Wednesday, 8 January 2020

ईरान : अमेरिका का दांव उलटा पडऩे के आसार



पश्चिम एशिया का संकट और भी गहराता जा रहा है। ईरान तो खैर सीधे मुकाबले में खड़ा हुआ है लेकिन अब ईराक ने भी अमेरिका को आँखें दिखानी शुरू कर दीं। उसकी संसद ने प्रस्ताव पारित करते हुए अपने देश में मौजूद अमेरिकी सैनिकों को देश छोडऩे का आदेश दे दिया। उल्लेखनीय है अमेरिका द्वारा ईरान के फौजी जनरल सुलेमानी की ह्त्या ईराक के बग़दाद हवाई अड्डे पर ही ड्रोन से हवाई हमला कर की गई थी। कुछ दशक पूर्व ईराक और ईरान के बीच बहुत लम्बी जंग चली थी जिसमें लाखों लोग मारे गये। लेकिन मौजूदा हालात में दोनों पड़ोसी देश अमेरिका के विरुद्ध एकजुट हो रहे हैं जो इस अंचल में आया बड़ा बदलाव है। जैसी जानकारी मिली है उसके मुताबिक सऊदी अरब, कुवैत, कतर, ईराक, बहरीन जैसे अनेक खाड़ी देशों में अमेरिका के सैनिक और अस्त्र-शस्त्र मौजूद हैं। वैसे तो दूसरे महायुद्ध के बाद शीतयुद्ध के मद्देनजर अमेरिका ने एक तरह से पूरी दुनिया में अपनी सैन्य उपस्थिति बनाई है। उसके समुद्री बेड़े जगह-जगह तैनात हैं। कई देशों में तो उसके स्थायी सैन्य अड्डे हैं। हालांकि पश्चिम एशिया में सऊदी अरब और इजरायल ही उसके परम समर्थक रहे हैं लेकिन धीरे-धीरे कुछ और देश भी उसकी शरण में आते गए। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि अमेरिका ने अपनी कूटनीति, सैन्य बल और आर्थिक सम्पन्नता से इस्लामिक देशों के बीच भी फूट डालने में कामयाबी हासिल कर ली। बीती सदी के अंत में जब सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर बलात कब्जा किया तब अमेरिका को इस्लामिक देशों के बीच बतौर संरक्षक बनकर घुसने का अच्छा अवसर मिल गया। स्मरणीय है सद्दाम ने इस्लाम को मानने के बावजूद ईराक को आधुनिक बनाने में काफी योगदान दिया था। जबकि शाह पहलवी के रहते आधुनिकता की राह पर चलने वाला ईरान अयातुल्ला खोमैनी का राज आते ही कट्टरवादी इस्लामिक देश बन बैठा। अमेरिका ने समय रहते अरब जगत में आ रहे वैचारिक बदलाव का फायदा उठाया और छोटे-छोटे अनेक अरबी देशों को कट्टरपंथी पड़ोसियों का भय दिखाकर वहां अपनी सैन्य टुकडिय़ां तैनात कर दीं। जिन अरबी मुल्कों में अभी भी पुराना शाही शासन चला आ रहा है उन्हें भी इस्लामिक आतंकवाद के नाम पर आ रहे बवंडर में अपनी सत्ता खतरे में नजर आई और वे अमेरिका की छतरी के नीचे आ गए। लेकिन ईरान पर उसका जादू नहीं चल पाया और उसने अपना परमाणु कार्यक्रम जारी रखते हुए अमेरिका के झंडे तले आने से इंकार कर दिया। दरअसल 1979 में जब खोमैनी ने शाह पहलवी की सत्ता लटकर घड़ी की सुइयां उल्टी घुमाते हुए ईरान को कट्टरवादी इस्लामिक देश बना दिया तभी से अमेरिका की नजर में वह खटक रहा था। लेकिन उसे खाड़ी में घुसने का मौका और बहाना नहीं मिल रहा था। कुवैत पर सद्दाम के हमले ने अमेरिका को वहां जमने का रास्ता दे दिया। उसी के बाद से राजशाही से संचालित अनेक अरबी देश वाशिंगटन को अपना रहनुमा मानकर शरणागत हो गये। ये कहना भी प्रासंगिक होगा कि फिलीस्तीन की आजादी के लिए लडऩे वाले यासर अराफात की मौत के बाद तो अरब जगत में अमेरिका से ऊंची आवाज में बात करने वाला कोई व्यक्तित्व बचा ही नहीं। एक दौर था जब सोवियत संघ अमेरिका को पश्चिम एशिया में शह दिया करता था लेकिन उसके विघटन के बाद रूस में वह दमखम नहीं बचा। यद्यपि ब्लादिमीर पुतिन के सत्ता में आने के बाद उसने एक बार फिर अमेरिका को चुनौती देने का साहस दिखाया जिसका प्रमाण सीरिया को दिया गया उसका संरक्षण है किन्तु उसका प्रभावक्षेत्र अमेरिका जैसा व्यापक नहीं हो सका। मौजूदा संकट के पीछे अमेरिका की सोच काफी दूरगामी है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के हालात जैसे बन गये हैं उनके बाद अब उसको वहां बने रहना कठिन हो रहा है। ऐसे में उसे पश्चिम एशिया के साथ ही मध्य एशिया पर नजर रखने के लिए कोई जगह चाहिए। लादेन और बगदादी का सफाया करने के बाद अब अरब जगत में इस्लामिक कट्टरवाद का झंडा बुलंद करने वाला ईरान ही बच रहता है। पूरे परिदृश्य पर नजर डालें तो दिखाई देगा कि यासर आराफात, कर्नल गद्दाफी और सद्दाम हुसैन जैसे ताकतवर नेताओं का अभाव अरब जगत में महसूस किया जा सकता है। सऊदी अरब के शाही परिवार में भी फूट के बीज अमेरिका ने बो दिए हैं और बड़ी बात नहीं कुछ सालों के भीतर इस्लाम का यह सबसे प्रमुख देश भी शाही शासन से मुक्त होकर राजनीतिक अनिश्चितता में फंसकर रह जाए। कहने को तो अमेरिका सऊदी अरब का संरक्षक है लेकिन उसे ये पता है कि दुनिया भर में इस्लाम के नाम पर आतंकवाद को आर्थिक सहायता देने में सऊदी अरब का सबसे अधिक योगदान है। इसके पीछे शाही परिवार का उदेश्य अपनी सत्ता बचाकर रखना है। इस प्रकार पश्चिम एशिया में आज की सूरत में केवल ईरान ही है जो अभी तक अमेरिका के इशारों पर नाचने से इंकार करता रहा। लेकिन ताजा तनाव के बाद अरब जगत एक अदृश्य भय से गुजर रहा है। जिस तरह से अमेरिका ने जनरल सुलेमानी को मारा उससे पश्चिम एशिया के अनेक शासक दहशत में डूब गये हैं। उन्हें ये डर भी सताने लगा है कि अमेरिका की हाँ में हाँ मिलाने के फेर में कहीं उनके देश में भी इस्लामिक आतंकवाद सिर न उठा ले। ये बात सौ फीसदी सही है कि अरब ही नहीं अपितु दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाले अधिकांश मुस्लिम अमेरिका को इस्लाम का दुश्मन मानते हैं। और उस दृष्टि से अरब देशों में सत्ता में बैठे हर शासक को दिखावे के लिए ही सही लेकिन अमेरिका का विरोध करना पड़ता है। लेकिन मौजूदा हालातों में अमेरिका के लिए भी शोचनीय स्थिति बन गयी है जिसमें इधर कुआं उधर खाई है। ईराक के साथ ही अन्य अरबी देश सुलेमानी की हत्या के तरीके को पचा नहीं पा रहे हैं। बताया जा रहा है कि फौजी जनरल होने के बावजूद सुलेमानी अरब देशों के बीच एकता की कूटनीतिक पहल कर रहा था जिसमें उसे काफी सफलता भी मिलने लगी थी। इसीलिए अमेरिका ने उसे रास्ते से हटा दिया। लेकिन इसके बाद पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईराक से आई प्रतिक्रियाएं उसे चिंतित कर रही हैं। गत दिवस राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के प्रधानमन्त्री से फोन पर जो लम्बी बात की उसका मुख्य विषय ईरान संकट ही था। हो सकता है भारत और ईरान के नजदीकी रिश्तों को देखते हुए अमेरिका बीच का रास्ता निकालने के लिए श्री मोदी की सेवाएं लेना चाहता हो। अरब जगत में उठे गुस्से के सैलाब से ट्रंप भी सतर्क हो उठे हैं। भारत भी चाहता है कि ये विवाद आगे न बढ़े क्योंकि बीते कुछ दिन में ही पेट्रोल-डीजल के दाम तेजी से बढ़ गए हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 7 January 2020

जेएनयू : विवाद की जड़ जानना भी जरूरी



दिल्ली के जेएनयू (जवाहरलाल नेहरू विवि)) परिसर में बीते रविवार की शाम कुछ नकाबपोशों ने घुसकर जो मारपीट की उसके दृश्य टीवी चैनलों के जरिये पूरे देश ने देखे। मारपीट करने वाले कौन थे ये अभी तक पता नहीं चल पाया है लेकिन घटना के तुरंत बाद ही ये आरोप लगाया जाने लगा कि नकाबपोश अभाविप (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) के थे जिसे भाजपा समर्थित छात्र इकाई माना जाता है। चूंकि जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष आइशी घोष भी हमले में घायल हो गईं इसलिए वामपंथी लॉबी के प्रचार को और बल मिल गया। पूरी घटना विवि. परिसरों के भीतर छात्रों के गुटों में होने वाले सामान्य झगड़े तक ही सीमित रहती लेकिन प्रो. योगेन्द्र यादव ने जेएनयू पहुंचकर परिसर में घुसने की कोशिश की किन्तु पुलिस ने उन्हें रोक लिया। इस दौरान उनके साथ धक्कामुक्की भी हुई जिसके बाद उन्होंने पूरी तरह पेशेवर राजनेता की तरह वामपंथी धारा के अनुरूप बयान देना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे सीताराम येचुरी, डी. राजा और ऐसे ही अन्य नेता भी जेएनयू पहुंच गये। घायल छात्रों को देखने कांग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा अस्पताल जा पहुंची। राहुल गांधी और अरविन्द केजरीवाल के ट्वीट भी आने लगे। जो कुछ भी हुआ वह दर्दनाक और शर्मनाक कहा जाएगा। जेएनयू देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों में माना जाता है। लेकिन बीते काफी समय से इसकी चर्चा नकारात्मक कारणों से होने लगी है। इसकी वजह वहां वामपंथी एकाधिकार के लिए उत्पन्न खतरा ही है। एक समय था जब इस संस्थान में छात्र और शिक्षकों में वामपंथी रुझान वाले ही ज्यादा थे। दूसरी विचारधारा के लोगों की हालत दांतों के बीच में जीभ जैसी थी। लेकिन कुछ साल पहले से जब वहां अभाविप ने भी छात्र राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाना शुरू की तबसे वामपंथी कुनबे के पेट में दर्द शुरू हो गया। गौरतलब ये है कि कहने को तो कांग्रेस की छात्र इकाई एएसयूआई भी जेएनयू में सक्रिय है लेकिन उसका होना न होना एक जैसा है। अभाविप का जनाधार बढऩे के पूर्व जेएनयू में विभिन्न वामपंथी गुट ही आपस में टकराते रहते थे। कुछ साल पहले जब वहां छात्रसंघ चुनाव में अभाविप का पदाधिकारी जीत गया तब वामपंथी गुटों को अपने वर्चस्व के लिए खतरा महसूस हुआ और उसके बाद के चुनावों में वे एकजुट होकर मैदान में उतरे। योगेन्द्र यादव जिस आम आदमी पार्टी के संस्थापक रहे उसकी छात्र इकाई ने भी जेएनयू में हाथ आजमाया लेकिन निराशा हाथ लगी। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि छात्रसंघ राजनीति में अभाविप अकेली ही संयुक्त वामपन्थी ताकत की प्रतिद्वंदी है। अभाविप का प्रभाव बढ़ते जाने का असर ये हुआ कि जेएनयू परिसर और छात्रावासों में होने वाली आपत्तिजनक गतिविधियों की जानकारी बाहर आने लगी। बेहद मामूली फीस होने के कारण यहां पढऩे वाले छात्रों का खर्च बहुत कम है। इसलिये वे लम्बे समय तक किसी न किसी बहाने छात्रावासों में पड़े रहते हैं। कई छात्र तो 40-45 साल के होने पर भी शोध की आड़ में वहां जमे हुए हैं। हाल ही में केंद्र सरकार ने जब शिक्षण और छात्रावास शुल्क में वृद्धि की तो छात्रों ने आन्दोलन शुरू कर दिया। अभाविप ने भी उसमें समर्थन दिया। सरकार ने काफी कुछ रियायत दे दी और आगे विचार का आश्वासन भी दिया जिसके बाद अभाविप तो आन्दोलन से अलग हो गयी लेकिन वामपंथी छात्र संगठन अड़े हुए हैं। मौजूदा विवाद के पीछे भी यही आन्दोलन है। नए सेमेस्टर हेतु छात्रों के पंजीयन की अंतिम तिथि घोषित हो चुकी थी। अधिकतर छात्र उस हेतु प्रयासरत थे किन्तु वामपंथी छात्रसंघ पंजीयन को बाधित कर परीक्षा को रोके रखना चाहते थे। रविवार 5 जनवरी को पंजीयन की आखिऱी तिथि थी। एक दिन पहले से छात्रसंघ पदाधिकारी पंजीयन करवाने आये छात्रों को रोकने का काम कर रहे थे जिस कारण छुटपुट तनाव था जो कि जेएनयू के लिए सामान्य बात है। लेकिन जब उन्हें लगा कि बहुमत उनके विरुद्ध जा रहा है तब उन्होंने पंजीयन कार्यालय की संचार व्यवस्था तहस नहस कर डाली। इसका विरोध करने वाले छात्रों को भी वामपंथियों ने धमकाया और कुछ के साथ हाथापाई किये जाने की भी खबर है। ऐसे छात्रों में अनेक ऐसे भी थे जिनका किसी राजनीतिक विचारधारा से सम्बन्ध नहीं है और वे केवल पढऩे के लिए जेएनयू में आये हैं। छात्रसंघ चुनाव में वामपंथी उम्मीदवारों को वोट देने वाले सभी छात्र उनके वैचारिक अनुयायी हैं ये मान लेना गलत है। ऐसे अनेक छात्र पंजीयन रोके जाने का विरोध कर रहे थे। नकाबपोश कौन थे, वे परिसर में कैसे घुसे, पुलिस की क्या भूमिका रही ये सब जांच का विषय हैं। हिंसा करने वाले और उसे संरक्षण देने वाले किसी भी व्यक्ति या विचारधारा का समर्थन नहीं किया जा सकता। लेकिन जेएनयू या किसी अन्य शिक्षा संस्थान में एक ही विचारधारा का पोषण किया जाना कहां तक उचित है? जेएनयू में वैचारिक स्वतंत्रता और जागरूकता अच्छी बात है लेकिन उसके नाम पर केवल साम्यवादी विचारधारा थोपने की इजाजत तो नहीं दी जा सकती। किसी विवि. में कश्मीर की आजादी और देश के टुकड़े-टुकड़े होने जैसे नारे लगाने वालों पर शिकंजा कसा जाना किस तरह से अनुचित है, ये बड़ा सवाल है। बीते रविवार जो हुआ उसके लिये यदि अभाविप जिम्मेदार है तो बेशक उसके विरुद्ध कानून सम्मत कार्रवाई होनी चाहिए लेकिन विवि की परीक्षा को बाधित करने वाले छात्रसंघ के नेताओं का कृत्य भी तो अपराध की श्रेणी में आता है। प्रौढ़ावस्था में प्रविष्ट होने के बाद भी जेएनयू में जमे बैठे अंकलनुमा छात्रों का लक्ष्य क्या है ये तो वे ही जानें किन्तु अधिकतर छात्र ऐसे हैं जो समय पर परीक्षा पास करने के बाद अपनी राह चुनना चाहते हैं। ऐसे में परीक्षा रोकने से ऐसे छात्रों का जो नुकसान होता है उसके बारे में क्या योगेन्द्र यादव और सीताराम येचुरी कभी सोचते हैं? डी. राजा की तो बेटी भी जेएनयू की छात्रा है। गत दिवस इस संस्थान के पूर्व छात्र रहे विदेश मंत्री एस.जयशंकर ने कहा भी कि वे जिस जेएनयू में पढ़े उसमें टुकड़े-टुकड़े गैंग नहीं होती थी। जयशंकर भारतीय विदेश सेवा के बेहतरीन अधिकारी माने जाते हैं। जब उन्हें मोदी सरकार में विदेश सचिव बनाया गया तब विपक्ष ने भी उनके चयन की तारीफ़  की थी। दोबारा सत्ता में आने पर नरेंद्र मोदी ने उन्हें विदेश मंत्री बना दिया। उन पर आज तक किसी विचारधारा का ठप्पा नहीं लगा। ऐसे में उनकी ताजा टिप्पणी का संज्ञान लिया जाना जरूरी है। जेएनयू का ताजा बवाल दरअसल किसी तात्कालिक घटना का नतीजा न होकर वामपंथी प्रभुत्व को मिल रही कड़ी चुनौती का परिणाम है। परिसर में सीसी कैमरे लगाने, महिला छात्रवासों में पुरुष छात्रों का बेरोकटोक प्रवेश और देर रात तक स्वछंदता के माहौल पर रोक जैसे क़दमों को अभिव्यक्ति की आजादी पर आघात मानकर प्रलाप करने वाले लोग दरअसल कुंठाग्रस्त हैं। कन्हैयाकुमार को रातों-रात राष्ट्रीय नेता बनाने की कार्ययोजना फ्लॉप हो चुकी है। गुजरात में हार्दिक पटेल का आकर्षण भी ढलान पर है। बंगाल का वामपन्थी किला मलबे में तब्दील हो चुका है। त्रिपुरा में भी साम्यवादी सत्ता पतन का शिकार हो गयी। केरल में ही उसका बचा खुचा आधार है जिसे जबरदस्त चुनौती मिलने लगी है। ऐसे में दुष्प्रचार ही एकमात्र सहारा बच रहा है, वामपंथियों के पास। रही बात बाकी पार्टियों और नेताओं की तो उनकी नीतिगत पहिचान नष्ट होने से वे भी अंधे विरोध की राह पर चल पड़ते हैं। जेएनयू में हुई मारपीट के विरोध में आसमान सिर पर उठाने वालों को इस बात का भी जवाब देना चाहिए कि विवि के सैकड़ों छात्रों को परीक्षा देने रोकने का षडयंत्र रचने वाले क्या असामाजिक तत्व नहीं हैं और उन्हें संरक्षण देना किस तरह की सियासत है? जामिया मिलिया और अलीगढ़ मुस्लिम विवि के छात्रों का बिना देर किया जेएनयू जा पहुंचना महज संयोग नहीं हो सकता।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 6 January 2020

ईरान में लगी आग से झुलस सकते हैं भारतीय हित



ऐसा लगता है पश्चिम एशिया की किस्मत में शांति से रहना नहीं है। बीते तकरीबन तीन दशक से इस्लाम के प्रभाव वाले इस इलाके में बारूदी धुंआ थमने का नाम ही नहीं ले रहा। सद्दाम हुसैन और कर्नल गद्दाफी जैसे ताकतवर नेताओं को मौत के घाट उतारने के बाद अमेरिका ने सीरिया पर निगाहें जमाईं और आईएसआईएस नामक इस्लामिक आतंकवादी संगठन को नेस्तनाबूत करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। इस संगठन के मुखिया बगदादी को ओसामा बिन लादेन के बाद सबसे खतरनाक मानकर अमेरिका ने जबर्दस्त अभियान चलाया। उसके चलते सीरिया गृहयुद्ध की चपेट में आ गया और लाखों बेगुनाह लोग मारे गए। जान बचाकर लाखों शरणार्थी यूरोप के अनेक देशों में समुद्री मार्ग से जा पहुंचे। हालात यहाँ तक बने कि रूस भी बीच में कूद पड़ा। यहाँ तक लगने लगा कि सीरिया संकट तीसरे विश्व युद्ध का कारण बन जाएगा। फ्रांस में हुए आतंकी हमले के बाद वह भी जंग में कूदा। वैसे भी सद्दाम के पतन के बाद ईराक में अमेरिका की मौजूदगी बनी हुई है। एक तरह से पश्चिम एशिया में अमेरिका ने वैसे ही हालात पैदा कर दिए जैसे साठ और सत्तर के दशक में वियतनाम में उसने बनाये थे। हालाँकि इस सबके पीछे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हेकड़ी मानी जा रही है लेकिन सही बात ये है कि उनके पहले के अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने भी पश्चिम एशिया में अपनी दादागिरी कायम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे चंद देशों के अलावा अधिकतर अरबी देश अमेरिका की हिट लिस्ट में ही रहते आये हैं। इसके पीछे दरअसल तेल का खेल बताया जाता है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पश्चिम एशिया के देशों में कच्चे तेल के कारण जो समृद्धि आई उसने इस्लामिक कट्टरता को जन्म दिया। हालांकि इसे खाद-पानी भी अमेरिका ही देता रहा। दूसरी तरफ इजरायल के पुनर्जन्म ने पश्चिम एशिया में एक स्थायी युद्धभूमि तैयार कर दी। ये बात भी सही है कि अन्य विश्व शक्तियाँ अरब जगत में उतना प्रभाव नहीं जमा सकीं। इसके पीछे उनकी अपनी समस्याएं हैं। फिलहाल अमेरिका की प्रभुत्ववादी सोच का ताजा शिकार ईरान हुआ है। बीते सप्ताह उसके एक कमांडर को अमेरिका ने मार गिराया। उस घटना के बाद ईरान भी बेहद आक्रामक हो उठा है और प्रतिक्रियास्वरूप अनेक अमेरिकी ठिकानों पर उसने भी धावा बोला है। उस वजह से पश्चिम एशिया एक बार फिर युद्ध के कगार पर खड़ा हो गया है। ईरान के साथ अमेरिका का झगड़ा काफी लंबे समय से चला आ रहा है। उसके तेल बेचने पर भी प्रतिबन्ध लगा है। अमेरिका चाहता है ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम बंद कर दे। भारत जैसे कई देशों के साथ उसका तेल को लेकर जो अनुबंध था उसे भी अमेरिका ने बाधित कर दिया। एक समय ऐसा ही उसने सद्दाम हुसैन के विरोध में ईराक के साथ किया था। वाशिंगटन का मकसद इस मामले में बेहद साफ है। वह पश्चिम एशिया की तेल संपदा पर अपना आधिपत्य ज़माने के साथ ही अरब देशों को संगठित होकर पश्चिमी जगत के मुकाबले खड़े नहीं होने देना चाहता। इसके पीछे इस्लामिक वर्चस्व को रोकना भी है। जिस अरब देश ने अमेरिकी हितों के अनुरूप नीति निर्धारित की वह तो सुरक्षित रहा लेकिन जिसने भी उसकी मर्जी के विरुद्ध जाने की हिमाकत की उसका हश्र सद्दाम हुसैन और गद्दाफी जैसा हुआ। आतंकवादी सरगना ओसामा और बगदादी ने बचने का बहुत प्रयास किया लेकिन अंतत: अमेरिका ने उन्हें निशाना बना ही लिया। ईरान के साथ उसका ताजा विवाद पूरी दुनिया के लिए चिंता का कारण बन गया है। ईरान ने भी जो जवाबी तेवर दिखाए हैं उनको देखते हुए पश्चिम एशिया की स्थिति विस्फोटक हो गई है। रूस और चीन ने राष्ट्रपति ट्रंप से जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाने की अपील की है। लेकिन ईरान ने अपने कमांडर की हत्या के बदले में जो कार्रवाई की उसके बाद अमेरिका ने अपनी फौजें पश्चिम एशिया में जमा करना शुरू कर दिया है। यदि लड़ाई छिड़ी तो ईरान कितना टिक सकेगा ये कहना कठिन है किन्तु पूरी दुनिया इस बात से भयभीत है कि वह मरता क्या न करता वाली स्थिति में कहीं परमाणु अस्त्रों का उपयोग न कर दे। लेकिन इस सबसे अलग हटकर भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो ईरान पर आई मुसीबत भारत के लिए भी बहुत भारी पड़ेगी। सस्ते तेल का अनुबंध तो अमेरिकी दबाव में पहले ही खटाई में पड़ गया। ईरान में चाबहार बंदरगाह बनाकर पाकिस्तान और चीन के ग्वादर बंदरगाह का रणनीतिक जवाब देने की भारतीय योजना भी अधर में लटक गयी। इस वजह से भारत को आर्थिक नुकसान तो हो ही रहा है लेकिन उससे भी बड़ी समस्या ईरान में कार्यरत लाखों भारतीय हैं जो युद्ध के हालात में देश लौटने को मजबूर होंगे। अमेरिका द्वारा की गई आक्रामक कार्रवाई की त्वरित प्रतिक्रियास्वरूप कच्चे तेल के दाम बढऩा अवश्यंभावी है जिसका जबर्दस्त दुष्प्रभाव पहले से मंदी की मार झेल रही भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़े बिना नहीं रहेगा। उल्लेखनीय है भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है। ईरान उसका बड़ा आपूर्तिकर्ता रहा है और उसके साथ हमारे कारोबारी और कूटनीतिक रिश्ते भी बहुत ही आत्मीय रहे हैं। ऐसे में अमेरिका द्वारा उत्पन्न संकट में भारत को बहुत ही संतुलित दृष्टिकोण के साथ आगे बढऩा पड़ रहा है। अमेरिका के साथ भी मोदी सरकार ने काफी अच्छे सम्बन्ध विकसित कर लिए हैं। ये देखते हुए विदेश नीति के लिए भी यह कठिन परीक्षा की घड़ी है। क्योंकि हमारे आर्थिक और कूटनीतिक हितों के साथ ही लाखों भारतीय अप्रवासियों का भविष्य भी इस संकट से प्रभावित होगा। ईरान और अमेरिका दोनों से मधुर रिश्तों के बाद भी भारत इस स्थिति में नहीं है कि वह दोनों के बीच सुलह करवा सके। अमेरिका में इस वर्ष राष्ट्रपति चुनाव होना है। डोनाल्ड ट्रंप दोबारा मैदान में उतरने के लिए प्रयासरत हैं। ऐसे में वे इस संकट में पीछे नहीं हटेंगे। लेकिन नौबत युद्ध की आती है या केवल छुटपुट तनाव बना रहेगा ये कोई नहीं बता सकता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर को समूचे घटनाक्रम पर पैनी नजर रखनी होगी क्योंकि ईरान में लगी आग से भारतीय हितों के झुलसने का खतरा भी कम नहीं है। इस्लाम के नाम पर होने वाला आतंकवाद नए सिरे से सामने आ जाये तो भी कोई आश्चर्य नहीं होगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 4 January 2020

बढ़ती महंगाई में सस्ता होता इंसान



वैसे तो देश और दुनिया के इतने विषय हैं जिन पर लम्बे आलेख लिखे जा सकते हैं लेकिन राजस्थान के कोटा शहर में बीते एक महीने में सौ से अधिक बच्चों की मौत को लेकर जो ठंडा रवैया अख्तियार किया जा रहा है वह इस बात का इशारा करता है कि हमारी संवेदनाएं किस हद तक मर चुकी हैं। सरकारी अस्पताल में ऑक्सीजन की पर्याप्त आपूर्ति नहीं होने से ही अधिकतर मौतें होना बताया जा रहा है। इसी तरह अस्पताल में लगी सभी वैन्टीलेटर मशीनों में कुछ ही काम कर रही थीं। लगातार हो रही मौतों के बाद भी राज्य के चिकित्सा मंत्री कल अस्पताल पहुंचे और 15 जनवरी तक समूची व्यवस्था को सुधारने का आश्वासन देकर लौट गए। इसी बीच मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने ये कहकर विवाद खड़ा कर दिया कि सर्दी में तो बच्चे मरते ही हैं। गत दिवस उन्हें ये कहते सुना गया कि बीते एक साल में केवल 900 बच्चों की मृत्यु हुई जबकि उसके पहले के सालों में 1000 मरा करते थे। ऐसी घटनाओं पर राजनीति न हो ये नामुमकिन है। सो, विपक्ष अपना कर्तव्य निभा रहा है। चिकित्सा मंत्री और मुख्यमंत्री से त्यागपत्र मांगते हुए धरना प्रदर्शन आदि जारी है। समाचार माध्यमों में आलोचना हो रही है जिससे बचने के लिए सत्तारूढ़ लोग उप्र के गोरखपुर जिले में हुईं बच्चों की मौतों का उल्लेख करना नहीं भूलते। कोटा लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला का निर्वाचन क्षेत्र होने से केंद्र से भी विशेषज्ञों का दल पहुंचने की जानकारी आई। 130 करोड़ के इस देश में महंगाई की दर चाहे कितनी भी बढ़ जाए लेकिन इंसानी जि़न्दगी दिन ब दिन सस्ती होती चली जा रही है। कोटा हो या गोरखपुर सभी जगह इस तरह की थोक मौतों का शिकार गरीब परिवार ही होते हैं। इसकी मुख्य वजह वे परिस्थितियां हैं जिनमें उन्हें रहना पड़ रहा है। गोरखपुर से मिली जानकारी के अनुसार सुअरों की वजह से फैलने वाली एन्सीफ्लाइटिस नामक बीमारी के कारण प्रतिवर्ष वहां बड़े पैमाने पर मौतें होती हैं। ये सिलसिलाया बरस दर बरस चला आ रहा है। जब बात ज्यादा बाढ़ जाती है तब कुछ समय के लिए होहल्ला मचता है और फिर बात आई गई हो जाती है। प्रभावित परिवारों को मुआवजा बांटकर सरकार अपना पल्ला झाड़ लेती है और जाँच वगैरह बिठाकर लोगों का गुस्सा ठंडा करते हुए दो चार को निलम्बित कर प्रशासनिक दृढ़ता दिखाई जाती है। इस दौरान कोई बड़ी घटना होने के बाद लोगों का ध्यान उस तरफ घूम जाता है। कोटा के हादसे के बाद भी यही होगा। और सरकार अगले साल मौतों के आंकड़ें में कमी का ढिंढोरा पीटकर अपनी पीठ ठोंकने में जुटी रहेगी। आजादी के सात दशक से ज्यादा बीत जाने के बाद भी देश के किसी न किसी हिस्से में इस तरह थोक के भाव लोगों का मर जाना शर्मनाक भी है और दुखदायी भी। एक तरफ  तो देश में चिकित्सा पर्यटन (मेडीकल टूरिज्म) के विकास की बात होती है जिसके अंतर्गत विदेशियों को इलाज के लिए आकर्षित करने का प्रचार करते हुए देश में चिकित्सा सुविधाओं के विश्वस्तरीय होने का दावा भी किया जाता है लेकिन दूसरी तरफ  कभी गोरखपुर तो कभी कोटा में इलाज के अभाव में सैकड़ों बच्चे मौत के मुंह में चले जाते हैं। बीती गर्मियों में बिहार में चमकी बुखार से हुई मौतों ने बवाल मचाया था। सफाई में कहा गया कि लीची खाने से प्रतिवर्ष ऐसा होता है। नीतीश सरकार भी कठघरे में खड़ी की गई किन्तु दोबारा वह हादासा नहीं दोहराया जाएगा इस बात की गारंटी कोई नहीं दे सकता। प्रश्न ये है कि ये सिलसिला कभी रुकेगा या नहीं ? विकास के नए-नए दावों के बीच ये बात समूची व्यवस्था के माथे पर कलंक है कि देश की बड़ी आबादी जानवरों से भी बदतर हालातों में रहने मजबूर है। एक तरफ  तो प्रधानमन्त्री ने गरीबों को 5 लाख तक की मुफ्त चिकित्सा जैसी सुविधा प्रदान की है वहीं दूसरी तरफ  जिला स्तर के अस्पतालों में प्राथमिक चिकित्सा तक का समुचित इंतजाम नहीं है। गोरखपुर में हुए हादसे के दौरान भी अस्पताल में आक्सीजन की कमी की बात सामने आई थी। जब जिला अस्पतालों में ये बदहाली है तब और भी निचले स्तर पर क्या हालात होंगे इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। पांच लाख तक के नि:शुल्क इलाज की सुविधा बहुत ही अच्छी है लेकिन जब अस्पतालों में इलाज का इंतजाम ही नहीं होगा तब योजना का क्या लाभ? मुख्यमंत्री और चिकित्सा मंत्री से त्यागपत्र मांगने वाले विपक्ष को भी तो अपने गिरेबान में झांककर देखना चाहिए। क्योंकि राजस्थान में साल भर पर पहले तक तो वही सत्ता में था और व्यवस्थाएं कोई एक दिन में तो सुधरती और बिगड़ती नहीं हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 3 January 2020

विडंबना : किसान उगाए - सरकार सड़ाए



बीते कुछ दिनों से देश के अनेक हिस्सों में बारिश हो रही है। पहाड़ों पर बर्फबारी के बाद मैदानी इलाकों में कोहरा और बरसात इस मौसम में होती ही है। उधर दक्षिण भारत में तो शीतकालीन वर्षा (विंटर मानसून) प्रकृति चक्र का स्थायी हिस्सा है। शीतऋतु का आनंद उठाने वालों के लिए तो कुदरत के ये नजारे सुखद होते हैं लेकिन इसका नुकसान खेती के साथ सरकार द्वारा खरीदे गए अनाज के खराब होने के रूप में भी देखने मिलता है। आज आई जानकारी के अनुसार बीते दो-तीन दिनों की बरसात में ही मप्र के अनेक हिस्सों में सरकार द्वारा समर्थन मूल्य पर खरीदी गयी लगभग 150 करोड़ रूपये की धान खराब हो गयी। इसका कारण नया नहीं है। प्रतिवर्ष देश भर से आने वाली खबरों के अनुसार रबी और खरीफ  दोनों ही फसलों के बाद सरकार द्वारा किसानों से खरीदे गए अनाज की बड़ी मात्रा महज इसलिए खराब हो जाती है क्योंकि उसका ठीक तरह से भंडारण नहीं होने के कारण वह खुले में पड़ा रहता है। आज़ादी के कुछ वर्षों बाद देश में अनाज की कमी के चलते हरित क्रांति का सूत्रपात करते हुए खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भरता तो हासिल कर ली गयी लेकिन भंडारण क्षमता में वृद्धि के बारे में समय रहते नहीं सोचा गया। सार्वजानिक वितरण प्रणाली (राशन दूकान) एवं सूखा आदि की स्थिति से निबटने के लिए देश में अनाज का सुरक्षित भंडार रखने के उद्देश्य से सरकार किसानों से सीधे अनाज खरीदकर गोदामों में रखती है। पहले केवल भारतीय खाद्य निगम के पास ही अपनी गोदामें हुआ करती थीं। लेकिन जब वे अपर्याप्त पडऩे लगीं तब निजी क्षेत्रों को बैंकों से कर्ज दिलवाकर गोदामें बनवाने की पहल भी हुई। बावजूद इसके भंडारण क्षमता का अपेक्षित विकास नहीं होने से सरकार द्वारा खरीदा गया अनाज खुले मैदान में रखे रहने पर बारिश में भीगकर खराब हो जाया करता है। बड़े-बड़े चबूतरों पर टीन शेड बनाकर तिरपाल से उन्हें ढंककर रखने का इंतजाम भी बदहाली का शिकार होने से साल दर साल सोना कहलाने वाला अनाज या तो सड़ जाता है या उसकी गुणवत्ता कम हो जाती है। गोदामों के भीतर रखे अनाज को चूहों द्वारा कुतर दिए जाने की खबरें तो आम है ही किन्तु गोदाम के भीतर जाने के पहले ही बरसाती पानी से उनका खराब हो जाना भी नियमित घटना बन गयी है। निजी गोदामों को किराये पर लेने की जो व्यवस्था है वह भी सरकारी ढर्रे का शिकार है। समय पर गोदाम मालिकों का भुगतान नहीं होने से वे भी परेशान होकर रह जाते हैं। अनेक ऐसे गोदाम मालिक हैं जिन्हें सरकार से समय पर किराया नहीं मिलने की वजह से उन पर बैंक का कर्ज और ब्याज बेतहाशा बढ़ गया। गोदामों के आवंटन में भी भारी भ्रष्टाचार है। सरकारी अधिकारी इस काम में जमकर पैसे खाते हैं। राजनीतिक तौर पर प्रभावशाली लोग तो अपने रसूख से किराया वसूलने में सफल हो जाते हैं लेकिन दीगर गोदाम मालिकों को नौकरशाही खून के आंसू रुलाने से बाज नहीं आती। ये सिलसिला निरंतर जारी है। किसान धूप में पसीना बहाकर जो अनाज उगाता है वह सरकारी खरीद के बाद धूप  और पानी में पड़े रहने से बर्बाद होता है। हरित क्रांति के समय ही यदि बढ़ते उत्पादन के समुचित भंडारण का प्रबंध किये जाने के बारे में सोचा गया होता तब इस विसंगति से बचा जा सकता था। बीते कुछ दशकों में किसानों ने अनाज से इतर फल और सब्जियों के उत्पादन पर भी काफी ध्यान दिया लेकिन भंडारण और प्रसंस्करण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने से उनकी उपलब्धि का सही लाभ उन्हें और देश दोनों को नहीं मिल पाता। करोड़ों रूपये के फल और सब्जियां इस वजह से नष्ट हो जाते हैं। 21 वीं सदी के भारत में एक तरफ  तो चाँद और मंगल को छूने जैसी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने की ललक और आत्मविश्वास हिलोरें मारता दिखाई देता है वहीं दूसरी तरफ  धरती की उर्वरा शक्ति से अर्जित अन्न, फल और सब्जियों के सुरक्षित भंडारण और उनके प्रसंस्करण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने से किसानों की मेहनत पर पानी फिर जाता है। भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है। बीते कुछ दशकों में किसानों ने उत्पादन बढ़ाने में उल्लेखनीय योगदान दिया। लेकिन ये कहना पूरी तरह से सही है कि इसका पूरा-पूरा लाभ देश को नहीं मिल पा रहा। वैसे तो हर सरकार भंडारण और प्रसंस्करण को प्रोत्साहित करने का इरादा व्यक्त करती है किन्तु उस पर अपेक्षित अमल नहीं हो पाने से आगे पाट पीछे सपाट की स्थिति बरकरार है। इसका लाभ सरकारी अमला भी जमकर लेता है जो खराब होने वाले खाद्यान्न के अतिरंजित आंकड़े प्रचारित कर अपना और अपने राजनीतिक संरक्षकों की तिजोरियां भरता है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 2 January 2020

