Thursday, 16 September 2021

अगले दस साल में भारत चीन की बराबरी कर सकता है बशर्ते



हमारे देश में राजनीति कभी न खत्म होने वाला विषय है | केवल राजनीतिक नेता और  कार्यकर्ता ही नहीं वरन रोजमर्रे की समस्याओं से जूझता आम आदमी भी मौका पाते ही राजनीतिक मुद्दों पर अपने ज्ञान को प्रकट करना नहीं भूलता |  ये कहना भी गलत न होगा कि राजनीति पर होने वाली अधिकतर चर्चा का केंद्र चुनाव ही होते हैं | चूँकि चुनावी वायदों  में बौद्धिक  मुद्दों के अलावा आम जनता को सीधे मिलने वाले फायदों का जिक्र होता है इसलिए लोगों की नजर उन पर लगी रहती है क्योंकि  निःशुल्क शिक्षा, पानी और बिजली से शुरू होकर बात नगद राशि तक आ पहुँची है | वैसे  तो चुनाव सुधारों के अंतर्गत चुनाव आयोग ने बीते दो दशक में जबरदस्त सख्ती की लेकिन राजनीतिक दल उसका भी तोड़ निकाल ही लेते हैं | चुनाव के दौरान मतदाता को नगद राशि या कई उपहार देना भ्रष्टाचरण के अंतर्गत आता है | इसलिए नौकरी , साइकिल , टीवी  , लैपटॉप , मिक्सर और ,मंगल सूत्र जैसे वायदे घोषणापत्र में समाहित होने लगे | लेकिन बीते लोकसभा चुनाव में कांग्रेस द्वारा गरीबों के खाते में 6 हजार रु. प्रतिमाह जमा करने जैसा वायदा किया गया था | दिल्ली उच्च न्यायालय में इसके विरूद्ध एक याचिका पेश हुई  जिस पर गत दिवस उसने चुनाव आयोग और केंद्र सरकार से जवाब माँगते हुए   आयोग को इस बात के लिए लताड़ा भी कि आधिकार कोई आभूषण नहीं हैं | उनका उपयोग जनता की भलाई के लिए करें न कि नोटिस जारी करने और आदेश प्रसारित करने तक सीमित रहें | याचिकाकर्ताओं ने कांग्रेस के उक्त  वायदे को जन  प्रतिनिधित्व क़ानून का उल्लंघन मानते हुए कहा कि यदि सभी दल ऐसे वायदे करने लगेंगे तो मतदाताओं का बहुत बड़ा वर्ग श्रम करने से दूर होता जाएगा | आम तौर पर ऐसे मुद्दे समाचार माध्यमों के लिए उतना महत्व नहीं रखते जबकि इन्हें पर्याप्त प्रचार  दिया जाना चाहिए | जहाँ तक बात चुनाव की है  तो लोकतान्त्रिक प्रणाली में जनता द्वारा अपनी सरकार चुने जाने का मकसद महज किसी को जिताना या हराना नहीं बल्कि देश का विकास और भावी पीढ़ी के लिए सुखी और सुरक्षित भविष्य का निर्माण होता है | लेकिन हमारे देश में चुनावों को भी डिस्काउंट सेल का रूप दे दिया जाता  है | इसीलिये राजनीतिक पार्टियाँ तरह – तरह के प्रलोभन देते हुए रस्ते का माल सस्ते जैसे नारे लगाती हैं | विगत लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने मतदाताओं को 72 हजार  रूपये सालाना उनके बैंक खाते में जमा करवाने का वायदा किया था लेकिन वह असर नहीं दिखा सका | उसके बाद गत वर्ष कोरोना के कारण  लॉक डाउन की घोषणा करते हुए  प्रधानमंत्री ने गरीबों को मुफ्त अनाज के साथ खातों में रु. 500  जमा करवाने का ऐलान कर दिया | चूँकि  वह आपातकालीन व्यवस्था थी इसीलिये उसका किसी ने विरोध नहीं किया किन्तु ये बात  हर किसी को पता है कि बहुत से लोगों  ने सरकार से मिला मुफ्त अनाज किराने के दुकानों पर बेच दिया | ये बात उजागर होने के बाद  सरकार की आलोचना भी होने लगी कि उसने करोड़ों लोगों को बिना काम किये पेट भरने की सुविधा देकर अकर्मण्य बना दिया | लॉक डाउन हटने के बाद जब कारोबार शुरू हुआ तब श्रमिकों की कमी के पीछे मुफ्त अनाज योजना को ही कारण माना गया | ऐसे में अगर लोगों के खातों में बिना कुछ किये एक निश्चित्त नगद राशि हर महीने जमा होने लगी और ऊपर से मुफ्त और सस्ता अनाज भी मिले तब जाहिर है उनके मन में कामचोरी की भावना तेज  होगी | भारत की 135 करोड़ आबादी यदि बोझ  बन गई तो उसका सबसे  बड़ा कारण वोटों की राजनीति के चलते लोगों को  अकर्मण्य बना देना ही है |  एक तरफ जहाँ बेरोजगारी के आंकड़े पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ने पर आमादा हैं वहीं दूसरी तरफ काम करने के लिए लोग नहीं मिलते | दिल्ली  उच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन संदर्भित याचिका पर चुनाव आयोग और केंद्र सरकार क्या जवाब देते हैं ये देखने वाली बात होगी क्योंकि चुनावी घोषणापत्र में मतदाताओं को दिए जाने वाले उपहारों के वायदों पर  सर्वोच्च न्यायालय भी सवाल कर चुका है | वैसे  नगद राशि देना या उसका वायदा तो सीधे घूस के अंतर्गत माना जाना चाहिए | ये इसलिए भी जरूरी है क्योंकि राजनीतिक दलों को न देश की चिंता है और न ही अर्थव्यवस्था की | उनका जोर येन - केन - प्रकारेण चुनाव जीतने पर होता है  और उसके लिए वे सरकारी  खजाना लुटाने में लेश मात्र भी शर्म या संकोच नहीं करते  | इसीलिये सत्ता बदलने पर नई सरकार ये आरोप लगाया करती है कि पिछले लोग  खजाना खाली कर गयी | ऐसे में  सर्वोच्च न्यायालय को चाहिए कि वह  दिल्ली उच्च न्यायालय में प्रस्तुत उक्त याचिका को स्वतः संज्ञान लेते हुए अपने पास बुला ले और इस बात को परिभाषित करे कि चुनाव घोषणापत्र में मतदाताओं को नगद राशि दिए जाने का वायदा  घूस देने की श्रेणी में है या  नहीं ? और जिन चीजों को बतौर मुफ्त उपहार देने की घोषणा की जाती है क्या वैसा करना चुनाव कानूनों का उल्लघन नहीं है ?  याचिकाकर्ताओं की ये चिंता पूरी तरह वाजिब और सामयिक है कि सभी दल  नगद राशि देने का वायदा करने लगे तो जनता के बड़े वर्ग में मुफ्तखोरी की प्रवृत्ति बढ़ेगी जो देश के लिए बहुत नुकसानदेह होगी  |  बड़ी बात नहीं आगामी आम चुनाव में कोई पार्टी कांग्रेस से दो कदम आगे बढ़कर और बड़ी राशि नगद देने का लालच देने लगे | कुछ लोग इस बारे में ये तर्क भी देते हैं कि जब भ्रष्ट अधिकारी और राजनेता दोनों हाथों से लूटमार करने में जुटे हुए हैं तब गरीबों को दी जाने वाले सुविधा या धन पर ऐतराज क्यों किया जाता है ? उनकी बात कुछ हद तक सही भी है परन्तु मुफ्त में नगद दिये जाने की बजाय बेहतर हो लोगों का पारिश्रमिक बढ़ाने का वायदा चुनाव घोषणापत्र में हो जिससे बिना काम किये घर बैठे – बैठे खाने की मनोवृत्ति  को रोका जा सके | भारत को यदि विकसित देश बनाना है तो  हर नागरिक को काम करना होगा , फिर  चाहे वह संपन्न हो या फिर  मध्यम अथवा  निम्न आय  वर्ग  का  | यदि हम विशाल आबादी को  मानव संसाधन में परिवर्तित कर सकें तो निश्चित तौर पर  कुछ ही वर्षों में भारत भी चीन की बराबरी करने की स्थिति में आ जायेगा | लेकिन इसके लिए देश को ऐसे राजनेता चाहिए जो अगले चुनाव की बजाय अगली पीढ़ी के बारे में सोचें | 

- रवीन्द्र वाजपेयी



Wednesday, 15 September 2021

टिकैत की हेकड़ी से किसान आन्दोलन कमजोर होने लगा

 

सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर किसान संयुक्त मोर्चा दिल्ली की सिन्धु सीमा पर एक तरफ का राजमार्ग खाली करने सहमत हो गया है | हाल ही में हरियाणा के करनाल में भी किसानों ने यातायात को सुचारू  रखने के लिए रास्ता खाली किया था | दो दिन पूर्व ही पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह ने  किसानों से अपील की कि वे पंजाब में अपना आन्दोलन समेटकर हरियाणा या दिल्ली  ले जाएँ क्योंकि उसकी वजह से राज्य का विकास प्रभावित हो रहा है  | उनके इस बयान पर अकाली दल और आम आदमी पार्टी ने हमलावर रुख अपनाते हुए कहा कि अमरिंदर ने किसानों को मझधार में छोड़ दिया है | दूसरी तरफ हरियाणा के वरिष्ठ मंत्री अनिल विज ने आरोप लगाया कि कैप्टेन की अपील से साबित हो गया कि किसानों को आन्दोलन के लिए भड़काने का काम उन्हीं का था और जब वह उन्हीं के गले पड़ने लगा तब वे उससे छुटकारा पाना चाह रहे हैं | दूसरी तरफ आन्दोलन के शीर्ष नेताओं में राकेश टिकैत को लेकर भी मतभेद सतह  पर आ रहे हैं | पंजाब और हरियाणा के किसान नेता इस बात से नाराज हैं कि टिकैत समूचे आन्दोलन के स्वयंभू नेता बन बैठे हैं और उसे चुनावी राजनीति से जोड़ रहे हैं | कुछ दिन पहले प. उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में आयोजित किसान महापंचायत में टिकैत द्वारा दिए गए भाषण से भी किसानों के कुछ संगठन रुष्ट हैं | यही वजह है कि दिल्ली की सिन्धु सीमा पर महीनों से  जमे किसान घर लौटने लगे  हैं | हरियाणा के किसान नेता भी चाह रहे हैं कि आन्दोलन का केंद्र टिकैत के प्रभावक्षेत्र से बाहर रखा जाए | उनकी आपत्ति इस बात पर भी है कि टिकैत आन्दोलन को जाटों के ध्रुवीकरण का जरिया बनाकर अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित करने का तानाबाना बुन रहे हैं | वैसे एक बात तो सच है कि टिकैत यदि न डटे होते तो दिल्ली की देहलीज पर पंजाब और हरियाणा के किसान इतने लम्बे समय तक नहीं रुक पाते | उ.प्र के आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर केंद्र सरकार ऐसा कुछ  भी नहीं करना चाह रही थी जिससे किसान भड़क जाएं और आन्दोलन हिंसक हो जाये | गणतंत्र दिवस पर दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले पर हुए उपद्रव ने किसान आन्दोलन के चेहरे  पर जो कालिमा पोती वह अब तक नहीं मिट सकी | सबसे  बड़ी बात ये हुई कि बड़ी – बड़ी डींगें हांकने के बाद भी आन्दोलन के नेता एक भी मांग सरकार से पूरी नहीं  करवा सके | उनके दावों के विपरीत पंजाब और हरियाणा में रबी फसल पर सरकारी खरीद के पिछले कीर्तिमान जहाँ टूटे वहीं किसानों को सीधे खाते में भुगतान की राशि मिलने से वे बिचौलियों से भी बच गए | चूँकि सरकार और किसान नेताओं के बीच संवाद पूरी तरह टूटा हुआ है इसलिए आन्दोलनरत किसानों में हताशा बढ़ रही है | उनकी मांगें कितनी सही हैं ये अब उतना बड़ा मुद्दा नहीं रहा जितना ये कि आन्दोलन की कोई दिशा  समझ में नहीं आ रही | किसानों के बीच भी ये चर्चा चल पड़ी है कि कानूनों को रद्द करने जैसी जिद न पकड़ी जाती तब शायद सरकार उनकी एक – दो मांगें मानकर बीच का रास्ता निकाल सकती थी |   लेकिन संयुक्त मोर्चा वार्ता की टेबिल पर बैठने से पहले ही ये शर्त रखता रहा कि पहले तीनों कानून वापिस लिए जाएं तब ही कोई बात होगी | चूँकि शुरुवात में ही ये साफ़ हो चला था कि कांग्रेस और वामपंथी संगठन इस आन्दोलन के पीछे हैं और भीड़ का लाभ लेकर कुछ खलिस्तान समर्थक भी  घुस आये हैं , इसीलिये बाकी विपक्षी दल खुलकर साथ नहीं आये | करनाल के बाद  सिन्धु सीमा पर एक तरफ का रास्ता खोलने पर सहमत होने से ये साफ़ हो गया है कि किसान नेता  भांप चुके हैं कि जिद न छोड़ने पर जनता उनके विरूद्ध हो जायेगी | अमरिंदर सिंह के ताजा बयान से भी ये लगने लगा है कि वे भी इस आन्दोलन से  पिंड छुड़ाना चाहते हैं जिसे उन्होंने ही प्रायोजित कर दिल्ली की सीमा तक भेजा था ताकि  उनके राज्य में शांति बनी रहे | लेकिन महीनों वहां पड़े रहने के बाद किसानों के जत्थे घर लौट आये और पंजाब में सैकड़ों स्थानों पर धरना दिए बैठे हैं | विधानसभा चुनाव सिर पर हैं और नवजोत सिद्धू कैप्टेन की नाक में दम किये हुए हैं | अकाली दल और आम आदमी पार्टी किसानों को ये समझाने में जुटी  हैं कि कांग्रेस के बहकावे में आकर वे न इधर के रहे न उधर के | ये बात बिलकुल सही है कि किसान आन्दोलन को दिल्ली के मुहाने तक ले जाने और उसे खाद - पानी देने में पंजाब की भूमिका जबरदस्त भूमिका रही | इसीलिये जब  सिख किसानों के जत्थे  दिल्ली से वापिस लौट आये तब धरना स्थल की रौनक भी फ़ीकी पड़ने लगी | मुजफ्फरनगर की महा पंचायत में टिकैत ने भीड़ तो काफी जुटाई लेकिन उनके द्वारा मंच से अल्ला हो अकबर का नारा लगाये जाने की विपरीत प्रतिक्रिया होने लगी  | हालांकि भाजपा विरोधी प्रचार लॉबी उस रैली से चमत्कारिक नतीजे हासिल होने की उम्मीदें व्यक्त करने में जुटी हुई है लेकिन अंदरखाने की बात ये है कि टिकैत की महत्वाकांक्षा से कांग्रेस भी सतर्क हो चली हैं | सपा और बसपा तो पहले से ही आन्दोलन से दूर बैठे रहे | लोकदल नेता जयंत हालाँकि जाट  हैं लेकिन टिकैत उनको भी मंच नहीं दे रहे | यदि यही हाल रहा तो आने वाले कुछ दिनों में पंजाब में किसान आन्दोलन की जड़ें काटने का काम अमरिंदर सिंह के हाथों शुरू हो सकता है | आम आदमी पार्टी ने इसीलिए अभी से उन पर भाजपा से मिले होने का आरोप लगाना शुरू कर दिया है |  एक  खबर ये भी  है कि केंद्र सरकार बिना किसान नेताओं से बात किये ही अपनी तरफ से कुछ ऐसी घोषणाएं कर सकती है  जिससे आन्दोलन की हवा निकल जाए | उ. प्र में  गन्ना किसानों के बकाया भुगतान  और रबी फसल के खरीदी मूल्य अभी से घोषित कर देना उसी दिशा में बढ़ाये कदम हैं | किसान आन्दोलन जिस जोश से शुरू हुआ था वह अब कहीं नहीं  दिखाई देता | इस वजह से ये आशंका प्रबल होती जा रही है कि कहीं  इसका हश्र भी 1974 की रेल हड़ताल जैसा न हो जाए | 

-रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 14 September 2021

हिन्दी की दुर्दशा के लिए हिन्दी भाषी ही ज्यादा दोषी



भाषा को लेकर कट्टर सोच का समर्थन तो नहीं किया जा सकता किन्तु ये भी सच है कि भाषा केवल संवाद का माध्यम ही नहीं अपितु संस्कृति और संस्कारों को भी अभिव्यक्त करती है | उस दृष्टि से यदि हिन्दी के प्रति आग्रह किया जाता है तो उसे सहज  और स्वाभाविक तरीके से लिया जाना चाहिए | सरकारी तौर पर उसे राजभाषा का दर्जा दिया गया है |  वह देश की एकमात्र भाषा है  जिसे सही मायनों में संपर्क भाषा के तौर पर स्वीकार्यता प्राप्त है | तमिलनाडु को छोड़कर और किसी भी राज्य में हिन्दी का विरोध नहीं सुनाई देता | दक्षिण भारत के पाँचों  राज्यों का सर्वेक्षण करने पर ये बात सामने आयेगी कि वहां से  निकलकर लाखों लोग उत्तर भारत के हिन्दी भाषी राज्यों में  स्थायी रूप से बस चुके हैं | उन्होंने अपनी सांस्कृतिक पहिचान को तो बचाए रखा लेकिन भाषा को लेकर न कोई आग्रह किया  और न आन्दोलन | केरल , कर्नाटक , आन्ध्र और तेलंगाना में भी स्थानीय भाषा का दबदबा है लेकिन हिन्दी का विरोध कभी – कभार ही देखने मिलता है , वह भी राजनीतिक कारणों से | लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि हिन्दी के प्रति उपेक्षा भाव हिन्दी भाषी राज्यों में भी कम नहीं है | इसे विडंबना ही  कहा जाएगा कि हिन्दी के बाहुल्य वाले प्रदेशों में उससे गौरवान्वित होने वाले घट रहे हैं | सवाल केवल अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा तक ही सीमित नहीं अपितु व्यवहार में हिन्दी के उपयोग का  भी  है |  एक जमाना था जब हिन्दी माध्यम में दी जाने वाली शिक्षा में भी  बतौर भाषा अंग्रेजी पढ़ने पर भी उतना ही जोर दिया जाता था जितना हिन्दी  पर | लेकिन जबसे हिन्दी भाषी इलाकों में अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा का चलन बढ़ा तबसे कुछ विद्यालयों को छोड़ दें तो बाकी के  विद्यार्थियों की अंग्रेजी तो माशा – अल्लाह है ही परन्तु  मातृभाषा होने के बाद भी हिन्दी का ज्ञान घटिया स्तर तक आता जा रहा है | इसके लिए विद्यार्थी और उसके शिक्षक जितने दोषी हैं उससे ज्यादा कसूरवार अभिभावक हैं जो घर में बच्चों से बातचीत में अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल करने को शान समझते हैं | हंसी तो तब आती है जब लोग अपने कुत्ते तक को अंग्रेजी में निर्देश देते हैं | वैसे ये अच्छी बात है कि सरकारी कार्यालयों में हिन्दी का प्रयोग बढ़ा है | राजभाषा अधिकारियों के जरिये कामकाजी हिन्दी का प्रशिक्षण भी दिया जाने लगा है जिसमें गैर हिन्दी भाषी अधिकारी और कर्मचारी भी रूचि लेते हैं |  हिन्दी भाषी राज्यों के  उच्च न्यायालयों में हिन्दी में बहस की अनुमति मिलने से भी माहौल बदला है | कुछ न्यायाधीश तो हिन्दी में फैसले भी लिखने लगे हैं | लेकिन सर्वोच्च न्यायालय में अब तक हिन्दी को अपेक्षित सम्मान और स्थान नहीं मिल सका | आज हिन्दी  दिवस पर  देश और दुनिया के अनेक हिस्सों में हिन्दी का गुणगान हो रहा है | हिन्दी  दिवस , सप्ताह , पखवाड़ा और मास के आयोजन पर  सरकारी विभागों में  मोटी रकम खर्च होगी | हिन्दी की महानता का बखान भी जमकर होगा | लेकिन ये केवल वार्षिक कर्मकांड बनकर रह गया है | हिन्दी को यदि सही मायनों में उसकी सही जगह प्रतिष्ठित करना है तो हिन्दी भाषियों को अपने दैनिक व्यवहार में उसका प्रयोग बढ़ाना चाहिए | बच्चों को किसी भी माध्यम में पढ़ायें किन्तु उनके साथ  ज्यादा से ज्यादा आपसी बातचीत हिन्दी में किया जाना ही मातृभाषा के प्रति आपकी प्रतिबद्धता का पैमाना होगा | वैश्वीकरण के इस दौर में केवल हिन्दी तक सीमित रहकर हम आगे नहीं बढ़ सकते , ये अवधारणा  आंशिक तौर पर तो सही है | चीन में भी इसीलिये अंग्रेजी सीखने का चलन बढ़ा है किन्त्तु देखने वाली बात ये भी है कि 135 करोड़ से अधिक आबादी वाले भारत के  एक विशाल  उपभोक्ता बाजार होने से दुनिया भर में हिन्दी सीखने का आकर्षण  बढ़ रहा है | भारतीय आज एक वैश्विक समुदाय के रूप में स्थापित हो चुके हैं | उनकी वजह से हिन्दी साहित्य और  भारतीय संस्कृति का भी विश्वव्यापी फैलाव हो रहा है | ऐसे में हिन्दी के अपने घर में ही उसके प्रति सौतेलापन अखरता है | हिन्दी के अखबार जब शीर्षक में अंग्रेजी लिपि का उपयोग करते हैं तब  गुस्से के साथ दुःख भी होता है |  किसी अन्य भाषा के शब्दों को व्यवहार में लाना कोई अपराध नहीं है लेकिन जब अपनी भाषा में उनके लिए समुचित शब्द हैं  तब उनका प्रयोग न करना हमारी विपन्नता को दर्शाता है | अक्सर ये भी कहा जाता है कि हिन्दी बड़ी ही क्लिष्ट भाषा है इसलिए लोग अंग्रेजी का उपयोग करते हैं परन्तु  गैर हिन्दी भाषी लोगों से उनकी भाषा को लेकर  ये तर्क कम ही सुनने मिलता है | सबसे बड़ी बात ये है कि हिन्दी भाषियों को अपनी संतानों को यदि  संस्कृति , संस्कार , साहित्य और आध्यात्म आदि से अवगत कराना है तो उनको हिन्दी का समुचित ज्ञान देना ही होगा | लेकिन  ये संकल्प  केवल हिन्दी दिवस का बुद्धिविलास बनकर न रह जाए ये ध्यान रखना सर्वाधिक जरूरी है |  एक बात जरूर स्वागतयोग्य है कि किसी भी हिन्दी भाषी क्षेत्र में अन्य भारतीय भाषा का विरोध नहीं सुनाई देता | इससे स्पष्ट होता है कि हिन्दी में समायोजन की प्रवृत्ति है और इसीलिये वह सरकारी तौर पर भले ही  राष्ट्रभाषा न कहलाये लेकिन सही मायनों में हिंदुस्तान की तरह ही हिन्दी भी हमारी राष्ट्रीयता को प्रतिबिंबित करती है | ये बात निःसंदेह सच है कि सभी  हिन्दी भाषी अपनी मातृभाषा को दूसरों पर लादने का विचार त्यागकर यदि स्वयं  उसका अधिकतम प्रयोग आपसी संवाद में करने लगें तो वह  राष्ट्रभाषा के तौर अपने आप प्रतिष्ठित्त हो जायेगी | जब हम अपनी माँ को माँ कहने में नहीं  हिचकते तो फिर मातृभाषा के प्रति संकोच कैसा ?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 13 September 2021

तो भाजपा अब तक विपक्ष में बैठी होती



हालाँकि ये पहली मर्तबा नहीं हुआ जब कोई व्यक्ति पहली बार विधायक चुने  जाने के बाद बिना मंत्री रहे सीधा मुख्यमन्त्री बन गया हो | प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी तो विधायक बाद में बने और मुख्यमंत्री पहले बन गये थे | पहली बार लोकसभा के लिए चुने जाते ही उन्हें प्रधानमन्त्री बनने का सौभाग्य  भी हासिल हो   गया | इसी तरह का प्रयोग हरियाणा में दोहराते हुए भाजपा ने अप्रत्याशित रूप से मानोहर लाल   खट्टर को मुख्यमंत्री बना दिया | जाट बहुल इस राज्य में पंजाबी मुख्यमंत्री का वह प्रयोग अप्रत्याशित और जोखिम भरा था | लेकिन श्री खट्टर के नेतृत्व में भाजपा ने दुष्यंत चौटाला के समर्थन से ही सही किन्तु दोबारा सरकार बना ली | वैसे म.प्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी विधायक – सांसद तो रहे लेकिन बतौर मंत्री प्रशासनिक अनुभव के बिना भी वे मुख्यमंत्री बनकर  लम्बी पारी खेलने में सफल रहे | गुजरात में गत दिवस भाजपा ने मुख्यमंत्री विजय रूपाणी से इस्तीफा दिलवाकर जिन भूपेन्द्र पटेल को उनकी जगह  सरकार सौंपी वे भी पहली बार के विधायक हैं जिन्हें सरकार में रहने का रत्ती भर अनुभव भी नहीं है |  ये फैसला इसलिए चौंकाने वाला है क्योंकि आगामी वर्ष गुजरात विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं | पिछले बार भी   भाजपा ने मुख्यमंत्री बदलकर चुनाव अपने पक्ष में कर लिया था | लेकिन भूपेन्द्र पटेल चूँकि सरकार के संचालन से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं इसलिए इस फैसले से राजनीतिक जगत में आश्चर्य  है | जिन नेताओं का नाम श्री रूपाणी के उत्तराधिकारी के तौर पर चल रहा था उनमें श्री पटेल दूरदराज तक नहीं थे  | 2017 में पटेल आन्दोलन के बाद जब आनंदी बेन पटेल को  हटाकर गैर पटेल विजय रूपाणी को मुख्यमंत्री बनाया गया तब वह खतरा उठाने वाला फैसला था | भाजपा उस चुनाव में हारते – हारते बची | उसके बाद पटेल आन्दोलन और उसके सूत्रधार हार्दिक पटेल की चमक फीकी पड़ गई और वे कांग्रेस की गोद में जा बैठे जिसने उन्हें प्रदेश कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया | भाजपा ने इस बात को गंभीरता से लिया | दूसरा अंदेशा उसे आम आदमी पार्टी की बढ़ती सक्रियता से होने लगा जो पटेल आन्दोलन की राख में दबी चिंगारी  को आग में बदलने की फिराक में है | हालांकि भाजपा चाहती तो उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल को कमान सौंपकर पटेल समुदाय को संतुष्ट कर सकती थी किन्तु उसने पूरी तरह नए नाम को आगे लाने का काम किया जिससे कि सत्ता विरोधी भावना को सतह  पर आने से पहले ही ठंडा किया जा सके | हालांकि श्री रूपाणी के विरुद्ध ऐसा कुछ भी नहीं था जिस वजह से उनको सत्ता से बाहर करना जरूरी हो जाता किन्तु ये बात भी सही है कि  पांच साल के शासनकाल  में वे वह असर नहीं छोड़ सके जिससे अगला चुनाव जीता जा सके | इसमें कोई  दो मत नहीं है कि श्री मोदी के  राष्ट्रीय राजनीति में आने के बाद गुजरात में भाजपा के पास उन जैसा एक भी नेता नहीं होने से उसका प्रभाव घटा है | हालाँकि 2019 के लोकसभा और उसके बाद हुए  स्थानीय निकायों में पार्टी को जबरदस्त सफलता मिली लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव का कटु अनुभव श्री मोदी और उनकी दाहिने हाथ गृहमंत्री अमित शाह भूले नहीं हैं |  इसीलिये श्री रूपाणी को अगले चुनाव के सवा साल पहले ही हटा दिया गया | नये मुख्यमंत्री को केवल पटेल होने के कारण सत्ता सौंपी गयी हो ऐसा भी नहीं है | भाजपा रूपाणी मंत्रीमंडल के किसी  और पटेल मंत्री को भी मुख्यमंत्री बना सकती थी जिसे शासन चलाने का अनुभव हो | लेकिन उसने  राष्ट्रीय स्तर पर दूसरी पंक्ति के नेत्तृत्व को धीरे – धीरे आगे बढ़ाने की जो कार्ययोजना बनाई है ये  उसी का हिस्सा माना  जा रहा है | कर्नाटक में येदियुरप्पा की विदाई उसकी शुरुवात थी  | राजनीतिक विश्लेषक इसके पीछे रास्वसंघ की  सोच मान रहे हैं | जिन राज्यों में भाजपा की सत्ता है वहां समय रहते नया नेतृत्व उभारने के प्रति संघ काफी सक्रिय है | स्थापित नेताओं के खेमेबाजी में लिप्त होने से भाजपा विचारधारा के बजाय चंद नेताओं के इर्द गिर्द सिमटने लगी थी | 2018 में म.प्र ,राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सत्ता गंवाने के लिए मुख्यमंत्रियों के प्रति जनता के मन में नाराजगी को प्रमुख कारण माना गया था | यही वजह रही कि कुछ महीनों बाद हुए लोकसभा चुनाव में उक्त तीनों राज्यों में उसने 2014 के प्रदर्शन को दोहराया | दरअसल संघ और भाजपा के रणनीतिकारों को ये बात अच्छी तरह समझ आ चुकी है कि विचारधारा के प्रति समर्थन के बावजूद राज्यों में जनता लम्बे समय तक एक ही चेहरा देखकर ऊब जाती है | प. बंगाल में वाममोर्चे ने ज्योति बसु के नाम पर लगभग चार दशक तक सरकार चलाई लेकिन उनके हटने के बाद जब किसी युवा नेता को मौका मिलने की जगह वयोवृद्ध बुद्धदेव भट्टाचार्य आ गए तो एक चुनाव बाद ही वामपंथ का वह किला कमजोर पड़ने लगा और आज की स्थिति में कोई उसका नामलेवा तक नहीं है | भाजपा भी चूँकि कैडर आधारित पार्टी है इसलिए उसके लिए जरूरी है वह अपने नेतृत्व में नयापन लाए जिससे नई पीढ़ी के मतदाता ऊबने से बचें | सुनने में आ रहा है कि भाजपा अपनी सत्ता वाले राज्यों में नए चेहरों को नेतृत्व प्रदान करने की  रणनीति पर तेजी से काम कर रही है | ऐसा करने के पीछे उसकी सोच युवा नेताओं के मन में आस जगाये रखना है | म.प्र में विष्णुदत्त शर्मा को प्रदेश संगठन का अध्यक्ष बनाकर उसने पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं में उत्साह का जो संचार किया उसके सकारात्मक परिणाम देखने मिले हैं | गुजरात में किया गया ताजा प्रयोग यदि आगे भी दोहराया जा सके तो नेतृत्व की नई पौध विकसित हो सकती है | ये परम्परा अन्य पार्टियों में भी शुरू हो तो निश्चित तैर पर देश की राजनीति में ताजी हवा के झोके जैसा एहसास हो सकता है | हर क्षेत्र में जब नई पीढ़ी  अच्छा काम करते हुए सफलता के झंडे फहरा रही है तब राजनीति के मैदान में भी नए खिलाड़ियों को अवसर दिया जाना समय की मांग है | भाजपा ने कर्नाटक के बाद गुजरात का मुख्यमंत्री यदि इसी  सोच के वशीभूत बदला है  तब ये बुद्धिमत्ता से भरा  कदम है जिसका लाभ उसे आने वाले  समय में मिलना तय है | इस बारे में एक बात याद रखने वाली  है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भी  यदि भाजपा ने 2009 की तरह  लालकृष्ण आडवाणी को ही डा. मनमोहन सिंह के विकल्प के तौर पर पेश किया होता तब बड़ी बात नहीं वह  अब तक विपक्ष  में ही बैठी नजर आती | केंद्र सरकार में भी श्री मोदी के उत्तराधिकारी के रूप में नितिन गडकरी जैसे नाम की चर्चा शुभ संकेत है |


- रवीन्द्र वाजपेयी 

 

Saturday, 11 September 2021

9/11 के 20 साल बाद भी अफगानिस्तान फिर वहीं का वहीं



ये महज संयोग ही कहा जायेगा कि अमेरिका के न्यूयार्क शहर में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की इमारतों पर आतंकवादी हमले के 20 साल बाद अफगानिस्तान में एक बार आतंकवाद की  पोषक तालिबानी सरकार सत्ता में लौट आई है | 11 सितम्बर 2001 को यात्री विमान का अपहरण कर दो गगनचुम्बी इमारतों से टकरा देने की वह घटना हैरतंगेज और दिल दहलाने वाली थी | हजारों लोग उसमें मारे गये थे | सबसे बड़ी बात ये रही कि जिस अमेरिका में दो – दो विश्वयुधों के दौरान एक गोली तक नहीं चली उस पर आतंकवादियों ने इतना बड़ा हमला कर दिया और विश्व की सबसे बड़ी सामरिक और आर्थिक महाशक्ति का गुप्तचर तंत्र और सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह बेअसर साबित हुई | उस घटना की जिम्मेदारी अल कायदा नामक संगठन द्वारा ली गई जिसके मुखिया ओसामा बिन लादेन की तलाश में अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमले करने शुरू किये और वहां तालिबान को हटाकर एक अंतिम सरकार बनाई | हालाँकि ओसामा को तलाशकर मारने में अमेरिका को 10 साल लग गये जो अफगान सीमा से कुछ दूर पाकिस्तान के एबटाबाद में छिपा हुआ था | लेकिन उस बहाने वह अफगानिस्तान में काबिज होकर तालिबान के सफाये में जुट गया | उसकी समर्थक जो सरकार काबुल में स्थापित हुई  उसके शासन में अफगानिस्तान कठमुल्लेपन से उबरकर आधुनिकता और विकास की ओर तो बढ़ चला परन्तु  तालिबान को समूल नष्ट करने में वह विफल रहा जो  छापामार शैली में अमेरिकी सेना से लड़ते रहे | 20 साल की इस लम्बी लड़ाई ने अमेरिकी जनता को ठीक उसी तरह नाराज किया जैसी वह वियतनाम युद्ध के दौरान हुई थी | दरअसल अमेरिकी जनमानस में ये बात बैठ गई थी कि ओसामा के मारे जाने के बाद अफगानिस्तान में करोड़ों डालर फूंकने और अपने सैनिक मरवाने का कोई मतलब नहीं  है | वैसे भी बीच में अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर मंदी का संकट मंडराने लगा था | ये देखते हुए पिछले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने क़तर के जरिये तालिबान के साथ वार्ता का दौर शुरू करते हुए अफगानिस्तान से अपने सैनिक हटाने की योजना बनाई | उनके कार्यकाल में तो वह संभव नं हो सका लेकिन गत वर्ष जो बाइडन के सत्ता में आने के बाद  प्रक्रिया तेज हुई और 31 अगस्त की बजाय अमेरिका ने महीने भर पहले ही सेनाएं हटाना शुरू कर दिया | पहले ये उम्मीद थी कि अफगान सरकार की सेना तालिबान से मुकाबला करने में सक्षम है , जिसके पास अत्याधुनिक अमेरिकी हथियार थे |  लेकिन वह उम्मीद धरी रह गयी  और तालिबान लड़ाके टहलने के अंदाज में काबुल तक चले आये | राष्ट्रपति अशरफ गनी के देश छोड़ देने के बाद से तो उनको खुला मैदान मिल गया | और  देखते – देखते ही अफगानिस्तान फिर से तालिबान के जबड़ों में समा गया | यद्यपि पंजशीर नामक इलाके में अभी तक जंग जारी है लेकिन देर -  सवेर उस पर भी तालिबानी झंडा फहरा जाएगा | इस प्रकार बीते 20 साल तक अमेरिका ने हजारों मील दूर आकर आतंकवाद की जड़ों को काटने के लिए जो जंग लड़ी वह बेनतीजा साबित हुई और तालिबान पहले से ज्यादा ताकत के साथ सत्ता में लौटा |  सबसे बड़ी बात ये हुई कि इस बार रूस और चीन जैसी दो महाशक्तियां उसे गले लगाने बेताब हैं | चीन तो अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण के लिए एक टांग से तैयार खड़ा है | दूसरी तरफ उसके एकाधिकार को रोकने के लिए रूस भी वहां  अपने   पाँव ज़माने को लालायित है जबकि इसी तालिबान ने उसे भी अफगानिस्तान से वैसे ही खदेड़ा था जैसे हाल ही में अमेरिका को वहां से निकलना पड़ा | अमेरिका और तालिबान के बीच हुए समझौते का पूरा ब्यौरा तो अज्ञात है लेकिन एक बात बड़े  ही जोर  शोर से प्रचारित की गई थी कि इस बार तालिबान काफी बदले हुए हैं और बजाय  बर्बरता के वे मानवीय सम्वेदनाओं का परिचय देंगे | अपने प्रारम्भिक बयानों में तालिबान प्रवक्ताओं ने महिलाओं के अधिकार और सम्मान बरकरार रखने का आश्वासन भी दिया और भयभीत  लोगों से अफगानिस्तान न छोड़ने की अपील के साथ ये भरोसा दिलाया कि वे किसी के प्रति बदले की भावना न रखते हुए अपने सभी विरोधियों  को माफ कर देंगे | लेकिन काबुल कब्जाते ही उनकी राक्षसी प्रवृत्ति सामने आने लगी | नृशंस हत्याओं का दौर शुरू हो गया , महिलाओं को घरों में कैद रहने कह दिया गया | उनके अपहरण ,नीलामी और बलात्कार की घटनाएँ आम हो गईं | अमेरिका की सेना के अफगानिस्तान छोड़ने के पहले ही वहाँ तालिबान का जंगल राज लौट आया और अमेरिका की सरकार चुपचाप देखती रही | जाते – जाते अमेरिकी सेना वहां  जो लाखों हथियार और सैन्य साजो – सामान छोड़ गई वह तालिबान के हाथ लग गया | कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि घड़ी की सुइयां  घूम फिरकर 2001 की उसी  तारीख पर आकर रुक सी गईं हैं जब  न्यूयार्क पर हुए आतंकवादी हमले ने अमेरिका के सर्वशक्तिमान होने के गरूर को मिट्टी में मिला दिया था | आज जब उस घटना को ठीक 20 साल हो गये हैं तब काबुल में उसी आतंकवादी सत्ता की पुनर्स्थापना हो चुकी है जिसे अमेरिका ने जड़ से नष्ट करने का बीड़ा उठाया था | ओसामा को तलाशकर मारने के बाद  अमेरिका ने खुद को महाबली साबित करते हुए जो एहसास कराया था वह बीते  एक महीने में मिथ्या साबित होकर रह गया | तालिबानी सत्ता ने औपचारिक रूप से कार्यभार सँभालने के पहले ही जिस अमानवीय दृष्टिकोण का परिचय दिया उसके कारण ये देश तो एक झटके में दो दशक पीछे चला ही गया किन्तु लगे हाथ समूचे दक्षिण पूर्व और मध्य एशिया की शान्ति को खतरा उत्पन्न हो गया क्योंकि तालिबान इस्लाम की आड़ में आतंकवाद को प्रश्रय देने के प्रति बहुत ही उदार है | उसके काबुल में बैठते ही दुनिया भर के इस्लामिक आतंकवादी संगठनों ने अफगानिस्तान में अपनी मौजूदगी दर्ज करा दी है |  काबुल हवाई  अड्डे के बाहर हुए आतंकवादी हमले में आईएस का हाथ होना इसका प्रमाण है | निश्चित रूप से आज का दिन एक दुखद संयोग बन गया है | भले ही तालिबान ने आज औपचारिक रूप से सत्तारूढ़ होने का जलसा टाल दिया हो लेकिन उसका शुरुवाती व्यवहार ये दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि बीते 20 साल में दुनिया चाहे कितनी भी बदल गई हो लेकिन तालिबान नहीं बदले | 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 10 September 2021

मुरलीधर राव ने कहा तो सच लेकिन मानेगा कौन



राजनीति में स्पष्टवादिता या तो विवादित बना देती है या फिर अलोकप्रिय | उस दृष्टि से भाजपा के म.प्र प्रभारी पी. मुरलीधर राव ने बड़ा ही दुस्साहसी बयान दे डाला | गत दिवस भोपाल प्रवास के दौरान एक सार्वजनिक कार्यक्रम में उनका ये कहना चर्चा का विषय बना हुआ है कि  जिनको तीन – तीन , चार – चार बार सांसद – विधायक बनकर जनप्रतिनिधित्व करने का अवसर दिया , उन्हें और क्या चाहिए तथा  ऐसे नेताओं के पास कहने को कुछ नहीं होना चाहिए | वे इसके आगे यहाँ तक बोल गए कि ऐसे नेता कहें कि उनको मौका नहीं  मिला तो उनको किसी लायक नहीं समझा जाना चाहिए और उनको मौका मिलना भी नहीं चाहिए | एक दिन पहले श्री राव पार्टी संगठन  के पदाधिकारियों को दौरे करने और कार्यकर्ताओं से संवाद करने की समझाइश के साथ चेतावनी दे चुके थे कि ऐसा न करने पर उन्हें पद से हटा दिया जावेगा | पता नहीं भाजपा के प्रादेशिक नेता और कार्यकर्ता उनकी बातों को कितनी  गम्भीरता से लेते हैं लेकिन उन्होंने जो कुछ भी कहा वह ऐसा कड़वा सच है जिससे आज के राजनेता और कार्यकर्ता आम तौर पर सहमत होना तो दूर  सुनना तक पसंद नहीं करते | हो सकता है उक्त तंज़ के पीछे म.प्र में राज्यसभा की एक सीट के लिए होने वाला उपचुनाव हो जिसके लिए पार्टी के  ऐसे अनेक नेता टिकिटार्थी हैं जो कई  बार सांसद – विधायक और महापौर जैसे पदों पर रह चुके हैं | इसी तरह संगठन में आजकल तमाम  ऐसे लोग पदाधिकारी बन जाते हैं जिनका मकसद पार्टी की सेवा कम और खुद को महिमामंडित करना ज्यादा होता है | म.प्र में भाजपा के पितृपुरुष कहलाने वाले स्व. कुशाभाऊ ठाकरे का ये जन्म शताब्दि वर्ष है | इस दौरान उनकी सेवाओं का स्मरण करते हुए उनके योगदान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जावेगी  | स्मरणीय है ठाकरे जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के प्रति उनके वैचारिक राजनीतिक विरोधी भी सम्मान का भाव रखते थे | उस लिहाज से श्री राव द्वारा कही  गईं उक्त बातें न सिर्फ भाजपा वरन समूचे राजनीतिक जगत पर लागू होती हैं क्योंकि  अधिकांश पार्टियों में होने वाली  टूटन और बगावत  के पीछे सैद्धान्त्तिक मतभिन्नता कम ,  निजी  स्वार्थों की पूर्ति न होना ज्यादा होता है | माना जाता है कि भाजपा और साम्यवादी पार्टी  ही  कैडर आधारित होने से किसी  व्यक्ति या परिवार की बजाय विचारधारा से प्रेरित और निर्देशित होती हैं | इन दोनों में विचारधारा को व्यक्ति से महत्वपूर्ण माना जाता है | लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा को रोके जाने पर विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार से भाजपा द्वारा समर्थन वापिस ले लेना और 13 दिन की वाजपेयी सरकार गिरने के बाद माकपा द्वारा स्व. ज्योति बसु को प्रधानमन्त्री बनने से रोकने जैसे उदाहरणों से ये प्रमाणित हुआ कि पार्टी का हित निजी हितों की तुलना में महत्वपूर्ण होता है | उसी दौर में श्री आडवाणी ने भाजपा को पार्टी विथ डिफ़रेंस कहकर उसे सबसे अलग बताया था | लेकिन नब्बे का दशक बीतने के साथ ही भारतीय राजनीति में विचारधारा की स्थिति दिल्ली वाली यमुना नदी जैसी होकर रह गई है जिसकी पवित्रता के प्रति भावनात्मक सहमति के बावजूद शायद ही कोई उसके जल से स्नान अथवा आचमन करना चाहेगा | सत्ता के  लिए सिद्धांतविहीन समझौते और पदों की लालच में पार्टी से बगावत  जैसे कदम अब चौंकाते नहीं हैं | म.प्र में ज्योतिरादित्य सिंधिया का  सदलबल कांग्रेस  छोड़ना , राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट तथा पंजाब में अमरिंदर – सिद्धू के झगड़े के पीछे कोई सैद्धांतिक मसला न होकर सीधे – सीधे पद और महत्व का विवाद ही है | चुनाव के समय टिकिट कटते ही ऐसे – ऐसे नेता कोप भवन में जा बैठते हैं जिनका ज्यादातर राजनीतिक जीवन संसद या विधानसभा में बीता हो | पार्टी द्वारा दशकों तक उपकृत किये जाने के बाद भी उनका मन नहीं भरता | माकपा अपने किसी भी नेता को दो से ज्यादा बार राज्यसभा में नहीं भेजती | वहीं भाजपा ने 75 साल की आयु सीमा तय कर रखी है जिसके अंतर्गत अनेक वरिष्ठ नेताओं को टिकिट और पदों से वंचित किया जा रहा है | ये परिपाटी जारी रहना चाहिए क्योंकि विचारधारा का प्रवाह निरंतर बनाये रखना तभी सम्भव है जब नई पीढ़ी भी उससे प्रेरित होकर प्रशिक्षित हो सके | कुछ अपवाद हो सकते हैं किन्त्तु किसी नेता को जीवन भर सांसद – विधायक या किसी पद पर बनाये रखना पार्टी की नेतृत्व संबंधी विपन्नता का परिचायक होता है | पंडित नेहरु के जीवनकाल में ही ये प्रश्न उठने लगा था कि उनके बाद कौन ? ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि ये अवधारणा बनाई जा चुकी थी कि उनके अलावा और कोई देश चला ही नहीं सकेगा | लेकिन शास्त्री जी और इंदिरा जी ने उनसे भी ज्यादा प्रभाव छोड़ा | इसी तरह अटल – आडवाणी की जोड़ी को भाजपा के लिए अपरिहार्य माना  जाने लगा था किन्तु नरेंद्र मोदी ने उस मिथक को तोड़ दिया | ये कहना गलत न होगा कि कांग्रेस देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी होने के बाद भी यदि आज बिखराव का शिकार है तो उसका प्रमुख कारण एक ही परिवार का उस पर कब्जा जमाये रखना है | तमाम क्षेत्रीय दल भी कमोबेश कांग्रेस जैसे हालातों से गुजर रहे हैं | ये देखते हुए श्री राव ने भाजपा के बहाने एक तरह से समूची राजनीतिक व्यवस्था को दिशा दिखाने का काम किया है | स्व. कुशाभाऊ ठाकरे एक बार खंडवा लोकसभा सीट का उपचुनाव जीतकर सांसद बने थे किन्तु कुछ ही दिनों बाद लोकसभा भंग हो गई | उसके बाद उन्हें पार्टी ने राज्यसभा में भेजना चाहा ताकि भ्रमण हेतु निःशुल्क रेलवे पास मिल जाये | उस समय पूर्व सांसदों को आज जैसी सुविधाएँ नहीं मिला करती थीं | लेकिन उन्होंने वह पेशकश ठुकरा दी | म.प्र में अनेक मुख्यमंत्री ठाकरे जी की कृपा से ही बने | मंत्री  , सांसद , विधायक , राज्यपाल के अलावा सत्ता और संगठन में विभिन्न पदों हेतु  उनका आशीर्वाद पाने वाले तो हजारों होंगे किन्तु पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बन जाने के बावजूद वे किसी सदन में नहीं गए | ये कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि चाहते तो वे प्रदेश के मुख्यमंत्री या अटल जी की सरकार में मंत्री तो बन ही सकते थे | ऐसे उदहारण पहले तो प्रत्येक पार्टी में  मिल जाया करते थे लेकिन अब ऐसे नेता दुर्लभ प्रजाति होते जा रहे हैं | उस दृष्टि से पी. मुरलीधर राव प्रशंसा के साथ ही अभिनंदन के भी पात्र हैं जिन्होंने उन नेताओं को आईना दिखाने का साहस किया जिनकी इच्छाओं का कोई अंत नहीं है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Thursday, 9 September 2021

नेतृत्वविहीन मुस्लिम समुदाय के नेता बनने उ.प्र में कूदे ओवैसी



एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी उ.प्र के दौरे पर हैं | आगामी  विधानसभा चुनाव के मद्देनजर वे अपनी पार्टी की ज़मीन तैयार कर रहे हैं | हैदराबाद और महाराष्ट्र के मराठवाड़ा अंचल से बाहर आकर ओवैसी ने बिहार के मुस्लिम बहुल सीमांचल इलाके में  विधानसभा चुनाव के दौरान  अपने प्रत्याशी उतारे जिनमें  से चार – पांच जीते भी | उसके बाद उन पर आरोप लगा कि वे भाजपा – जद ( यू ) गठबंधन की जीत में सहायक बने क्योंकि मुस्लिम मतों में विभाजन होने से राजद को घाटा हो गया | उसके बाद उन्होंने बंगाल विधानसभा के चुनाव में भी हाथ आजमाना चाहा किन्तु वहां उन्हें ज्यादा भाव नहीं मिला क्योंकि फुरफुरा शरीफ के पीर द्वारा कांग्रेस और वामपंथियों से गठबंधन कर लिया गया  था | लेकिन वे निराश नहीं हुए और उ.प्र में पूरी ताकत से कूद पड़े जहाँ तकरीबन 20 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं जो तकरीबन 100 सीटों पर निर्णायक साबित हो सकते हैं | अभी तक ये माना जाता रहा है कि राज्य के मुस्लिम मतदाताओं का बहुमत समाजवादी पार्टी के पाले में जाता है | थोड़ा हिस्सा बसपा और बचा हुआ कांग्रेस का  समर्थक भी  है | भाजपा तो वैसे भी मुस्लिम मतों की उम्मीद नहीं करती | उ.प्र में सपा के  उत्थान  में मुस्लिम समुदाय का योगदान बहुत साफ़ है | उसके संस्थापक मुलायम सिंह को  मुस्लिम परस्ती के चलते  मुल्ला तक  कहा जाने लगा था | नब्बे के दशक में भाजपा ने मंदिर आन्दोलन के सहारे ऊँची छलांग लगाई  लेकिन बाद में वह लगातार पीछे होती गई | उसका लाभ लेकर उ.प्र की राजनीति सपा और बसपा के बीच सिमट गई | भाजपा तो फिर भी अपना वजूद बनाये रही किन्तु  कांग्रेस के  लिए तो नाम ज़िंदा रखना भी कठिन हो गया | लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव ने राजनीतिक तस्वीर का रंग ही बदल डाला | नरेंद्र मोदी की अभूतपूर्व लहर के सामने न सपा का यादव – मुस्लिम पत्ता चला और न ही बसपा का दलित दांव काम आया | कांग्रेस भी किसी तरह अपने दो टापू रायबरेली और अमेठी बचाकर रख सकी | उस चुनाव ने उ.प्र की राजनीति पर हावी मुस्लिम मिथक को तोड़ दिया | दलित और यादवों का बड़ा हिस्सा भी मोदी लहर में समाहित होकर रह गया | उसी के परिणामस्वरूप 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को अकल्पनीय सफलता मिली और वह 325 सीटें जीतने में कामयाब हो गई | उस चुनाव में सपा और कांग्रेस  मिलकर लड़ने के बावजूद फिसड्डी साबित हुईं | इससे भाजपा को एक बात समझ में आ गई कि बजाय मुस्लिम तुष्टीकरण के बाकी मतदाता समूहों पर ध्यान  दिया जाए तो राष्ट्रीय राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण राज्य पर कब्जा बनाये रखा जा सकता है | और इसीलिये उसने योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाकर अपनी दूरगामी रणनीति साफ कर दी | इसका लाभ उसे 2019 के लोकसभा चुनाव में भी मिला जिसमें सपा ने अपनी घोर विरोधी बसपा के साथ गठबंधन किया | मायावती और मुलायम सिंह एक मंच पर भी आये लेकिन दाल नहीं गली | संयोग से अदालती फैसला आने से राम मंदिर निर्माण का रास्ता भी  साफ़ हो गया | उधर सपा के मुस्लिम चेहरे आजम खान पुत्र सहित जेल चले गये जिससे  उनका बड़बोलापन और दादागिरी ठंडी पड़ गई | मुलायम सिंह की अस्वस्थता और सपा में विभाजन से मुस्लिम मतदाता खुद को नेतृत्वविहीन महसूस करने लगे थे | कांग्रेस अपनी दुर्दशा से ही नहीं उबर पा रही और बसपा भी समूचे दलित समाज को प्रभावित करने में असफल रही | ऐसे में उ.प्र की राजनीति में एक बड़ा शून्य आ गया है | अखिलेश यादव साक्रिय  तो हैं लेकिन वे  अपने पिता जैसी  राजनीतिक पैंतरेबाजी नहीं जानते | शिवपाल यादव  के अलग होने से भी सपा कमजोर हुई है | इस सबसे  मुसलमानों को ये लगने लगा है कि सपा , बसपा और कांग्रेस में से कोई भी उनका संरक्षक बनने लायक नहीं रहा और यही भांपकर ओवैसी ने  उ.प्र में  मुस्लिम ध्रुवीकरण का पांसा चला है | गत दिवस उन्होंने सपा और बसपा को तीखे शब्दों में लताड़ते हुए कहा कि उनकी वजह से ही श्री मोदी प्रधानमन्त्री बन गये | आशय ये था कि ये दोनों दल उ.प्र में मोदी लहर को थाम लेते तो भाजपा केंद्र की सत्ता हासिल न कर पाती |  समाचार माध्यमों से मिल रही जानकारी के अनुसार उनकी रैलियों में मुस्लिम युवा बड़ी संख्या में आने से सपा – बसपा दोनों परेशान हैं | बसपा तो इतना बौरा गई है कि दलितों को छोड़ ब्राह्मणों को रिझाने में जुटी है | सपा को भी इस बात की चिंता है कि यादवों के अलावा  पिछड़ी जातियां उससे दूर चली गईं हैं | ऐसे में यदि ओवैसी ने मुस्लिम मतों में थोड़ी सी भी सेंध लगा दी तब सपा का बचा – खुचा आधार भी खिसक सकता है | वैसे स्वाभाविक तौर पर सपा  और बसपा से नाराज मुस्लिम तथा पिछड़े भाजपा विरोधी मतदाताओं का झुकाव कांग्रेस की तरफ होना चाहिए किन्तु उसकी खराब स्थिति के चलते कोई उससे जुड़ना नहीं चाह रहा | यही वजह है कि मुस्लिम मतदाताओं को उनकी  बदहाली का ब्यौरा देते हुए ओवैसी बड़ी ही चतुराई से उनके बीच नेतृत्व के अभाव को दूर करने की पुरजोर कोशिश में जुट गये हैं |  सपा – बसपा ये प्रचारित कर रही हैं कि उ.प्र में ओवैसी की दखलंदाजी का मकसद  मुस्लिम मतों में बंटवारा करवाकर परोक्ष तौर पर भाजपा की राह आसान करना है | हालाँकि वे  इसका खंडन करते हुए ये सवाल पूछ रहे हैं कि सपा और बसपा के लंबे शासनकाल के बाद भी उ.प्र के मुसलमान हर क्षेत्र में पिछड़े क्यों हैं ? लोकसभा और विधानसभा में उनकी लगातार घटती संख्या भी ओवैसी के हमले का हिस्सा है | वे कितने कामयाब होते हैं ये तो चुनावी नतीजे ही बता  सकेंगे किन्तु एक बात तो सही है कि चाहे मुलायम सिंह और अखिलेश यादव की सत्ता रही या मायावती की किन्तु  मुस्लिम समुदाय का आर्थिक , सामाजिक और शैक्षणिक उत्थान नहीं हो सका | योगी राज में हिंदुत्व का पत्ता तो खुलकर खेला जाता रहा किन्तु मुसलमानों के पक्ष में खड़े होने का साहस न सपा कर पाई और न ही बसपा | कांग्रेस से तो वहां के मुसलमान राम  जन्मभूमि का ताला खोले जाने के दिन से ही नाराज हैं | तीन तलाक कानून बनाने और अयोध्या विवाद सुलझ जाने के बाद भाजपा द्वारा सामान नागरिक कानून लागू किये  जाने की तैयारी भी  की जा रही है | राजनीतिक क्षेत्रों में ये चर्चा आम है कि कोरोना न आता तब समान नागरिक संहिता और जनसँख्या नियन्त्रण कानून मोदी सरकार बनवा चुकी होती जिनको लेकर मुस्लिम समाज काफी चिंता में है | ओवैसी मुसलमानों के मन में ये बात बैठाने का प्रयास कर रहे हैं कि बजाय किसी के पिछलग्गू बनने के उनको अपना स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व बनाना चाहिए | उनकी एक बात तो सभी स्वीकार करेंगे कि उ.प्र के मुस्लिम समुदाय का अपना कोई ऐसा नेता नहीं है जिसका पूरे राज्य में प्रभाव हो | ये कहना भी गलत न होगा कि आजम खान को मुलायम सिंह यादव का करीबी  भले माना जाता रहा हो लेकिन  2012 में मुलायम ने उनको उपेक्षित करते हुए अपने बेटे अखिलेश को मुख्यमंत्री बनवा दिया | ओवैसी ने जो मुद्दे उठाए वे सामयिक भी हैं और सटीक भी क्योंकि पूरे देश के राजनीतिक माहौल को देखें तो मुस्लिम समुदाय कुछ नेताओं और पार्टियों के शिकंजे में फंसकर अपना स्वतंत्र आधार गंवाता जा रहा है | ममता , माया , अखिलेश और राहुल सभी मुसलमानों का वोट तो चाहते हैं लेकिन चुनाव के दौरान खुद को सबसे बड़ा हिन्दू साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते | ओवैसी इसी का लाभ उठाकर उ.प्र में भाग्य आजमा रहे हैं | यदि उनको 10  - 20 सीटें भीं हासिल हो गईं तब ये माना  जा सकेगा कि वे मुसलमानों के सबसे बड़े नेता बनने जा रहे हैं | अपने विवादास्पाद बयानों से वे युवा मुस्लिमों के पसंदीदा तो हैं ही  और उनका अपना स्वतंत्र राजनीतिक आधार भी है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी