Thursday, 3 June 2021

टीकाकरण अभियान में नीतिगत अस्थिरता पर न्यायपालिका की नाराजगी गैर वाजिब नहीं



गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने कोरोना टीकाकरण में व्याप्त विसंगतियों  पर नाराजगी व्यक्त करते हुए केंद्र सरकार द्वारा टीकों के आवंटन संबंधी सभी दस्तावेज मंगवाए , जिनमें फ़ाइल पर लिखे गये नोट्स भी हैं | उल्लेखनीय है न्यायालय द्वारा टीकाकरण को लेकर आ रही शिकायतों पर सरकार से अनेक सवाल पूछते हुए हलफनामे में उनका जवाब देने हेतु दो सप्ताह  का समय दे दिया | सरकार की तरफ से नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप को चुनौती दिए  जाने पर अदालत ने तल्खी भरे अंदाज में कहा कि जनता की तकलीफ देखकर वह मूकदर्शक नहीं रह सकती | अपने आदेश में सर्वोच्च न्यायालय  ने राज्य सरकारों को  कुछ टीके मुफ्त और कुछ निजी अस्पतालों को बेचे जाने पर ऐतराज करते हुए टीकाकरण नीति और अब तक उस पर खर्च हुई राशि का विवरण मांगते हुए  ऑन लाइन पंजीयन में हो रही परेशानी के साथ ग्रामीण और शहरी आबादी के अनुपात में  भेदभाव का भी संज्ञान लिया है | स्मरणीय है टीकाकरण शुरू होने पर केंद्र और राज्यों की तरफ से ये आश्वासन दिया गया था कि वह पूरी तरह मुफ्त होगा | लेकिन जब उसकी शुरुवात हुई तो सरकारी केन्द्रों में तो वह निःशुल्क लगा किन्तु निजी अस्पतालों को 150 रु. में दिये जाने के साथ ही 100 रु. सेवा शुल्क लेने  की अनुमति दी गई | यद्यपि अनेक निजी अस्पतालों ने सेवा शुल्क लिए बिना ही टीके लगाये | लेकिन बाद में सरकार ने जो नीति बनाई उसके तहत 50 फीसदी टीके तो राज्य सरकारों को मुफ्त दिए गये वहीं शेष निजी अस्पतालों को ऊंची दरों पर जिससे अलग - अलग टीकों की औसतन कीमत 1000 रु. तक जा पहुंची | इस कारण बड़ा वर्ग सरकारी टीकाकरण के भरोसे आकर टिक गया | इस बारे में यह उल्लेखनीय है कि टीकाकरण अभियान जिसे प्रधानमन्त्री ने उत्सव का नाम दिया , शुरुवात में अपेक्षानुरूप नहीं रहा | निःशुल्क  होने के बाद भी एक वर्ग टीका लगवाने के प्रति उदासीन रहा किन्तु ज्योंही आयु सीमा घटी त्योंही भीड़ बढ़ने लगी और 18 वर्ष से ऊपर वालों को भी पात्र माने  जाने के बाद से तो अफरातफरी मच गई | अस्पतालों के अलावा अनेक टीकाकरण केंद्र खोलकर  ऑनलाइन पंजीयन की सुविधा भी दी गई किन्तु उसमें भी वे सभी परेशानियां देखने में मिल रही हैं जो हमारी पहिचान हैं | टीकों की कमी के कारण अनेक  केंद्र बंद भी किये गए | कुछ दिन तक टीकाकरण रोकने की नौबत देश की राजधानी दिल्ली तक में आ गई | ये कहने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि इस  काम में सरकारी नीतियां और निर्णय जिस तरह अचानक बदले जाते रहे उससे वह अनिश्चितता और  अव्यवस्था का शिकार होकर रह गया | हालाँकि खुद सर्वोच्च न्यायालय हाल ही में तमिलनाडु उच्च न्यायालय के एक फैसले के संदर्भ में कह चुका है कि अदालतों को ऐसे आदेश नहीं देना चाहिए जिनका पालन करना असम्भव हो | दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा 80 वर्ष से अधिक आयु वालों की बजाय युवाओं को टीकाकरण में प्राथमिकता देने संबंधी आदेश में जो टिप्पणी की गई वह भी अशोभनीय कही जायेगी | लेकिन सरकार का ये कहना कि नीतिगत मामलों में न्यायपालिका का हस्तक्षेप अनुचित है कुछ हद तक गलत है क्योंकि समीक्षा और निगरानी के तौर पर न्यायालयों की  भूमिका लोकतान्त्रिक व्यवस्था में नियन्त्रण और संतुलन के लिए आवश्यक  प्रतीत होती है | ये बात सही है कि सरकार के दैनंदिन कार्यों  में न्यायिक  सक्रियता  अनेक अवसरों पर अतिरंजित लगती है लेकिन दूसरी तरफ ये भी उतना ही सही है कि आम जनता के लिये सत्ता के उच्च शिखर तक अपनी बात पहुँचाने के माध्यम सिकुड़ जाने और जनप्रतिनिधियों के चुनाव जीतने के बाद मतदाताओं से दूरी बना लेने के कारण अब न्यायपालिका में ही उम्मीद की किरण नजर आने से साधारण जन उसी के जरिये अपनी पीड़ा व्यक्त कर पाते हैं | शासन व्यवस्था चाहे वह केंन्द्र की हो  अथवा राज्य की , पहले जैसी संवेदनशील नहीं रही | सत्ता में बैठे नेतागणों की प्रशासनिक अक्षमता की वजह से नौकरशाही ने निर्णय प्रक्रिया पर कब्ज़ा कर लिया है | इसका  दुष्प्रभाव जनता की उपेक्षा के रूप में दिखाई दे रहा है | कोरोना की दूसरी लहर के दौरान जो कुछ भी हुआ उसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार की भले न हो लेकिन लोगों के इलाज में निजी अस्पतालों को लूटने का जो अभियान चला उसे रोकने में केंद्र  और राज्यों की सरकारें विफल रहीं | उसके बाद टीकाकरण के अभियान का संचालन भी बेहद फूहड़पन से किया जाना ये साबित करता है कि शासन और प्रशासन अपने दायित्व निर्वहन के प्रति गंभीर नहीं हैं | सर्वोच्च न्यायालय ने गत दिवस जो कहा उस पर सकारात्मक  दृष्टिकोण का प्रदर्शन करते हुई टीकाकरण अभियान को सुव्यवस्थित करना चाहिये क्योंकि  कोरोना की  तीसरी लहर आने के पहले अधिकांश देशवासियों को टीका लगाया जाना नितांत जरूरी है |


- रवीन्द्र वाजपेयी

 

Wednesday, 2 June 2021

परीक्षाएं रद्द हो सकती हैं तो चुनाव क्यों नहीं टल सकते



केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ( सीबीएसई ) ने 10 वीं के बाद 12 वीं की परीक्षा भी रद्द कर दी | खुद  प्रधानमंत्री ने इस आशय की घोषणा की | राज्यों को भी अपने शिक्षा मंडलों में ऐसे ही फैसले करने की छूट दे दे गयी है | इस  निर्णय का कारण कोरोना संक्रमण की स्थिति में छात्रों के स्वास्थ्य और  सुरक्षा की चिंता करना बताया गया जो पूरी तरह उचित भी है | मूल्यांकन से असंतुष्ट छात्रों को परीक्षा का विकल्प भी दिया गया है | लेकिन इसी के साथ  मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा का ये  बयान भी पढ़ने मिला कि आगामी वर्ष होने वाले पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव निर्धारित समय पर ही कराए जायेंगे | ये राज्य हैं मणिपुर , गोवा , पंजाब , उत्तराखंड और उप्र | हमारे देश में चुनाव करवाना बहुत ही पेचीदा काम है | इसलिये चुनाव आयोग काफी पहले से तैयारियां शुरू कर देता है | मतदाता सूचियाँ नए सिरे से बनाने के साथ ही सुरक्षा और प्रशासनिक प्रबन्ध भी करने होते हैं | उस दृष्टि से मुख्य चुनाव आयुक्त ने ऐसी कोई बात नहीं कही जो अस्वाभाविक हो | लेकिन कोरोना के कारण देश में जो परिस्थितियां उत्पन्न हुईं उनमें चुनाव करवाए जाने से जनता का बड़ा वर्ग बहुत नाराज है | अभी हाल ही में असम , बंगाल , तमिलनाडु , केरल और पुडुचेरी में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान प्रधानमन्त्री सहित अन्य नेताओं की रैलियों में उमड़ी भीड़ में कोरोना अनुशासन की धज्जियां उड़ने पर पूरे देश में गुस्सा देखा गया | बंगाल , तमिलनाडु और केरल में चुनाव उपरांत कोरोना का संक्रमण जिस तेजी से बढ़ा उसके लिए देश का जनमत चुनाव प्रचार करने वाले नेताओं को ही जिम्मेदार मानता है | अनेक विपक्षी नेताओं ने प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर खूब हमले किये लेकिन उन सबने भी रैलियां करने में कोई कसर नहीं छोड़ी | भले  ही बीते कुछ दिनों से कोरोना की  दूसरी लहर का प्रकोप काफी कम हो गया  लेकिन इसी के साथ ही तीसरी लहर के आने की आशंकाएं भी लगातार व्यक्त की जा रही हैं जिसका समय आगामी नवम्बर से अगले साल की जनवरी  तक बताया जा रहा है | ये आश्वासन भी दिया जा रहा है कि तीसरी लहर यदि आती भी है तो वह लम्बी नहीं खिंचेगी | सरकारी जानकारी के अनुसार दिसम्बर तक पूरे देश को कोरोना का टीका लगा दिया जावेगा | लेकिन  टीके को लेकर जो अनिश्चितता बनी हुई है उसे देखते हुए सरकारी आश्वासन पर विश्वास नहीं  होता | और फिर तीसरी लहर कोई पूछ बताकर तो आयेगी नहीं | इसके अलावा देश की अर्थव्यवस्था भी डांवाडोल है | वर्तमान वित्तीय वर्ष में सकल घरेलू उत्पादन ( जीडीपी ) और विकास दर के अनुमान आये दिन संशोधित हो रहे हैं | वित्तीय घाटा स्वाभाविक तौर पर बढ़ गया है | केंद्र और राज्यों की सरकारें कोरोना काल में चिकित्सा के साथ ही राहत के कार्यों में उलझी रहीं जिससे विकास  के बाकी काम पिछड़ गए | ऐसे में चुनाव का आयोजन न केवल  कोरोना संक्रमण की वापिसी  में सहायक बन सकता है अपितु उसमें सरकारी खजाने से जो धन खर्च होगा उसका उपयोग किसी और जरूरी काम में हो तो वह ज्यादा सार्थक होगा | इसके अलावा  राजनीतिक पार्टियों द्वारा चुनाव में जिस बेरहमी से   पानी की तरह पैसा बहाया जाता है उसका बोझ भी घूम फिरकर जनता पर ही पड़ता है क्योंकि चुनावी चंदा भ्रष्टाचार के प्रमुख कारणों में से है | जिन पांच राज्यों में आगामी साल चुनाव होने हैं उनमें से पंजाब , उप्र और गोवा में कोरोना का जबर्दस्त  कहर  देखने मिला | मौतें भी खूब हुईं | उप्र में कोरोना के चरमोत्कर्ष के दौरान हुए पंचायत चुनाव का संचालन जिन सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के जिम्मे था उनमें से बड़ी संख्या में कोरोना ग्रसित हुए | ये सब देखते हुए सभी राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग से मिलकर कोई ऐसा सर्वसम्मत रास्ता निकालना चाहिए जिससे न तो संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन हो और न ही जन के साथ धन हानि की आशंका  बढ़े | कुछ समय पहले इसी स्तंभ में साल - दो साल चुनाव स्थगित करने संबंधी सुझाव दिये जाने पर अनेक पाठकों ने उसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया को खत्म करने का प्रयास बताकर  विरोध किया था लेकिन बंगाल चुनाव के दौरान रैलियों को लेकर जो विपरीत प्रतिक्रिया देश भर से आई उसे देखने के बाद ये कहना गलत न होगा कि चुनाव संवैधानिक आवश्यकता होते हुए भी देश और जनहित से बड़ा नहीं हो सकता | आगामी कम से कम दो साल देश को कोरोना से हुए नुकसान से उबरने में लगेंगे | ऐसे में चुनाव आ जाने से केंद्र और  सम्बन्धित राज्य की सरकार सब काम भूलकर उसमें जुट जाती हैं | विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा 5 राज्यों के चुनाव हेतु तैयारियां शुरु करने के भी संकेत मिलने लगे हैं | हालातों के मद्देनजर यदि 10वीं और 12वीं जैसी परीक्षाएं जिनका विद्यार्थी के जीवन में बेहद  महत्वपूर्ण  स्थान होता है , यदि इस कारण से  रद्द की जा सकती हैं कि नई पीढ़ी का स्वास्थ्य और सुरक्षा ज्यादा जरूरी है तो चुनावों में भी तो लाखों लोगों का स्वास्थ्य दांव पर लग सकता है | और अब तो युवा मतदाता भी काफी हैं | चुनाव आयोग चाहे जितनी  सख्ती कर ले  लेकिन  वह नेताओं की रैलियों की भीड़ से  मास्क और शरीरिक दूरी जैसे अनुशासन का पालन नहीं करवा सकता | ऐसे में समय रहते  इस बारे में विचार होना चाहिए | राष्ट्रपति शासन के अलावा विधानसभा का कार्यकाल बढ़ाये जाने जैसे विकल्प भी हो सकते हैं | आने वाले कम से कम एक साल कोरोना से हुई क्षति की पूर्ति पर पूरा ध्यान देना देश हित में होगा | देखें राजनीतिक दल इस दिशा में  क्या सोचते हैं  ?

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 1 June 2021

विधायकों की वेतन वृद्धि का प्रयास जले पर नमक छिड़कने जैसा



देश  में बेरोजगारी अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर है | कोरोना काल में बड़े पैमाने पर लोगों की नौकरियां चली  गईं या फिर वेतन में  कटौती हो गयी | केन्द्रीय कर्मचारियों का महंगाई भत्ता भी स्थिर कर दिया गया था | सांसदों की क्षेत्र  विकास निधि  बंद कर दी गई | लम्बे - लम्बे लॉक डाउन  से कारोबार ठप्प रहने  के कारण सरकार की कर वसूली घट गई | राज्य सरकारों का खजाना खाली है | कोरोना ने जो आपातकालीन हालात उत्पन्न कर  दिए उनके कारण सरकार का पूरा ध्यान और संसाधन चिकित्सा प्रबंधों और अब टीकाकरण पर केन्द्रित हो गया है | आज से लॉक डाउन में आंशिक ढील दी गई लेकिन आर्थिक गतिविधियाँ पूरी तरह प्रारम्भ नहीं होने से अर्थव्यवस्था की स्वाभाविक गति शायद ही वापिस आ सकेगी |  इसका सबसे ज्यादा असर छोटे  व्यवसायी , निजी क्षेत्र के नौकरीपेशा और श्रमिक वर्ग पर पड़ेगा जिसके सामने घर चलाने की समस्या पैदा हो गई है | हालाँकि निर्धन तबके को सरकार ने मुफ्त राशन बांटकर  भुखमरी से बचा लिया लेकिन मध्यम वर्गीय स्वरोजगारी , व्यापारी और नौकरीपेशा वर्ग की कमर कोरोना ने बुरी तरह तोड़कर रख दी है | आय के स्रोत सिमट जाने के बावजूद  भी  बिजली के बिल , बैंक की किश्तें और अन्य सरकारी देनदारियों के लिए जमकर दबाव बनाया जाता है | बिजली का उपयोग न करने वाले संस्थानों से भी न्यूनतम प्रभार के  नाम पर पठानी वसूली की जा रही है | सरकारी कर्मचारी को वेतन - भत्ते समय पर मिलते रहें , इसमें किसी को ऐतराज नहीं है लेकिन मुसीबत तो पूरे समाज पर आई है इसलिए सभी वर्गों के हितों का ध्यान रखना शासन का दायित्व है | लेकिन लोकतंत्र नामक व्यवस्था में जनता के प्रतिनिधि के तौर पर नव - सामन्तों का जो नया वर्ग उत्पन्न हुआ उसकी संवेदनहीनता दुखी करने के साथ ही क्रोधित भी कर देती है | आज खबर आई कि  मप्र विधानसभा के सदस्यों के वेतन और भत्तों में वृद्धि करने की तैयारी शुरू हो गई है | इस हेतु एक वरिष्ठ विधायक की अध्यक्षता में समिति का गठन भी कर दिया गया जिसमें   सत्ता और विपक्ष  दोनों का प्रतिनिधित्व है | बाताया जा रहा है 2016 के बाद विधायकों के वेतन और भत्ते चूंकि नहीं बढ़े  इसलिए ये समिति बनाई गई है | यद्यपि इसकी कवायद कमलनाथ सरकार के समय ही शुरू  हो गई थी किन्तु वह गिर गई और उसके बाद आ गया कोरोना | अब एक साल बाद जब कोरोना की दूसरी लहर में बड़े पैमाने पर जन और धन हानि हुई है तथा सरकारी खजाना खाली पड़ा है तब विधायकों के वेतन - भत्तों में वृद्धि जैसे विषय नितांत गैर जरूरी लगते हैं | आश्चर्य की बात है कि छोटी - छोटी सी बातों पर सरकार पर  चढ़ बैठने वाला विपक्ष ऐसे मामलों में सर्वदलीय एकता का पक्षधर बन जाता है | संसद में भी यही नजारा देखने  मिलता है | अक्सर सत्र के अंतिम दिन सांसदों के वेतन - भत्तों में बढ़ोतरी का प्रस्ताव संसदीय कार्यमंत्री पेश करते हैं जिस पर न कोई बहस होती है और न ऐतराज | प्रस्ताव पेश होते ही  समूचा सदन एकमत से उसे स्वीकृति प्रदान कर देता है | देखा - सीखी विधान सभाओं में भी  ऐसा होने लगा | जनप्रतिनिधियों को अपना कार्य ठीक से करने के लिए पर्याप्त वेतन - भत्ते और अन्य सुविधाएँ मिलनी ही चाहिये | लेकिन देखने वाली बात ये भी है कि जिन सांसदों - विधायकों की आय उनके द्वारा दिये गए शपथ पत्र के मुताबिक लाखों और करोड़ों में है , वे भी वेतन - भत्तों और सुविधाओं को लेने से इंकार नहीं करते | हालाँकि कुछ हैं जो पूरा पैसा जन कल्याण में लगा देते हैं | लेकिन समाजवाद और साम्यवाद का झन्डा उठाने वाले भी इस वृद्धि का विरोध करते शायद  ही कभी देखे गए हों | सदस्य न रहने पर भी मिलने वाली पेंशन , निःशुल्क यात्रा और चिकित्सा से भी अपवादस्वरूप किसी ने इंकार किया होगा | मप्र विधानसभा के माननीय सदस्यों से ये अपेक्षा है कि वे वेतन - भत्तों में वृद्धि के किसी भी प्रयास को तब तक स्थगित रखने का दबाव बनायें जब तक प्रदेश कोरोना संकट से उबरकर सामान्य स्थिति में नहीं लौट आता | आने वाले कम से कम दो साल कोरोना से हुए नुकसान की भरपाई में लग जायेंगे और वह भी  तब जब तीसरी लहर या उस जैसी ही कोई आपदा न आ टपके | विधायकों को ये  समझ लेना चाहिए कि इस समय जनता बेहद नाराज है और उसकी नाराजगी हर दृष्टि से जायज भी है | ऐसे में जब आम आदमी की आर्थिक स्थिति बुरी शक्ल में है तब माननीय विधायकों के वेतन - भत्तों में वृद्धि की बात सोचना भी जनता के जले पर नमक छिड़कने जैसा होगा | अच्छा होगा विधायकों के बीच से ही इसके  विरुद्ध  आवाज उठे लेकिन उसकी सम्भावना लगभग शून्य है क्योंकि यही एक ऐसा मुद्दा है जिसमें दलीय मतभेद किनारे रख दिए जाते हैं | ये देखकर हंसी आती है कि चुनाव में करोड़ों फूंकने   वाले अधिकतर  नेतागण चुनाव जीतने के बाद वेतन और भत्ते के साथ सरकारी सुविधाओं के मोहताज हो जाते हैं | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 31 May 2021

अस्पतालों में ऑक्सीजन युक्त बिस्तरों का प्रबंध सर्वोच्च प्राथमिकता



कोरोना की दूसरी लहर के चरम  में  दैनिक संक्रमितों का अधिकतम  आंकड़ा 4.5 लाख से भी ऊपर चला गया था | अस्पतालों में बिस्तरों की कमी  के साथ ही ऑक्सीजन आपूर्ति और वेंटीलेटरों की किल्लत भी देखने मिली जिस  कारण  बड़ी संख्या  में लोग मारे गये  |  उस दौर की याद आज भी दहला देती है | श्मसान में दाह संस्कार करने के लिए परिजनों को घंटों ही नहीं अपितु कई दिनों तक इन्तजार करना पड़ा | निश्चित रूप से वह एक अप्रत्याशित और अभूतपूर्व  संकट था | सरकार सहित निजी क्षेत्र द्वारा दी जाने वाली स्वस्थ्य सेवाएँ बुरी तरह चरमरा गईं | सरकारी अस्पतालों में चूँकि चिकित्सा संबंधी नियमों का पालन करना होता है इसलिए वहां जो भी इंतजाम हुए वे भले देर से हुए हों लेकिन पुख्ता हुए | लेकिन निजी अस्पतालों ने अंधाधुंध कमाई के फेर में बिस्तरों की संख्या तो बढ़ाई लेकिन उस अनुपात में आवश्यक सुविधाएँ नहीं बढ़ीं | कुछ ने तो पार्किंग हेतु बनाये गये तलघर में ही कोरोना वार्ड के अलावा  न्यूनतम जरूरतों का ध्यान रखे बिना ही सघन चिकित्सा वार्ड बना दिए गये | हालाँकि कोरोना संक्रमण के चरमोत्कर्ष में जैसी और जितनी चिकित्सा मिल सकी उसी में लोगों ने काम चलाया | चिकित्सकों और उनके सहयोगी कर्मियों ने इस अवधि में जिस  सेवा भाव का परिचय दिया वह भी मिसाल है | निजी अस्पतालों के मालिकों ने भले ही निर्लज्जता के साथ मुनाफाखोरी की लेकिन सरकारी अस्पतालों में संसाधनों के अभाव में जितना भी हो सका इलाज किया गया | लेकिन इस सबसे हटकर एक बात जो इस दौरान पूरी तरह स्पष्ट हो गई कि 138 करोड़  की आबादी के हिसाब से हमारे देश में चिकित्सा प्रबंध बहुत ही नगण्य हैं | देश के बहुत बड़े हिस्से में चिकित्सा नाम की कोई व्यवस्था ही नहीं है | गत दिवस प्रधानमन्त्री ने मन की बात में ये जानकारी दी कि कोरोना की दूसरी लहर में ऑक्सीजन की कमी देखते हुए अस्पतालों में प्रयुक्त होने वाली ऑक्सीजन का  उत्पादन दस गुना बढ़ा | निश्चित रूप से ये संतोष का विषय है | ऑक्सीजन के वैकल्पिक स्रोत के तौर पर कंसंट्रेटर नामक उपकरण भी अस्पतालों के साथ घरों में रखे जा रहे हैं | विदेशों से बड़ी संख्या  में उनका आयात हो रहा है | कोरोना देखभाल केन्द्रों  की शक्ल में साधारण संक्रमण वाले मरीजों के इलाज की भी काफी व्यवस्था सरकार और निजी सेवाभावी संस्थाओं द्वारा की गई है | लेकिन ये सब होते - होते कोरोना की दूसरी लहर ढलान पर आ गई और 1 जून से देश के बड़े हिस्से में तालाबंदी वापिस लेकर व्यापारिक संस्थान और कार्यालय कतिपय बंदिशों के साथ खुलने जा रहे हैं | उद्देश्य व्यापार और उद्योग को गति देकर अर्थव्यवस्था को संबल देना है | लोगों की  आवाजाही के साथ ही  सार्वजनिक परिवहन भी शुरू किये जाने का फैसला किया जा रहा है | हालाँकि अनेक राज्यों और उनके भीतर कई शहरों में संक्रमण ज्यादा होने से  कुछ दिन और तालाबंदी जारी  रखी जावेगी | लेकिन इसके बाद भी कोरोना की उपस्थिति बनी रहने की आशंका है और तीसरी लहर कब आयेगी ये भी पक्के तौर पर कोई नहीं बता पा रहा | कोरोना के टीके लगाने के काम की गति को देखते हुए साल खत्म होते तक भी अगर यह अभियान पूरा हो जावे तो बड़ी बात होगी | ऐसे में अब जो जरूरत समझ आती है वह है देश में कोरोना के संक्रमण की चरम स्थित्ति के समय जितने मरीज अस्पतालों , शिविरों अथवा घरों में इलाजरत थे उससे भी ज्यादा ऑक्जसीन सुविधायुक्त  बिस्तरों का  प्रबन्ध सर्वोच्च प्राथमिकता  के आधार  पर किया जाए | ऐसा इसलिए जरूरी है क्योंकि चिकित्सा जगत भी इस बात को लेकर आशंकित है कि कोरोना अथवा इस जैसी दूसरी संक्रामक बीमारी का हमला भविष्य में हो सकता है | ब्रिटेन और वियतनाम से जो खबरें आ रही हैं उनके अनुसार कोरोना से मिलता - जुलता नया संक्रमण देखने मिला है | छोटे देशों में  जनसंख्या कम होने से अस्पताल , चिकित्सक और दवाओं की जरूरत भी कम होती है लेकिन भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश की जरूरत तो अमेरिका और यूरोप के अनेक बड़े देशों को मिलाकर भी ज्यादा है | ऐसे में केंद्र  और राज्य सरकारों को चाहिए कि  वे कोरोना की दोनों लहरों से मिले सबक को भुलाने की बजाय चिकित्सा तंत्र को इतना मजबूत करें जिससे किसी को अस्पताल में बिस्तर और ऑक्सीजन के लिए भटकना न पड़े | इसके अलावा देश में दवा उत्पादन के क्षेत्र में भी बड़े सुधार की जरूरत है | जिस तरह वैक्सीन बनाने में भारत अग्रणी है वैसे ही दवा उत्पादन के साथ ही चिकित्सा संबंधी उपकरणों के मामले में अधिकतम  आत्मनिर्भरता जरूरी है | अभी तक देखने में आता रहा है कि किसी भी आपदा के जाते ही हम पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं | लेकिन कोरोना ने जिस तरह लाखों ज़िन्दगी छीनने के साथ ही अर्थव्यवस्था को चौपट कर  दिया उसके मद्देनजर आवश्यक है कि भारत चिकित्सा क्षेत्र में एक अग्रणी देश बने | यदि हम ऐसा कर पाए तो आपदा में अवसर तलाशने की बात सही हो जायेगी वरना हम नहीं  सुधरेंगे की परिपाटी जारी रहेगी | और वह  दुर्भाग्यपूर्ण होगा |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 29 May 2021

शिष्टाचार का पालन कानून नहीं अपितु संस्कार से होता है



ममता बैनर्जी को राजनीति में आये कई दशक बीत चुके हैं | हाल ही में वे तीसरी बार बंगाल की  मुख्यमंत्री बनी हैं  | चुनाव प्रचार के दौरान उनके और प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी के बीच काफी तनातनी रही  | यहाँ तक कि मुकाबला मोदी बनाम ममता बनकर रह गया था | चुनाव परिणामों ने प्रधानमन्त्री  की  साख को काफी धक्का पहुँचाया जिन्होंने बंगाल में पूरी ताकत झोंक दी थी | हालाँकि भाजपा को  संतोष होगा कि  जिस राज्य में उसका नामलेवा नहीं होता था वहां  वह मुख्य विपक्षी दल बन बैठी | सुश्री  बैनर्जी के लिए ये चिंता का विषय इसलिए है क्योंकि  लोकसभा के  बाद विधानसभा चुनाव में भी भाजपा , कांग्रेस और वामपंथियों को पीछे छोड़ते हुए उनकी  प्रमुख  प्रतिद्वंदी बनकर उभरी | इसीलिये  उन्होंने अपने स्वभाव अनुसार केंद्र  सरकार से पंगा लेना शुरू कर दिया | चुनाव पूर्व  भाजपा ने भी उनको घेरने के लिए सुनियोजित रणनीति के अंतर्गत  तृणमूल से   बड़ी संख्या में दलबदल करवाया और टूटकर आये लोगों को उम्मीदवारी भी  दी  | दरअसल  ममता  की नाराजगी की सबसे बड़ी वजह ये  है कि वे अपनी पार्टी को तो शानदार  सफलता दिलवाने में कामयाब हो गईं किन्तु खुद चुनाव हार गईं |  हुआ यूँ कि  वे अपनी परम्परागत भवानीपुर सीट छोड़कर  नंदीग्राम में शुभेंदु अधिकारी की चुनौती स्वीकार करने जा पहुँची जो चनाव के पहले उनका साथ छोड़कर भाजपा में चले गये थे | लेकिन वह दांव गलत साबित हुआ | भाजपा ने भी श्री अधिकारी को नेता प्रतिपक्ष बनाकर  ममता के जले पर नमक छिड़कने का काम किया  |  चुनाव के बाद तृणमूल के लोगों ने भाजपा कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमले करने शुरू कर दिए | हालाँकि चुनाव  के पहले भी प्रायोजित हिंसा वे  करते थे लेकिन सरकार बन जाने के बाद अपेक्षा थी कि मुख्यमंत्री परिपक्वता का परिचय देकर सामान्य वातावरण बनाने का प्रयास करेंगीं | लेकिन गत दिवस तूफ़ान से हुई  क्षति का जायजा लेने  आये  प्रधानमन्त्री के स्वागत में मुख्यमंत्री और किसी बड़े अधिकारी की गैर मौजूदगी के बाद श्री मोदी द्वारा बुलाई गयी बैठक में ममता न सिर्फ 30 मिनिट देर से गईं वरन प्रधानमन्त्री को तूफ़ान से हुए नुकसान की  क्षतिपूर्ति हेतु 20 हजार करोड़ की मांग सम्बन्धी फ़ाइल देने  के बाद ये कहते हुए चली गईं कि उनको दूसरी किसी बैठक में जाना था |  बताया जाता है मुख्यमंत्री इस बात से नाराज थीं कि बैठक में  नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु को भी बुलाया गया था | उल्ल्लेखनीय है उक्त बैठक में लोकसभा में कांग्रेस दल के नेता अधीर रंजन चौधरी भी आमंत्रित थे किन्तु दिल्ली में होने की वजह से वे नहीं आये | बंगाल के पहले प्रधानमंत्री  उड़ीसा भी गये  जहाँ मुख्यमंत्री नवीन पटनायक उनके साथ रहे | वहां भी नेता प्रतिपक्ष को बुलाया गया था जो कोरोना संक्रमित होने से नहीं आ सके | जिस भवन में प्रधानमन्त्री की बैठक हो रही थी  उसी में मौजूद रहने के बाद भी ममता  30 मिनिट देर से आईं जबकि प्रधानमन्त्री और राज्यपाल धैर्यपूर्वक उनकी प्रतीक्षा करते रहे |  उन्हें चाहिए था कि वे  राज्य को तूफ़ान से हुए नुकसान का विस्तृत ब्यौरा देते हुए ज्यादा से जयादा राहत  की माँग करतीं | प्रधानमन्त्री को यदि वीडियो के जरिये तबाही के दृश्य  दिखाए जाते तो उससे राज्य को फायदा ही होता | लेकिन मुख्यमंत्री ने  बजाय अवसर का लाभ उठाने के बचकानी हरकत की | भले ही वे इस बात पर खुश हों कि उन्होंने प्रधानमंत्री  और राज्यपाल को आधा घंटे इंतजार करवा दिया किन्तु इससे उनकी शान बढ़ी हो ऐसा नहीं |  प्रधानमन्त्री यदि उनके व्यवहार से नाराज होकर बैठक रद्द कर  लौट जाते तब वे  बंगाल की उपेक्षा को लेकर हल्ला मचा देतीं | वे चाहती तो कोई बहाना खोजकर किसी वरिष्ठ मंत्री को अधिकारियों के साथ भेजकर प्रधानमन्त्री के सामने राज्य की जरूरत का ब्यौरा रखवा सकती थीं | लेकिन वे  मुख्य सचिव को लेकर बैठक में आईं  जो  उनके साथ ही  चले गए | बाद में केंद्र  सरकार ने उनको वापिस दिल्ली आकर रिपोर्ट करने कहा |  उल्लेखनीय है मुख्य सचिव भारतीय प्रशासनिक सेवा के अंतर्गत केंद्र  के अधीन होते हैं | उनका सेवाकाल समाप्त होने के बाद ममता ने उन्हें तीन महीने की सेवा वृद्धि दे दी थी | हो सकता है मुख्यमंत्री उन्हें दिल्ली  भेजने में टांग फंसायें | ये भी सम्भव है कि मुख्य सचिव इस्तीफा दे दें | लेकिन इस घटना ने बंगाल और केंद्र के पहले से खराब चले आ रहे रिश्तों में और कड़वाहट घोल दी है | सुश्री बैनर्जी का स्वभाव देखते हुए किसी को इस आचरण पर आश्चर्य नहीं हुआ किन्तु राजनीति से हटकर इस तरह के मामलों में  शिष्टाचार का उल्लंघन अपरिपक्वता के साथ ही बेहूदगी भी है |  भविष्य में अपने राज्य की किसी जरूरत को लेकर मुख्यमंत्री केंद्र सरकार के पास  जाएँ और उनका यथोचित सत्कार न हो तो वह  किसी भी दृष्टि से उचित न होगा | चुनाव के बाद प्रधानमन्त्री ने बंगाल के विकास में सहयोग देने की बात भी कही थी | गैर भाजपा शासित अन्य राज्यों और  केंद्र के बीच अनेक मुद्दों पर टकराव होता रहता है लेकिन प्रधानमन्त्री  सरकारी दौरे पर राजकीय अतिथि होते हैं | इसलिए  जो भी हुआ वह अशोभनीय और अवांछित कहा  जाएगा | ममता बैनर्जी के व्यवहार में किसी सुधार की उम्मीद करना तो व्यर्थ है किन्तु यदि वे आगामी लोकसभा चुनाव में विपक्ष का चेहरा बनकर नरेंद्र मोदी के मुकाबले खड़ी होना चाहती हैं तब उन्हें राष्ट्रीय राजनीति के अनुरूप अपने को ढालना होगा | गत दिवस उन्होंने  प्रधानमन्त्री के साथ जिस तरह का व्यवहार किया उसके चलते वे बंगाल की नेता भले बनी  रहें लेकिन राष्ट्रीय परिदृश्य पर उनका उभरना संभव नहीं होगा | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 28 May 2021

निजी अस्पतालों में इलाज की दरें तय करने नियामक संस्था बने



यदि कोई अनहोनी नहीं हुई तो जून के अंत तक कोरोना की दूसरी लहर का वेग समाप्त होने आ जाएगा | जहां तक बात  तीसरी लहर की है तो उसे रोकना हमारे हाथ में है | और वह आती भी है तो उसका प्रकोप और समयावधि बहुत कम होगी | इसका कारण ये है कि बीते दो महीनों में समूचे देश में जो चिकित्सकीय ढांचा खड़ा किया गया है उसे यदि बरकरार रखा जा सके तो  संक्रामक बीमारी  को प्रारंभिक पायदान पर ही रोकने में हम सक्षम होंगे | हालाँकि इस बारे में ज्यादा आशावाद भी घातक  होगा क्योंकि ब्रिटेन सहित अनेक देशों में कोरोना रूप बदलकर बार - बार लौट  रहा है | भारतीय संदर्भ में देखें तो कोरोना की पहली लहर में लोगों का इलाज आसानी से हो गया था क्योंकि संक्रमण की गंभीरता और गति अपेक्षाकृत कम रही परन्तु दूसरी लहर ने बहुत ही तेजी से जोर पकड़ा  | हालाँकि अधिकतर संक्रमित मरीज  घर में साधारण इलाज से ही स्वस्थ  हो गए लेकिन जिनको अस्पताल और ऑक्सीजन की जरूरत पड़ी उन्हें मुश्किल  हालातों से गुजरना पड़ा | अप्रैल का महीना इस बारे में बहुत ही चिंता और चुनौतियों से भरा रहा क्योंकि अस्पतालों में बिस्तरों की कमी के अलावा   ऑक्सीजन और वेंटीलेटरों की किल्लत होने से हजारों लोगों की जान चली गई | इसका एक कारण संक्रमण का अप्रत्याशित रूप से तेज हो जाना रहा | गत वर्ष उसका चरमोत्कर्ष आते - आते छह महीने लग गये थे | लेकिन दूसरी लहर की  उछाल इतनी जबरदस्त थी कि देखते - देखते वह रोजाना 4 लाख से भी ऊपर निकल गई |  जिसके कारण पूरे देश में भय का वातावरण बन गया | संक्रमण के अनुपात में ही मौतें भी बढ़ीं | कुछ समय के लिए तो लगा कि समूची व्यवस्था पंगु होकर रह गयी है | लेकिन उस घड़ी में भी लोगों ने हौसला नहीं खोया | बीते कुछ दिनों के आंकड़े  इस बात का संकेत  हैं कि दूसरी लहर अब ढलान पर है और  कुछ दिनों में ही उससे निजात मिलने लगेगी | लेकिन उसके बाद निश्चिन्त होकर बैठ जाना खतरे को दोबारा निमन्त्रण देने जैसा होगा | पहली लहर के बाद जैसी  बेफिक्री देखी गयी थी वह बहुत महंगी पड़ी | सरकार और जनता दोनों अति आत्मविश्वास का शिकार न हुए होते तो दूसरी लहर को आ धमकने का अवसर न मिलता | इसी तरह कोरोना के टीके को लेकर राजनेताओं सहित कतिपय लोगों ने जो भ्रम फैलाया वह भी गैर जिम्मेदाराना था | उसी कारण से उप्र और बिहार के अनेक गाँवों में लोग टीका लगाने तैयार नहीं हैं |  स्वास्थ्य विभाग की टीमों पर हमले तक किये गए | समाजावादी पार्टी के विदेश शिक्षित  अध्यक्ष अखिलेश यादव तो यहाँ तक बोल गए कि ये भाजपा वैक्सीन है जिसे वे नहीं लगवाएंगे | उम्मीद है दूसरी लहर में हुई परेशानियों और जनहानि के बाद नेताओं के साथ ही आम जन के आचरण में दायित्वबोध का समावेश हो सकेगा | ये बात ध्यान रखने वाली है कि कोरोना पार्टी या विचारधारा नहीं  देखता | दूसरी लहर ने अनेक नेताओं तथा विशिष्ट हस्तियों को छीन लिया | इसलिए  ये आवश्यक  है कि पूरा देश बिना मतभेद के कोरोना  सदृश किसी  भी आपदा से निबटने में धैर्य और एकजुटता का परिचय दे | बीते दो महीनों में निजी क्षेत्र की चिकित्सा व्यवस्था  में जो मुनाफाखोरी हुई वह किसी लूट से कम न थी | दवाइयों की कालाबजारी ने भी समाज के एक वर्ग की हैवानियत का पर्दाफाश कर दिया है | सरकार ने अपने स्तर पर उसे रोकने का प्रबंध किया लेकिन वह सफल नहीं हो सका | इस कटु अनुभव के बाद भविष्य के लिए इन अस्पतालों में  इलाज की दरों का नियमन किया जाना निहायत आवशयक है | चिकित्सा चाहे सरकार करे या निजी क्षेत्र के अस्पताल या डिस्पेंसरी खोलकर बैठे चिकित्सक , लेकिन उसकी आड़ में जनता की जेब काटने जैसी नीचता पर विराम लगना ही  चाहिए | यदि इसके लिए कोई नियामक संस्था की जरूरत पड़े तो वह भी तत्काल गठित की जावे  |  दवा निर्माताओं को भी हालातों का लाभ उठाकर  लूटने की छूट नहीं दी जा सकती | सरकार ने निर्देश दिए थे कि हर अस्पताल में जेनेरिक दवाओं की दूकान होनी  चाहिये लेकिन उसको रद्दी की टोकरी में फेंक दिया गया | यही वजह रही कि दवा व्यवसायियों और निजी अस्पतालों ने बीते दो महीने में बेशुमार  कमाई की  | आगे ऐसा न हो इसके लिए सरकार को कड़ाई से पेश आना होगा | जनता का भी ये फर्ज है कि वह कोरोना अनुशासन का ईमानदारी से पालन करे क्योंकि लापरवाही उसकी ज़िन्दगी के लिए ही खतरा बन जाती है | कुल मिलाकर बीते एक साल ने जो सिखाया है   यदि सरकार और जनता उससे सबक लें   तो कोई कारण नहीं तीसरी लहर अथवा भेस बदलकर आने वाले संक्रमण का सामना हम न कर पाएं  | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 27 May 2021

श्रीलंका का चीन के जाल में फंसना भारत के लिए चिंता का बड़ा कारण



श्रीलंका वैसे तो एक संप्रभुता संपन्न देश है इसलिए वह अपने फैसले करने के  लिए स्वतन्त्र है | ताजा समाचार के अनुसार प्रधानमंत्री   महिंद्रा   राजपक्षे की  सरकार ने राजधानी कोलम्बो के बंदरगाह को चीन के हवाले करने का फैसला किया है जो वहां 269 हेक्टेयर में  एक पोर्ट सिटी बनाएगा जिसे सिंगापुर और हांगकांग  की तरह एक व्यावसायिक केंद्र बनाने का सपना श्रीलंका  सरकार देख रही है | उसके अनुसार कोलम्बो बन्दरगाह  और पोर्ट सिटी में चीन की सहायता से जिस अधोसंरचना का विकास होगा उससे इस टापू  नुमा देश में विदेशी निवेश के साथ ही पर्यटन में खासी वृध्दि होगी | आगामी 5 वर्षों में  2 लाख से ज्यादा  नए रोजगार भी उत्पन्न होंगे | भारत  के  लिए इस खबर का कोई महत्व न होता लेकिन दो बातों से ये हमारे लिए चिंता का कारण है  | पहला तो  ये परियोजना चीन द्वारा विकसित की जायेगी और दूसरी ये कि कोलम्बो बंदरगाह कन्याकुमारी से मात्र 290 किमी दूर है | इसे लेकर भी फ़िक्र न होती किन्तु चीन चूँकि भारत के प्रति खुलकर शत्रुता का भाव रखता है और श्रीलंका चाहे कितना भी आश्वस्त करे लेकिन आने वाले समय में वह  यहाँ अपना सैन्य जमावड़ा करने से बाज नहीं आयेगा | इसके पहले भी श्रीलंका भारत के विरोध को नजरअंदाज करते हुए हम्बनटोटा बन्दरगाह 99 साल की लीज पर चीन को सौंप चुका था | कोलंबो बंदरगाह और पोर्ट सिटी को लेकर भी ऐसा ही अनुबंध किये जाने की खबर है | इस बारे में सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि राजपक्षे सरकार ने सर्वोच्च  न्यायालय के निर्देश  की भी बड़ी ही चालाकी से अवहेलना कर  डाली  जहां  उक्त फैसले के विरुद्द्ध दो दर्जन याचिकाएं विचाराधीन हैं जिन पर न्यायालय ने सरकार से कह रखा था कि विपक्ष को विश्वास में लिए बिना कोई फैसला न करे | लेकिन राजपक्षे सरकार ने गत 24 मई को संसद में बहुमत के बल पर फैस्ला करने के बाद आनन - फानन में चीन के साथ करार करने का कदम उठा लिया | विपक्ष का कहना है कि चीन से आँख मूंदकर लिया जा रहा निवेश देश को उसका आर्थिक उपनिवेश बनाने का कारण बनेगा | स्मरणीय है श्रीलंका आर्थिक तौर पर काफी पिछड़ा माना जाता है | वहां से चाय और मसालों के अलावा और कुछ निर्यात नहीं होता | दोपहिया वाहन , ऑटो और छोटी कारें तक भारत से जाती हैं | अंतर्राष्ट्रीय अनुदान के बल पर उसका काम चलता है | चीन ने  इस कमजोर नस को पकड़ लिया | कुछ साल पहले तक श्रीलंका में तमिल उग्रवाद के कारण गृह युद्ध की स्थिति रही | राजपक्षे के पिछले कार्यकाल में लिट्टे नामक तमिल उग्रवादी संगठन को समूल नष्ट कर दिया गया | उसे इस बात पर गुस्सा है कि लिट्टे को भारत ने ही खड़ा किया था तथा तमिलनाडु की द्रमुक नामक पार्टी तमिल राष्ट्र के लिए लिट्टे को प्रश्रय देती थी | पूर्व प्रधानमन्त्री राजीव गांधी की हत्या के पीछे भी यही प्रमुख कारण बना | उसी अवधारणा के वशीभूत श्रीलंका विशेष रूप से राजपक्षे चीन की तरफ झुकते हुए चीनी पूंजी के लिए रास्ता साफ़ करते गए | लिट्टे के खात्मे के बाद इस देश में विदेशी पर्यटकों की संख्या बढने लगी है तथा अनेक देश यहाँ निवेश के इच्छुक बताये जाते हैं किन्तु चीन ने जिस तेजी से  अपना शिकंजा कसा उससे सब चौकन्ने हैं | वैसे भी श्रीलंका की भौगोलिक स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है | पश्चिम एशिया और यूरोप से दक्षिण एशिया और पेसिफिक क्षेत्र में   आने वाले जलपोतों के लिए वह एक बेहतरीन विश्राम स्थल है |  साथ ही वह अफ्रीका के भी निकट है | चीन वैसे भी दक्षिण चीन के समुद्र के साथ ही हिंद माहासागर में भी  दबदबा बढ़ाना चाह रहा है किन्तु वियतनाम , थाईलैंड , मलेशिया , दक्षिण कोरिया आदि के विरोध के साथ भारत , जापान और आस्ट्रेलिया की मजबूत मोर्चेबंदी ने उसके मंसूबे पूरे नहीं होने दिए | कोरोना के कारण अमेरिका भी उससे बहुत नाराज है | ऐसे में चीन द्वारा  कोलम्बो बंदरगाह को हथियाकर पोर्ट सिटी के विकास के अधिकार हासिल करने से हिन्द महासागर में तनाव का बीजारोपण हो रहा है  | श्रीलंका को आज भले ही सब हरा - हरा दिख रहा है लेकिन वह जिस जाल में फंसता जा रहा है उसकी कल्पना तक उसे नहीं है | ये कहना भी गलत न होगा कि राजपक्षे भारत के प्रति  खुन्नस  के चलते अपने देश को ड्रेगन के जबड़े में धकेलने की ऐतिहासिक भूल कर रहे हैं | श्रीलंका में राष्ट्रपति पद पर भी  प्रधानमन्त्री राजपक्षे के छोटे भाई ही आसीन हैं | इस वजह से उनकी सरकार को राजनीतिक तौर पर  खतरा नहीं है | इसे भारतीय विदेश नीति की असफलता भी कहा जा सकता है क्योंकि  इस निकटस्थ पड़ोसी से जहां भारत से गये  बौद्ध धर्म का बोलबाला है और सांस्कृतिक निकटता के अलावा दूसरी सबसे बड़ी आबादी तमिल भाषियों की होने के बाद भी , आपसी रिश्तों में कभी विश्वास नहीं रह सका | हालाँकि भारत ने कभी उसको दबाने की कोशिश नहीं की किन्तु तमिल उग्रवाद ने  सिंहली नेतृत्व के मन में जो भारत विरोध भर दिया वह  निकलने का नाम नहीं ले रहा | कोलम्बो बंदरगाह को चीन के हवाले करने का राजपक्षे सरकार का फैसला यदि अमल में आ गया तब वह  उनके  देश के लिए तो खतरे की  घंटी होगा ही लेकिन भारत के व्यापारिक और सामरिक हितों को भी उससे नुकसान होगा | सबसे बड़ी बात हिन्द महासागर भी अंतर्राष्ट्रीय शक्ति प्रतिस्पर्धा  का अड्डा बन सकता है क्योंकि अमेरिका भी इस इलाके में  अपनी मौजूदगी बढ़ाएगा |

- रवीन्द्र वाजपेयी