Tuesday, 17 May 2022

अयोध्या , मथुरा और काशी में मुगलिया आतंक के प्रतीक शर्म का विषय



 वाराणसी के ऐतिहासिक विश्वनाथ मदिर परिसर में ही बनी ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर चल रहे विवाद में गत दिवस बड़ा मोड़ आ गया जब उसको हिन्दू मन्दिर तोड़कर बनाये जाने संबंधी दावे की जाँच हेतु  निचली अदालत ने जो कमीशन नियुक्त किया था उसने  सर्वेक्षण के दौरान मस्जिद के वजूखाने मे विशाल शिवलिंग देखे जाने की  बात करते हुए अदालत को सूचना दी जिसने तत्काल उस स्थल को सील करने का निर्देश दिया | कमीशन आज अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंपेगा | दूसरी तरफ मस्जिद की इंतजामिया कमेटी ने निचली अदालत द्वारा कमीशन के जरिये जांच करवाए जाने को अवैध निरुपित करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगाई |  ज्ञानवापी मस्जिद के सामने नंदी की जो मूर्ति है उसका मुंह भी वजूखाने की तरफ होने से हिन्दू पक्ष लम्बे समय से ये दावा करता आ रहा है कि मस्जिद के भीतर शिवलिंग है और औरंगजेब के शासनकाल में विश्वनाथ मंदिर पर जबरन कब्जा करते हुए उक्त मस्जिद तान दी गयी थी | अदालत में ये दावा किये हुए भी तीन दशक से ज्यादा व्यतीत हो चुका है | मुस्लिम पक्ष अपनी सफाई में  कह रहा है कि 1991 में संसद द्वारा पारित कानून के बाद अब किसी धार्मिक स्थल का  स्वरूप  बदला नहीं जा सकेगा | असदुद्दीन ओवैसी ने भी इसी आधार पर निचली अदालत की कार्रवाई को असंवैधानिक बताया और ये कहने का दुस्साहस भी किया कि ज्ञानवापी थी , है और रहेगी | यद्यपि शिवलिंग की जो आकृति मिली उसकी प्रमाणिकता पुरातत्व विशेषज्ञ ही साबित कर सकेंगे जिसे दूसरा पक्ष  फुहारे का नाम दे रहा है |  लेकिन शिवलिंग के अलावा  मस्जिद के गुम्बद और दीवारों पर उकेरी गयी जो आकृतियाँ कमीशन के संज्ञान में आई हैं वे हिन्दू संस्कृत्ति से मेल खाती बताई जाती हैं | अदालत क्या फैसला देगी और 1991 का कानून उसमें  कितने आड़े आएगा ये तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन मुस्लिम पक्ष इस बात को तो नहीं  झुठला सकता कि वह समूचा इलाका विश्वनाथ मंदिर का है जहाँ इस्लामिक संस्कृति का कोई ऐतिहासिक प्रमाण ज्ञानवापी मस्जिद बनाये  जाने के पूर्व नहीं मिलता | मस्जिद की तरफ मुंह किये बैठी नंदी की प्रस्तर प्रतिमा भी   अपने आप में काफी कुछ कह जाती है | गत दिवस ज्योंही  शिवलिंग मिलने की बात सामने आई त्योंही जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने तंज कसा कि इनको हर जगह भगवान मिल जाते हैं | लेकिन क्या महबूबा और मुस्लिम धर्मगुरुओं में से किसी के पास  इस सवाल  का उत्तर है कि मुग़ल शासकों द्वारा हिन्दुओं के तीन बड़े आराध्यों श्री राम , श्रीकृष्ण और महादेव से  जुड़े पवित्र स्थलों पर मस्जिद बनाने के पीछे कौन सी सद्भावना थी ? ज़ाहिर तौर पर ये मुगलिया सल्तनत  की धर्मान्धता और हिन्दुओं को आतंकित करने के मकसद से किया गया पाप था जिसका प्रायश्चियत करने की बजाय सीनाजोरी की जा रही है | इस्लाम के जन्म के हजारों वर्ष पहले से अयोध्या , मथुरा और काशी सनातनी हिन्दुओं के लिए पवित्र स्थान रहे हैं | मुगल शासकों द्वारा वहां जाकर मस्जिदें बनाने का उद्देश्य हिन्दुओं को आतंकित करना ही था | आजादी के बाद भारत ने धर्म निरपेक्षता अपना ली और  सभी धर्मों  को अपनी उपासना पद्धति का इस शर्त के साथ पालन करने की स्वतंत्रता दी जिससे दूसरों के धर्म का अनादर न हो | प्रश्न ये है  कि हिन्दुओं ने तो मुसलमानों की जिद पूरी करते हुए उनको एक अलग  मुल्क दे दिया तो क्या मुसलमान हिन्दुओं की आस्था  के सबसे बड़े केन्द्रों में मुगल शासकों और उनके सिपहसालारों द्वारा तलवार की नोंक पर खड़ी की गईं मस्जिदें हटाकर सद्भावना अर्जित करने की सौजन्यता नहीं  दिखा सकते ताकि  गंगा – जमुनी संस्कृति  को बल मिले | लेकिन मुस्लिम समुदाय के नेता और विशेष तौर पर मुल्ला – मौलवी अपना उल्लू सीधा करने के लिए जैसी  ऐंठ  दिखाते हैं वही दोनों समुदायों के बीच अविश्वास की सबसे बड़ी वजह है |  सामान्य बातचीत  में तो गुलाम नबी आजाद जैसे तमाम लोग ये बात स्वीकार करते हैं कि उनके पूर्वज हिन्दू थे परन्तु  इस तरह के विवाद उठते ही उन्हें बाबर और औरंगजेब में अपना अतीत नजर आता है | महबूबा मुफ्ती ने कल जो बयान दिया उसमें ये भी कहा गया कि  ज्यादातर  विदेशी पर्यटक मुग़लों द्वारा बनाये गए भवनों  को देखने आते हैं | शायद उनका संकेत ताजमहल , लालकिला और  फतेहपुर सीकरी जैसी इमारतों को लेकर था किन्तु उनको शायद ये पता नहीं होगा कि विदेशी पर्यटकों को बाबरी ढांचे ,  ज्ञानवापी तथा मथुरा में कृष्ण भूमि से सटी शाही मस्जिद देखने में कोई रूचि कभी नहीं रही | सही बात ये है कि आजादी के बाद मुसलमान कांग्रेस के चंगुल में फँसे रहे और उसके बाद में लालू और मुलायम जैसे नेताओं ने उनका राजनीतिक शोषण किया | इसके पहले कि वे कुछ संभल पाते ओवैसी सरीखे चालाक उनको बरगलाने लग गये | लेकिन इस समाज का जो शिक्षित वर्ग है वह भी जब कट्टरपंथियों के बहकावे में मुगलकालीन सोच का शिकार होकर अपने को इस मुल्क का मालिक समझने लगता है तब हंसी आती  है | ज्ञानवापी के साथ ही मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि की दीवार से सटाकर बनाई गई मस्जिद भी  इस्लामिक आतंक का जीता जगता प्रमाण हैं  | बाबरी और ज्ञानवापी को लेकर छाती पीटने  वाले ओवैसी उस वक़्त को याद क्यों नहीं करते जब देश के बाहर से आये लुटेरों ने हिंसा  के बल पर हिन्दुओं के अनगिनत धार्मिक स्थल तोड़ दिए और अयोध्या , मथुरा तथा काशी में जान - बूझकर ऐसे स्थलों पर मस्जिदें खडी कीं जिनसे हिन्दू आहत होने के साथ ही आतंकित भी हों | ये देखते हुए  आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में मुगलकालीन बर्बरता के निशानों को मिटाना राष्ट्रहित में होगा | याद रहे भावी  पीढ़ियों को भारत के प्राचीन गौरव से परिचित कराए बिना विश्व गुरु और महाशक्ति बनने का सपना साकार नहीं हो सकेगा |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 16 May 2022

