Wednesday, 12 February 2020

प्रशंसा और बधाई के हकदार हैं केजरीवाल



दिल्ली विधानसभा चुनाव में जैसा अनुमानित था वैसा ही हुआ। इस चुनाव से रहीम की लिखी ये बात एक बार सही साबित हो गई कि जहाँ काम आवे सुई कहा करे तलवार ? अर्थात एक महानगरीय राज्य में स्थानीय मुद्दों पर पिछली सरकार का वायदों पर खरा उतरना ज्यादा कारगर सिद्ध हुआ। भाजपा को लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नाम और काम का जो लाभ मिला ठीक वही फायदा अरविन्द केजरीवाल के खाते में आकर जुड़ा। मोदी के विरूद्ध जिस तरह विपक्ष ने खूब हायतौबा मचाया वैसा ही केजरीवाल के साथ हुआ। लोकसभा में आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में अपनी उपलब्धियों के नाम पर संसद की सीटें मांगीं लेकिन दिल्ली की जनता ने उसे तीसरे नम्बर पर धकेल दिया। लेकिन मात्र आठ महीने बाद ही उसी आम आदमी पार्टी को फिर सिर आँखों पर बिठा लिया और सातों लोकसभा सीटें जीत चुकी भाजपा को 8 सीटों पर समेट दिया। इस चुनाव परिणाम के दो संकेत हैं। पहला ये कि भाजपा को प्रादेशिक स्तर पर गंभीर किस्म के सक्षम नेतृत्व को आगे लाना होगा और वहीं आम आदमी पार्टी के लिए भी ये संदेश है कि अपनी सीमा से बाहर निकलकर हाथ पाँव मारने से बचें क्योंकि राष्ट्रीय स्तर तो बड़ी बात है किसी पड़ोसी राज्य में भी आम आदमी पार्टी को दिल्ली जैसी सफलता मिलना जागती आँखों से सपने देखने जैसा होगा। आम आदमी पार्टी में जाने के बाद लौटकर दोबारा पत्रकार बने आशुतोष की ये बात काबिले गौर है कि किसी और को ये अहंकार न रहे कि दिल्ली की जीत में उसका हाथ है क्योंकि ये केवल और केवल श्री केजरीवाल के करिश्मे और विश्वसनीयता की जीत है। जहां तक बात उनके राष्ट्रीय राजनीतिक क्षितिज पर उभरने की है तो ये काफी मुश्किल है क्योंकि आम आदमी पार्टी एक क्षेत्रीय भी नहीं अपितु महानगरीय पार्टी ही है और उसका अस्तित्व भी तभी तक है जब तक वह दिल्ली में केन्द्रित रहेगी। भारतीय राजनीति की तासीर ये रही है कि क्षेत्रीय या स्थानीय पार्टी के नेता ने जब भी राष्ट्रीय स्तर पर उभरने की कोशिश की उसका मूल जनाधार कमजोर होता गया। तमिलनाडु सहित दक्षिण भारत की क्षेत्रीय पार्टियों ने इस फार्मूले को अपनाते हुए  अपने प्रभावक्षेत्र को समझकर उससे बाहर निकलने का दुस्साहस नहीं किया जिसकी वजह से वे अनेक दशकों से अपनी ताकत संजोकर रख सकीं। वैसे दिल्ली के चुनाव में भाजपा ने एक तरह से अपनी वापिसी कर ली वरना ये आशंका भी थी कि कहीं केजरीवाल नामक करिश्मे में उसकी हालत भी कांग्रेस जैसी होकर न रह जाए। आम आदमी पार्टी आन्दोलन से निकली पार्टी और अरविन्द केजरीवाल ही उसके चेहरे हैं। उन्हें मालूम है कि आन्दोलन के साथियों को बराबरी से बिठाने पर उनकी महत्वाकांक्षाएं परवान चढऩे लगती हैं। और वे अपनी कीमत मांगने लगते हैं। इसीलिए 2015 की ऐतिहासिक जीत के बाद उन्होंने बड़ी ही चतुराई से पार्टी खड़ी करने के लिए एक करोड़ का का चन्दा देने वाले शांति भूषण के अलावा प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव, कुमार विश्वास और प्रोफे. अरुण कुमार जैसे नींव के पत्थरों को निकाल बाहर किया। योगेंद्र यादव के साथ तो धक्का मुक्की तक की गई। इस चुनाव में उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया का मतगणना में काफी देर तक पीछे बने रहना भी एक संकेत है कि दूसरे स्थान वाला अपने को पहले के लायक समझने की भूल न करे। चुनाव नतीजों को भाजपा और उसके द्वारा उठाये जा रहे राष्ट्रीय मुद्दों और हिन्दू मतों के धु्रवीकरण की पराजय मानने वाले दरअसल सतही आकलन करने की गलती कर रहे हैं। इस परिणाम को शाहीन बाग की जीत बताने वालों की राजनीतिक समझ पर भी हंसी आती है। एक राष्ट्रीय पार्टी किसी चुनाव में अपनी हैसियत के लिहाज से बात करे तो उसमें गलत क्या है ? कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने दिल्ली की अपनी रैलियों में नरेंद्र मोदी की नीतियों की आलोचना की क्योंकि वे भी एक राष्ट्रीय पार्टी के राष्ट्रीय नेता हैं। उन्होंने भी श्री केजरीवाल पर झूठे वायदे करने का आरोप लगाया। ये बात अलहदा है कि आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस को इस लायक भी नहीं समझा कि उस पर कोई टिप्पणी की जाए। चुनावी नतीजे भाजपा के लिए तो निश्चित तौर पर विचारणीय हैं क्योंकि बीती मई में आम आदमी पार्टी को चारों खाने चित्त करने के बाद वह उस जन समर्थन को अपने साथ जोड़कर नहीं रख सकी। इसके लिए नेता का चेहरा न होना कारण बना या कमजोर संगठन ये जाँच का विषय हैं लेकिन कांग्रेस के लिए ये चिंता का विषय है जो 1998 से 2013 तक दिल्ली की सत्ता में रहने के बाद 2014 और 2019 के लोकसभा के अलावा 2015 और 2020 के विधानसभा चुनाव में शून्य से आगे नहीं बढ़ सकी। यदि उसे इस बात की खुशी है कि भाजपा 1998 से लगातार पांच विधानसभा चुनाव हार गई तो उसे ये याद रखना चाहिए कि भाजपा ने अपना मत प्रतिशत काफी हद तक सुरक्षित रखा जबकि कांग्रेस तो दयनीयता के स्तर तक आ गई है। जहां तक बात पूरे देश में केजरीवाल फार्मूले को अपनाकर चुनाव जीतने की है तो ये गलतफहमी होगी। हर राज्य की अपनी प्राथमिकतायें, आवश्यकताएं और भौगोलिक परिस्थितियाँ अलग हैं। दिल्ली में बीते पांच साल तक आम आदमी पार्टी सरकार ने बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर जो भी उल्लेखनीय कार्य किये उन्हें उसी तेजी से जारी रखना कठिन होगा। छत्तीसगढ़ और मप्र में तमाम कल्याणकारी योजनायें चलाने के बाद अंतत: भाजपा के हाथ से सत्ता खिसक ही गई। आम आदमी पार्टी सरकार के सामने असली चुनौती नए कार्यकाल में होगी। जनता की उम्मीदों को आसमान पर चढ़ाकर हमेशा के लिए राज नहीं किया जा सकता। शीला दीक्षित ने 15 साल के शासन में दिल्ली में जो विकास किया वह अभूतपूर्व था किन्तु आखिरकार वे खुद चुनाव हार गईं। दिल्ली के मुद्दे पूरी तरह से स्थानीय और नगरीय निकाय के स्तर के थे। चूंकि उनसे गरीब और निम्न आय वर्ग के लोगों को लाभ हुआ इस कारण आम आदमी पार्टी की वापिसी का रास्ता खुल गया। अब दूसरी पारी में केजरीवाल सरकार क्या करेगी इस पर उसका भविष्य निर्भर करेगा। जहां तक बात भाजपा की है तो ये नतीजे उसके लिए धक्का हैं क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद मोदी सरकार ने जिस प्रभावशाली तरीके से अपने घोषणापत्र के मुख्य वायदों को अमली जामा पहिनाया उसके बाद भी राज्यों के चुनाव में पार्टी का निराशाजनक प्रदर्शन शोचनीय है। इसकी वजह प्रादेशिक नेतृत्व को कमजोर करने की कोशिश है या प्रदेश स्तर के नेताओं का केन्द्रीय नेतृत्व पर पूरी तरह आश्रित हो जाना , इसका विश्लेषण होना जरूरी है। अरविन्द केजरीवाल ने लगातार दो बार अपना करिश्मा दिखा दिया लेकिन ऐसा करने वाले वे पहले नेता नहीं हैं। तमिलनाडु, आन्ध्र, तेलंगाना, उड़ीसा, बिहार, उप्र आदि में अनेक क्षेत्रीय नेता ऐसी ही सफलता अर्जित कर राष्ट्रीय पार्टियों को जमीन दिखा चुके हैं। केजरीवाल फिलहाल तो सुपर हीरो की तरह उभरे हैं। दो बार नरेंद्र मोदी के सामने जीतना बड़ी बात है। उनकी अपनी कोई राजनीतिक विचारधारा नहीं है जो उनका सबसे मजबूत पक्ष है। जिसके कारण उन्हें सभी दलों के समर्थकों का समर्थन मिला लेकिन कालान्तर में यही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बनेगी क्योंकि वे दिल्ली में किसी और को नहीं घुसने देना चाहेंगे और इसी तरह दूसरे नेता उनकी पार्टी को अपने इलाके में बर्दाश्त नहीं कर पायेंगे। बावजूद इसके फिलहाल वे भाजपा विरोधी राजनीति के एक बड़े चेहरे बनकर उभरे हैं। राष्ट्रीय राजधानी में होने की वजह से उन्हें समाचार माध्यमों के जरिये काफी प्रचार भी मिल जाता है वरना उड़ीसा जैसे राज्य में तो नवीन पटनायक लगातार पांचवी बार मुख्यमंत्री बने लेकिन उनको समाचारों में उतना महत्व नहीं मिलता। इस चुनावी सफलता के लिए श्री केजरीवाल निश्चित रूप से प्रशंसा और बधाई के हकदार हैं क्योंकि उन्होंने अर्जुन की तरह केवल अपने लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित रखा।
-रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 11 February 2020

यदि शाहीन बाग वीआईपी इलाके में होता तब ....??




दिल्ली का शाहीन बाग़ इलाका इसके पहले कभी इतना चर्चित नहीं हुआ। बीते डेढ़ महीने से वहां मुस्लिम महिलाएं बीच सड़क पर बाल-बच्चों सहित धरना दिये बैठी हैं। उसके कारण यातायात अवरुद्ध है। हजारों लोगों को रोज लम्बा चक्कर लगाकर अपने गन्तव्य तक पहुंचना पड़ रहा है। इस धरने का कारण सीएए का विरोध है। कुछ दिन पूर्व धरने पर बैठी महिला का चार महीने का शिशु सर्दी की वजह से जान गँवा बैठा। महिला अपने बच्चे के अंतिम संस्कार के बाद दोबारा धरने पर आ बैठी। आन्दोलन के समर्थकों ने उस महिला के जज्बे की तारीफ  की तो विरोधियों ने उसे निर्मोही बताते हुए आलोचना कर डाली। इस घटना से व्यथित एक बालिका ने सर्वोच्च न्यायालय को पत्र भेजकर ये सवाल उठाया कि क्या एक नौनिहाल को भीषण सर्दी में इस तरह आन्दोलन में ले जाना उचित था? इस सवाल का न्यायालय ने भी संज्ञान लिया और गत दिवस चार महीने के बच्चे को आन्दोलन का हिस्सा बनाये जाने पर तीखे सवाल दागे। शाहीन बाग़ में सड़क रोककर बैठे रहने पर भी सर्वोच्च न्यायालय ने पूछा कि आखिर कितने दिनों तक आप लोगों को परेशान कर सकते हैं? धरना देने के लिए आम सड़क और सार्वजनिक पार्क  आदि के उपयोग पर भी अदालत ने ऐतराज जताया और पहले से पेश की गई एक याचिका पर दिल्ली और केंद्र दोनों सरकारों को नोटिस जारी करते हुए 17 फरवरी को सुनवाई रखी गई। शाहीन बाग़ का धरना दिल्ली विधानसभा चुनाव में बड़ा मुद्दा बना रहा। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने जहां मुस्लिम मतों के लालच में धरने का समर्थन किया वहीं भाजपा ने इसका पुरजोर विरोध करते हुए हिन्दू मतों को अपने पाले में खींचने की रणनीति पर काम किया। ये सवाल भी बार-बार उठा कि हजारों लोगों की परेशानी के सबब बने इस धरने को हटाने के लिए दिल्ली की पुलिस और प्रशासन ने कोई कदम क्यों नहीं उठाया? उल्लेखनीय है पुलिस केंद्र सरकार के अधीन होने से दिल्ली की सरकार ने इस मामले से अपना पल्ला झाड़ लिया। ये आरोप भी लगा कि भाजपा जानबूझकर शाहीन बाग़ के धरने को खत्म नहीं करवा रही जिससे हिन्दू मतदाता गोलबंद हो सकें। लेकिन राजनीति से अलग हटकर देखें तो क्या इस मामले में न्यायपालिका भी अपनी भूमिका के प्रति उदासीन नहीं रही? दिल्ली देश की राजधानी है जहां न्यायपालिका की सर्वोच्च पीठ भी विराजमान है। शाहीन बाग़ का धरना एक राष्ट्रीय खबर बना रहा। समाचार माध्यमों में इसे लेकर खूब बहस और चर्चा भी हुई। ऐसे में ये आश्चर्य की बात है कि छोटी-छोटी बातों का संज्ञान लेकर शासन और प्रशासन को हड़का देने वाले सर्वोच्च न्यायालय ने भी शाहीन बाग़ मामले में पेश के गई याचिका पर इतनी सुस्ती दिखाई? जो न्यायपालिका किसी आतंकवादी की फांसी रोकने के लिए देर रात बैठकर सुनवाई कर सकती है उसने देश की राजधानी में चल रहे एक ऐसे आन्दोलन को रोकने के लिए अपनी जागरूकता और प्रभाव का उपयोग क्यों नहीं किया जिसकी वजह से दिल्ली के हजारों लोगों को डेढ़ माह से जबर्दस्त परेशानी हो रही है। ये सवाल भी उठ सकता है कि दिल्ली का प्रशासन चला रही केजरीवाल सरकार और पुलिस का नियंत्रण करने वाली केंद्र सरकार ने भी शाहीन बाग़ में सड़क रोककर बैठी मुस्लिम महिलाओं को हटाने के लिए क्या किया? इसका जवाब ये है कि एक तो दिल्ली में चुनाव हो रहे थे और दूसरा धरने पर महिलाएं बैठी थीं जिन पर बल प्रयोग करना राजनीतिक दृष्टि से नुकसानदेह साबित होता। उससे भी बड़ी बात ये थी कि धरना स्थल पर बैठीं महिलाएं मुस्लिम थीं। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय तो राजनीतिक हानि लाभ से उपर है। यदि वह शाहीन बाग़ के धरने का संज्ञान लेते हुए जनता को हो रही परेशानी के मद्देनजर दिल्ली और केंद्र दोनों सरकारों को निर्देशित करता तब आन्दोलनकारियों पर भी दबाव पड़ता। इस बारे में ये कहना गलत नहीं होगा कि यदि किसी माननीय न्यायाधीश का उस रास्ते से आना जाने होता और धरने की वजह से उन्हें लंबा चक्कर लगाना पड़ता तब शायद न्यायपालिका स्वत: संज्ञान लेकर अपना असर दिखाती। हालाँकि ये बात सही है कि न्यायपालिका की अपनी सीमायें हैं और शासन-प्रशासन के सामान्य कार्यों में उसकी दखलंदाजी उचित नहीं मानी जाती लेकिन अनेक ऐसे ज्वलंत मामले हैं जहां जनहित को देखते हुए न्यायालय ने पहल करते हुए शासन-प्रशासन को कार्रवाई करने कहा है। विधायिका के अधिकार क्षेत्र तक में उसने दखल देने से परहेज नहीं किया। ऐसे में शाहीन बाग़ में बीच सड़क पर चल रहे धरने को हटवाने में न्यायपालिका की सुस्ती समझ से परे है। शाहीन बाग़ का धरना केवल एक खबर नहीं अपितु एक नजीर बन गया। उसकी देखासीखी सीएए के विरोध में देश के अनेक शहरों में मुस्लिम महिलाओं द्वारा बीच सड़क या अन्य किसी सार्वजनिक स्थल पर धरना शुरू कर दिया गया। जहां-जहां पुलिस और प्रशासन ने रोकने की कोशिश वहां-वहां आन्दोलन के नाम पर हिंसा की गयी। जैसा शुरू में कहा गया चूँकि मामला महिलाओं और वह भी मुस्लिमों का था इसलिए सरकार में बैठे राजनेता तो बचते रहे लेकिन न्यायपालिका को तो खुलकर ऐसे प्रकरणों में अपना मत रखना चाहिए। इस बारे में ये सवाल भी स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या लुटियंस की दिल्ली कहे जाने वाले वीआईपी इलाकों में और सर्वोच्च न्यायालय के करीब शाहीन बाग जैसा नजारा होता तब क्या उसे इतने लम्बे समय तक बर्दाश्त किया जाता?

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 10 February 2020

आरक्षण : दर्द बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा दी



बीते पांच साल पर नजर डालें तो जब भी देश में कहीं चुनाव होते हैं तब किसी एक विशेष मुद्दे को उछालकर विवाद खड़ा किया जाता है जिसके पीछे उद्देश्य केवल और केवल सियासी लाभ उठाना है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के पहले योजनाबद्ध तरीके से सीएए और एनसीआर को लेकर भय का भूत खड़ा करते हुए दिल्ली के शाहीन बाग़ इलाके में मुस्लिम महिलाओं के धरने को राष्ट्रीय खबर बना दिया गया। उसके पीछे का मंतव्य किसी से छिपा नहीं था। दिल्ली का दंगल समाप्त होते ही राजनीतिक जमात की नजर बिहार विधानसभा के चुनाव पर आकर टिक गयी। संयोगवश सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले ने उसे अवसर भी दे दिया जिसके अनुसार सरकारी नौकरियों में पदोन्नति में आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है और न्यायपालिका इस बारे में सरकार को निर्देशित नहीं कर सकती। फैसला आते ही सियासी हलचल मच गयी। कांग्रेस ने बिना देर किये केंद्र की भाजपा सरकार के शासन में अनु.जाति और जनजाति के अधिकार खतरे में होने का हल्ला मचा दिया। पार्टी के वरिष्ठ नेता माल्लिकर्जुन खडग़े ने केंद्र से मांग की कि या तो वह सर्वोच्च न्यायालय में पुनार्विचार याचिका दायर करे या फिर संविधान में संशोधन करते हुए आरक्षण को मौलिक अधिकार बनाने की व्यवस्था करे। दूसरी तरफ केंद्र सरकार में शामिल रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के सांसद चिराग पासवान ने भी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से असहमति व्यक्त कर दी। दिल्ली के चुनाव परिणाम 11 तारीख को आ जायेंगे। उसके बाद बिहार की बिसात बिछने लगेगी। स्मरणीय है 2015 के चुनाव में भी वहां आरक्षण का मुद्दा जोरदारी से उठा था। चुनाव के कुछ पहले ही रास्वसंघ प्रमुख डा.मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा जैसा सुझाव दिया जिसे लालू यादव सहित अन्य भाजपा विरोधी पार्टियों ने बड़ा मुद्दा बना लिया। चुनाव परिणामों ने साबित कर दिया कि भाजपा को उस विवाद से भारी नुकसान हुआ। जब प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने आरक्षण जारी रखने संबंधी आश्वासन दिए तो भाजपा के परम्परागत सवर्ण मतदाता रुष्ट हो गए। वैसा ही नजारा मप्र में देखने मिला जब ग्वालियर, भिंड और मुरैना क्षेत्र में सवर्ण और अनु. जाति के गुटों में खूनी संघर्ष हुआ। प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बयान कोई माई का लाल आरक्षण नहीं हटा सकता ने सवर्ण मतदाताओं में नाराजगी पैदा की जिसका खमियाजा भाजपा को प्रदेश सरकार गंवाने के रूप में उठाना पड़ा। सर्वोच्च न्यायालय का ताजा निर्णय अनेक राज्यों में पदोन्नति में आरक्षण के लंबित मामलों पर असर डालेगा। मप्र उच्च न्यायालय ने भी पदोन्नति में आरक्षण को रद्द किया था जिसके विरुद्ध शिवराज सरकार की याचिका सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है। इस कारण हजारों पदोन्नतियां रुकी पड़ी हैं। सैकड़ों लोग तो इन्तजार करते-करते सेवा निवृत्त तक हो गये। सर्वोच्च न्यायालय के ताजा निर्णय ने इस मसले को नया रूप दे दिया। चूँकि संसद चल रही है इसलिए इस पर हंगामा होने की पूरी सम्भावना है। केंद्र सरकार की मुसीबत ये है कि न तो वह सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से सहमत हो सकती है और न ही उसका विरोध करने का साहस जुटा सकेगी। वैसे तो कोई भी पार्टी आरक्षण के मौजूदा ढांचे का विरोध नहीं कर सकती क्योंकि जातीय समीकरण भारत की चुनावी राजनीति का स्थायी आधार बन चुके हैं। अनु. जाति और जनजाति के बाद अब ये अन्य पिछड़ी जातियों तक जा पहुंचा है। राज्य स्तर पर नई-नई जातियों को आरक्षण की परिधि में लाने का फैसला भी चुनाव के समय होता है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आरक्षण की अधिकतम सीमा निश्चित किये जाने के बाद भी घुमा-फिराकर आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाये जाने का खेल चलता रहता है। नियुक्तियों में आरक्षण के बाद जब पदोन्नति में आरक्षण का फैसला हुआ तब यह अनारक्षित जातियों की नाराजगी का कारण बन गया। अपने परम्परागत मतदाताओं को संतुष्ट करने के लिए मोदी सरकार ने आरक्षण के लाभ से वंचितों के लिए आर्थिक आधार पर 10 फीसदी आरक्षण देने की व्यवस्था भी की जिसका लाभ भाजपा को लोकसभा चुनाव में मिला भी लेकिन उसके साथ ही ये मांग भी उठने लगी कि आरक्षण का आधार जाति की बजाय आर्थिक स्थिति को बनाया जावे। सर्वोच्च न्यायालय के ताजे फैसले में चूँकि आरक्षण को मौलिक अधिकार मानने से मना कर दिया गया इसलिए अब आरक्षण समर्थक इसे मौलिक अधिकारों में शामिल करने का दबाव बनायेंगे। कांग्रेस नेता श्री खडग़े ने तो उसकी मांग भी कर दी। जहां तक बात संविधान की है तो उसके रचयिता डा. भीमराव आम्बेडकर ने आरक्षण को एक अस्थायी व्यवस्था माना था। वरना वे उसी समय उसे मौलिक अधिकारों की सूची में शामिल करवा देते तो कोई उनका हाथ पकडऩे वाला नहीं था। जब-जब आरक्षण की समय सीमा बढ़ाई गई तब-तब संसद में किसी ने भी उसका विरोध नहीं किया। रास्वसंघ प्रमुख डा. भागवत भी बिहार के झटके के बाद अनेक मर्तबा दोहरा चुके हैं कि जब तक आरक्षण का उद्देश्य पूर्ण न हो तब तक उसे जारी रखा जाए। ताजा फैसले के परिप्रेक्ष्य में विचारणीय बात ये है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों को लेकर भी मीठा-मीठा गप और कड़वा-कड़वा थू वाली प्रवृत्ति राजनेताओं की मानसिकता पर हावी हो चुकी है। यदि सर्वोच्च न्यायालय आरक्षण को मौलिक अधिकार बता देता तो उसकी जय-जयकार हो रही होती। संसद द्वारा भारी बहुमत से पारित फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देते समय जो लोग उसकी निष्पक्षता और अधिकार सम्पन्नता का सम्मान करते दिखते हैं वे ही फैसला मनमाफिक नहीं आने पर उसे संसद में बदलने की मांग उठाने से बाज नहीं आते। आजादी के सात दशक बीत जाने पर भी आरक्षण प्राप्त एक बड़ा वर्ग यदि अब भी सामजिक और आर्थिक दृष्टि से वंचित है तो इस बात पर विचार होना चाहिए कि आरक्षण की व्यवस्था में कमी कहाँ रह गई? सर्वोच्च न्यायालय ने तो क्रीमी लेयर का सवाल उठाकर आरक्षण से लाभान्वित तबके को आगे लाभ नहीं मिलने जैसी बात भी कही थी लेकिन उसका भी विरोध हो गया। ये सब देखते हुए आरक्षण के बारे में ये कहना गलत नहीं होगा कि दर्द बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा दी। आरक्षण का मकसद बहुत ही पवित्र था। सदियों से उपेक्षित और दलित समाज के हिस्से को मुख्यधारा में शामिल किये जाने के लिए की गई अंतरिम व्यवस्था पूरी तरह कारगर नहीं हुई तो उसके कारण तलाशना समय की मांग है। जिस तरह किसी मरीज को सदैव के लिए जीवन रक्षक उपकरणों के सहारे जीवित नहीं रखा जा सकता उसी तरह आरक्षण भी है। यदि डा. आम्बेडकर को आभास होता कि उनकी नेकनीयती को आधार बनाकर वोटों की फसल काटी जायेगी तब वे भी शायद कोई और व्यवस्था करते। जाति की लकीरें मिटने की बजाय गहरी होती जाने का ही नतीजा है कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के संत रैदास जयन्ती पर उनके मन्दिर जाने पर बसपा प्रमुख मायावती को ऐतराज हुआ। आरक्षण को मौलिक अधिकार बनाने की मांग पूरी होने के बाद जाति विहीन समाज की कल्पना बेमानी होकर रह जायेगी।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 8 February 2020

पूर्वोत्तर में राष्ट्रीयता का सूर्योदय



असम में चल रहे बोडो उग्रवादी आन्दोलन के शांतिपूर्ण समाधान के बाद गत दिवस प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी कोकराझार पहुंचे और बोडो आन्दोलन के केंद्र बने रहे जिलों के विकास हेतु आथिक पैकेज की घोषणा करते हुए विश्वास दिलाया कि इन इलाकों को विकास की मुख्यधारा में शामिल करने के हरसंभव प्रयास किये जावेंगे। 54 सालों से चले आ रहे बोडो आन्दोलन में हजारों लोग मारे गए। असम का ये सबसे बड़ा आदिवासी तबका अलगाववादी ताकतों के प्रभाव में आकर हिंसा के रास्ते पर चल पड़ा था। इसके लिए विदेशी मदद मिलने से भी इंकार नहीं किया जा सकता। अतीत में अनेक बार बोडो उग्रवादियों से समझौते हुए लेकिन किसी न किसी वजह से उनको लागू नहीं किया जा सका। हालांकि ये भी सही है कि सशस्त्र संघर्ष करने वालों की ताकत निरंतर कम होती जा रही थी। 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद से पूर्वोत्तर राज्यों में भाजपा के पैर जमे। असम, मणिपुर और त्रिपुरा में उसकी सरकार बन जाने के बाद से वहां राष्ट्रवादी ताकतें मजबूत हुईं। पूर्वोत्तर में आदिवासी समुदाय बड़ी संख्या में है। आजादी के बाद से ही इस क्षेत्र के विकास की उपेक्षा की जाती रही जिससे यहाँ के लोग देश की मुख्य धारा में शामिल नहीं हो सके। ईसाई मिशनरियों और नक्सलवादियों के बीच हुए गठजोड़ ने यहाँ भारत विरोधी भावनाओं को काफी गहराई तक फैला दिया किन्तु बीते पांच वर्ष में वहां के राजनीतिक समीकरण बदल गए। जिसकी वजह से अलगाववादी संगठनों की घेराबंदी हुई और उनमें से अनेक ने समर्पण भी कर दिया। लेकिन बोडो उग्रवादी अभी तक सक्रिय थे। हाल ही में केंद्र सरकार ने उनको हथियार रख देने के लिए राजी किया और वे मुख्यधारा में शरीक हो गए। कश्मीर घाटी में अलगाववाद की जड़ों में सफलतापूर्वक मठा डालने के बाद केंद्र सरकार का हौसला निश्चित तौर पर बुलंद हुआ जिसके बाद उसने बोडो उग्रवादियों को भी हिंसा छोड़कर शांति के रास्ते पर चलने के लिए राजी किया। पूर्वोत्तर की राजनीति के अलावा वहां के विकास में भी इस समझौते से बड़ी मदद मिलेगी। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि यूपीए सरकार के दौर में पूर्वोत्तर राज्यों की घोर उपेक्षा हुई। प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह असम से राज्यसभा के लिए चुने जाते रहे किन्तु उसके बाद भी पूर्वोत्तर में विकास का सूर्योदय नहीं आ सका। लेकिन मोदी सरकार ने सत्ता सँभालते ही न सिर्फ असम वरन समूचे पूर्वोत्तर के चौमुखी विकास की योजना शुरू की। बड़े पैमाने पर सड़कों का जाल बिछाये जाने से परिवहन आसान हुआ जिसकी वजह से व्यापार और पर्यटन दोनों में वृद्धि देखने मिली। अरुणाचल में चीन से सटी सीमा तक पक्की सड़कें, हवाई पट्टी बिजली और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता से भारत विरोधी ताकतों का आधार कमजोर होता गया। हालाँकि अभी भी स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हो सकी लेकिन धीरे-धीरे जिस तरह से अलगाववादी संगठन समर्पण करते जा रहे हैं उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि निकट भविष्य में वहां राष्ट्रीय एकता के लिए चला आ रहा खतरा पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा। प्रधानमन्त्री ने बोडो आन्दोलन के प्रभावक्षेत्र में जाकर विकास की जो घोषणाएं कीं वह समझदारी भरा कदम है। देश का पूर्वोत्तर इलाका अपने अप्रतिम प्राकृतिक सौन्दर्य के कारण पर्यटन की दृष्टि से बेजोड़ है। इसे भारत का स्विटजरलैंड भी कहा जाता है लेकिन विदेशी ताकतों के षडयंत्र की वजह से ये क्षेत्र अलगाववाद की चपेट में आ गया। अब हालत सुधरती दिख रही हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि निकट भविष्य में समूचा पूर्वोत्तर विकास का नया प्रतीक बनकर मुख्यधारा के राज्यों की कतार में खड़ा नजर आएगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

वर्दीधारियों पर भारी सफेदपोश साहब



मप्र में आईपीएस और आईएएस लॉबी के बीच चल रही रस्साखींच में एक बार फिर बाजी आईएएस के हाथ जाती दिख रही है। बीते दिनों राजगढ़ जिले की महिला कलेक्टर ने एक पुलिस कर्मी को चांटा रसीद कर दिया था। जिसकी डीएसपी स्तर के अधिकारी ने जांच की और कलेक्टर को दोषी ठहरा दिया। आईएएस लॉबी को खाकी वर्दी वालों का ये रवैया पसंद नहीं आया और उन्होंने अपनी चिर परिचित शैली में जाल बट्टा फैलाया जिसका नतीजा प्रदेश के डीजीपी वीके सिंह को हटाये जाने जाने की खबर के रूप में सामने आ गया। इस सम्बन्ध में अंतिम निर्णय आज कल में हो जाएगा। जिन राजेन्द्र कुमार का नाम श्री सिंह के उत्तराधिकारी के तौर पर चल रहा है वे इंदौर के चर्चित हनी ट्रैप मामले के लिए गठित एसआईटी के प्रमुख हैं। इसलिए उन्हें डीजीपी बनाने से पहले उच्च न्यायालय से अनापत्ति लेनी पड़ेगी। कलेक्टर द्वारा एक पुलिसकर्मी को सरे आम थप्पड़ मारे जाने पर कमलनाथ सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री तक ने ऐतराज जताया था। आईएएस लॉबी को इस बात की खुन्नस है कि कलेक्टर की जांच डीएसपी ने की और उसकी रिपोर्ट डीजीपी ने मंजूर करते हुए कलेक्टर के विरुद्द्ध कार्रवाई हेतु पत्र लिख दिया। आईएएस लॉबी चूंकि सरकार के ज्यादा मुंह लगी होती है इसलिए बताया जाता है मुख्यमंत्री भी डीजीपी से खुन्नस खा गए। श्री सिंह द्वारा बिना मुख्य सचिव से चर्चा किये कलेक्टर के विरुद्ध कार्रवाई किये जाने वाले पत्र को आईएएस बिरादरी ने अपनी शान में गुस्ताखी माना और अंतत: सफेदपोश नौकरशाही एक बार फिर वर्दीधारियों पर भारी साबित होती दिख रही है। प्रशासनिक ढांचे के भीतर चल रहे इस शीतयुद्ध से कमलनाथ सरकार की प्रशासनिक कमजोरी उजागर हो गई है। एक साल की सत्ता में दूसरी बार डीजीपी का बदला जाना ये दर्शाता है कि मुख्यमंत्री का अपने अमले पर या तो सही नियंत्रण नहीं है या फिर वे आईएएस और आईपीएस के बीच समन्वय स्थापित नहीं कर पा रहे। प्रशासन के इन दो धड़ों के बीच अहं की जंग नई नहीं है। पुलिस विभाग में कमिश्नर प्रणाली लागू होने की मांग पुरानी है। इसके लागू होने पर पुलिस विभाग काफी हद तक आईएएस के प्रभुत्व से मुक्त हो जाता है। किन्तु आईएएस तबका इसमें अड़ंगा लगाया करता है। जिस भी पुलिस अधिकारी ने सफेदपोश नौकरशाहों की सर्वोच्चता को चुनौती देने की हिमाकत की उसकी हालत वीके सिंह जैसी कर दी गयी। संदर्भित प्रकरण में गलती किस तबके की है ये कह पाना कठिन है लेकिन बीते कुछ समय से पुलिस विभाग में तबादले एवं महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों को लेकर जिस तरह से चूहा बिल्ली का खेल चल रहा है उससे पुलिस विभाग खुद को अपमानित महसूस करने लगा है। हनी ट्रैप काण्ड के जाँच में भी जिस प्रकार ताबड़तोड़ तरीके से अधिकारी बदले गये उससे भी प्रशासन से जुड़ी दोनों लॉबियों के बीच की टकराहट उजागर हो गयी थी। ताजा प्रकरण से एक बार फिर ये बात सामने आ गयी है कि कमलनाथ भी आईएएस के चक्रव्यूह में फंसकर रह गये हैं। वीके सिंह या पुलिस महकमे के अन्य अधिकारियों को पूरी तरह सक्षम या ईमानदार होने का प्रमाणपत्र देना तो अतिशयोक्ति होगी लेकिन ये भी सही है कि आईएएस लॉबी में अभी भी अंग्रेजों के जमाने में नजर आने वाली गोरी चमड़ी वाली नस्लीय श्रेष्ठता का अहंकार है जिसके आगे वे बाकी सभी को तुच्छ और हेय समझते हैं। वैसे दूध के धुले तो वर्दीधारी पुलिस वाले भी कतई नहीं हैं और जनता को खून के आंसू रुलाने में इन दोनों में से किसी को भी कम नहीं कहा जा सकता लेकिन सरकार में बैठे चुने हुए नेताओं में प्रशासनिक क्षमता यदि हो तो फिर आईएएस और आईपीएस दोनों की बीच समन्वय कायम रखते हुए सरकार का सुचारू संचालन संभव होता है। बीते एक साल की समीक्षा की जावे तो कमलनाथ अपने प्रशासनिक ढांचे में चूंकि स्थायित्व नहीं ला सके इसलिए उसमें कसावट का पूरी तरह अभाव है। नई सरकार आने के बाद सरकारी अमले का स्थानान्तरण तो साधारण प्रक्रिया है लेकिन इसका निरंतर जारी रहना ये दर्शाता है कि सरकार अपनी दिशा ही तय नहीं कर पा रही। मप्र में आईएएस और आईपीएस लॉबी के बीच ताजा जंग में कौन विजेता बनकर निकलेगा ये उतना मायने नहीं रखता जितना ये कि प्रशासन के दोनों पहियों के बीच का तालमेल बिगडऩे से प्रदेश की कानून और प्रशासनिक व्यवस्था चौपट हो सकती है जो पहले से ही बेहद खस्ता स्थिति में है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 7 February 2020

नेहरु जी का पत्र : गेंद कांग्रेस के पाले में



प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी अपने ऊपर होने वाले राजनीतिक हमलों का जवाब देने में जल्दबाजी भले नहीं करें लेकिन मौका आने पर छोड़ते भी नहीं। दो दिन पहले राहुल गांधी ने युवाओं द्वारा उनको डंडे मारे जाने संबंधी बयान पर श्री मोदी ने लोकसभा में बिना श्री गांधी का नाम लिए तीखी टिप्पणी कर डाली। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर होने वाली बहस यूँ तो महज औपचारिकता होती है लेकिन प्रधानमंत्री हर वर्ष उसका जवाब देते हुए सरकार का पक्ष रखने के साथ ही विपक्ष पर चौतरफा हमला करने में भी नहीं चूकते। गत दिवस भी ऐसा ही हुआ जब उन्होंने सीएए ( नागरिकता संशोधन कानून ) के विरोध पर कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करते हुए प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरु के एक पत्र का उल्लेख करते हुए बताया कि उसमें भी पाकिस्तान से आने वाले अल्पसंख्यकों को ही भारत की नागरिकता देने संबंधी बात कही थी न कि हर व्यक्ति को। नेहरु - लियाकत समझौते से एक साल पहले असम के तत्कालीन मुख्यमंत्री को लिखे उक्त पत्र में नेहरु जी ने अल्पसंख्यक शब्द का जो उल्लेख किया उस पर कांग्रेस का ध्यान आकर्षित करते हुए प्रधानमन्त्री ने ये तंज भी कसा कि कांग्रेस जिन नेहरु जी को अपना आदर्श मानती है उनकी मंशा भी पाकिस्तान से आने वाले अल्पसंख्यकों को ही भारत में नागारिकता देने की थी, बाकी को नहीं। उनके इस पैंतरे का कांग्रेस के पास कोई जवाब नहीं था। एनपीआर (राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर) को लेकर भी श्री मोदी ने गेंद कांग्रेस के पाले में डालकर इसकी शुरुवात के लिए उसे ही जिम्मेदार ठहरा दिया। दिल्ली का चुनाव कल खत्म हो जाएगा। जैसी उम्मीद की जा रही है उसके अनुसार तो शाहीन बाग़ और उसकी तर्ज पर देश भर में प्रायोजित धरने - प्रदर्शन आदि भी समाप्त कर दिए जायेंगे। लेकिन केन्द्र सरकार पर समाज को बाँटने का जो आरोप कांग्रेस और बाकी विपक्षी दलों ने लगाया उसके कारण मुस्लिम समाज पूरी तरह भ्रम की खाई में जा गिरा है। प्रधानमन्त्री ने लोकसभा में पं. नेहरु का जो पत्र पढ़कर सुनाया वह सरकारी दस्तावेज है इसलिए उसकी सत्यता पर संदेह नहीं किया जा सकता। ऐसे में कांग्रेस को अब स्पष्ट करना चाहिए कि क्या वह नेहरु जी की इच्छा के विरुद्ध जाकर सीएए की मुखालफत कर रही है? भारत का विभाजन होने के बाद से ही पाकिस्तान में रह रहे हिन्दू, सिख, पारसी, जैन और ईसाई समुदाय के नागरिकों का उत्पीडऩ शुरू हो गया था। धीरे-धीरे वहां अल्पसंख्यक आबादी घटती चली गई। जान, माल और अस्मत बचाने के लिए बहुतों ने इस्लाम कबूल कर लिया, वहीं बड़ी संख्या उन लोगों की भी है जो किसी तरह बच-बचाकर भारत की सीमा में आ तो गये लेकिन बरसों - बरस बीत जाने पर भी उन्हें यहाँ की नागरिकता नहीं मिली जिससे वे बदहाली में अधिकारविहीन जि़न्दगी जी रहे हैं। ऐसे में इन लोगों को भारत की नागरिकता देने के लिए नेहरु जी की सरकार के समय बने कानून में समयानुकूल संशोधन किये जाने पर मचाया गया बवाल अनावश्यक ही नहीं औचित्यहीन और उससे भी बढ़कर देशहित के विरुद्ध है। प्रधानमंत्री द्वारा नेहरु जी के पत्र का खुलासा किये जाने के पहले पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह का राज्यसभा में दिया भाषण चर्चा में आ चुका था जिसमें उन्होंने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार की चर्चा करते हुए उन्हें भारत की नागरिकता देने का सुझाव दिया था। बेहतर हो कांग्रेस इस विषय में जिम्मेदारी का परिचय दे क्योंकि दिल्ली विधानसभा चुनाव को लेकर जो पूर्वानुमान अभी तक आये हैं उनके मुताबिक कांग्रेस पूरी तरह हाशिये पर आ चुकी है। मुसलमानों में उसके प्रति झुकाव खत्म सा है वहीं हिन्दू-सिख सहित शेष समुदाय भी कांग्रेस को किसी तरह से भाव नहीं दे रहे। सीएए का विरोध जिस तरह दिशाहीन हुआ उससे कांग्रेस को जबर्दस्त नुकसान हुआ, जिसे उसके नेताओं को समझ लेना चाहिए। बेहतर हो पं. नेहरु एवं उसके बाद भी कांग्रेस के अनेक बड़े नेताओं द्वारा पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के सम्बन्ध में व्यक्त चिंताओं को पार्टी का मौजूदा नेतृत्व समझे और तदनुसार अपनी नीति का निर्धारण करे। सीएए अब एक हकीकत है जिसमें सुधार और संशोधन समय के साथ हों ये ग़लत नहीं होगा लेकिन मौजूदा हालात में उसको लागू होने से रोकना कश्मीर में अनुच्छेद 370 की वापिसी जैसा ही रहेगा जो देश के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 6 February 2020

मस्जिद : जमीन ठुकराने का कोई औचित्य नहीं



सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई समय सीमा समाप्त होने के पूर्व ही केंद्र सरकार ने राम जन्मभूमि पर मंदिर बनाने हेतु न्यास का विधिवत गठन कर दिया। न्यास में कानूनविद, धर्माचार्य, सामाजिक कार्यकर्ता और प्रशासनिक अधिकारी रखे गए हैं। एक दलित सदस्य भी है। अच्छी बात ये है कि न्यास अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र रहेगा। कुछ न्यासियों की नियुक्ति भी उसी के द्वारा की जावेगी। अभी तक केवल एक आपत्ति आई है और वह भी मंदिर आन्दोलन के बड़े स्तम्भ रहे कल्याण सिंह की तरफ  से, जिन्होंने दलित के साथ अन्य पिछड़ा वर्ग का एक सदस्य रखे जाने की मांग रखी है। यद्यपि जिन सदस्यों को न्यास में रखा गया गया वे सभी हर दृष्टि से सुयोग्य और सुपात्र हैं। गैर राजनीतिक चेहरों की वजह से न्यास को लेकर सियासी विवाद की गुंजाईश कम ही है लेकिन धार्मिक क्षेत्र के जिन लोगों को न्यासी बनाया गया उनमें से कुछ के बारे में अन्य धर्माचार्य नाक सिकोड़ सकते हैं। फिर भी कुल मिलाकर केंद्र सरकार ने बिना समय नष्ट किये न्यास का गठन करते हुए एक अनिश्चितता को खत्म कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने राम जन्मभूमि पर हिन्दुओं के अधिकार को मान्य करने के अलावा अयोध्या में ही मस्जिद हेतु 5 एकड़ शासकीय भूमि देने का निर्देश भी दिया था। गत दिवस मंदिर निर्माण हेतु न्यास के गठन की घोषणा के साथ ही सरकार ने अयोध्या के निकट मस्जिद हेतु भी भूमि आवंटित कर दी। लेकिन मुस्लिम समाज के दो प्रमुख संगठनों उप्र सुन्नी मुस्लिम वक्फ  बोर्ड और आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने शरीयत का हवाला देते हुए मस्जिद हेतु आवंटित भूमि लेने से इंकार कर दिया। हालाँकि अयोध्या के अनेक मुस्लिमों ने इस फैसले को सराहा। कुछ मुस्लिम संगठनों ने आवंटित भूमि में अस्पताल, विद्यालय जैसे संस्थान बनाने की वकालत भी की। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के पहले ही सभी पक्षों ने उसे मानने की प्रतिबद्धता दिखाई थी। निर्णय वाले दिन उप्र सहित समूचे देश में सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता कर दी गई थी। लेकिन हिन्दुओं और मुस्लिमों की तरफ  से प्रदर्शित समझदारी और संयम की वजह से तमाम आशंकाएं निर्मूल साबित हुईं। सबसे बड़ी बात ये रही कि न तो हिन्दू समाज ने विजयोल्लास मनाया और न ही मुसलमानों की तरफ से पराजय की खीझ जैसा एहसास देखने मिला। अयोध्या में दोनों समुदायों के लोगों ने इस लंबित मामले के निपटने पर खुशी भी जताई। फैसला आये हुए लगभग तीन महीने होने को आये लेकिन इस दौरान भी इस मुद्दे पर किसी भी तरह का सांप्रदायिक तनाव देखने नहीं मिला जिससे ये लगा कि दोनों पक्षों ने पिछली कड़वाहट भुलाकर सौजन्यता और सद्भावना का रास्ता चुनने का निर्णय किया है। लेकिन लगता है मुस्लिम समाज में कुछ विघ्नसंतोषी ऐसे हैं जिनके पेट में मंदिर मुद्दे के शांतिपूर्ण समाधान के कारण दर्द हो रहा है। इसकी वजह अदालती फैसले के बाद उनकी दुकानदारी चौपट हो जाना ही है। पूरे देश में मुस्लिम समुदाय के छोटे-बड़े अनेक अनेक संगठन हैं। उन सभी ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को जय-पराजय की भावना से ऊपर उठकर स्वीकार किया लेकिन उपर्युक्त दोनों संस्थाओं ने फैसले के फौरन बाद से ही नाराजगी दिखानी शुरू कर दी। मस्जिद के लिए 5 एकड़ शासकीय भूमि दिए जाने के अदालती फरमान पर कुछ हिन्दू संगठनों ने आपत्ति जताते हुए उसे अनावश्यक बताया लेकिन अधिकतर ने न्यायोचित बताकर उसका स्वागत किया। उप्र सरकार ने जहां मस्जिद हेतु भूमि प्रदान की है वह मुस्लिम आबादी वाला इलाका है। वहां प्रति वर्ष एक बड़ा उर्स भी भरा करता है। चूँकि अभी तक दोनों ओर से किसी भी तरह के तनाव के संकेत नहीं मिले हैं। इसलिए बेहतर होगा मुस्लिम समाज मस्जिद के लिए आवंटित भूमि को स्वीकार करते हुए वहां एक भव्य मस्जिद और उसके साथ ही समाज के शैक्षणिक उत्थान हेतु उच्च स्तरीय संस्थान बनाए। राम मन्दिर का निर्माण होने के साथ ही अयोध्या का समूचा क्षेत्र अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन केंद्र बनने जा रहा है। केंद्र और उप्र सरकार द्वारा इसके लिए की जा रही तैयारियों को देखकर कहा जा सकता है कि पूरे अवध अंचल को अयोध्या के विकास का सीधा लाभ मिलेगा। ऐसे में मुस्लिम समाज यदि अपनी मस्जिद भी बना ले तब अयोध्या हिन्दुओं के अलावा मुसलमानों के बड़े आस्था केंद्र के तौर पर प्रसिद्ध होगा। मुस्लिम समाज की अपनी धार्मिक मान्यताओं का सम्मान होना पूरी तरह जायज है लेकिन समय के साथ थोड़ी व्यवहारिकता भी होनी चाहिए। शरीयत के पालन को लेकर कभी-कभी तो लगता है कि भारत के मुस्लिम समाज के नेता अरब के मुसलिम देशों की तुलना में ज्यादा कट्टर हैं। इसका कारण उनके मन में समाया ये डर है कि यदि भारत के मुसलमान भी प्रगतिशील हो गए तब उनकी पूछ-परख खत्म हो जायेगी। समय आ गया है जब मुस्लिम समाज के पढ़े लिखे वर्ग को सदियों पुरानी सोच से निकलकर बदलते समय की जरूरतों के मुताबिक अपने को ढालना चाहिये। आजादी के सात दशक बाद भी यदि मुसलमान शैक्षणिक और सामाजिक दृष्टि से पिछड़ गए तो इसके लिए उनके नेता ही जिम्मेदार हैं। इस बारे में जम्मू कश्मीर का उदाहरण सामने है। वहां के मुस्लिम नेताओं ने अपनी औलादों को तो पढऩे-लिखने विदेश भेज दिया लेकिन कश्मीर घाटी के युवकों को धार्मिक कट्टरता का पाठ पढ़ाकर हिंसा के रास्ते पर धकेल दिया। अयोध्या में मस्जिद की जमीन ठुकराने का निर्णय मुस्लिम नेताओं की हताशा हो सकती है लेकिन उसके कारण वे पूरे समाज को दांव पर लगा दें ये ठीक नहीं है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और उप्र के सुन्नी वक्फ  बोर्ड के कर्ताधर्ताओं की हठधर्मिता की वजह से पहले ही मुसलमानों का बहुत नुकसान हो चूका है। अच्छा होगा युवा पीढ़ी के मुस्लिम सुधारवादी सोच के साथ आगे आयें। एक हाथ में कुरान और एक में कम्प्यूटर के नारे को अपनाने का ये सही समय है।

-रवीन्द्र वाजपेयी