वोट वासना से अर्थव्यवस्था की मुक्ति जरूरी




केंद्र सरकार 6 करोड़ किसानों के खाते में आज 2-2 हजार रूपये जमा करेगी। इस प्रकार कुल 12 हजार करोड़ रूपये का भार खजाने पर आयेगा। इसके पहले कल ही रेल किराये में कुछ पैसे की वृद्धि किये जाने के साथ ही गैर सब्सिडी वाले घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत में बढ़ोतरी कर दी गयी। मप्र सरकार कर्मचारियों को 5 फीसदी महंगाई भत्ता देने जा रही है। साथ ही विधान परिषद के गठन का प्रस्ताव भी केंद्र को भेजा जा रहा है। बीते माह जीएसटी का संग्रहण लगातार दूसरे महीने एक लाख करोड़ का आँकड़ा पार कर गया जिससे सरकार की जान में जान आई। आगामी बजट में आयकर की दरें घटाने की संभावनाओं पर विराम लग रहा है। सरकार के भीतरखानों में चल रही चर्चाओं के अनुसार कारपोरेट टैक्स घटाए जाने से राजस्व में आई कमी के कारण वित्त मंत्री और दरियादिली नहीं दिखा सकेंगीं। सरकार की उम्मीदें एयर इंडिया सहित सार्वजानिक क्षेत्र के कुछ उद्यमों के विनिवेश (बेचने) पर टिकी हैं। लेकिन इस दिशा में अभी तक मिले संकेत बहुत आशा नहीं जगाते। बहरहाल अच्छे मानसून की वजह से कृषि क्षेत्र से अच्छी खबर आने की उम्मीद से अर्थव्यवस्था के लडख़ड़ाते कदमों के सम्भलने की संभावना जताई जा रही है। नई नौकरियों के सृजन के साथ ही वेतन वृद्धि की उम्मीद भी आर्थिक विशेषज्ञ व्यक्त कर रहे हैं। बावजूद इसके आम जनता को बहुत ज्यादा राहत मिलने की उम्मीद इसलिए नहीं है क्योंकि अभी तक जीएसटी के ढांचे को लेकर चली आ रही अनिश्चितताएं खत्म नहीं हुईं। आये दिन कोई न कोई नया नियम या फार्म आ जाता है। जिन कारोबारियों ने जीएसटी समय पर जमा कर दिया है उन्हें भी इनपुट के्रडिट का लाभ नहीं मिल रहा। सरकार के पास पैसा नहीं होने से इन्फ्रा स्ट्रक्चर के तमाम काम रुके पड़े हैं। राज्यों की हालत तो और भी खराब है। मप्र सरकार ने दो दिन पहले ही एक हजार करोड़ का कर्ज फिर ले लिया। चुनावी वायदे के मुताबिक किसानों के कर्ज माफ़  करने का काम अभी तक ठीक तरह से आकार नहीं ले सका। जिन राज्यों के विधानसभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन होता है वहां नई सरकार पिछली सत्ता पर खजाना खाली कर जाने का आरोप तो लगाती है परन्तु उसकी अपनी नीतियाँ भी आर्थिक हालात सुधारने की बजाय मुफ्तखोरी बढ़ाने वाली होने से हालत और भी चिंताजनक हो जाती है। दरअसल जब सरकार के पास पर्याप्त धन नहीं है तब उसे बेकार की रईसी दिखाने से बचना चाहिए। किसानों, कर्मचारियों, निराश्रित बुजुर्गों और गरीबों को मिलने वाली सौगातों से किसी को तब तक कोई ऐतराज नहीं होता जब तक उसका बोझ किसी दूसरे के कंधों पर नहीं आये। दुर्भाग्य से सता में बैठे लोगों की मानसिकता तदर्थ व्यवस्थाओं पर आकर सिमट गई है। होना तो यह चाहिए कि जितनी चादर हो उतना ही पैर पसारा जाए लेकिन यहाँ तो पाँव खाट से बाहर आने वाली नौबत है। प्रश्न ये है कि राजनीतिक पार्टियों को अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए सरकारी खजाने की लूटमार का अधिकार आखिर कब तक दिया जाता रहेगा? जरुरतमंदों की मदद करना किसी भी लोक कल्याणकारी शासन व्यवस्था की जिम्मेदारी है लेकिन उसके साथ ही ये भी देखा जाना चाहिए कि उस हेतु समुचित संसाधन हैं भी या नहीं ? यही स्थिति विकास कार्यों के सम्बन्ध में है। उनकी आड़ में होने वाले भ्रष्टाचार पर तो किसी का नियंत्रण नहीं है जिसकी वजह से आने वाली पीढिय़ों पर कर्ज चढ़ रहा है। सुरक्षा के क्षेत्र की तो अनदेखी नहीं की जा सकती इसलिए उस पर चाहे-अनचाहे व्यय करना ही पड़ता है किन्तु शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बेहद जरूरी क्षेत्रों की उपेक्षा बदस्तूर जारी है। मोदी सरकार ने पिछले कार्यकाल में गरीबों को 5 लाख तक के मुफ्त इलाज की जो सुविधा दी उसके औचित्य और उपयोगिता को तो स्वीकार करना ही पड़ेगा लेकिन वह गरीबों से ज्यादा निजी अस्पतालों की कमाई में सहायक साबित हुई है। कहने का आशय ये है कि सरकारी क्षेत्र का समूचा आर्थिक प्रबंधन चूंकि राजनीतिक हित संवर्धन पर टिका हुआ है इसलिए उसमें सच्चाई से आँखें मूंदने की गलती दोहराई जा रही है। भारत के बैंकिंग उद्योग का सत्यानाश करने में भी सत्ताधीशों की वोट वासना ही सर्वाधिक जिम्मेदार है। न सिर्फ  छोटे अपितु बड़े कर्ज भी राजनीतिक दबावों के चलते नियमों को शिथिल करते हुए बंटवाये गए जिसका नतीजा माल्या और नीरव मोदी के रूप में देश को झेलना पड़ रहा है। कुल मिलाकर आज की स्थिति में देश एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहां उसे अपनी आर्थिक दिशा दूरगामी सोच के अनुसार तय करनी होगी। चुनाव जीतने के लिए की जाने वाली मार्केटिंग अपनी जगह है लेकिन उसके लिए सरकारी खजाना लुटाने की छूट बंद होनी चाहिए। सरकार में बैठे लोग मुफ्तखोरी को बढ़ावा देकर अपना उल्लू तो सीधा कर ले जाते हैं लेकिन उसका भार उन ईमानदार करदाताओं पर पड़ता है जिनके प्रति सरकार पूरी तरह बेरहम है। इस बारे में किसी एक पार्टी को दोषी ठहराना न्यायोचित नहीं होगा क्योंकि सभी एक ही दिशा में बढ़ रही हैं। बेहतर होगा आर्थिक प्रबन्धन के समूचे ढांचे को व्यवहारिक रूप देते हुए सरकार की कर नीति को अस्थिरता और अनिश्चितता से मुक्त किया जाए। यदि ऐसा नहीं किया जाता तब आर्थिक अराजकता की आशंका दिन ब दिन प्रबल होती जायेगी। कड़े निर्णय बिल्ली के गले में घंटी बांधने जैसा है लेकिन किसी न किसी को तो वह करना ही पड़ेगा। 21 वीं सदी का बीसवां वर्ष शुरू हो गया है। दुनिया कहाँ से कहाँ जा पहुँची है और हम हैं कि दिन रात बस वोट के फेर में उलझे हुए हैं। राजनीति और अर्थशास्त्र रेल की पटरी की तरह एक साथ चलते हैं लेकिन उनके बीच सदैव एक निश्चित दूरी रखी जाती है। उसमें थोड़ी सी भी घट-बढ़ दुर्घटना का कारण बन जाती है। भारतीय अर्थव्यवस्था के गड़बड़ाने का कारण पटरियों के बीच की दूरियों में अंतर आना ही है। जब तक हमारे राजनेता इस वास्तविकता को समझकर उसे दुरुस्त नहीं करते तब तक एक कदम आगे दो कदम पीछे वाली हालत जारी रहेगी।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 1 January 2020

