Wednesday, 8 September 2021

अफगानिस्तान में आतंक का राज : बारूदी धमाके और खूनखराबा जारी रहेगा



अफगानिस्तान में अंतरिम सरकार बन गई | जो जानकारी आई उसके अनुसार  तालिबान के विभिन्न गुटों के बीच सामंजस्य स्थापित किये जाने की कोशिश हुई जिसका प्रमाण हक्कानी और मुल्ला बरादर दोनों की सरकार में मौजूदगी है अन्यथा दो दिन पहले तक दोनों के बीच खूनी संघर्ष की खबरें आ रही थीं | सरकार का मुखिया हसन अखुंद  को बनाया गया है जिनका नाम संरासंघ द्वारा तैयार की गई आतंकवादियों की  सूची में है | इसी तरह अब्दुल गनी , मुल्ला याकूब और सिराजुद्दीन हक्कानी भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आतंकवादियों की जमात में माने जाते हैं | महिलाओं को उनके अधिकार और सम्मान देने की घोषणा करने वाले तालिबान की कार्यवाहक सरकार में एक भी महिला को शामिल न किया जाना काफी कुछ कह जाता है | हालांकि शेर अब्बास स्टानकजई का उप विदेशमंत्री बनना भारत के लिए राहत की खबर है जिनसे हाल ही में कतर की राजधानी दोहा में भारतीय राजदूत की मुलाकात हुई थी | स्टानकजई भारत की सैन्य अकादमी में प्रशिक्षित हो चुके हैं | लेकिन उनके अलावा इस सरकार के अधिकतर मंत्री और प्रशासनिक मुखिया भारत विरोधी हैं | कुछ तो ऐलानिया तौर पर पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई से जुड़े हुए हैं | जैसी कि खबरें हैं पाकिस्तान ने पंजशीर पर हमले में अपनी सेना और ड्रोन का उपयोग किया जबकि तालिबान ये चेतावनी देता रहा है कि पाकिस्तान उनके देश के मामलों में दखलंदाजी न दे | दूसरी तरफ काबुल में महिलाओं ने बड़ा प्रदर्शन करते हुए पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे बुलंद किये | ये बात स्पष्ट नहीं हो सकी कि महिलाओं को घर से बाहर   आने से रोकने वाली तालिबानी सत्ता ने  इस प्रदर्शन की अनुमति कैसे दी ? हालांकि अफगानिस्तान के कुछ और बड़े शहरों में तालिबान के विरोध में महिलाओं ने सड़कों पर उतरकर अपने लिए शिक्षा और रोजगार की मांग की | तालिबानी सैनिक उनके सामने बंदूकें ताने दिखाई दिए लेकिन वे बेख़ौफ़ नजर आईं | इस सबके बीच उल्लेखनीय बात ये है कि सरकार के गठन हेतु विभिन्न गुटों में तालमेल बिठाने वाले पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई को सत्ता में किसी भी प्रकार की हैसियत नहीं दी गई | जैसी कि खबर आ  रही हुई उसके मुताबिक नई सरकार के गठन के जलसे में तालिबान ने रूस , चीन , पाकिस्तान , ईरान और कतर को विशेष तौर पर न्यौता  भेजा है | इनमें क़तर के  ही अमेरिका के साथ सामान्य सम्बन्ध हैं जबकि बाकी के साथ उसकी तनातनी है | जहां तक पाकिस्तान का सवाल है तो वह इस समूचे मामले में दोहरा रवैया अपनाता आया है | एक तरफ तो उसने तालिबान का खुलकर साथ दिया वहीं दूसरी ओर अफगानिस्तान से निकले अमेरिकी सैनिकों को इस्लामाबाद में रुकने की सुविधा प्रदान की जिसे लेकर इमरान खान की सरकार की जमकर आलोचना हो रही है | ये देखते हुए  भारत को  अफगानिस्तान  के नए शासकों से निकटता स्थापित करने में  जल्दबाजी से बचना चाहिए क्योंकि सरकार में जिस तरह के  कुख्यात आतंकवादी भरे हुए हैं उनसे  किसी सदाशयता की उम्मीद करना बेकार है | और जब जिम्मेदार तालिबान नेता खुलकर ये कह रहे हैं कि चीन उनका सबसे सच्चा साथी है जिसने अफगानिस्तान के पुनर्निमाण का जिम्मा लिया है तब तो भारत के लिए काबुल में पैठ बनाना मुश्किल ही नहीं अपितु खतरे से भरा होगा | लेकिन इस परिदृश्य से इतर एक खबर ये भी है कि प्रारम्भिक रूप से समूची अफगानी जनता को भयभीत करने के बावजूद तालिबानी  आतंक के विरुद्ध देश के विभिन्न हिस्सों से आवाजें उठना शुरू हो गया है | न सिर्फ महिलाऐं बल्कि युवा  भी  हथियारबंद तालिबानों के सामने आकर अपनी बात कहने का साहस दिखा रहे हैं | पंजशीर में भी तालिबान के कब्जे की पूरी तरह पुष्टि नहीं हो सकी है | अंतरिम सरकार के गठन से अनेक  कबीलाई नेता संतुष्ट नहीं हैं | आईएसआई के प्रमुख का सरकार के गठन के पहले तालिबान के विभिन्न नेताओं से मंत्रणा करना भी कुछ लोगों को नागवार गुजर रहा है | पाकिस्तान के विरोध में हुई नारेबाजी के पीछे यही कारण माना जा रहा है |  सबसे बड़ा पेंच ये है कि अगर इस सरकार को रूस और चीन जैसे बड़े देश मान्यता दे देंगे तब संरासंघ क्या करेगा जिसकी सूची में शामिल आतंकवादी अफगानिस्तान के शासक हैं | कल को यदि हसन अखुंद संरासंघ जाते हैं तब क्या विश्व संगठन उन्हें भाषण की इजाजत देगा ? सवाल और भी हैं क्योंकि ये सरकार अंतरिम है जिससे ये निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वहां राजनीतिक स्थिरता नहीं आई है | साथ  ही  तालिबान का देश पर कब्जा होने के बावजूद उसे सर्वमान्य नहीं कहा जा सकता | कुछ देशों द्वारा इस सरकार को मान्यता दिए जाने के बाद भी विश्व जनमत  विशुद्ध आतंकवादियों की  सरकार को किस तरह स्वीकार करेगा ये देखने वाली बात होगी | इसीलिये ये आशंका बरकरार है कि अफगानिस्तान की स्थिति आसमान से टपके और खजूर पर अटके वाली होने जा रही है | अमेरिका और उसके साथ जुड़े नाटो देश भले ही भौतिक रूप से अफगानिस्तान से निकल चुके हैं लेकिन उनकी रूचि अभी भी वहां बनी हुई है | दोहा में  अमेरिका और तालिबान के बीच क्या तय हुआ ये तो शायद ही सामने आये लेकिन अमेरिका को इस बात का अफ़सोस जरूर हो रहा होगा कि तालिबान ने मतलब निकल गया तो पहिचानते नहीं वाली प्रवृति जाहिर कर दी | जिस तेजी से वह चीन की गोद में  जा बैठा उससे वाशिंगटन खुद को ठगा महसूस कर रहा है | हालाँकि कूटनीति के जानकार ये भी कह रहे हैं कि अमेरिका , अफगानिस्तान में जो हथियार छोड़कर आया उनका उद्देश्य वहां अशांति बनाये रखना है जिसके संकेत मिलने भी लगे हैं | ये सब देखकर अफगानिस्तान के बारे में कोई ठोस निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी क्योंकि तालिबान अपनी असलियत पर उतर आये हैं और जिस तरह का आतंक उनके राज में देखने मिल रहा है उससे ये आशंका प्रबल हो रही है कि आने वाले दिनों में भी वहां बारूदी धमाके और खूनखराबा जारी रहेगा |

