Wednesday, 18 March 2020

गोगोई : अब बात निकल ही पड़ी है तो .....





पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के राज्यसभा में मनोनयन पर उठा विवाद बड़ा ही महत्वपूर्ण है। न्यायपालिका के उच्च पदों से निवृत्त होने के बाद किसी पद पर नियुक्ति का ये पहला मामला नहीं है। अनेक संवैधानिक और अन्य पदों पर केवल सेवानिवृत उच्च या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश ही नियुक्त होते हैं। लोकपाल और लोकायुक्त के अलावा प्रेस काउन्सिल ऑफ  इंडिया सहित मानवाधिकार आयोग और उस जैसे अनेक संस्थानों में पूर्व न्यायाधीश की नियुक्ति अनिवार्य है। इन सब पर चयन राज्य या केंद्र की सरकारें ही करती हैं। तो क्या ये सभी राजनीति से प्रभावित नहीं हैं? अनेक विश्वविद्यालयों के कुलपति भी पूर्व न्यायाधीश बनाये गये। विभिन्न जांच आयोगों में भी उनकी नियुक्ति होती रही है। अब सवाल ये है कि क्या जब भी इस तरह की नियुक्ति होगी सम्बन्धित पूर्व न्यायाधीश की ईमानदारी और निष्पक्षता पर उंगलियां नहीं उठेंगीं ? श्री  गोगोई के मनोनयन की उनके साथ पत्रकार वार्ता में बैठे सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश श्री मदन बी. लोकुर और कुरियन जोसफ  ने तो आलोचना की ही लेकिन उन मार्कंडेय काटजू ने भी तीखे शब्द इस्तेमाल किये जो स्वयं सर्वोच्च न्यायालय से निवृत्ति उपरान्त प्रेस काउन्सिल ऑफ  इंडिया के अध्यक्ष के रूप में सरकारी सुविधाओं  के साथ रुतबे का लाभ उठा चुके हैं। वर्तमान में देश भर में न जाने कितने पूर्व न्यायाधीश सेवानिवृत्ति के बाद शासन द्रारा प्रदत्त किसी न किसी ऊंचे ओहदे पर बैठकर अच्छा खासा वेतन, सुविधाएं और रुतबे का मजा लूट रहे हैं। अब चूँकि श्री गोगोई की नियुक्ति पर विवाद उठ खड़ा हुआ है तो बेहतर होगा बाकी नियुक्तियों की भी विधिवत समीक्षा की जावे जिससे देश को ये पता चले कि न्याय की आसंदी से उतरकर कौन-कौन से मी लार्ड सरकारी खैरात का फायदा उठाते हुए बुढ़ापे का आनन्द ले रहे हैं। लगे हाथ ये भी स्पष्ट होना चाहिए कि देश के तमाम उच्च न्यायालयों के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय में पदस्थ वर्तमान न्यायाधीश किस राजनेता या न्यायाधीश के परिवार से हैं ? इस तरह के विवाद केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहें  और उनसे व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियां दूर हो सकें  तो ये देशहित में होगा। रंजन गोगोई राज्यसभा की सदस्यता लेने के बाद क्या कहने वाले हैं ये सभी सुनना चाहेंगे।

- रवीन्द्र वाजपेयी

विधायकों को मतदाताओं से दूर रखना मौलिक अधिकार का हनन




मप्र की राजनीति में जो कुछ भी हो रहा है उसे देखकर हंसी भी आती है और दु:ख भी होता है। दोनों पक्षों की तरफ  से नैतिकता और लोकतांत्रिक मर्यादाओं की दुहाई दी जा रही है लेकिन इनके प्रति आस्था कहीं भी नहीं दिखाई देती। यदि कमलनाथ के पास बहुमत है तो बजाय कोरोना की आड़ लेकर मुकाबले से बचने के उन्हें उसे साबित करना था। और यदि नहीं है तो बिना लागलपेट के इस्तीफा देते हुए विपक्ष में आ बैठते। इसी तरह भाजपा भी जिन 22 विधायकों को बेंगुलुरु में बिठाये हुए है उन्हें भोपाल लाकर विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष पेश कर देती तो अब तक अनिश्चितता दूर हो जाती। विधानसभा अध्यक्ष भी पूरी तरह से दलीय राजनीति का हिस्सा बने दिखाई दे रहे हैं। 22 बागी विधायकों में से 6 के इस्तीफे उनके वीडियो देखकर उन्होंने स्वीकार कर लिए लेकिन बाकी के बारे में उनकी नीति और नीयत दोनों समझ से परे हैं। राज्यपाल महोदय संविधान के मुखिया के तौर पर हैं लेकिन उनको भी कोई निष्पक्ष नहीं मान रहा। उनके स्पष्ट निर्देशों की मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष दोनों ने खुले आम धज्जियां उड़ा दीं लेकिन वे ये कहते हुए रह गये कि मुझे आदेशों का पालन करवाना आता है। भाजपा सर्वोच्च न्यायालय में लोकतंत्र बचाने के नाम पर जा पहुंची तो पीछे - पीछे कांग्रेस ने भी बागी विधायकों को बेंगुलुरु से लाने के लिए अदालत में अर्जी लगा दी। उधर बेंगुलुरु में बैठे विधायक वहां क्यों रुके हैं इसका जवाब भी किसी के पास नहीं है। उनके जो वीडियो सामने आये उनमें वे किसी दबाव से मुक्त होकर स्वेच्छा से ठहरे होने की बात दोहरा रहे हैं किन्तु उनके पास इस बात का कोई ठोस आधार नहीं है कि वे लौट क्यों नहीं रहे ? विधायकों को दूसरे राज्य में जाकर छिपने की क्या जरूरत पड़ गई इसका जवाब कोई नहीं दे पा रहा। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा ने उन्हें जबरन बंधक बना रखा है। मुख्यमंत्री ने तो ये तक कहा कि वे सब अपने घर लौट आयें और खुली हवा में सांस लें उसके बाद फिर वे विधानसभा में अपना बहुमत साबित करेंगे। लेकिन ये आरोप तो कांग्रेस पर भी है कि वह अपने विधायकों को अकेला नहीं छोड़ रही। यदि उनकी निष्ठा असंदिग्ध है तो पहले जयपुर और अब भोपाल के एक आलीशान होटल में उन्हें क्यों बिठा रखा है ? इसी तरह भाजपा भी अपने विधायकों को बटोरकर एक साथ रखे हुए है। कुल मिलाकर अविश्वास पूरे माहौल पर हावी है। न कोई नैतिक है और न ही निष्पक्ष। एक पक्ष सत्ता हासिल करने के लिए मरा जा रहा है तो दूसरा उससे चिपके रहने के लिए किसी भी हद तक जाने को आमादा है। संख्या बल हाथ से खिसक जाने के बाद भी बीते दो - तीन दिनों में जिस तरह से प्रशासनिक और राजनीतिक नियुक्तियां की गईं वे लूट सके सो लूट वाली कहावत को चरितार्थ कर रही है। इस सबके लिए किसी एक को कसूरवार ठहराना तो अन्याय होगा क्योंकि सभी पक्ष किसी न किसी रूप में लोकतंत्र का चीरहरण करने पर आमादा हैं। कांग्रेस और भाजपा दोनों ने अपने विधायकों को भेड़-बकरी जैसा बना दिया है। बीते 10-15 दिनों से वे अपने मतदाताओं और परिजनों से दूर हैं। भोपाल से सर्वोच्च न्यायालय तक संविधान के पालन और उल्लंघन की चर्चा चल रही है लेकिन प्रदेश के करोड़ों मतदाता अपने निर्वाचित जनप्रतिनिधि से जबरन दूर किये जाएं तो क्या ये उनके मौलिक आधिकारों का हनन नहीं है ? मामला चूंकि सर्वोच्च न्यायालय में है इसलिए होगा तो वही जो वह चाहेगा लेकिन इस समूचे विवाद में जो मतदाता इस संसदीय प्रजातंत्र का आधार है उसकी न कोई भूमिका है और न ही पूछ-परख। हमारे देश में ये स्थिति गाहे बगाहे किसी न किसी राज्य में बनती ही रहती है इसलिए आम जनता भी उसे गंभीरता से नहीं लेती लेकिन अब उसे भी सामने आना चाहिए। जनप्रतिनिधि अपनी राजनीतिक पार्टी के प्रति वफादार रहें ये तो जरूरी है लेकिन इस दौरान जनता पूरी तरह उपेक्षित कर दी जाए ये कहां का लोकतंत्र है?

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 17 March 2020

पूर्व न्यायाधीशों को लेकर आचार संहिता बननी चाहिए

मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस : सम्पादकीय
- रवीन्द्र वाजपेयी

पूर्व न्यायाधीशों को लेकर आचार संहिता बननी चाहिए

देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई एक बार फिर चर्चाओं के साथ विवाद में हैं। लेकिन उसकी वजह उनका अदालती फैसला न होकर राज्यसभा में उन्हें मनोनीत किया जाना है। राजनीतिक क्षेत्र के अलावा सोशल मीडिया पर भी उनके, मनोनयन पर पक्ष-विपक्ष में टीका-टिप्पणी हो रही है। ये कहा जा रहा है कि राम मन्दिर संबंधी फैसले के पुरस्कार स्वरूप उन्हें ये सौगात दी गई। कुछ लोगों का ये मानना है कि मोदी सरकार का ये कदम दूरगामी सोच की तरफ  इशारा करता है। ऐसा करके उसने वर्तमान न्यायाधीशों को ये लालच दे दिया है कि वे सरकार के अनुकूल फैसले देते रहें तो सेवा निवृत्ति के बाद उनका ध्यान रखा जाएगा। और भी अनेक बातें कहीं जा रही हैं। वैसे ये पहला अवसर नहीं है जब न्यायपालिका की सर्वोच्च आसंदी से निवृत्ति के उपरान्त किसी को राजनीतिक सत्ता ने उपकृत किया हो। सबसे बड़ा उदाहरण देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रहे रंगनाथ मिश्र का है जिन्हें कांग्रेस सरकार ने राज्यसभा में भेजा। दिल्ली में सिख दंगों के दौरान हुए नरसंहार में कांग्रेस के कतिपय नेताओं को बेकसूर ठहरा देने वाले आयोग के श्री मिश्र ही मुखिया रहे। दूसरा उदाहरण देश के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे एम एस गिल का था जिन्हें कांगे्रस ने राज्यसभा में भेजने के बाद केन्द्रीय मंत्रीमंडल में राज्य मंत्री भी बनाया। यद्यपि पूर्व न्यायाधीशों और नौकरशाहों को इस तरह से महिमामंडित करने पर आलोचना के स्वर सदैव उठे। ये सुझाव भी आया कि एक निश्चित अवधि तक उन्हें कोई पद स्वीकार नहीं करना चाहिए। न्यायपालिका में भी इस बारे में बुद्धिविलास होता रहा। अभी तक आम तौर से पूर्व न्यायाधीश किसी जांच आयोग, नियामक संस्थाएं, मध्यस्थत्ता ट्रिब्यूनल आदि में नियुक्त होते रहे। लेकिन राज्यसभा में मनोनयन का ये पहला प्रकरण है। फिर भी श्री गोगोई पर जिस तरह के तंज कसे जा रहे हैं उनके पीछे यदि नैतिक और पारदर्शी सोच होती तब उसे सहज रूप में लिया जा सकता था। लेकिन आज उनके विरोध में खड़े अधिकतर लोग वही हैं जो कुछ बरस पहले सर्वोच्च न्यायालय में चार न्यायाधीशों द्वारा की गयी पत्रकारवार्ता में श्री गोगोई के शामिल रहने पर उनके साहस की प्रशंसा करते नहीं थकते थे। उस दौरान तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के बहाने चार वरिष्ठ न्यायाधीशों ने मोदी सरकार पर न्यायिक स्वतंत्रता में दखल देने का आरोप लगाया। उस पत्रकार वार्ता ने पूरे देश में तहलका मचा दिया था। उस समय ऐसा माहौल बना जैसे देश में न्यायपालिका पूरी तरह से सरकार के शिकंजे में कैद होकर रह गयी। उन चार में से तीन तो सेवा निवृत्त हो गए। बचे श्री गोगोई जिनके बारे में ये माना जा रहा था कि कांग्रेसी पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण शायद केंद्र सरकार उनसे कनिष्ट किसी को मुख्य न्यायाधीश बनायेगी। अतीत में भी ऐसा हुआ है। पत्रकार वार्ता में उनकी मौजूदगी भी उनकी राह में अवरोधक थी। लेकिन मोदी सरकार ने ऐसा नहीं किया।  उनके पद पर आने के बाद ही उनके बारे में सरकार के साथ मिल जाने जैसी चर्चाएं शुरू हो गईं। राम जन्मभूमि के अलावा अनेक ऐसे प्रकरण हुए जिनमें श्री गोगोई द्वारा दिये गए फैसलों को सरकार की तरफदारी समझा गया। अयोध्या विवाद को दैनिक सुनवाई द्वारा उन्होंने जिस तत्परता से निपटाया वह इतिहास बन चुका है। उसके लिए उनकी जबरदस्त तारीफ  हुई लेकिन सेकुलर और अवार्ड वापिसी तबके को वह फैसला हजम नहीं हुआ जो उन्होंने अपनी सेवा निवृत्ति के ठीक पहले दिया। लेकिन याद रखने वाली बात येे भी है कि उस पीठ में चार न्यायाधीश और भी थे जिनमें एक मुस्लिम भी था। लेकिन सभी ने एक सा निर्णय दिया जो बड़ी बात थी। बहरहाल श्री गोगोई के पद से हटने के बाद भी उनके ऊपर निशाने साधे जाते रहे। ये भी कहा जाता है कि एक महिला द्वारा उन पर लगाये गये आरोप इसी षडय़ंत्र का हिस्सा थे जिस कारण वे दबाव में रहे। अनेक पूर्व मुख्य न्यायाधीश विभिन्न कारणों से विवादित हुए। कुछ पर भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप लगे और जांच भी हुई। भाई भतीजावाद भी न्यायपालिका में जमकर छाया रहता है। भ्रष्टाचार की बात तो खुद न्यायाधीश भी स्वीकार करते हैं। ऐसे में पूर्व मुख्य न्यायाधीश को राज्यसभा में मनोनीत किये जाने पर उठ रहे सवाल अपनी जगह सही हैं। बेहतर तो यही होता कि वे खुद होकर इसके लिए असहमति व्यक्त कर देते। लेकिन अब समय आ गया है जब इस तरह की नियुक्तियों को लेकर नियम या आचार संहिता बनाई जावे। सेवा निवृत्त न्यायाधीश के अनुभव का उपयोग करना बुरा नहीं है लेकिन ऐसा करते समय उसकी निष्पक्षता पर सवाल न उठें ये ध्यान रखना जरूरी है। हालांकि हमारे देश के नेता और न्यायपालिका से जुड़े लोग इस बारे में कितने सहमत होंगे ये कहना मुश्किल है। क्योंकि नैतिकता का ढिंढोरा पीटना और उसका पालन करना दो अलग बातें होकर रह गई हैं। यही वजह है कि श्री गोगोई की आलोचना वही लोग कर रहे हैं जिन्होंने खुद सत्ता में रहते हुए गलत परम्परा शुरू की। और जिनने ये मनोनयन किया वे उस समय उनका विरोध किया करते थे।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 16 March 2020

निष्पक्षता छोड़ पक्षकार बन गये निर्णायक



मप्र के राजनीतिक संकट का परिणाम फिलहाल पूरी तरह अनिश्चित है। दोनों पक्ष अपने प्रतिद्वंदी को मात देने के लिए हरसम्भव प्रयास कर रहे हैं। नैतिकता, शुचिता और लोकतान्त्रिक मर्यादाएं भोपाल के तालाब की गहराइयों में समा चुकी हैं। लेकिन इस सबके बीच संवैधानिक पदों पर विराजमान महानुभावों की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल हर उस व्यक्ति को विचलित कर रहे हैं जिसका लोकतंत्र में अटूट विश्वास है। इस तरह के राजनीतिक संकट के समय दो पद अचानक महत्वपूर्ण हो जाते हैं , पहला राज्यपाल और दूसरा विधानसभा अध्यक्ष। मप्र की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों के सन्दर्भ में भी इनके निर्णयों पर पूरा खेल आकर टिक गया है। विधायकों का पाला बदल और उन्हें भोपाल से दूर कहीं ले जाकर रखने के पीछे का मकसद तो समझ में आता है लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने काफी पहले ही ये व्यवस्था कर दी थी कि किसी भी सरकार का बहुमत राष्ट्रपति या राजभवन में नहीं वरन सदन के भीतर मतदान से होना चाहिए। इसीलिये जब भी किसी सरकार के बहुमत पर सवाल उठता है तब महामहिम उसे सदन के भीतर साबित करने का निर्देश देते है। मप्र में कांग्रेस के अनेक विधायकों द्वारा सदस्यता से इस्तीफा दे दिए जाने के कारण कमलनाथ की सरकार का बहुमत ज्योंही खतरे में में आया त्योंही भाजपा ने राज्यपाल का दरवाजा खटखटाया और उन्होंने आज 16 मार्च को विधानसभा का सत्र शुरू होते ही अपने अभिभाषण के फौरन बाद सरकार को बहुमत साबित करने का निर्देश दे दिया। उनकी तरफ  से ये निर्देश भी दिया गया कि मतदान बटन दबाकर किया जावे। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री कमलनाथ ने उनसे मिलकर कहा कि बेंगुलुरु में बैठे 22 विधायकों को वापिस लाये जाने की व्यवस्था पहले हो। इस दौरान ये पेंच भी फंस गया कि बेंगुलुरु जा बैठे 22 विधायकों के जो इस्तीफे विधानसभा अध्यक्ष नर्मदा प्रसाद प्रजापति तक एक भाजपा नेता द्वारा पहुंचाए गए थे उन्हें मंजूर करने के लिए उन्होंने तिथि निर्धारित की। इसके पीछे उद्देश्य इस बात की पुष्टि करना था कि त्यागपत्र बिना किसी दबाव के स्वेच्छा से दिया गया है। यद्यपि उनके बुलाने पर विधायक नहीं आये लेकिन आश्चर्यजनक तरीके से श्री प्रजापति ने उनमें से छह के त्यागपत्र मंजूर कर लिए। ये छह पूर्व मंत्री थे जिन्हें मुख्यमंत्री के आग्रह पर राज्यपाल द्वारा एक दिन पहले ही बर्खास्त किया जा चुका था। अध्यक्ष महोदय का ये निर्णय चौंकाने वाला था क्योंकि उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर उपस्थित नहीं होने के बावजूद भी इस आधार पर छह पूर्व मंत्रियों के इस्तीफे मंजूर कर दिए क्योंकि वे वीडियो साक्षात्कार में ऐसा कह चुके थे। यद्यपि शेष विधायकों ने भी वीडियो पर वैसे ही साक्षात्कार दिए थे लेकिन अध्यक्ष ने उनका संज्ञान नहीं लिया जिसका कारण वे ही बता सकते हैं। दूसरी तरफ  राज्यपाल द्वारा आज बहुमत साबित किये जाने के निर्देश को हवा में उड़ा दिया गया। पत्रकारों द्वारा पूछे जाने पर श्री प्रजापति ने उसे एक काल्पनिक सवाल बताते हुए ये एहसास करवाने की कोशिश की कि वे महामहिम की बात मानने को बाध्य नहीं हैं। उधर राज्यपाल को जब भाजपा से पता लगा कि सदन में वोटिंग के लिए बटन दबाने वाली प्रणाली खराब है और ध्वनि मत से बहुमत साबित किये जाने पर गड़बड़ी की आशंका है तब महामहिम ने विधानसभा सचिव को बुलाकर उनकी खिंचाई कर दी। यहीं नहीं आधी रात को मुख्यमंत्री को बुलवाकर आज की कार्यसूची में बहुमत साबित करने का जिक्र न होने पर नाराजगी भी व्यक्त की। इस पर कमलनाथ ने अपनी पहले वाली बात दोहराते हुए बेंगुलुरु से 20 विधायकों के लौटने की शर्त रख दी। राज्यपाल द्वारा दबाव बनाये जाने पर उन्होंने ये कहकर बात टाल दी कि बहुमत परीक्षण पर अध्यक्ष ही निर्णय लेंगे जिन्होंने आज राज्यपाल के अभिभाषण के बाद कोरोना का बहाना बनाकर सदन 26 मार्च तक स्थगित कर दिया गया। इस दौरान ये साफ़  हो गया कि भाजपा बहुमत साबित करने के लिए लालायित है वहीं सत्ता पक्ष इसे जितना हो सके टालने की रणनीति पर चल रहा है। दोनों तरफ  से व्हिप जारी हो चुके थे। बागी विधायकों के अलावा भी कुछ और के एन वक्त पर पाला बदलने की चर्चा दोनों तरफ  से चलाई जा रही थी। सरकार को गिराने और बचाने के साथ ही राज्यसभा चुनाव के लिहाज से भी मोर्चेबंदी हो रही है। लेकिन राजनीतिक रस्साकशी से अलग हटकर राज्यपाल और विधानसभा अध्यक्ष भी इस खेल में बजाय निष्पक्ष निर्णायक बने रहने के पक्षकार बनकर सामने आ गए। हालांकि ये कोई पहला उदाहरण नहीं है। जिस राज्य में भी इस तरह का राजनीतिक संकट आता है वहां राज्यपाल और विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका पर सवाल उठते हैं। यदि दोनों एक ही राजनीतिक दल से जुड़े रहे हों तब तो सामंजस्य बना रहता है लेकिन अलग दलों से होने पर वैसा ही टकराव देखने मिलता है जैसा मप्र के मौजूदा राजनीतिक संकट में दिखाई दे रहा है। क्या राज्यपाल सदन की कार्यसूची तय करने संबंधी निर्देश दे सकते है और विधानसभा अध्यक्ष उसे मानने बाध्य हैं या नहीं इसे लेकर भी सवाल खड़े हो गये हैं। कौन सही है और कौन गलत ये विश्लेषण और वैधानिक समीक्षा का विषय है लेकिन एक बार फिर इन दोनों संवैधानिक पदों से जुडी गरिमा को ठेस पहुंची है। भले ही दोनों अपने को निष्पक्ष और नियम प्रक्रिया से जुड़ा बताते फिरें लेकिन सामान्यतया ये माना जा रहा है कि राज्यपाल भाजपा की सरकार बनवाने की भूमिका तैयार कर रहे हैं वहीं विधानसभा अध्यक्ष की पूरी कोशिश कमलनाथ सरकार को बचाने की है। आज सदन में जो कुछ हुआ उसके बाद राजभवन की भूमिका क्या होगी इस पर सभी की निगाहें लगी रहेंगीं। बात राष्ट्रपति शासन की भी हो रही है। भाजपा आज के फैसले के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय भी जा पहुंची है जहां कल सुनवाई होनी है। लेकिन दु:ख का विषय ये है कि संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों द्वारा अपने अधिकारों के दुरूपयोग की पुनरावृत्ति रुकने का नाम नहीं ले रही। मप्र में जो कुछ भी हो रहा है और आगे भी होगा उसमें जीते हारे कोई भी लेकिन जिस संविधान की दुहाई पक्ष-विपक्ष बात-बात में देते नहीं थकते उसका जमकर मजाक उड़ रहा है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 14 March 2020

दंगाइयों से हर्जाना वसूली का कानून पूरे देश में लागू हो



उप्र सरकार द्वारा जुलूस, प्रदर्शन, हड़ताल और बंद आदि के दौरान होने वाले उपद्रव से सरकारी और निजी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वालों से हर्जाना वसूलने के लिए गत दिवस एक अध्यादेश लाया गया। बीते दिनों अलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सीएए विरोधी दंगों के दौरान सरकारी और निजी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वालों के नाम और पते युक्त चित्रों के पोस्टर सड़कों पर प्रदर्शित किये जाने पर स्वत: संज्ञान से विचार करते हुए उप्र सरकार को उन्हें उतारने का आदेश देते हुए उसे निजता और सम्मान के विरुद्ध बताया। राज्य सरकार उस आदेश के विरूद्ध सर्वोच्च न्यायालय गई लेकिन वहां भी उससे सवाल पूछा गया कि उस कदम का कानूनी आधार क्या था? उच्च न्यायालय ने अपने आदेश के क्रियान्वयन हेतु 16 मार्च तक का समय दिया है। उक्त आदेश पर पूरे देश में बहस हो रही है। दंगाइयों की निजता और सम्मान की बात बहुतों को हजम नहीं हुईं। दंगों के दौरान सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाना आम हो गया है। लखनऊ दंगों का पूरा घटनाक्रम टीवी कैमरों में सीधा प्रसारित हुआ था। उप्र सरकार ने उसके बाद नुकसान की भरपाई दोषी व्यक्तियों से करने के लिए बाकायदा नोटिस देकर वसूली की कार्रवाई शुरू कर दी। दंगा भड़काने के आरोपी कुछ लोगों के नाम, पते और चित्र युक्त पोस्टर लगाकर सार्वजनिक किये गए। जिन्हें अलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश गोविन्द माथुर ने हटवाने के आदेश दे दिए। सर्वोच्च न्यायालय में उस आदेश के विरुद्ध की गयी अपील की सुनावाई के दौरान भी राज्य सरकार को असहज लगने वाले प्रश्नों का सामना करना पड़ा। इसीलिये योगी सरकार ने बिना देर किये एक अध्यादेश निकलवा दिया जिसमें सरकारी और निजी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वाले से उसका हर्जाना वसूल किये जाने का प्रावधान है। यद्यपि इसकी विस्तृत नियमावली इतनी जल्दी तैयार नहीं हो सकती इसलिए सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत अपील में राज्य सरकार को कितनी राहत मिलेगी ये कहना कठिन है लेकिन अध्यादेश लागू होने के बाद दंगों के दौरान उपद्रव करने वालों में खौफ  जरूर पैदा होगा ये उम्मीद की जा सकती है। योगी सरकार के इस कदम की आलोचना करने वाले भी शांत नहीं बैठेंगे किन्तु हर समझदार व्यक्ति इस बात को लेकर चिंतित है कि जनांदोलनों के दौरान तोडफ़ोड़ सामान्य हो गई है। पुलिस की गाडिय़ों के अलावा सार्वजनिक बसों और निजी वाहनों को क्षति पहुँचाने और आग लगा देने की प्रवृत्ति आम होती जा रही है। निजी संपत्ति भी निशाने पर होती है। लखनऊ के उपद्रव में सीसी कैंमरों के जरिये दोषी तत्वों की पहिचान करने के बाद राज्य सरकार द्वारा उन पर हर्जाने की कार्रवाई की गयी। दिल्ली में हुए हालिया दंगों में भी बड़े पैमाने पर सरकारी और निजी सम्पत्ति में तोडफ़ोड़ और आगजनी का नजारा दिखाई दिया। इस परिप्रेक्ष्य में योगी सरकार द्वारा जारी किया गया अध्यादेश सामयिक कदम भी है और साहसिक भी। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति और आन्दोलन की स्वतंत्रता एक आवश्यक तत्व है लेकिन हमारे देश में इसके स्वछंदता में बदल जाने से अनुशासनहीनता का बोलबाला हो गया। कानून का लिहाज और भय दोनों नजर नहीं आते। आन्दोलनकारी कब दंगाई बन जाते हैं ये समझ ही नहीं आता। किसी भी मांग के लिए सड़क पर खड़े वाहनों को नुकसान पहुंचाना या जला देना कैसा लोकतंत्र है? पुलिस चौकी में आग या किसी दूकान अथवा मकान को जला देने का भी औचित्य सिद्ध नहीं किया जा सकता। लखनऊ और दिल्ली के दंगों के बाद के जो चित्र आये उन्हें देखकर लगा कि दंगाइयों को केवल सजा देने मात्र से काम नहीं चलने वाला। उस दृष्टि से योगी सरकार द्वारा लाए गए अध्यादेश पर केंद्र सरकार को भी विचार करते हुए पूरे देश के लिए वैसा ही कानून बनाने की पहल करना चाहिए। हो सकता है सरकार के कुछ सहयोगी भी इस पर आपत्ति दर्ज करवाएं और इसमें भी सांप्रदायिकता ढूंढ ली जावे लेकिन लोकतंत्र को बेलगाम होने से बचाने के लिए ऐसा करना निहायत जरूरी हो गया है। शांतिपूर्ण आन्दोलन कब हिंसक हो जाए कहना कठिन होता है। ये कहना भी गलत नहीं है कि भीड़ का लाभ लेकर असामाजिक, अपराधी और राष्ट्रविरोधी तत्व अपना खेल दिखा देते हैं। निजी खुन्नस निकालने का काम भी होता है। पहले ऐसे लोगों की पहिचान नहीं हो पाने से पुलिस और प्रशासन उनके विरुद्ध कुछ करने में सक्षम नहीं होते थे लेकिन अब सीसी कैमरों की मदद से उपद्रवियों की शिनाख्त सम्भव है। ऐसे में उनके द्वारा की जाने वाली तोडफ़ोड़ और आगजनी की भरपाई उनसे किया जाना संभव हो गया है। इस आधार पर योगी सरकार के इस अध्यादेश का राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में समर्थन किया जाना चाहिये। कानून केवल किताबों में सिमटकर रह जाने की बजाय व्यवहारिक हो और उसके पालन के प्रति गम्भीरता हो इसके लिए ऐसे कदम जरूरी हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 13 March 2020

गनीमत है कोरोना भारत से शुरू नहीं हुआ वरना ....

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विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा कोरोना को वैश्विक महामारी घोषित करने के बाद अमेरिका जैसे देश तक ने उसे खतरनाक मानते हुए यूरोप से आने वाले लोगों पर प्रतिबन्ध लगा दिया। ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्री भी  कोरोना पीडि़त हो गए हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति तो एक विदेशी राष्ट्र प्रमुख के स्वागत में नमस्कार करते दिखाई दिए। ईरान सरकार के अनेक  बड़े नेता इस बीमारी की चपेट में आकर जान गँवा बैठे। इटली भी कोरोना  से हलाकान है। वहां सभी लोगों को घर में रहने कह दिया गया है। अनेक देशों में कर्मचारियों को घर में रहकर ही काम करने की सुविधा दे दी गयी है। चीन में अब नये मरीजों की संख्या में तो कमी आई है लेकिन अनेक देशों में कोरोना से लाखों लोग संक्रमित हो चुके हैं। चूँकि अभी तक इसका कोई टीका नहीं बना इसलिए इसको रोकने  के बारे में चिकित्सा जगत भी असहाय है। केवल इजरायल ने ये दावा किया है कि वह कोरोना को रोकने वाली दवाई बनाने के करीब पहुंच चुका है। इस बीच भारत की संसद में गत दिवस स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन ने कोरोना  को लेकर  जो जानकारी प्रस्तुत की वह वाकई उत्साहवर्धक है। चीन के साथ भारत के व्यापार सम्बन्ध होने से वहां आना जाना बढ़ा है। बीमारी के चरमोत्कर्ष के वक्त भी उसके मुख्य केंद्र वुहान में सैकड़ों भारतीय थे जिन्हें सुरक्षित निकाल लिया गया। ईरान में कार्यरत भारतीय भी सुरक्षित बुला लिए गये। जबकि वहां के हालात बेहद चिंताजानक हैं। यही नहीं तो भारत सरकार ने कोरोना  की जांच हेतु एक आधुनिक लैब के उपकरण ईरान भेजे हैं जिन्हें उसे भेंट में दे दिया जावेगा। एहतियातन भारत में भी हाई एलर्ट कर दिया गया है। हवाई अड्डों पर विदेशों से आने वालों की सघन जाँच हो रही है। दिल्ली सहित अनेक राज्यों में स्कूल 31 मार्च तक बंद कर  दिए गये हैं। दिल्ली सरकार ने तो सिनेमा घरों में भी तालाबंदी करवा दी। वहीं आईपीएल मैच बिना दर्शकों के करने कहा गया है। आम जनता को कोरोना से बचाने के लिए सावधानी बरतने हेतु सरकारी प्रचार किया जा रहा है। संचार माध्यम भी अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। भारत सरकार  ने 15 अप्रैल तक सभी वीजा रद्द कर दिए हैं। इसके कारण पर्यटन, होटल, उड्डयन व्यवसाय चौपट होने लगा है। तथा पहले से चली आ रही आर्थिक मंदी और भी खतरनाक स्तर तक जा पहुँची है। भारत में हालाँकि कोरोना से संक्रमित मरीजों की संख्या अभी तक 100 से भी कम है और सऊदी अरब से लौटे  एक वृद्ध की कल हुई मौत के अलावा अभी तक किसी और के मरने की जानकारी नहीं आई है। लेकिन आर्थिक क्षेत्र में कोरोना का जबर्दस्त असर हुआ है। अर्थव्यवस्था की हालत चिंताजनक है। चीन से आयात रुकने की वजह से कच्चे माल की किल्लत हो रही है। जिसका असर आने वाले दिनों में दिखाई देगा। चेहरे पर लगाने वाले मास्क और हाथ धोने वाले एल्कोहल युक्त सैनेटाईजर खत्म हो चुके हैं या उनकी कालाबाजारी हो रही है। लेकिन इस बारे में सबसे बड़ी बात एक आर्थिक विशेषज्ञ ने कही जिसके अनुसार यदि ये बीमारी चीन की बजाय भारत से शुरू हुई होती तो हालात भयावह हो जाते। चीन में महामारी का हमला बेहद भयानक था। इसके पहले कि कुछ समझ में आता तब तक हजारों लोग संक्रमित हो चुके थे और बड़ी संख्या में मौतें हो गईं। ये भी माना जाता है कि साम्यवादी सरकार होने के नाते वहां कोरोना से मारे गये लोगों की सही जानकारी नहीं दी गई। करोड़ों लोग लम्बे समय तक घरों में कैद जैसे रहे किन्तु हल्ला नहीं मचा। हफ्ते भर के भीतर हजारों मरीजों की क्षमता वाले अस्थायी अस्पातल की व्यवस्था भी वुहान में कर ली गयी। उस दृष्टि से  भारत में अचानक आने वाली ऐसी किसी महामारी से निपटने के इंतजाम बहुत ही कम हैं। हालांकि केंद्र सरकार ने जिस तरह के कदम उठाये उसकी वजह से बीमारी का प्रकोप ज्यादा नहीं फैला। सरकारी आंकड़ों को सही न मानें तब भी इटली और ईरान की अपेक्षा भारत ने काफी बचाव कर  लिया। विदेशों  से आने वालों की सघन जाँच और जरा भी लक्षण पाए जाने पर पूरी सावधानी बरतने के साथ ही देश भर में तकरीबन 50 लैब के अलावा उतने ही कलेक्शन सेंटर स्थापित करना काफी सहायक बना। जनता को जागरूक भी समय रहते कर  लिया गया। भारतीय मौसम और बाकी  परिस्थितियों के मद्देनजर कोरोना का बहुत ज्यादा असर शायद नहीं पड़े लेकिन इस बहाने हमें अपनी स्वास्थ्य सेवाओं के आकलन का एक अच्छा अवसर मिल गया। सरकार के आलोचकों ने भी ये माना कि केंद्र सरकार ने कोरोना को लेकर अभी तक जो कुछ भी किया वह संतोषजनक कहा जा सकता है। लेकिन इसी के साथ ये बात भी स्वीकार करनी होगी कि प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाला सरकारी खर्च समय और जरूरत के मुताबिक बहुत ही कम है। चंद अपवादों को छोड़ दें तो सरकारी चिकित्सा सुविधाएँ ही बीमार हैं। मोदी सरकार ने जिस आयुष्मान योजना को लागू किया वह मुख्य रूप से शहरों में ही कारगर है क्योंकि वहां सरकारी के साथ ही निजी अस्पतालों की भरमार है किन्तु छोटे शहरों, कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में हालात बहुत ही दयनीय हैं। किसी भी तरह की विपत्ति उससे लडऩे के तरीकों की खोज का आधार बनती है। महामारी के बाद ही उसका इलाज खोजा  जाता है। लेकिन भारत में इस बारे में आत्मनिर्भरता का अभाव है क्योंकि चिकित्सा जगत में शोध की स्थिति वैश्विक स्तर के हिसाब से  बहुत ही मामूली है। केंद्र  और राज्यों के बजट में स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च के आंकड़े बढ़ती जरूरत को पूरा नहीं करते। दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने मोहल्ला क्लीनिक की दशा को काफी सुधारा और मुफ्त इलाज की सुविधा भी प्रदान की किन्तु किसी बड़ी महामारी से लडऩे की योग्यता और क्षमता हमारे देश के चिकित्सा तंत्र में नहीं है। मौजूदा संकट तो आने वाले कुछ दिनों में तापमान बढ़ते ही खत्म हो जाएगा लेकिन कोरोना दोबारा नहीं लौटेगा इसकी गारंटी क्या है? इसी के साथ यदि इसी तरह का कोई नया और अपरिचित वायरस कहीं भारत में आ धमका तब क्या होगा उसकी तैयारी भी होनी चाहिए।  फर्ज करें यदि कोरोना का प्रकोप चीन के बजाय भारत से प्रारम्भ हुआ होता तो जो हालात बनते उसकी कल्पना मात्र से रूह कांपने लगती है। हर साल चमकी बुखार से सैकड़ों बच्चों की मौत को रोक पाने में विफल हमारे चिकित्सा तंत्र को स्वस्थ और तंदुरस्त बनाने के लिए उसे देश की सुरक्षा जैसी सर्वोच्च प्राथमिकता देना समय की मांग ही नहीं जरूरत भी है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 12 March 2020

दिग्विजय की राजनीति ने डुबो दिया कमलनाथ को



हालांकि आज की राजनीति इतनी अनिश्चित और अविश्वसनीय हो गयी है कि किसी तरह की भविष्यवाणी करना जल्दबाजी होती  है किन्तु मप्र की कमलनाथ सरकार जिस तरह के संकट में फंसी है उसे देखते हुए सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी ये मानकर चल रहा है कि ये कुछ ही  दिनों की मेहमान है। 20 कांग्रेसी विधायक जिनमें 6 मंत्री भी थे, बेंगलुरु में बैठे हुए हैं। उनके नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने पहले कांग्रेस  छोड़ी और गत दिवस वे विधिवत भाजपा में शामिल हो गए। जैसा कहा जा रहा है उसके अनुसार  वे काफी समय से नाराज चल रहे थे। मप्र की सत्ता में कांग्रेस की वापिसी में उल्लेखनीय योगदान के बाद भी पार्टी ने सत्ता और संगठन में उन्हें अपेक्षित महत्व नहीं दिया। रही-सही कसर पूरी कर दी 2019 के लोकसभा चुनाव में गुना सीट पर हुई अप्रत्याशित हार ने जिसके बाद श्री सिंधिया हाशिये पर सिमटकर रह गये थे। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने की उनकी कोशिशों को भी कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की जुगलबन्दी ने सफल नहीं  होने दिया। ऐसे में उनके लिए  केवल राज्यसभा में जाना ही एक अवसर बचा था किन्तु इसके बारे में  भी कोई ठोस आश्वासन उन्हें न तो प्रदेश स्तर पर मिला और न ही अपने दोस्त राहुल गांधी से। ऐसे में जब श्री सिंधिया को लगा कि उनके लिए कांग्रेस में संभावनाओं के सभी दरवाजे बंद हो चले हैं तब उन्होंने वह फैसला किया जो  चौंकाने वाला था। मप्र की कमलनाथ सरकार को गिराने की भाजपाई कोशिशें तो शुरू  से ही चल रही थीं। लेकिन बीच में  उसके अपने दो विधायक ही कांग्रेस की गोद में जा बैठे। लेकिन पहले आधा दर्जन विधायकों का गुरुग्राम में जा बैठना और फिर छह मंत्रियों सहित 20 विधायकों  के  भाजपा के संरक्षण में बेंगुलुरु चले जाने के बाद ये साफ हो गया था कि इस मुहिम के पीछे किसी दिग्गज कांग्रेसी का हाथ है और होली के दिन ये साफ हो गया कि ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बगावत का बिगुल फूंक दिया है। कांग्रेस ने उन्हें मनाने की कितनी  कोशिशें कीं ये स्पष्ट  नहीं है। 9 मार्च को उन्होंने श्रीमती  गांधी से मिलना चाहा किन्तु उन्हें समय नहीं दिया गया। यदि वह  मुलाकात हो जाती तब संभवत: श्री सिंधिया ठन्डे पड़ जाते। लेकिन इस बारे में चौंकाने वाली बात ये रही कि उनके अभिन्न मित्र राहुल ने भी उनकी खोज खबर नहीं ली। आखिरकार गत दिवस वे भाजपा में शामिल हो गए और उन्हें बतौर पुरस्कार राज्यसभा की टिकिट भी दे दी गयी। हालाँकि इसकी पुष्टि नहीं हुई किन्तु ऐसा कहा जा रहा है कि उन्हें केन्द्रीय मंत्रीमंडल में भी जल्द ही शामिल  किया जावेगा। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे उल्लेखनीय पहलू ये है कि गांधी परिवार के बेहद निकट रहने के बाद भी श्री सिंधिया की नाराजगी दूर करने का प्रयास न तो सोनिया जी की तरफ से हुआ और न ही राहुल के। प्रियंका वाड्रा की भी कोई भूमिका नहीं दिखी। इसके विपरीत भाजपा ने इस मौके को लपकने में जरा भी देर नहीं की और गृहमंत्री अमित शाह खुद श्री  सिंधिया को लेकर प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी के पास गए। बहरहाल अब श्री सिंधिया भाजपा में आ गए हैं और आज भोपाल पहुंचकर राज्यसभा का पर्चा  भी भर देंगे। लेकिन अभी इस सियासी नाटक का मध्यांतर ही हुआ है। पटकथा का क्लाइमैक्स तो अब सामने आयेगा। भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपने-अपने विधायकों को क्रमश: हरियाणा और राजस्थान भेज दिया है। बेंगलुरु में बैठे 20 बागी कांग्रेसी विधायकों पर ही पूरा दारोमदार है। कांग्रेस उनमें से कुछ को तोडऩे की पूरी कोशिश कर रही है किन्तु अभी तक सफलता उससे दूर ही है। वहीं भाजपा भी ये समझ बैठी है कि जरा सी भी रणनीतिक चूक से बना बनाया खेल खराब हो सकता है। इसलिए दोनों पक्षों से पूरी ताकत झोंकी जा रही है। 20 विधायकों ने विधायकी से अपने त्यागपत्र भेज दिए हैं लेकिन वे आवश्यक प्रक्रिया का पालन होने तक स्वीकार  नहीं हो पाएंगे। उनके पहले 2 विधायकों ने भी अपने त्यागपत्र सौंप दिए थे। कांग्रेस के पास सपा- बसपा और निर्दलीय मिलाकर 92-94 विधायक बचे हैं जबकि भाजपा 105 को लेकर बैठी है। त्यागपत्र देने वाले विधायकों के बारे में फैसला विधानसभा अध्यक्ष नर्मदा प्रसाद प्रजापति को करना है जो जाहिर है कांग्रेस के हितों के मुताबिक होगा। जैसी खबर है उसके अनुसार कमलनाथ समझ गये हैं कि बाजी उनके हाथ से निकल गयी है। लेकिन वे अपने अनुभव और प्रबंध कौशल का पूरा उपयोग करते हुए ये भरोसा दिला रहे  हैं कि उनका मास्टर स्ट्रोक अभी बाकी है। 20 विधायकों का जो होगा उसका राज्यसभा चुनाव पर जैसे भी असर पड़े लेकिन जिस तरह के संकेत मिल रहे हैं उनके अनुसार कमलनाथ सरकार का बचना तकरीबन असम्भव होता जा रहा है। अब सवाल ये है कि ये हालात आखिरकार बने तो बने कैसे? और जवाब है कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले दिग्विजय सिंह की सियासी चालों से उनकी गद्दी खतरे में आ गयी। जैसी जानकारी मिल रही है उसके अनुसार मुख्यमंत्री तो श्री सिंधिया के साथ सामंजस्य बिठाने के इच्छुक थे किन्तु दिग्विजय सिंह ने ग्वालियर राजघराने से अपनी निजी खुन्नस के चलते सब कुछ चौपट करके रख दिया। इस तरह आन्तरिक गुटबाजी और चंद नेताओं की महत्वाकांक्षा ने अच्छी भली चल रही सरकार की विदाई तय कर दी। ज्योतिरादित्य भले ही  पूरे प्रदेश में प्रभाव न रखते हों लेकिन उनकी छवि कमलनाथ और दिग्विजय की अपेक्षा बेहतर है। और यही भाजपा के लिए फायदेमंद हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में सिंधिया घराने के असर वाले ग्वालियर-चम्बल संभाग में भाजपा को जबरदस्त नुकसान उठाना पड़ा था। ज्योतिरादित्य के आने से वहां पार्टी राजमाता सिंधिया वाले दौर में लौट सकती है। खैर, ये सब तो भविष्य की कोख में छिपी बातें हैं किन्तु आने वाले कुछ दिनों में कमलनाथ सरकार की विदाई होना तय है। ये काम राज्यसभा चुनाव के पहले होगा या बाद में ये अभी नहीं कहा जा सकता लेकिन आंकड़े कमलनाथ से दूर होते जा रहे हैं। उनका मास्टर स्ट्रोक कुछ भी हो लेकिन दिग्विजय सिंह की शकुनी चालों ने जिस तरह के हालात पैदा कर दिए उनके कारण प्रदेश में सत्ता परिवर्तन अवश्यम्भावी है। इस राजनीतिक महाभारत का अंतिम परिणाम जो भी हो लेकिन एक बात निश्चित है कि दिग्विजय सिंह और कमलनाथ की राजनीति अंतिम सांसें गिनने की ओर है। आयु के चलते वे दोबारा लडऩे की स्थिति में नहीं होंगे। इस प्रकार मप्र में लम्बे इन्तजार के बाद आये कांग्रेस के अच्छे दिन जल्द ही खत्म होने जा रहे हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी