Friday, 19 February 2021

जीवनदायिनी नदियों के जीवन की रक्षा ही सही भक्ति



आज पुण्यसलिला नर्मदा  का प्राकट्य उत्सव समूचे नर्मदा क्षेत्र में पूरे भक्ति भाव से मनाया जा रहा है | सुबह से ही भक्तगण नर्मदा तटों पर एकत्र होकर इस  जीवनदायिनी सरिता के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त कर  रहे हैं | इस दौरान लाखों श्रद्धालु उसके जल में स्नान करने के साथ ही दीपदान और पूजन सामग्री  प्रवाहित करेंगे | नर्मदा तटों पर मेले जैसा माहौल बना रहेगा | लेकिन  कल सुबह उन घाटों के जो चित्र समाचार  माध्यमों के जरिये प्रसारित होंगे वे विचलित करने वाले रहेंगे | सर्वत्र गंदगी दिखाई देगी | किनारों पर फूल वगैरह उतराते मिलेंगे | सौभाग्यवश नर्मदा उन गिनी - चुनी नदियों में से है जो प्रदूषण से काफी हद तक मुक्त है | इसका कारण इसके किनारे बसे  शहरों में अपेक्षाकृत कम औद्योगिकीकरण होना है | लेकिन बीते कुछ वर्षों से नर्मदा भक्ति जिस तेजी से बढ़ी उसकी वजह से इस पवित्र नदी का  हाल भी अन्य नदियों  जैसा होने का खतरा बढ़ गया है | भगवान शिव की पुत्री होने से उसका पौराणिक महत्व भी है | ये एकमात्र ऐसी नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है | नर्मदा के महात्म्य पर पुराण की रचना भी की गई | आद्य शंकराचार्य ने इस पर जो अष्टक लिखा वह नर्मदा भक्तों की जुबान पर रहता है | समूचे नर्मदा क्षेत्र में नमामि देवी नर्मदे का स्वर सुनाई देता है | बीते काफी समय से यह भक्तों के साथ राजनेताओं की श्रद्धा का केंद्र भी बन गई है | कुछ इसकी  परिक्रमा करते हैं तो कुछ नित्य दर्शन | लेकिन इस सबसे अलग हटकर आज के दिन नर्मदा पर हो रहे अत्याचार पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए | नर्मदा से अवैध रेत उत्खनन में राजनेताओं की भूमिका सर्वविदित है | सरकारी बंदिशें इस कारण बेअसर होकर रह जाती हैं | इसी तरह से साधु - संतों ने नर्मदा के किनारों पर अपने आश्रम बना लिए हैं | आवासीय बस्तियां भी कुकुरमुत्तों की शक्ल में नजर आती हैं | ये सब मिलकर नर्मदा को प्रदूषण की गर्त में धकेलने का काम कर रहे हैं , जो चिंता का विषय होना चाहिए | आज माँ स्वरूप इस नदी के  प्राकट्य दिवस पर  केवल उसकी पूजा - अर्चना तक सीमित न रहकर उसकी रक्षा के प्रति दायित्वबोध जाग्रत करने पर भी विचार किया जाना जरूरी है | हमारे देश में नदियों को माँ मानकर पूजित किया जाता है | छोटी - छोटी नदियों को भी गंगा का प्रतीक मानकर लोग अपना श्रद्धा भाव व्यक्त करते हैं | नदी स्नान आध्यात्मिक विधान का हिस्सा है | कुम्भ और उस सदृश अन्य मेले नदियों के किनारे ही आयोजित होते हैं | त्यौहारों पर नदियों में स्नान की परम्परा है | लेकिन बढ़ती आबादी और बेतहाशा शहरीकरण ने नदियों के अस्तित्व के लिए संकट उत्पन्न कर दिया है | दुर्भाग्य से नर्मदा की पवित्रता भी अब प्रदूषण की चपेट में आने लगी है | मप्र के अमरकंटक से गुजरात के भड़ूच तक की इसकी यात्रा प्रकृति की गोद में होती है | इसे सौन्दर्य की नदी भी कहा गया है | लेकिन ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि ये सौन्दर्य पहले जैसा नहीं रहा | कारण वही हैं जिनकी वजह से गंगा और यमुना दुर्दशा का शिकार हुईं | ऐसे में अनगिनत नर्मदा भक्तों का ये दायित्व है कि वे आज के दिन नर्मदा के पूजन - अर्चन के साथ ही  उसकी रक्षा का प्रण लेकर उस दिशा में प्रयास भी  करें | नर्मदा की विलक्षणता नदियों की पवित्रता के अभियान का आधार बन सके तो ये बहुत बड़ी बात हो सकती है | भारत को प्रकृति ने नदियों के रूप में जो उपहार दिया उसे सहेजकर रखना उसके भक्तों का कर्तव्य है | यदि हम नदियों की पवित्रता को सुरक्षित रखने के प्रति उदासीन  हैं तो फिर ये कहना गलत न होगा कि उनके प्रति  हमारी भक्ति महज पाखंड है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी



Thursday, 18 February 2021

जब तक भ्रष्ट तंत्र की पूंजी से राजनीति की दुकान चलेगी तब तक सुधार असंभव



मप्र के सीधी  जिले में दो दिन पूर्व बाणसागर की नहर में यात्री बस गिर जाने से 50  से ज्यादा मौतें हो जाने के बाद मुख्यमंत्री से लेकर निचले स्तर तक शासन और प्रशासन हरकत में हैं | जिम्मेदार ठहराये जा रहे तमाम अधिकारियों और कर्मचारियों को  स्थानान्तरण और निलंबन देकर जनता के गुस्से को ठंडा करने का घिसा - पिटा तरीका भी आजमाया जा रहा है | मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शोक  संतप्त परिवारों तक  व्यक्तिगत  पहुंचकर अपनी संवेदनशीलता का परिचय दिया | मृतकों और घायलों के परिजनों को नियमानुसार मुआवजा भी  बांट दिया जाएगा | जांच रूपी  सरकारी कर्मकांड भी ऐसे हादसों के बाद होता ही है | जिस जगह दुर्घटना हुई वहां की व्यवस्थाएं सुधारने के लिए भी उठापटक की जायेगी | और फिर कुछ समय  बाद सब भूलकर पूरी व्यवस्था अपने ढर्रे में लौट आयेगी | कुछ साल पहले पन्ना के निकट एक बस में आग लगने के बाद सड़क परिवहन के नियमों का पालन करने के लिए सरकारी मुस्तैदी दिखाते हुए  खटारा  बसों को चलने से रोकने के लिए सख्ती की गई | निर्धारित संख्या से ज्यादा सवारियां बिठाये जाने वाली यात्री बसों के विरुद्ध कार्रवाई हुई | लेकिन  लेश मात्र सुधार  नहीं दिखा | इसलिए  ताजा हादसे के बाद परिवहन व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियां जस की तस बनी रहेंगी ये कहना  गलत नहीं होगा | सही बात  ये है कि परिवहन महकमा भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा अड्डा है | आरटीओ नाम आते ही आम नागरिक के मन में ये बात आ जाती है कि  बिना घूस और दलालों के उस दफ्तर में एक कागज भी इधर से उधर करवाना टेढ़ी - खीर है | ऐसा नहीं है कि सरकार में बैठे नेता और प्रशासन चलाने  वाले  साहेब बाहादुरों की फौज को कुछ पता न हो लेकिन परिवहन  विभाग एक तरह से राजनेताओं के लिए दुधारू गाय की तरह है | कहते हैं परिवहन आयुक्त का पद  कुबेर के खजाने का मालिक होने जैसा है | सत्तारूढ़ पार्टी के खर्चे चलाने में इस महकमे का सहयोग किसी से छिपा नहीं है | राजनीतिक रैलियों के लिए मुफ्त में बसों का इंतजाम परिवहन विभाग के सहयोग से होना भी जगजाहिर है | केवल सरकार में बैठे लोग ही नहीं अपितु विपक्ष की राजनीति चलाने में भी परिवहन विभाग पूरी  सौजन्यता दिखाता है | यही हाल लोक निर्माण विभाग का है | जिसमें जबरदस्त भ्रष्टाचार होता है | इन विभागों को मलाईदार इसीलिये कहा जाता है | मुख्यमंत्री अपने खासमखास को इन विभागों का मंत्री क्यों बनाते हैं ये साधारण बुद्धि वाला भी बता देगा | संदर्भित हादसे के पीछे  परिवहन और लोक निर्माण विभाग के अलावा पुलिस को भी कठघरे में खड़ा किया  जा रहा है | जाम लगने के कारण बस चालक ने जिस वैकल्पिक मार्ग को चुना वह जानलेवा बन गया | यदि यातायात को सुव्यवस्थित करने वाली पुलिस कर्तव्यनिष्ठ हो जाये तो सड़क दुर्घटनाएं काफी हद तक रोकी जा सकती हैं | लेकिन सवाल ये हैं कि ये साहस कौन करेगा ? भारत में राजनीति का जो रंग - रूप और तौर - तरीके हैं उनके चलते भ्रष्टाचार रोकना असंभव मान लिया गया है | सत्ता में बैठा कोई नेता ईमानदार भले हो लेकिन उसे भी अपनी पार्टी को चलाने के लिए भ्रष्ट नौकरशाहों से उगाही करनी होती  है | आरटीओ , लोक निर्माण विभाग और पुलिस के अलावा लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी भी वह विभाग है जिसमें भरी।मलाई पर राजनेताओं की लार टपकती  है | ऐसे में जो हादसा  सीधी में हुआ उसकी पुनरावृत्ति रोकने के दावे सिवाय झूठ के और कुछ भी नहीं हैं | दुर्घटनाएं होंगी , लोग मरते रहेंगे और भ्रष्ट व्यवस्था से चलने वाली राजनीति मुआवजे बाँटकर अपनी संवेदनशीलता का भौंड़ा प्रदर्शन करती रहेगी | हादसे के लिए जिम्मेदार माने जा रहे चंद सरकारी मुलाजिम भले ही निलम्बित या स्थानांतरित कर दिए जाएँ लेकिन मौत न निलम्बित की जा सकती है और न ही स्थानांतरित | जब तक मलाईदार विभागों से उगाही  राजनेता करते रहेंगे तब तक व्यवस्था में सुधार की बात सोच लेना मूर्खीं के स्वर्ग में रहने के समान होगा | ऐसे हादसों के बाद जनता के गुस्से की आग पर पानी डालने के जो परंपरागत तरीके हैं वे भी भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने के उपाय होते हैं | जिन विभागों की लापरवाही के चलते ऐसे हादसे होते हैं उनकी कार्यप्रणाली में कोई सुधार या बदलाव तब तक नहीं हो सकता जब तक उनका आर्थिक शोषण   राजनेता बंद नहीं करते | आरटीओ से मुफ्त बसों तथा  टैक्सियों का जुगाड़ करने और पुलिस और लोक निर्माण विभाग का  कामधेनु की तरह उपयोग करने वाली राजनीतिक संस्कृति के चलते लोगों के सस्ते में बेमौत मरने की घटनाए दोहराई जाती रहेंगीं | हाल ही में मुरैना में नकली  जहरीली शराब से काफी लोग मारे जाने के बाद खूब  हल्ला मचा | उसके बाद दो - चार दिन शिव जी के तांडव की तरह राज्य सरकार ने खूब सख्ती दिखाई लेकिन आबकारी महकमा   किसी भी राज्य सरकार के लिए नोट छापने की मशीन होने से उसमें भ्रष्टाचार को रोक पाना असम्भव माना जाता है | शिवराज सिंह चौहान व्यक्तिगत रूप से बहुत ही सम्वेदनशील और भावुक इंसान हैं जो जनता से सीधा संपर्क और संवाद करने में सिद्धहस्त हैं | लेकिन क्या वे  भ्रष्टाचार और राजनीति के गठजोड़ को रोकने का जोखिम उठाने का दुस्साहस कर सकते हैं और जवाब है नहीं क्योंकि राजनीति बिना पैसे के नहीं चल सकती और उस पैसे का बड़ा स्रोत सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार ही है | सीधी बस हादसे के लिए जिम्मेदार  मानकर हाल - फ़िलहाल जिन्हें निलम्बित अथवा स्थानांतरित किया गया वे  सब कुछ समय बाद बहाल हो जायेंगे क्योंकि एक भ्रष्ट की जांच जब दूसरा भ्रष्ट करेगा तब और क्या उम्मीद की जा सकती हैं | कुछ समय पूर्व प्रदेश  के एक परिवहन आयुक्त का लिफाफे लेते हुए वीडियो सार्वजनिक होने के बाद उनकी जांच हुई लेकिन वे बेदाग़ करार दिए गये क्योंकि जिस अफसर को उनकी जांच का काम मिला वह उन्हीं के मूल विभाग में  कनिष्ठ पद पर था | इसीलिये जब उनको निर्दोष बताया गया तब उसका खूब मजाक उड़ा | इस हादसे के लिए जिम्मेदार सरकारी लोगों को भी ऐसी ही रस्म अदायगी के बाद राहत दे दी जायेगी क्योंकि जब तक सरकारी तंत्र द्वारा प्रदत्त पूंजी से राजनीति नामक  दुकान चलेगी तब तक किसी सुधार की कल्पना करना ही व्यर्थ है |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 13 February 2021

नेताओं की अदूरदर्शिता से कमजोर पड़ रहा किसान आन्दोलन



दिल्ली के विभिन्न प्रवेश द्वारों पर चल रहे किसान आन्दोलन में अब पहले जैसी धार नहीं रही। 26 जनवरी को हुई हिंसा के बाद किसान संगठनों के बीच मतभेद उभरने की खबरें भी आईं। इसकी  वजह भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत का आन्दोलन पर एक तरह से कब्जा कर लेना बताया जा रहा है। वे बड़ी ही चतुराई से आन्दोलन को जाट समुदाय के बीच केन्द्रित करते हुए उसके चेहरे बन बैठे। उप्र और उत्तराखंड में चकाजाम नहीं करने का उनका निर्णय भी किसान संयुक्त मोर्चे के अधिकतर नेताओं को रास नहीं  आया। उसके बाद से ऐसा लगने लगा कि मोर्चे में पहले जैसा सामंजस्य नहीं है। श्री टिकैत द्वारा 2 अक्टूबर तक आन्दोलन करने की घोषणा को लेकर भी मोर्चे के भीतर नाराजगी देखी जा रही है। ताजा समाचारों के अनुसार न सिर्फ टिकरी और सिंघु अपितु राकेश के अपने गढ़ गाजीपुर में भी किसानों की उपस्थिति घटने लगी है। सड़कों पर ताने गये तम्बुओं के अतिरिक्त ट्रैक्टर ट्रॉली में जो आवास व्यवस्था की गई थी उनमें भी किसानों की संख्या में निरंतर कमी आ रही है। किसान  नेता चाहे जितना दावा करें लेकिन  छह महीने की जिस तैयारी से धरने की शुरुवात हुई थी , उसका दम निकलने लगा  है। रबी फसल की कटाई भी नजदीक आती जा रही है। सबसे बड़ी बात ये है कि अपना घर - खेत छोड़कर कड़कड़ाती सर्दी में खुले आसमान के नीचे बैठने वाले आन्दोलनकारी भी इस बात से निराश हो चले हैं कि अभी तक उनके हाथ कुछ नहीं लगा और दर्जन भर वार्ताओं के बाद भी समझौते की सम्भावना नजर नहीं आ रही। ये सोचना तो जल्दबाजी होगी  कि आन्दोलन पूरी तरह विफल हो गया लेकिन ये कहना भी गलत न होगा कि किसान नेता लंबे आन्दोलन की जमीनी तैयारी ठीक से नहीं कर पाए जिससे वह सीमित क्षेत्र तक सिमटकर रह गया। यही वजह है कि सरकार बजाय झुकने के अपनी बात पर अड़ी हुई है। पंजाब और हरियाणा के समृद्ध किसान भले ही अभी भी धरना स्थल पर जमे हों लेकिन छोटे किसान का धैर्य जवाब देने लगा। हालाँकि किसान संगठनों ने नए जत्थे बुलवाने की व्यवस्था बनाई जो कुछ समय तक चली भी  । लेकिन अब वह सिलसिला कमजोर पड़ने लगा है । पंजाब के गाँवों में जुर्माने की  धमकी के बाद भी लोगों में पहले जैसा उत्साह नहीं रहा तो इसकी वजह आन्दोलन का दिशाहीन होना ही है। जो नेता एकता का प्रदर्शन करते हुए नजर आते थे वे अब अलग - अलग बयान देते हुए एक दूसरे के फैसलों पर सवाल उठाने लगे हैं। राष्ट्रव्यापी चकाजाम को अपेक्षित सफलता नहीं मिलने से भी आन्दोलन का दबाव कम हुआ है। 18 फरवरी को रेल रोकने की जो घोषणा की गई है उसको लेकर भी विशेष तैयारी नजर नहीं आ रही। लेकिन श्री टिकैत द्वारा हरियाणा और राजस्थान का दौरा करने के बाद अन्य  राज्यों में जाने का जो फैसला किया गया वह बुद्धिमत्तापूर्ण कदम है। सही बात तो ये है कि सीधे दिल्ली को घेरकर बैठ जाने के पहले  यदि किसान नेता देशव्यापी दौरे करते हुए किसानों और जनता दोनों के बीच अपनी बात पहुँचाते तो आन्दोलन के प्रति ज्यादा समर्थन जुटाया जा सकता था। आन्दोलन की शुरुवात पंजाब से चूंकि हुई इसलिए दूसरे राज्यों ने उस पर ध्यान नहीं दिया  और यही  सबसे बड़ी गलती हुई क्योंकि दिल्ली के बाहर जो जमावड़ा हुआ उसमें सिखों की बहुतायत होने से आन्दोलन पर एक समुदाय विशेष का ठप्पा लग गया।  अनेक राज्यों से  संगठनों के नेतागण तो मंच लूटने जा पहुंचे लेकिन उनके साथ किसानों की अपेक्षित संख्या नहीं होने से वे दबाव बनाने की स्थिति में नहीं आ सके। ये देखते हुए कहा जा सकता है कि जो काम  श्री टिकैत तथा बाकी नेता अब कर रहे हैं वही आन्दोलन शुरू  करने के पहले कर लिया जाता तो भले ही दिल्ली में आयोजित धरने में देश भर से किसान नहीं आ पाते परन्तु  वे अपने - अपने स्थानों पर नए कृषि कानूनों का विरोध करते । और फिर किसानों के आयोजन में योगेन्द्र यादव जैसे गैर किसान के प्रवेश से सरकार के साथ समझौते की गुंजाईश खत्म हो गई। यदि संयुक्त मोर्चे में शामिल किसान नेता प्रारम्भ से  ही देश भर में दौरे पर निकल  गये होते तो कृषि मंत्री को संसद में ये कहने का अवसर न मिलता कि आन्दोलन एक ही राज्य का है। लेकिन किसानों का नेता होने का दावा करने वाले सुर्खियों  में रहने का मोह नहीं छोड़ सके और दिल्ली तक ही सीमित रहे। आन्दोलन लम्बा खिंचने के बावजूद कोई नतीजा नहीं निकलने से समाचार माध्यमों में भी अब उसको लेकर पहले जैसी रूचि नहीं रही। बची - खुची कसर पूरी कर दी राकेश टिकैत की महत्वाकांक्षा ने। सच्चाई ये है कि देश के  जनमानस में  किसानों के प्रति तो सहानुभूति , समर्थन और सम्मान का भाव है किन्तु किसान नेताओं के प्रति नहीं। और ये परखी हुई बात है कि किसी भी आन्दोलन को सफलता तभी मिलती है जब उसे जनता का भावनात्मक समर्थन मिले , जो  अब तक  यह आन्दोलन हासिल करने में विफल रहा । और इसके लिये उसे खड़ा करने वाले वे नेता और संगठन जिम्मेदार  हैं जिनमें दूरदर्शिता का नितांत अभाव है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 12 February 2021

महामहिम शब्द की सार्थकता को बनाये रखने की जिम्मेदारी है राज्यपालों की



हालाँकि ये पहली बार नहीं हो रहा लेकिन संवैधानिक पदों पर बैठे महानुभावों की निर्वाचित सरकार के नेता से पटरी नहीं बैठने के मामले जिस तेजी से बढ़ रहे हैं वह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। ताजा उदाहरण महाराष्ट्र के राज्यपाल भगतसिंह कोश्यारी को सरकारी विमान उपलब्ध नहीं होने पर उनका किसी एयर लाइंस की नियमित उड़ान से देहरादून जाने का है। जैसी कि खबर है उसके अनुसार राज्यपाल को हवाई अड्डा पहुंचने पर ज्ञात हुआ कि राज्य सरकार द्वारा उन्हें सरकारी विमान देने से मना कर दिया गया जिसके बाद वे यात्री विमान की टिकिट खरीदकर अपने गंतव्य को रवाना हो गये। बवाल मचा तो राज्य सरकार ने सफाई दी कि राजभवन को इस बारे में पहले ही सूचित किया जा चुका था किन्तु राज्यपाल को उसकी जानकारी नहीं होने से वे हवाई अड्डे जा पहुंचे। विमान हेतु राज्य सरकार ने क्यों मना किया इसका खुलासा अभी नहीं हुआ किन्तु प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि श्री कोश्यारी और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के बीच सम्बन्ध अच्छे नहीं होने से आये दिन तनाव उत्पन्न होता है। दरअसल पिछले विधानसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र में सरकार के गठन को लेकर बनी अनिश्चितता के बीच  श्री कोश्यारी ने जिस तरह सुबह-सुबह देवेन्द्र फडनवीस और अजीत पवार को शपथ दिलवाई उसकी खुन्नस श्री ठाकरे के मन में है। उसके बाद भी विभिन्न अवसरों पर दोनों के बीच टकराहट होती रही। कंगना रनौत और अर्नब गोस्वामी के मामले में भी राजभवन और मुख्यमंत्री आमने-सामने आये। राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच खींचातानी का दूसरा नजारा इन दिनों बंगाल में देखा जा सकता है। राज्यपाल जगदीप धनखड़ खुले आम मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी की मुखालफत करते रहते हैं। गत दिवस तो उन्होंने लोकतंत्र बचाने के लिए ममता सरकार की विदाई को जरूरी बताकर आग में घी डालने जैसा काम कर डाला। हालाँकि ममता भी राज्यपाल के विरुद्ध अमर्यादित टिप्पणियाँ करने से बाज नहीं आतीं। लेकिन श्री धनखड़ भी मर्यादाएं लाघने में संकोच नहीं करते। ऐसे मामलों का मुख्य कारण केंद्र और राज्य में परस्पर विरोधी सरकारें होना है। राज्यपाल चूँकि केंद्र द्वारा नियुक्त होता है इसलिए उसकी वफादारी भी उसके प्रति ज्यादा रहती है। संघीय ढांचे में  राज्य का शासन संविधान के मुताबिक चले ये देखने के लिए राज्यपाल का पद बनाया गया था परन्तु धीरे-धीरे वह राजनीति के मकड़जाल में फंस गया। जब तक देश में कांग्रेस का एकछत्र राज था तब तक ये स्थिति नहीं बनीं लेकिन जबसे केंद्र और राज्यों की सरकारें अलग-अलग दलों  की बनने लगीं तब से इस तरह के विवाद बढ़ते गए। विशेष रूप से क्षेत्रीय दलों की राज्य सरकारों का केंद्र द्वारा नियुक्त राज्यपाल से पंगा होता ही रहता है। इसमें ज्यादा गलती किसकी होती है ये कह पाना कठिन है लेकिन ये बात शत-प्रतिशत सही है कि अधिकतर राज्यपाल अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता से बंधे होने के कारण संवैधानिक पद की गरिमा बनाये रखने में विफल रहते हैं। रोमेश भंडारी, बूटा सिंह और ऐसे ही अनेक उदाहराण हैं जिन्होंने राजभवन में बैठकर राजनीतिक नेता की तरह आचरण किया जिससे  इस पद का मान-सम्मान कम हुआ। वैसे काँग्रेस का रिकॉर्ड इस बारे में बहुत ही कलंकित है जिसने अपने एकाधिकार वाले जमाने में विपक्षी दल की राज्य सरकारों को बिना ठोस कारण के बर्खास्त करने का खेल जमकर खेला। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बोम्मई मामले में दिए फैसले के बाद जरूर ये सिलसिला रुका लेकिन अभी भी राज्यपाल केंद्र के एजेंट की छवि से बहर नहीं निकल पा रहे। श्री कोश्यारी और श्री धनखड़ का उल्लेख तो सामयिक होने से  महज सांकेतिक है लेकिन  समय आ गया है जब इस संवैधानिक पद के अधिकार और उसकी भूमिका पर नए सिरे से विचार किया जावे। इस बारे में एक बात स्पष्ट है कि देश में बहुदलीय व्यवस्था अब एक वास्तविकता है। क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व को नकारना भी सच्चाई से आँखें मूँद लेना है। ऐसे में राजभवन  और राज्य सरकार के बीच छोटी - छोटी बातों पर होने वाले विवाद लोकतंत्र के सम्मान को ठेस पहुंचाते हैं। राज्यपाल द्वारा विधानसभा से पारित विधेयक पर हस्ताक्षर नहीं किये जाने से वह लागू नहीं हो पाता। मप्र के राज्यपाल रहे भाई महावीर और मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के बीच भी तनातनी चली जिसके बाद महामहिम ने सरकारी विमान का उपयोग बंद कर दिया था। उन्होंने भी अनेक विधेयकों पर लम्बे समय तक हस्ताक्षर नहीं किये। विवाद तो विरोधी विचारधारा के राष्ट्रपति को लेकर भी होता है। हाल ही में संसद का बजट सत्र शुरू होने पर राष्ट्रपति के अभिभाषण का विपक्ष द्वारा बहिष्कार किया जाना इसका प्रमाण है। निश्चित रूप से इस तरह के विवाद अशोभनीय लगते हैं। यद्यपि कुछ ऐसे उदाहराण भी हैं जिनमें विरोधी राजनीतिक विचारधारा के महामहिमों से प्रधानमन्त्री या मुख्यमंत्री के रिश्ते बहुत ही सौजन्यतापूर्ण रहे। इनमें डा.शंकरदयाल शर्मा और अटलबिहारी वाजपेयी तथा प्रणब मुखर्जी और नरेंद्र मोदी उल्लेखनीय हैं। लेकिन राज्यों में ऐसा कम ही होता है। यही वजह है कि क्षेत्रीय दलों द्वारा राज्यपाल के पद को ही विलोपित किये जाने की मांग उठाई जाती रही है। मौजूदा दोनों प्रकरणों में राज्यपाल और मुख्यमंत्री दोनों ही टकराव के बहाने खोजते दिखाई देते हैं लेकिन राजभवन से ज्यादा गम्भीरता और गरिमामय व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। उस दृष्टि से श्री कोश्यारी और श्री धनखड़ को अपनी  राजनीतिक प्रतिबद्धता से परे संवैधानिक लक्ष्मण रेखा के भीतर रहकर ही आचरण करना चाहिए। उद्धव ठाकरे और ममता बैनर्जी को भी  सौजन्यता और शालीनता का प्रतीक नहीं माना जाता लेकिन संवैधानिक पद पर विराजमान महानुभाव को महामहिम शब्द की सार्थकता को बनाये रखने के लिए सदैव सतर्क रहना चाहिए।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 11 February 2021

समझौते के बाद भी चीन पर विश्वास करना भूल होगी



चीन सरकार द्वारा बीते 9 माह से लद्दाख में चल रहे विवाद के सुलझने संबंधी जानकारी  देते हुए  बताया गया कि पेंगोंग झील के करीब  दोनों सेनाओं का जमावड़ा खत्म हो जायेगा और तय प्रक्रिया के अंतर्गत सेनाएं पूर्ववत पीछे हट जायेंगी। हालांकि कल तक रक्षा मंत्रालय या भारत सरकार के अन्य किसी अधिकृत स्रोत से इसकी पुष्टि नहीं  हुई थी।लेकिन आज रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने राज्यसभा में इसकी पुष्टि कर दी ।उन्होंने साफ किया कि भारत ने कुछ भी नहीं खोया । टैंकों की वापिसी के साथ इसका सिलसिला शुरू होगा और सबसे आखिर में सैनिक पीछे हटेंगे। यदि वाकई ऐसा हुआ है तब ये भारत की सैन्य शक्ति का ही प्रभाव माना  जायेगा जिसने चीन को पहली बार झुकने को मजबूर कर दिया। सही बात तो ये है कि  गलवान घाटी में हुई खूनी मुठभेड़ में भारतीय सैन्य टुकड़ी पर धोखे से किये हमले के बाद की गई जवाबी कार्रवाई में हमारे जवानों ने चीनी सैनिकों की जिस तरह धुनाई की उसके बाद चीन की अकड़ कम हुई वरना वह बात करने को भी राजी नहीं होता। उस समय कोरोना के प्रकोप से पूरा देश पीडि़त था। चीन को लगा कि वह 1962 की पुनरावृत्ति कर लेगा जब भारत को करारी हार झेलनी पड़ी और उसने हमारी हजारों वर्ग किलोमीटर जमीन कब्जा ली। लेकिन 2020 में उसे एकदम उल्टा अनुभव हुआ। भारत ने पूरी सीमा पर जबरदस्त सैन्य मोर्चेबंदी करते हुए चीन को साफ़ संकेत दे दिया कि वह धमकियों से डरने वाला नहीं है। अग्रिम चौकियों तक़ सड़क और पुल  के साथ ही हवाई अड्डा बनाकर लड़ाकू विमानों के अलावा  मिसाइलों की तैनाती तो की ही गई , प्रधानमन्त्री , रक्षा मंत्री और सेनाध्यक्ष ने भी अग्रिम मोर्चों पर जाकर सैनिकों का हौसला बढ़ाते हुए चीन को विस्तारवादी रवैया छोडऩे के प्रति आगाह किया। सबसे बड़ी बात ये हुई कि भारत ने इस विवाद में किसी और को मध्यस्थ नहीं बनाया और चीन को बातचीत की टेबिल पर बैठने बाध्य कर दिया। रणनीतिक महत्व के अनेक स्थानों  पर भारतीय सैनिकों ने अपना आधिपत्य स्थापित कर सामरिक तौर पर बढ़त भी ले ली। लेकिन सैन्य तैयारियों के समानांतर भारत ने आर्थिक मोर्चे पर जो आक्रामक रवैया अपनाया उसने चीन पर अतिरिक्त  दबाव बनाया। भारत को  जो वैश्विक समर्थन मिला उसकी वजह से भी चीन परेशान हुआ। एक साल पहले तक वह आर्थिक महाशक्ति के तौर पर  अमेरिका तक को चुनौती देने की स्थिति में आ गया था। लेकिन कोरोना के बाद से उसके प्रति पूरी दुनिया गुस्से के साथ ही घृणा से भी भर उठी। भारत सरकार ने एक के बाद एक ऐसे कदम उठाये जिनकी वजह से चीन से होने वाले आयात में बड़ी कमी आई। देश  को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में उठाये गये कदमों का जमीनी असर भले ही अभी उतना न महसूस हुआ हो लेकिन भावनात्मक तौर पर न सिर्फ उपभोक्ता अपितु उद्योगपति भी चीन के साथ व्यापारिक सम्बन्धों को लेकर उदासीन होने लगे। इस नीति से वह जबरदस्त दबाव में आया। ये  कहना गलत न होगा कि सीमा पर सैन्य स्तर से  दिए गए माकूल जवाब के अलावा आर्थिक दृष्टि से उसकी दुखती रग पर हाथ रखने की  रणनीति  बहुत  कारगर रही। चीन को ये एहसास कतई न था कि भारत इतनी बड़ी तैयारी के साथ युद्ध के लिए खड़ा हो जाएगा। कूटनीतिक मोर्चे पर हमारी ओर से कड़क रवैया दिखाए जाने से भी चीन की अकड़ कम हुई। लेकिन चीन और धोखा एक दूसरे  के पर्याय हैं। धूर्तता  उसकी रग - रग में भरी हुई है। भले ही वह माओ युग  के लौह  आवरण को तोड़कर साम्यवादी चोला पहिनने के बाद भी पूंजी के फेर में फंस गया हो लेकिन उसकी सोच में जो कुटिलता है वह कुत्ते की पूंछ समान है। बीते 9 महीनों में भारत की तरफ से मिले कड़े जवाब से वह निश्चित तौर पर बौखलाया है। सीमा पर हमारी  मोर्चेबंदी से वह जितना विचलित हुआ उससे ज्यादा मार उसे आर्थिक मोर्चे पर पड़ रही है। गलवान घाटी के संघर्ष के बाद भारत में चीन के ग्लैमर से प्रभावित तबके की  मानसिकता भी काफी हद तक बदली है जिसकी वजह से आत्मनिर्भर भारत के प्रति लोगों का आग्रह बढ़ा। बीते कुछ महीनों में वैश्विक आर्थिक महाशक्ति के रूप में भारत की भूमिका और महत्वपूर्ण हो गई है।  ऐसे में चीन ऊपरी तौर पर भले ही समझौतावादी  रवैया दिखा रहा हो लेकिन वह दोबारा कोई हरकत नहीं करेगा इसकी कोई शाश्वति नहीं  दी जा सकती। इसलिए  सेनाओं की वापिसी यदि हो जाए तब भी भारत को सतर्क  रहना होगा क्योंकि गलवान में हुई पिटाई का बदला लेने के लिए वह कब क्या कर बैठे ये कह  पाना मुश्किल है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 10 February 2021

संसद में सौजन्यता : काश, ऐसे दृश्य आगे भी देखने मिलें



किसी राजनेता की मृत्यु के उपरान्त आयोजित  श्रृद्धांजलि सभा में विरोधी विचारधारा वाले नेतागण भी  प्रशंसा करते हुए उसके गुणों का बखान करते हैं। इस दौरान कहीं से भी नहीं  लगता कि ये वही लोग हैं जो जीवित रहते तक उसकी बखिया उधेड़ने का कोई  मौका नहीं  छोड़ते थे। इसी तरह रास्ते में शवयात्रा देखकर देखकर हर कोई रुक जाता है और मन ही मन मृतक की शांति के लिए अपने इष्ट से प्रार्थना करता है। ये सम्वेदनशीलता ही मानवीयता का आधार है। लेकिन आज की राजनीति में जब विरोधी विचारधारा के लोगों में मतभेद शत्रुता के चरम पर पहुँच जाते हैं तब आश्चर्य से ज्यादा दु:ख होता है। उस दृष्टि से गत दिवस राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे  वरिष्ठ कांग्रेस सांसद  गुलाम नबी आजाद के कार्यकाल की समाप्ति पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण के दौरान भावुक  हो जाना चर्चा का विषय बन गया। उन्होंने श्री आजाद के संसदीय योगदान के साथ उनके व्यक्तित्व की तो प्रशंसा की ही लगे हाथ ये भी कह दिया कि वे लौटकर आएंगे और उनके अनुभवों का लाभ लिया जावेगा। भावुक तो श्री आजाद भी हुए और इंदिरा जी तथा संजय गांधी के साथ ही अटल बिहारी वाजपेयी का भी स्मरण किया। भावनाओं के इस प्रवाह का राजनीतिक विश्लेषण भी बिना देर किये शुरू हो गया। किसी को प्रधानमन्त्री के आंसुओं में नाटकीयता दिखी तो किसी को राजनीति। श्री आजाद के भाषण में भी उनकी पार्टी की अंदरूनी खींचतान की झलक दिखाई दी , जिसके चलते उन्हें राज्यसभा की सदस्यता से वंचित होना पड़ा। ये कयास लगाये जाने लगे कि केंद्र सरकार जम्मू कश्मीर में राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करने में उनकी सहायता ले सकती है। ज्ञातव्य है श्री  आजाद इस राज्य के मुख्यमंत्री भी रहे हैं और वर्तमान परिदृश्य में डा. फारुख अब्दुल्ला के अलावा एकमात्र नेता हैं जिनकी राष्ट्रीय राजनीति में पहिचान है। चूँकि श्री आजाद अधिकतर समय केंद्र में ही रहे इसलिए राजनीतिक तौर पर वे राष्ट्रीय मुद्दों के बेहतर जानकार है। बतौर सांसद भी उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही। हालांकि कांग्रेस में वे प्रथम पंक्ति के नेता नहीं बन सके और इसका कारण संभवत: जम्मू कश्मीर का राष्ट्र की मुख्यधारा से कटा रहना ही रहा। लेकिन 370 और 35 ए हटने के बाद से वहां  के हालात पूरी तरह बदल गये हैं। यद्यपि श्री आजाद ने उस निर्णय का राज्यसभा में पूरी ताकत से विरोध किया था लेकिन धीरे-धीरे उन्हें भी  ये एहसास हो चला है कि वे संवैधानिक प्रावधान इतिहास हो चले हैं। ऐसे में यदि वे अपनी भूमिका को नए सिरे से तय करने की सोच रहे हों तो उसमें आश्चर्य नहीं  होना चाहिए। लेकिन प्रधानमन्त्री ने जिस तरह उनकी तारीफ के पुल बांधे उस पर अधिकतर प्रातिक्रियाएं व्यंग्यात्मक ही रहीं। विशेष रूप से श्री मोदी का ये कहना कि उन्हें निवृत्त नहीं रहने दिया जावेगा  , नये राजनीतिक समीकरणों का संकेत दे गया किन्तु इससे अलग हटकर देखें तो इस तरह की सौजन्यता को  केवल राजनीतिक दृष्टि से ही देखा जाना अटपटा लगता है। पंडित नेहरु के दौर में विपक्ष इतना तगड़ा नहीं था । फिर भी संसद में विपक्ष के जो नेता होते थे वे प्रधानमंत्री की कटु आलोचना करने में लेशमात्र भी  संकोच नहीं करते थे परन्तु  नेहरु जी ने उसे शत्रुता नहीं समझा। दरअसल राजनीति में कटुता का दौर शुरू हुआ 1975 में आपातकाल के साथ जब इंदिरा जी ने  समूचे विपक्ष को जेल में ठूंसकर संसद को बंधक बना लिया था। यहां तक कि बाबू जयप्रकाश नारायण और आचार्य कृपलानी जैसी वयोवृद्ध हस्तियों तक को नहीं बख्शा। भले ही आपातकाल दो साल के भीतर अलविदा हो गया लेकिन राजनीति में शत्रुता के जो बीज बो गया उसकी फसल गाजर घास की तरह देश भर में फैल चुकी है। ये देखते हुए संसद या इसके बाहर नेतागण एक-दूसरे की तारीफ  या तो किसी शोक प्रसंग के दौरान करते हैं या फिर स्वार्थवश। लोकतंत्र में वैचारिक विरोध के समानांतर सौजन्यता और मानवीयता निहायत जरूरी है। नेहरु जी और लोहिया जी की नोक झोंक , और नेहरु जी मृत्यु के बाद संसद में अटल जी  द्वारा दिया गया भाषण भारतीय लोकतंत्र की सबसे सुखद स्मृतियों में से है। ऐसे में प्रधानमन्त्री और गुलाम नबी आजाद के भावुक हो जाने में नाटकीयता और राजनीतिक गुणा- भाग देखना इस बात का परिचायक है कि राजनीति में सौजन्यता आश्चर्यचकित करने लगी है। हालांकि आज के दौर में वैचारिक छुआछूत तो लगभग खत्म सी है। वामपंथ और भाजपा के बीच ही पूरी तरह से छत्तीस का आँकड़ा है। वरना अन्य  सभी दलों के बीच आवाजाही को लेकर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। ऐसे में श्री आजाद और प्रधानमन्त्री के बीच कोई खिचड़ी पक रही है तो बड़ी बात नहीं। कश्मीर को लेकर जहां केंद्र सरकार को ऐसे  स्थानीय  लोग चाहिए जो वहां की जमीनी सच्चाई से वाकिफ हों , वहीं श्री आजाद को भी अपनी राजनीति जिंदा रखने की चिंता है। लेकिन इस तरह की भावनाएं और संवाद संसद में यदि सामान्यत: व्यक्त होने लगें तो इससे निचले स्तर तक फ़ैल चुकी कटुता में कमी लाई जा सकती है , जो आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है। बेहतर हो संसद सत्रों के दौरान ही इस तरह के आयोजन रखे जाएं जिनमें राजनीतिक कड़वाहट से ऊपर उठकर सौजन्यता और शिष्टाचार नजर आये।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 9 February 2021

कानूनों को स्थगित रखकर वार्ता जारी रखना ही बेहतर विकल्प है



प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी द्वारा संसद में दिए  भाषण में किसानों के साथ  वार्ता  जारी रहने की बात कहे जाने के बाद किसान नेताओं ने  अपनी जो सहमति व्यक्त की वह सकारात्मक संकेत है | एक नेता ने तो स्थान और तारीख बताने तक की मांग कर डाली | लेकिन साथ - साथ उनका  ये भी कहना है कि न्यूनतम  समर्थन मूल्य ( एमएसपी ) को लेकर आश्वासन नहीं , कानूनी व्यवस्था की जावे | राकेश टिकैत ने इस बारे में प्रधानमन्त्री द्वारा दिए गए आश्वासन पर टिप्पणी करते हुए कहा कि देश भरोसे पर नहीं वरन कानून से चलता है | ऐसे में सवाल उठता है कि जब किसानों की मूल मांगों को जस का तस मानने के लिए सरकार राजी नहीं है और  किसान नेता कृषि कानूनों को कतिपय संशोधनों के साथ स्वीकार करने से असहमत हैं तब प्रधानमन्त्री के आह्वान पर बातचीत शुरू हो भी जाए तो उसका नतीजा दर्जन भर पिछली वार्ताओं जैसा ही होना तय है | किसान नेताओं को श्री मोदी की ये बात तो समझ  आ गई कि  बातचीत जारी रखी जावे लेकिन उनका ये सुझाव अनसुना कर दिया गया कि आन्दोलन स्थल पर बैठे बुंजुर्गों को घर भेज दिए जाने के साथ ही आन्दोलन समाप्त कर  बातचीत जारी रहे | लेकिन श्री टिकैत का ये कहना कि देश कानून  से चलता है भरोसे से नहीं , दोनों पक्षों के बीच अविश्वास को बढ़ाने वाला ही है | जहाँ तक बात न्यूनतम समर्थन मूल्य की है तो उसकी कानूनी गारंटी देना पूरी तरह अव्यवहारिक होगा | कल को उपभोक्ता ये मांग करने लगेंगे कि कृषि  उत्पादों का अधिकतम मूल्य भी कानूनन तय किया जाये | ऐसे में सरकार के लिए उस स्थिति का सामना करना कठिन होगा | और फिर कृषि उत्पादों की संख्या भी लगातार बढ़ाई जा रही है | हाल ही में केरल सरकार ने साब्जियों  के न्यूनतम मूल्य निश्चित किये हैं | लेकिन सवाल ये है कि सरकार क्या - क्या खरीदेगी ? सार्वजनिक वितरण प्रणाली ( राशन ) के लिए खरीदे जाने वाले अनाज तक के लिए भण्डारण व्यवस्था अपर्याप्त होने से करोड़ों रु. का अनाज हर साल बर्बाद हो जाता है | और फिर किसान संगठन ये बताने में असमर्थ हैं कि यदि कोई किसान अपनी तात्कालिक जरूरत पूरी करने के लिए अपना उत्पादन न्यूनतम कीमत से कम किसी को बेच दे तब उसको कौन रोकेगा ? वैसे भी अधिकतर छोटे और मध्यम किसान अपनी फसल गाँव में ही बेच देते हैं | ऐसे में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकार भले खरीद करे जो वह करती भी  है , लेकिन उसके लिए व्यापारी को बाध्य करने का कानून बनाये जाने के बाद भी उसे  लागू नहीं किया जा सकेगा | किसान  संगठनों का ये कहना गलत नहीं है कि उनका उत्पाद सस्ते में खरीदकर व्यापारी और उद्योगपति उस पर जबर्रदस्त मुनाफा कमाते हैं | आलू चिप्स और मक्के के आटे का उदाहरण इस दौरान खूब सुनने मिला | लेकिन इसका कारण भंडारण क्षमता और प्रसंस्करण सुविधाओं का जरूरत के अनुसार विकास नहीं किया जाना है | महाराष्ट्र के कुछ इलाके फलों की खेती के लिए काफी प्रसिद्ध हैं | उनमें फलों के रस , जैम , जैली आदि बनाने के उद्योग भी लग गये जिससे किसान को उसके उत्पाद का अच्छा मूल्य मिलता है  | देश के विभिन्न हिस्सों से आये दिन ऐसी खबरें आती हैं जिनमें कम लागत पर खेती और उससे जुड़े कारोबार से अच्छी कमाई के अवसर उत्पन्न किये जा सके | पहले कृषि के साथ पशुपालन भी अनिवार्य रूप से जुड़ा होता था लेकिन जबसे बैलों की जगह ट्रैक्टर ने ली तबसे उस दिशा में किसानों की रूचि कम होती गई | पशुपालन किसानों के लिए अतिरिक्त आय का सशक्त माध्यम बन सकता है | श्री टिकैत ने सरकार को 2 अक्टूबर तक का समय दिया है , कृषि क़ानून वापिस लेने के लिए | जाहिर है इस अवधि में उन कानूनों के फायदे और नुकसान काफी हद तक सामने आने लगेंगे  | किसान संगठन कानून वापिसी पर जोर दे रहे हैं | यदि सरकार वैसा करने के बाद शांत  बैठ जाए तब भी यथास्थिति बनी रहेगी | ऐसे में अच्छा  यही होगा कि सरकार द्वारा दिए गए प्रस्ताव के अनुसार तीनों कानूनों का क्रियान्वयन साल - डेढ़ साल तक स्थगित रखा जावे और इस दौरान  दोनों पक्ष आपसी   सहमति से जरूरत के मुताबिक उनमें संशोधन कर् लें |  किसान  नेता यदि प्रधानमंत्री द्वारा  संसद में दिए गए आश्वासन पर  अविश्वास करते रहेंगे तो गतिरोध बना रहेगा | उनको ये सोचना चाहिए कि दो महीने से भी ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी वे आन्दोलन के प्रति आम जनता की  वैसी सहानुभूति और समर्थन हासिल नहीं कर सके जो कृषि प्रधान देश होने के नाते अपेक्षित था | 26 जनवरी को दिल्ली में जो हुआ उससे आन्दोलन का नैतिक पक्ष कमजोर हुआ जिसके कारण 1 फरवरी को संसद घेरने का कार्यक्रम रद्द करना पड़ा और उसके बाद आयोजित चकाजाम का भी वैसा असर नहीं हुआ जैसा प्रचारित किया जा रहा था | इसके बाद ही किसान नेताओं के बीच के मतभेद भी सार्वजनिक हुए और अब ये सुनने में आ रहा है कि पंजाब और हरियाणा के साथ ही उप्र से दिल्ली को होने वाली दूध और सब्जियों की आपूर्ति रोकी जायेगी | ऐसा करने से किसान सरकार पर कितना दबाव बना पायेंगे ये तो वे ही जानें लेकिन  दिल्ली के करोड़ों वाशिन्दे अवश्य इस आन्दोलन के प्रति नाराजगी रखने बाध्य हो जायेंगे | इस धमकी से ये भी साबित होने लगा है कि आन्दोलन का नेतृत्व करने वालों को भी कुछ सूझ नहीं रहा | समूचे परिदृश्य पर निगाह डालने के बाद यही उचित प्रतीत होता है कि प्रधानमन्त्री के आह्वान को स्वीकार करते हुए किसान नेता सकारात्मक रवैया प्रदर्शित करते हुए  कानूनों को वापिस लिए जाने की बजाय उनके स्थगन पर राजी हों | उन्हें इस वास्तविकता को समझ लेना चाहिये कि हवा में चलाये तीर किसी काम नहीं आते |  

- रवीन्द्र वाजपेयी