Monday, 9 March 2020

कमलनाथ : मजबूत से मजबूर बने



मप्र की कमलनाथ सरकार पर मंडराते संकट के लिए कांग्रेस ने भाजपा पर जो आरोप लगाये थे वे उसी के गले पड़ते जा रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह इस मामले में सबसे ज्यादा मुखर रहे। उनने भाजपा पर कांग्रेस सहित कुछ और  विधायकों को बंधक बनाने और 30-35 करोड़ रूपये में खरीदने का आफर देने की बात कहते हुए दावा  किया कि वे इसका प्रमाण भी दे देंगे। कांग्रेस, सपा, बसपा और कुछ निर्दलीय  विधायक जिस तरह से गायब हुए उससे उनकी बातें सही भी लगीं। उनमें से कुछ को गुरुग्राम के एक होटल से छुड़ाकर लाने की कवायद भी हुई। लेकिन अनेक विधायक फिर भी हाथ नहीं आये। इस पर कहा गया कि उन्हें भाजपा ने बेंगुलुरु में छिपाकर रखा हुआ है। बीते दो दिनों में एक-एक करके विधायक लौट रहे हैं। परसों शेरा लौटे और गत दिवस बिसाहूलाल सिंह नामक पूर्व मंत्री भी आ गए। इस दावे को नकारना जल्दबाजी होगी कि इस सब में भाजपा का हाथ था लेकिन ये भी उतना ही सही है कि गायब हुए जो भी विधायक लौटकर आये उनमें से एक ने भी ये नहीं कहा कि उन्हें किसी ने जबर्दस्ती रोके रखा था या खरीदने की कोशिश की गई। सभी ने स्वेच्छा से जाने की बात कहते हुए साफ कर  दिया कि उनकी पूरी कोशिश मंत्री पद हासिल करने के लिए दबाव बनाने की है। सपा, बसपा, निर्दलीय सहित कांग्रेस के गायब हुए विधायकों में से लगभग सभी ने मंत्री बनने की इच्छा जताते हुए खुलकर अपना असंतोष व्यक्त किया। कल बेंगुलुरु से लौटकर आये बिसाहूलाल ने तो साफ़  कहा कि वे मंत्री नहीं बनाये जाने से नाराज थे और अपनी मर्जी से तीर्थयात्रा पर गये थे। जो भी विधायक अज्ञातवास से लौटकर आये उनमें से किसी ने भी दिग्विजय सिंह और दूसरे कांग्रेस नेताओं द्वारा खरीद फरोख्त के आरोप की पुष्टि नहीं की। कुछ ने तो उनके आरोप का मखौल तक उड़ाया। बिसाहूलाल को जिन दिग्विजय सिंह के गुट का माना जाता है उनने भी उनके तमाम आरोपों को हवा में उड़ा दिया। अभी भी कांग्रेस के दो विधायक लापता हैं। उनके बेंगुलुरु में भाजपा के कब्जे में होने की बात कही जा रही है। इस उठापटक के पीछे राज्यसभा के चुनाव को कारण माना जा रहा है। भाजपा चाहती है वह दूसरी सीट पर कांग्रेस को न जीतने दे। अभी तक जो कुछ भी हुआ वह नाटक से कम नहीं था। भाजपा पर ऑपरेशन लोटस चलाने का आरोप लगाने वाली कांग्रेस भी दावा कर रही है कि भाजपा के दर्जन भर विधायक उसके संपर्क में हैं। इसका साफ मतलब है कि जिस खरीद फरोख्त का आरोप वह भाजपा पर लगा रही है वही उसके द्वारा भी किया जा रहा है। नारायण त्रिपाठी और शरद कोल नामक दो भाजपा विधायक तो खुलकर कांग्रेस की गोद में बैठे हुए हैं। यदि रहस्यमय ढंग से गायब हुए विधायक भाजपा के दबाव या लालच में गये थे तो वे  इतनी आसानी से कैसे लौटे  ये बड़ा सवाल है। ये भी खबर है कि विधानसभा के बजट सत्र के पहले कमलनाथ उनमें से अधिकतर को मंत्री पद देकर ठंडा कर लेंगे। उनके अलावा भी कई विधायकों ने पार्टी में असंतोष की बात कही। राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा ने तो पार्टी का पूर्णकालिक प्रदेश अध्यक्ष नहीं होने को समूचे  विवाद की वजह बताते हुए जल्द इस पद पर नई नियुक्ति की बात उछाल दी। ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या दिग्विजय सिंह भाजपा पर लगाये आरोप वापिस लेंगे? इस दौरान भाजपा ने जो और जैसे भी किया उससे वह भी दूध की धुली नहीं कही जा सकती। ये आरोप भी गलत नहीं है कि वह शुरुवात से ही कमलनाथ सरकार को अस्थिर करने में लगी हुई है लेकिन उसका दांव सही नहीं बैठ रहा जिसके लिए वह स्वयं जिम्मेदार है। अव्वल तो उसके भीतर नेतृत्व को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है और दूसरा उसके  सभी शीर्ष प्रादेशिक नेता बड़बोलेपन की बीमारी से ग्रसित हैं। सरकार गिराने जैसे काम अखाड़े की कुश्ती जैसे सबके सामने तो होते नहीं हैं। बीते कुछ  दिनों में कांग्रेस और सरकार समर्थक कुछ  विधायकों का अज्ञातवास पर जाना भाजपा द्वारा प्रायोजित था या नहीं लेकिन उसके दामन पर छींटे जरुर पड़ गए। बहरहाल प्रदेश सरकार पर संकट अभी बना हुआ है। कमलनाथ नए मंत्री बनाने के लिए मौजूदा में से जिसकी छुट्टी करेंगे कल को वह नाराज नहीं  होगा इसकी गारंटी नहीं है। इसी तरह राज्यसभा में जाने के इच्छुक अनेक नेताओं में भी इस बात पर असंतोष है कि दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया की महत्वाकांक्षा उनके राजनीतिक भविष्य को चौपट कर रही है। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि मप्र कांग्रेस में जबर्दस्त अंतर्कलह है जिसके चलते पार्टी के बड़े नेताओं ने कमलनाथ को मजबूत से मजबूर नेता बनाकर रख दिया। जो विधायक अभी तक मुख्यमंत्री के सामने कुर्सी पर बैठने की हिम्मत तक नहीं करते थे वे ही उनकी आँख में आँख डालकर बातें करने का साहस कर रहे हैं। कमलनाथ यूँ भी  मप्र के नैसर्गिक नेता कभी नहीं रहे। उनके गुट में भी ऐसे लोग नहीं हैं जो प्रदेश तो क्या आंचलिक वजनदारी भी रखते हों।  ऐसे में जो कुछ भी राजनीतिक उठापटक बीते कुछ दिनों से चली आ रही है उसके लिए कांग्रेस और उसके पदलोलुप नेता ही पूर्णत: जिम्मेदार हैं। अपने बेटे और  भाई-भतीजे को स्थापित करने के बाद भी दिग्विजय सिंह की भूख नहीं मिट रही और उसी के कारण उनने  कमलनाथ सरकार पर संकट पैदा करते हुए अपना उल्लू सीधा करने की बिसात बिछाई। कहना गलत नहीं  होगा कि भाजपा भी कुछ हद तक उसमें उलझकर रह गयी। हाँ, ये बात जरूर है कि दिग्विजय द्वारा छेड़ा गया ये छद्म युद्ध कमलनाथ की सरकार के लिए घातक साबित हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि कांग्रेस की कमजोरी उजागर होने से भाजपा के मुंह में भी पानी आने लगा है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 7 March 2020

उदारीकरण के नाम पर उधारीकरण का दुष्परिणाम



किसी व्यवसायी के दिवालिया हो जाने से उससे जुड़े लोगों पर असर पड़ता है लेकिन जब कोई बैंक डूबता है तब हजारों ही नहीं वरन लाखों लोग उससे प्रभावित होते हैं। भारत में बैंकों का राष्ट्रीयकरण 1969 में स्व. इंदिरा गांधी की सरकार ने किया था। उसके पहले तक भारतीय स्टेट बैंक को छोड़कर शेष सभी बैंक निजी या यूँ कहें कि बड़े औद्योगिक घरानों के हाथ में थे जो जनता का पैसा अपने पास रखकर ब्याज देते हुए जमा राशि का उपयोग अपने व्यवसाय में करते थे। लेकिन वह व्यवस्था एकपक्षीय थी। मसलन जनता की जमा राशि का उपयोग बैंकों के मालिक तो अपने निजी व्यवसाय हेतु कर लेते लेकिन जमाकर्ता को आसानी से कर्ज नहीं मिलता था। छोटे कारोबारी तो उस बारे में सोचते तक नहीं थे। लेकिन राष्ट्रीयकरण के बाद हालात बदले और हाथ ठेला, रिक्शा, छोटे दुकानदार आदि को भी बैंकों से कर्ज की सुविधा दी जाने लगी। हस्तशिल्प से जुड़े साधारण कारीगरों की मदद हेतु भी बैंक आगे आये। निश्चित रूप से वह एक क्रांतिकारी बदलाव था जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था से आम नागरिक का जुड़ाव पैदा किया। लेकिन इसका दूसरा पहलू ये था कि वह सब श्रीमती गांधी ने अपने राजनीतिक लाभ के लिए किया। बैंकों के प्रबंधन में वित्तीय विशेषज्ञों के साथ ही ऐसे लोगों को नियुक्त किया जाने लगा जो बैंकिंग प्रणाली को लेकर पूरी तरह से अनभिज्ञ थे और जिनका उद्देश्य राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध करना था। कहने का आशय ये है कि राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकों में सरकारी हस्तक्षेप बढ़ता गया। भले ही रिजर्व बैंक को स्वायत्त कहा जाता रहा लेकिन निचले स्तर पर बैंकों के ऋण वितरण में सरकारी तंत्र की दखलंदाजी होने लगी । तब तक बैंकों में डूबंत कर्ज का आंकड़ा सामने नहीं आ पाता था। लेकिन 1991 में डा मनमोहन सिंह वित्त मंत्री बने और उन्होंने अर्थव्यवस्था को उदारीकरण या मुक्त अर्थव्यवस्था का नाम दिया तो उसका सबसे ज्यादा असर बैंकों की कार्यप्रणाली पर पड़ा। हालाँकि उस समय कांग्रेस पार्टी के भीतर भी एक वर्ग था जिसने डा. सिंह के उस प्रयोग को समाजवादी सोच के विपरीत बताकर उसे इंदिरा युग की आर्थिक नीतियों से मुंह मोडऩे वाला बताया किन्तु तत्कालीन प्रधानमन्त्री पीवी नरसिम्हा राव ने उन आपत्तियों की उपेक्षा करते हुए उदारीकरण को प्रश्रय दिया। ये कहना गलत नहीं होगा कि न केवल उद्योग-व्यापार जगत बल्कि मध्यम वर्ग ने भी उस बदलाव को पुरजोर समर्थन दिया। शेयर बाजार के दरवाजे भी आम लोगों के लिए खुले लेकिन धीरे-धीरे उदारीकरण के दुष्परिणाम भी सामने आने लगे और बड़े-बड़े घोटालों के कारण सरकार के वित्तीय संस्थानों के अलावा आम जनता का धन भी उनमें डूबने लगा। हर्षद मेहता काण्ड इसकी सबसे पहली कड़ी थी। उसके बाद से न जाने कितने काण्ड होते गए और सार्वजानिक तथा निजी धन की लूटपाट होती रही। राव साहब के बाद आई सरकारों के सिर पर भी आर्थिक सुधारों का भूत सवार रहा जिसके कारण घपले और घोटालों की श्रृंखला जारी रही। उदारीकरण ने धीरे-धीरे उधारीकरण की शक्ल अख्तियार कर ली और जो भारतीय समाज कर्ज लेने को बुरा मानता वह कर्ज लेकर घी पीने की ऋषि चार्वाक की सलाह को अपना आदर्श मानकर छोटी-छोटी जरुरतों के लिए बैंकों से कर्ज लेने दौड़ पड़ा। यही नहीं तो बैंक भी कर्ज बांटने के लिए न्यौता देने में जुट गए। इसका लाभ अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाने में अवश्य हुआ। सड़कों पर वाहनों की भीड़, आवासीय और व्यवसायिक भवनों का बड़े पैमाने पर निर्माण, मध्यम श्रेणी परिवारों में आधुनिक सुख-सुविधाओं के साधनों का प्रवेश इसका उदाहरण है। लेकिन इस सबके बीच जो सबसे बड़ी बात हुई वह बड़े औद्योगिक घरानों द्वारा बैंकों से बड़े कर्ज लेकर हजम करने की प्रवृत्ति का विकास। मनमोहन सिंह के वित्तमंत्री बनने के पहले तक एनपीए ( नॉन परफार्मिंग एसेट) जिसे डूबंत कर्ज कहना ज्यादा सही होगा, का बैंकिंग कार्यप्रणाली में कोई स्थान नहीं था। इस वजह से बैंकों की बैलेंस शीट में दिखाया जाने वाला मुनाफा वास्तविकता से दूर होता था। लेकिन एनपीए में फंसी रकम पर ब्याज लगाकर लाभ दिखाने पर रोक लगने के बाद से बैंकों की असली स्थिति सामने आने लगी और उसके बाद से ही बड़े कर्जदारों द्वारा अरबों-खरबों खाकर बैठ जाने की जानकारी बाहर आई। इस प्रकार ये कहना गलत नहीं होगा कि इन्दिरा जी द्वारा बैंकों को पूजीपतियों के नियन्त्रण से निकालने का जो साहस किया गया था वह डा. मनमोहन सिंह ने उदारीकरण के माध्यम से बेअसर कर दिया। आज चाहे सरकारी हों या निजी , सभी बैंक यदि डूबंत कर्ज के बोझ से चरमरा रहे हैं तो उसके लिए वे नीतियां जिम्मेदार हैं जिनमें आँख मूंद्कर कर्ज बांटे गये। गत दिवस निजी क्षेत्र का यस बैंक नामक बैंक संकट में आ गया। इसके पहले महाराष्ट्र में एक बैंक इसी तरह डूब चुका था। जमाकर्ताओं का संचित धन इसके चलते खतरे में आ गया। बीते कुछ वर्षों में जितने भी बैंक घोटाले सामने आये सभी की वजह बड़े कर्जदारों द्वारा अदायगी नहीं किया जाना रहा। जो जानकारी आ रही है उसके अनुसार अधिकांश बड़े डूबंत कर्ज मनमोहन सिंह सरकार के समय बांटे गए और उनके लिए बैंकों के प्रबंधन पर राजनीतिक दबाव की बात भी सामने आ चुकी है। करोड़ों खाए बैठे कर्जदारों को और कर्ज देकर बैंकों की कमर तोडऩे का सिलसिला लगातार जारी रहा। इसे लेकर तरह-तरह की बातें हो रही हैं। आरोप-प्रत्यारोप भी सुनाई दे रहे हैं। मोदी सरकार ने बैंकों का विलय करते हुए स्थिति को सँभालने का जो प्रयोग किया उससे आंकड़े भले ही सुधर गये लेकिन जमीनी सच्चाई अभी भी उजागर नहीं हुई। बड़े बैंकों के उच्च पदस्थ अधिकारी और श्रेष्ठ बैंकर का पुरस्कार जीतने वाली हस्तियाँ भी बैंकों को डुबोने वालों के साथ लिप्त पाई गईं। ताजा चर्चा यस बैंक की हो रही है। उसके मालिकों के बीच हुआ पारिवारिक विवाद उसके पतन की वजह बना। लेकिन प्रश्न ये है कि समूची बैंकिंग व्यवस्था को नियंत्रित और निर्देशित करने वाला रिजर्व बैंक सब कुछ जानते और देखते हुए भी निठल्ला क्यों बैठा रहा और जो कदम उसने अब जाकर उठा वह पहले क्यों नहीं उठाया? भारतीय स्टेट बैंक यदि समय रहते यस बैंक को अधिग्रहीत कर लेता तो हालात इस कदर नहीं बिगड़ते। आर्थिक मोर्चे पर आलोचना से घिरी मोदी सरकार के लिए यस बैंक का डूबना बदनामी का एक और सबब बने बिना नहीं रहेगा। श्रेय लेने में आगे-आगे रहने वाली सरकार के लिये इस विफलता को दूसरे के सिर पर लाद देना भी संभव नहीं है। लेकिन बैंकिंग व्यवस्था रूपी नाव में नीचे से छेद किसने किये ये भी साफ  होना चाहिए। लगातार सामने आ रहे बैंकिंग घोटालों के बाद इस बात पर बहस जरूरी है कि उदारीकरण की आड़ में उधारीकरण और मुक्त के नाम पर उन्मुक्त अर्थव्यवस्था क्या भारतीय परिप्रेक्ष्य में सही थी और यदि नहीं तो उसका विकल्प क्या हो सकता है? बाजार की जरूरतों के मुताबिक अर्थव्यवस्था को ढालने के प्रयास में भारत मात्र एक बाजार बनकर रह गया है। इस बारे में याद रखने वाली बात ये होगी कि अमेरिका परस्त कहे जाने वाले मनमोहन सिंह की सरकार को पहले कार्यकाल में घोर वामपंथी और चीन समर्थक माकपा नेता हरिकिशन सिंह सुरजीत ने वामपंथी दलों का समर्थन दिलवाकर टिकाये रखा। कहते हैं चंद्रमा की चमक तो पूरी दुनिया को दिखाई देती है किन्तु उसका पृष्ठ भाग अंधकारमय होता है। भारतीय बैंकिंग व्यवस्था की मौजूदा स्थिति भी वैसी ही है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 6 March 2020

बिना स्वास्थ्य समृद्धि नहीं आ सकती



कोरोना वायरस को लेकर हल्ला  तो खूब मच रहा है लेकिन अपेक्षित गम्भीरता नहीं दिखाई दे रही। कतिपय टीवी  चैनलों ने तो कोरोना को भी अपनी दर्शक संख्या बढ़ाने का माध्यम बना लिया है। भय का भूत भी खड़ा किया जा रहा है। ऐसे अवसरों पर भारत में सुझाव वीर भी खुलकर सामने आ जा आते हैं। कोरोना  से बचने के लिए गांजा , भांग , शराब पीने जैसी सलाहें भी आने लगी हैं। हल्दी के सेवन और कपूर साथ रखने का मशवरा भी सुनने में आया है। ये भी कहा जा रहा है कि होली के बाद ज्योंही तापमान बढ़ेगा त्योंही कोरोना अपने आप खत्म हो जाएगा। इसका संक्रमण होने के बाद 14 दिन तक वायरस शरीर के भीतर बना रहता है और इस दौरान कभी भी प्रभावशील होकर जान के लिए खतरा बन सकता है। भारत में अब तक इसका खास असर नहीं दिखाई दिया। संक्रमित मरीज भी विशाल जनसंख्या के लिहाज से तो बेहद कम हैं। विदेशी पर्यटकों के जरिये इसका आगमन हुआ या जो भारतीय विदेशों से लौटे वे इसका  वायरस लेकर आये ये जांच का विषय है लेकिन जिस तरह की सावधानियां बरतने का सुझाव चिकित्सक और बाकी जानकार दे रहे हैं उनमें अधिकतर स्वच्छता से सम्बधित हैं। अभिवादन में हाथ मिलाने की बजाय नमस्कार करने और कुछ भी खाने के पहले हाथ अच्छी से तरह धोने की बात भारतीय संदर्भ में नई  नहीं है। बहरहाल एल्कोहल युक्त सेनेटाईजर और मास्क का उपयोग करने जैसा सुझाव , भीडभाड़ वाले इलाकों से बचने की हिदायत का पालन करना आम भारतीय के लिए कठिन है। उल्लेखनीय है कि उक्त दोंनों चीजों की कालाबाजारी भी शुरू हो गयी है। इसी तरह करोड़ों ऐसे लोग जो झुग्गी - झोपडिय़ों में नारकीय हालातों में रहते हों उनसे उक्त सलाहों पर अमल करने की उम्मीद व्यर्थ है। एक सुझाव ये भी आया कि बाहर की खाद्य सामग्री का उपयोग न करें। आशय आनलाइन खाने की सेवा का उपयोग न करने का है। लेकिन जिस तरह की चेतावनियां और सुझाव कोरोना को लेकर आये हैं उनका संज्ञान लेने वाला वर्ग हमारे देश में बहुत छोटा है। इस कारण ये आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि चीन जैसी स्थिति उत्पन्न होने पर भारत में कोरोना महामारी का रूप ले सकता है। और ये गलत भी नहीं है। यूँ भी हमारे देश में बीमारियों के बारे में  जितना हल्ला मचता है उनसे बचाव की व्यवस्था उस अनुपात में नहीं होती। कोरोना वायरस का इलाज करने के  बारे में तो चिकित्सा जगत अभी तक अनभिज्ञ था लेकिन भारत में  प्रतिवर्ष डेंगू और स्वाइन फ्लू का हमला होता है और पर्याप्त चिकित्सा नहीं मिल पाने से सैकड़ों मारे जाते हैं। उ.प्र. के गोरखपुर में सुअरों से फैलने वाली बीमारी की चपेट में आकर दर्जनों बच्चे हर साल काल के गाल में समा जाते है। गत वर्ष बिहार में चमकी बुखार से बड़ी तादात में छोटे बच्चे मारे गए। हाल ही में यही हालात राजस्थान और गुजरात में भी बने। जब बीमारी फैलती है तब कुछ दिनों तक तो खूब हल्ला मचता है लेकिन बाद में सब कुछ पहले जैसा ही होकर रह जाता है। देश की राजधानी दिल्ली में डेंगू का हमला सालाना कार्यक्रम जैसा है। इन सभी बीमारियों की मुख्य वजह गंदगी और मच्छर हैं। प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन और स्वच्छता सर्वेक्षण का बिलकुल असर नहीं हुआ ये  कहना तो गलत होगा किन्तु देश के महानगरों तक में सफाई की व्यवस्था जिस तरह लचर है उसकी वजह से संक्रामक बीमारियाँ बे रोक - टोक भारत में तांडव मचाती हैं। कोरोना तो कुछ दिनों बाद विदा हो जाएगा लेकिन तापमान बढऩे के साथ ही गर्मियों के मौसम में होने वाली बीमारियाँ दस्तक देंगीं। फिर आ जायेगी बरसात। कुल मिलाकर भारत में मौसम जनित बीमारियों के अलावा संक्रामक बीमारियाँ पूरे तामझाम के साथ आ धमकती हैं और पूरी चिकित्सा व्यवस्था उनके सामने असहाय खड़ी  नजर आती है। भारत को विश्व की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था बनाने के लिए हो रहे दावों के बीच इस तरह की बीमारियों से निपटने में अक्षमता की वजह से भारत की छवि निश्चित रूप से खराब होती है। विकसित देशों में इस तरह के संकट आने पर उनकी पुनरावृत्ति रोकने के  लिये युद्धस्तर पर कोशिशें की जाती हैं लेकिन हमारे देश में उनका दिखावा ज्यादा होता है। कोरोना तो  बड़ी बात है  किन्तु अभी तो भारत मच्छरों से होने वाली बीमारियों से ही मुक्त नहीं हो सका। बेहतर हो बड़ी-बड़ी बातें करने और तात्कालिक उपाय करने की बजाय भारत में स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता के साथ गंभीरता बरती जाए। किसी भी देश में स्वास्थ्य की स्थिति सुधारे बिना आर्थिक समृद्धि की कल्पना करना बेकार है। भारत की आर्थिक  समृद्धि का सपना बिना स्वस्थ भारत के पूरा नहीं हो सकेगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 4 March 2020

सांसदों - विधायकों की आड़ में लोकतंत्र का सौदा



जब भी कहीं जनप्रतिनिधियों की खरीद-फरोख्त होती है तब उसे हॉर्स ट्रेडिंग (घोड़ों का व्यापार) कहा जाता है। सांसद और विधायक को घोड़ा कहना उनका सम्मान है या अपमान इस पर अभी तक बहस नहीं हुई। बिकने और खरीदने वालों की तरफ  से भी इस व्यापार को कोई और नाम देने की मांग अब तक नहीं उठी। लेकिन गत दिवस सोशल मीडिया पर किसी की ये टिप्पणी ध्यान खींचने वाली रही कि जनप्रतिनिधियों की खरीदी-बिक्री को घोड़ों से जोड़कर इस समझदार  और वफादार पशु का अपमान न किया जाए। इस बारे में एक बात और काबिले गौर है कि विज्ञान में घोड़े को शक्ति का प्रतीक मानकर ही हॉर्स पॉवर नामक मानदंड स्थापित किया गया। वैसे अब घोड़ों का उपयोग सीमित हो चला है। तांगे और बग्गियों का चलन खत्म हो चला है। घुड़ दौड़ का आकर्षण भी दिन ब दिन कम हो रहा है। ऐसे में सांसदों - विधायकों की खरीदी को हॉर्स ट्रेडिंग कहना लगता तो अटपटा ही है लेकिन पशु संरक्षण में अग्रणी मेनका गांधी ने भी कभी इस नामकरण पर आपत्ति नहीं व्यक्त की। इस चर्चा का ताजा-तरीन संदर्भ मप्र में चल रही राजनीतिक हलचल है। कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह बीते दो तीन दिनों से लगातार ये आरोप लगा रहे हैं कि भाजपा कमलनाथ की सरकार को गिराने के लिए बसपा-सपा, निर्दलीय सहित कुछ कांग्रेस विधायकों को 30 से 35 करोड़ देकर तोडऩा चाह रही है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी इसकी पुष्टि की है। एक दो कांग्रेस विधायकों ने भी ये दावा किया कि उन्हें भाजपा से वैसा ऑफर मिला है। गत दिवस श्री सिंह ने ये कहकर सनसनी पैदा कर दी कि कुछ विधायकों को विशेष विमान से दिल्ली ले जाकर एक पांच सितारा होटल में ठहराया गया है। ये खबर भी आई कि दिग्विजय खुद पतासाजी करने उस होटल जा पहुंचे और आरोप लगाया कि उन्हें होटल में जाने नहीं दिया गया। इसी के साथ उन्होंने ये भी फरमाया कि विधायकों से उनकी बात हो गयी है और वे लौट आएंगे। इधर बसपा विधायक के पति ने कांग्रेस के आरोपों का खंडन किया है। मप्र कांग्रेस की आन्तरिक राजनीति में दिग्विजय और कमलनाथ से छत्तीस का आंकड़ा रखने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बहरहाल इस समूचे घटनाक्रम से अनभिज्ञता जाहिर की है। ज्ञातव्य है श्री सिंधिया इस समय कोप भवन में हैं और उनके बगावत किये जाने की अटकलें लग रही हैं। मप्र में व्याप्त राजनीतिक आनिश्चितता किस मुकाम पर पहुंचेगी ये फिलहाल कोई नहीं बता सकता। वैसे भाजपा में चलने वाली चर्चाएं ये संकेत जरूर करती रही हैं कि वह कमलनाथ सरकार को गिराने का इरादा रखती है और मौका लगते ही अपनी कार्ययोजना को अंजाम देगी। हालांकि ऐसा होना कोई अजूबा नहीं होगा। हमारे देश में सरकार बनाने और गिराने के अलावा राज्यसभा चुनाव में भी विधायकों की खरीदी की परम्परा है। झारखंड में तो खुले आम ऐसा होता रहा। विधायकों को खरीदकर राज्यसभा में जाने वालों में विजय माल्या और उन जैसे अन्य उद्योगपति भी रहे हैं। छोटी पार्टियां अपने अतिरिक्त मत बेचकर धनकुबेरों और नामी गिरामी वकीलों को उच्च सदन का सदस्य बनने में मददगार होती रही हैं। कर्नाटक में बीते साल कुमारस्वामी सरकार गिराने की लिए भाजपा ने डेढ़ दर्जन सत्ताधारी विधायकों से इस्तीफा दिलवा दिया। बाद में उपचुनाव जीतकर वे सभी येदियुरप्पा सरकार में मंत्री पद पा गये। विचारणीय है कि दलबदल कानून के बाद भी ये कारोबार थमने का नाम नहीं ले रहा। दिग्विजय सिंह का आरोप कितना सही है ये तो वे ही जानें लेकिन उन जैसे अनुभवी नेता द्वारा 30-35 करोड़ का भाव खोलने से ये संदेह भी मजबूत हुआ है कि क्या कमलनाथ सरकार के लिए बहुमत जुटाने बसपा-सपा और कुछ निर्दलियों को भी मोटी रकम दी गई थी ? कांग्रेस ने भाजपा के दो विधायकों को भी तोड़ रखा है। तो क्या उनका ह्रदय परिवर्तन भी नोटों की गड्डियां दिखाकर किया गया ? पीवी नरसिम्हा राव की सरकार बचाने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को संसद भवन की भीतर लाखों की घूस दी गई थी। उसके बाद भाजपा के फग्गन सिंह कुलस्ते और अशोक अर्गल संसद में नोटों की गड्डियां लेकर आये और ये कहकर सनसनी मचा दी कि वह रकम उन्हें दलबदल के लिए दे गयी। चुनाव में निर्धारित खर्च सीमा से कई गुना ज्यादा खर्च होना किसी से छुपा नहीं है। हाल ही में छत्तीसगढ़ में आयकर छापों के दौरान जो जानकारी आई उसके अनुसार तो काले धन का उपयोग राजनीतिक कामों के लिए होता था। मुख्यमंत्री की उपसचिव पर आयकर वालों ने छापा मारा।  उनके अलावा और भी अनेक नेताओं और कारोबारियों पर दबिश दी गई। चूंकि वे सभी कांग्रेस के करीबी हैं इसलिए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भन्ना उठे और भागे-भागे दिल्ली गये । सवाल ये है कि राजनीति में इतना पैसा आता कहां से है ? सरकार बनाना और गिराना प्रजातंत्र का हिस्सा है। दलबदल यदि वैचारिक आधार या नीतिगत मतभेदों पर आधरित हो तब तो बुरा नहीं लेकिन प्रलोभन के कारण हो तब वह प्रजातंत्र का अपमान है। मप्र में ये पहला अवसर नहीं है जब विधायकों के पाला बदलने का खेल हो रहा हो। पिछली शिवराज सरकार के पास पर्याप्त बहुमत होने पर भी भाजपा कांग्रेस के विधायकों की तोडफ़ोड़ किया करती थी। दिग्विजय सिंह के आरोप कितने सही हैं ये आगामी कुछ दिनों में साफ हो जाएगा। राज्यसभा के चुनाव से भी इसे जोड़कर देखा जा रहा है। श्री सिंधिया की नाराजगी भी इसके पीछे हो सकती है। लेकिन एक विधायक को 30-35 करोड़ में खरीदे जाने का आरोप मामूली नहीं है। सबूत मांगे जाने पर दिग्विजय ने समय आने पर साबित करने की बात कही। यद्यपि उनके बयान गंभीरता से नहीं लिए जाते और इस आरोप के पीछे राज्यसभा में दोबारा जाने की उनकी अपनी रणनीति भी हो सकती है किन्तु सरे आम इस तरह के आरोपों से नेताओं और जनप्रतिनिधियों की इज्जत का जो होता हो सो होता हो लेकिन जनता ये सुनकर खुद को अपमानित महसूस करती है कि उसने जिन्हें मत देकर माननीय बनाया वे उसके विश्वास का सौदा करते घूम रहे हैं। दिग्विजय सिंह के आरोप बेहद गम्भीर हैं। उनका खुलासा होना चाहिए क्योंकि सवाल कुछ नेताओं का नहीं लोकतंत्र का है।

-रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 3 March 2020

काश, निर्भया के आंसुओं के बारे में भी सोच लेते



जो न्यायपालिका किसी एक मामले में आशा की किरण बनकर सामने आती है वही दूसरे में अपनी लाचारी से निराशा पैदा कर देती है। निर्भया काण्ड के दोषियों की फाँसी की तारीख फिर बढऩे के बाद देश भर से जो प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं उनमें गुस्सा साफ देखा जा सकता है। न्याय शास्त्र की प्रसिद्ध उक्ति है कि भले ही सौ गुनहगार छूट जाएं किन्तु किसी बेगुनाह को सजा नहीं होना चाहिए। निश्चित रूप से ये एक आदर्श स्थिति है। नीर - क्षीर विवेक पर आधारित न्याय ही सही माना जाता है। इसीलिये अंतिम निष्कर्ष तक पहुँचने से पूर्व न्याय प्रक्रिया विभिन्न पायदानों से गुजरती है। साक्ष्यों के बयान , उनका प्रति परीक्षण , परिस्थितियों का विश्लेषण और कृत्य के पीछे निहित भावना भी देखी जाती है। अपराधिक प्रकरण में तो और भी सावधानी बरतनी होती है। लेकिन एक बार निष्कर्ष पर पहुँचने के बाद भी यदि सजा टलती जाए तो फिर उसकी गम्भीरता के साथ ही कानून और दंड प्रक्रिया का भय कम होता जाता है। हमारे देश में अपराध करने वालों के मन में ये बात गहराई तक जगह बना चुकी है कि कानून को वे अपनी उँगलियों पर नचा सकते हैं। इस सोच को वे अधिवक्ता भी मजबूती प्रदान करते हैं जो अपराधी के बचाव में तरह - तरह के पेंच फंसाते रहते हैं। ताजा संदर्भ निर्भया काण्ड के दोषियों के मृत्युदंड की तारीख फिर से टल जाने का है। आज उन्हें फांसी दी जानी थी। गत दिवस उनमें से एक की याचिका पर अदालत ने रहम दिखाते हुए न्याय की निष्पक्षता का हवाला देते हुए भगवान के यहाँ तक का हवाला दे दिया। न्याय में निष्पक्षता हर हाल में जरूरी है लेकिन उसकी गम्भीरता नष्ट हो जाये तो वह निरर्थक हो जाता है। निर्भया प्रकरण ने हमारे देश की दंड प्रक्रिया में सुराखों को उजागर कर दिया है। जहां तक बात अधिवक्ताओं के जमीर की है तो उसे उनकी पेशेगत जिम्मेदारी मानकर हवा में उड़ा दिया जाता है किन्तु किसी कू्रर अपराधी के साथ जब कानून रियायत और रहमत दिखता है तो समाज पर उसका बुरा असर पड़ता है। संदर्भित प्रकरण में अभी तक जो कुछ भी हुआ वह निराश करने वाला है। फांसी होगी ये तो हर कोई जानता है लेकिन जिस तरह उसकी तारीख बार-बार आगे बढ़ती जा रही है उससे न्यायपालिका के प्रति सम्मान और भरोसा भले ही कम नहीं हुआ लेकिन ये कहना गलत नहीं होगा कि वह हंसी का पात्र बनती जा रही है। भगवान के यहाँ जाकर अपराधी कानून के  निष्पक्ष न होने की शिकायत न कर सके इसकी चिंता करने वाले न्यायाधीश महोदय को ये भी सोचना चाहिए था कि भगवान के पास बैठी निर्भया हमारी न्याय प्रणाली पर आंसू बहा रही होगी।

- रवीन्द्र वाजपेयी



केजरीवाल : अपने हुए पराये



जो अरविन्द केजरीवाल कुछ समय पहले तक भाजपा विरोधी समाचार चैनलों की आंख के तारे हुआ करते थे वे अचानक खलनायक बन बैठे। कांग्रेस भी दिल्ली चुनाव के बाद उनकी बलैयाँ लेती नहीं थक रही थी। लेकिन ज्योंही दिल्ली सरकार ने कन्हैया कुमार और उनके साथियों पर राजद्रोह का आरोप पत्र दाखिल करने की अनुमति पुलिस को दी त्योंही अरविन्द क्रांतिकारी से फासिस्ट माने जाने लगे। वामपंथी प्रचारतंत्र श्री केजरीवाल द्वारा चार साल पहले किये गये ट्वीट को उछाल रहा है जिसमें उन्होंने कन्हैया के भाषण को शानदार बताया था। उन पर ये आरोप लग रहे हैं कि दिल्ली दंगों के दौरान जनता से कटे रहने की वजह से खराब हुई छवि को सुधारने के लिए उन्होंने कन्हैया को लेकर अपनी नीति बदल डाली। ये भी कहा जा रहा है कि बीते दिनों केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद अरविन्द ने यू टर्न ले लिया। सच्चाई तो वे खुद ही बता सकेंगे लेकिन कन्हैया पर आरोप पत्र दाखिल करने की अनुमति के बाद वे अपने ही समर्थकों की आलोचना के शिकार होने लगे हैं। कहने वाले तो यहाँ तक कह रहे हैं कि भाजपा के साथ उनकी कोई गोपनीय डील हुई है। वैसे श्री केजरीवाल को जानने वाले ये मानते हैं कि इसके पीछे भी उनकी कोई दूरगामी राजनीति है। दरअसल बीते पांच साल में वे केंद्र सरकार से पंगा लेकर काफी परेशानी महसूस करते रहे हैं। इसीलिये चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी पर कोई राजनीतिक हमला भी नहीं किया। उन्हें लगता है कि बिजली, पानी, अस्पताल और स्कूल के बारे में वे आगे ज्यादा कुछ नहीं कर पायेंगे। ऐसे में अगली बार जनता के सामने जाने के लिए उन्हें कुछ बड़े काम भी करने होंगे जिनके लिए केंद्र की मदद लगेगी। लोकसभा चुनाव तो अभी बहुत दूर हैं लेकिन दिल्ली के आगामी नगर निगम चुनाव में उन्हें भाजपा से मुकाबला करना पड़ेगा। पिछले चुनाव में भाजपा ने आम आदमी पार्टी का सफाया कर दिया था। वर्तमान में शाहीन बाग और दिल्ली के दंगों की वजह से श्री केजरीवाल की छवि हिन्दू विरोधी नेता की होती जा रही थी। दंगों के दौरान उनकी अनुपस्थिति से हिन्दुओं को ये लगा कि विधानसभा चुनाव में भाजपा को हराकर वे ठगे रह गए। ऐसे में श्री केजरीवाल के आत्मसमर्पण नुमा इस कदम से राजनीति के जानकार जहां सन्न हैं वहीं भाजपा इसे पसंद करने के बाद भी सतर्क है क्योंकि वे कब कौन सा पैंतरा चल जाएँ ये कोई नहीं जानता। कन्हैया पर आरोप पत्र दाखिल किये जाने की अनुमति देकर उन्होंने अपने ऊपर नक्सली होने के आरोप को भी धो डाला है। यद्यपि अभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी लेकिन श्री केजरीवाल ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वे सामाजिक कार्यकर्ता की छवि से आगे बढ़कर अब विशुद्ध राजनेता बन चुके हैं जिसका हर निर्णय राजनीतिक नफे-नुकसान से प्रेरित होता है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 2 March 2020

भारत के लिए उबरने का स्वर्णिम अवसर




कोरोना वायरस ने चीन को तो भारी नुकसान पहुँचाया ही लेकिन उससे पूरी दुनिया प्रभावित हो रही है। पूंजी बाजार जबरदस्त गोते लगा रहे हैं। इसके प्रभावस्वरूप भारत के शेयर बाजार में भी बीते कुछ दिनों से हिचकोले महसूस किये गये। निवेशकों का अरबों का नुकसान होना बताया जा रहा है। पहले से मंदी की शिकार चल रही अर्थव्यवस्था के लिए ये हालात दूबरे में दो आसाढ़ वाली कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। एक तरफ  तो उक्त वायरस से संक्रमण का खतरा है वहीं दूसरी ओर चीन में आर्थिक गतिविधियाँ ठप्प हो जाने की वजह से भारत जैसे देश में कच्चे माल और अन्य जरुरी चीजों का अभाव हो गया है। जिन भारतीय उद्योगपतियों ने चीन में अपने कारखाने स्थापित कर रखे हैं वे भी काम बंद हो जाने की वजह से मुसीबत में फंस गए। हालंकि चीन की अर्थव्यवस्था में मंदी आने के आसार नजर आते ही अनेक बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ पहले से ही अपना कारोबार समेटकर भारत में जमने की सोचने लगी थीं किन्तु मौजूदा स्थितियों में अब ऐसा करना उनके लिए संभव नहीं रहा। चूँकि चीन से न कोई आ रहा है और न ही वहां जा रहा है इसलिए वहां की स्थिति कब तक सुधरेगी ये पता नहीं लग पा रहा। निश्चित रूप से ये एक बड़ा संकट है जो आर्थिक सुस्ती को और गम्भीर बना रहा है किन्तु मुश्किल के इस दौर में में भी नई उम्मीदें जागृत हो रही हैं। आर्थिक जगत की जानकारी रखने वाले अनेक विशेषज्ञ ये मान रहे हैं कि इस संकट में भारत के लिए उद्योग-व्यापार क्षेत्र में अपार संभावनाएं पैदा हुईं हैं। औद्योगिक संगठनों की प्रतिनिधि संस्था एसोचैम ने इस धारणा की पुष्टि करते हुए कहा है कि कोरोना वायरस से पैदा हुए हालात भारत के निर्यात बाजार को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कर सकते हैं। हालंकि ये बात भी याद रखनी होगी कि बीते दो दशक के दौरान भारतीय उद्योग कच्चे माल के लिए काफी हद तक चीन पर निर्भर करने लगे हैं। यही वजह है कि कोरोना संकट के बाद से भारत का मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर भी संकटग्रस्त हो गया। लेकिन जब ये तय हो गया कि चीन को उससे उबरने में लंबा समय लगेगा तब विश्व बाजार में उसकी जगह लेने वाला सबसे उपयुक्त देश भारत ही हो सकता है। ये उम्मीद कोई और जताता तब शायद उस पर भरोसा नहीं होता लेकिन एसोचैम जैसे संस्थान ने इस सम्भावना को विश्वसनीय माना तब उम्मीद की जा सकती है। लेकिन केवल खयाली पुलाव पकाने से भारत विश्व बाजार में चीन के स्थान को भरने में सफल नहीं हो सकेगा। अच्छा होगा केन्द्र और राज्य सरकारें उद्योगों के लिए विशेष पैकेज और रियायतें घोषित करें। वैसेे भी आर्थिक सुस्ती से निपटने के लिए ऐसे कदमों की उम्मीद और जरूरत थी। अब जबकि चीन से मिल रही प्रतिस्पर्धा में व्यवधान आ गया है इसलिए भारत के पास स्वर्णिम अवसर है अपनी अर्थव्यवस्था को ऊंचाइयों पर ले जाने का। भारत में कारोबारियों के पास खासा अनुभव है और काम करने वाले हुनरमंद कामगार भी। ऐसे में इस मौके को लपकने में भी यदि भारत चूक गया तब सिवाय हाथ मलने के और कुछ नहीं बचेगा। केंद्र सरकार कहने को तो आर्थिक सुस्ती से निपटने के लिए काफी कुछ करने के दावे कर रही है लेकिन कोरोना वायरस के बाद उत्पन्न हालातों में अब ऐसे उपाय करने की जरूरत है जिनका लाभ त्वरित मिलने लगे। किसी देश के राजनीतिक नेतृत्व और आर्थिक प्रबंधन की परीक्षा ऐसे ही अवसरों पर होती है। वैसे भी नरेंद्र मोदी सरकार को इसी मोर्चे पर सर्वाधिक आलोचना झेलनी पड़ रही है। ऐसे में यदि वह समय रहते देश में अनुकूल वातावरण बनाकर औद्योगिक गतिविधियों में तेजी लाने के लिए नीति निर्धारण करे तो बड़ी बात नहीं भारत के आर्थिक महाशक्ति बनने का रास्ता खुल सकता है। यद्यपि कुछ लोगों का अभी भी ये मानना है कि चीन लम्बे समय तक इस स्थिति में नहीं रहेगा और जल्दी ही दोबारा मैदान में उसी हौसले के साथ खड़ा नजर आयेगा लेकिन वैश्विक शक्ति संतुलन के मद्देनजर ये कहा जा सकता है कि अमेरिका सहित पश्चिम के विकसित देश उसे पहले जैसा पनपने नहीं देंगे। सही बात ये है कि विश्व व्यापार संगठन के नाम पर आई मुक्त अर्थव्यवस्था जिन विकसित देशों ने अपनी मंदी दूर करने के लिए दुनिया भर पर थोपी थी वे उसका अपेक्षित लाभ नहीं ले पाये जबकि चीन ने अपने चारों तरफ  खींचे लौह आवरण को स्वयं होकर तोड़ते हुए अपने दरवाजे पूरे विश्व के कारोबारियों के लिए खोलकर अकल्पनीय तरक्की हासिल कर ली। अमेरिका के बाजारों तक में चीन का बना सामान धड़ल्ले से बिकने लगा। कोरोना वायरस ने चीन के उस दबदबे को पलक झपकते कमजोर कर दिया। विकसित देशों में चूँकि श्रमिक बहुत महंगे हैं इसलिए वे चीन में उत्पादन गतिविधियाँ ठप्प होने का लाभ चाहकर भी नहीं ले सकेंगे। सस्ते मानव संसाधन के मामले में भारत ही चीन के मुकाबले वैश्विक अपेक्षाओं को पूरा करने में सक्षम है। एसोचैम द्वारा दिए संकेत के मर्म को समझकर केन्द्र सरकार को फौरन ऐसा कुछ करना चाहिए जिससे उद्योग-व्यापार जगत निराशा से निकलकर उत्साह का प्रदर्शन करे। भाग्य में विश्वास नहीं करने वालों को भी ये तो मानना ही पड़ेगा कि कोरोना वायरस में जहां चीन का दुर्भाग्य निहित है तो वह भारत की किस्मत खोलने का अवसर भी लेकर आया है। अब ये हमारे ऊपर है कि हम उसका किस तरह फायदा उठा पाते हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी