Tuesday, 7 June 2022

पंजाब में खालिस्तानी आतंक को पनपने से पहले कुचलना ज़रूरी



1984 में अमृतसर के ऐतिहसिक स्वर्णमंदिर परिसर में हुए ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार की बरसी पर गत दिवस वहां जिस तरह से खालिस्तान समर्थक नारेबाजी के बीच जरनैल सिंह भिंडरावाले के पोस्टर लहराए गए उससे  साबित हो गया कि पंजाब की जमीन में दबे अलगाववाद के बीज अनुकूल माहौल पाते ही अंकुरित होने लगे हैं | कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली में किसान संगठनों के धरने के दौरान खालिस्तान समर्थक तत्व खुलकर सामने आये थे और वहां भी भिंडरावाले के चित्र वाले टी शर्ट और पोस्टर देखने मिले थे | उस आन्दोलन के समर्थन में कैनेडा और ब्रिटेन में जिस तरह से सिख संगठनों ने अन्दोलन किया उसमें भी खालिस्तान समर्थकों की भूमिका का संकेत मिला था | आन्दोलन खत्म होते ही पंजाब में विधानसभा चुनाव आ  गये जिसमें कांग्रेस  और  अकाली दल को मात देकर आम आदमी पार्टी प्रचंड बहुमत के  साथ सत्ता में आई | जिस तरह से बादल परिवार, अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू आदि हारे वह इस सीमावर्ती राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव  के रूप में सामने आया | आम आदमी पार्टी की जो सरकार दिल्ली में है उसने आम जनता को जो मुफ्त सुविधाएँ दीं उसका जादू  पंजाब के मतदाताओं के भी सिर पर चढ़कर बोला | लोगों को उम्मीद थी कि भगवंत सिंह मान के नेतृत्व में बनी सरकार जनहित के काम करते हुए राज्य को स्वच्छ प्रशासन देगी | शुरुवात में ऐसा लगा भी किन्तु उसके साथ ही जिस तेजी से खालिस्तानी ताकतें पंजाब में सिर उठाने लगीं उससे तकरीबन चार दशक पहले का खूनी दौर लौटने की आशंका उत्पन्न होने लगी | खालिस्तान  विरोधी जुलूस पर  हमले के बाद हिन्दू मंदिर में घुसकर तोड़फोड़ मचाना , ख़ुफ़िया मुख्यालय पर रॉकेट लाँचर से हमला और उसके बाद मूसेवाला की हत्या जैसी वारदातों से ये संदेह होने लगा कि पंजाब में बड़ा राजनीतिक बदलाव किसी षडयंत्र का हिस्सा तो नहीं था | यद्यपि इस बारे में कुछ आरोप भी लगे लेकिन  कोई पुख्ता आधार सामने नहीं आने से उनकी सत्यता प्रमाणित नहीं सकी | इस बारे में ये कहना गलत न होगा कि 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद से खालिस्तानी आतंक धीरे – धीरे दम तोड़ बैठा | लेकिन बतौर विचारधारा वह बना रहा और समय – समय पर उसके भाव व्यक्त्त होते रहे | लेकिन कैनेडा में जिस तरह से सिख आबादी का वर्चस्व बढ़ता गया उसकी वजह से वहां खालिस्तान समर्थक संगठनों के पास काफी पैसा आने लगा और उसी के बलबूते वे सात समन्दर पार बैठकर भारत में उस आन्दोलन को दोबारा खड़ा करने के प्रयास में जुटे रहे | वैसे  पंजाब में जो भी सरकार रही उसने खालिस्तानी आन्दोलन को पनपने का अवसर नहीं दिया | हालांकि अकाली दल आनंदपुर साहेब प्रस्ताव को दोहराना नहीं भूला किन्तु भाजपा के साथ गठबंधन सरकार चलाने की वजह से वह अलगाववादियों से दूर ही रहा | दूसरी तरफ कांग्रेस की राज्य सरकार भी  दूध की जली हुई होने से खालिस्तानी तत्वों को गले लगाने से बचती रही | लेकिन किसान आन्दोलन ने पंजाब में सिखों को एक बार फिर मुख्यधारा से काटने में उल्लेखनीय  भूमिका का निर्वहन किया | इसे लेकर आन्दोलन पर आरोप भी लगे जिन्हें सरकारी प्रचार बताकर उपेक्षित कर दिया गया | गणतंत्र दिवस पर दिल्ली के लालकिले में  जिस तरह से निहंगों ने आतंक मचाया उसे पूरी दुनिया ने देखा | उसके बाद भी राकेश टिकैत जैसे नेताओं ने सच्चाई देखने की बजाय आँखें मूँद लीं | किसान आन्दोलन को खालिस्तान प्रवर्तक या समर्थक कहना तो सही नहीं है लेकिन ये तो मानना ही पड़ेगा कि किसानों की आड़ लेकर खालिस्तानी तत्व एक बार फिर सड़कों पर आने में सफल हो गए | पंजाब के किसान तो दिल्ली के धरने में व्यस्त रहे और इधर राज्य के भीतरी हिस्सों में खालिस्तानी जनता  के मन में  भारत विरोधी भावनाओं का संचार करने में लग गए | राजनीतिक सत्ता बदलने का  लाभ  पंजाब की आम जनता को कितना मिला ये तो फिलहाल  साफ़ नहीं है लेकिन खालिस्तानी संगठनों को नई सरकार बनने के बाद अपने लिये सुविधाजनक माहौल मिलने लगा और यही कारण है अचानक  खूनी घटनाओं का सिलसिला शुरू हो गया | इसके कारण मान सरकार की जो किरकिरी हो रही है वह तो अपनी जगह है लेकिन  पंजाब में अलगाववाद की ये बयार  राष्ट्रीय चिंता  का विषय है | अकाली दल के एनडीए से अलग  होने के बाद उसके नेताओं की भाषा भी बदलती  लग रही है | इस प्रकार गत  दिवस स्वर्णमंदिर परिसर में खालिस्तान समर्थक नारेबाजी और भिंडरावाले के पोस्टरों का प्रदर्शन साधारण घटना नहीं है | 1984 में इसी स्थान पर सेना ने ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार के दौरान भिंडरावाले को मारा था | उसी के चलते अकाल तख़्त को भी भारी  नुकसान हुआ  | उस सैन्य अभियान की प्रतिक्रिया स्वरूप ही दो सिख अंगरक्षकों ने इंदिरा जी की उनके ही निवास पर हत्या कर दी थी और उस अभियान के निर्देशक जनरल वैद्य को पुणे में मार दिया गया | यद्यपि पंजाब का सिख समुदाय खालिस्तानी आन्दोलन के साथ सीधे तौर पर चूंकि कभी नहीं जुड़ सका इसलिए वह मुहिम अंततः कमजोर पड़ते – पड़ते खत्म हो गई | लेकिन  कश्मीर में धारा 370 हटने के बाद आतंकवाद की जिस तरह कमर टूटी उसके बाद से पाकिस्तान ने खालिस्तानी आन्दोलन को पुनर्जीवित करने का खेल रचा जिसे कैनेडा आदि से मदद मिल रही है | पंजाब की नई सरकार राजनीतिक तौर पर अभी उतनी अनुभवी और परिपक्व नहीं है कि इस तरह के हालात को संभाल सके | हालांकि मुख्यमंत्री श्री मान ने दिल्ली जाकर केन्द्रीय गृहमंत्री से अतिरिक्त सुरक्षा बल मांगे थे | लेकिन जिस तरह का वातावरण वहाँ बन रह है , उसमें राजनीतिक सूझबूझ की बेहद जरूरत है | पिछले मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह कांग्रेस के होने के बावजूद केंद्र से अच्छे रिश्ते बनाए रखते थे | लेकिन आम आदमी पार्टी और केंद्र सरकार के बीच छत्तीस का आंकड़ा दिल्ली से ही बना हुआ है | ऐसे में दोनों के बीच संवादहीनता सुरक्षा की दृष्टि से बेहद सम्वेदनशील इस राज्य के लिए खतरनाक साबित हो सकती है | बेहतर हो केंद्र और पंजाब सरकार ऐसे मामलों में राजनीति से ऊपर उठकर काम करें क्योंकि आन्तरिक सुरक्षा राजनीतिक नफे – नुकसान से कहीं ऊपर है |

- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 6 June 2022

हिन्दुओं की आस्था का अपमान करने वालों पर भी फन्दा कसा जाए



भाजपा नेत्री नूपुर शर्मा द्वारा  की गई टिप्पणी पर देश के अलावा मुस्लिम देशों में भी नाराजगी देखी गयी | गत दिवस क़तर और कुवैत सरकार ने  भारतीय राजदूत को तलब करते हुए अपनी नाराजगी जताई | भारत सरकार ने  भी उन्हें साफ़ शब्दों में बता दिया कि वह  सभी धर्मों का सम्मान करती है | लेकिन नूपुर चूंकि भाजपा से ताल्लुकात रखती थीं लिहाजा अन्य मुस्लिम देशों की नाराजगी सामने आने  के पहले ही उन्हें छह वर्ष के लिए निलम्बित एवं  एक अन्य प्रवक्ता नवीन जिंदल को निष्काषित कर दिया गया | सुश्री शर्मा ने भी अफसोस जताते हुए ट्वीट के जरिये माफी मांग ली |  दूसरी तरफ उस टिप्पणी की प्रतिक्रियास्वरूप कानपुर में  जुमे की नमाज से लौट रही भीड़ ने जमकर  दंगा कर डाला  | आश्चर्य की बात है कि जो मौलवी तथा मुस्लिम प्रवक्ता नूपुर पर चौतरफा हमला करने में जुटे रहे उनमें से ज्यादातर  दंगाइयों के अपराध पर पर्दा डालते हुए निर्दोष मुस्लिम युवकों को फंसाए जाने का आरोप लगा रहे हैं | इसी बीच भारत को तेल और गैस की आपूर्ति करने वाले दो मुस्लिम देशों की आपत्ति का सरकार द्वारा समुचित उत्तर देने के साथ ही भाजपा ने नूपुर और नवीन पर कार्रवाई कर डाली | सत्ता में होने के कारण भाजपा के लिए ऐसा करना जरूरी था या मजबूरी ये बहस का मुद्दा बनते सोशल मीडिया पर  संदेशों की बाढ़ आ गयी है | भाजपा के परम्परागत समर्थक भी इस फैसले की खुलकर निंदा करते हुए कह रहे हैं कि जब नूपुर को पार्टी की जरूरत सबसे ज्यादा जरूरत थी तब उसे अकेला छोड़ दिया गया | नूपुर ने  जो ट्वीट किया उससे भी ये संकेत मिलता है कि उन्हें दबाववश वैसा करना पड़ा | ये भी संभव है कि पार्टी  ने उनको  और श्री जिंदल को विश्वास में लेकर  कार्रवाई की हो जिससे और मुस्लिम देशों को  ऐतराज करने का अवसर न मिले | वैसे एक बात तो साफ  है कि भाजपा ने दो नेताओं पर जो गाज गिराई वह सरकार के कहने पर  ही प्रतीत होती है | वरना ये काम तो वह  टिप्पणी के तत्काल बाद  कर सकती थी | जहाँ तक सरकार का प्रश्न है तो उसने भी इस प्रकरण को तभी गंभीरता से लिया जब क़तर और कुवैत से  सरकारी आपत्ति आई | चूंकि उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू भी क़तर के दौरे पर  थे  इसलिए भी भाजपा ने जल्दबाजी  में कदम उठाया | बहरहाल  भावनात्मक मुद्दे से जुडी राजनीति जब कूटनीति तक जा पहुँची तब किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी से ऐसे निर्णय की  उम्मीद रहती है | और फिर  भाजपा के साथ चूँकि हिन्दुत्व का मुद्दा जुड़ा हुआ है इसलिए उसके समर्थकों के एक वर्ग में नुपुर के निलम्बन को सैद्धांतिक पलायन मानकर आलोचना की जा रही है |  विरोध यदि पाकिस्तान की तरफ से आया होता तब भी शायद भाजपा ये  कदम न उठाती | लेकिन तेल कूटनीति का दबाव भारी पड़ गया | वैसे इस फैसले से न तो भाजपा की नीतियों में कोई बदलाव आएगा और न ही  सरकार की | अतीत में भी भाजपा ने मौके की नजाकत के मद्देनजर अपने नेताओं को इसी तरह दण्डित किया है | लेकिन इस मामले के दूसरे पहलू को भी देखा जाना चाहिये | नूपुर द्वारा शिवलिंग के बारे में दूसरे पक्ष द्वारा की गयी टिप्पणियों से आक्रोशित होकर वह कहा जिसे मुस्लिम समुदाय और कतिपय इस्लामिक देशों ने बुरा माना | लेकिन हमारे देश के अनेक मौलवी अपने समुदाय के बीच जिस तरह की तकरीरें किया करते हैं उनका विश्लेषण करने पर स्पष्ट हो जाएगा कि उनकी जुबान से हिन्दू देवी  – देवताओं और धर्म ग्रन्थों का किस तरह उपहास किया जाता है ? संचार क्रांति के इस युग में उनकी सैकड़ों वीडियो यू ट्यूब पर उपलब्ध हैं | अपने धर्म और उसके प्रवर्तकों की श्रेष्ठता और महानता का गुणगान पूरी तरह उचित है लेकिन देश के बहुसंख्यक समुदाय की आस्था का मखौल उड़ाने का साहस भारत जैसे देश में ही संभव है |  भाजपा तो एक  राजनीतिक पार्टी होने से चुनावी नफे – नुकसान के मकड़जाल में फंसी हुई है लेकिन केंद्र सरकार को चाहिए वह कथित मौलवियों सहित पेशेवर मुस्लिम वक्ताओं की वीडियो को खंगालकर इस बात की जाँच करे कि अपने धर्म की शान  में कसीदे पढ़ने वाले दूसरों के बारे में किस तरह की बातें कहते हैं ? भारत के धर्मनिरपेक्ष देश होने से सभी  धर्मावलम्बियों को अपने आराध्य और आस्था के प्रति सम्मान रखने की स्वतंत्रता तो है लेकिन स्वछंदता नहीं | ऐसे में जो भी किसी अन्य की  आस्था का अपमान करे उसे दण्डित किया जाना चाहिए | भारत में मुस्लिम  समुदाय की जितनी भी प्रसिद्ध दरगाहें हैं उनमें प्रतिदिन जाने वाले  में हिन्दुओं की संख्या भी अच्छी – खासी रहती है जबकि किसी मुसलमान के  मंदिर जाने पर उसे बुतपरस्त होने से इस्लाम का विरोधी मान लिया जाएगा | इंडोनेशिया जैसे इस्लामिक देश ने जिस तरह से अपने हिन्दू अतीत को संस्कृतिक  धरोहर के तौर पर सहेजकर रखा  काश, हमारे देश के मुल्ला – मौलवी भी उससे प्रेरणा प्राप्त करते | लेकिन हमारे देश में मुसलमानों के धार्मिक रहनुमाओं और नेताओं के सिर से कट्टरता का भूत उतरता ही  नहीं है | गत दिवस एक टीवी साक्षात्कार में एक मौलवी साहब कानपुर के दंगे के औचित्य को साबित करते हुए ये कहने से बाज नहीं आये कि ऐसी टिप्पणियों  पर मुस्लिम नौजवान कुछ भी करने से नहीं चूकेंगे | समय आ गया है जब मुस्लिम समुदाय को बदलती दुनिया के अनुसार अपनी सोच में सुधार करना चाहिए | भाजपा ने ये जानते हुए भी कि  उसके  समर्थक नाराज होंगे , अपने दो नेताओं पर अनुशासन  का  चाबुक चला दिया परन्तु क्या मुस्लिम समाज  भड़काऊ तकरीरें करने वाले मौलवियों के वीडियो की जांच कर उन पर फंदा कसेगा ? अफगानिस्तान में तालिबानों द्वारा बामियान की वैश्विक धरोहर कहलाने वाली बुद्ध मूर्तियाँ खंडित की गईं तब भारत में रहने वाले उन लोगों की  जुबान से निंदा का एक शब्द तक नहीं निकला जिन्होंने गत वर्ष  तालिबान के सत्ता में लौटने पर खुशियाँ मनाईं थीं | नूपुर और नवीन पर भाजपा द्वारा की गई कार्रवाई निश्चित तौर पर केंद्र सरकार पर पड़े कतिपय इस्लामिक देशों के दबाव में की गई | लेकिन अब सरकार को  हिन्दू देवी – देवताओं का अपमान करने वालों  की खबर भी  लेनी चाहिए | हिन्दुओं के विरुद्ध ज़हर उगलने वाले जाकिर नाइक गिरफ्तारी के भय से मलेशिया में दुबके बैठे हैं | लेकिन अभी भी देश के भीतर उन जैसे अनेक लोग हैं जो मुस्लिम समुदाय की भावनाओं को भड़काकर देश के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं | भारत भले ही  हिन्दू राष्ट्र नहीं है किन्तु 80 फीसदी आबादी की आस्था के  अपमान की छूट मिलती रही तब ऐसी धर्मनिरपेक्षता भी  किस काम की ? हमारे संविधान निर्माता इस बात को समझते थे और इसीलिये उन्होंने संविधान की मूल प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष जैसा शब्द शामिल नहीं किया था |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Sunday, 5 June 2022

जल, जंगल और जमीन को भी साँस लेने का अवसर मिलना चाहिये




आज विश्व पर्यावरण दिवस है। इस दिन पर्यावरण को बचाने के लिये तरह - तरह के सरकारी  और गैर सरकारी आयोजन होते हैं। उनका  उद्देश्य प्रकृति का संरक्षण कम फ़ोटो छपाना ज्यादा होता है ।  जो नेता और नौकरशाह विकास के नाम पर वृक्षों के बेरहमी से कत्ले आम में रत्ती भर संकोच नहीं करते वे ही आज के दिन पौधे रोपकर पर्यावरण के सबसे बड़े हिमायती बन  जाते हैं । बीते दो वर्ष कोरोना के कारण पर्यावरण सम्बन्धी भव्य आयोजन तो नहीं किये जा सके लेकिन एक बात अधिकतर लोगों के मन में बैठ गई है  कि प्रकृति के प्रति उनका निर्दय व्यवहार ही पर्यावरण में आई विकृति का एकमात्र कारण है। कोरोना के विश्वव्यापी फैलाव को भी पर्यावरण असंतुलन से जोड़कर देखा जा रहा था। हालांकि वह अभी तक वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित नहीं हो सका। बावजूद उसके बीते दो वर्षों में  लॉक डाउन के दौरान प्रकृति ने जिस तरह राहत  की सांस ली उसने समूची मानव जाति को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित कर दिया। दूर न जाते हुए हम अपने देश पर ही नजर डालें  तो प्रधानमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी में गंगा नदी का जल न सिर्फ चमत्कारिक ढंग से स्वच्छ  हुआ अपितु जलचर भी निडर होकर अठखेलियाँ करते  किनारों पर दिखने लगे। दरअसल नदी के  किनारे पूजन सामग्री से लबालब रहने से मछलियां वहां तक आने से कतराती थीं। गंगा को प्रदूषण मुक्त करने पर  बड़ी राशि लुटाई जा चुकी है किंतु  अपेक्षित परिणाम नहीं आये।  जबकि लॉक डाउन के दौरान  वैज्ञानिक परीक्षण किये जाने पर उसके जल की शुद्धता  से वे आश्चर्यचकित  रह गये। वाराणसी के अलावा भी अन्य शहरों के पास प्रवाहित  नदियों की दशा में भी ऐसा ही गुणात्मक सुधार महसूस किया गया। औद्योगिक इकाइयों से आने वाले प्रदूषित जल के रुकने के अलावा प्रतिदिन भक्तगणों के न आने से नदियों को लंबी सांस लेने की छूट मिली। अप्रैल और मई की भीषण गर्मी ने भी उस दौरान रौद्र रूप नहीं दिखाया। छोटे और बड़े सभी शहरों में वायु प्रदूषण में  अकल्पनीय सुधार भी देखने मिला। तराई क्षेत्रों के निवासियों को तो तब बेहद आनंद मिला जब वातावरण में धूल  और धुंआ कम हो जाने से नंगी आंखों से दूर - दूर के   वे पर्वत भी नजर आने लगे जो पहले दूरबीन से भी बमुश्किल दिखते थे। ये भी अनुभव हुआ  कि गर्मी में  होने वाली आम बीमारियों से लोगों को राहत मिली। गौरतलब है लॉक डाउन में ज्यादातर  जनरल प्रैक्टिशनर अपना दवाखाना बंद कर बैठ गए ।  लेकिन अपवादस्वरूप कुछ को छोड़कर अधिकतर लोगों  को पर्यावरण में आये सुखद बदलाव ने स्वस्थ बनाये रखा।  बीते अनेक वर्षों से गायब हो चुके पक्षियों की मौजदगी का सुखद एहसास भी उस दरम्यान हुआ था । घरों की बगिया में तितलियां जहाँ मंडराती दिखीं वहीं राष्ट्रीय उद्यानों में अक्सर  छिपे रहने वाले वन्य जीव निडर होकर बाहर आने लगे। इस दृष्टि से दोनों लॉक डाउन  प्रकृति और पर्यावरण के लिए जीवनदायी साबित हुए  किन्तु ढील दिए जाते ही चंद दिनों में  स्थिति पूर्ववत बनने लगी और मानवीय वासना  पर्यावरण संरक्षण के सुखद एहसास पर पानी फेरने के लिए अपने वीभत्स  रूप में सामने आ गई। ये भी कह सकते हैं कि लॉक डाउन से कोरोना  के फैलाव को रोकने के साथ ही प्रकृति और पर्यावरण को जीवनदान मिला।  इस आधार पर उसे पर्यावरण संरक्षण का दौर भी कह सकते हैं। लेकिन इससे  हमने कुछ नहीं सीखा इसीलिए ये कहना पड़ रहा है कि हम भावी पीढ़ियों को खतरे में डालने पर आमादा  हैं । यदि लॉक डाउन  जैसा आचरण अस्थायी तौर पर ही सही सप्ताह में एक दिन हम  कर सकें तो पर्यावरण  विषयक चिंताएं कुछ हद तक तो दूर हो सकती हैं।  और इसलिए  प्रकृति का संरक्षण एक  या कुछ दिनों की रस्म अदायगी तक सीमित न रहकर हमारे जीवन का स्थायी हिस्सा बनना चाहिए। जिस तरह  सांस लेना हमारे लिए जरूरी है वैसी ही अनिवार्यता प्रकृति और पर्यावरण को बचाने की भी है। जिस दिन हम इसके महत्व को समझ लेंगे तो वर्ष का हर दिन  पर्यावरण दिवस होगा। जल, जंगल और जमीन के प्रकृति प्रदत स्वरूप को  ज्यादा से ज्यादा सुरक्षित रखने पर ही भावी पीढ़ियां  स्वस्थ और सुरक्षित रहेंगी। बुजुर्गों से विरासत में  हरी-भरी धरती मिली थी लेकिन हम अपनी संतानों को जो प्रदूषित वातावरण देने जा रहे हैं उसकी चिंता करने का समय आ चुका है। यदि अब भी हम सतर्क और जिम्मेदार न हुए तो ये मान लेना ही सही रहेगा  कि हमने खुद अपने विनाश की शुरुवात कर दी है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 4 June 2022

