुद्ध प्रस्तुत याचिका को सुनने से इंकार करते हुए साफ कह दिया कि पहले हिंसा रोको। उल्लेखनीय है नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में उक्त संस्थान में छात्रों द्वारा किये जा रहे आन्दोलन के दौरान हिंसा होने लगी। सार्वजानिक संपत्ति की तोडफ़ोड़ के साथ वाहन भी जलाये गये। दिल्ली पुलिस ने परिसर में घुसकर उपद्रवी तत्वों पर कार्रवाई की जिससे छात्र और भड़क गए। कांग्रेस सहित विपक्षी पार्टियां छात्रों के समर्थन में कूद पड़ीं। प्रियंका गांधी तो इंडिया गेट पर धरने पर बैठ गईं। याचिका पर विचार करने के लिए दी गईं दलीलों पर प्रधान न्यायाधीश ने गुस्सा व्यक्त करते हुए कहा कि सार्वजानिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और बसों को जलाए जाने जैसी घटनाएं रोके बिना न्यायालय सुनवाई नहीं करेगा। यद्यपि अदालत ने ये भी कहा कि वह ये फैसला नहीं कर रही कि कौन सही और कौन गलत है। जामिया मिलिया दिल्ली का सुप्रसिद्ध शिक्षण संस्थान है। इस केन्द्रीय विवि को गुणवत्ता के आधार पर काफी बेहतर श्रेणी प्राप्त है। इसकी स्थापना यूं तो अलीगढ़ में हुई किन्तु कालान्तर में इसे दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया। हालांकि इसका मुस्लिम स्वरूप बरकरार रखा गया। पूर्व राष्ट्रपति स्व. डा. जाकिर हुसैन भी इसके उपकुलपति रहे थे। दिल्ली स्थित जेएनयू की तरह यह संस्थान उतना विवादास्पद नहीं रहा किन्तु बीते कुछ सालों से यहां भी वामपंथी तेवर नजर आने लगे हैं जिसकी बानगी ताजा उपद्रवों से मिली। कुलपति ने ये आरोप लगा दिया कि पुलिस ने बिना अनुमति परिसर में प्रवेश किया और छात्रों की पिटाई कर डाली। इसके बाद अलीगढ़ मुस्लिम विवि में भी विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया और देखते-देखते देश के कई शहरों में छात्र जामिया मिलिया के छात्रों के समर्थन में आन्दोलनरत हो उठे। प्रश्न ये है कि उक्त विवि के छात्रों को नागरिकता संशोधन कानून से ऐसी क्या परेशानी हो गयी कि वे हिंसक आन्दोलन पर उतर आये। ये बात सही है कि दिल्ली पुलिस ने परिसर में घुसकर तोडफ़ोड़ और आगजनी करने वाले छात्रों पर बलप्रयोग किया किन्तु किसी कानून का विरोध करते हुए इस तरह की गतिविधि में शामिल लोग महज ये कहकर सहानुभूति के पात्र नहीं बन सकते कि वे छात्र हैं। पुलिस पर पत्थर फेंकते हुए छात्रों की भीड़ के चित्र सार्वजानिक हो चुके हैं। विवि परिसर में इतने पत्थर किसके द्वारा और क्यों लाये गए इस बात का उत्तर भी कुलपति को देना चाहिए। समूची घटना से ये तो पता चलता ही है कि छात्रों की आड़ में असामाजिक तत्वों ने अपना खेल दिखा दिया। आज हुई गिरफ्तारियां इसका प्रमाण हैं। जिस तरह से अलीगढ़ मुस्लिम विवि में इसकी त्वरित प्रतिक्रिया हुई वह भी सवाल खड़े कर रही है। टीवी पर अनेक छात्रों ने ये स्वीकार किया कि कतिपय वामपंथी संगठन विवि की परीक्षा टलवाना चाहते थे और उसी उद्देश्य से नागरिकता संशोधन कानून के नाम पर ये हिंसा करवाई गई। सच्चाई जो भी हो लेकिन इतना तो सच है कि विवि परिसर में इस कानून के विरोध का कोई अर्थ नहीं था। वहां पढऩे वाले वाले छात्र इससे तनिक भी प्रभावित नहीं हो रहे हैं। न तो उनकी नागरिकता खतरे में है और न ही उन्हें कोई देश से निकाल रहा है। ऐसे में आन्दोलन इतना हिंसक कैसे हुआ ये गम्भीरता से सोचने वाली बात है। और फिर कांग्रेस ने जिस तत्परता से हिंसक आन्दोलन की निंदा करने की बजाय उलटे पुलिस पर आरोप लगाना शुरू कर दिया उससे ये संदेह और भी गहराता है कि छात्रों की हिंसा के पीछे राजनीतिक षडयंत्र काम कर रहा था। जामिया मिलिया के छात्र विवि परिसर के बाहर आकर जब बस को जलाने लगे तब पुलिस ने उन्हें रोककर परिसर में लौटाने की कोशिश की और उसके बाद उपद्रव होने पर फिर पिटाई हुई। इस घटना का सबसे चिंताजनक पहलू ये है कि इस्लामिया नाम जुड़ा होने के बावजूद जामिया मिलिया में अलीगढ़ मुस्लिम विवि जैसी कट्टरता और जेएनयू की तरह वामपंथी धारा नहीं थी। लेकिन ताजा आन्दोलन के बाद अब ये मान लेने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि एक अच्छे भले शैक्षणिक संस्थान का माहौल खराब कर दिया गया। नागरिकता संशोधन कानून को लेकर जिस तरह का विरोध हो रहा है उसके पीछे अधिकतर वही लोग हैं जिन पर इस कानून का रत्ती भर भी असर नहीं होने वाला। कानून को मुस्लिम विरोधी बताने वालों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि देश का आम मुसलमान इसे लेकर सड़कों पर क्यों नहीं उतरा? चंद नेता ही इसे लेकर भड़काने वाली गतिविधियों को हवा दे रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने हिंसा रोके बिना याचिका की सुनवाई नहीं करने की जो बात कही वह पूरी तरह सही है क्योंकि दबाव की इस राजनीति का अंत समय की मांग और जरूरत दोनों हैं। यूं भी हिंसा से किसी आन्दोलन का औचित्य खतरे में पड़ जाता है। असम में उक्त कानून का सबसे ज्यादा विरोध शुरू हुआ लेकिन उसके हिंसक होते ही आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे प्रमुख संगठन ने उसे वापिस लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय जाने का निर्णय लिया। देश के जिन हिस्सों में कानून के विरोध में प्रदर्शन आदि हो रहे हैं उनमें मुस्लिमों की संख्या कितनी है ये देखने वाली बात है। बेकार में धजी का सांप बनाकर चंद राजनीतिक नेताओं ने जो गलती की उसका लाभ उठाकर देश विरोधी ताकतें अपने षडय़ंत्र में कामयाब हो गईं। विदेशी नागरिकों पर केंद्रित कानून को मुस्लिम विरोधी बताकर उसका विरोध करने वाले ये भूल गए कि ऐसा करते हुए एक बार फिर वे हिन्दू धु्रवीकरण की परिस्थितियां बनाने में सहायक बन गए हैं। राजनीति अपनी जगह है किन्तु पढ़ाई-लिखाई कर रहे छात्रों के कंधों पर रखकर बन्दूक चलाने वालों को ये सोचना चाहिए कि अराजकता फैलाने वाले भी अंतत: उसी की चपेट में आ जाते हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 16 December 2019

मायावती के सवालों का भी जवाब दें राहुल



ऐसा लगता है राहुल गांधी बोलने के पहले सोचते नहीं हैं। या फिर उन्हें आज तक ये समझ नहीं आया कि कब, कहाँ, क्या और कैसे बोलना चाहिए ? बीते सप्ताह दिल्ली में हुई कांग्रेस की रैली में उन्होंने बड़ी ही तेज आवाज में कहा कि उनका नाम राहुल सावरकर नहीं बल्कि राहुल गांधी है और वे सच्चाई की लिए मर जायंगे लेकिन माफी नहीं मांगेंगे। इसके पीछे उनके उस बयान पर माफी मांगने सम्बन्धी मांग थी जिसमें उन्होंने प्रधानमन्त्री के मेक इन इण्डिया नारे का रेप इन इण्डिया कहकर मजाक उड़ाया था। संसद और बाहर उसे लेकर काफी बवाल मचा था। दिल्ली की रैली में वे मोदी सरकार पर नीतिगत हमले करते तो किसी को ऐतराज नहीं होता किन्तु उन्होंने बेवजह खुद के सावरकर नहीं होने की बात कह डाली जो न सिर्फ  अप्रासंगिक अपितु अनावश्यक भी थी। जब से महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भाजपा ने स्वातंत्र्य वीर सावरकर को भारत रत्न देने की बात अपने घोषणापत्र में शामिल की तभी से कांग्रेस और वामपंथी लॉबी सावरकर जी को लेकर आलोचनात्मक टिप्पणियाँ करने में जुटी हुई है। ये सही है कि उन पर महात्मा गांधी की हत्या का आरोप लगा था किन्तु वे अदालत से बरी हो गये। बावजूद इसके ये कहा जाता रहा कि सावरकर जी की विचारधारा ने ही नाथूराम गोडसे को गांधी जी की हत्या के लिए उकसाया। और द्विराष्ट्र का सिद्धांत भी उन्हीं का दिया हुआ था। जेल से बाहर आने के लिए अंग्रेजों से लिखित माफी मांगने का आरोप भी उन पर लगाया गया। लेकिन सावरकर जी के प्रति कांग्रेस की नाराजगी के बावजूद स्व. इंदिरा गांधी के प्रधानमन्त्री कार्यकाल में ही उन पर डाक टिकिट जारी किया गया था। यही नहीं इंदिरा जी ने लिखित रूप में ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध सावरकर जी के संघर्ष की प्रशंसा भी की थी। दरअसल जब से देश के विभाजन के लिए भाजपा ने पंडित नेहरू को जिम्मेदार ठहराने का अभियान छेड़ा है तभी से कांग्रेस कभी सावरकर जी और कभी जनसंघ के संस्थापक स्व. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को विभाजन के लिए कसूरवार ठहराने की रणनीति पर चल पड़ी है। इतिहास को लेकर विभिन्न अवधारणाएं होना गलत नहीं हैं। उसकी प्रामाणिकता पर भी विवाद हो सकते हैं लेकिन सावरकर जी का इतिहास इतना पुराना भी नहीं है कि उसे लेकर अनभिज्ञता रहे। ब्रिटिश सत्ता के विरूद्ध उनका संघर्ष किसी प्रमाणपत्र का मोहताज नहीं है। उन्हें काले पानी की सजा के दौरान अंडमान की सेलुलर जेल में 10 वर्षों तक कठोर यातनाएं सहनी पड़ीं। उनके पूरे परिवार को प्रताडि़त किया गया। कट्टर हिंदूवादी होने के बावजूद सावरकर जी ने समाज सुधार विशेष तौर पर जातिवाद के विरुद्ध काफी जनजागरण किया। वे उच्च कोटि के लेखक थे। ऐसे व्यक्ति से वैचारिक मतभेद रखना तो सामान्य बात है लेकिन उसका अपमान करने की कोशिश किसी भी दृष्टि से शोभनीय नहीं कही जा सकती। महाराष्ट्र में जिस शिवसेना के साथ कांग्रेस ने हाल ही में मिलकर सरकार बनाई है वह सावरकर जी को अपना आदर्श और प्रेरणास्रोत मानती है। उन्हें भारत रत्न दिए जाने की भी वह पक्षधर है। राहुल के बयान पर उसने भी नाराजगी जताई है। यद्यपि संजय राउत जैसे बड़बोले प्रवक्ता ने बजाय आग उगलने के ये कहते हुए पल्ला झाड़ लिया कि कांग्रेस के उच्च नेताओं से बात की जायेगी। उन्होंने श्री गांधी को सावरकर जी द्वारा रचित साहित्य पढऩे के लिए दिए जाने की बात भी कही। राज्य के गृहमंत्री ने भी राहुल की बात पर ऐतराज किया है। हालांकि मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की खामोशी चौंकाने वाली है। बहरहाल श्री गांधी द्वारा खुद के सावरकर नहीं होने की बात से कांग्रेस को एक बार फिर जबर्दस्त नुकसान हो गया। स्वातंत्र्य वीर के तौर पर प्रसिद्ध सावरकर जी की स्वाधीनता संग्राम में जो भूमिका है उसके कारण शिवसेना और भाजपा के अलावा भी देश का एक बड़ा वर्ग उनके प्रति सम्मान का भाव रखता है। युवा पीढ़ी में भले ही उस महान नेता के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं हो लेकिन श्री गांधी द्वारा की गयी टिप्पणी के बाद से सावरकर जी को पढऩे और समझने के प्रति असंख्य लोगों की रूचि जागृत हो गई है। सोशल मीडिया पर जो कुछ भी चल रहा है उससे ये स्पष्ट हो जाता है कि सावरकर जी अचानक राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बन गए। इस मुद्दे पर राजनीतिक दृष्टिकोण से भी सोचें तो राहुल ने एक बार फिर बचकानापन दिखाते हुए कांग्रेस के लिए मुश्किल पैदा कर दी है। उनकी दादी ने जिस व्यक्ति के सम्मान में डाक टिकिट जारी करवाया और स्वाधीनता संग्राम में उनकी संघर्षशीलता के प्रति आदरभाव व्यक्त किया हो उसके प्रति हल्कापन दिखाना किसी भी दृष्टि से अच्छा नहीं है। बसपा नेत्री मायावती ने श्री गांधी द्वारा सावरकर जी के प्रति व्यक्त किये गये उद्गार के बाद कांग्रेस पर दोहरा चरित्र रखने का आरोप लगाते हुए सवाल किया कि शिवसेना अपने एजेंडे पर कायम है। जिसके तहत उसने नागरिकता संशोधन विधेयक पर मोदी सरकार का साथ दिया और वह सावरकर जी की अनन्य भक्त भी है। फिर भी कांग्रेस उसके साथ महाराष्ट्र सरकार में क्यों बनी हुई है? महाराष्ट्र के कांग्रेस नेताओं के साथ ही शरद पवार की एनसीपी भी श्री गांधी द्वारा सावरकर जी के बारे में जिस तरह की बातें की गईं उनसे सनाके में है। दरअसल कांग्रेस की दिक्कत ये है कि वह महात्मा गांधी से ज्यादा आज के गांधी परिवार की भक्त हो गयी जिस वजह से उसके किसी सदस्य द्वारा की गई गलतियों पर टोकने वाला कोई नहीं है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 14 December 2019

माफिया उन्मूलन : सरकारी मुख्यालय से हो शुरुवात



मप्र के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने पुलिस और प्रशासन के आला अधिकारियों को माफिया के विरुद्ध निर्णायक मुहिम छेडऩे का जो आदेश दिया वह स्वागतयोग्य है। प्रदेश भर से आये उच्च अधिकारियों को उन्होंने जिस सख्त अंदाज में निर्देश दिए यदि उसका सही-सही पालन हो गया तो निश्चित रूप से ये बड़ी उपलब्धि होगी। माफिया शब्द से साधारण तौर पर अभिप्राय अपराधी गिरोहों से होता है लेकिन धीरे-धीरे सफेदपोश माफिया भी अस्तित्व में आता गया और आज आलम ये है कि कोई भी ऐसा क्षेत्र ऐसा नहीं है जिसका माफियाकरण न हो गया हो। एक समय था जब अपराधी तत्व राजनेताओं के संरक्षण में पलते रहते थे। लेकिन कालान्तर में वे खुद ही राजनेता बन गए। हालात यहाँ तक आ गए कि देश की संसद और विधानसभाओं में बड़ी संख्या में ऐसे जनप्रतिनिधि चुनकर आने लगे जिन पर संगीन अपराधों के मुकदमे चल रहे हैं। फूलन देवी का लोकसभा के लिए चुना जाना काफी कुछ कह गया। अनेक ऐसे कुख्यात अपराधी तत्व हैं जो कत्ल या उस जैसे ही किसी अपराध के प्रकरण में जेल में बंद रहने के बाद भी लोकसभा और विधानसभा का चुनाव जीत चुके हैं। ये विडंबना ही है कि चुनाव जीतने की क्षमता वाले उम्मीदवार उतारने की रणनीति के चलते राजनीतिक दलों ने प्रत्याशी की अपराधिक अपराधिक पृष्ठभूमि को अनदेखा करने की आदत डाल ली है। राजनीति और अपराध का गठजोड़ जब पूरी तरह सफलतापूर्वक स्थापित हो गया तब अन्य क्षेत्रों में भी माफिया का प्रवेश हुआ और स्थिति यहाँ तक बिगड़ गई कि शासन, प्रशासन, उद्योग-व्यापार, सभी में सीधे या परोक्ष रूप से माफिया का दबदबा बढ़ता गया। भू माफिया, शराब माफिया, दूध माफिया से बढ़ते-बढ़ते बात मीडिया माफिया तक आ पहुँची है। किसी भी क्षेत्र में गलत काम करने वालों का संगठित गिरोह माफिया कहा जा सकता है। उस दृष्टि से देखें तो कमलनाथ ने बहुत ही सही सोच का परिचय दिया। अभी तक होता ये था कि सरकार द्वारा कड़ाई बरतने की हिदायत मिलते ही पुलिस और प्रशासन मिलकर स्थापित अपरधियों की पकड़-धकड़ कर दिया करते थे। लेकिन मुख्यमंत्री ने माफिया विरोधी मुहिम को व्यापक रूप देने का हुक्मनामा जारी करते हुए अधिकारियों को कड़े शब्दों में समझा दिया कि ढिलाई बरतने पर उनकी खैर नहीं रहेगी। जैसे समाचार मिल रहे हैं उनके अनुसार प्रशासनिक अमला माफिया विरोधी अभियान में जुट गया है। लेकिन सवाल ये है कि पुलिस और प्रशासन के अनेक जिम्मेदार लोगों का माफिया से जो याराना है उसे मुख्यमंत्री किस तरह रोक सकेंगे? सही बात तो यही है कि माफिया के विस्तार में राजनीति, पुलिस और प्रशासन का ही योगदान है। अपराधी प्रवृत्ति एक मानसिकता है लेकिन संगठित अपराध जब सरकारी संरक्षण में चलने लगते हैं तब उसे माफिया की हैसियत मिल जाती है। उस लिहाज से कमलनाथ को चाहिए कि वे माफिया विरोधी अभियान का शुभारम्भ भोपाल स्थित सचिवालय से करें। सचिवालय में घूमने वाले दलाल किस-किस अधिकारी से मिलते हैं उसका पता किया जाए तो ये बात उजागर होते देर नहीं लगेगी कि माफिया राज का उद्गम स्थल सरकार का अपना मुख्यालय ही है। राजधानी में बैठे अनेक पत्रकार भी सत्ता के दलाल बनकर माफिया के कारोबार में मददगार बनते सुने जा सकते हैं। मुख्यमंत्री की मंशा पर कोई शक किए बिना ये कहना सर्वथा उचित रहेगा कि जब तक सरकार अपने घर की सफाई नहीं करती तब तक माफिया का उन्मूलन नहीं हो सकता। हाल ही में इंदौर के एक अखबार मालिक के कथित अवैध कारोबार को सरकार ने नेस्तनाबूत कर दिया। इसके पीछे जो वजह बताई गई वह हनीट्रैप नामक उस कांड से जुड़ी हुई है जिसमें अनेक राजनेताओं तथा आला अधिकारियों की रंगरेलियों की सचित्र दास्तान का पर्दाफाश हुआ। सरकार द्वारा उक्त अखबार मालिक और उसके होटलों इत्यादि पर जिस तरह से बुलडोजर चलाया गया उसे लेकर तरह-तरह की बातें सोशल मीडिया पर चल रही हैं। उक्त अख़बार मालिक की काली करतूतों से किसी को सहानुभूति नहीं हो सकती लेकिन उसको बर्बाद किये जाने की वजह यदि बड़ी हैसियत वाले तमाम नेताओं और अधिकारियों की इज्जत उतरने का खौफ  है तब मुख्यमंत्री को चाहिये वे इस मामले में उछल रहे आरोपों को लेकर अपनी सरकार की अग्निपरीक्षा देने का साहस भी दिखाएँ। कमलनाथ बहुत ही अनुभवी नेता हैं। उनकी योग्यता और दक्षता असंदिग्ध है किन्तु माफिया के सफाए के लिए उन्होंने नौकरशाहों को जो निर्देश दिए वे तब तक कारगर नहीं हो सकेंगे जब तक सत्ता से जुड़े लोगों के साथ ही प्रशासन और पुलिस की विभिन्न क्षेत्रों के अपराधी तत्वों के साथ चल रही अघोषित भागीदारी पर शिकंजा नहीं कसा जाता। बीते दिनों प्रदेश में रेत के ठेके नीलाम किये गए। मुख्यमंत्री यदि सही-सही पता कर लें कि जिन लोगों ने आर्थिक मंदी के इस दौर में भी सरकार की उम्मीद से बहुत बढ़कर बोली लगाई वे और उनके साथ कौन-कौन हैं तो उनको माफिया की वास्तविक स्थिति पता चल जायेगी। यदि पुलिस और प्रशासन ठान ले तथा राजनेता संरक्षण नहीं दें तो किसी शहर या बस्ती में चलने वाली अधिकतर अपराधिक गतिविधियों को चुटकी बजकर रोका जा सकता है। माफिया राज यदि आज समूची व्यवस्था पर हावी है तो उसके लिये सरकारी अमला सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। मप्र अपेक्षाकृत शांत राज्य है और यहाँ कानून व्यवस्था भी काफी अच्छी मानी जाती है। लेकिन समय के साथ ही इस राज्य में भी उन समस्त बुराइयों का पदार्पण होता गया जिनके लिए उप्र और बिहार को बदनाम किया जाता रहा। खैर, कमलनाथ की कोशिश को देर आयद दुरुस्त आयद मानकर उम्मीद की जानी चाहिए कि ज्यादा न सही थोड़ा सा भी कुछ हो गया तो वह भी राहत की बात होगी। लेकिन मुख्यमंत्री की निष्पक्षता तभी साबित हो सकेगी जब वे शासन -प्रशासन और अपनी पार्टी के माफिया के साथ चले आ रहे गठबंधन को तहस-नहस करने की हिम्मत दिखाएँ। यदि वे ऐसा कर सके तब मप्र को विकसित राज्य बनाने का सपना साकार हो सकेगा। वरना जो चल रहा है वैसा ही चलता रहेगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 13 December 2019

काश, समय रहते इलाज कर लिया होता



समय पर इलाज नहीं होने से किस तरह छोटी सी फुंसी पहले फोड़ा और बाद में नासूर बन जाती है इसका ताजा उदहारण है पूर्वोत्तर की वर्तमान स्थिति। पहले राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर और अब नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध को लेकर देश के पूर्वी राज्यों में जिस बड़े पैमाने पर हिंसक आन्दोलन हो रहे हैं उन्हें तात्कालिक प्रतिक्रिया कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आजादी के बाद से ही पूर्वोत्तर राज्यों में भाषा, संस्कृति और क्षेत्रीयता के नाम पर अलगाववाद के बीज बोये जाते रहे हैं। जनजातीय समुदायों के बाहुल्य वाले इस अंचल में सांस्कृतिक विविधता तो सदियों से ही थी लेकिन ब्रिटिश राज में वहां ईसाई मिशनरियों का जाल फैलता चला गया। स्वाधीन भारत में इस इलाके की संवेदनशीलता पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिए जाने की वजह से पूर्वोत्तर मुख्यधारा में शामिल होने से वंचित रह गया। म्यांमार (बर्मा) और बांग्ला देश (1971 से पहले पूर्वी पाकिस्तान) से घुसपैठिये लगातार सीमावर्ती राज्यों में आते गए। लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ असम। पूर्व राष्ट्रपति स्व. फखरुद्दीन अली अहमद जब असम की राजनीति में सक्रिय थे उस समय वहां काफी मुस्लिम घुसपैठिये आये जिन्हें सुनियोजित तरीके से नागरिकता दी जाती रही क्योंकि वे कांग्रेस के वोट बैंक माने जाते थे। सांस्कृतिक और भाषायी विविधता के साथ भौगोलिक संरचना की वजह से पूर्वोत्तर में नए-नए राज्य बनते गये। इसके पीछे भी अनेक कारण थे लेकिन दुर्भाग्यवश इन प्रदेशों में राष्ट्रीय राजनीति की मुख्यधारा की बजाय क्षेत्रीय दलों या ये कहें कि कबीला संस्कृति पर आधारित राजनीति का आधिपत्य बना रहा। ईसाई मिशनरियों के अलावा यहाँ चीन ने भी भारत विरोधी भावनाओँ को भड़काते हुए अशांति का माहौल बनाये रखा। पूर्वोत्तर के राज्यों की क्षेत्रीय पहिचान और सांस्कृतिक विशिष्टता बनाये रखने के लिए उन्हें जम्मू कश्मीर जैसे तरह-तरह के अनेक विशेषाधिकार भी दिए गए। इन राज्यों में अनेक सशस्त्र उग्रवादी संगठन भारत के विरुद्ध विद्रोह पर उतारू रहे जिसकी वजह से समूचा इलाका अशांत बना रहा। समय-समय पर अनेक समझौते भी केंद्र ने किये लेकिन ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि जिस तरह से शेष भारत का तादात्म्य इस इलाके से नहीं कायम हो सका ठीक वैसी ही स्थिति इन राज्यों के लोगों की भी रही। प्राकृतिक सौन्दर्य और अपार वन संपदा से से भरपूर पूर्वोत्तर के अरुणाचल राज्य को तो चीन अपने नक्शे में दिखाने से भी बाज नहीं आता। लम्बे समय तक अशांत रहने के बावजूद पूर्वोत्तर राज्यों में भारतीय प्रभुसत्ता बनी रही तो उसका कारण हमारे सुरक्षा बल ही हैं। जहां तक बात वर्तमान समस्या की है तो इसकी शुरुवात 1971 में बांग्ला देश बनने के पहले तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में हुए गृह युद्ध से उत्पन्न हुई जब बहुत बड़ी संख्या में शरणार्थी बनकर लाखों लोग सीमा पार करते हुए सीमावर्ती राज्यों में आ गए। सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ असम। बांग्ला देश के निर्माण के बाद इंदिरा गांधी और शेख मुजीब के बीच समझौता हुआ जिसके अनुसार भारत में घुस आये शरणार्थियों को वापिस भेजा जाना तय हुआ। लेकिन मुजीब के तख्ता पलट के बाद वहां सत्ता में आये लोगों के भारत के साथ रिश्ते बिगड़ गए और शरणार्थी भारत में ही रह गये। हालाँकि उस समय उन्हें देश के विभिन्न हिस्सों में शिविर बनाकर रखा गया था किन्तु असम और बंगाल में वे बड़ी संख्या में जमे रहे और यहीं से असम का ऐतिहासिक छात्र आंदोलन शुरू हुआ। लंबे संघर्ष के बाद स्व. राजीव गांधी ने आन्दोलनकारियों के साथ नया समझौता करते हुए असम को शरणार्थियों के बोझ से मुक्ति देने का वायदा किया। उसके बाद वहां असम गण परिषद की सरकार बनी लेकिन बाद में डेढ़ दशक तक कांग्रेस सत्ता में रही। डा मनमोहन सिंह भी इसी राज्य से राज्यसभा के लिए चुने जाते रहे हैं लेकिन उस समझौते को अमल में लाने की दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं किये गए। और यदि किये भी गये होंगे तो उनका कोई असर जमीन पर तो नहीं दिखाई दिया। इस कारण से वहां जनसंख्या असंतुलन की स्थिति उत्पन्न होती गयी। अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के फेर में कांग्रेस और वामपंथियों ने बांग्ला देश से आये मुसलमानों को अपना वोटबैंक बना लिया। आज ममता बनर्जी भी उसी लाइन पर चल रही हैं। इस समस्या को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के दखल पर नागरिकता रजिस्टर बनाया गया लेकिन उसके झमेले में फंसने के बाद केंद्र सरकार नया विधेयक लेकर आई जो अब कानून बन गया है। हालाँकि इसके अनुसार 2014 की निश्चित तिथि तक आये गैर मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान है लेकिन पूर्वोत्तर में ये आशंका व्याप्त है कि इस कानून के कारण अब नये सिरे से शरणार्थियों का रेला आना शुरू हो जाएगा। असम के अलावा अन्य राज्यों को अपनी भाषा और संस्कृति खतरे में पड़ती दिखाई दे रही है। विधेयक पारित होने के पहले ही बड़ा इलाका आन्दोलन की चपेट में आ चुका था। हलात बेहद तनावपूर्ण हैं। उनमें सुधार कैसे होगा ये कह पाना बेहद कठिन है। केंद्र सरकार आश्वासन दे रही है। प्रधानमंत्री गृहमंत्री भी ये समझा रहे हैं कि डरने की बात नहीं है। आगे क्या होगा ये कोई नहीं बता पा रहा। विपक्ष ने केंद्र सरकार को इसके लिए जिम्मेदार बताकर अपना पल्ला झाड़ लिया है। हिंसा का ये दौर लम्बा चलेगा या फिर जल्द ही शांति हो जायेगी ये फिलहाल कहना कठिन है। लेकिन इस विवाद से एक बात पुन: साबित हो गयी कि इस तरह की समस्याओं का हल जितनी जल्दी हो किया जाना चाहिए। पूर्वोत्तर में मोदी सरकार ने विकास की धारा बहाने के लिए कारगर कदम उठाये हैं। वहां का पर्यटन भी बढ़ा है लेकिन अचानक वहां अशांति का पुराना माहौल लौट आया। उम्मीद है जल्द ही हालात सामान्य होंगे और भ्रम तथा आशंकाएं दूर हो जायेंगीं किन्तु पूर्वोत्तर में अलगाववाद और घुसपैठ की समस्या का समय रहते समाधान न किये जाने की कितनी बड़ी कीमत देश ने चुकाई ये गम्भीर चिन्तन का विषय है। राष्ट्रीय विषयों पर राजनीति से उपर उठकर सोचने की प्रवृत्ति न जाने कब हमारे यहाँ विकसित होगी?

-रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 12 December 2019

एक वायदा अच्छे दिन का भी तो था



तीन तलाक, अनुच्छेद 370, राम मंदिर और अब नागरिकता संशोधन विधेयक पारित होने के बाद मोदी सरकार के पास ये कहने का भरपूर अवसर है कि उसने भाजपा के घोषणापत्र के उन परंपरागत वायदों को पूरा कर दिया जिन्हें लेकर उसे विपक्ष और जनता दोनों से उलाहने सुनने मिलते थे। यद्यपि अयोध्या मसला सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निपटाया गया लेकिन वह चूंकि हिंदुओं के पक्ष में गया इसलिए उसका राजनीतिक फायदा भाजपा के खाते में आया और हिंदुत्व की भावना को भी इस फैसले से काफी बल मिला किन्तु शेष तीनों विषय मोदी सरकार की उपलब्धि माने जाएंगे। सबसे बड़ी बात ये हुई कि विपक्ष द्वारा राज्यसभा में सरकार की राह में अवरोधक लगाने की रणनीति बुरी तरह बिखर गई। हालांकि बीते कुछ वर्षों में उच्च सदन में भाजपा और एनडीए की सदस्य संख्या खासी बढ़ गई लेकिन पूर्ण बहुमत में अभी भी कमी है। बावजूद उसके भाजपा का संसदीय प्रबंधन अपेक्षाकृत बेहतर रहा और वह कांग्रेस सहित शेष भाजपा विरोधी दलों की एकता में सेंध लगाने में कामयाब हो गई। नागरिकता संशोधन विधेयक दरअसल राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में उत्पन्न विसंगतियों के कारण लाना पड़ा। इसका पूर्वोत्तर राज्यों में जिस तरह का विरोध हो रहा है उसे देखते हुए केंद्र सरकार को आने वाले समय में विकट हालातों का सामना करना पड़ सकता है। ये दांव यदि उल्टा पड़ा तो पूर्वोत्तर में भाजपा के रथ के पहिये फंस भी सकते हैं । लेकिन देश के बाकी हिस्सों में पार्टी अपने प्रतिबद्ध मतदाताओं को बांधे रखने में जरूर सफल होगी । विपक्ष भी ये नहीं कह सकेगा कि भाजपा चुनाव जीतने के लिए भावनात्मक मुद्दे उठाती है । लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू ये है कि अब मोदी सरकार को इस आरोप से खुद को बचाना होगा कि वह आर्थिक मोर्चे पर मिल रही विफलता पर पर्दा डालने के लिए विवादग्रस्त विषयों को छेड़कर देश का ध्यान भटकाती रहती है। समाज के एक बड़े वर्ग के अनुसार संसद में नागरिकता संशोधन विधेयक को जिस तरह पेश किया गया उसकी उतनी जरूरत नहीं थी। सरकार उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप होने वाले उपद्रवों का पूर्वानुमान लगाने में भी विफल रही । ये भी कहा जा रहा है कि कश्मीर में शान्ति का दावा कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरने के पहले ही मोदी सरकार ने पूर्वोत्तर में अलगाववाद के नए बीज बो दिये । हालांकि सरकार जिस तरह से अपने फैसले पर कायम रही उससे ये लगता है कि इस विधेयक को लेकर भी उसके मन में कश्मीर जैसी ही कोई न कोई कार्ययोजना है जिसकी वजह से वह पूर्वोत्तर में भड़क उठी हिंसा को लेकर जरा भी चिंतित नहीं है । हो सकता है उसका आत्मविश्वास ठोस तैयारी की वजह से हो किन्तु अब समय आ गया है जब केंद्र सरकार को आर्थिक मोर्चे पर छाई निराशा को दूर करने की परिणाममूलक कोशिशें करनी चाहिए। आर्थिक मंदी कहें या सुस्ती लेकिन वास्तविकता यही है कि कारोबारी जगत में जबरदस्त अनिश्चितता है । घटते उत्पादन और बढ़ती बेरोजगारी के आंकड़े जनचर्चा के विषय बनते जा रहे हैं । विकास दर को लेकर पेश की गई रंगीन तस्वीर के रंग फीके पडऩे लगे हैं । भाजपा के भीतर ही अर्थव्यवस्था को लेकर असंतोष और आलोचना महसूस की जा सकती है । वित्तमंत्री द्वारा दी जाने वाली सफाई मजाक का विषय बनने लगी है । प्रधानमंत्री तो यूं भी ऐसे मुद्दों पर कुछ बोलने से कतराते हैं । भाजपा के प्रवक्ता भी संतोषजनक जवाब देने की बजाय या तो कन्नी काट जाते हैं या फिर तथ्यहीन बातें कहकर अपनी, पार्टी और सरकार तीनों की भद्द पिटवा देते हैं । भावनात्मक मुद्दों को व्यापक राष्ट्रीय हितों से जोड़ने  की उसकी रणनीति अब तक निश्चित रूप से कारगर रही किन्तु आर्थिक मोर्चे को लंबे समय तक अनदेखा नहीं किया जा सकता । मौजूदा वित्तीय वर्ष समाप्ति की ओर है । नए बजट का खाका तैयार होने लगा है। जीएसटी की वसूली उम्मीद से कम होने के साथ ही राजकोषीय घाटा भी अनुमानों के बाहर जाने को मचल रहा है । विपक्ष के साथ ही अनेक राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक विशेषज्ञ और रेटिंग एजेंसियां भारतीय अर्थव्यवस्था के भविष्य को लेकर चिंताजनक भविष्यवाणी करते रहती हैं । ये कहने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि भले ही सरकार कुछ भी कहती रहे लेकिन आम जनता भी आर्थिक स्थिति को लेकर आश्वस्त नहीं है । नोटबन्दी और जीएसटी की वजह से आई कारोबारी सुस्ती दूर होने का नाम ही नहीं ले रही। समूचा व्यापार, उद्योग और बैंकिंग जगत एक अजीबोगऱीब दहशत से गुजर रहा है। सरकार इस स्थिति से बेखबर या उदासीन है ये कहना तो गलत होगा लेकिन उसने जो उपाय किये वे जरूरत के मुताबिक अपर्याप्त थे या फिर माकूल नहीं रहे। हाल ही में वित्तमंत्री ने आगामी बजट में निजी आयकर की दरें घटाने के संकेत दबी जुबान में दिए थे। कारपोरेट कर में कमी के बाद से ये मांग उठने लगी थी कि आम जनता को भी तो कुछ राहत सीधे तौर पर मिले जिससे उसकी क्रय शक्ति बढऩे से बाजारों में मांग उठे। ऐसा होगा या कुछ और निर्णय लिए जाएंगे ये स्पष्ट नहीं है क्योंकि मोदी सरकार पूर्वानुमान लगाने के अवसर नहीं देती । खैर जो भी हो लेकिन कुछ न कुछ तो होना ही चाहिए क्योंकि शांतिकाल में आम इंसान की चिंता घर, परिवार और रोजी रोटी पर केंद्रित रहती है। बाजारवाद के इस दौर में केवल भावनाएं लंबे समय तक जनापेक्षाओं को दबाकर नहीं रख सकतीं। मोदी सरकार इस वास्तविकता को जितनी जल्दी समझ ले उतना बेहतर होगा। प्रधानमंत्री को ये भी याद रखना चाहिए कि उन्होंने एक वायदा अच्छे दिन आने का भी किया था।

-रवीन्द्र वाजपेयी