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 7 September 2021

नाम में क्या रखा है : चाहे कुलपति कहो , कुलगुरु या कुछ और ....



म.प्र में अब विश्वविद्यालय के कुलपति को कुलगुरु कहा जाएगा | शिक्षक  दिवस के अवसर पर तदाशय की घोषणा करते हुए राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री मोहन यादव ने जानकारी दी कि इस बारे में प्रस्ताव तैयार कर लिया गया है | मंत्री महोदय के अनुसार कुलपति की बजाय कुलगुरु संबोधन लोगों के ज्यादा गले उतरता है | पहले जब इस पद को उपकुलपति कहा जाता था तब  राज्यपाल कुलपति कहलाते थे | कालान्तर में उपकुलपति को कुलपति और राज्यपाल को कुलाधिपति कहा जाने लगा | लेकिन  रोचक बात ये है कि अंग्रेजी में इन पदों के लिए पुराना संबोधन ही जारी रहा और राज्यपाल चांसलर तथा कुलपति वाइस चांसलर ही कहलाते रहे | उच्च शिक्षा मंत्री ने कुलपति को कुलगुरु कहे जाने संबंधी प्रस्ताव तैयार किये जाने की बात तो कही किन्तु ये नहीं बताया कि राज्यपाल को कुलाधिपति ही कहा जाता रहेगा अथवा उनका पदनाम भी परिवर्तित होगा ? इसी के साथ ये सवाल भी स्वाभाविक तौर पर उठेगा कि क्या अंग्रेजी में प्रयुक्त होने वाले  चांसलर और वाइस चांसलर रूपी  सम्बोधन भी बदले जावेंगे या फिर उनको आगे भी ढोया जाता रहेगा ? इस बारे में लोगों के मन - मस्तिष्क में ये बात भी आयेगी कि इस बदलाव का कारण और आवश्यकता  क्या है ? उपकुलपति को कुलपति और कुलपति को कुलाधिपति कहे जाने संबंधी बदलाव कब और क्यों हुए ये भी स्पष्ट नहीं था और अंग्रेजी में पुराने संबोधन ही क्यों जारी रखे गये ये बताने वाला भी कोई नहीं है | श्री यादव ने भी ये साफ़  नहीं किया कि अचानक ये बदलाव करने का दिव्य ज्ञान उनको कहाँ से प्राप्त हो गया ?  उच्च शिक्षा मंत्री यदि विश्वविद्यालयों में  गिरते शैक्षणिक स्तर और आर्थिक संकट के बारे में चिंता व्यक्त करते हुए उन्हें इससे उबारने की कार्ययोजना प्रस्त्तुत करते तो वह स्वागतयोग्य होती  | ये बात सर्वविदित है कि प्रदेश के लगभग सभी  शासकीय विश्वविद्यालयों की आर्थिक स्थिति बेहद खराब है | प्राध्यापकों के पद रिक्त पड़े हैं और  अतिथि शिक्षकों के भरोसे किसी  तरह शिक्षण कार्य सम्पन्न  चलाया जाता है | आर्थिक संसाधनों के  अभाव में रिक्त पदों पर नियुक्तियां करने से बचा जा रहा है | शोध कर रहे छात्र भी इस वजह से परेशान हैं | विज्ञान के विद्यार्थियों को प्रयोग करने हेतु समुचित उपकरण और सामग्री उपलब्ध नहीं हो रही | विश्वविद्यालय अनुदान आयोग तथा अन्य संस्थानों से गोष्ठियों और सेमिनार के लिए आने वाले धन का फर्जीबाड़ा भी आम है | अनेक विश्वविद्यालय ठेके पर डाक्टरेट करवाने के लिए कुख्यात हो चले हैं | शोध कर्ता छात्र – छात्राओं के आर्थिक दोहन के अलावा उनके  साथ  अशोभनीय हरकतों की खबरें भी अक्सर आया करती हैं |  निजी विश्वविद्यालय खुल जाने के बाद से तो शासकीय विश्वविद्यालयों के सामने अस्तित्व का संकट मंडराने लगा है | इसकी मुख्य वजह उनमें  शिक्षकों का अभाव है | अनेक विभागों में तो बरसों से नियमित प्राध्यापक न होने से अतिथि प्राध्यापक ही शिक्षण करवा रहे हैं |  रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय , जबलपुर में प्राध्यापकों के खाली पदों की संख्या सौ के ऊपर बताई जाती है | एक ही प्रोफेसर अनेक विभागों का विभागाध्यक्ष बना बैठा है | इन सब वजहों से कुलपति का पद दयनीय बनकर रह गया है | उसका सारा समय  शैक्षणिक स्तर सुधारने और उच्च स्तरीय शोध हेतु  आर्थिक प्रबन्धन की बजाय  प्रशासनिक गुत्थियों को सुलझाने में निकल जाता है | बीते एक – दो दशक से ये  चर्चा भी चला करती है कि कुलपति पद के लिए भी  बोली लगती है | अनेक राज्यपाल तो इस बारे में बुरी तरह बदनाम तक हुए | इसी तरह कुलसचिव ( रजिस्ट्रार ) की  नियुक्ति  भी मलाईदार थाने की तर्ज पर होने लगी है | इसका परिणाम कुलपति के साथ उनके टकराव के रूप में सामने आता है | कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि कम से कम म.प्र के सरकारी विश्वविद्यालय इक्का – दुक्का अपवाद छोड़कर दुर्दशा का शिकार हो चुके हैं | कुलपति के चयन में योग्यता की बजाय राजनीतिक प्रतिबद्धता , पहुँच और पैसे की भूमिका महत्वपूर्ण होती जा रही है | बेहतर होता उच्च शिक्षा मंत्री जी बजाय कुलपति का पदनाम बदलने का प्रस्ताव बनाने के प्रदेश के  शासकीय विश्वविद्यालयों की  दुरावस्था पर ध्यान देते हुए उनका उन्नयन करने का कोई प्रभावी प्रस्ताव तैयार करवाते | म.प्र मोदी सरकार द्वारा बनाई गयी नई शिक्षा नीति लागू करने वाला पहला  प्रदेश तो  बन गया है लेकिन जहां तक विश्वविद्यालयीन शिक्षा के स्तर का प्रश्न है तो राज्य सरकार के लिए सोचने वाली बात ये है कि म. प्र के युवा उच्च अध्ययन के लिए दूसरे राज्यों में क्यों जाते हैं ? उसकी तुलना में प्रदेश के शासकीय विश्वविद्यालयों में दूसरे राज्यों के छात्रों के प्रवेश लेने का अनुपात कम ही है | उच्च शिक्षा मंत्री ने कुलपति  को कुलगुरु कहे जाने संबंधी प्रस्ताव बनाने के संकेत तो दे दिए किन्तु ये  नहीं  बताया कि इस पद का सम्मान बढ़ाने के लिए  विश्वविद्यालयों को प्रतिस्पर्धा का मुकाबला करने में सक्षम किस तरह बनाया जाएगा | बीच में एक दौर ऐसा भी आया था जब प्रशासनिक और पुलिस सेवा से निवृत  अधिकारियों  के अलावा पूर्व न्यायाधीश तक कुलपति बनाये जाने लगे थे | स्व. इंदिरा गांधी के दौर में तो जबलपुर में एक पूर्व फौजी जनरल को कुलपति बना दिया गया किन्तु कहा जाता है उन्हें यहाँ का बंगला  पसंद नहीं आया क्योंकि उसमें उनके कुत्तों के रहने के लिए समुचित व्यवस्था नहीं थी इसलिए वे नहीं आये  | हालांकि  अब कुलपति के पद पर प्राध्यापक रहा व्यक्ति ही नियुक्त हो सकता है किन्तु उसके चयन की  प्रक्रिया पर भी उंगलियाँ उठती रहती हैं | इन हालातों के मद्देनजर राज्य सरकार  से अपेक्षा है कि वह कुलपति का नाम बदलकर चाहे जो कर दे लेकिन उसके पहले अपने विश्वविद्यालयों को डूबने से बचा ले | पदनाम बदलने से यदि ये संस्थान सुधरते होते तो उपकुलपति को कुलपति नाम देने के बाद से ही म.प्र के विश्वविद्यालय अपने नाम को सार्थक करते हुए विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित हो जाते | शायद इसीलिये विलियम शेक्सपियर ने कहा था कि नाम में क्या रखा है ? 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 6 September 2021

दया के पात्र नहीं ये देश के गौरव हैं : ओलम्पिक की खुशी दोगुनी हो गई



विश्व ओलम्पिक के बाद उसी स्थान पर विकलांग या दिव्यांग कहे  जाने वाले खिलाड़ियों की विश्व प्रतियोगिता आयोजित की जाती है जिसे पैरालिम्पिक्स कहते हैं | इस वर्ष टोक्यो में संपन्न मुख्य ओलम्पिक खेलों के बाद आयोजित पैरालिम्पिक्स का बीते सप्ताह समापन हुआ | ये आयोजन भारतीय संदर्भ में इसलिए महत्वपूर्ण रहा क्योंकि इसमें भारतीय खिलाड़ियों ने पहली बार ढेर सारे पदक हासिल कर मुख्य ओलम्पिक की खुशी को दोगुना  कर दिया | 1968 से अब तक भारत ने पैरालिम्पिक्स में जितने पदक जीते उसका सबसे बड़ा हिस्सा इस बार का है | 2016 के रियो पैरालिम्पिक्स में भारत को कुल 5 पदक हासिल हुए थे जबकि टोक्यो में भारतीय दस्ते ने 19 पदक जीतकर पूरे विश्व का ध्यान खींचा | उल्लेखनीय है भारत ने मात्र 54 खिलाड़ी ही टोक्यो भेजे थे |  पिछले पैरालिम्पिक की तुलना में बीते पांच साल में खिलाड़ियों की तैयारी पर तकरीबन 17 करोड़ रु. व्यय किये गये जो रियो खेलों की तुलना में पांच गुना ज्यादा था | इसका सुपरिणाम भी सामने आया है | प्रधानमंत्री सहित तमाम बड़ी हस्तियाँ जिस तरह इन दिव्यांग खिलाडियों का उत्साहवर्धन करती रहीं वह निश्चित रूप से स्वागत योग्य है | भारत दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ ही दक्षिण एशिया में मजबूत सामरिक शक्ति के रूप में उभर रहा है | हमारा देश दूध उत्पादन के साथ सबसे ज्यादा फिल्में बनाने के लिए भी प्रसिद्ध  है |  ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में भी हम वैश्विक बाजारों में अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं | वैक्सीन दवाइयां बनाने में तो भारत का अग्रणी स्थान है ही | मोबाइल और साफ्टवेयर के उत्पादन में भी देश  बहुत प्रभावशाली तरीके से आगे बढ़ रहा है | रक्षा उत्पादन के अलावा  अन्तरिक्ष विज्ञान जैसे बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भारतीय वैज्ञानिक एवं तकनीशियनों ने विस्श्वस्तरीय प्रतिष्ठा हासिल की है | इसे  देखते हुए यह अपेक्षा करना गलत नहीं होता कि खेलों में भी हमारा देश विश्वस्तर को स्पर्श करे | एक दौर था भारत और हॉकी एक दूसरे के पर्याय हुआ करते थे किन्तु 1968 के मांट्रियल ओलम्पिक में वह गौरव हमसे छिन गया और तबसे केवल एक मर्तबा हमने  मास्को में स्वर्ण पदक जीता और वह भी तब , जब  नाटो देश उससे बाहर रहे | हालिया टोक्यो ओलम्पिक में कांस्य जीतने से लम्बा सूखा तो खत्म हुआ लेकिन पुराना जलवा बरकरार न रह सका | लेकिन अन्य मैदानी खेलों में भारतीय खिलाड़ी जिस तेजी से उभर रहे हैं वह शुभ संकेत है | ये भी अच्छा है कि अब क्रिकेट के अलावा भी दूसरे खेलों के विजेताओं को नायक जैसा सम्मान मिलने लगा है | यही वजह रही कि टोक्यो पैरालिम्पिक्स में भारत के खिलाड़ियों द्वारा किये गए प्रदर्शन का हर खेल प्रेमी ने संज्ञान लिया और पदक जीतने वालों को जमकर प्रशंसा और प्रोत्साहन मिला | शारीरिक कमी के बावजूद उनके हौसले को हर देशवासी सलाम कर रहा है क्योंकि उनकी उपलब्धि सामान्य खिलाड़ियों की  तुलना में अधिक सम्मानीय और मूल्यवान है | इससे ये भी साबित होता है कि यदि शासन और खेल संघों द्वारा शारीरिक विकलांगता के शिकार वर्ग में से उदीयमान प्रतिभाओं का चयन कर उनके भरण – पोषण और प्रशिक्षण पर समुचित ध्यान दिया जावे तो बीते पांच वर्ष में हुए प्रयासों के परिणामस्वरूप पदक संख्या में जिस तरह पांच गुना वृद्धि हुई उससे भी बेहतर नतीजे  पेरिस में होने वाले आगामी ओलम्पिक और उसके बाद होने वाले पैरालिम्पिक्स में देखने मिल सकते हैं | आजकल हर मामले में भारत की तुलना चीन से की  जाती है | पैरालिम्पिक्स में चीन का दल 251 सदस्यों का था जिसने 207 पदक जीते | इसकी ख़ास वजह ये है कि उसने आर्थिक प्रगति के साथ ही खेल जगत में भी अपनी धाक  ज़माने के लिए पुरजोर कोशिश की | ये कहने में भी कोई गलती नहीं है कि खेल भी उद्योग का स्वरूप बनता जा रहा है | पदक जीतने वालों को शासकीय और निजी क्षेत्र से जिस तरह प्रोत्साहन मिलने लगा है उससे  खिलाड़ी बनने का आकर्षण बढ़ा है | इस प्रवृत्ति को और बढ़ावा देने की जरूरत है क्योंकि ये खिलाड़ी हमारे  देश के वैश्विक  राजदूत हैं | विशेष रूप से शारीरिक दृष्टि से विकलांग खिलाड़ियों ने साबित कर दिया कि वे अब दया के पात्र नहीं वरन राष्ट्रीय गौरव के ध्वजावाहक हैं | 

-रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 4 September 2021

हिम्मत है तो चीन के उइगर मुसलमानों के पक्ष में बोलकर दिखाएं तालिबान



आखिरकार तालिबान भी पाकिस्तान की जुबान में बोलने लगा | काबुल पर कब्जा जमा लेने के बाद प्रारम्भिक बयान में उसने जम्मू – कश्मीर को भारत और पाकिस्तान के बीच का द्विपक्षीय विवाद बताते हुए हस्तक्षेप से परहेज के संकेत दिए थे | कुछ दिन पूर्व ही दोहा में उसके राजनयिक प्रतिनिधि ने भारत के राजदूत से मुलाकात के दौरान दोनों देशों के बीच अच्छे सम्बन्धों की उम्मीद जताई | भारत में भी एक लॉबी है जो पहले दिन से ही तालिबान के  साथ बातचीत करने का दबाव बना रही है | शुरुवाती दौर में अफगानिस्तान में हुए सत्ता परिवर्तन के बारे में  भारत सरकार की चुप्पी पर भी  सवाल उठाये गये  | लेकिन अफगानिस्तान में ईरान की  तर्ज पर इस्लामिक शासन व्यवस्था लागू होने के साथ ही तालिबान का असली चेहरा सामने आने लगा | भले ही  पाकिस्तानी नेताओं की इस बात को तालिबान ने सीधे – सीधे समर्थन नहीं दिया कि अफगानिस्तान की तर्ज पर वे कश्मीर को भी आजाद करवाएंगे किन्तु गत दिवस उसके प्रवक्ता सुहैल शाहीन का ये कहना खतरनाक संकेत है कि भले ही  हमारा इरादा किसी भी देश के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष करने का नहीं है लेकिन मुसलमान होने के कारण कश्मीर अथवा किसी दूसरे देश के मुसलमानों के पक्ष में आवाज उठाना हमारा अधिकार है | इसके पूर्व भी एक अन्य प्रवक्ता नसीहत दे चुके हैं कि भारत को कश्मीर में सकारात्मक रवैया रखना चाहिए | हालाँकि भारत के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि काबुल स्थित हमारा दूतावास काम करता रहेगा | इसकी एक वजह वहां रह रहे हिन्दू और सिखों की  सुरक्षा  के साथ बीते 20 वर्ष के दौरान भारत द्वारा अनेक विकास योजनाओं  का संचालन है | कुछ और परियोजनाओं का काम अभी तक अधूरा पड़ा है | सत्ता हासिल होते ही अफगानिस्तान की ओर से इकतरफा निर्णय लेते हुए भारत के साथ व्यापार पर रोक लगा दी गई | भारत को  चिंता है कि तालिबान से अनबोला रखने पर वह पूरी तरह से पाकिस्तान और चीन के शिकंजे में फंस जाएगा | लेकिन उसके  प्रवक्ता द्वारा दूसरे  देशों के मुस्लिमों के पक्ष में आवाज उठाने को अपना अधिकार बताते हुए कश्मीर पर  भारत को जो समझाइश  दी गई उसमें भावी खतरों के संकेत निहित हैं क्योंकि  भले ही कूटनीतिक तौर पर तालिबान कश्मीर के बारे में भारत का समर्थन करने से बचता  रहा हो लेकिन इस्लाम के नाम पर वहां अलगाववाद को हवा देने का काम कर सकता है | वैसे भी  कश्मीर घाटी में आतंकवाद को बढ़ावा देने में तालिबान सहायक रहे हैं | पाक अधिकृत कश्मीर में आतंकवादियों के अनेक प्रशिक्षण केंद्र उसके संरक्षण में ही चलते हैं | अफगानिस्तान से अमेरिका के पूरी तरह से चले जाने के बाद  पाकिस्तान और चीन के साथ जिस तरह से तालिबान की नजदीकियां बढ़ रही  हैं ,  वे भारत विरोधी नये समीकरण का आधार बन सकती हैं  | कश्मीर के मुसलमानों के समर्थन के पीछे भी तालिबान की सोच जहर भरी है | हालांकि अफगानिस्तान के ताजा घटनाक्रम पर  भारत अभी तक बहुत ही सावधानी के साथ प्रतिक्रिया व्यक्त करता आ रहा है किन्त्तु इस्लाम के नाम पर  कश्मीर में रूचि  दिखाकर उसने एक तरह से उकसाने वाला काम किया है | यद्यपि ऐसे मसलों में उत्तेजना सदैव नुकसानदेह  होती है लेकिन पूरी तरह चुप रहने से भी सामने वाले का हौसला मजबूत होता है | इसे देखते हुए भारत को भी तालिबान को दो टूक बता देना चाहिए कि कश्मीर में रहने वाले मुसलमानों की चिंता करने की उसे जरूरत नहीं है | तालिबान को ये भी समझ लेना चाहिए कि भारत में अगर मुनव्वर राणा जैसे उसके समर्थक हैं तो जावेद अख्तर और नसीरुद्दीन शाह जैसे भी हैं जिन्होंने तालिबानी किस्म के इस्लाम की  पुरजोर  मुखालफत की है | बीते दो दशकों में अफगानी  महिलाओं को शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में आगे बढ़ने के जो अवसर मिले उनको तालिबानी सत्ता ने जिस निर्दयता से छीन लिया वह भारत के मुसलमानों के लिए सबक होना चाहिए | उस दृष्टि से देश के मुस्लिम संगठनों को तालिबानी सत्ता  को ये नसीहत देनी चाहिए कि वह मध्ययुगीन बर्बरता को पुनर्स्थापित करने का दुस्साहस करने से बचे|  इसी के साथ तालिबान को ये चुनौती भी भारत के मुस्लिम संगठनों से अपेक्षित है कि यदि वह दुनिया भर के मुसलमानों का हमदर्द बनना चाहता है तो सबसे पहले चीन द्वारा शिनजियांग प्रान्त में रह रहे उइगर मुस्लिमों पर हो रहे अत्याचार के विरुद्ध वैश्विक स्तर पर  आवाज बुलंद करे | इस बारे में एक रोचक तथ्य ये है कि तमाम मुस्लिम देश भी उइगर मुसलमानों के बजाय चीन का साथ दे रहे हैं | जिसका प्रमाण चीन से भागकर मुस्लिम देशों में आये लोगों का प्रत्यर्पण करते हुए उनको चीन को सौंपा जाना है जिसके बाद उनका कुछ पता नहीं चलता | तालिबान जिस इस्लामी तौर - तरीके को लागू करने का दम भर रहा है , चीन में उनको सिरे से नकारा जाता  है | लेकिन सऊदी अरब जैसा देश तक चीन के खिलाफ मुंह खोलने की जुर्रत नहीं कर पाता जो खुद को मुसलमानों का सबसे बड़ा मददगार समझता है | कश्मीर के मुसलमानों के पक्ष में बोलने का अधिकार जताने वाले तालिबानी हुक्मरानों में यदि हिम्मत होती तो वे चीन के उइगर मुसलमानों की दुर्दशा पर आंसू बहाते लेकिन मजहबी सत्ता कायम करने पर आमादा तालिबानी हुक्मरान उस चीन के तलवे चाट रहे हैं जो धर्म को अफीम मानता है और इस्लाम के अनुयायियों  को नेस्तनाबूत करने पर आमादा है | 

-रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 3 September 2021

आरक्षण का अर्थ केवल सरकारी नौकरी और शिक्षा हेतु प्रवेश का कोटा नहीं



म.प्र सरकार ने उच्च न्यायालय द्वारा रोक लगाई गयी श्रेणियों को छोड़कर ओबीसी ( अन्य पिछड़ी जातियां ) के लिए भर्ती और परीक्षाओं में 27 फीसदी आरक्षण लागू कर दिया | इस मुद्दे पर कांग्रेस  और भाजपा में आरोप – प्रत्यारोप के साथ ही श्रेय लूटने की प्रतिस्पर्धा चल रही थी | राज्य की पिछली कमलनाथ सरकार द्वारा ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने का जो निर्णय लिया उस पर उच्च न्यायालय ने रोक लगा दी थी | बाद में वह सरकार भी चली गई और शिवराज सिंह चौहान दोबारा मुख्यमंत्री बन गये | उनकी सरकार ने उच्च  न्यायालय द्वारा लगाये गये स्थगन को हटवाने की काफी कोशिश की | सर्वोच्च न्यायालय तक की शरण ली गई किन्तु उच्च न्यायालय  द्वारा लगाई गई रोक हटवाने में कोई कामयाबी हाथ नहीं लगी | और कोई मामला होता तब शायद म.प्र सरकार इतनी उठापटक नहीं करती किन्तु एक तो कमलनाथ सहित पूरी कांग्रेस पार्टी भाजपा पर ओबीसी की उपेक्षा करने का आरोप लगाने में जुटी हुई है और दूसरा प्रदेश में होने जा रहे तीन विधानसभा और एक लोकसभा सीट के उपचुनाव हैं | हाल ही में जो जानकारी प्रकाश में आई उसके अनुसार म. प्र में अन्य पिछड़ी  जातियों की आबादी तकरीबन 60  प्रतिशत है | उस दृष्टि से देखें तो 27 फीसदी का आंकड़ा भी कम है परन्तु  सर्वोच्च न्यायालय ने चूँकि कुल आरक्षण की सीमा 50 फीसदी तय कर रखी है इसलिए राज्य सरकार मजबूर है | लेकिन राजनीतिक मुद्दा बन जाने के कारण न्यायालय के अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा किये बिना ही महाधिवक्ता से कानूनी राय लेकर बीच का रास्ता निकालते हुए  अदालत द्वारा लगाई गई रोक के अलावा बाकी पदों के  लिए ओबीसी हेतु 27 फीसदी आरक्षण लागू कर  दिया गया | निर्णय की घोषणा होते ही भाजपा और कांग्रेस दोनों के बीच बयानों का मुकाबला फिर शुरू  हो गया | दोनों पार्टियाँ खुद को ओबीसी का हितचिन्तक और दूसरी को दुश्मन साबित करने पर तुली हुई हैं | शिवराज सरकार के ताजा फैसले के बाद म.प्र में आरक्षण का  कुल आंकड़ा 50 फीसदी से ज्यादा होने की खबर है | इसलिए ये आशंका बनी हुई है कि कहीं न्यायालय इस पर भी रोक न लगा दे | क्या होगा ये पक्के तौर पर कह पाना कठिन है लेकिन इस मुद्दे पर जो बात न केवल म.प्र वरन  समूचे देश से निकलकर आई है वह है आरक्षण के बारे में रवैये की | सैद्धांतिक तौर पर तो आरक्षण के विरोधी भी दबी जुबान ही सही  ये स्वीकार करते हैं कि समाज में आर्थिक , सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े लोगों के उन्नयन के लिए आरक्षण रूपी व्यवस्था आवश्यक है | लेकिन ये कब तक जारी रहेगी यह  अस्पष्ट होने से मतभेद पैदा हो रहे हैं | जब तक बात अनु. जाति और जनजाति तक सीमित थी तब तक विवाद पैदा नहीं हुए लेकिन जबसे ओबीसी को आरक्षण का लाभ दिया जाने लगा तबसे उससे वंचित वर्ग में असंतोष है | हाल ही में संसद द्वारा पारित संशोधन के बाद अब राज्य सरकारों को भी ये अधिकार मिल गया है कि वे ओबीसी की सूची में नई जातियों को शामिल कर सकती हैं | सभी पार्टियों ने उक्त संशोधन को समर्थन दिया | उसके बाद ये चर्चा चल रही है कि विभिन्न राज्यों की सरकारें वोट बैंक के मद्देनजर आरक्षण नामक रेवड़ी बांटने   में लग जायेंगीं | दूसरी तरफ मंडल समर्थक कही जाने वाली पार्टियों के नेताओं ने जाति आधारित जनसंख्या की गिनती करवाने का दबाव बनाना शुरू कर दिया है | उनका कहना है कि ओबीसी की संख्या चूँकि 60 फीसदी के लागभग है इसलिये जातिगत आधार पर जनगणना होने से आरक्षण का उचित  अनुपात तय किया जा सकेगा | इस बात का  दबाव भी बनाया जा रहा  है कि आरक्षण की  अधिकतम सीमा  को 50 प्रतिशत  से ज्यादा किया  जावे | लेकिन इस सबके बीच एक सवाल  रह – रहकर चर्चा में आता है कि आरक्षण समाज के वंचित वर्ग के उत्थान के  बजाय दलगत राजनीति के दलदल में फंसकर रह गया है | उसका लाभ ले रही  जातियों के बीच नेताओं और नौकरशाहों का एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो अपने कुनबे के विकास में जुटा हुआ है | इसे क्रीमी लेयर कहा जाता है | सर्वोच्च न्यायालय तक इस पर टिप्पणी कर चुका है लेकिन राजनीति के सौदागर सुनने को तैयार नहीं हैं | एक तरफ सरकारी नौकरियां सिमटती जा रही हैं वहीं  दूसरी तरफ ओबीसी की सूची लम्बी होती जा रही है | कुल मिलाकर बड़ी ही  विरोधाभासी स्थिति बन गई  है | जाति की जंजीरें तोड़कर समतावादी समाज की बजाय जाति  के नाम पर उसे टुकड़े – टुकड़े करने का षड्यंत्र हो  रहा है  | बेहतर होगा सरकार चाहे वह किसी भी पार्टी की हो इस बारे में व्यवहारिक आधार पर सोचकर निर्णय ले | तात्कालिक राजनीतिक फायदे के लिए इस तरह के कदम उठाने से जनता संतुष्ट होती तब न तो कांग्रेस आज इस दुर्दशा में पहुँचती और न ही लालू यादव , मुलायम सिंह यदव और  मायावती सत्ता से हटाये जाते | 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को  उ.प्र और बिहार जैसे जातिगत राजनीति के गढ़  में जो समर्थन मिला उससे साबित होता है कि जन अपेक्षा जाति की सियासत से अलग है | इस बात को राजनेताओं  को समझ लेना चाहिये | कोरोना की दो लहरों ने ये बात साफ कर दिया कि देश की सर्वोच्च प्राथमिकताएँ क्या होनी चाहिए ? समाज के प्रत्येक  वर्ग को विकास  के समान अवसर मिलना जरूरी है  लेकिन ये जाति के नाम पर राजनीति करने वाले  नेताओं के रहते संभव नहीं ,  जिनके लिए इस देश के वंचित लोग केवल मतदाता हैं |  आजादी के 75 साल बाद  भी गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन  करने वाले करोड़ों लोग विकास के सारे आंकड़ों को झुठलाने के लिए पर्याप्त हैं | ये बात गम्भीरता से समझ लेनी चाहिए कि आरक्षण का अर्थ केवल सरकारी नौकरी और शिक्षण संस्थान में प्रवेश का कोटा नहीं अपितु उससे भी आगे बढ़कर बहुत कुछ है |

- रवीन्द्र वाजपेयी
 

 

 

Thursday, 2 September 2021

ताकि नये गिलानी पैदा न हो सकें



कश्मीर घाटी में अलगाववादी आंदोलन का नेतृत्व करने वाले हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी 92 साल की उम्र में चल बसे। उनको आज सुबह 5 बजे दफन भी कर दिया गया ताकि भीड़ का लाभ उठाकर  आतंकवादी उपद्रव न कर सकें। हालांकि जम्मू - कश्मीर में भारत विरोधी अलगाववादी  भावना के जन्मदाता तो शेख अब्दुल्ला रहे किन्तु उसे आतंकवाद के रूप में बदलने में गिलानी की भूमिका बहुत ही खतरनाक थी जिन्होंने कश्मीर के नौजवानों की बेरोजगारी का फायदा उठाते हुए उन्हें आतंकवादियों के साथ जुड़ने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित किया। घाटी में सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी करने के लिए युवकों को पैसा देने जैसा देशविरोधी षडयंत्र भी उन्हीं का रचा हुआ था। खुद तीन बार विधायक रहे गिलानी ने बाद के दौर में हुर्रियत को चुनाव प्रक्रिया से अलग कर लिया और शांति  की हर कोशिश को ये कहते हुए पलीता लगाते रहे कि पाकिस्तान को भी उसमें शामिल किया जावे। भारत सरकार को चिढ़ाने के लिए गाहे - बगाहे दिल्ली स्थित पाकिस्तानी दूतावास की दावत कबूल करने वालों में वे सबसे आगे रहते थे। बाकी अलगाववादी नेताओं की तरह गिलानी ने अपनी आधा दर्जन औलादों में से एक को भी आतंकवाद की राह पर नहीं चलने दिया और वे सब पढ़ लिखकर देश - विदेश में नौकरी अथवा व्यवसाय के जरिये आराम की ज़िन्दगी बिता रहे हैं। जांच एजेंसियों को इस बात के पुख्ता प्रमाण भी मिल चुके थे कि गिलानी सहित अन्य अलगाववादी नेताओं को पाकिस्तान की तरफ से भारी मात्रा में आर्थिक सहायता मिलती रही। दो साल पहले केंद्र सरकार द्वारा धारा 370 और 35 ए को हटाए जाने के पहले ही राजनीतिक नेताओं के साथ ही हुर्रियत से जुड़े संगठनों के सरगना भी नजरबंद किये गए थे। बाद में सियासी नेता तो रिहा  कर दिये गए किन्तु हुर्रियत नेताओं को रिहाई नहीं दी गई। उसी का परिणाम रहा कि घाटी के भीतर अमन बना हुआ है । गिलानी को पाकिस्तानी एजेन्ट कहना भी गलत नहीं होगा । अपने पाकिस्तान प्रेम को उन्होंने कभी छिपाया भी नहीं । उनका एक बेटा तो  10 साल तक वहीं नौकरी करता रहा। उनकी मौत पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान द्वारा एक दिन के राजकीय  शोक के साथ राष्ट्रध्वज को आधा झुकाए जाने का जो ऐलान किया उसके बाद गिलानी के पाकिस्तान से जुड़ाव में किसी शक की गुंजाइश नहीं रह गई। इमरान के अलावा  पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष बाजवा ने भी गिलानी की मौत पर अफसोस जताकर उनकी असलियत जाहिर कर दी । बकौल इमरान हुर्रियत नेता पाकिस्तानी ही थे जिन्हें भारत ने कैद कर रखा था। गिलानी के परिवार के पास 150 करोड़ की सम्पत्ति है । हाल ही में उन्हें प्रवर्तन निदेशालय ने वसूली का नोटिस भी दिया था । उनको भले ही कुछ लोग हुर्रियत का उदारवादी चेहरा मानते हों किन्तु वे बहुत ही शातिर और कट्टर भारत विरोधी थे जिन्होंने कश्मीर घाटी के युवाओं के मन में भारत विरोधी जहर घोलकर  पत्थरबाजी को उनका रोजगार बना दिया। ये हमारे देश की कमजोरी ही है  जो  गिलानी जैसे राष्ट्रविरोधी व्यक्ति को सार्वजनिक रूप से पाकिस्तान की तरफदारी करते हुए घाटी में अलगाववादी भावनाएं विकसित करने की आज़ादी दी गई। उनके अलावा यासीन मलिक जैसे जहर उगलने वाले लोग भी हैं जिन्होंने घाटी में आतंकवाद के बीज बोये। हालांकि उम्र के प्रभाव और 370 हटाये जाने के बाद के हालातों में गिलानी सहित हुर्रियत का पूरा कुनबा अप्रासंगिक होकर रह गया था। अलगाववादी संगठनों  को विदेशी धन  की आवक रुक जाने से घाटी के भीतर सुरक्षा बलों पर  पत्थरबाजी बहुत ही कम हो गई है। आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में सुरक्षा बलों के काम में रुकावट डालने जैसी हरकतें भी बन्द हो गईं। गिलानी की नजरबंदी के विरुद्ध भी घाटी में बड़े आंदोलन की हिम्मत किसी में नहीं हुई। परिवारजन चाहते  थे उनको आज सुबह 10 बजे दफनाया जावे ताकि उनके समर्थकों का हुजूम जमा हो सके किन्तु लेकिन प्रशासन ने उन्हें  अनुमति नहीं दी और सुबह -  सुबह उनको सुपुर्दे खाक कर दिया गया। गिलानी के न रहने से घाटी में अलगाववाद का ज़हर फैलाने वालों का शातिर सरगना चला गया। इमरान खान ने पाकिस्तानी बताकर गिलानी  का पूरी तरह से पर्दाफाश कर डाला। अपना राष्ट्रध्वज उन जैसे शख्स के लिए झुकाने और एक दिन के राजकीय शोक का फैसला   इमरान खान की घटिया सोच का परिचायक तो है ही किन्तु इससे हुर्रियत का पाकिस्तानी संबंध भी उजागर हो गया है। भारत के लिए ये अच्छा मौका है हुर्रियत और उसमें शामिल पाकिस्तान परस्त संगठनों को को पूरी तरह प्रतिबंधित करने का ।हालांकि हुर्रियत में भी आपसी मतभेद कम नहीं हैं किंतु भारत विरोध के मसले पर उसमें शामिल तमाम नेता एक राय हैं । बीते दो साल के दौरान जम्मू - कश्मीर में भारत विरोधी ताकतों का पूरी तरह सफाया होने की स्थिति तो नहीं बन सकी और इक्का - दुक्का वारदातें तथा मुठभेड़ आये दिन हुआ ही करती हैं किन्तु ये सच है कि हुर्रियत जैसे संगठनों का असर लगातार क्षीण हुआ है । गिलानी की मौत के बाद हुर्रियत से जुड़े नेताओं में नेतृत्व और कार्यप्रणाली को लेकर विवाद बढ़ सकता है। भारत सरकार को इसका लाभ लेते हुए अलगाववाद की जड़ों में मठा डालने की चाणक्य नीति पर अमल करने में तनिक भी संकोच नहीं करना चाहिए जिससे नये गिलानी पैदा न हो सकें। 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 1 September 2021

नेता-नौकरशाहों के गठजोड़ की नींव पर खड़े हैं भ्रष्टाचार के टॉवर



दिल्ली का हिस्सा  बन चुके  नोएडा में सुपरटेक नामक नामी बिल्डर द्वारा निर्मित 40 मंजिला दो टॉवर गिरवाने का जो आदेश अलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दिया था उसे सर्वोच्च न्यायालय ने बहाल करते हुए टॉवर गिराने के साथ ही उसमें फ्लैट खरीदने वालों को ब्याज  सहित मुआवजा देने का आदेश भी दे दिया। इमारत गिराने का खर्च भी बिल्डर को ही वहन करना होगा। इन टॉवर्स के निर्माण में नियम-  शर्तों का उल्लंघन होने का आरोप था जिसे उच्च और सर्वोच्च न्यायालय ने सही मानते हुए उक्त आदेश दिया। अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने अवैध निर्माण में बिल्डर और भवन निर्माण की स्वीकृति देने से संबंधित अधिकारियों की मिलीभगत पर भी टिप्पणी की। ये पहला अवसर नहीं है जब किसी अवैध निर्माण को धराशायी करने के आदेश न्यायालय ने दिए हों किन्तु 40 मंजिल के दो जुड़वा टावर्स को गिरा देने का सम्भवतः ये पहला मामला होगा। इनमें पैसा निवेश  करने वालों  की संख्या एक हजार से ज्यादा बताई जाती है। अवैध निर्माण के नाम पर तोड़ी जाने वाली ये इमारतें एक दिन में तो खड़ी नहीं हुई होंगी । इतने बड़े निर्माण पर नजर रखना सरकारी विभागों के अधिकारियों की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है लेकिन ये बात केवल दिल्ली के सुपरटेक बिल्डर से जुड़ी हो ऐसा नहीं है क्योंकि पूरे देश में बनने वाले आवासीय एवं व्यावसायिक निर्माण में अनियमितताएं होती हैं । और इसका कारण है स्थानीय निकायों में बैठे नौकरशाहों का भ्रष्ट रवैया। निर्माण कार्य की स्वीकृति देने वाले विभागों का ये दायित्व होता है कि वे विभिन्न स्तरों पर उसका निरीक्षण करते हुए देखें कि सब कुछ  नियमानुसार हो रहा है अथवा नहीं ? ऐसे में  छोटा सा निर्माण भी बिना सरकारी अधिकारियों की जानकारी के नहीं हो सकता। ऐसे में देश की राजधानी के बगल में 40 - 40 मंजिल की दो अट्टालिकाएं नियम विरुद्ध खड़ी होती रहीं और किसी ने उनका संज्ञान न लिया हो ऐसा मानना  सच्चाई से मुंह मोड़ना होगा । सर्वोच्च न्यायालय ने बिल्डर और अधिकारियों की मिलीभगत की जो बात कही वह तो जगजाहिर है। ऐसे में अवैध निर्माण के लिए जितना दोषी भवन निर्माता बिल्डर है उतना ही वे सरकारी अधिकारी भी जिनकी भ्रष्ट कार्यप्रणाली के कारण बिल्डर बिना डरे नियम - कानूनों की धज्जियां उड़ाता रहा । ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय  ने टॉवर तोड़ने का जो आदेश दिया उसके साथ ही जिम्मेदार अधिकारियों को भी ऐसी सजा मिलनी चाहिए जिससे कि भविष्य में ऐसी हिमाकत किसी की न हो । अन्यथा किसी निर्मित भवन को धरशायी करना राष्ट्रीय सम्पत्ति का नुकसान है। सही बात ये है कि कानून के प्रति भय यदि नहीं है तो इसकी बड़ी वजह वह नौकरशाही भी है जिसके कंधों पर कानून का पालन कराने की जिम्मेदारी है। इसी कारण से पूरे देश में अवैध निर्माणों की संस्कृति विकसित हो गई। सुपरटेक ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध पुनरीक्षण  याचिका दायर करने की बात भी कही है । हो सकता है न्यायालय कुछ राहत दे दे किन्तु जब तक ऐसे मामलों से जुड़े भ्रष्ट अधिकारियों को कड़ा दंड नहीं दिया जाता तब तक ये प्रवृत्ति जारी रहेगी।  बेहतर होगा इस बारे में न्यायालय के फैसलों तक इंतजार करने के बजाय अवैध  निर्माण की संस्कृति की जड़ में मठा डालने का प्रयास हो। सुपरटेक तो केवल एक उदाहरण है । यदि व्यापक सर्वेक्षण किया जाए तो अवैध निर्माण के अनगिनत उदाहरण मिल जाएंगे। ये बुराई राजनीतिक संरक्षण के कारण और तेजी से फैली क्योंकि इस देश में जितने भी अवैध कार्य होते हैं उनमें नौकरशाह और नेताओं के गठजोड़ की बड़ी भूमिका है। सर्वोच्च न्यायालय ने अधिकारियों पर तो तीखी टिप्पणी की किन्तु नेताओं के बारे में वह मौन रहता है । समय आ गया है जब इस गठजोड़ को धराशायी किया  जाए क्योंकि इसी नींव पर भ्रष्टाचार के अनगिनत टॉवर खड़े हुए हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी