Monday, 8 February 2021

ये इससे बड़े हादसे की चेतावनी भी हो सकती है



गत दिवस उत्तराखंड के चमोली में हिमशैल ( ग्लेशियर ) के टूटने से जो हालात उत्पन्न हुए वे प्रलय के पूर्वाभ्यास से कम नहीं थे | देखते   - देखते जल सैलाब आया और उसकी चपेट में आई हर चीज पलक झपकते बर्बाद हो गयी | शुरुवाती आंकड़ों में जनहानि की जो जानकारी आई उसमें और वृद्धि की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता | ऋषि गंगा नामक अलकनंदा की सहायक नदी पर बन रहे बाँध सहित कुछ और पनबिजली परियोजनाओं का  निर्माण भी तबाही  का शिकार हो गया | उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदा का ये पहला  मामला नहीं है | बढ़ते वैश्विक तापमान से ग्लेशियरों के सिकुड़ने का सिलसिला निर्बाध जारी है | लेकिन  सबसे बड़ी बात ये हुई कि बजाय गर्मियों के सर्दियों के मौसम में बर्फ का पहाड़ टूटकर  भयंकर बर्बादी का कारण बन गया | जिस नन्दा देवी क्षेत्र में हादसे की जगह स्थित है उसे बेहद संवेदनशील मानकर पर्यावरण वैज्ञानिक  प्राकृतिक संतुलन से की जा रही छेड़छाड़ के प्रति चेताते रहे हैं | 2013 में  हुए केदारनाथ हादसे के बाद भी विशेषज्ञों की अनेक समितियाँ बनीं जिनकी रिपोर्ट में उत्तराखंड में विकास कार्यों के कारण पर्यावरण को हो रहे नुकसान पर चिंता व्यक्त की गई थी किन्तु जैसी कि प्रारम्भिक जानकारी आई उसके अनुसार उनके  सुझावों पर गौर करने की जरूरत ही नहीं समझी गई | एक बात और भी जो इस हादसे के संदर्भ में उल्लिखित है , वह है उत्तराखंड में फोरलेन सड़कों का जाल बिछाने के लिये पहाड़ों को तोड़ने - फोड़ने के लिए किये जाने वाले विस्फोटों के  कम्पन से हिमशैलों का आधार कमजोर हो जाना | कुछ लोग इस हादसे में चीन के हाथ होने का भी जिक्र कर रहे हैं परन्तु  उस बारे में बिना पुख्ता सबूत के कुछ कहना उचित न होगा | लेकिन हमारे हिस्से की जो गलतियाँ हैं उनसे नहीं सीखने की चारित्रिक विशेषता की वजह से ऐसे किसी भी हादसे के बाद बुद्धिविलास तो बहुत होता है लेकिन ठोस काम नहीं होने से समय - समय पर उनकी पुनरावृत्ति होती रहती है | ताजा दुर्घटना के असली कारण की जाँच के बाद एक बार फिर मोटी - मोटी रिपोर्टों की फाइलें सरकारी आलमारियों की शोभा बढ़ाएंगी |  मरने वालों के परिवारों को नगद राशि का ऐलान तो राज्य और केंद्र दोनों सरकारों ने कर ही दिया , राहत और बचाव के काम भी कल से ही चल रहे हैं | कहा जा रहा है कि निजी क्षेत्र के तहत बन रही एक पनबिजली परियोजना का काम तो 95 फीसदी पूरा हो चुका था जो पूरी तरह मिट्टी में मिल गया | आर्थिक क्षति का आकलन  कमोबेश हो ही जाएगा लेकिन प्रभावित इलाके के पर्यावरण को जो नुकसान हुआ वह अपूरणीय है क्योंकि मानव निर्मित किसी ढांचे को तो दोबारा बनाया जा सकता है लेकिन एक पहाड़ के धराशायी होने के बाद उसका पुनर्निर्माण संभव नहीं होता | उत्तराखंड भारत की  सबसे पवित्र गंगा और यमुना नदी का उद्गम स्थल है | इसे देवभूमि भी कहा जाता है | हिन्दुओं और सिखों के पवित्र तीर्थ  होने के साथ ही यहाँ  पर्यटन के भी अनेक प्रसिद्ध स्थल होने से लाखों तीर्थयात्री और सैलानी प्रतिवर्ष यहाँ आते हैं | एक जमाना था जब चारधाम यात्रा पैदल की जाते थी किन्तु विज्ञान और तकनीक के विकास ने आवागमन के जो आधुनिक साधन विकसित किये उनकी वजह से उत्तराखंड ही नहीं वरन समूचे पहाड़ी क्षेत्रों का प्राकृतिक संतुलन पूरी तरह से बिगड़ चुका है | वर्तमान में चार धाम की यात्रा  के  लिए चौड़ी बारहमासी सडकें बनाये जाने के कारण पहाड़ों के आकार और आधार पर प्रहार हो रहा है | गत दिवस जो कुछ हुआ  उसने उन  तमाम आशंकाओं को सही  साबित कर दिया जो इसी क्षेत्र में दशकों पहले शुरू हुए चिपको आन्दोलन के समय से व्यक्त की जाती रही हैं | टिहरी बाँध परियोजना का विरोध करने वालों ने जो - जो खतरे बताये थे वे सब धीरे - धीरे सामने आते जा रहे हैं | सुन्दरलाल बहुगुणा और उन जैसे अनेक लोगों ने उत्तराखंड में  पर्यावरण संरक्षण के लिए जो आन्दोलन और अभियान चलाये उनको समर्थन और सम्मान तो खूब मिला लेकिन उनके सुझावों और मांगों को उपेक्षित किये जाने की वजह से हिमालय अपना धीर - गम्भीर स्वभाव बदलने पर बाध्य हो गया | प्रकृति की  अपनी  स्वनिर्मित संतुलन प्रणाली है जो मानव जाति के अस्तित्व को सुरक्षित रखती है लेकिन मनुष्य की विकास संबंधी वासना ने उस संतुलन को पूरी तरह तहस - नहस कर दिया | इस बारे जो लापरवाही बरती गई वह आपराधिक उदासीनता के सबसे बड़े उदाहरणों में से है | भारतीय जीवन शैली और ज्ञान परम्परा में प्रकृति के साथ संघर्ष की बजाय सामंजस्य बिठाने की जो सीख थी उसे विस्मृत कर दिए जाने से ही इस तरह के हादसों की पुनरावृत्ति जल्दी - जल्दी  होने लगी है | प्रकृति का धैर्य जब टूटता है तब तबाही के तौर पर उसकी अभिव्यक्ति होती है | गत दिवस हुआ हादसा वैसे तो अपने   आप में बहुत बड़ा था लेकिन उसे इससे   बड़ी किसी प्राकृतिक आपदा की पूर्व चेतावनी के तौर पर भी  लिया जाना चाहिए | आश्चर्य इस बात का है कि  अपनी  संचार क्रान्ति पर इठलाने वाली मानव जाति प्रकृति द्वारा  दिए जाने वाले संकेतों को समझने में असमर्थ है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 6 February 2021

टिकैत के बढ़ते वर्चस्व ने सरकार को दबाव मुक्त कर दिया



ऐसा लगता है केंद्र सरकार ने भी ये भांप लिया है कि नए कृषि संशोधन कानूनों के विरोध में हो रहा किसान आन्दोलन गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में हुए उपद्रव के बाद अपराधबोध से ग्रसित होकर रह गया है | हालाँकि दिल्ली  के बाहर टिकरी और  सिंघु में आन्दोलनकारियों का जमावड़ा है लेकिन जिस तेजी से उसका केंद्र गाजीपुर स्थानांतरित हुआ उसकी वजह से आन्दोलन का नेतृत्व कर रहा संयुक्त मोर्चा तो पृष्ठभूमि में चला गया और भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत आन्दोलन के चेहरे बन गये | यद्यपि वे आये दिन इस बात का स्पष्टीकरण देते हैं कि सभी नीतिगत फैसले  सामूहिक तौर पर ही लिए जाते हैं लेकिन ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि पंजाब के जो  नेता आन्दोलन की अगुआई कर रहे  थे वे खबरों से बाहर हो गये और समाचार माध्यमों को भी राकेश टिकैत में ही टीआरपी नजर आने लगी | गाजीपुर में लगे  आन्दोलन के मंच पर यदाकदा सिख समुदाय का एकाध प्रतिनिधि नजर आ जाता है लेकिन मुख्य रूप से अब वहां जाटों का बोलबाला है जो निकटवर्ती इलाकों में ही रहते हैं | 28 जनवरी को राकेश के नाटकीय दांव ने किसान आन्दोलन का समूचा रंग - रूप बदल दिया और देखते - देखते वह एक समुदाय विशेष की सामाजिक  एकता और सम्मान पर आकर अटक गया | किसान पंचायतों की जगह जाटों की खाप पंचायतों ने ले ली और राजनेताओं को आन्दोलन के पास तक न फटकने देने वाली  जिद भी एक  झटके में दरकिनार कर दी गई | जो राजनेता किसान आन्दोलन को दूर से देखते थे वे राकेश टिकैत को समर्थन देने आने लगे | हालांकि उन्होंने उनको मंच और माइक न देने के साथ ही आन्दोलन की जमीन पर वोटों की फसल की उम्मीद छोड़ देने की नसीहत भी दे डाली लेकिन ये बात किसी से छिपी नहीं रह सकी कि आन्दोलन का मुख्यालय अघोषित तौर पर जैसे ही गाजीपुर सरका त्योंही राजनेताओं की आवाजाही वहां बढ़ गयी | यहाँ तक कि विपक्ष का संयुक्त प्रतिनिधमंडल उनसे मिलने आ रहा था जिसे प्रशासन ने रोक दिया | इसी के साथ ही हरियाणा के जाट बहुल इलाकों में भी खाप पंचायतें होने लगीं जिनमें राकेश या उनके भाई नरेश ने शिरकत की | लेकिन प्रारंभिक रोकथाम के बावजूद उनमें राजनेताओं को मंच मिलने लगा | जिससे किसान आन्दोलन में राजनीति खुलकर घुसने में कामयाब हो गई | जो विपक्षी नेता धरना स्थल पर नहीं आये उन्होंने भी फोन पर राकेश से बात कर अपना समर्थन दिया | इस पर उनके द्वारा ये सफाई दी गयी कि कोई समर्थन दे तो उसमें बुराई क्या है ? धीरे - धीरे टिकैत परिवार की राजनीतिक महत्वाकांक्षा सामने आने लगी जिस पर राजनेता भी निगाह जमाये हुए थे | उल्लेखनीय है अगले साल इन्हीं दिनों उप्र में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और किसान आन्दोलन के बहाने राजनीतिक गोटियाँ बिठाने की कोशिशें तेज हो चली हैं | टिकैत परिवार अब तक चुनावी राजनीति में कुछ नहीं कर सका | राकेश दो चुनाव  लड़कर बुरी तरह हारे | लेकिन तब वे रालोद पर आश्रित थे लेकिन अब उन्हें लगने लगा है कि वे जाट मतों की फसल अकेले काटने में सक्षम हैं | लेकिन इसकी भनक लगते ही चौधरी चरण सिंह के पौत्र जयंत चौधरी ने गत दिवस रालोद के बैनर तले किसान महापंचायत आयोजित कर बड़ी भीड़ बटोरकर टिकैत परिवार को एक तरह से ये संकेत दे दिया कि वे खुद को जाट समुदाय का चौधरी समझने की भूल न करें | इस तरह पहले खालसा से खिसककर जो किसान आन्दोलन खाप के हाथ में आया था अब वह जाट राजनीति के मकड़जाल में उलझने लगा है | बीती 2 फरवरी को केंद्र सरकार के साथ होने वाली बातचीत जिस तरह बिना होहल्ले के रद्द हुई , वह रहस्यमय है | उसके बाद राकेश ने आन्दोलन को अक्टूबर तक खींचने की घोषणा कर डाली | प्रधानमन्त्री और संसद का माथा नहीं झुकने नहीं देंगे जैसा उनका बयान भी किसी अंदर की बात का हिस्सा बन गया | आज होने वाले चकाजाम से उप्र और उत्तराखंड को मुक्त रखने वाला बयान देकर राकेश ने ये साबित कर दिया कि वे संयुक्त किसान मोर्चे के स्वयंभू प्रवक्ता बन बैठे हैं | उप्र और उत्तराखंड में चका जाम नहीं किये जाने का कोई औचित्य भी वे नहीं बता सके | संयुक्त्त मोर्चे के जो प्रमुख नेता लगातार दो महीनों तक अग्रिम मोर्चे पर रहकर सुर्ख़ियों में रहे वे 26 जनवरी के बाद से जिस तरह से शांत हो गए वह किसी रणनीति के अंतर्गत है या आन्दोलन में आई दरार उसके पीछे है ये फिलहाल तो पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता । लेकिन ये बात साफ़ है कि बीते एक सप्ताह में किसान आन्दोलन टिकैत परिवार के कब्जे में आ गया है | और उसी के बाद केंद्र सरकार ने भी अपना रुख कड़ा कर लिया | प्रधानमन्त्री ने एक फोन कॉल की दूरी वाली बात कहते हुए भी साफ़ कर दिया था कि आख़िरी वार्ता के समय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर  द्वारा रखे गये प्रस्ताव पर किसान नेता अपना जवाब लेकर आयें | उसके बाद राष्ट्रपति के अभिभाषण में भी कृषि कानूनों की जमकर तारीफ किये जाने से ये लगा कि सरकार पूरी तरह दबाव मुक्त हैं | और गत दिवस संसद में श्री तोमर द्वारा जिस तरह के आक्रामक तेवर दिखाए गये उससे लगता है सरकार लचीला रुख छोड़ चुकी है | उसके बाद प्रधानमंत्री ने कृषि मंत्री का भाषण सुनने की सलाह देकर न सिर्फ विपक्ष अपितु किसान आन्दोलन के कर्ताधर्ताओं को भी ये एहसास करवा दिया कि अब सरकार से किसी नरमी की उम्मीद न करें | ये बात भी गौर तलब है कि राकेश टिकैत के बयानों में तीखेपन और तल्खी  की जगह अब दार्शनिक अंदाज ने ले ली है जिसमें स्वाभाविकता कम और बनावटीपन ज्यादा दिखाई देता है | इस प्रकार  अब किसान आन्दोलन की धार यदि कमजोर हो रही है तो उसकी वजह  साफ़ है | पंजाब का वर्चस्व लगातार घट रहा है | दो दिन पहले जिस तरह  से कुछ विदेशी हस्तियों ने आन्दोलन के समर्थन में बयान दिया उससे भी उसका नैतिक पक्ष कमजोर हुआ है | रही - सही  कसर टिकैत परिवार की एकला चलो नीति और राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी कर  रही है | संयुक्त मोर्चे के बाकी नेता टिकैत परिवार के इस आचरण  से हतप्रभ हैं लेकिन कुछ करने के स्थिति भी उनकी नजर नहीं आ रही | इन्हीं सब कारणों से दो महीने तक दबाव में दिखी केंद्र सरकार अब ऊंची आवाज में बात  करते हुए दिख रही है |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 5 February 2021

ऐसी ही कार्रवाई जनता के लिफ्ट में फंसने पर भी होनी चाहिए



 दो दिन पहले एक खबर आई कि मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान राजधानी भोपाल स्थित सचिवालय की लिफ्ट में कुछ मिनिटों  के लिए फंस गये | पलक झपकते अमला सक्रिय हुआ और वे सुरक्षित निकल आये | लिफ्ट में खराबी को अव्वल दर्जे की  लापरवाही मानकर दो - तीन शासकीय कर्मियों को  निलम्बित कर दिया गया  | ऐसा करना लाजमी भी था  | आखिरकार सूबे के मुख्यमंत्री की सुरक्षा में किसी भी प्रकार की चूक को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता | गनीमत रही जो लिफ्ट में आई तकनीकी खराबी को तत्काल ठीक कर लिया गया जिससे श्री चौहान को ज्यादा देर उसके भीतर नहीं रुकना पड़ा | लेकिन छोटी सी ये घटना अनेक सवाल पैदा कर गई | हमारे देश में लिफ्ट खराब होना कोई अनोखी बात नहीं मानी जाती | आखिर मशीन है तो  खराब भी होगी | लेकिन उसका संज्ञान तभी लिया जाता है जब किसी विशिष्ट व्यक्ति को  उस कारण असुविधा हो जाए | उस दृष्टि से ये कहना गलत न होगा कि यदि राज्य सचिवालय की अन्य कोई लिफ्ट खराब हुई होती तब संभवतः न उसकी अख़बारों में खबर आती और न ही निलम्बन जैसी कोई  कार्रवाई होती | सचिवालय प्रदेश सरकार का प्रशासनिक मुख्यालय है जहां से शासन का संचालन किया जाता है | मुख्यमंत्री सहित  दर्जनों बड़े अधिकारी और उनके मातहत काम करने वाला अमला यहीं बैठता है | आम जनता भी आती -  जाती  रहती है , जिसे प्रवेश पत्र लेना  होता है | आधुनिक तकनीक की दर्जनों लिफ्ट लगी हैं | उनके रखरखाव का ध्यान भी रखा जाता है | लेकिन सचिवालय से दूर राजधानी में ही न जाने कितनी ऐसी बहुमंजिला इमारतें होंगीं जिनकी लिफ्ट आये दिन खराब होने से लोग हलाकान होते हैं | पुराने मॉडल की लिफ्ट में  लोगों के घंटों फंसे रहने के समाचार  भी अक्सर सुनाई देते हैं | सबसे बड़ी परेशानी अस्पतालों की लिफ्ट खराब होने से होती है | सरकारी अस्पतालों में तो लिफ्ट का खराब होना बहुत आम है | इसकी वजह से आम जनता को कितनी दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं इसका अंदाज लगाया जा सकता है लेकिन शायद ही किसी ने सुना या पढ़ा हो कि सरकारी अस्पताल की लिफ्ट खराब होने पर किसी का निलम्बन किया गया | हमारा आशय मुख्यमंत्री की लिफ्ट में आई खराबी को नजरंदाज करने या  हलके में लिए जाने से  कदापि  नहीं है | लेकिन प्रजातंत्र में हर व्यक्ति के अधिकारों और सुख - सुविधाओं के प्रति समान सोच होनी चाहिए | ऐसे में ये अपेक्षा करना गलत नहीं है कि मुख्यमंत्री की लिफ्ट खराब होने पर जिस तत्परता से दोषी सरकारी कर्मियों पर गाज गिराई गयी वैसी ही दंडात्मक कार्रवाई हर सरकारी लिफ्ट की खराबी पर की जाये तो व्यवस्था के प्रति बढ़ता जा रहा असंतोष और अविश्वास  कुछ कम हो सकता है | अति विशिष्ट लोगों की सुरक्षा और सुविधाएँ निश्चित रूप से आम नागरिक की तुलना में बेहतर होनी चाहिए  लेकिन दोनों में जमीन - आसमान का अंतर लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है | इसी तरह उनके आगमन पर किया जाने वाला टीम - टाम भी सामंतवादी दौर की याद  दिलाता है | गत वर्ष जबलपुर में महामहिम राष्ट्रपति जी के आगमन के दो महीने पहले नगर निगम के आलीशान सभागार मानस भवन  को बंद कर नए सिरे से उसकी साज - सज्जा पर बड़ी राशि खर्च कर दी गयी | कतिपय कारणों से राष्ट्रपति महोदय का आगमन नहीं हुआ | प्रश्न ये है कि भारत सरीखे देश में इस तरह की सोच कब तक जारी रहेगी ? राष्ट्रपति बनते समय उनके  जीवन परिचय में बताया गया था कि वे बेहद साधारण पृष्ठभूमि से आये थे | ऐसे में वे शायद खुद भी इस तरह के शाही इंतजाम को पसंद न करते हों लेकिन जिन लोगों के हाथ में शासन - प्रशासन की व्यवस्था है वे आज भी अंग्रेजी राज की यादें ताजा किया करते हैं | मप्र के मुख्यमंत्री श्री चौहान भी बेहद सरल व्यक्ति हैं जिनका जनता से सीधा जुड़ाव उनकी लोकप्रियता  का सबसे बड़ा कारण है | लिफ्ट में उनके फंसने पर निलम्बित हुए कर्मचारियों की खबर भी उनकी  जानकारी में आई होगी | ऐसे में ये अपेक्षा करना गलत नहीं है  कि कम से कम प्रदेश भर के सरकारी अस्पतालों में लगी लिफ्ट बंद होने पर भी प्रशासन ऐसी ही त्वरित कार्रवाई करे जिससे आम जनता को लोकतंत्र की सार्थकता का एहसास हो सके | बात छोटी सी है लेकिन उसका  सांकेतिक मह्त्व बहुत बड़ा है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी



Thursday, 4 February 2021

किसानों और कर्मचारियों जैसी चिंता छोटे और मध्यम व्यापारी की भी करे शिवराज सरकार



मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान किसान हितैषी माने जाते हैं | खुद भी ग्रामीण पृष्ठभूमि और कृषक परिवार से हैं | सत्ता में आने के बाद उन्होंने कृषि और कृषकों के लिए काफी कुछ किया | परिणामस्वरूप मप्र अन्न उत्पादन में अग्रणी राज्य बन गया | विशेष रूप से गेंहू की सरकारी खरीदी में तो वह पंजाब और हरियाणा दोनों को टक्कर देने की स्थिति में आ गया | वैसे भी मप्र का गेंहू गुणवत्ता में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है | इसका प्रमाण उसका आटा बेचने वाली अनेक कम्पनियों के विज्ञापन हैं जिनमें वे मप्र से गेंहू खरीदे जाने का उल्लेख प्रमुखता  से किया करती हैं | लेकिन 2018 के चुनाव में शिवराज  सरकार सत्ता से बाहर हो गई और कारण बने किसान जिन्हें कांग्रेस ने कर्ज माफी का वायदा करते हुए अपने पाले में खींचने में सफलता हासिल की | राहुल गांधी हर सभा में ये आश्वासन दोहराते थे  कि कांग्रेस की सरकार बनते ही 10 दिनों के भीतर किसानों के 2 लाख तक के कर्जें माफ कर दिए जायेंगे | वह आश्वासन तुरुप का पत्ता साबित हुआ | लेकिन वह वायदा कमलनाथ सरकार के गले की फांस बन गया | आर्थिक और व्यवहारिक दोनों परेशानियां सामने आ खड़ी हुईं | उधर किसानों ने भी कर्ज देने वाली संस्थाओं को पैसा देना बंद कर दिया | ऐसा नहीं है कि उस सरकार ने कुछ  भी न किया हो परन्तु  जब तक वह हालात को अपने नियन्त्रण में ले पाती उसकी विदाई हो गई और शिवराज सिंह का राजयोग उन्हें सत्ता में वापिस ले आया | लेकिन सता सँभालते ही उन्हें भी सिर मुंड़ाते ही ओले पड़ने वाली स्थिति से जूझना पड़ा | इधर  शपथ ग्रहण हुआ और उधर कोरोना के कारण लॉक डाउन शुरू हो गया | उसकी वजह से शासन - प्रशासन की पूरी शक्ति और संसाधन कोरोना की  रोकथाम पर केन्द्रित हो गए | हालांकि लॉक डाउन में शिथिलता आने से जनजीवन और कारोबार सामान्य स्थिति में लौटने लगे परन्तु  ऐसा होते - होते आ गयी किसान आन्दोलन की  लहर | वैसे  मप्र में इसका असर अब तक तो न के बराबर है लेकिन शिवराज सिंह चूँकि अनुभवी शासक हैं इसलिए उन्होंने संकट की सम्भावनाओं को खत्म करने के लिए जरूरी कदम उठाना  शुरू किये  जिनके अंतर्गत बीते कुछ दिनों से किसान समुदाय को प्रसन्न करने के लिए अनेक तरीके अपनाये जा रहे हैं | इनमें सबसे ताजा है कर्ज माफी | ये कहना गलत न होगा कि राज्य की  जर्जर आर्थिक स्थिति को देखते हुए शायद राज्य सरकार ये निर्णय अभी और टालती लेकिन दिल्ली में चल रहे किसान आन्दोलन की तपिश से मप्र को बचाने के लिए  मुख्यमंत्री ने बिना देर किये खाली खजाने को और खाली करने जैसा दुस्साहस कर डाला |  दरअसल  शिवराज सिंह भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह ही सदैव  चुनावी मूड   में रहते हुए काम करते हैं | इसलिये ये मान लेना सही है कि कर्ज माफी के जरिये वे किसान आन्दोलन को पनपने से तो रोक ही रहे हैं लेकिन उनकी नजर अभी से 2023 के चुनाव पर है | कांग्रेस के लिए उनका ये पैंतरा निश्चित तौर पर बड़ा राजनीतिक धक्का है क्योंकि किसानों की कर्ज माफी के मामले में वह अपराधबोध से दबी हुई है | लेकिन शिवराज सिंह की इस दरियादिली या राजनीतिक दांव में भी वोट बैंक की राजनीति ही है | कर्मचारी और किसान नामक दो दबाव समूह किसी  भी सरकार को झुकाने में सक्षम मान लिए गए हैं | इसलिए हर सरकार इनकी मिजाजपुर्सी में लगी रहती है जबकि  लघु और मध्यम हैसियत के व्यापारी को भी कोरोना के कारण जबरदस्त नुकसान हुआ परन्तु उसे किसी भी सरकार ने राहत नहीं दी | इसका कारण उसका असंगठित होना है | कहने को तो प्रदेश  में व्यापारियों के बड़े - बड़े संगठन हैं लेकिन उनमें जमे बैठे पदाधिकारी शासन और प्रशासन से टकराने में डरते हुए निजी स्वार्थपूर्ति तक ही सीमित रहते हैं जिससे  छोटे व्यापारी की सुनवाई नहीं हो पाती | सरकारी महकमा भी इन्हें जी भरकर दबाता है | ये देखते हुए शिवराज सरकार को चाहिए कि छोटे और मझोले श्रेणी के व्यापारी वर्ग को कर्ज माफी या करों में विशेष रियायत से लाभान्वित करें | भाजपा वैसे भी व्यापारियों की पार्टी मानी जाती रही है | ये वह वर्ग है जो उसके साथ उस समय भी जुड़ा रहा जब वह विपक्ष में होती थी | भले ही  शिवराज सिंह ने पिछले कार्यकाल में समाज के सभी वर्गों के लोगों को अपने निवास पर बुलाकर उनकी समस्याएँ दूर करने का अभियान चलाया जिसमें लघु और मध्यम व्यापारी भी थे लेकिन उन्हें अपेक्षित लाभ न मिल सका | किसान आन्दोलन मप्र में पाँव न जमा सके इसलिए राज्य सरकार खेती और किसानों के लिए तो बहुत कुछ करती दिख रही है | इसी तरह कर्मचारी वर्ग भी सरकार का हिस्सा होने का लाभ लेने से नहीं चूकता | लेकिन कम पूंजी से कारोबार करने वाले छोटे व्यापारी भी मौजूदा समय में काफी परेशान हैं | ऐसे में शिवराज सरकार को अपनी सम्वेदनशीलता का और विस्तार करते हुए इस वर्ग के लिए भी ऐसा कुछ करना चाहिए जिससे वह अपने को उपेक्षित महसूस न करे | आखिर किसान अन्नदाता है तो व्यापारी भी तो करदाता है | लेकिन उसे न किसी प्रकार की आर्थिक सुरक्षा प्राप्त है और न ही सामाजिक | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 3 February 2021

मध्यम वर्ग की अनदेखी अन्याय : आय कर छूट की सीमा 10 लाख की जाए



बजट के बाद देश के मध्यम वर्ग में , जिसे सामान्यतः नौकरपेशा माना  जाता है बहुत निराशा है |  इस वर्ग का कहना है कि बजट बनाते समय सरकार चाहे केंद्र की हो या राज्य की  , वह सभी वर्गों के लिए कुछ न कुछ करती है लेकिन मध्यम वर्ग उपेक्षित रह जाता है | कोरोना काल में बड़ी संख्या में नौकरियां चली गईं | शासकीय कर्मियों का  महंगाई भत्ता स्थिर कर दिया | निजी क्षेत्र ने तो सीधे - सीधे वेतन में ही कटौती कर डाली | इसी तरह महीनों कारोबार बंद रहने से मध्यम वर्गीय व्यापारी की आर्थिक दशा भी डगमगा गई | हालात किसी से छिपे नहीं हैं | यद्यपि  इसके लिए सरकार को दोष देना कतई ठीक नहीं होगा क्योंकि समस्या  अभूतपूर्व और पूरी तरह अकल्पनीय थी | और उसने जो और जैसा भी बन सका किया भी | करोड़ों गरीबों को मुफ्त अनाज देने का फैसला बहुत ही बुद्धिमत्ता और दूरदर्शितापूर्ण था | बैंकों से कर्ज वसूली को टालकर सरकार ने उद्योग और व्यवसाय से जुड़े लोगों को भी समयानुकूल राहत दी | बिजली बिल के साथ ही स्थानीय निकायों के करों की वसूली भी स्थगित रखी गई | आयकर और जीएसटी के बारे में भी मोहलत दी जाती रही | लेकिन जैसे ही लॉक डाउन हटा त्योंही सब कुछ पहले जैसा  हो गया | सरकारी महकमे ठेठ पठानी शैली  में वसूली पर आमादा हो गए | बैंक वाले भी सुबह - शाम परेशान करने में जुट गए | सरकार का खजाना खाली होने से ऐसा करना स्वाभाविक ही था | लोगों को उम्मीद थी कि शायद बैंकों  का ब्याज कुछ माफ़ हो जाएगा परन्तु ऐसा नहीं हुआ | लेकिन इस सबके बीच सबसे ज्यादा पिसा मध्यम वर्ग जिसे न मुफ्त अनाज मिला और न ही अन्य किसी प्रकार की सहायता | उसकी तनख्वाह और भत्ते भी घट गये | जिनकी  नौकरी गई उनकी  पीड़ा के लिए तो शब्द ही नहीं हैं | ऐसे में कर्मचारी और मझोले किस्म के व्यापारी को लग रहा था कि केन्द्रीय  बजट में उसकी समस्याओं का कुछ न कुछ निदान तो होगा | हालांकि  निर्मला सीतारमण ने ये एहसान तो अवश्य किया कि करों का बोझ नहीं बढ़ाया किन्तु उसमें किसी भी प्रकार की कमी नहीं किये जाने से  निराशा और बढ़ गई | इस वर्ग को  उम्मीद थी कि आयकर सहित अन्य करों में उसे कुछ रियायत मिलेगी | करों में छूट की सीमा बढ़ाये जाने के साथ ही अन्य बचत योजनाओं पर  लाभ बढ़ाये जाने की अपेक्षा भी थी | लेकिन वित्त मंत्री ने उस बारे में कुछ नहीं किया | सबसे प्रमुख बात ये है कि नौकरपेशा मध्यम वर्ग ही ईमानदारी से आय कर देता है | इसके साथ ही अप्रत्यक्ष करों में भी बतौर उपभोक्ता उसका  बड़ा योगदान  है | कोरोना काल के बाद बाजारों में मांग बढाने के लिए तरह - तरह के जतन किया जा रहे हैं | आर्थिक विशेषज्ञ भी ये मान रहे हैं कि जब तक बाजार में उपभोक्ताओं की भीड़ नहीं उमड़ती तब तक अर्थव्यवस्था रफ़्तार नहीं  पकड़ सकती | लेकिन ये भीड़ मध्यम वर्ग की ही हो सकती है | ऐसे में ये जरूरी है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की इस रीढ़ को और मजबूत किया जाए | लेकिन श्रीमती सीतारमण ने  इस वर्ग को एक तरह से हाशिये  पर धकेल दिया गया है | अभी बजट संसद के सामने विचारार्थ प्रस्तुत हुआ है | ऐसे में  उसमें संशोधन की गुंजाईश है | बेहतर होगा मध्यम वर्ग को आयकर में छूट सहित बचत योजनाओं से मिलने वाले लाभों में भी वृद्धि हो जिससे इस वर्ग के पास अतिरिक्त पैसा आये  ताकि वह बाजार की  रौनक बढ़ाने में मददगार हो सके | कोरोना काल में इस वर्ग के मन में असुरक्षा का जो भाव आ गया है उसके कारण खरीदी के प्रति उसका हौसला कमजोर हुआ है जिसे बढ़ाये बिना अर्थव्यवस्था में उछाल लाना कठिन होगा |  वित्तमंत्री यदि वाकई वित्तीय वर्ष 2021- 22 में 11 फीसदी  की विकास दर के अनुमान को हकीकत में बदलना चाहती हैं तब उन्हें बजट पर बहस के दौरान संशोधन पेश करते हुए आयकर छूट की सीमा 10 लाख कर देनी चाहिए | ऐसा होने पर भले ही आयकर  की कमाई कम हो जाये लेकिन उससे होने वाली कर की बचत सीधे बाजार में आयेगी जिससे उद्योग - व्यापार तो फलेंगे - फूलेंगे ही लगे हाथ  सरकारी खजाने में ही जीएसटी के तौर पर जबरदस्त राजस्व आयेगा | हमारे देश में बजट दर बजट प्रयोग होते आये हैं | कुछ कारगर रहे तो कुछ असफलता की खाई में गिरकर विलुप्त हो गए | ऐसे में निर्मला जी इस सुझाव को भी अमल में लाकर  देख लें | वे चाहें तो इसे कोरोना काल के मद्दे नजर अस्थायी राहत के  तौर पर लागू करें और यदि उसके अनुकूल नतीजे आयें तो उसे आगामी सालों में भी जारी रखा जाये | मौजूदा हालात में  आयकर छूट की सीमा बढाकर 10 लाख  किया जाना भी क्रान्तिकारी  कदम होगा | वैसे भी देश के इतने विशाल वर्ग को बजट में ठेंगा दिखाना उसके साथ अन्याय नहीं तो और क्या है ?

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 2 February 2021

मध्यम वर्ग और किसान के तुष्टीकरण से बचने का जोखिम उठाया वित्त मंत्री ने



मोदी सरकार द्वारा वित्तीय वर्ष 2021 - 22 के लिए आम बजट गत दिवस लोकसभा में पेश किया गया | कोरोना और किसान नामक दो मुद्दे बजट के पहले सरकार पर दबव बनाये हुए थे | ऊपर से असम , बंगाल , तमिलनाडु और केरल के विधानसभा चुनाव रूपी चुनौतियां  सामने खड़ी हुई हैं | ऐसे में लोकप्रिय बजट देते हुए आम जनता को खुश करना अपेक्षित था | राहुल गांधी सहित अनेक आर्थिक विशेषज्ञ  कोरोना काल के दौरान ही ये मांग करने लगे थे कि सरकार लोगों को नगद राशि दे जिससे उनकी क्रय शक्ति बढ़े और बाजार गुलजार हो सकें | सैद्धांतिक तौर पर ये सलाह बहुत ही व्यवहारिक थी | केंद्र सरकार ने समाज के गरीब तबके के बैंक खातों में कुछ राशि जमा भी  करवाई किन्तु वह बहुत ही कम रही | चूंकि करोड़ों लोगों से रोजगार छिन गया था इसलिये उनका पेट भरने के लिए मुफ्त अनाज देने का विकल्प सरकार ने चुना जो काफी हद तक कारगर भी रहा | लेकिन परेशानी तो समाज के हर वर्ग के सामने थी | उद्योग - व्यापार चौपट हो चुका था | परिणामस्वरूप सरकार की राजस्व वसूली भी घट गई  | वित्तीय घाटा और विकास दर संबंधी सभी अनुमान गड़बड़ा गए | जैसे - तैसे हालात सामान्य होने को आये तो किसान आन्दोलन ने नई मुसीबत पैदा कर दी | ऐसे में एक लोकप्रिय बजट की  अपेक्षा पूरा देश कर रहा था | आशय आयकर में छूट और आम उपभोक्ता वस्तुओं को सस्ता करने से है | लेकिन निर्मला सीतारमण द्वारा जो बजट पेश किया गया उसका शेयर बाजार सहित उद्योग जगत और उदारीकरण के समर्थक आर्थिक विशेषज्ञों ने तो दिल खोलकर स्वागत किया किन्तु आम जनता , नौकरीपेशा और  किसान को इसमें ऐसा कुछ भी नहीं  दिख रहा जिस पर वह संतोष कर सके | विपक्ष से तो खैर बजट की तारीफ अनपेक्षित रहती ही है | सवाल ये है कि फिर बजट में ऐसा क्या है जिसके कारण आर्थिक मामलों के वे जानकार भी इसकी प्रशंसा कर रहे हैं जो मोदी सरकार की नीतियों और क्रियाकलापों के कटु आलोचक के तौर पर  विख्यात हैं | उत्तर में ये कहा जा रहा है कि मोदी सरकार ने इस बजट में चुनाव की देहलीज पर खड़े राज्यों में विकास  के लिए तो खजाना खोल दिया है लेकिन पूरे राष्ट्रीय परिदृश्य पर नजर डालें तो इसे लोकलुभावन बजट नहीं कहा जा सकता | ऐसे में इसकी प्रशंसा केवल इस कारण हो रही है कि सरकार ने सीधे जनता के हाथ में पैसे देने की बजाय विकास कार्यों में तेजी लाकर रोजगार और मांग बढ़ाने को प्राथमिकता दी | सबसे प्रमुख बात ये रही कि कोरोना के कारण उत्पन्न हालातों के मद्देनजर स्वस्थ भारत की सोच को मजबूत करने के लिए स्वास्थ्य संबंधी आवंटन  35 हजार करोड़ कर दिया गया | इसी तरह शिक्षा को भी महत्व दिया गया | लेकिन सबसे ज्यादा जिस क्षेत्र पर सरकार का ध्यान दिखाई दिया वह है अधोसंरचना संबंधी प्रकल्पों के लिए एक लाख करोड़ से भी ज्यादा का प्रावधान | इसी के साथ ही पर्यावरण संरक्षण को भी सरकार की चिंताओं में शामिल किया गया है | वित्त मंत्री ने पुराने वाहनों के बारे में जो स्क्रैप नीति बनाई वह भी कालान्तर में कारगर होगी ये उम्मीद लगई जा रही है | लेकिन सबसे बड़ा कदम जो इस बजट के ज़रिये उठाया गया है वह है विनिवेश और निजीकरण | कुछ सरकारी बैंक और जीवन बीमा निगम में निजी क्षेत्र को प्रवेश देने का फैसला निःसंदेह दुस्साहसी है जिसका विरोध भी सुनाई देने लगा है | बीमा क्षेत्र में 74 फीसदी विदेशी निवेश की  अनुमति दिया जाना पूंजी बाजार में आवक बढ़ाने में सहायक बन सकता है | और भी  ऐसा बहुत कुछ बजट में है जो आम जनता के नजरिये से तो  किसी काम का नहीं है लेकिन आलोचक भी दबी जुबान ही सही किन्त्तु ये मान रहे हैं कि वित्त मंत्री ने जो लक्ष्य तय किये हैं वे लम्बे समय के लिए हैं | बजट में अनुत्पादक व्यय की बजाय पूंजीगत खर्च पर जोर देकर सरकार ने विनिवेश के औचित्य को सबित करने का जो प्रयास किया वह आलोचकों के सबसे अधिक निशाने पर है | इस बारे में ये संदेह भी व्यक्त किया जा रहा है कि कहीं ऐसा न हो कि सरकार अपनी संपत्ति बेच भी दे और पैसा भी  खुर्द - फुर्द हो जाए | लेकिन इस बजट की सबसे बड़ी खासियत ये है कि इसमें किसी वर्ग विशेष के तुष्टीकरण की बजाय ठोस वास्तविकताओं पर ध्यान दिया गया है | जो लोग इसकी आलोचना कर रहे हैं उनका कहना भी है कि ये आत्मनिर्भर , स्वस्थ , शिक्षित , सुरक्षित और विकसित भारत का बजट है लेकिन ये सब होते - होते लंबा समय लग जाएगा | इस आधार पर मोदी सरकार ने कर्मचारी और किसान जैसे वर्ग के दबाव से मुक्त रहते हुए विकासोन्मुखी बजट पेश करते हुए लोकप्रियता की बजाय वास्तविकता को केंद्र बिंदु बनाया जो राजनीतिक दृष्टि से खतरा मोल लेने जैसा है | अपने सबसे बड़े समर्थक मध्यम वर्ग के अलावा  किसानों को लुभाने की बजाय विकास कार्यों के साथ ही शिक्षा , स्वास्थ्य , पर्यावरण , सुरक्षा और  आत्मनिर्भरता पर बजट को केन्द्रित रखकर 21 वीं सदी के तीसरे दशक की जो दिशा तय की है यदि वह इस देश की राजनीतिक संस्कृति  में रच बस जाए तो आने वाले कुछ सालों में भारत की तकदीर और तस्वीर दोनों बदल सकती हैं | बशर्ते सरकारी मशीनरी ईमानदारी से काम करे और सभी सत्ताधारी क्षणिक लाभ की बजाय दूरगामी लक्ष्यों को प्राथमिकता दें | कोरोना के बाद का भारत आत्मविश्वास से भरा हुआ है और उसी की झलक इस बजट में दिखाई देती है | उम्मीद की जानी चाहिए कि गत एक वर्ष  की मनहूसियत आने वाले वित्तीय साल में दूर हो सकेगी | बीते  दो महीनों से जीएसटी की रिकॉर्ड वसूली ने निश्चित तौर पर वित्तमंत्री का हौसला बढ़ाया है |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 1 February 2021

किसान की पगड़ी और प्रधानमन्त्री का सिर नहीं झुकने देंगे जैसी टिप्पणी में छिपे कई संकेत



दो महीने से चले आ रहे किसान आन्दोलन का केंद्र अब दिल्ली के बाहरी इलाके गाजीपुर में स्थानांतरित हो गया है | ये जगह पश्चिमी उप्र का प्रवेश द्वार है जहाँ जाट समुदाय का वर्चस्व है | 26 जनवरी को हुए बलवे के बाद पंजाब प्रायोजित आन्दोलन बदनाम हो गया लेकिन  भारतीय किसान यूनियन नामक संगठन के नेता राकेश टिकैत ने बड़ी ही चतुराई से आन्दोलन को बिखरने से न सिर्फ रोक लिया अपितु खुद उसके सबसे बड़े नेता बन गये | इसका तात्कालिक परिणाम ये हुआ कि जिस आन्दोलन पर सिखों का कब्जा दिखाई देता था वह जाटों की मुट्ठी में आ गया | हालांकि इसे परिस्थितिजन्य बदलाव कहा जा सकता है लेकिन इसके पीछे भी कहीं न कहीं टिकैत बंधुओं की अपनी महत्वाकांक्षा छिपी  हुई है | स्मरणीय है किसान  संगठनों और सरकार के बीच वार्ताओं के बीच ही यूनियन के अध्यक्ष और राकेश के बड़े भाई नरेश टिकैत ने खुले आम आरोप लगाया था कि वार्ता में जब भी समाधान की सम्भावना नजर आने लगती है तब कतिपय नेता रायता फैलाते हुए गतिरोध बनाये रखने का कारण बन जाते हैं | हालांकि उन्होंने किसी का नाम तो नहीं लिया लेकिन उसके बाद पंजाब के एक किसान नेता द्वारा दिल्ली में अनेक राजनीतिक नेताओं से मिलने का  मप्र के किसान नेता शिवकुमार कक्का द्वारा विरोध किये जाने पर उक्त नेता द्वारा उन्हें रास्वसंघ का एजेंट बता दिया गया | उक्त दो उदाहरणों से ये साफ़ हो चला था कि किसान संगठनों के बीच अन्तर्विरोध और अविश्वास बना हुआ था | भले ही ये आंदोलन पंजाब से शुरू हुआ लेकिन जब ये दिल्ली के दरवाजे पर आया तब टिकैत परिवार को  लगा कि इसका नेतृत्व येन केन प्रकारेण उनके हाथ आ जाए | हालाँकि किसानों के बीच अच्छी पकड़ की बावजूद  राकेश टिकैत दो बार चुनाव लड़े लेकिन  सजातीय जाट मतदाताओं का समर्थन हासिल करने में भी उनको सफलता नहीं मिली | इस बारे में एक बात बड़ी ही महत्वपूर्ण है कि चौधरी चरण सिंह के वारिस बने उनके बेटे अजीत सिंह अब राजनीतिक हाशिये पर हैं और उनके बेटे जयंत भी लगातार दो चुनाव हारकर अप्रासंगिक हो गये हैं | इस कारण जाट समुदाय में कोई बड़ा राजनीतिक चेहरा नजर नहीं आ रहा | हालाँकि भाजपा ने जाटों में से अनेक नेताओं को अपनी तरफ खींचकर राजनीतिक ओहदा दिया लेकिन वे पूरे समुदाय को प्रभावित करने में सक्षम  नहीं हैं | राकेश और नरेश टिकैत को किसान आन्दोलन में उतनी रूचि नहीं थी क्योंकि उनके प्रभाव वाले पश्चिमी उप्र की  समस्याएँ पंजाब और हरियाणा की तुलना में काफी अलग हैं | लेकिन उन्होंने दूसरों के मंच पर कब्जे का सुनहरा अवसर लपक लिया | संयोगवश 26 जनवरी को आन्दोलन के अनियंत्रित होने के बाद से पंजाब के किसान नेता कमजोर पड़ने  लगे और टिकैत बंधुओं ने बिना देर किये सहायक कलाकार की बजाय खुद को नायक की भूमिका में ला खड़ा किया | शुरू में ऐसा लगा कि उनका शो भी फ्लॉप होगा लेकिन घटनाचक्र जिस तेजी  से घूमा उसके कारण टिकैत बंधु किसान आन्दोलन के प्रतीक बनकर समूचे परिदृश्य पर छा  गये | न सिर्फ  पाश्चिमी  उप्र बल्कि हरियाणा की खाप पंचायतों ने अभूतपूर्व सक्रियता दिखाते हुए इसे किसान की  आड़ में  जाट अस्मिता से जोड़ दिया | यही नहीं तो जिन  राजनीतिक  नेताओं को अब तक आन्दोलन स्थल पर फटकने की इजाजत तक न थी वे खुले आम आकर राकेश के प्रति समर्थन व्यक्त करते दिखने लगे |  सबसे मजेदार बात ये है कि वे अपने साथियों सहित गिरफ्तारी देने जा रहे थे किन्तु भाजपा विधायक द्वारा की गई  कथित हरकत के बाद  बिदक गये जो कि उनकी रणनीति का हिस्सा था | जिस सुनियोजित ढंग से खाप पंचायत आयोजित हुईं और गाजीपुर में शक्ति प्रदर्शन किया गया उसमें कृषि कानून से ज्यादा राकेश टिकैत और उनके बहाने जाट समुदाय को गोलबंद ,किये जाने की कोशिश अधिक थी | दो दिन पहले  तक ऐसा लग रहा था कि किसानों  के साथ केंद्र सरकार की सम्वाद प्रक्रिया पूरी तरह ठप्प हो गई लेकिन सर्वदलीय बैठक  और  रेडियो पर प्रधानमन्त्री की मन की बात का प्रसारण होने के बाद 2 फरवरी को फिर बातचीत किये जाने का फैसला सामने आ गया | यही नहीं तो टिकैत बन्धु किसान की पगड़ी और प्रधानमन्त्री के साथ ही संसद के सम्मान को बनाए  रखने जैसी बातें करने लगे | हालाँकि न सरकार ने कानून वापिस लेने का संकेत दिया और न ही टिकैत या अन्य किसी किसान नेता द्वारा अपनी घोषित नीति से पीछे हटने का | फिर भी बातचीत का सिलसिला किस आधार पर शुरू किया जा रहा है ये बताने कोई तैयार नहीं | और जब इस बारे में राकेश से पूछा गया तब वे बोले ये अंदर की बात है | राजनीति के जानकार मान रहे हैं कि सरकार के साथ समझौता हो न हो लेकिन  राकेश और नरेश टिकैत की जुगलबन्दी ने एक झटके में पंजाब के वर्चस्व से किसान आन्दोलन को अपने हाथों में केन्द्रित कर लिया है जो संभवतः केंद्र और भाजपा दोनों को रास आने वाला है | इस बारे में उल्लेखनीय है कि बादल परिवार से अलगाव के बाद भाजपा  के पास एक भी ऐसा नेता नहीं है जो सिख समुदाय और गुरुद्वारों के साथ समन्वय स्थापित कर सके | लेकिन जाटों के साथ ये परेशानी नहीं आयेगी क्योंकि पश्चिमी उप्र के राजनीतिक समीकरण भाजपा के काफी अनुकूल रहे हैं और शुरुवाती  नाराजगी के बावजूद चुनाव में जाट उसे ही  समर्थन देते हैं | मौजूदा प्रकरण का पटाक्षेप कैसे होगा और होगा भी या नहीं ये आज कह पाना कठिन है लेकिन 26 जनवरी के बाद अचानक बहुत कुछ ऐसा हुआ है जिससे माना जा सकता है कि किसान आन्दोलन की दिशा बदल सकती है और इसका कारण टिकैत बंधु बनेंगे  | विभिन्न किसान संगठनों के नेताओं ने सार्वजनिक   तौर पर ये स्वीकार किया कि राकेश और नरेश ने आन्दोलन को नवजीवन दे दिया | भाजपा के विरोध में खड़े विपक्ष को भी अचानक जाटों के नए नेता के रूप में टिकैत नजर आने लगे | 2 फरवरी को होने वाली बातचीत किसी निष्कर्ष पर पहुंचेगी या पहले की तरह गतिरोध  बना रहेगा ये तो बैठक के बाद ही सामने आयेगा लेकिन राकेश की ये टिप्पणी  कि सरकार की कोई मजबूरी हो तो हमें बताये और हम प्रधानमंत्री का सिर नहीं झुकने देंगे , समूचे प्रकरण में किसी नए मोड़ का  संकेत है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी