Friday, 17 January 2020

संजय राउत ने बयान पलटा लेकिन बात नहीं



शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत राजनेता होने के अलावा पार्टी के मुखपत्र सामना के संपादक भी हैं। लेकिन उनकी प्रसिद्धि विवादास्पद बयानों और तीखी टिप्पणियों से ही है। महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबन्धन टूटने में उनकी बयानबाजी को भी एक कारण माना जाता है। हालाँकि ये कहना गलत नहीं होगा कि संजय महज एक मोहरे हैं जिन्हें आगे बढ़ाकर ठाकरे परिवार अपनी चालें चला करता है। उनके पहले के प्रवक्ता भी सामना के संपादक रहे। इनमें एक संजय निरुपम कांग्रेस में जा घुसे और दूसरे प्रेम शुक्ल भाजपा में। बीते काफी समय से श्री राउत, ठाकरे परिवार के बाद शिवसेना के सबसे मुखर नेता के रूप में सामने आये। वे राज्यसभा सदस्य भी हैं। पिछले विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा और शिवसेना में मुख्यमंत्री पद को लेकर छिड़ी जंग में उनकी शेरो-शायरी युक्त टिप्पणियाँ सुखिऱ्यों में रहीं। ये कहना भी काफी हद तक सही है कि भाजपा उनके बयानों के सामने निरीह नजर आई। लेकिन उद्दव ठाकरे के मुख्यमंत्री बनने के बाद श्री राउत की बयानबाजी ठंडी पड़ गई। ये माना जाने लगा कि उद्धव के मुख्यमंत्री बन जाने के बाद शिवसेना ने अपने प्रवक्ता को वाणी पर संयम रखने की हिदायत दे दी। लेकिन हाल ही में कुछ ऐसी राजनीतिक घटनाएँ हुईं जिनके बाद शिवसेना अपनी मौलिक शैली पर लौटती दिख रही है। गत 13 जनवरी को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा आयोजित विपक्षी दलों की बैठक में शिवसेना को आमंत्रण नहीं मिला। उसके पहले वीर सावरकर के विरुद्ध कांग्रेस के कतिपय नेताओं द्वारा छेड़े गये अभियान पर भी शिवसेना कड़ा ऐतराज जता चुकी थी। यही नहीं तो महाराष्ट्र सरकार में कांग्रेस के कुछ मंत्री उद्धव ठाकरे से मिलकर महत्वहीन मंत्रालय मिलने पर नाराजगी भी जता चुके थे। कहते हैं उस दौरान काफी गर्मागर्म वार्तालाप भी हुआ। शिवसेना की मुसीबत ये है कि भले ही मुख्यमंत्री की कुर्सी उसके पास हो लेकिन सत्ता के असली सूत्र एनसीपी प्रमुख शरद पवार के पास ही हैं। लेकिन वह चाहकर भी उनके विरुद्ध कुछ नहीं कह पाती। सावरकर संबंधी बयानबाजी में भी एनसीपी कांग्रेस के साथ नहीं दिखी। ऐसे में शिवसेना ने कांग्रेस को कमजोर गोटी मानकर उस पर निशाना साधने की रणनीति अपनाई और उसी के अंतर्गत दो-तीन दिन पहले ऐसा बयान दे दिया जिससे कांग्रेस पूरी तरह तिलमिला गयी। श्री राउत ने पुणे में एक भाषण के दौरान आज के माफिया सरगनाओं को बौने कद का बताते हुए कह दिया कि हाजी मस्तान के आने पर लोग खड़े हो जाया करते थे। लेकिन उनके इस बयान ने तहलका मचा दिया जिसमें प्रधानमन्त्री रहते हुए इंदिरा गांधी के माफिया डॉन करीम लाला से मिलने आने की बात थी। स्मरणीय है करीम एक ज़माने में मुम्बई में अपराध की दुनिया का बेताज बादशाह हुआ करता था। इस बयान के कारण कारण कांग्रेस सकते में आ गयी। और समय होता तब कांग्रेस ही नहीं बल्कि दीगर लोग भी श्री राउत की बात को राजनीतिक स्टंट बताकर उपेक्षित कर देते लेकिन ऐसे समय जब महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की कुर्सी कांग्रेस की बैसाखी पर टिकी हुई है, उनकी पार्टी के प्रवक्ता द्वारा इतना सनसनीखेज बयान देना साधारण बात नहीं मानी जा सकती। हालाँकि कांग्रेस द्वारा बेहद तीखी प्रतिक्रिया के बाद उन्होंने बयान वापिस ले लिया लेकिन उसका खंडन करने की बजाय ये और जोड़ दिया कि इंदिरा जी करीम लाला के पठान नेता होने के कारण उससे मिलने जाती थीं। लेकिन तब तक सोशल मीडिया सहित दूसरे माध्यमों ने लाला की आपराधिक गतिविधियों का चि_ा खोल दिया। इंदिरा जी के साथ उसके चित्र भी प्रसारित हो गए। सवाल ये है कि संजय ने ये सब जान बूझकर किया या अनजाने में। क्योंकि अब तक उद्धव ठाकरे या अन्य किसी और शिवसेना नेता ने उस बयान के समर्थन या विरोध में कुछ नहीं कहा। कुछ लोगों का ये भी मानना है कि श्री राउत को महाराष्ट्र में शिवसेना की सरकार बनवाने में निभाई गयी महत्वपूर्ण भूमिका के बाद भी खाली हाथ रह जाने का रंज है। और वे विघ्नसंतोषी के तौर पर सामने आकर खुद को स्थापित करने में जुट गये हैं। गौरतलब है उनका नाम संभावित मुख्यमंत्री के तौर पर भी उभरा था। हालाँकि इस बात को भी नहीं नकारा जा सकता कि पार्टी प्रवक्ता के मुंह से विवादास्पद बयान दिलवाकर उद्धव ठाकरे कांग्रेस को सन्देश देना चाहते हैं कि वह उनकी उपेक्षा और वीर सावरकर की चरित्र ह्त्या का दुस्साहस करेगी तो उसे उसी शैली में जवाब मिलेगा। सच्चाई जो भी हो लेकिन श्री राउत ने अपना बयान वापिस लेने के बाद भी इंदिरा जी और करीम लाला की मुलाकात का खंडन नहीं किया। उनके ये कह देने से कि वे उससे पठान नेता के रूप में मिलती थीं, पूर्व में दिए बयान में छिपा आरोप नष्ट नहीं होता। अब गेंद कांग्रेस की पारी में है। उसे ये स्पष्ट करना चाहिए कि इन्दिरा जी करीम लाला से किस वजह से मिलती थीं? इंदिरा जी जैसी शक्तिशाली कही जाने वाली नेत्री किसी तस्कर की छवि वाले व्यक्ति से क्यों मिलती थीं ये निश्चित रूप से रहस्यमय है। भले ही श्री राउत ने कांग्रेस की आपत्ति के बाद अपने बयान को वापिस ले लिया किन्तु उनकी संशोधित टिप्पणी में भी पूर्व प्रधानमंत्री पर आक्षेप यथावत है। राजनीति के जानकार शिवसेना प्रवक्ता की बात का विश्लेषण कर रहे हैं। कुछ को लग रहा है कि उद्धव ठाकरे को कांग्रेस के साथ रहना असहज लगने लगा है। दरअसल दोनों एक दूसरे को पचा नहीं पा रहे हैं। बड़ी बात नहीं ठाकरे परिवार कांग्रेस को छेड़कर दोबारा भाजपा के साथ गलबहियां करने की कार्ययोजना में जुट गया हो। कांग्रेस द्वारा सावरकर के विरुद्ध की गई बयानबाजी के बाद विपक्ष की बैठक में शिवसेना को न्यौता नहीं दिया जाना और उसके बाद संजय राउत द्वारा इंदिरा जी का अपराधिक छवि के व्यक्ति से मिलने का खुलासा साधारण बातें नहीं है। इनके पीछे छिपे राजनीतिक मंतव्य भी देर-सवेर सामने आ जायेंगे। फिलहाल तो कांग्रेस को सांप-छछूदर वाली स्थिति से गुजरना पड़ रहा है क्योंकि श्री राउत के दोनों बयानों में एक बात शामिल है कि इंदिरा जी उस करीम लाला से मिलती थीं जिसे अपराध की दुनिया का बड़ा नाम माना जाता था।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 16 January 2020

ई कॉमर्स : व्यापारी के साथ ग्राहक की चिंता भी जरूरी



समय के साथ बहुत कुछ बदलता है और व्यापार भी अपवाद नहीं है। तकनीक के विकास ने जो बदलाव किये उनके प्रभावस्वरूप ग्राहक के बाजार जाने की बजाय बाजार ग्राहक तक पहुँचने लगा। ऑनलाइन व्यापार या ई कॉमर्स के नाम से जानी जाने वाली इस प्रणाली ने परम्परागत व्यापार की समूची संस्कृति बदल डाली। इसमें ऐसे अनेक फायदे हैं जिनकी वजह से ग्राहक इसके साथ जुड़ता चला जाता है। अव्वल तो उसे बाजार जाने की झंझट से मुक्ति मिल जाती है और फिरर दाम भी कम देने पड़ते हैं। चीज पसंद नहीं आने पर लौटाने की सुविधा भी है। समय - समय पर निकलने वाले विशेष ऑफर्स के जरिये ग्राहकों को अकल्पनीय रियायतें भी दी जाती हैं। ऑनलाइन कम्पनियां ग्राहकों को संचार माध्यमों से नए उत्पादों के बारे में जानकारी भी उपलब्ध करवा देती हैं। ग्राहक के पास बिना बाजार में भटके ही किसी चीज के प्रतिस्पर्धात्मक दामों की तुलना करते हुए अपनी पसंद चुनने का अवसर भी रहता है। उपभोक्तावाद के विस्तार के साथ ही ऑनलाइन कंपनियों का कारोबार बढ़ता चला गया। पहले इसकी मौजूदगी केवल विकसित देशों में ही थी लेकिन इंटरनेट ने देशों की दूरियां मिटा दीं। नतीजतन आज पूरे विश्व में ई कॉमर्स फैल गया। लेकिन इससे व्यापार के परम्परागत ढांचे को जबर्दस्त नुकसान भी हो रहा है। भारत जैसे देश में जहां करोड़ों छोटे - छोटे व्यापारी अर्थव्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा हैं , ऑनलाइन व्यापार ने उनके अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर दिया है। उदारीकरण के आगमन के बाद जब छोटे व्यापार में भी बड़े औद्योगिक घरानों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई तब इसका विरोध हुआ लेकिन बाजारवादी ताकतें सरकार पर हावी होती गईं और खुदरा व्यापार में भी बड़ी देशी कम्पनियां कूद पड़ीं। बात यहीं तक सीमित रहती तब भी ठीक था लेकिन उनके पीछे या यूँ कहें कि उनका साथ लेकर दुनिया की अनेक बड़ी ऑनलाइन कम्पनियां ही नहीं बल्कि रिटेल स्टोर्स की श्रंखला भी भारत में घुस बैठी। पहले इनकी मौजूदगी केवल महानगरों में थी लेकिन धीरे - धीरे मझोले शहरों में भी ये जम गए। बड़ी कम्पनियों के शो रूम के बाद मॉल संस्कृति आई। उसने भी छोटे और मध्यम व्यापारी की कमर तोड़ी। लेकिन सबसे बड़ा धक्का लगा ऑनलाइन व्यापार से। इन दिनों दुनिया की सबसे बड़ी ई कॉमर्स कम्पनी अमेजन के संस्थापक जेफ बेजोस भारत आये हुए हैं। गत दिवस उन्होंने भारत में अपने कारोबार के विस्तार के सम्बन्ध में रिटेल व्यापार से जुड़े औद्योगिक घरानों के प्रतिनिधियों को संबोधित किया। वे एक उत्प्रेरक की तरह बोले। उनके विरोध में देश भर में व्यापारियों ने प्रदर्शन किये। श्री बेजोस ने अपने संबोधन में अरबों रूपये की निवेश की घोषणा भी कर डाली। भारत के अनेक औद्योगिक घराने उनके साथ व्यावसायिक भागीदारी करने के इच्छुक भी दिखाई दे रहे हैं। अमेजन के मालिक ने भारत में हो रहे विरोध को देखते हुए आने वाले कुछ वर्षों के भीतर मेक इन इण्डिया के अंतर्गत बनने वाले सामान के निर्यात का भी आश्वासन दिया जिसका मूल्य 71 हजार करोड़ होगा। यही नहीं उन्होंने भारत में छोटे और मध्यम कारोबारियों को डिजिटलाइज करने पर भी मोटी रकम खर्च करने की बात कही। लेकिन बात केवल अमेजन तक सीमित रखने से ही ऑनलाइन कारोबार को लेकर हो रही बहस और विरोध की चर्चा पूरी नहीं हो सकेगी। भारत में भी रिलायंस, टाटा, बिरला, बियाणी और अन्य जाने - अनजाने कारोबारियों ने भी रिटेल व्यापार में कदम बढ़ाकर छोटे और मझोले स्तर के व्यापारी को बर्बाद करने का इंतजाम कर दिया है। बीते दशहरा-दीपावली सीजन में जब व्यापार जगत आर्थिक मंदी का रोना रोते हुए ग्राहकों की कमी से परेशान था तब ऑनलाइन कंपनियों की बिक्री लगभग 50 हजार करोड़ के आसपास बताई गयी। एक महंगे मोबाइल फोन की ऑनलाइन बिक्री के महज 36 घंटे के भीतर ही 750 करोड़ के आंकड़े को छू जाना ये दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि एक अदृश्य बाजार तेजी से सक्रिय रहते हुए अपना दायरा बढ़ाने में जुटा हुआ है। इसके लिए केवल सरकारी नीतियों और बाजारवादी ताकतों को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि भारत के त्रिस्तरीय व्यापारिक ढांचे में मुनाफे के बंटवारे की जो प्रणाली प्रचलित है उसमें ग्राहकों की बजाय व्यापार करने वाले के फायदे पर ही ध्यान दिया जाता रहा। ऑनलाइन और रिटेल स्टोर्स ने ग्राहकों के लाभ पर ध्यान केन्द्रित कर बीच की अनेक कडिय़ों को अलग करते हुए उत्पादक और ग्राहक के बीच सीधा सम्बन्ध कायम किया जिसकी वजह से मुनाफे में हिस्सेदार घटे और उपभोक्ता को उम्मीद से ज्यादा फायदा होने लगा। ऑनलाइन कम्पनियों ने अब नई योजना भी बनाई है जिसके तहत वे दुकानदारों के नेटवर्क का उपयोग करते हुए अपना माल ग्राहकों तक पहुँचाने का तरीका लागू करेंगी। रिलायंस जियो और उस जैसी दूसरी कम्पनियां भी इस दिशा में आगे बढ़ रही हैं। अमेजन के मालिक ने भारत के छोटे और मध्यम कारोबार को डिजिटलाइज करने पर करोड़ों खर्च करने की जो बात की है उसके पीछे भी यही सोच है। लेकिन इस सबके बीच सोचने वाली बात ये है कि भारत में आज भी करोड़ों ऐसे छोटे व्यापारी हैं जो तकनीक और व्यापार के आधुनिक तौर तरीकों से अनजान हैं। सुदूर गाँव में बैठे खुदरा व्यापारी को रातों-रात आधुनिकता के सांचे में ढाल देना आसान नहीं होगा। और फिर हर छोटे-मध्यम कारोबारी के साथ कुछ कर्मचारी या उसके परिजन भी जुड़े होते हैं। यदि पूरा का पूरा व्यापार रिटेल स्टोर्स और ऑनलाइन में सिमटकर रह गया तब बेरोजगारी के आंकड़े कहाँ जाकर रुकेंगे ये सोचकर भी डर लगता है। लेकिन इसके लिए परम्परागत शैली के उत्पादकों और व्यापारियों को भी बदले हुए हालातों में ग्राहकों के हितों के प्रति अधिक संवेदनशील होना पड़ेगा। यदि ग्राहक को घर बैठे कोई चीज मिले और वह भी कम दाम पर तो वह व्यापारी के पास क्यों जाएगा? हाल ही के वर्षों में होटलों की बुकिंग और रेस्टारेंट से भोजन घर पहुँचाने का कारोबार जिस तेजी से बढ़ा उसके पीछे भी ग्राहक को मिल रही सुविधा और किफायत की बड़ी भूमिका है। ये बात सही है कि छोटे व्यापारी के लिए इस तरह की प्रतिस्पर्धा करना असम्भव है। इसलिए अब सरकार की भूमिका पर सबकी नजर जाती है। ये कहने में कोई गलती नहीं होगी कि बीते तीन दशक से केंद्र और राज्यों की सरकारों के दिमाग पर जिन आर्थिक सुधारों का भूत सवार है उसमें भारत की जमीनी हकीकत को पूरी तरह से उपेक्षित किया जाता रहा। यदि खुदरा व्यापार के क्षेत्र में बड़े औद्योगिक घरानों की घुसपैठ को समय रहते रोकते हुए ग्राहकों के लाभ की समुचित व्यवस्था की गयी होती तब अमेजन के मालिक भारत में आकर दरियादिली नहीं दिखा पाते। खैर , अभी भी देर नहीं हुई है। सरकार को चाहिए कि वह व्यापार के चंद हाथों में सीमित हो जाने के सिलसिले को रोकने के लिए कदम उठाये वरना विदेशी कम्पनियों के बढ़ते कदम पहले छोटे और मध्यम व्यापरियों को रौदेंगे और उसके बाद बड़े धनकुबेरों को। इसके पहले कि स्थिति बेकाबू होते हुए अराजकता को जन्म दे, संभल जाना चाहिए क्योंकि नया उपनिवेशवाद बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कंधों पर बैठकर आ रहा है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 14 January 2020

आर्थिक मंदी में भी बढ़ रहा भ्रष्टाचार उद्योग



केन्द्रीय बजट आने के एक पखवाड़े पहले खुदरा महंगाई के जो आंकड़े आये हैं उनकी वजह से मोदी सरकार का मानसिक बोझ बढ़ गया है। आर्थिक मंदी में आम तौर पर मांग कम होने से दाम गिरते हैं। लेकिन बीते कुछ महीनों में रोजमर्रे की चीजों के मूल्यों में वृद्धि के कारण महंगाई बढ़ गई। हालाँकि इसका कारण अधिक वर्षा से खराब हुई सब्जियां एवं अन्य फसलें भी हैं। प्याज तो खैर, हर साल ही हड़कंप मचाता है लेकिन इस साल मानसून लंबा खिंच गया। महाराष्ट्र में इस वजह से गन्ने की पैदावार कम हुई है जिससे आने वाले समय में चीनी के दाम बढऩा तय है। रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में कटौती के बावजूद यदि महंगाई बीते पांच साल के उच्चतम स्तर तक आ गयी तब सरकार के लिए चिन्तन और चिंता दोनों की परिस्थितियाँ बन गई हैं। यद्यपि प्याज के अलावा बाकी हरी सब्जियों के दाम बीते कुछ दिनों में लगातार नीचे आने से हो सकता है बजट पेश होने तक तक महंगाई के आंकड़े कुछ नीचे आ जाएं लेकिन गन्ना और दलहन के साथ ही धान की फसल को अतिवृष्टि से हुए नुकसान से आने वाले दिनों में एक बार फिर खुदरा महंगाई सिरदर्द बन सकती है। सबसे बड़ी बात ये है कि रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में कटौती की संभावनाएं जहां घट रही हैं वहीं नगदी की कमी दूर करने के बारे में उसका लचीला रवैया भी कड़ाई में बदल सकता है। अर्थशास्त्री भी इस बात को लेकर भौचक हैं कि बाजार में नगदी की किल्लत के बावजूद महंगाई बढऩे की स्थिति कैसे बनी। अर्थशास्त्र के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार बाजार में मुद्रास्फीति (नगदी के अतिरिक्त चलन) की वजह से मांग बढ़ती है जो महंगाई का कारण बन जाती है। लेकिन भारतीय बाजार बीते दो-तीन साल से मुद्रा संकुचन की समस्या से जूझते आ रहे हैं। नोटबंदी को इसका सबसे प्रमुख कारण माना जाता रहा है। उससे उद्योग व्यापार जगत उबर पाता उसके पहले ही जीएसटी लागू हो जाने से समस्या और जटिल हो गई। वैसे उक्त दोनों कदमों का प्रारम्भिक तौर पर तो स्वागत हुआ लेकिन उनके अमल में जो अनिश्चितता और अव्यवस्था हुई उसकी वजह से परिणाम प्रतिकूल हो गए। वैसे इसका दूसरा पहलू ये भी है कि उक्त दोनों कदमों से काले धन से होने वाला कारोबार ठंडा पड़ गया जिसकी वजह से समानांतर अर्थव्यवस्था सिमटने को आ गई। लेकिन इससे बाजार में मांग घटी जिसका दुष्प्रभाव अंतत: उत्पादन और उसके साथ ही रोजगार गिरने के रूप में सामने आया। केंद्र सरकार की समूची राजनीतिक कामयाबी आर्थिक मोर्चे पर आकर सवालों के घेरे में इसलिए फंसकर रह जाती है क्योंकि इस स्थिति से निकलने की अवधि और तरकीब को लेकर सत्ता पक्ष पूरी तरह खामोश बना हुआ है। प्रधानमंत्री ने बीते दिनों उद्योगपतियों सहित कुछ जानकारों से प्रत्यक्ष बातचीत करते हुए सुझाव मांगे लेकिन वे सब बजट की दिशा तय करने के लिये थे जो अमूमन हर साल होता है। सवाल ये है कि इस स्थिति से देश निकलेगा कैसे? कुछ लोगों का ये भी कहना है कि मोदी सरकार ने बीते पांच वर्षों में रक्षा सौदों में जो बड़ी धनराशि खर्च कर दी उससे भी अर्थव्यवस्था में ठहराव आ गया लेकिन वह ऐसी जरूरत थी जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। सबसे बड़ी बात जो समझ में आती है वह है आर्थिक मोर्चे पर दीर्घकालीन नीतियों के अभाव की। हमारे देश में करों को लेकर कोई ये नहीं बता सकता कि आज जो दरें हैं वे कब तक जारी रहेंगी? पिछले बजट में सोने के आयात पर शुल्क बढ़ाया गया था। इसका मकसद सोने की खरीदी पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा है। बीते कुछ महीनों में स्वर्ण आयात घटने की खबरें भी आईं लेकिन दूसरी तरफ  स्वर्ण आभूषणों का निर्यात घटने से इस व्यवसाय को जमकर घाटा हुआ। अब खबर है कि आगामी बजट में सोने के आयात पर शुल्क फिर से कम किया जा रहा है। इसी तरह से आयकर की दरों को लेकर भी अनिश्चितता बनी रहती है। आगामी बजट के पहले की परिस्थितियों में सरकार बेहद दबाव में है लेकिन उसे ऐसे फैसले लेने चाहिए जो ठोस हों और नीतिगत अनिश्चितता से मुक्त रहें। चंद उद्योगपतियों से मिली सलाह के आधार पर बजट बनाने की बजाय आम जनता को ध्यान में रखते हुए यदि आर्थिक नियोजन किया जावे तो उसके परिणाम कहीं बेहतर होंगे। देश में आलीशान कारों की बजाय छोटे दोपहिया वाहनों को सस्ता किया जाना कहीं जरूरी है। रही बात बेरोजगारी की तो सरकार को श्रम कानूनों में सुधार करना चाहिए जिनकी वजह से नौकरियों पर संकट है। न्यूनतम मजदूरी तय करने से श्रमिकों का शोषण रोकने के प्रयास का नकारात्मक प्रभाव भी हुआ। बेहतर हो इस बारे में मांग और पूर्ति के सिद्धान्त्त को भी ध्यान में रखा जावे। ऊंचे वेतनमान के कारण ही अंतत: सरकार भी नई नौकरी निकालने की बजाय संविदा नियुक्तियों और दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों से काम चला रही है। लेकिन निजी क्षेत्र के नियोक्ताओं पर दर्जनों श्रम कानूनों का बोझ लाद दिया गया है। खुदरा मंहगाई की दरों में वृद्धि का हल्ला तो कमजोर पड़ सकता है किन्तु बेरोजगारी दूर करने के लिए सरकार को श्रम कानूनों और सेवा शत्र्तों में लचीलापन लाना होगा। आर्थिक सुधारों के लिहाज से भी ये बेहद जरूरी हैं। रही बात बजट की तो वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पास सीमित विकल्प हैं। राजकोषीय घाटा नियंत्रित करने के लिए सरकारी खर्च कम करना होगा और वैसा करने से विकास कार्य प्रभावित होते हैं। अच्छा तो यही होगा सरकार आर्थिक क्षेत्र में होने वाले भ्रष्टाचार पर लगाम लगाए और इसके लिए आयकर की समाप्ति जैसे किसी क्रांतिकारी कदम की जरूरत है। सरकार माने या न माने लेकिन नोटबंदी इसी दिशा में बढ़ाया गया कदम था। बजट में करों की कमी से ज्यादा जरूरत सरकारी अमले के भ्रष्टाचार को रोकने की है। प्रधानमंत्री भले ही न खाउंगा के अपने दावे को सही साबित करते रहे हों लेकिन न खाने दूंगा वाली बात को वे लागू नहीं करवा पाए। भ्रष्टाचार रूपी दीमक समूची व्यवस्था को चाट रहा है। आगामी बजट में यदि सरकार आर्थिक नीतियों को भ्रष्टाचार से मुक्त करवाने का पुख्ता इंतजाम कर सके तभी निराशा का वर्तमान माहौल दूर हो सकेगा। सत्ता के शीर्ष पर विराजमान महानुभावों को ये बात अच्छी तरह से जान लेनी चाहिए कि आर्थिक मंदी के बाद भी सरकारी अमले के भ्रष्टाचार का कारोबार जमकर फल फूल रहा है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 13 January 2020

वामपंथ : डूबते को जेएनयू का सहारा



दिल्ली की प्रसिद्ध जेएनयू में बीते दिनों हुआ बलवा कहने को तो शांत हो गया लेकिन उसके कारण वामपंथी हताशा एक बार फिर उजागर हो गयी। 5 जनवरी की शाम वहां कुछ नकाबपोशों द्वारा की गयी मारपीट का देश भर में जबर्दस्त प्रचार हुआ। लेकिन उसके पहले जो कुछ भी हुआ उस बारे में लोगों को ज्यादा नहीं पता। धीरे-धीरे जो जानकारी आई उसके अनुसार नये सेमेस्टर का पंजीयन रोकने के लिए वामपन्थी छात्रों द्वारा सम्बंधित दफ्तर की समूची संचार व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया गया। उन्हें रोकने वाले छात्रों को पीटा भी गया। फीस और छात्रावास शुल्क में वृद्धि के विरोध में चलाये जा रहे आन्दोलन के अंतर्गत वामपंथी जेएनयू में समूची शैक्षणिक गतिविधियों को महज इसलिए ठप्प किये हुए हैं जिससे कि उनकी स्वच्छन्दता पर लगाये जा रहे नियंत्रण प्रभावशील न हो सकें। इसके पीछे शिक्षकों का भी वह समूह है जो वामपंथी विचारधारा में रंगा हुआ है। इनमें तमाम ऐसे लोग हैं जो इसी विवि के छात्र रह चुके हैं। पूरे फसाद की जड़ यही है कि वामपंथी जेएनयू में अपने एकाधिकार को मिल रही चुनौती से भन्नाए हुए हैं। उनकी ये सोच केवल इस संस्थान में ही नहीं बल्कि दिल्ली के जामिया मिलिया, अलीगढ़ मुस्लिम विवि, हैदराबाद के उस्मानिया और बंगाल के जादवपुर विवि जैसे उन तमाम शिक्षण संस्थानों में भी साफ दिखाई दे रही है जहां वामपन्थी ताकतों को वैचारिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है। ये स्थिति अचानक नहीं बनी। बीते पांच सालों में केंद्र की सत्ता द्वारा वामपंथी और उनकी आड़ में सक्रिय देश विरोधी तत्वों की गतिविधियों पर रोक लगाये जाने के बाद से ही सुनियोजित तरीके से उक्त शिक्षण संस्थानों में अराजकता और अव्यवस्था का माहौल बनाकर उसे युवा असंतोष का नाम देकर भ्रम फैलाया जा रहा है। उनके अलावा भी अन्य विश्वविद्यालयों में छात्र आंदोलित हुए लेकिन उनकी संख्या मु_ी भर रही। कुल मिलाकर वामपन्थी और उनके साथ जुड़े बाकी देशविरोधी मानसिकता वाले छात्र ही इस बवाल के पीछे हैं। इस सन्दर्भ में ये बात बिलकुल सही है कि पूरे घटनाक्रम का उद्देश्य केवल और केवल देश के भीतर अराजक वातावारण का निर्माण करना है। इस बारे में एक टीवी वार्ता के दौरान पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने जेएनयू में हुए ताजा फसाद को लेकर एक तरफ  तो जहां विवि प्रशासन और दिल्ली पुलिस की तीखी आलोचना की वहीं उन्होंने पंजीयन रोके जाने के लिए सर्वर रूम को नुकसान पहुँचाने के लिए वामपंथी छात्रसंघ की भूमिका को भी कठघरे में खड़ा कर दिया। लगे हाथ उन्होंने ये भी कहा कि सत्तर के दशक में वामपंथी शासन के दौरान कोलकाता विवि में भी वामपंथी छात्र संगठनों ने इसी तरह की हिंसक हरकतें कीं जिनके परिणामस्वरूप उस प्रतिष्ठित संस्थान की छवि धीरे-धीरे खऱाब होती चली गई। छात्र आंदोलनों से उत्पन्न हालातों ने अलाहाबाद विवि की भी गरिमा को पहले जैसा नहीं रहने दिया। इस बारे में चौकाने वाली बात ये है कि जेएनयू के वामपंथी छात्र संगठन के साथ अलीगढ़ मुस्लिम विवि के देशविरोधी तत्वों का गठजोड़ होने के बाद उसमें जादवपुर विवि और जामिया मिलिया जैसे अन्य संस्थान भी जुड़ते चले गये। निश्चित रूप से ये आकस्मिक तौर पर नहीं हुआ। इसकी पृष्ठभूमि जेएनयू में 2016 में हुआ वह आन्दोलन है जिसमें भारत तेरे टुकड़े होंगे और कश्मीर की आजादी जैसे नारे खुले आम लगाए गए और वामपंथी संगठन उसके लिये दोषी लोगों के बचाव में आ खड़े हुए। उस दौर में पूरे देश में असहिष्णुता के नाम पर वामपंथी बुद्धिजीवी अवार्ड वापिसी अभियान चला रहे थे। चूंकि उसका निशाना केंद्र की मोदी सरकार थी इसलिए न सिर्फ  कांग्रेस बल्कि शेष गैर भाजपाई दल भी उनके सुर में सुर मिलाने लगे। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव ने वामपंथियों सहित पूरे विपक्ष को नकार दिया। बाकी दल तो कमोबेश इस देश की मिट्टी से जुड़े हुए हैं इसलिए उनके पास अभी भी वापिसी की संभावनाएं हैं लेकिन साम्यवादी विचारधारा आयातित होने की वजह से लगातार तिरस्कृत होती जा रही है। ऊपर से केंद्र सरकार ने कश्मीर संबंधी ऐतिहासिक फैसला कर अलगावादियों के हौसले पस्त कर दिए। बची खुची कसर नागरिकता संशोधन कानून के लागू होने ने पूरी कर दी। जेएनयू की छात्र राजनीति को पूरी तरह वामपंथी रंग तो दशकों पहले दे दिया गया था लेकिन हाल के कुछ सालों में जबसे लाल रंग फीका पडऩे का खतरा बढ़ा तबसे वामपंथी विचारधारा को अपने पाँव उखड़ते नजर आने लगे। कांग्रेस को इस खेल को समझना चाहिए क्योंकि उसका जितना नुकसान भाजपा ने नहीं किया उससे ज्यादा उन वामपंथी सलाहकारों ने कर दिया जो पंडित नेहरू से लेकर इंदिरा जी तक के समय सत्ता के गलियारों में घुसकर समूची व्यवस्था को अपने मुताबिक मोडऩे में कामयाब होते रहे। शैक्षणिक और बौद्धिक गतिविधियों से जुड़े हर महत्वपूर्ण संस्थान पर छद्म रूप से वामपंथियों ने कब्जा जमा लिया जिसे कांग्रेसी समझ ही नहीं सके। दुर्भाग्य से आज भी वे इस षडयंत्र से अनभिज्ञ हैं। उन्हें ये समझ लेना चाहिए कि वामपंथी राजनीति इस देश के हितों का सौदा करने वाली रही है। और बहुदलीय लोकतंत्र तथा अभिव्यक्ति की आजादी में साम्यवाद का कोई भरोसा नहीं है। मजदूर्रों और किसानों की हमदर्द बनी रहने वाली साम्यवादी पार्टियों की वजह से ही इस देश का किसान पूरी तरह सरकार पर निर्भर होकर अपना हुनर भूल बैठा वहीं श्रमिक आन्दोलन भी दिशाहीन होते-होते बिखराव का शिकार हो गया। अब केवल इस विचारधारा को जेएनयू जैसे कुछ संस्थानों का ही सहारा है। समाचार माध्यमों में बैठे साम्यवादी इसीलिये ऐसे संस्थानों में होने वाली किसी भी घटना को योजनाबद्ध तरीके से राष्ट्रीय स्तर का बना देते हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 11 January 2020

इन्टरनेट : सर्वोच्च न्यायालय का संतुलित फैसला



सर्वोच्च न्यायालय ने गत दिवस जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 35 ए और 370 हटाये जाने के दौरान की गई प्रतिबंधात्मक व्यवस्थाओं पर अपना निर्णय सुनाते हुए जो भी टिप्पणियाँ कीं वे बेहद महत्वपूर्ण हैं। एक कश्मीरी पत्रकार और कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद द्वारा प्रस्तुत याचिकाओं का निपटारा करते हुए तीन सदस्यों की पीठ ने धारा 144 के तर्कसंगत और वास्तविक आधार पर उपयोग पर बल देते हुए कहा कि बार-बार इसका उपयोग शक्ति का दुरूपयोग है। सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य के प्रशासन को ये आदेश दिया कि वह धारा 144 और इन्टरनेट पर लगे प्रतिबंध संबंधी आदेशों को सार्वजनिक करे जिससे उन्हें उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सके। अदालत ने इन्टरनेट पर लगी रोक की एक सप्ताह में समीक्षा करते हुए नियमों का पालन करने की हिदायत भी दी और जरूरी सेवाओं के लिए उसे तत्काल शुरु करने कहा। लेकिन अपने निर्णय में अदालत ने जो टिप्पणियाँ कीं वे अध्ययन और विमर्श का विषय हैं। अदालत ने एक तरफ जहां इन्टरनेट को अभिव्यक्ति और व्यवसाय के लिए अनिवार्य बताया वहीं ये कहने में भी परहेज नहीं किया कि उसका काम स्वतंत्रता के अधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन कायम रखना है। स्वतंत्रता और सुरक्षा के बीच हमेशा टकराव रहा। ये नहीं कहा जा सकता कि किसकी ज्यादा जरूरत है , दोनों के बीच संतुलन कायम करने की जरूरत है। अदालत का ये कथन ही संदर्भित फैसले की आत्मा है। अदालत ने इन्टरनेट को सम्वैधानिक अधिकार तो माना किन्तु इस आधार पर उसे मौलिक अधिकार की श्रेणी में नहीं रखा क्योंकि याचिकाकर्ताओं ने उसकी मांग नहीं की थी। धारा 144 के बारे में भी फैसले में ये कहा गया कि वह खतरे की आशंका पर भी लगाई जा सकती है। दोनों मुद्दों पर अदालत ने एक तरफ जहां नागरिकों के अधिकार और कानून के दुरूपयोग को रोकने के प्रति अपनी सतर्कता प्रगट की वहीं दूसरी तरफ ये कहकर कि उसका काम स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन कायम करना है अपने दायित्वबोध का भी परिचय दे दिया। चूंकि याचिका और फैसले का सीधा सम्बन्ध जम्मू - कश्मीर से है इसलिए स्वतन्त्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन की बात बेहद प्रासंगिक और साथ ही महत्वपूर्ण हो जाती है। राज्य में अलगाववाद और उसकी आड़ में पनपे आतंकवाद की वजह से कश्मीर घाटी में विशेष रूप से नागरिक अधिकार और स्वतंत्रता मजाक बनकर रह गये थे। इन्टरनेट के उपयोग के जिस संवैधानिक अधिकार को सर्वोच्च न्यायालय ने भी मान्य किया उसका दुरूपयोग जिस तरह से हो रहा था उसके बाद उस पर प्रतिबन्ध लगाया जाना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक जरूरी कदम था। इन्टरनेट के कारण देश विरोधी ताकतों के बीच संपर्क बना रहता था। मोबाइल का उपयोग भी अलगाववादियों ने देश को नुकसान पहुँचाने के लिए किया। ये बात साबित हो चुकी है कि बीते कुछ महीनों में घाटी में आतंकवादी गतिविधियों पर नियन्त्रण लगने में मोबाईल और इन्टरनेट पर लगे प्रतिबन्ध काफी सहायक रहे। सर्वोच्च न्यायालय ने जिस स्पष्टता के साथ सरकार को उसकी सीमाओं का स्मरण करवाते हुए दायित्वों की जरूरत पर भी बल दिया वह उन लोगों के लिए भी संकेत है जो इस फैसले को सरकार की हार बताते घूम रहे हैं। इन्टरनेट अभिव्यक्ति और व्यावसायिक जरूरतों के लिहाज से एक ऐसी जरूरत बन गई है जिसके अभाव में किसी इंसान की अधिकतर गतिविधियां ठप्प होकर रह जाती हैं। लेकिन उसके साथ भी विज्ञान अभिशाप है या वरदान वाली बहस जुड़ गई है। दुनिया भर को जोडऩे वाली यह तकनीक अपने आप में बेजोड़ हैं। लेकिन कश्मीर घाटी में इसका जिस काम के लिये उपयोग हुआ उससे इसकी नकारात्मकता भी उजागर हो गयी। सरकार से ये अपेक्षा करना कि वह जम्मू - कश्मीर में लगाए गये प्रतिबंधात्मक आदेशों का प्रकाशन करते हुए जनता को उसे चुनौती देने का अधिकार प्रदान करे पूरी तरह सही है लेकिन संदर्भित याचिकाओं पर फैसला देने में जल्दबाजी से बचने की अदालत की नीति ने अपने आप ही ये साबित कर दिया कि इन्टरनेट रोकने का सरकार का निर्णय समय की मांग थी। जैसे कि संकेत मिल रहे हैं उनके मुताबिक घाटी सहित पूरे राज्य में प्रशासनिक ढांचे का पुनर्गठन हो चुका है। खूनी खेल पर भी रोक लगी है। और अलगाववादी ताकतों का हौसला भी कमजोर पड़ रहा है। आम जनता भी अमन की पक्षधर बताई जा रही है। सरकार अपनी तरफ  से ही मोबाइल और इन्टरनेट शुरू करने के इरादे जता चुकी थी। ये सब देखते हुए न्यायालय के फैसले को सही नजरिये से देखना चाहिए। स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन कायम रखने को अपनी जिम्मेदारी बताकर सर्वोच्च न्यायालय ने थोड़े में ही बहुत कुछ कह दिया।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 10 January 2020

विपक्षी एकता : सर्वमान्य नीति और नेता का अभाव बाधक



विपक्षी एकता की नई कोशिश अभी से सवालिया घेरे में आ गयी है। 13 जनवरी को कांग्रेस द्वारा दिल्ली में आमंत्रित विपक्षी दलों की बैठक में आने से तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने खुले तौर पर इंकार कर दिया। बसपा की तरफ  से मायावती ने भी बैठक में शरीक होने के प्रति अरुचि दिखा दी है। शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत के अनुसार उनकी पार्टी को अभी तक न्यौता ही नहीं मिला। समान विचारधारा वाले राजनीतिक दलों को अपने झंडे के तले लाने की कांग्रेसी मुहिम नई नहीं है। विगत लोकसभा चुनाव के पूर्व भी सोनिया जी के बुलाने पर विपक्षी पार्टियों के नेता एक साथ आये और हाथ उठाकर फोटो भी खिंचवाया। देश के अनेक राज्यों में विपक्ष की साझा रैलियाँ भी हुईं। जिनके जरिये ये दिखाने का भरपूर प्रयास हुआ कि भाजपा के विरोध में एक महागठबंधन बन गया है जो नरेंद्र मोदी की वापिसी को रोकने में कामयाब होगा। लेकिन ज्यों-ज्यों चुनाव करीब आते गए एकता का वह राग बेसुरा होने लगा। यद्यपि गठबंधन तो हुए लेकिन राष्ट्रीय की बजाय प्रांतीय स्तर पर। मसलन बंगाल में ममता अकेली लड़ीं। उप्र में सपा-बसपा ने कांग्रेस को किनारे कर दिया। उड़ीसा में बीजू जनता दल ने भी कांग्रेस को तवज्जो नहीं दी। तो हरियाणा में क्षेत्रीय दलों ने अपनी खिचड़ी अलग पकाई। वामपंथी दल भी कहीं साथ तो कहीं अलग रहे। इस प्रकार जितना ढोल पीटा गया उस हिसाब से कुछ भी नहीं हुआ। इसकी एक वजह ये रही कि भले ही कांग्रेस विपक्ष की अकेली पार्टी है जिसे राष्ट्रीय कहा जा सकता है किन्तु भाजपा विरोधी बाकी दल अब उसे पहले जैसा वजन नहीं देना चाहते। इसकी एक बड़ी वजह ये है कि अधिकतर क्षेत्रीय दलों के पास जो वोट बैंक है वह कांग्रेस के खाते से ही निकला हुआ है। ऐसे में वे नहीं चाहेंगे कि वह फिर से मजबूत हो। उप्र में सपा ने तो एक बार कांग्रेस के साथ गठबंधन किया भी था किन्तु बसपा दूर ही रही। पिछले लोकसभा चुनाव में मायावती ने अखिलेश यादव के साथ गठबंधन किया लेकिन चुनाव परिणामों के बाद दोनों की राहें जुदा हो गईं। दरअसल कांग्रेस की मुसीबत ये है कि वह पंजाब और छत्तीसगढ़ के अलावा कहीं भी अपनी दम पर सत्ता में नहीं है। पुडुचेरी में उसकी सरकार है जरूर लेकिन उसका कोई महत्व नहीं है। राजस्थान और मप्र में उसे बैसाखियों का सहारा लेना पड़ा है। उसके अलावा जिन और राज्यों में कांग्रेस सरकार का हिस्सा है वहां भी उसकी हैसियत बेहद साधारण है। कर्नाटक में उसने जिस तरह से कटोरे में रखकर सत्ता कुमारस्वामी को सौंपी उससे उसकी कमजोरी साबित हो गई। महाराष्ट्र में जो ताजा राजनीतिक प्रयोग हुआ उसमें भी कांग्रेस का महत्व घटा। पूरी निर्णय प्रक्रिया पर शरद पवार हावी रहे। झारखंड में भी कांग्रेस हेमंत सोरेन के आभामंडल के समक्ष फीकी है। ऐसे में छोटे-छोटे दल भी पूरी तरह से उसका आधिपत्य मंजूर करने में हिचकते हैं। 13 तारीख की प्रस्तावित विपक्षी बैठक से ममता बैनर्जी का किनारा करना ही कांग्रेस के लिए बड़ा धक्का है क्योंकि विपक्ष में वे ही ऐसी एकमात्र ऐसी नेत्री हैं जो अपने दम पर बंगाल जैसे बड़े राज्य की सत्ता पर बनी हुई हैं। जिस वामपंथी किले को इंदिरा गांधी तक नहीं हिला सकीं उसे ममता ने धराशायी कर दिया। इसी तरह मायावती भी कांग्रेस की नाव में सवार होकर दलित वोटों पर अपना एकाधिकार नहीं छोडऩा चाहेंगी। अखिलेश यादव ने 2017 के विधानसभा चुनाव में राहुल को अपनी सायकिल पर बिठाया था लेकिन उसकी वजह से सपा को जबरर्दस्त नुकसान हुआ। ऐसे में केवल शरद पवार और थोड़ा-बहुत वामपंथी ही कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाना चाहेंगे। हालांकि लालू की राजद और हेमंत सोरेन की झामुमो जैसी पार्टियां कांग्रेस के साथ चिपकी हुई हैं लेकिन वे राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से महत्वहीन हैं। वामपंथी भी बंगाल में भले कांग्रेस से याराना बनाकर रखें लेकिन केरल में वे अपने प्रभावक्षेत्र में उसे घुसने नहीं देंगे। ये देखते हुए 13 जनवरी की बैठक कितनी कारगर होगी ये देखने वाली बात रहेगी। सबसे बड़ी बात ये है कि कांग्रेस में शीर्ष स्तर पर नेतृत्व को लेकर भी अनिश्चितता है। श्रीमती गांधी कार्यकारी अध्यक्ष जरूर हैं लेकिन बीच-बीच में राहुल गांधी को दोबारा कमान सौंपे जाने की चर्चा चलने से विपक्षी दल बिचकने लगते हैं। जहां तक प्रियंका वाड्रा को आगे लाने की बात है तो वे उप्र में ही ज्यादा सक्रिय हैं। चूँकि सोनिया जी का स्वास्थ्य उतना अच्छा नहीं है कि वे देश भर में दौरा करते हुए विपक्षी एकता को पुख्ता आधार दे सकें इसलिए छोटी पार्टियां भी कांग्रेस को अब पहले जैसा महत्व नहीं देतीं। कुल मिलाकर कांग्रेस इस समय संक्रान्तिकाल से गुजर रही है। उसके पास नीति और नेता दोनों को लेकर अनिश्चितता है। शिवसेना को गले लगाकर वह तथाकथित धर्मनिरपेक्षता की अपनी पहिचान को खतरे में डाल ही चुकी है। सीएए के विरोध के बहाने उसने विपक्ष को एकजुट करने का जो दांव चला है उसकी सफलता संदिग्ध ही है क्योंकि निकट भविष्य में दिल्ली, बिहार और बंगाल के जो विधानसभा चुनाव होने वाले हैं उनमें वहां के भाजपा विरोधी क्षेत्रीय दल कांग्रेस को अपने ऊपर हावी नहीं होने देंगे। अरविन्द केजरीवाल, तेजस्वी यादव और ममता बैनर्जी वैसे तो भाजपा के घोर विरोधी हैं लेकिन वे कांग्रेस को भी ताकतवर होते नहीं देखना चाहते। और यही देश की सबसे पुरानी पार्टी की दिक्कत है। दूसरी पीढ़ी के नेतृत्व और गांधी परिवार के विकल्प के अभाव के चलते कांग्रेस को अब छोटी पार्टियां भी भाव नहीं दे रहीं। विपक्षी एकता की कोशिशों का अपना महत्व है लेकिन सर्वमान्य नेता और नीति की गैर मौजूदगी उसमें बाधक बन जाती है। श्रीमती गांधी के अलावा शरद पवार, एच डी देवगौड़ा, शरद यादव, मुलायम सिंह यादव जैसे नेता अब वृद्धावस्था का शिकार हैं। उनके पीछे कोई भी ऐसा चेहरा नहीं दिखता जो पूरे देश में प्रभाव और पहिचान रखता हो। ऐसे में कांग्रेस की ताजा कोशिश किसी मुकाम पर पहुँचती नहीं लगती। नवीन पटनायक, ममता बैनर्जी, के. चंद्रशेखर राव, जगन मोहन रेड्डी, जैसे क्षेत्रीय छत्रपों के बिना विपक्षी एकता का वैसे भी कोई अर्थ नहीं है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 9 January 2020

अब सारी उम्मीदें बजट पर टिकी हैं



नये साल की खुशियाँ खत्म होते ही भारत में नए वित्तीय वर्ष के बजट का इन्तजार शुरू हो जाता है। पहले फरवरी के अंत में पेश होने वाला बजट मोदी सरकार के आने के बाद एक फरवरी को लोकसभा में पेश हो जाता है। इसका लाभ ये हुआ कि 31 मार्च को वित्तीय वर्ष समाप्त होने के पहले ही संसद नए बजट को मंजूरी दे देती है और नये आवंटन भी अप्रैल में ही होने से नए कारोबारी साल का काम समय पर शुरू हो जाया करता है। अतीत में ये शिकायत आम थी कि नए बजट में स्वीकृत की गयी राशि सम्बन्धित विभाग को मई और यहाँ तक कि जून माह तक मिल पाती थी। तब तक मानसून की दस्तक होने से मैदानी विकास कार्य विलम्बित होते थे और बड़ी मात्रा में बजट राशि अनुपयोगी पड़ी रह जाती थी। बीते पांच वर्षों में ये विसंगति दूर हुई है। इस वर्ष भी आम बजट एक फरवरी को पेश होने का ऐलान हो चुका है सरकारी विभागों से इस सम्बन्ध में भेजे गये प्रतिवेदनों के बाद केंद्र सरकार का वित्त विभाग बजट को अंतिम रूप देने में लग जाता है। इस समय वही प्रक्रिया तेजी से चल रही है। लेकिन इस वर्ष बजट का इन्तजार कुछ ख़ास वजहों से ज्यादा हो रहा है। मोदी सरकार के पहले पांच साल आशाएं जगाने वाले रहे। उम्मीदें आसमान छूने लगीं। अच्छे दिन का इन्तजार बेसब्री बढ़ाने लगा। लेकिन वैसा कुछ हुआ नहीं जिसका वायदा किया गया था। बावजूद इसके देश ने प्रधानमन्त्री पर भरोसा दिखाते हुए उन्हें 2019 के चुनाव में पहले से भी ज्यादा बहुमत देकर सत्ता सौंप दी। मतदाताओं को ये भरोसा हो चला था कि भले ही 2014 में किये वायदों को पूरा करने में सरकार सफल नहीं हुई लेकिन उसकी नीति और नीयत साफ़ थी। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि आम जनता ने समृद्धि के साथ देश की सुरक्षा को भी बराबर से महत्व दिया और निजी हितों को राष्ट्रहित की तुलना में तुच्छ समझते हुए एक निर्णायक जनादेश नरेंद्र मोदी को प्रदान करते हुए उनके विरोधियों को बुरी तरह निराश कर दिया। बीते पांच वर्ष में केंद्र सरकार ने जो गलतियाँ कीं उन्हें मतदाता ने ये सोचकर भी नजरअंदाज कर दिया कि जो काम करता है उसी से चूक होती है। उल्लेखनीय है अपनी निजी ईमानदारी और पेशेवर विद्वता के बावजूद डा. मनमोहन सिंह की सरकार फैसले नहीं कर पाने वाली सरकार के रूप में बदनाम होने से जनता की निगाहों में उतर गयी थी। उस लिहाज से श्री मोदी दुस्साहासिक फैसले लेने वाले साबित हुए। हालाँकि उनकी वजह से समाज के हर वर्ग को अकल्पनीय परेशानियां उठानी पडीं। लेकिन उसके बाद भी लोगों को प्रधानमंत्री की नेकनीयती पर भरोसा बना रहा। 2019 का जनादेश पूरी तरह श्री मोदी की निजी साख का परिणाम कहा जाना चाहिए और वह गलत भी नहीं है। लेकिन उसके बाद बीते छह महीनों में राजनीतिक मोर्चे पर ऐतिहासिक कार्य करने की बावजूद मोदी सरकार आर्थिक मोर्चे पर जनता की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी। हालत सुधरना तो दूर रहा और भी बिगडऩे की नौबत आ गई। बेरोजगारी के आंकड़े बीते चार दशक के सर्वोच्च स्तर तक जा पहुँचे। बाजार में मांग घटते जाने से उत्पादन में गिरावट आती चली गई । निर्यात में कमी के वजह से व्यापार घाटा भी चिंताजनक स्थिति में आ पहुँचा। अर्थशास्त्र के अंतर्गत जितने भी नकारात्मक मापदंड हो सकते हैं , भारतीय अर्थव्यवस्था के उसी मुकाम पर पहुंचने की बात न केवल राष्ट्रीय वरन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रचारित हो रही है। सरकार के विरोधियों के दावे भले ही नजरअंदाज कर दिए जाएँ किन्तु उसके अपने समर्थक खेमे में भी अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता का माहौल है। हालांकि इसके लिए वर्तमान सरकार को पूरी तरह कसूरवार नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि अधिकृत तौर पर ये माना जाता है कि 2011 से ही इसकी शुरुवात हो चुकी थी जो वैश्विक कारणों से आर्थिक मंदी की शक्ल में जमकर बैठ गयी। हालांकि अर्थशास्त्रियों का बड़ा वर्ग नोटबंदी और जीएसटी को इसके लिए जिम्मेदार मानता है। भाजपा को हालिया विधानसभा चनावों में जो असफलता हाथ लगी उसके लिए भी आम तौर पर आर्थिक कारणों को जिम्मेदार माना जा रहा हैं। प्रधानमन्त्री की निजी लोकप्रियता और क्षमता पर भी इसी कारण सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में अब आगामी बजट ही वह जरिया है जो अर्थव्यवस्था को लेकर छाई निराशा को दूर कर सकता है। भले ही सरकार और रिजर्व बैंक ने बीते महीनों में कुछ उपाय किये लेकिन उनका जैसा असर अपेक्षित था वैसा नहीं हुआ। जनाकारों का कहना है कि ये उपाय दीर्घकालीन लाभ देंगे। लेकिन मौजूदा स्थिति में ऐसा कुछ किये जाने की जरुरुत है जिससे उद्योग - व्यापार जगत के साथ ही जनता में भी ये भाव पैदा हो कि सरकार आर्थिक समस्याओँ को लेकर न केवल चिंतित है अपितु उनके निराकरण के लिए प्रयासरत भी है। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन कितनी राहत दे सकेंगी ये अभी कह पाना सम्भव नहीं है किन्तु यदि ये अवसर भी चला गया तब मोदी सरकार के पास देश में छाई निराशा को दूर करना बेहद कठिन होगा। बेहतर होगा आगामी बजट ज्यादा सैद्धांतिक न होकर थोड़ा व्यवहारिक भी हो क्योंकि अब जनता का धैर्य भी जवाब देने लगा है । मोदी सरकार की राष्ट्रवादी सोच और नीतियाँ पूरी तरह सही हैं लेकिन आज के दौर में आर्थिक नीतियाँ सब पर भारी पड़ जाती हैं। खाली जेब तमाम खुशियों और उपलब्धियों का आनंद छीन लेती है।

-रवीन्द्र वाजपेयी