कानपुर दंगा : विधानसभा चुनाव में हार की खीझ का परिणाम



ऐसे समय जब राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद कानपुर के समीप स्थित अपने गृहग्राम के प्रवास पर हों और प्रधानमन्त्री तथा मुख्यमंत्री भी उनके साथ थे , तभी कानपुर में सामप्रदायिक तनाव उत्पन्न हो गया जिसे दंगा कहना गलत न होगा |  एक भाजपा नेत्री की टिप्पणी के विरोध में बाजार बंद करवाने पर हुए  विवाद ने सांप्रदायिक तनाव का रूप ले लिया | और उसके बाद वही सब हुआ जो बीते कुछ महीनों में देश के अनेक हिस्सों में देखने मिला | उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घटना के बाद देर रात प्रशासन की  बैठक में  दंगाइयों के घरों पर बुलडोजर चलाने के निर्देश जारी कर दिए | उपद्रवियों की पहिचान की जा रही है लेकिन पत्थरबाजी करने वाले अनेक युवकों ने उससे बचने के लिए अपना चेहरा ढंक रखा था | इससे ये साफ़ हो जाता है कि दंगा आकस्मिक न होकर पूर्व नियोजित था | प्राप्त जानकारी के मुताबिक मुस्लिम बहुल क्षेत्र में  भाजपा नेत्री के बयान के विरोध में जब दुकानें बंद करवाने के लिए जबरदस्ती की गयी तब उससे  पैदा हुआ विवाद  सांप्रदायिक  दंगे में बदल गया | वैसे बात उतनी बड़ी थी नहीं जितनी बना दी गयी | ऐसा लगता है उ.प्र में योगी आदित्यनाथ के दोबारा मुख्यमंत्री बनने से उन मुल्ला – मौलवियों का दिमागी संतुलन बिगड़ गया है जो मानकर बैठे थे कि अखिलेश यादव की सरकार आने वाली है और उनके सुनहरे दिन लौट आयेंगे | विधानसभा चुनाव में  'बाबा तो गयो' का नारा भी खूब सुनाई देता रहा | दूसरी तरफ भाजपा ये कहते हुए वोट मांगती रही कि पांच वर्षीय योगी राज में एक भी दंगा नहीं हुआ और गुंडे – बदमाशों को पकड़कर सीखंचों के पीछे  भेज दिया गया | कुछ दुर्दांत अपराधी एनकाउन्टर में मारे भी गये | इस कारण अपराधों के लिये कुख्यात उ.प्र में  क़ानून व्यवस्था जिस चमत्कारिक ढंग से सुधरी उसने भाजपा को  विधानसभा चुनाव जिताने में बहुत  बड़ा योगदान दिया | हालाँकि  समाजवादी पार्टी ने भाजपा और विशेष रूप से योगी  आदित्यनाथ की कट्टर हिन्दू छवि को आधार बनाकर मुस्लिम  समुदाय का जबरदस्त ध्रुवीकरण अपने पक्ष में किया था | आम बातचीत तक में मुस्लिम मतदाता भाजपा को कोसते और अखिलेश की तारीफ में कसीदे पढ़ते सुने जा सकते थे | दरअसल किसान आन्दोलन के कारण पश्चिमी उ.प्र के जाट समुदाय के मन में भाजपा से नाराजगी के कारण लोकदल नेता जयंत चौधरी और अखिलेश यादव के बीच जो चुनावी गठबंधन हुआ उससे मुस्लिम समुदाय के ठेकेदारों को ये विश्वास हो गया कि योगी  सरकार चलाचली की बेला में है और इसीलिये वे खुलकर उसके विरोध में आ गये | लेकिन दांव उल्टा पड़ गया और न सिर्फ पश्चिमी अपितु उ.प्र के सभी हिस्सों में भाजपा को खासी सफलता  मिली | हालाँकि सपा के मत प्रतिशत और सीटों में काफी  वृद्धि भी हुई लेकिन ले - देकर सुविधाजनक बहुमत के साथ योगी सत्ता में लौट आये | इस कारण सपा तो खिसियाई है ही लेकिन मुस्लिम समुदाय की रहनुमाई करने वालों के पेट का मरोड़ रुकने का नाम नहीं ले रहा | इसी बीच वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद का प्रकरण गर्माने से मुस्लिम समुदाय की बेचैनी और बढ़ गई | जिस तरह से कानपूर के बेकनगंज थाने के यतीम बाजार इलाके में गत दिवस जुमे की  नमाज के बाद लौट रही भीड़ ने दुकानें बंद कराने के लिए उपद्रव शुरू करते हुए पत्थरबाजी की , उसे देखने के बाद ये कहना  गलत नहीं है कि एक भाजपा नेत्री द्वारा टीवी चैनल पर बहस के दौरान की गई टिप्पणी को बहाना बनाकर ये दंगा किया गया | मुस्लिम समुदाय इस बात को अच्छी तरह जानता था कि राष्ट्रपति , प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री कानपुर  से महज 50 किमी दूर हैं | ज़ाहिर है ऐसे अवसरों पर प्रशासन और पुलिस का ध्यान अति विशिष्ट हस्तियों की व्यवस्था पर लगा रहा होगा | इसीलिये अवसर का लाभ लेकर दंगे के हालात बना दिये गए | ध्यान देने योग्य है कि ज्ञानवापी मस्जिद विवाद अदालत में है  जिसे  लेकर दोनों समुदायों द्वारा ये आश्वासन दिया जा चुका है कि अदालत के फैसले को स्वीकार करेंगे | हाल ही में देश भर के उलेमाओं के देवबंद सम्मेलन में ही  ये तय किया गया था कि मुस्लिम समुदाय सड़कों पर उतरने से परहेज करेगा | यहाँ तक कि वाराणसी शहर तक में किसी भी प्रकार का विवाद देखने नहीं मिला |  काशी विश्वनाथ मंदिर तथा ज्ञानवापी मस्जिद दोनों जगह धार्मिक क्रियाकलाप  पूर्ववत जारी हैं | वाराणसी में सांप्रदायिक सौहाद्र भी बना हुआ है | ऐसे में देवबंद सम्मलेन में की गई अपील के बाद कानपुर में नमाज के बाद लौट रही  भीड़ जिस प्रकार हिंसा पर उतारू हुई, वह तात्कालिक प्रतिक्रिया न होकर सुनियोजित प्रतीत होती है | घटना के बाद जो जानकारी आ रही है उसके अनुसार इस दंगे की तैयारी बीते अनेक दिनों से हो रही थी | ऐसे में ये गुप्तचर एजेंसी की भी विफलता है | आम तौर पर जब राष्ट्पति या प्रधानमंत्री जैसी हस्तियाँ कहीं जाती है तो  ख़ुफ़िया तंत्र ये पता लगाता है कि उस दौरान किसी  अप्रिय घटना की आशंका तो नहीं है जिसकी वजह से उनकी सुरक्षा खतरे में पड़े | और यहाँ तो कानपुर के समीप  देश और प्रदेश की वे हस्तियाँ एक साथ उपस्थित थीं जिन्हें सर्वोच्च स्तर की सुरक्षा हासिल है | ऐसे में इस दंगे के पीछे  बड़ी साजिश के होने से इंकार नहीं किया जा सकता | मुस्लिम समुदाय के जिम्मेदार लोगों और मुल्ला – मौलवियों को सामने आकर इस दंगे की खुलकर आलोचना करते हुए कसूरवारों की पहिचान करने में प्रशासन की मदद करनी चाहिए । अन्यथा पूरी बिरादरी पर संदेह की सुई लटकती रहेगी | इस तरह की घटनाओं में सभी मुस्लिम शामिल भले न हों किन्तु करौली , खरगौन और जहांगीरपुरी के दंगों में पत्थरबाजी का एक जैसा तरीका बहुत कुछ कह जाता है | और वैसी ही पत्थरबाजी कानपुर में भी हुई | 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 3 June 2022

अलगाववाद की जड़ें खोदे बिना कश्मीर में चुनाव करवाना नुकसानदेह होगा



 कश्मीर घाटी से आ रही खबरें चिंता पैदा करने वाली हैं | बीते  कुछ दिनों में  जिस तरह से वहां कश्मीरी पंडितों की हत्याएँ हुईं उससे उनमें भय व्याप्त है | शासकीय कार्यालय के कर्मचारी के बाद एक शिक्षिका को जिस तरह गोली मारी गयी उससे   हिन्दुओं में दहशत  है | उल्लेखनीय है धारा 370 हटने के बाद से अनेक पंडित परिवार घाटी में लौट आये जिन्हें अस्थायी आवासों में रखा गया है | लेकिन अनेक ऐसे भी हैं जो या तो अपने घरों में रह रहे हैं या हाल ही में जम्मू क्षेत्र से आकर घाटी   में सरकारी नौकरी कर रहे हैं | आतंकवादियों को ये बात समझ आ चुकी है कि वे बड़ी वारदात को अंजाम शायद नहीं दे सकंगे इसीलिये अब उन्होंने नई शैली अपनाई | उनको इस बात की चिंता है कि यदि हालात सामान्य होते गए तब घाटी में रहने वाले मुस्लिम भी अलगाववाद के आकर्षण से मुक्त होकर आर्थिक विकास के बारे में सोचने लगेंगे | ये कहना गलत नहीं है कि धारा 370 हटने के बाद कश्मीर घाटी के भीतर पाकिस्तान समर्थक तत्वों का सफाया तेजी से हो रहा है | यही कारण है कि बड़ा धमाका  करना उनके लिए संभव नहीं हो पा रहा | इस वर्ष जिस बड़ी संख्या में पर्यटक कश्मीर घाटी पहुंचे उसकी वजह से वहां व्यवसायिक गतिविधियों में तेजी आई और आम कश्मीरी को  दो वर्ष बाद अच्छी – खासी कमाई होने से वह धारा 370 और राज्य की विशेष स्थिति जैसे मुद्दे भूलने लगा | अमरनाथ यात्रा का मौसम भी आ गया | अगस्त 2019 में इस यात्रा के चलते ही धारा 370 हटाये जाने का फैसला संसद में हुआ था और यात्रा बीच में ही रोक दी गई थी | उसके साल भर बाद तक  हालात सामान्य नहीं हो सके और फिर आ गया कोरोना | इस कारण पर्यटन पूरी तरह चौपट होकर रह गया था | इस साल घाटी में सैलानियों की आवक जिस तरह से बढ़ी उससे अलगाववादी काफी परेशान हैं | घाटी के लोगों को संतुष्ट देखकर भी उन्हें अपने भविष्य की चिंता होने लगी है | अमरनाथ यात्रा के लिए न सिर्फ देश भर में उत्साह है अपितु कश्मीर घाटी के लोग भी बेसब्री से उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं क्योंकि यात्रा मार्ग पर रहने वाले स्थानीय लोग यात्रियों से काफी कमाई कर लेते  हैं | इसके अलावा अमरनाथ आने वाले अधिकतर यात्री घाटी के अन्य पर्यटन स्थलों की सैर भी करते हैं जिससे  वहां के पर्यटन उद्योग को जबरदस्त सहारा  मिल जाता है | सच ये है कि अलगाववादी ताकतों के पास पहले  जैसा ढांचा तो नहीं रहा और न ही उतने हथियार तथा गोला बारूद |  विदेशों से आने वाले धन के रास्ते भी बंद कर दिए गये हैं | इसीलिये अब वे छोटी – छोटी वारदातों के जरिये अपने अस्तित्व का ऐलान करते रहते हैं | उन्हें ये लगता है कि कश्मीरी पंडितों के अलावा  हिन्दुओं के अन्य वर्गों को आतंकित करने से घाटी का जनसँख्या संतुलन मुस्लिमों के पक्ष में ही झुका रहेगा | स्मरणीय है निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन होने के बाद घाटी के नेता इस बात से चिंतित हैं कि जम्मू के हिन्दू बहुल इलाके की सीटें बढ़ गईं | उसके अलावा घाटी में कुछ सीटें आरक्षित कर दी गईं जिनमें गुर्जर  समुदाय का वर्चस्व है | इसी के साथ ही देश के विभाजन के समय कश्मीर घाटी में रह रहे जिन सफाई कर्मचारियों को राज्य का नागरिक न मानकर मताधिकार से वंचित कर दिया गया था ,  उन्हें और उनके परिजनों  को  सभी नागरिक सुविधाएं  और अधिकार दे दिए गए | इस वजह से  वे  पहली मर्तबा मत डालेंगे जिससे अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार के इर्द - गिर्द घूमती  राजनीति में नए समीकरण जन्म ले सकते हैं | ऐसे में अलगाववादियों का हताश होना स्वाभविक है | गत दिवस जिस बैंक अधिकारी की हत्या की गयी वह राजस्थान का रहने वाला था | इसके अलावा बिहार और पंजाब से आकर काम  कर रहे एक – एक मजदूर को भी मौत के घाट उतारकर ये एहसास करवाने का प्रयास किया गया कि घाटी में केवल मुस्लिम ही बर्दाश्त किये जायेंगे | दरअसल ये एक तरह की मनोवैज्ञानिक लड़ाई है | लेकिन ध्यान देने  योग्य बात ये है कि जिन दफ्तरों में हिन्दू कर्मचारी कार्यरत हैं वहां के मुस्लिम सहकर्मी भी ह्त्या जैसी घटना के बाद खामोशी धारण कर लेते हैं | ये प्रवृत्ति  घाटी के नेताओं की उस बात के सर्वथा विपरीत है कि पंडितों के बिना कश्मीर अधूरा है | हाल ही  में जो हत्याएं हुईं उन्हें यासीन मलिक को आजीवन कारावास दिए जाने की रोषपूर्ण प्रातिक्रिया भी माना जा रहा है | लेकिन घाटी में रहने वाले पंडित और अन्य हिन्दू जिस तरह घाटी छोड़ने पर आमादा हैं और हिन्दू शासकीय  कर्मचारी अपना तबादला जम्मू क्षेत्र में करने का दबाव बना रहे हैं उसकी वजह से अलगाववादियों का हौसला बढ़ रहा है | अनेक छोटे शहरों और कस्बों में हत्या जैसी  घटना न होने के बावजूद हिन्दू सामान लेकर जम्मू की  तरफ कूच करते देखे जा रहे हैं | उनको रोकने के लिए न फारुख अब्दुल्ला आये और न ही महबूबा मुफ्ती | घाटी में  भाजपा का प्रभाव भी कम है | उससे जुड़े कुछ पंचों और सरपंचों की जिस तरह से ह्त्या कर दी गई उससे बाकी  भी डरे  बैठे हैं | केंद्र सरकार स्थिति से निपटने के लिए जिस तरह लगातार उच्चस्तरीय बैठकें कर रही है उससे लगता  है जल्द ही आतंकवाद के विरुद्ध बड़ी कार्रवाई की जावेगी  | लेकिन उसके बाद भी  जब तक घाटी में हिन्दुओं के सुरक्षित रहने की अचूक  व्यवस्था नहीं  हो जाती तब तक कश्मीर विधानसभा के चुनाव करवाने में जल्दबाजी नहीं करना चाहिए क्योंकि वैसा होने पर कुछ  सीटों पर देश विरोधी तत्वों का जीतकर आना तय है  और तब वे अपनी संवैधानिक स्थिति का लाभ उठाकर अलगाववादियों को संरक्षण और सहायता देने में सक्षम हो जायेंगे | कश्मीर घाटी के मौजूदा हालात देश विरोधी ताकतों की हताशा का परिचायक हैं | केंद्र सरकार को चुनाव प्रक्रिया शुरू करने से पहले अलगाववादी  ताकतों के ताबूत  में आखिरी कील ठोकने का काम करना चाहिए क्योंकि उसके बिना घाटी में शांति नहीं आ सकेगी |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 2 June 2022

नेशनल हेराल्ड सौदा : नैतिक आधार पर तो गलत लगता है



कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके पुत्र राहुल गांधी को प्रवर्तन निदेशालय का समन मिलते ही राजनीति शुरू हो गयी | नेशनल हेराल्ड मामले में पूछताछ हेतु दोनों को बुलावा भेजा गया है | यह प्रकरण लम्बे समय से न्यायालय में  है | भाजपा नेता डा. सुब्रमण्यम स्वामी ने कांग्रेस के मुखपत्र रहे नेशनल हेराल्ड नामक अखबार की संचालक कंपनी के  अधिग्रहण में  कथित हेराफेरी के लिए जिनको आरोपी बनाया उनमें गांधी परिवार के करीबी पूर्व पत्रकार सुमन दुबे , संचार विशेषज्ञ सैम पित्रोदा , कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रहे स्व. मोतीलाल वोरा , पूर्व केन्द्रीय मंत्र ऑस्कर फर्नांडीज सहित सोनिया जी और राहुल भी हैं | आरोप ये है कि इन लोगों ने यंग इंडिया लिमिटेड नामक कम्पनी बनाकर नेशनल हेराल्ड  ( अंग्रेजी )  , नवजीवन ( हिन्दी ) और कौमी आवाज ( उर्दू )  अखबारों की मालिक एसोसिएटेड जर्नल लिमटेड को अधिग्रहीत कर लिया | ये अख़बार आजादी के पहले से कांग्रेस पार्टी द्वारा शुरू किये  गये थे | कांग्रेस नेतओं और कार्यकर्ताओं के पास इसके शेयर   भी थे | आजादी के बाद ये अखबार कांग्रेस के मुखपत्र बन गये | नेशनल हेराल्ड के मुख्य पृष्ठ पर सबसे ऊपर जवाहरलाल नेहरू द्वारा स्थापित वाक्य अंकित रहता था | हालांकि उक्त पत्रों का देश की पत्रकारिता में कोई खास योगदान नहीं रहा लेकिन कांग्रेस का  एकछत्र राज होने से इनके संस्करण अनेक राज्यों की राजधानियों से प्रकशित कर सरकारी जमींने  सस्ती दरों पर प्राप्त  की गईं जिन पर कालान्तर में बड़ी – बड़ी अट्टालिकाएं तानकर व्यवसायिक परिसर बना दिए गये |  कांग्रेस का वर्चस्व पूरे देश पर रहने तक उक्त अखबार सरकारी विज्ञापनों की खुराक पाकर घिसटते रहे लेकिन अंततः 90 करोड़ तक का घाटा हो जाने पर  2008 में उनको बंद कर दिया गया | बाद में यंग इण्डिया नामक कम्पनी ने 2016 में मात्र 50 लाख रु. में  एसोसियेटेड जर्नल लिमिटेड का अधिग्रहण करते हुए उस पर लदे कर्ज चुकाने की जिम्मेदारी भी ले ली | डा. स्वामी ने इसी बिंदु को पकड़कर आरोप लगाया कि कर्ज चुकाने के नाम पर  मात्र 50 लाख का भुगतान कर श्रीमती गांधी और राहुल के निकटस्थों की कम्पनी ने जिस कम्पनी का अधिग्रहण किया उसकी जो अचल संपत्तियां देश भर में फैली हुई हैं उनका बाजार मूल्य तकरीबन 2000 करोड़ रूपये है | इस तरह 50 लाख देकर अरबों की संपत्ति हासिल कर ली गयी | म.प्र की राजधानी भोपाल में भी उक्त अखबारों के स्वामित्व वाली इमारत महाराणा प्रताप नगर जैसे महंगे व्यवसायिक इलाके में स्थित है |  लखनऊ , दिल्ली और मुम्बई में नेशनल हेराल्ड की जो इमारतें हैं उनकी मौजूदा कीमत 2000 करोड़ से ज्यादा हो  तो आश्चर्य नहीं करना चाहिये | डा. स्वामी द्वारा इस मामले को अदालत में ले जाए हुए भी लम्बा समय बीत चुका है | कंपनी नियमों में हेराफेरी के साथ राजनीतिक दल के कोष का दुरूपयोग आदि आरोप इस मामले में हैं | उल्लेखनीय है कि यंग इंडिया लिमिटेड के 75 फीसदी शेयर  सोनिया जी  और राहुल के पास हैं | और तो और जिस 50 लाख के भुगतान से उक्त सौदा किया गया वह भी कम्पनी  ने कांग्रेस से इस आधार पर उधार लिए कि अख़बारों को फिर शुरू किया जाना है | ये भी गौरतलब है कि एसोसियेटेड जर्नल लिमिटेड को यंग इण्डिया लिमिटेड द्वारा अधिग्रहीत किये जाने के निर्णय पर देश के पूर्व  कानून मंत्री शांतिभूषण और सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश डा.मार्कंडेय काटजू ने भी ये कहते हुए आपत्ति जताई कि उनके पास भी उक्त कम्पनी के शेयर  हैं  जो उनके  पिता द्वारा खरीदे गए थे | उस आधार पर कम्पनी का सौदा किये जाते समय उन्हें भी बतौर अंशधारक सूचित किया जाना था किन्तु ऐसा नहीं किया गया | प्राप्त जानकारी के अनुसार ऐसे और भी अंशधारक देश  भर में होंगे जिन्हें इस सौदे का रत्ती भर भी भान नहीं है | कुल मिलाकर मामला आर्थिक गड़बड़ी का है | चूंकि ये न्यायालय में विचाराधीन है अतः इसके वैधानिक परिणाम के बारे में कुछ कहना गलत होगा |  लेकिन सोनिया जी और राहुल के 75 फीसदी शेयर  जिस कम्पनी में  हों उसे कांग्रेस के कोष से 50 लाख रु.  दिया जाना और पार्टी के कोषाध्यक्ष स्व. वोरा जी का इस कम्पनी में निदेशक बन जाना , सवाल खड़े करने के लिए पर्याप्त है | देश के पूर्व कानून मंत्री और सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश की आपतियां भी इस संदेह को बल देती हैं कि दाल में कुछ न कुछ काला तो है | कांग्रेस पार्टी यदि अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित समाचार पत्रों को पुनर्जीवित करने के लिए ये सब करती तब  उसे सामान्य प्रक्रिया मान  लिया जाता परन्तु श्रीमती गांधी और राहुल के वर्चस्व वाली गैर कारोबारी कम्पनी द्वारा कांग्रेस से धन  लेकर जो व्यवसायिक लेन - देन किया गया वह कानूनन कितना गलत है ये तो अदालत तय करेगी परन्तु नैतिकता और सार्वजनिक जीवन में जिस शुचिता की आवश्यकता  गांधी जी  बताकर गये उसके लिहाज से उक्त सौदा पूरी तरह गलत प्रतीत  होता है | क्योंकि इसके जरिये पार्टी के लिए शुरू किये गए समाचार पत्रों से जुड़ीं सम्पत्ति का तीन-चौथाई स्वामित्व गांधी पारिवार के दो सदस्यों के पास आ गया  | हालांकि 1938 में स्थापित एसोसियेटेड जर्नल लिमिटेड की बेशकीमती संपत्तियों के बारे में आम कांग्रेसजन के साथ ही जनता भी अनजान रही लेकिन डा. स्वामी द्वारा इस सौदे के साथ जुड़ीं  तमाम बातों को सार्वजनिक कर न सिर्फ गांधी परिवार अपितु कांग्रेस को भी कठघरे में ला खड़ा किया | कांग्रेस का ये कहना गलत नहीं है कि इसके एवज में भाजपा ने उन्हें राज्यसभा में मनोनीत किया  किन्तु इससे प्रकरण का कानूनी पक्ष प्रभावित नहीं होता | प्रवर्तन निदेशालय ने हाल ही में कांग्रेस के नए कोषाध्यक्ष पवन बंसल से भी पूछ्ताछ की थी | श्रीमती गांधी और राहुल को भी उसी सिलसिले में बुलाया गया है जिसे कांग्रेस पार्टी राजनीतिक बदला और  प्रताड़ना बताकर सरकार को घेर रही है | जाहिर है ऐसे मामलों में राजनीति होती है लेकिन जब कानूनी एजेंसी किसी को बुलाये तो उसके पास जाना हर नागरिक का दायित्व है | मामला प्रवर्तन निदेशालय के पास क्यों आया और जिसके पास हजारों प्रकरण लंबित हैं , जैसे सवाल कोई मायने नहीं रखते | यदि श्रीमती गांधी और राहुल को  ये भरोसा है कि उक्त सौदे में कुछ भी  अवैधानिक नहीं है तब उनको बिना डरे पूछ्ताछ हेतु जाना चाहिए | प्रधानमंत्री  बनने के पहले नरेंद्र मोदी भी तो केन्द्रीय जाँच एजेंसी के सामने घंटों बैठकर जवाब दे चुके हैं | 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 1 June 2022

राज्यसभा : केवल नाम के लिए उच्च सदन रह गई



ये बड़ा ही रोचक है कि आम चुनाव के जरिये बनने वाली लोकसभा को संसद का निम्न सदन और राज्यों के विधायकों के मतों से चुनी जाने वाली राज्यसभा उच्च सदन कहलाती है | जब भी बात संसद की होती  है तब पहले राज्यसभा और बाद में लोकसभा का उल्लेख होता है |  जहां तक शक्तियों का सवाल है तो किसी भी सरकार के लिए लोकसभा में बहुमत होना अनिवार्य है जबकि  राज्यसभा में अल्पमत  के बाद भी सरकार  सत्ता पक्ष की भूमिका में रहती है | यद्यपि  किसी भी विधेयक को पारित करने के लिए राज्यसभा की स्वीकृति भी जरूरी होती है और उस दृष्टि से सरकार में रहने वाली पार्टी उच्च सदन में भी बहुमत चाहती है और न होने पर निर्दलीय सदस्यों के अलावा छोटे दलों से समन्वय बनाकर काम निकालती है | प्रश्न ये है कि उच्च सदन क्यों बनाया गया है ? और इसका सीधा उत्तर है संसदीय प्रक्रिया में समाज के उस वर्ग को शामिल करने के लिए जो चुनाव की राजनीति या झंझट से दूर रहता है | इसमें राजनीति के अलावा , कला – संस्कृति , खेल , उद्योग – व्यवसाय , समाजसेवा    , विज्ञान  शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत प्रतिभाशाली और समर्पित लोग आते हैं | `राज्यसभा  सदस्य को मंत्रीपरिषद में भी शामिल किया जा सकता है | सबसे बड़ी खासियत ये है कि ये कभी भंग नहीं होती इसीलिये इसे स्थायी  सदन कहा जाता है | लोकसभा भंग रहने की स्थिति में कामचलाऊ सरकार राज्यसभा के  माध्यम से विधायी प्रक्रिया को जारी रखती है | इसके सदस्यों का कार्यकाल छह वर्षों का होता है | एक तिहाई सदस्य प्रति दो वर्ष में चुने जाते हैं | 12 सदस्यों का मनोनयन सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति करते हैं | इस का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि पूर्व प्रधानमन्त्री डा. मनमोहन सिंह हमेशा इसी सदन के सदस्य रहे | देश के अनेक दिग्गज राजनेता भी उच्च सदन के जरिये ही संसदीय प्रक्रिया से जुड़े | कई  राजनेता जो लोकसभा चुनाव हार जाते हैं उन्हें उनकी पार्टी राज्यसभा में ले आती है | इस प्रकार  उच्च सदन जनता द्वारा सीधे न चुने जाने के बाद भी महत्व रखता है | सार्वजानिक जीवन की अनेक विभूतियों को इसकी सदस्यता दी जाती रही है | आजादी के बाद के कुछ दशक तक तो इसकी गरिमा और गुणवत्ता कायम रही लेकिन अस्सी का दशक आते तक उच्च शब्द के साथ खिलवाड़ शुरू हुआ और ये सदन उन  नेताओं का आश्रयस्थल बनने लगा जो जनता का विश्वास अर्जित करने में विफल रहते हैं | हालाँकि चुनाव हार जाने वाले किसी नेता की उपयोगिता के मद्देनजर पार्टी उन्हें राज्यसभा में लाती है तो वह गलत नहीं लगता | लेकिन अनेक व्यक्ति  राजनीति में कोई भूमिका न होने के बावजूद अपने संपर्कों अथवा पैसे के दम पर उच्च सदन में जगह पा जाते हैं | निर्दलीय विधायकों के अलावा किसी दल के पास अतिरिक्त मतों के मोटे दाम लगते हैं | छोटे – छोटे क्षेत्रीय दल तो इस मामले में बदनाम हैं ही लेकिन राष्ट्रीय पार्टियां भी ऐसे अनेक लोगों को उपकृत करती हैं जिनके आने से उच्च सदन की छवि को धब्बा लगता है | विजय माल्या इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण था | शिवसेना भी एक सीट किसी न किसी ऐसे व्यक्ति को  देती रही है जो पार्टी से बाहर का होता है | प्रसिद्ध  उद्योगपति स्व. राहुल बजाज उनमें से एक थे | देश के अनेक दिग्गज अधिवक्ता भी राजनीतिक दलों के मुकदमे लड़ने के एवज में उच्च सदन की सदस्यता हासिल करते रहे हैं | कपिल सिब्बल इसका ताजा  उदाहरण हैं जिन्होंने कांग्रेस में दल न गलने के कारण समाजवादी पार्टी को पटाकर राज्यसभा में लौटने का इंतजाम कर लिया | इन दिनों राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव चल रहे हैं | जिसे लेकर एक बार फिर वही बातें सामने आ रही हैं जिनका शुरू में जिक्र किया गया है | कांग्रेस द्वारा जो उम्मीदवार घोषित किये गए उनकी जमकर आलोचना पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह हो रही है क्योंकि छत्तीसगढ़ और राजस्थान से जिन लोगों को प्रत्याशी बनाया वे सभी बाहरी हैं | इसके अलावा अनेक ऐसे प्रत्याशी है जिन्हें किसी और राज्य से लड़ाया जा रहा है जबकि वे अपने राज्य से चुने जा सकते हैं | महाराष्ट्र से इमरान प्रतापगढ़ी नामक उ.प्र के व्यक्ति  को कांग्रेस ने टिकिट  दी जबकि उस राज्य के मुकुल वासनिक को किसी और राज्य से | कोई पार्टी किसे उम्मीदवार बनाये ये उसका अधिकार है लेकिन कांग्रेस की टिकिटों को लेकर जिस तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं वे इस बात का द्योतक हैं कि उच्च सदन का स्तर किस तरह गिराया जा रहा है | भाजपा भी इस खेल में पीछे नहीं है | उसने भी महाराष्ट्र ,कर्नाटक और राजस्थान में  एक अत्तिरिक्त प्रत्याशी खडा कर कांग्रेस के लिए चिंता उत्पन्न कर दी है | इनमें सबसे ज्यादा चर्चा राजस्थान से लड़ रहे सुभाष चंद्रा की है जो ज़ी टीवी सहित अनेक बड़ी कंपनियों के मालिक हैं | 2016 में  वे हरियाणा से इसी तरह अतिरिक्त मत बटोरकर राज्यसभा में आ गये थे | उनकी उम्मीदवारी से कांग्रेस को चिंता हो गई है जिसने निर्दलीय और छोटी पार्टियों के विधायकों के समर्थन की उम्मीद पर अपना एक प्रत्याशी उतार दिया है | राजनीतिक दल तो व्हिप के जरिए अपने मतों को सहेजकर रखते हैं लेकिन निर्दलीय विधायक को अपनी तरफ खींचना आसान होने से धनकुबेर उम्मीदवार अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं | जबसे राजनीति में जातिगत समीकरण होने लगे हैं तबसे राज्यसभा में भी  इसकी झलक दिखाई देने लगी है | उस लिहाज से पूरे देश पर निगाह डालें तो जिन उम्मीदवारों को राजनीतिक पार्टियों ने राज्यसभा हेतु पेश किया है उनमें से ज्यादातर उनके अपने काम के तो हो सकते हैं किन्तु उच्च सदन की छवि और गरिमा की कसौटी पर  कमतर ही नजर आते हैं | और फिर जो सदस्य अतिरिक्त मतों को येन केन प्रकरण प्राप्त कर सांसदी  हथिया लेते हैं उनकी संसदीय प्रक्रिया में कम और अपने स्वार्थ साधने में ज्यादा रुचि रहती है | हालाँकि लोकसभा में भी अनेक ऐसे  सदस्य लहर के सहारे जीतकर आ जाते हैं जो कभी मुंह तक नहीं खोलते | लेकिन राज्यसभा में तो ऐसे सदस्यों की भरमार है जो  मिट्टी के माधो बने बैठे रहते हैं | यही वजह है कि उच्च सदन में बहस निम्नस्तर पर आती जा रही है | इसके लिए किसी एक पार्टी को जिम्मेदार ठहराए जाने की बजाय पूरे राजनीतिक समुदाय को कठघरे में खड़ा किया जा सकता है क्योंकि चाहे राष्ट्रीय दल हों या छोटी पार्टियां सभी ने उच्च सदन को मजाक बनाने में कसर नहीं छोड़ी है  |     
-रवीन्द्र वाजपेयी