2020 : अर्थव्यवस्था पर केन्द्रित हो



बीता वर्ष 2019 बड़ी घटनाओं से भरा हुआ रहा। लोकसभा चुनाव के जरिये एक बार फिर मोदी सरकार का नारा साकार हुआ और भाजपा ने 300 का आंकड़ा पार करते हुए भारतीय राजनीति में कांग्रेस के बाद पहले ऐसे राजनीतिक दल के तौर पर खुद को स्थापित किया जिसे अपने दम पर लोकसभा में स्पष्ट बहुमत हासिल हो सका। मतदाताओं के उस फैसले ने सरकार को वह सब करने का हौसला दिया जिसे लगभग असंभव मान लिया गया था। जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 35 ए तथा 370 की विदाई जिस अंदाज में हुई वह किसी कारनामे से कम नहीं था। इसी तरह अयोध्या का सैकड़ों वर्ष पुराना विवाद भी सर्वोच्च न्यायालय ने जिस तरह निपटाया वह भी ऐसी घटना है जिसे इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान मिले बिना नहीं रहेगा। इसके पहले तीन तलाक पर रोक जैसे संवेदनशील मामले में भी केंद्र सरकार को संसद में जो समर्थन मिला वह बड़ी उपलब्धि थी। इन सब वजहों से विपक्ष पूरी तरह निहत्था और बेबस होकर रह गया। प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी अपनी पार्टी के मूलभूत मुद्दों को अमल में लाने के कारण एक महानायक के तौर पर उभरे। निश्चित ही इन सबकी वजह से उनका मनोबल ऊंचा हुआ जिसका प्रमाण नागरिकता संशोधन विधेयक को पारित करवाकर कानून बनवाने के रूप में सामने आया। वर्ष 2019 के अंत में इस मुद्दे पर सरकार को संसदीय मोर्चे पर जो विजय मिली उससे विपक्षी दलों में ये भय व्याप्त हुआ कि भाजपा और श्री मोदी के विरुद्ध मोर्चेबंदी नहीं की गयी वे वह अप्रासंगिक होकर रह जाएंगे। और उसके बाद जो कुछ हुआ और हो रहा है वह देश के सामने है। यद्यपि केंद्र सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति के चलते ये मानना गलत नहीं होगा कि अंतत: इस मुद्दे पर भी विपक्ष को विफलता ही हाथ लगेगी क्योंकि मामला कानूनी से ज्यादा एक समुदाय विशेष पर आकर केन्द्रित हो गया। बीते वर्ष में लोकसभा की धमाकेदार जीत के बाद भी भाजपा ने दो राज्य गंवाए। लेकिन सबसे बड़ी बात हुई शिवसेना से उसका अलगाव। आने वाले कुछ महीनों में भाजपा को दिल्ली और बिहार जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। मौजूदा राजनीतिक हालातों में उसके लिए इनसे निपटना बेहद कठिन लागता है। ये बात भी सही है कि भाजपा का दबदबा उसके सहयोगी दलों पर अब पहले जैसा नहीं रहा। दिल्ली में न सही लेकिन बिहार में जरुर उसे नीतिश कुमार जैसे अनुभवी नेता से जूझना होगा। बंगाल में भी ममता बैनर्जी एक बड़ी चुनौती केंद्र के लिए हैं। नागरिकता संशोधन और उसके बाद राष्ट्रीय जनसँख्या रजिस्टर को लेकर अनेक गैर भाजपा शासित राज्यों की सरकारें जिस तरह से टकराहट के मूड में हैं उसे देखते हुए 2020 में देश की राजनीति को अप्रत्याशित घटनाचक्र से गुजरना पड़ सकता है लेकिन राजनीति से अलग हटकर सबसे बड़ी चुनौती देश और सरकार के सामने अर्थव्यवस्था की चिंताजनक स्थिति है। सरकार और विपक्ष दोनों के बीच चलने वाली रस्साकशी को एक बार छोड़ भी दें तो ये मान लेने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि बीते वर्ष देश का आर्थिक माहौल निराश करने वाला रहा। इसके लिए भले ही वैश्विक हालातों को जिम्मेदार मानकर मन को संतोष दे दिया जाये किन्तु केंद्र सरकार जिस तरह से अपनी उपलब्धियों का श्रेय लूटने में कंजूसी नहीं करती ठीक वैसे ही उसे आर्थिक मोर्चे पर छाई निराशा की जिम्मेदारी भी लेना चाहिए। मंदी की बजाय इसे आर्थिक सुस्ती माना जाए तब भी ये तो कहना ही पड़ेगा कि अच्छे दिन और सबका विकास जैसे नारे भी 1971 के गरीबी हटाओ के वायदे की कतार में आ खड़े हुए हैं। आर्थिक विशेषज्ञ और उद्योग जगत ये स्वीकार कर रहा है कि सरकार और रिजर्व बैंक द्वारा उठाये गये कतिपय क़दमों से अर्थव्यवस्था की बदहाली दूर होने का रास्ता खुल गया है लेकिन इसमें कितना वक्त लगेगा ये दावे के साथ चूंकि कोई भी नहीं बता पा रहा इसलिए आम जनता के मन में घबराहट बढ़ती जा रही है। बैंकों की गिरती सेहत भी बड़ी चिंता का विषय है। नया रोजगार तो दूर की बात है उलटे नौकरी में लगे लोगों का काम छिन रहा है। सरकार कुछ नहीं कर रही ये कहना तो गलत होगा परन्तु उसकी कोशिशों का असर दिख नहीं रहा ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है। लोगों की ये अपेक्षा भी सही है कि प्रधानमंत्री अर्थव्यवस्था की स्थिति को लेकर देश से संवाद करें। जहां तक बात वित्त मंत्री द्वारा दी जाने वाली सफाई और आश्वासनों की है तो इस सरकार के बारे में ये धारणा पूरी तरह स्थापित हो चुकी है कि हर महत्वपूर्ण फैसला प्रधानमंत्री कार्यालय से ही होता है। इसलिए बेहतर हो अर्थव्यवस्था पर श्री मोदी राष्ट्र से मुखातिब हों और अपनी सरकार की कार्ययोजना प्रस्तुत करें। प्रधानमन्त्री के बारे में अभी भी जनमानस में भरोसा कायम है। बेहतर हो वे 2020 को अर्थव्यवस्था केन्द्रित रखते हुए प्राथमिकताएँ तय करें। दूरगामी उपायों की अपनी अहमियत है लेकिन आम जनता के लिए कुछ ऐसा भी किया जाना चाहिए जिससे तत्काल राहत मिले। आर्थिक क्षेत्र में तथाकथित सुधारों की चर्चा बीते तीन दशक से चली आ रही है लेकिन उसके परिणामों के बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं है। प्रधानमन्त्री को चाहिए कि वे उद्योग व्यापार जगत की परिशानियों को हल करने के लिए बेशक जरूरी कदम उठायें लेकिन आम जनता की क्रय शक्ति बढ़ाये बिना आर्थिक विकास का कोई भी लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता। भारत पर निगाह रखे हुए आर्थिक विशेषज्ञ भी मान रहे हैं कि यहाँ का घरेलू उपभोक्ता बाजार ही इतना विशाल है कि बिना निर्यात किये भी भारत के उद्योगों का समूचा उत्पादन घरेलू बाजार में ही खप सकता है। इसलिए जिस तरह सरकार उद्योग व्यापार को बढ़ावा देने के लिए तरह-तरह की सुविधाएँ और रियायतें देती है ठीक उसी तरह आम करदाता का बोझ भी कम किया जाना चाहिए जो कि भारतीय अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाये रखने में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भाजपा का उत्थान भी जिस मध्यमवर्ग के बूते हुआ वही आज के माहौल में सबसे ज्यादा परेशान है। छोटी पूंजी वाले व्यापारी को भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। यदि मोदी सरकार 2020 में भारत के विशाल मध्यमवर्ग और घरेलू बाजार पर ध्यान केन्द्रित करते हुए नीतियों का निर्धारण और क्रियान्वयन करे तब उसके राजनीतिक फैसलों पर उठने वाले सवाल भी बेमानी होकर रह जायेंगे। दोबारा सत्ता में आने के बाद कुछ महीनों के भीतर ही प्रधानमन्त्री ने अपनी निर्णय क्षमता और दृढ़ता का जो परिचय दिया वैसा ही कुछ आर्थिक मोर्चे पर किया जाना समय की मांग है। रही बात दुनिया भर के विशेषज्ञों की टीका-टिप्पणियों की तो ये बात पक्के तौर पर समझ लेना चाहिए कि भारत की समस्याओं का इलाज घर में ही मौजूद है। उसके लिए किराये के आयातित दिमागों की जरुरत नहीं है।

- रवीन्द्र वाजपेयी