मोदी की नेपाल यात्रा : सही समय पर सही कदम



प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं को सैर – सपाटा और धन की बर्बादी बताने वाले अब उतने मुखर नहीं रहे क्योंकि विरोधियों को भी  ये एहसास होने लगा है कि इन यात्राओं से वैश्विक मंचों पर भारत के पक्ष में माहौल  निर्मित हुआ है | कूटनीतिक मोर्चे पर न सिर्फ पाकिस्तान अपितु चीन की तुलना में  भी श्री  मोदी ज्यादा असरकारक साबित हुए हैं | हाल ही में उनकी डेनमार्क , जर्मनी और फ्रांस की यात्रा बहुत ही सफल रही | रूस - यूक्रेन युद्ध के बीच  यूरोपीय देशों में जाकर भारत के कूटनीतिक , आर्थिक और सामरिक हितों के लिए प्रधानमंत्री के प्रयासों की सर्वत्र सराहना हुई | उसी क्रम में आज वे नेपाल की यात्रा पर पहुंचे  | हालांकि उनका ये दौरा कुछ घन्टों का ही है  किन्तु बुद्ध पूर्णिमा के दिन नेपाल स्थित उनकी जन्मस्थली लुंबिनी जाने का श्री मोदी का निर्णय हमेशा की तरह उनकी  विदेश यात्रा को सार्थकता प्रदान करने में  सहायक होगा | वहां के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा उनकी अगवानी हेतु एक दिन पहले ही लुंबिनी आ चुके थे | गौतम बुद्ध की जन्मस्थली में बुद्ध पूर्णिमा पर उनके जाने से न सिर्फ भारत और नेपाल अपितु दुनिया भर के बौद्ध देशों में जो सकारात्मक सन्देश जाएगा वह मोजूदा अंतर्राष्ट्रीय हालातों में बेहद जरूरी एवं लाभदायक माना जा रहा है | इस बारे में ये उल्लेखनीय है कि श्री देउबा  के प्रधानमंत्री बनने के बाद दोनों देशों के सम्बन्ध काफी सुधरे हैं | अन्यथा पिछले प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली तो पूरी तरह चीन की गोद में बैठकर  भारत के साथ सीमा विवाद के नाम पर  युद्ध तक के लिए आमादा हो गये थे | हालाँकि मोदी सरकार ने भी उस शरारत पर बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए नेपाल की आपूर्ति रोकने जैसा कदम उठाते हुए कूटनीतिक दृढ़ता का परिचय दिया | संयोगवश ओली सरकार का अति चीन प्रेम उन्हें ले डूबा और श्री देउबा प्रधानमंत्री बनाये गए जिन्होंने  दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए  भारत यात्रा भी की जिसमें काशी विश्वनाथ मंदिर का दर्शन भी शामिल था | अब बुद्ध पूर्णिमा के दिन श्री मोदी के लुंबिनी पहुंचने से जो सन्देश निकलने वाला है वह भारतीय उपमहाद्वीप के अलावा समूचे दक्षिण पूर्व एशिया में जाए  बिना नहीं रहेगा | लेकिन इसका सबसे ज्यादा असर श्रीलंका पर होगा जो इन दिनों अभूतपूर्व संकट में घिरा है और उसका कारण भी चीन को ही माना जा रहा है | यहाँ ये जान लेना भी जरूरी है कि नेपाल भी कमोबेश श्रीलंका जैसी ही स्थिति में है | उसने भी चीन से अनाप – शनाप कर्ज ले रखा है और देर – सवेर वह आर्थिक  दिवालियेपन की ओर बढ़ रहा है | गैर जरूरी चीजों का आयात रोककर उसने   संकट की स्वीकारोक्ति भी कर दी | ऐसे में नेपाल की विकास परियोजनाओं में काफी आर्थिक सहायता करने वाले भारत के लिए दोहरी चिंता का कारण उत्पन्न हो गया है | पहला तो ये कि आर्थिक आपात्काल की स्थिति में नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता पैदा होना अवश्यम्भावी है जिसका परिणाम दोबारा माओवादियों का सत्ता में लौटना हो सकता है जो हमारे हितों के विरुद्ध होगा क्योंकि उस स्थिति में चीन का वर्चस्व इस पहाड़ी देश पर और बढ़ जाएगा जिसकी गिद्ध दृष्टि नेपाल पर उसी दिन से लगी  हुई है जबसे उसने तिब्बत पर बलात कब्जा किया था | और दूसरा ये कि यदि नेपाल में भी श्रीलंका जैसे हालात उत्पन्न हुए तब वहां से बड़ी संख्या में लोग भारत आयेंगे जिसकी वजह से शरणार्थी संकट पैदा होगा | दरअसल  भारत के आजाद होने के बाद जो लोग सत्ता में आते रहे उनमें से  अधिकतर ने नेपाल के हिन्दू राजघराने की बजाय उसके विरोधियों का साथ दिया जो भीतर ही भीतर चीन की तरफदारी करते रहे | इसी का दुष्परिणाम राजशाही के पतन के बाद माओवादी सत्ता के तौर पर देखने मिला जिसने भारत के साथ रिश्ते बिगाड़ने में रूचि ली | लेकिन जैसे संकेत मिले हैं उनके अनुसार नेपाल में भी एक वर्ग ऐसा है जो चीन की कुटिल चाल को समझकर उसके विरुद्ध सडकों पर उतर आया है | देउबा सरकार आने के बाद नेपाल ने भारत के प्रति दोस्ताना रवैया दिखाया है | इसका एक कारण श्रीलंका का हश्र भी है | वहां के लोगों को ये बात अच्छी तरह समझ में आ गई है कि चीन जो सहायता देता है उसका उद्देश्य अंततः नेपाल को कर्ज के बोझ तले दबाकर हड़पना है | भारत के लिए हालाँकि इन दोनों देशों को कर्ज से उबारना तो टेढ़ी खीर है लेकिन इस स्थिति का लाभ लेकर वे चीन के शिकंजे में न चले जाएँ इसलिए हमें सतर्क रहना पडेगा | उस दृष्टि से श्रीलंका को धन और जरूरी सामान की आपूर्ति कर भारत ने वहां के लोगों में  अपने लिए समर्थन और सम्मान अर्जित करते हुए जबरदस्त कूटनीतिक दांव चला है | नेपाल में यद्यपि अभी श्रीलंका जैसी स्थिति नहीं बनी लेकिन यदि तुरंत उपाय न किये गए तो जल्द ही आर्थिक अराजकता देखने मिल सकती है | और तब चीन वहां सीधा हस्तक्षेप करने की स्थिति में होगा क्योंकि  दोनों की सीमाएं मिली हुई हैं | इसलिए श्री मोदी की संक्षिप्त नेपाल यात्रा से भी बड़े परिणाम निकलने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता | हालाँकि चीन इसके बाद कुछ न कुछ करे बिना नहीं रहेगा लेकिन मौजूदा वैश्विक माहौल में वह पहले जैसी आक्रामकता दिखाने की  स्थिति में नहीं है | कूटनीति के मोर्चे पर श्री  मोदी की सक्रियता और आत्मविश्वास ने भारत को एक बड़ी  अंतर्राष्ट्रीय ताकत के रूप में स्थापित कर दिया है | नेपाल यात्रा उस दिशा में एक कारगर कदम है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 14 May 2022

चिंतन शिविर : कर्ज उतारने की शुरुवात प्रथम परिवार ही क्यों न करे



कांग्रेस का बहुप्रतीक्षित नव संकल्प चिंतन शिविर गत दिवस राजस्थान के उदयपुर शहर में शुरु हुआ | तीन दिन के  इस आयोजन में पार्टी अपनी भावी योजनाओं के साथ ही उस रणनीति का निर्धारण करेगी जिससे वह 2024 में सत्ता में भले न आ सके किन्तु कम से कम वजनदार विपक्ष के तौर पर तो संसद में उसकी उपस्थिति हो | पांच राज्यों के हालिया चुनाव में मुंह के बल गिरने के बाद उसको चिंतन का खयाल आया | शिविर के कुछ दिन पूर्व कांग्रेस की डूबती नैया को पार लगाने के लिए प्रशांत किशोर उभरे थे जिन्होंने कुछ सुझाव और कार्ययोजनाएं आला नेतृत्व के सामने रखीं | उस दौरान उनके कांग्रेस में शामिल होने की चर्चा काफी तेजी से चली किन्तु जल्द ही उन्होंने खुद होकर उसका खंडन कर दिया  | लेकिन जैसे संकेत उदयपुर से आ रहे हैं उनके अनुसार उनके ही  सुझावों में से अनेक पर पार्टी  विचार कर रही है जिनमें मुख्यतः युवा चेहरों को आगे लाना है | एक परिवार एक उम्मीदवार के सिद्धांत को लागू करने के साथ ही किसी पद पर आने से पहले पांच साल संगठन का काम करने की शर्त के साथ ही ये भी तय किये जाने की खबर है कि एक बार पद पर रहने के बाद दोबारा उपकृत किये जाने के लिए तीन वर्ष प्रतीक्षा करनी होगी | लेकिन गांधी परिवार इस नियम से ऊपर रहेगा | शिविर स्थल पर नेताओं के जो पोस्टर लगाये गए हैं उनमें नेहरू - गांधी परिवार के बजाय सरदार पटेल , नेताजी सुभाष चन्द्र बोस , बाबू राजेन्द्र प्रसाद आदि को महत्व दिया गया है | प्रथम दिन पार्टी की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पार्टीजनों से आह्वान किया कि पार्टी ने हमें बहुत कुछ दिया लेकिन जब वह संकट में है तो हमें उसके उपकारों का बदला चुकाना चाहिये | उल्लेखनीय है शिविर में शामिल 400 नेताओं में अधिकतर  गांधी परिवार समर्थक ही हैं इसलिए उम्मीद तो यही है कि अंततः उसी का प्रशस्तिगान करते हुए सब अपने घर लौट जायेंगे | पार्टी वाकई चाहती है कि वह  दुरावस्था से बाहर आये  तो उसे यथास्थितिवाद त्यागना होगा ? श्रीमती गांधी का ये कहना बहुत सही है कि पार्टी ने जो दिया उसे लौटाना सबका कर्तव्य है किन्तु क्या इस नेक कार्य की शुरुवात उनके परिवार से ही नहीं होनी चाहिए क्योंकि अपने पूर्वजों की पुण्याई के नाम पर कांग्रेस का सबसे ज्यादा लाभ तो मौजूदा गांधी परिवार ने ही उठाया और आज भी उसे सारी बंदिशों से परे रखने का राग दरबारी ये डर दिखाकर गाया जा रहा है कि वरना पार्टी बिखर जायेगी | शिविर में अतीत की गलतियों पर विचार करते हुए भविष्य में उन्हें न दोहराए जाने का संकल्प लिए जाने की बात  कही जा रही है | लेकिन जब तक उनके जिम्मेदार लोगों को दंड न दिया जाए तब तक शायद ही कुछ हासिल हो सकेगा | पिछले लोकसभा चुनाव के तीन साल बाद हो रहे इस शिविर में सबसे पहले इस बात पर विचार होना चाहिए कि 2019 की  हार के बाद जब राहुल गांधी ने नैतिकता के नाम पर अध्यक्ष पद छोड़कर किसी गैर गांधी को आगे लाये जाने की बात कही थी तब महीनों अनिश्चितता बनाये रखकर आख़िरकार श्रीमती गांधी को कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त करने का औचित्य क्या था , जो स्वास्थ्य संबंधी कारणों से मैदानी प्रचार करने में असमर्थ हो चुकी थीं | दूसरी बात ये है कि जब श्री गांधी ने अध्यक्षता त्याग दी तब बजाय दूसरे युवा नेताओं में संभावनाएं तलाशकर आगे करने के वे और उनकी बहिन प्रियंका वाड्रा ही पार्टी में सारे निर्णय लेती रहीं | यदि पार्टी की कमान किसी अन्य के पास आई होती तो बीते तीन साल में उसकी छवि और पहिचान राष्ट्रीय स्तर पर बन जाती | देश की सबसे पुरानी पार्टी होने के कारण  भले ही चुनावी मैदान में वह पहले जैसी दमदार न रही हो लेकिन राष्ट्रीय विकल्प के तौर पर उसी का नाम लिया जा सकता है | विपक्ष का कोई भी गठबंधन उसके बिना कारगर नहीं हो सकता | बुरे से बुरे दौर में भी  उसके पास प्रतिबद्ध मतदाता हैं किन्तु एक ही  खूंटे  से बंधे रहने के कारण उसकी चेतना शिथिल पड़ गई | ऐसे में आवश्यकता है वह अपने मौजूदा ढांचे के साथ ही सोच भी बदले अन्यथा ये शिविर भी आये , बैठे , खाये  – पिये खिसके से ज्यादा कुछ साबित नहीं होगा | कांग्रेस में जितने भी असंतुष्ट हैं उनकी  शिकायत केवल  और केवल गांधी परिवार के एकाधिकार को लेकर है | उन्हें ये लगता है और जो सही भी है कि लगातार दो लोकसभा चुनाव हारने और संसद में मान्यता प्राप्त विपक्ष का दर्जा तक गंवाने के बाद भी शीर्ष नेतृत्व किसी अन्य को अवसर देने राजी नहीं है | संगठन के चुनाव न हो पाने से नई पौध तैयार नहीं हो पा रही | जनाधार और अच्छी छवि के लोगों को दूर रखते हुए परिवार की परिक्रमा करने वालों को उपकृत किया जाता है | जब गांधी परिवार के नेतृत्व को देश का जनमानस केंद्र और राज्य दोनों में लगातार अस्वीकृति करता आ रहा है तब किसी और को आजमाने में हिचक क्यों है , इस प्रश्न का समुचित उत्तर तलाशे बिना ऐसे कई चिन्तन शिविर भी कांग्रेस को  दुरावस्था से नहीं  निकाल पाएंगे | आगामी लोकसभा चुनाव के पहले अनेक राज्यों के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं जिनमें कुछ ऐसे भी हैं जहां वह भाजपा की प्रमुख प्रतिद्वंदी है | इनमें से राजस्थान और छत्तीसगढ़ में उसकी सरकार है | हिमाचल और गुजरात में वह मुख्य विपक्षी दल है लेकिन आम आदमी पार्टी उससे वह दर्जा छीनने के लिए कमर कस रही है | इन्हें लेकर पार्टी कितनी गम्भीर है इसका एक उदाहरण गुजरात कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष हार्दिक पटेल का ताजा बयान है जिसके अनुसार उन्होंने  राहुल गांधी से मिलने का समय माँगा तब जवाब मिला अभी व्यस्त हूँ और दो सप्ताह बाद बताऊंगा | नाराज चल रहे हार्दिक न्यौते के बावजूद उदयपुर शिविर में शरीक नहीं हुए | ऐसी ही बेरुखी राहुल ने बरसों पहले असम कांग्रेस के बड़े नेता हेमंता बिस्वा शर्मा के साथ दिखाई थी जिससे रुष्ट होकर वे भाजपा में चले गए और आज असम के मुख्यमंत्री हैं | हार्दिक के भी भाजपाई बनने की अटकलें जोरों पर हैं | यदि वैसा हुआ तब गुजरात में कांग्रेस लड़ाई से पहले ही पराजयबोध  का शिकार हो जायेगी | राजस्थान की गुत्थी उलझाये रखने में भी गांधी परिवार की अनिर्णय की प्रवृत्ति है | और यदि फैसला होता भी है तो पंजाब जैसा जिसकी वजह से अच्छा भला राज्य हाथ से निकल गया | उदयपुर में हो रहे इस आयोजन में लिए जाने वाले निर्णय  आज या कल सामने आयेंगे  लेकिन  कांग्रेस वाकई अपना उदय चाहती है तब उसे अपनी सेना का पुनर्गठन करते हुए ,किसी  ऊर्जावान सेनापति के हाथ कमान सौंपनी होगी वरना प. बंगाल और उ.प्र जैसे शर्मनाक नतीजे अन्य राज्यों में भी उसे देखने मिल जाएँ तो आश्चर्य नहीं होगा | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 13 May 2022

ज्ञानवापी : 31 साल बाद भी मामला प्रारंभिक स्थिति में



अक्सर अदालतों में बैठे न्यायाधीश सरकार को आदेश देते हैं कि फलां काम इस तारीख तक हो जाना चाहिए  | ऐसा न करने पर मानहानि का खतरा रहता है | दो दिन पहले म.प्र में ओबीसी आरक्षण के पचड़े में रुके पंचायत और नगरीय चुनाव संबंधी मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को निश्चित तारीख तक कुछ  दस्तावेज सौंपने कहा था जो वह पेश नहीं कर सकी और तब उसने बिना आरक्षण के ही चुनाव करवाने का फरमान जारी कर दिया | इसी तरह दशकों तक लटके रहे राम जन्मभूमि के विवाद को सुलझाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दैनिक सुनवाई की गई | आशय ये है कि जिन मामलों को न्यायपालिका सुलझाना चाहती है उनका निराकारण तेजी से हो जाता है वरना  पेशी  बढ़ती जाती है | हालाँकि न्यायपालिका की कार्यपद्धति  कानून द्वारा  बनाये कायदों से नियंत्रित रहती है | लेकिन जो मामला समाज के बड़े हिस्से को प्रभावित करता हो ,  उसको प्राथमिकता के साथ निपटाना जरूरी होता है  | ऐसा इसलिए आवश्यक  है क्योंकि अपीलों का सिलसिला  सर्वोच्च न्यायालय तक चलता है | ऐसे में  प्राथमिक न्यायालयीन प्रक्रिया ही  बीरबल की खिचड़ी जैसी रही तो अंतिम निर्णय होने में कितना वक्त लगेगा इसका अंदाजा साधारण व्यक्ति तक लगा सकता है | उस दृष्टि से सही मायनों में वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में बनी ज्ञानवापी  मस्जिद संबंधी  मामले में गत दिवस निचली अदालत ने जो आदेश दिया उसकी तह में जाने से पता चला कि वर्ष 1991 में कुछ लोग इस दावे के साथ अदालत जा पहुंचे कि उक्त मस्जिद 1669 में औरंगजेब के  शासनकाल में विश्वनाथ मंदिर तोड़कर बनाई गयी थी | बीते 31 साल से इस मामले में न्यायालय ने क्या किया ये शोध का विषय है | यद्यपि बीते कुछ समय से  इसमें  गति आई और अदालत ने एक अधिवक्ता को बतौर कमिश्नर मस्जिद में जाकर दावे की सत्यता पता करने कहा |  लेकिन जब वे  वहां गये तब उपस्थित मौलवियों और मुस्लिम जनता ने उनको घुसने से ही रोका | मस्जिद के कुछ हिस्से ताले  में बंद हैं जिनके बारे में वादी का कहना है कि उनकी ठीक से जाँच करने पर हिन्दू मंदिर के प्रमाण मिल जायेंगे | मुस्लिम समुदाय की तरफ से तमाम  ऐतराज पहले भी लगाये जा चुके हैं और वर्तमान में भी अदालती आदेश को मानने के बारे में असहमति के स्वर सुनाई दे रहे हैं | सम्भवतः इसी से रुष्ट होकर गत दिवस अदालत ने कड़ा रुख दिखाते हुए दो अतिरिक्त कमिश्नर और नियुक्त करते हुए आदेश पारित किया कि मस्जिद में तहखाने से लेकर हर जगह का  सर्वेक्षण और वीडियोग्राफी करवाकर 17 मई तक पूरी रिपोर्ट  पेश की जावे | साथ ही कह दिया कि जहां ताले बंद हैं उन्हें या तो खोला जाए या फिर तोड़ दिया जाए | उसने ये निर्देश भी दिया कि सर्वे के दौरान कमिश्नरों के अलावा सम्बंधित अधिवक्ता और  प्रशासनिक अमला ही रहेगा | इस  आदेश से  लगता है जैसे 31 साल पहले प्रस्तुत  मामले का संज्ञान अब जाकर लिया गया है | सर्वे दल जो रिपोर्ट देगा उस आधार पर  फैसला हो जायेगा ये मान लेना मूर्खता होगी क्योंकि ऐसे विषयों में पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की जाँच ही प्रामाणिक मानी जाती है |  राममंदिर मसले का हल भी खुदाई में मिले प्राचीन  अवशेषों के आधार पर ही संभव हो सका | ज्ञानवापी मस्जिद में भी यही तरीका आजमाना अपेक्षित है  | बहरहाल जब अदालत ने  मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाये जाने के दावे की पुष्टि हेतु ऐतिहासिक प्रमाण एकत्र करने की पहल की है तब ये उम्मीद की जा सकती है कि इस विवाद को अदालत द्वारा हल किया जाना संभव हो जाएगा | लेकिन इस उम्मीद के साथ ही ये विसंगति भी  है कि तीन दशक से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी यदि ये प्रकरण सबूत जुटाने की प्रारम्भिक अवस्था में ही है तब अंतिम तौर पर निराकरण होते – होते तो न जाने गंगा जी में कितना पानी और बह चुका होगा ? सोचने वाली बात ये है कि इस जैसे मसले के बारे में , जिसका सम्बन्ध न सिर्फ वाराणसी अपितु पूरे देश से है , अदालती प्रक्रिया की गति इतनी धीमी है  | बहरहाल उसने सुस्ती त्यागकर तेज गति से आगे बढ़ने की इच्छा शक्ति प्रदर्शित की है तब मुस्लिम पक्ष से भी  अपेक्षा है कि  सर्वे का काम  सुचारू ढंग से होने दे क्योंकि उसमें बाधा डालने से चोर की दाढी में तिनके वाली उक्ति चरितार्थ हो रही है | वैसे भी  सनातन धर्म के प्राचीनतम आस्था केंद्र के परिसर में मस्जिद होना किसी भी दृष्टि से हजम होने वाली बात नहीं है | सर्वविदित है कि औरंगजेब इस्लामी कट्टरता का प्रतीक था |  विश्वनाथ मंदिर का हिस्सा प्रतीत होती ज्ञानवापी  मस्जिद निश्चित तौर पर उसकी धर्मान्धता का प्रमाण है | आश्चर्य का विषय है कि आजादी के बाद मुगलकालीन अत्याचारों के इन प्रमाणों को नष्ट करने के बारे में क्यों नहीं सोचा गया ? और जब अदालत में मामला दर्ज हुआ तब वहां कछुआ से भी धीमी चाल का नजारा देखने मिला | ऐसे में ये प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि जो आदेश अदालत द्वारा अब दिया गया यही बरसों पहले दिया गया होता तो बड़ी बात नहीं अब तक दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता | बहरहाल अब जब शुरुवात हो ही चुकी है तब इस प्रकरण को भी सर्वोच्च प्राथमिकता  के आधार पर जल्द से जल्द निष्कर्ष तक पहुँचाना चाहिए | इसी तरह मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि से सटाकर बनाई गयी शाही मस्जिद का विवाद भी अदालत में  आ चुका है | बेहतर तो ये होगा कि सर्वोच्च न्यायालय इन मामलों को उ.प्र उच्च न्यायालय द्वारा अपने हाथ में लिए जाने का निर्देश दे जिससे कि कानूनी लड़ाई का सफर छोटा किया जा सके | अन्यथा इनके लंबित रहने से सामजिक स्तर पर तनाव बना रहेगा | चूंकि ये मामले धार्मिक आस्था से जुड़े हैं इसलिए पूरा देश प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर इनमें रूचि लेता है | और फिर राजनीति करने वालों को भी उनमें अपना हित नजर आने लगता है |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 12 May 2022

दंड विधान संहिता के अधिकतर कानून अंग्रेजों के ही बनाये हैं



 जैसी उम्मीद थी वैसा ही हुआ | सर्वोच्च न्यायालय ने राजद्रोह कानून के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी | इस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत द्वारा केंद्र सरकार से जिस तरह के सवाल पूछे जा रहे थे उनसे  संकेत मिल रहा था कि वह इस कानून को कालातीत मानते हुए इसके खात्मे की पक्षधर है | उसका बस चलता तो वह इसे रद्द करने का फरमान सुना देती लेकिन केंद्र सरकार द्वारा इसकी समीक्षा करने का का आश्वासन दिए जाने के बाद उसने फ़िलहाल इस पर अस्थायी रोक लगा दी है | अब  सरकार निश्चित समयावधि के भीतर इसके बारे में अपने रिपोर्ट पेश करेगी जिसके बाद ये तय होगा कि अंग्रेजों के दौर के इस कानून की आजाद भारत में जरूरत है या नहीं ? ये विवाद इसलिए खड़ा हुआ क्योंकि हाल के वर्षों में पूरे देश में सैकड़ों की संख्या में राजद्रोह के प्रकरण दर्ज हुए | इनके बारे में ये अवधारणा है कि ये राजनीतिक बदले की भावना के वशीभूत किये गए और इसका उद्देश्य अपने विरोधी की आवाज दबाना है | सत्ता में बैठे व्यक्ति की आलोचना भी राजद्रोह की परिधि में आने के कारण विपक्ष सहित दूसरे अनेक लोगों पर इस कानून के तहत मुकदमे लगाये गए और गिरफ्तारियां भी हुईं | ऐसे में बात सर्वोच्च न्यायालय तक जा पहुंची जिसने लम्बी सुनवाई के बाद गत दिवस कानून को लागू किये जाने पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी | जिन पर ये प्रकरण दर्ज है वे सम्बंधित अदालत में जमानत की अर्जी लगा सकेंगे  | लेकिन तब तक नए मामले राजद्रोह के अंतर्गत दर्ज करना संभव नहीं होगा | और इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं को भी कुछ राहत दे दी | लेकिन इस बारे में प्रश्न ये उठता है कि इस कानून को रद्द करने के बारे में जितना हल्ला अब मचाया जा रहा है वह पहले क्यों नहीं हुआ ? कपिल सिब्बल जैसे दिग्गज अधिवक्ता ने केन्द्रीय मंत्री रहते हुए इस कानून को रद्द करने की अनुशंसा मंत्रीमंडल के समक्ष की हो ऐसा सुनने में नहीं आया | लगता है केंद्र में सत्ता बदलने के बाद राजद्रोह के मामलों में तेजी आने से एक वर्ग विशेष में घबराहट व्याप्त है | जेएनयू , जामिया मिलिया , जादवपुर , उस्मानिया और अलीगढ़ मुस्लिम विवि के परिसर में जिस तरह के देश विरोधी नारे और भाषणबाजी हुई उसके बाद कठोर  कार्रवाई की  आवश्यकता आम नागरिक भी महसूस करने लगा था | भारत तेरे टुकड़े होंगे और कश्मीर क्या मांगे आजादी जैसे नारे देश की  राजधानी में लगाने वालों के विरुद्ध भी यदि कड़े कानूनी कदम नहीं उठाये जाते तब ऐसी ताकतों का हौसला और बुलंद होने का खतरा है | वैसे तो राजद्रोह ही क्यों किसी भी क़ानून का दुरुपयोग नहीं होना चाहिये | लेकिन देश में कुछ लोग और संगठन जिस तह से अराजकता फ़ैलाने पर आमादा हैं उन पर लगाम कसने के लिए कडा क़ानून ही नहीं  अपितु उसे लागू करने के लिए दृढ इच्छा शक्ति की भी जरूरत है | निर्दोष लोगों की हत्या करने वाले नक्सलवादियों के कृत्य को जायज ठहराने वाले कथित बुद्धिजीवियों  के प्रति सौजन्यता बरतना देशहित में नहीं हो सकता | जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाये जाने के बाद वहां जिस तरह के कड़े कदम उठाये गये उन्हें मानवाधिकारों का हनन मानने वाला तबका भी हमारे देश में है | ये वही लोग हैं जो बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों के प्रति हमदर्द बने हुए हैं | ऐसे में सवाल ये है कि राजद्रोह जैसे कानून का होना गलत है या उसके दुरुपयोग को रोकना जरूरी है ? हमारे देश में स्वतंत्र न्यायपालिका है जिसने कन्हैया कुमार जैसों को भी जमानत दी | ऐसे में होना ये चाहिए कि किसी कानून के बेजा उपयोग की गुंजाईश समाप्त करने पर विचार हो | केन्द्रीय कानून मंत्री किरण रिजुजू द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर जो प्रतिक्रिया व्यक्त की गई उसका संज्ञान भी लिया जाना चाहिए | ऐसे संवेदनशील मामलों में न्यायपालिका और सरकार के बीच टकराव उचित नहीं है क्योंकि  दोनों की अपनी – अपनी भूमिका और अहमियत है | लोकतंत्र के सभी स्तंभों के बीच पारस्परिक सम्मान और समन्वय बेहद जरूरी है | न्यायपालिका का कर्तव्य है कि वह संविधान के अंतर्गत व्यवस्था को चलाये जाने के प्रति सजग रहे | चुनी हुई सत्ता निरंकुश न हो इस पर भी उसे नजर रखनी होती है | लेकिन बीते एक दो दशकों से ये देखने में आया है कि न्यायपालिका भी कई मामलों में सीमोल्लंघन कर जाती है | यद्यपि कई बार ऐसा करना आवश्यक भी होता है लेकिन हर मामले में नहीं | सर्वोच्च न्यायालय को इस बात की चिंता भी करनी चाहिये कि राजद्रोह क़ानून पर अस्थायी रोक लगाए जाने के कारण यदि कोई ऐसा मामला सामने आया जिसमें उसके उपयोग की जरूरत है तब सरकार क्या करेगी ? सवाल और भी हैं लेकिन चूंकि  खुद सरकार ने समीक्षा की बात स्वीकार कर ली है इसलिए उस तक रुकना ही होगा | उम्मीद की जानी चाहिए कि सर्वोच्च न्यायालय इस प्रकरण में देशहित को सर्वोपरि मानकर निष्कर्ष निकालेगा | रही बात अंग्रेजों के दौर का कानून होने की तो हमारे देश में जो दंड विधान संहिता है उसके अधिकतर कानून उसी समय के हैं जिनमें से अनेक की उपयोगिता और औचित्य पर सवाल उठते रहे हैं | बेहतर हो सर्वोच्च न्यायालय इस बारे में भी विचार करे |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 11 May 2022

बिना ओबीसी आरक्षण के चुनाव : भाजपा – कांग्रेस की अग्नि परीक्षा



आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय ने म.प्र में बिना ओबीसी आरक्षण के ही नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव करवाने का आदेश दे दिया | प्रदेश सरकार द्वारा इस वर्ग को 35 फीसदी आरक्षण दिए जाने की मांग उसने ये कहते हुए अस्वीकार कर दी कि वह आवश्यक विवरण उपलब्ध नहीं  करा सकी किन्तु उसके अभाव में लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को टालते रहना गलत होगा | राज्य चुनाव आयोग ने भी न्यायालय के निर्देशानुसार चुनाव हेतु अपनी स्वीकृति दे दी | लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ओबीसी आरक्षण के साथ ही चुनाव करवाने की प्रतिबद्धता दोहराते हुए ये घोषणा भी कर डाली कि  सर्वोच्च न्यायालय में पुनर्विचार  याचिका लगाई जावेगी | वहीं अनेक विधि  विशेषज्ञ कह रहे हैं कि अब  पुनर्विचार याचिका की कोई गुंजाईश ही नहीं है | कांग्रेस और भाजपा के बीच एक – दूसरे को ओबीसी विरोधी साबित करने के लिए आरोप – प्रत्यारोप का दौर भी चल पड़ा है | यदि सर्वोच्च न्यायालय ने पुनर्विचार याचिका स्वीकार नहीं की तब ओबीसी आरक्षण के बिना चुनाव करवाने की बाध्यता होगी | और उस स्थिति में जैसा कहा जा रहा है कि राजनीतिक दल ज्यादा से ज्यादा उम्मीदवारी ओबीसी वर्ग के लोगों को देकर उनकी नाराजगी से बचना चाहेंगे | जो कुछ भी होना है वह आने वाले कुछ दिनों में ही स्पष्ट हो जायेगा किन्तु सर्वोच्च न्यायालय का रुख देखने से लगता है कि वह अपने  आदेश पर ही कायम रहेगा | ऐसे में ये मानकर चला जा सकता है कि चुनाव जल्द होंगे | चूँकि मानसून सिर पर है इसलिए  चुनाव आयोग के सामने  भी बड़ी दिक्कतें आयेंगीं | विशेष रूप से पंचायत चुनावों में बरसात  बाधा बन सकती है | जहाँ तक बात म.प्र सरकार की है तो भाजपा के लिए भी ये बड़ी चुनौती है | यद्यपि अपने मजबूत संगठन के बलबूते वह कांग्रेस पर भारी नजर आती है लेकिन ये चुनाव स्थानीय मुद्दों पर केन्द्रित होने से पूरे प्रदेश में एक जैसे समीकरण होना जरूरी नहीं रहता | यद्यपि ओबीसी वर्ग में  भाजपा का जनाधार काफी मजबूत है | स्वयं मुख्यमंत्री उसका प्रतिनिधित्व करते हैं और आम जनता के साथ उनका सम्पर्क भी बेहद जीवंत है | लेकिन कांग्रेस द्वारा भाजपा पर ओबीसी विरोधी होने का जो आरोप लगाया जा रहा है उसकी काट निकालना उसके लिए आसान नहीं होगा | और फिर ओबीसी के तुष्टीकरण के लिए उन्हें ज्यादा टिकिटें देने  के अलावा सामान्य वर्ग के प्रभुत्व वाली सीटों से उतारे जाने पर उच्च जातियों के नाराज होने का नुकसान भी संभावित है  | यद्यपि ये समस्या कांग्रेस  के सामने भी रहेगी |  2023 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा के  लिए स्थानीय निकायों और पंचायत चुनाव जीतना  जरूरी होगा क्योंकि इनके नतीजों का मनोवैज्ञानिक प्रभाव विधानसभा चुनाव पर पड़े बिना नहीं रहेगा | कांग्रेस के लिए भी ये  जीवन – मरण का सवाल होंगे | यदि वह इनमें सफलता हासिल कर सकी तो उसके लिए 2023 का मुकाबला जीतना आसान हो जायेगा , अन्यथा उसका मनोबल टूटे बिना नहीं रहेगा | इसी तरह भाजपा के लिए भी ये चुनाव इस पार या उस पार वाले होंगे | 2018 के विधानसभा चुनाव की कडवी यादें वह शायद ही भूली होगी | मुख्यमंत्री भी इस बात को समझते हैं कि ये चुनाव  उनके राजनीतिक भविष्य का निर्धारण करने वाले होंगे | मार्च 2020 में सत्ता हासिल होने के बाद चूंकि कोरोना लग गया , उस कारण सरकार को कार्य करने का समुचित अवसर नहीं मिला | इस वजह से आधे – अधूरे पड़े काम भाजपा के लिए मुसीबत बन सकते हैं | उस  काल में सांसद – विधायक भी ज्यादा कुछ न कर सके | कमलनाथ सरकार ने आते ही चूंकि स्थानीय निकाय भंग कर दिए थे इसलिए उनमें नौकरशाही हावी है | जिसके भ्रष्टाचार का खामियाजा  भाजपा के खाते आ सकता है | लेकिन इससे भी बड़ी समस्या जो भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने आने वाली है वह है एक अनार सौ बीमार वाली | यदि चुनाव हुए तो बरसों से टिकिट की आस  लगाये कार्यकर्ताओं की उम्मीदें सातवें आसमान पर होंगीं | ऐसे में जो उससे वंचित रह जायेंगे उनकी नाराजगी दोनों बड़ी पार्टियों को इस चुनाव के बाद विधानसभा के मुकाबले में भी काफ़ी महंगी साबित होगी |  जहाँ तक प्रश्न ओबीसी आरक्षण का है तो ये मुद्दा कानून से ज्यादा राजनीतिक बन गया है | भाजपा और कांग्रेस दोनों अपने को ओबीसी का हितचिन्तक  साबित करने में जुटी हैं  | भाजपा के पास कहने को ये है कि उसने उमाश्री भारती , बाबूलाल गौर और शिवराज सिंह चौहान के रूप में लगातर तीन ओबीसी मुख्यमंत्री दिए जबकि कांग्रेस  के पास प्रदेश स्तर पर पिछड़ी जाति का कद्दावर नेता नहीं है | अरुण यादव को जिस तरह पीछे धकेला गया उसकी वजह से पार्टी  कमजोर हुई है | सर्वोच्च न्यायालय ने गत दिवस  ओबीसी आरक्षण के बिना ही चुनाव करवाने का जो आदेश दिया उसके परिप्रेक्ष्य में भाजपा और कांग्रेस दोनों को अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा | आरक्षण का प्रावधान हुए बिना भी वे इस वर्ग को कितना अवसर देंगीं यह  इन चुनावों से स्पष्ट हो जाएगा | यदि उन्हें समुचित प्रतिनिधित्व बिना  आरक्षण के ही मिल सके तब हो सकता है भविष्य में इसे लेकर बनाया जाने वाला दबाव कुछ कम हो | वैसे भी राजनीतिक दलों को अपने स्तर पर इस तरह की रचना  करनी चाहिये जिससे समाज के सभी वर्गों के साथ न्याय हो सके और विकास की मुख्यधारा से कोई भी इसलिए वंचित न रहे क्योंकि वह दलित अथवा पिछड़ी जाति में जन्मा है | इसी के साथ ये भी जरूरी है कि आरक्षित वर्ग के जो राजनीतिक नेता स्थापित हो चुके हैं वे  अपने परिवार के दायरे से निकलकर समूचे  समाज के वंचित वर्ग के उत्थान को प्राथमिकता दें  जो कि आरक्षण का मूल उद्देश्य है |  

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 10 May 2022

कमजोर नेतृत्व खालिस्तानी आतंक की वापसी की वजह बन रहा



ऐसा लगता है पंजाब को जलाने की बड़ी साजिश रची जा रही है | पटियाला में खालिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाने वाली रैली पर सिख संगठन द्वारा किये हमले के बाद काली मंदिर में जिस तरह से निहंगों द्वारा आतंक फैलाया गया वह सामान्य बात नहीं थी | पंजाब के किसी हिन्दू धार्मिक स्थल में घुसकर सिखों द्वारा तलवारें लहराने का यह संभवतः पहला अवसर था | अन्यथा गुरुद्वारों में जहाँ हिन्दू श्रद्धालु बड़ी संख्या में देखे जाते हैं वहीं मंदिरों में सिखों की आवाजाही भी बहुत ही सामान्य बात है | वैष्णो देवी और अमरनाथ यात्रा में भी सिखों की अच्छी खासी संख्या होती है | नब्बे के दशक में जब खालिस्तानी आतंक पंजाब में छाया था तब भी हिन्दू – सिख भाईचारा यथावत रहा | लेकिन ऐसा लगता है किसान आन्दोलन की नमी से पनपे खालिस्तानी बीज पंजाब की धरती पर अंकुरित होने लगे हैं | निहंगों द्वारा की गई कुछ हिंसक वारदातों के बाद ये महसूस किया जाने लगा है कि देश विरोधी शक्तियां इस सीमावर्ती राज्य में पाँव फ़ैलाने के लिये प्रयासरत हैं | बीते कुछ दिनों के भीतर ही जो संदिग्ध पकड़े  गये उनके पास से विस्फोटक पदार्थ भी मिले | गत दिवस चंडीगढ़ के निकट पंजाब के मोहाली में स्थित इंटेलिजेंस विंग के मुख्यालय पर रॉकेट से हुए हमले से उन तमाम आशंकाओं की पुष्टि हो गई जिनके अनुसार पंजाब में आतंकवाद नए सिरे से सिर उठाने की फ़िराक में हैं |  हालाँकि रात का समय होने से नुकसान ज्यादा नहीं हुआ अन्यथा दिन के समय जनहानि भी हो सकती थी | बताया जा रहा है कि रॉकेट तकरीबन 80 फीट दूर से फेंका गया |  इस सन्दर्भ में सबसे अधिक चिंता का विषय ये है कि आखिरकार ऐसा क्या और कैसे हो गया कि दशकों से ठंडा पड़ा खालिस्तानी आन्दोलन अचानक गर्म हो उठा | स्मरणीय है जब कृषि कानूनों के विरोध में पंजाब के किसान जिनमें ज्यादातर सिख थे,दिल्ली आये तब मददगार के तौर पर गुरुद्वारों ने भी धरनास्थल पर लंगर के जरिये सेवा कार्य शुरू किये | शुरुवात में तो वह सामान्य लगा लेकिन जल्द ही वहां  भिंडरावाले के चित्र वाली टी शर्ट और खालिस्तानी झन्डे नजर आने लगे | निहंगों ने भी किसानों के तम्बुओं के साथ अपना डेरा जमा लिया जबकि उन्हें खेती – किसानी से कुछ भी लेना देना नहीं था | सबसे चौंकाने वाली बात ये रही कि किसान आन्दोलन के समर्थन में कैनेडा और ब्रिटेन में भारतीय दूतावास के समक्ष वहां रहने वाले सिख संगठनों द्वारा प्रदर्शन किये गए जिनमें खालिस्तानी नारे भी लगे | वह  आन्दोलन तो जैसे – तैसे खत्म हो गया और कृषि कानून भी वापिस हो गये परन्तु  जिस कांग्रेस सरकार ने आन्दोलन को पंजाब से दिल्ली भेजकर अपना सिरदर्द घटाया था , जनता ने उसे सत्ता से बाहर कर दिया | लेकिन विकल्प के तौर पर आई आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद से जिस तरह खालिस्तान समर्थक सिख संगठन खुले आम उपद्रव मचाने का दुस्साहस कर रहे हैं वह आने वाले बड़े खतरे का संकेत है | आम आदमी पार्टी के खालिस्तानी नेताओं से सम्बन्धों को लेकर अरविन्द केजरीवाल के पुराने साथी डा.कुमार विश्वास ने जो आरोप विधानसभा चुनाव के पूर्व लगाए और फिर हालिया घटनाओं पर प्रतिक्रिया के दौरान उसकी सांकेतिक पुष्टि की वह निश्चित रूप से विवादित मसला है | परन्तु इतना जरूर  कहा जा सकता है कि पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान की  प्रशासनिक क्षमता पर अभी से सवाल उठने शुरू हो गये हैं | इस बारे में ये भी विचारणीय है कि राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कुर्सी छोड़ने के पूर्व अनेक मर्तबा केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह से अकेले में बात करते हुए सुरक्षा संबंधी कुछ जानकारियाँ दी थीं | निश्चित तौर पर उनके संज्ञान में कुछ न कुछ ऐसा आया होगा जिसे केंद्र सरकार की जानकारी में लाने की जरूरत उन्होंने महसूस की  |  उस समय पंजाब प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू के पाकिस्तान के निवर्तमान प्रधान मंत्री इमरान खान से याराने की भी राजनीतिक जगत में खूब चर्चा थी | ये भी सुनने में आता रहा कि कैप्टन ने सिद्धू और इमरान के बीच नजदीकी को लेकर भी कुछ जानकारी श्री शाह  को दी थी | हालांकि ऐसी बातों का खुलासा नहीं हो पाता किन्तु बीते एक दो साल के भीतर पंजाब के राजनीतिक  घटनाक्रम पर निगाह डालने से  ये बात सामने आती है कि स्पष्ट बहुमत वाली सरकार और कैप्टन जैसे अनुभवी मुख्यमंत्री  के बावजूद पकिस्तान की सीमा से सटे इस राज्य में कांग्रेस  की अंतर्कलह और पार्टी हाईकमान के ऊलजलूल निर्णयों ने वहां राष्ट्रीय पार्टियों की कब्र खोदने का गुनाह कर डाला | परिणामस्वरूप मिट्टी के नीचे दबे राष्ट्रविरोधी बीज सतह से ऊपर आने लगे हैं | गत दिवस नवजोत और भगवंत के बीच मुलाकात की खबर के बाद मोहाली में ख़ुफ़िया विंग के मुख्यालय पर राकेट से ग्रेनेड फेंके जाने की घटना हो गयी | हालांकि उस  मुलाकात से इसके तार जोड़ना उचित नहीं है लेकिन एक बात जरूर सामने आने लगी है कि पंजाब में जिस नई राजनीति का उदय हुआ उसके पास अनुभवी नेतृत्व का अभाव होने से राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे की अनदेखी करने का खतरा उत्पन्न हो गया है | आम आदमी पार्टी की सरकार ने स्वच्छ प्रशासन का जो संकेत दिया वह बेशक उत्साहवर्धक है लेकिन खालिस्तानी ताकतों पर लगाम न कसी गई तो पंजाब में आतंकवाद की लपटें तेज होने का खतरा बढ़ जाएगा | ऐसा लगता है श्री  मान के पास स्वतंत्र सोच का अभाव है और उनके मार्गदर्शक श्री केजरीवाल आगामी लोकसभा चुनाव के लिहाज से राष्ट्रीय विकल्प बनने के लिए हाथ - पाँव मारने में व्यस्त हैं | ऐसे में देश विरोधी ताकतों को अपना जाल फ़ैलाने का अवसर मिलने की सम्भावना बढ़ रही है |   

- रवीन्द्र वाजपेयी