Wednesday, 15 June 2022

अग्निपथ : बेरोजगारी दूर करने के साथ ही सेना को सक्षम बनाने में भी सहायक



 केंद्र सरकार ने अग्निपथ नामक नई योजना के जरिये भारतीय सेना के तीनों अंगों में चार वर्ष के लिए सेवा का जो ऐलान किया वह अपने ढंग का अनूठा निर्णय है | जैसा बताया गया है 21 वर्ष तक की आयु के युवक इसका लाभ ले सकेंगे | उन्हें सैन्य प्रशिक्षण देकर बाकायदा सैनिक के रूप में कार्य करने का अवसर मिलेगा | चार वर्ष के उपरान्त उनमें से 25 फीसदी को योग्यता और क्षमता के आधार पर स्थायी कर लिया जावेगा | जबकि बाकी को पूर्व सैनिक के तौर पर दूसरी नौकरी  करने का अधिकार रहेगा | सेवा निवृत्ति पर एकमुश्त राशि  भी दी जायेगी | प्रशिक्षण के दौरान  उनका जो कौशल विकास  होगा वह भविष्य में उनके लिए  सहायक साबित होगा | इन सैनिकों को अग्निवीर कहा जावेगा | इस योजना का उद्देश्य एक तो भारतीय सेना को सदैव युवाओं से परिपूर्ण बनाये रखना  है और दूसरा बेरोजगारी दूर करना | उल्लेखनीय है सेना में एक निश्चित अवधि के बाद सेवानिवृत्ति की  सुविधा होने से बड़ी संख्या में सैनिक और अधिकारी त्यागपत्र दे देते हैं | उन्हें पूरी  पेंशन और अन्य सुविधाएं भी मिलती हैं | अग्निपथ योजना का सबसे बड़ा लाभ ये होगा कि सेना में कभी भी जवानों की कमी नहीं रहेगी | वहीं  नौजवान सैनिकों की बड़ी संख्या मारक क्षमता बढ़ाने में भी सहायक साबित होगी | अमेरिका जैसे विकसित देश में पांच वर्ष की सैन्य सेवा अनिवार्य है | उसके पीछे की सोच यही है कि सेना में सैन्यबल की कभी भी कमी न हो | भारत की सेना विश्व की सबसे पेशेवर सेना मानी जाती है | चूंकि हमारी विशाल भौगोलिक सीमा चीन तथा पाकिस्तान जैसे शत्रु राष्ट्रों से घिरी  है इसलिए सैन्य बल की पर्याप्त संख्या आवश्यक है  | कुछ राज्यों और जातिगत समुदायों में तो सेना की सैन्य सेवा पुश्तैनी रूप से चली आ रही है | ऐसे में अग्निपथ नामक योजना से  रोजगार सृजन के काम  में निरंतरता बनी रहेगी | चूंकि प्रति चार वर्ष बाद भर्ती किये गए 75 फीसदी लोग निवृत्त हो जायेंगे इसलिये नए बेरोजगारों को अवसर मिलता रहेगा | जो नवयुवक लम्बे समय तक बतौर सैनिक काम  नहीं करना चाहते उनके लिये  ये सेवा बेरोजगारी से बचने का अच्छा अवसर है क्योंकि चार वर्ष बाद उन्हें किसी सरकारी अथवा निजी संस्थान की नौकरी प्राप्त करने में पूर्व सैनिक होने का लाभ भी मिल सकेगा | अनेक नौकरियों में तो पूर्व सैनिक का ही चयन किया जाता है | इसके अलावा प्रधानमन्त्री ने केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में रिक्त पड़े तकरीबन 10 लाख पदों को भरने के निर्देश दिए हैं | जाहिर तौर पर ये कदम 2024 के लोकसभा चुनाव की  तैयारी की तरफ इशारा करते हैं किन्तु बेरोजगारी जिस तरह से बढ़ती जा रही है उसे देखते हुए इनका स्वागत किया जाना चाहिए | यद्यपि विपक्ष ने 2 करोड़ रोजगार देने के वायदे का हवाला  देकर सरकार पर तंज भी कसा है | लेकिन मनरेगा के साथ ही रोजगार प्रदाता कोई भी योजना युवाओं के हित में ही  कही जावेगी | वैसे आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा सरकारी नौकरी को रोजगार का एकमात्र जरिया मानने के विरुद्ध है | आजादी के बाद  सरकार द्वारा दी जाने वाली नौकरियों का अपना आकर्षण था | लम्बे समय तक सेवा करने के  अवसर के साथ ही सेवा निवृत्ति के उपरान्त पेंशन का लालच था | केन्द्रीय सेवाओं में तो जीवन भर सीजीएचएस के जरिये निःशुल्क चिकित्सा की सुविधा भी है | हालाँकि अब पुरानी पेंशन योजना तो नहीं है लेकिन आज भी सरकारी नौकरी की चाहत अधिकतर नौजवानों में देखी जा सकती है | इसका कारण उसमें नौकरी की सुरक्षा के साथ ही नए वेतनमानों का लाभ है जो निजी संस्थानों में अपेक्षाकृत नहीं मिलता | लेकिन उससे भी बड़ी बात ये है कि सरकारी नौकरी में ऊपरी कमाई का अतिरिक्त आकर्षण है | हालाँकि बीते कुछ सालों में स्व - रोजगार के प्रति नौजवान पीढ़ी  अग्रसर हुई है | सूचना तकनीक के क्षेत्र में तो निजी  क्षेत्र  ही सबसे बड़ा  रोजगार का स्रोत है |  लेकिन उसके अलावा अन्य क्षेत्र उतना रोजगार नहीं दे सके | ऐसे में तकनीकी और पेशेवर शिक्षा प्राप्त अनेक युवा अकेले या समूह बनाकर अपना उद्यम संचालित करते हुए बजाय  रोजगार मांगने के रोजगार प्रदाता बन गये हैं | स्टार्ट अप प्रकल्पों की संख्या में वृद्धि इसका प्रमाण है | कोरोना काल और उसके बाद स्व -रोजगार का चलन जिस  तरह बढ़ा  वह अच्छा संकेत है किन्तु दूसरी तरफ ये भी सही है कि सरकारी नौकरियों के बिना  बेरोजगारी  दूर नहीं हो सकती | हालाँकि वेतन के बढ़ते हुए बोझ से से बचने के लिए सरकार उनमें कमी करते हुए संविदा का सहारा ले रही है | बहुत सी सेवाएँ तो उसने निजी क्षेत्रों को ही सौंप दी हैं जिसके   नुकसान और फायदे दोनों देखने मिल रहे हैं | लेकिन ये बात पूरी तरह सही है कि रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में भले ही निजी क्षेत्र की सेवाएँ ली जाएँ किन्तु जहाँ तक बात  सैन्य बल की है तो उसका निजीकरण नहीं हो सकता | सीमा पर लगातार तनाव बने रहने के कारण हमें अपनी सेना को सतर्क , सक्रिय और सक्षम बनाये रखना बहुत जरूरी है और उस दृष्टि से अग्निपथ एक महत्वपूर्ण कदम है | केंद्र सरकार के अन्य विभागों में जो रिक्त पद हैं उनके लिए भर्ती शुरू करने का ऐलान भी अच्छा संकेत है | नई पीढ़ी के आने से शासकीय कार्यप्रणाली में नयापन आयेगा जो समय की मांग है | रोजगार हमारे देश में चुनावी मुद्दा बनता रहा है | बिहार विधानसभा के पिछले चुनाव में तो राजद नेता तेजस्वी यादव ने इसी के बलबूते युवाओं का जबरदस्त  समर्थन बटोरा | लेकिन सरकारी नौकरियों के अलावा कौशल विकास पर जोर दिया जाना भी जरूरी है जिससे नौजवांन  अपने पैरों पर खडा होने का आत्मविश्वास अर्जित कर सकें  | अग्निपथ के जरिये केंद्र सरकार ने एक अवसर पेश किया है उन नौजवानों के लिए जो बिना कुछ किये निठल्ले घूमा करते हैं | यदि वे इस अवसर का लाभ नहीं उठाते  तब ये कहना गलत न होगा कि उनकी बेरोजगारी की असली वजह कामचोरी है |

-रवीन्द्र वाजपेयी



Tuesday, 14 June 2022

तेल के खेल में आम जनता का बजट फेल



भारत के कुछ राज्यों  में पेट्रोल और डीजल की  किल्लत के समाचार आ रहे हैं | एक पेट्रोलियम कंपनी द्वारा आपूर्ति कम किये जाने से उसके  पेट्रोल  पम्प बंद हो गए हैं | इसका दबाव अन्य कंपनियों पर भी पड़ने लगा है | जानकार सूत्रों के अनुसार आने वाले दिनों में पेट्रोल - डीजल की आपूर्ति में कमी आने की आशंका है | इसकी वजह से कुछ लोगों ने बिना जरूरत के इनकी खरीदी करना शुरू कर दिया है | इस संकट की वजह तेल कंपनियों के घाटे को बताया जा रहा है | लेकिन दबी जुबान ये भी चर्चा है कि भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा द्वारा मो. पैगम्बर के बारे में की गयी टिप्पणी के बाद तेल उत्पादक मुस्लिम देशों ने जिस प्रकार की प्रतिक्रियाएं दीं उससे भारत सरकार के कान खड़े हो गए | हालाँकि अभी तक उनमें से किसी  भी देश ने तेल आपूर्ति रोकने की बात नहीं की और न ही उसकी  संभावना ही नजर आ रही है | लेकिन रूस से सस्ते कच्चे तेल के सौदे की वजह से हो सकता है भारत सरकार ने अरब देशों  से मिलने वाले महंगे कच्चे तेल के आयात में कमी करने की पहल की हो | रूस से आयात किये गये कच्चे तेल को उपयोग लायक बनाने में समय लगने की वजह से भी आपूर्ति में कमी आ सकती है | बहरहाल सरकार ने ये आश्वस्त किया है कि देश में पेट्रोल – डीजल की कमी नहीं है | बावजूद इसके आशंकित लोग जमाखोरी में जुट गए हैं | लेकिन जहां तक घाटे का प्रश्न है तो तेल कम्पनियों का जो आय – व्ययक प्रकाशित होता है और समय – समय पर  उनकी ओर से अधिकृत आंकड़े आते हैं , उनसे तो यही बात उजागर होती है कि उनको भारी कमाई होने से उनके पास अपार नगदी उपलब्ध है और इसी के कारण वे सस्ता तेल मिलने पर तत्काल सौदा करने में सफल हो जाती हैं | वरना रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध के दौरान रूस से सस्ता तेल खरीदकर जमा करने की हिम्मत न पड़ती | तेल कम्पनियाँ बीच – बीच में ये भी प्रचारित करती हैं कि उनको अमुक अवधि में इतनी राशि  का मुनाफा हुआ | कोरोना काल में जब कच्चे तेल के दाम गिरे तब इन कम्पनियों ने अनाप – शनाप कमाई की किन्तु उसका लाभ उपभोक्ता को देने से इस आधार पर इंकार कर दिया कि पिछले घाटे की भरपाई की जा रही है | सही बात तो ये है इस बारे में असलियत सामने नहीं आती | ज्यादातार तेल कम्पनियाँ चूंकि सरकारी हैं इसलिए उनके क्रियाकलापों में सरकार का हस्तक्षेप भी प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष तरीके से रहता है | लेकिन उनके द्वारा दाम ऊंचे  रखे जाने की वजह से निजी क्षेत्र की तेल कंपनियों को भी जमकर  मुनाफाखोरी करने का अवसर मिल जाता है | बीच – बीच में सरकार पेट्रोल – डीजल की  कीमतों को पूरी तरह बाजार के भरोसे छोड़ देती है | उसके बाद उनकी कीमतें सोने – चांदी की तरह लगभग रोजाना ही कम या ज्यादा होने लगती हैं किन्तु ज्योंही चुनाव करीब आते हैं , दाम स्थिर कर दिए जाते  हैं | गत वर्ष दीपावाली के ठीक पहले प्रधानमत्री ने पेट्रोल – डीजल सस्ता कर दिया था क्योंकि पांच राज्यों की विधानसभा के चुनाव होने वाले थे | चुनाव संपन्न होते  ही स्थितियां पूर्ववत होने लगीं और दामों में वृद्धि होने लगी | लेकिन इस बीच जिस तेजी से दाम  रोजाना बढ़ना शुरू हुए उसकी वजह से महंगाई का हल्ला मचा | विपक्ष को भी केंद्र सरकार पर ये ताना कसने का अवसर मिला कि पेट्रोल –  डीजल के दाम बाजार द्वारा नियंत्रित होने की बात सरासर झूठ है क्योंकि सरकार जब चाहे दाम घटाकर वाहवाही लूट लेती है | लेकिन  कीमतों के रोजाना बढ़ते समय निर्विकार बनकर बैठ जाती है | पेट्रोल – डीजल की कमी होने से आपूर्ति का जो संकट है उससे लोग इस बात से आशंकित हैं कि इसकी वजह से जमाखोर तबका कालाबाजारी शुरू कर सकता है | इस बारे में जनता की अपेक्षा है कि कच्चे तेल के तिलिस्म को लेकर व्याप्त आनिश्चतता सरकार दूर करे |  इस बात का जवाब मिलना चाहिए कि सरकारी तेल कम्पनियां घाटे में क्यों हैं , जबकि k  निजी क्षेत्र की तेल कम्पनी जबरदस्त मुनाफे में हैं | ये मुद्दा इसलिए उछलता है क्योंकि कच्चा तेल तो सभी को एक जैसे दाम पर मिलता है |  ऐसे में सरकारी कम्पनियाँ कभी तो भारी कमाई का ढोल पीटती हैं और कभी घाटे का रोना लेकर बैठ  जाती हैं | सबसे बड़ी बात है पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले केंद्र  और राज्य के भारी  – भरकम कर | हाल ही में केंद्र सरकार ने उनमें थोड़ी कटौती की तो दाम भी धडाम से नीचे आ गये | लेकिन अभी भी इस बारे में और गुंजाईश है | बेहतर हो केंद्र और राज्य मिलकर पेट्रोल – डीजल के दाम और उनमें लगने वाले करों के पहाड़ को छोटा करें जिससे आम उपभोक्ता को  राहत  महसूस  हो | सरकार को ये ध्यान रखना चाहिए कि महंगाई के वैसे तो अनेक कारण हैं लेकिन पेट्रोल – डीजल की उनमें मुख्य भूमिका होती है | प्रधानमंत्री ,  गरीब कल्याण योजनाओं पर पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं | राज्य सरकारें भी खुद को जन हितैषी साबित करने के लिए खजाना लुटाने में संकोच नहीं करतीं किन्तु पेट्रोल – डीजल उनकी नजर में विलासिता की वस्तु है | जबकि ये भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर आम जनता के बजट पर असर डालती हैं | 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 13 June 2022

राष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री में तालमेल अच्छा लेकिन उसका इशारों पर नाचना ठीक नहीं



 2007 में राष्ट्रपति का चुनाव होने वाला था | प्रो .एपीजे कलाम को दोबारा चुने जाने की बात उठी तो भाजपा उसके लिए तैयार थी |  2002 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय ही चूंकि वे  इस पद के लिए चुने गए थे लिहाजा भाजपा को उनके दोबारा चुने जाने में ऐतराज न था | देश का जनमानस भी उनको पुनः राष्ट्रपति  देखना चाहता था क्योंकि राष्ट्रपति भवन में रहते हुए वे जनता के राष्ट्रपति के रूप में लोकप्रिय हो गये थे | बजाय उस भव्य प्रासाद में कैद रहने के वे पूरे देश में लोगों से मिलते रहे | विद्यार्थियों के  साथ वे जिस तरह घुलते – मिलते उसकी वजह से उनकी छवि एक भविष्यदृष्टा की बन गई थी | मिसाइल मैन के तौर पर पहिचान बना चुके डा. कलाम के राष्ट्रपति बन जाने से भारत की छवि  वैश्विक स्तर पर ऐसे  देश के तौर पर बनी जिसने एक वैज्ञानिक को अपने सर्वोच्च पद पर प्रतिष्ठित किया | और कलाम साहेब ने भी अपने चयन को सार्थक साबित करते हुए राष्ट्रपति पद की गरिमा में वृद्धि की | ऐसे में जब उनको एक कार्यकाल और देने का विचार राजनीतिक क्षेत्र में उठा तो उसकी  अच्छी प्रतिक्रिया हुई | भाजपा की रजामंदी के बाद सपा नेता मुलायम सिंह यादव और प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने उस अभियान को आगे बढ़ाते हुए आम सहमति बनाने का प्रयास किया | हालाँकि कांग्रेस ने उस प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया जिसके पीछे मुख्य वजह ये बताई जाती है कि 2004 में उनके कारण ही सोनिया गांधी प्रधानमन्त्री नहीं  बन सकीं | हालांकि इस बात के अधिकृत प्रमाण नहीं हैं लेकिन जिस तरह से कांग्रेस ने डा. कलाम को दूसरा कार्यकाल दिए जाने में टाँग अड़ाई , उसके पीछे और कोई कारण  दिखता भी नहीं था | उधर मुलायम सिंह और ममता ने अपनी मुहिम को आगे बढ़ाते हुए डा. कलाम की उम्मीदवारी का ऐलान करने हेतु पत्रकार वार्ता आमंत्रित कर डाली जिसमें  ममता तो पहुंच गईं लेकिन मुलायम सिंह नहीं आये और इस तरह वह कोशिश बीच रास्ते ही दम तोड़ बैठी | बाद में कांग्रेस ने प्रतिभा पाटिल का नाम आगे किया जो राष्ट्रपति बनीं लेकिन उनका कार्यकाल बेहद साधारण रहा | हालाँकि राष्ट्रपति पद पर दो अवसर  केवल प्रथम राष्ट्रपति डा.  राजेन्द्र प्रसाद को ही मिले और वह भी उनकी जिद के कारण | वरना तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू उसके विरुद्ध थे | उसके बाद से राष्ट्रपति को दोबारा अवसर नहीं देने की परम्परा सी बन गयी | लेकिन उससे भी ज्यादा जो बात उभरकर सामने आई वह ये कि राष्ट्रपति भवन में अन्य क्षेत्रों के प्रतिभावान लोगों को प्रतिष्ठित करने के प्रति राजनीतिक दलों की अरुचि | हालाँकि स्व. प्रणव मुख़र्जी कुछ अपवाद कहे जा सकते हैं लेकिन इस पद हेतु उनका चयन बौद्धिकता के बजाय उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि की वजह से किया गया | वर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का जहाँ तक सवाल है तो  इस पद हेतु उनका चयन चौंकाने वाला था | यद्यपि वे उस समय बिहार के राज्यपाल  थे और राज्यसभा में भी रहे किन्तु राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका बहुत ही सीमित रही | इसीलिए जब उनका नाम भाजपा ने तय किया तब प्रथम दृष्टया यही सुनने में आया कि नरेंद्र मोदी ने भी रबर स्टाम्प राष्ट्रपति की परम्परा को जारी रखा | हालाँकि श्री कोविंद ने राष्ट्रपति पद की गरिमा को गिरने तो नहीं दिया लेकिन वे राजेन्द्र बाबू , डा. राधाकृष्णन और डा. कलाम की श्रेणी में नहीं रखे जा सकते | अब जबकि उनका कार्यकाल समाप्त होने जा रहा है और उनके उत्तराधिकारी को लेकर अनुमानों तथा अटकलों का दौर शुरू हो गया है तब देश ये चाहता है कि जिस तरह प्रधानमंत्री श्री मोदी ने अपने व्यक्तित्व से समूचे विश्व में प्रशंसा हासिल की ठीक वैसी ही शख्सियत राष्ट्रपति भवन में विराजमान हो | भाजपा ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और अपने अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा को अन्य दलों से बात कर आम सहमति बनाने का दायित्व दिया है | दूसरी तरफ ममता बैनर्जी ने भी 15 जून को विपक्षी दलों की  बैठक आमंत्रित की है | लेकिन सीपीएम के सीताराम येचुरी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री शिवसेना प्रमुख की ओर से इस दावतनामे को स्वीकार नहीं किया गया | श्री येचुरी ने तो सुश्री बैनर्जी द्वारा इस तरह बैठक बुलाने पर ही ऐतराज कर दिया | कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी अस्पताल में हैं इसलिये उनकी प्रतिक्रया नहीं मिली किन्तु ऐसा लगता है राष्ट्रपति चुनाव को लेकर ममता की पहल इस बार भी अंजाम तक नहीं  पहुँच  सकेगी | इसकी एक वजह उनकी  प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा है वहीं दूसरी तरफ विपक्ष में आपसी तालमेल और विश्वास का अभाव है | ऐसे में कुछ मत कम होने के बावजूद भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए का राष्ट्रपति चुना जाना लगभग तय है | लेकिन बेहतर तो यही होगा कि संवैधानिक प्रमुख के पद पर दलीय सीमाओं में कैद किसी प्रभावहीन व्यक्ति को चुनने के बजाय आम सहमति से ऐसे व्यक्ति का चयन हो जिसका दृष्टिकोण राजनीतिक न होकर राष्ट्रीय हो | प्रधानमंत्री बनने के बाद श्री मोदी ने राजनीतिक सोच और कार्यप्रणाली में काफी सकारात्मक सुधार किये हैं | उसी कड़ी में अब उनको राष्ट्रपति पद की गरिमा में वृद्धि हेतु प्रयास करना चाहिए | देश में तमाम ऐसे व्यक्तित्व हैं जो राजनीति से अलग हटकर विभिन्न क्षेत्रों में जो काम कर रहे हैं उससे देश को फायदा मिल रहा है | भले ही राष्ट्रपति के पास प्रधानमंत्री जैसे शक्ति नहीं होती परन्तु उसकी नियुक्ति तो वही करता है | राष्ट्रपति भवन में बैठे व्यक्ति का प्रधनमंत्री से  तालमेल तो अच्छी बात है परन्तु  प्रधानमंत्री के इशारे पर उसका नाचना भी अपेक्षित नहीं है | उस दृष्टि से भाजपा से ये उम्मीद की जा सकती है कि वह चाल , चरित्र  और चेहरे  के अपने दावे के अनुरूप नए राष्ट्रपति के लिए ऐसा प्रत्याशी तय करे जिसे विपक्षी दल भी समर्थन देने बाध्य हो जाएँ | भारत का संविधान दुनिया का श्रेष्ठतम संविधान है , तो फिर  हमारा राष्ट्रपति  भी उसी के अनुरूप होना चाहिये |

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 11 June 2022

नमाज के बाद फसाद : ये कैसा इस्लाम



उ.प्र के कानपुर शहर में जुमे की नमाज से लौटे लोगों की भीड़ द्वारा किये गए दंगे की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि गत दिवस उ.प्र के प्रयागराज , सहारनपुर और मुरादाबाद आदि के अलावा झारखंड के रांची , और प. बंगाल के हावड़ा में भी नमाज से लौट रहे मुस्लिमों की भीड़ ने बेवजह पुलिस पर पत्थर फेंकने के साथ लूटपाट और आगजनी की | इसे सांप्रदायिक दंगा कहना गलत होगा क्योंकि जिन स्थानों पर भी नमाजियों ने फसाद के हालात उत्पन्न किये वहाँ अन्य धर्मावलम्बियों के साथ उनका किसी भी  प्रकार का विवाद नहीं हुआ | हालाँकि हावड़ा में भाजपा का कार्यालय भी जला दिया गया | पुलिस की मौजूदगी ज़ाहिर है एहतियातन ही थी | लेकिन जिस तरह से उसको निशाना बनाया गया उसका कारण समझ से परे है | भाजपा से निलंबित नूपुर शर्मा द्वारा की गयी  टिप्पणी के विरोध में मुस्लिम समुदाय को विरोध का पूरा अधिकार है | वैसे भी देश भर में अनेक स्थानों पर उनके विरुद्ध अपराधिक प्रकरण दर्ज हो चुके हैं | ऐसे में मुस्लिम समुदाय को चाहिए कि वह प्रतीक्षा करे | बजाय पुलिस पर पत्थर फेंकने , आग लगाने और लूटपाट के जरिये दहशत फैलाने वालों का बचाव करने के देश के मुल्ला – मौलवियों और मुस्लिमों के स्वयंभू नेता बने फिर रहे असदुद्दीन ओवैसी यदि आतंकवादी संगठन  अल कायदा द्वारा भारत में धमाके करने की धमकी  के विरुद्ध मुंह खोलते तब उन्हें साहसी कहा जाता | ध्यान देने लायक बात ये है कि जो बात नूपुर ने कही वह तो सोशल मीडिया पर न जाने कब से प्रसारित की जाती रही है |  लेकिन तब मुसलमानों का गुस्सा नहीं जागा और न ही बैरिस्टर ओवैसी को ध्यान रहा कि उसके विरुद्ध कानूनी कदम उठाये जाते | इसी के साथ ही यू ट्यूब पर अनेक मौलवियों और मुस्लिम वक्ताओं के सैकड़ों  वीडियो उपलब्ध हैं जिनमें हिन्दू देवी – देवताओं के अलावा उनके धार्मिक ग्रन्थों के बारे में अनर्गल बातें कही गईं हैं | लेकिन किसी भी हिन्दू ने तो उनके विरुद्ध हिंसा का सहारा नहीं   लिया | इस्लाम दुनिया के सबसे नए धर्मों में है | उसका इतिहास लगभग 1500 साल पुराना ही है लेकिन उसके धर्माचार्य ऐसा प्रचारित करते हैं मानों दुनिया शुरू ही इस्लाम के आने के बाद हुई हो | अपने धर्म की श्रेष्ठता का प्रचार और उसके उपदेशों का प्रसार पूरी तरह जायज है | दुनिया में जो भी अच्छा विचार है उसका प्रचार – प्रसार धर्म  और देश की सीमाओं से ऊपर उठकर होना चाहिए | लेकिन जिन बातों से वैमनस्य फैलता है उनका तिरस्कार किया जाना भी आवश्यक है | उस दृष्टि से इस्लाम के  मानने वालों को ये  ध्यान रखना होगा कि जिस तरह वे अपने धर्म और उसके महापुरुषों के प्रति आस्था रखते हैं ठीक वैसी ही अन्य धर्मावलम्बी भी | इसलिए जब उन्हें ये अपेक्षा रहती है कि उनकी धार्मिक आस्था के प्रति दूसरे सम्मान और सहिष्णुता का भाव रखें तो इसके एवज में उन्हें भी वैसी ही  सौजन्यता दिखानी होगी | भारत में रहने वाले आम और ख़ास दोनों वर्गों के मुस्लिमों को ये बात साफ़ तौर पर समझ लेनी चाहिए कि ये मोहम्मद गौरी , चंगेज खान और नादिर शाह का दौर नहीं है और न ही ये वह हिन्दुस्तान है जिसे  आतंक के बल पर एक बार फिर बाँटा जा सके  | बेहतर हो मुस्लिम समुदाय के मुल्ला – मौलवी अपनी कौम को बजाय  मरने – मारने   जैसी  बातों  के प्रति उकसाने के इस बात की समझाइश दें  कि नमाज के बाद हिंसा करना इबादत नहीं शरारत है जिसे  कोई समझदार व्यक्ति शायद ही पसंद करेगा | गत दिवस जुमे की नमाज के बाद प्रयागराज के अलावा उ.प्र के कुछ और शहरों सहित अन्य राज्यों में जो कुछ भी  मुसलमानों की भीड़ ने किया उसकी  यदि मुल्ला – मौलवी निंदा नहीं करते तो ये मान लेना गलत न होगा कि वह सब उनकी जानकारी और सहमति से  ही हो रहा है | लेकिन सबसे बड़ा सवाल  है कि ये सब करने से मुसलमानों को हासिल क्या हो रहा है ? उलटे उनके विरुद्ध समाज में नकारात्मक सोच बढ़ती ही जा रही है | मस्जिद से नमाज पढ़कर लौटते व्यक्ति का मन तो शुद्ध और तनावरहित होना चाहिए | लेकिन मस्जिद में जाते समय नमाजी और लौटते समय फसादी का रूप धारण कर लेने वाले मुसलमान कैसे भी हों लेकिन बतौर इंसान उन्हें बेहद घटिया दर्जे का कहा जावेगा | वैसे भी इस तरह की भीड़ में अधिकतर कबाड़ी , मिस्त्री और पंचर जोड़ने वाले तबके के ज्यादा होते हैं  जिनकी अशिक्षा का लाभ लेकर उन्हें बलवा करने के लिए प्रेरित किया जाता है | लेकिन मुस्लिम समाज में जो पढ़ा – लिखा और तथाकथित तरक्की पसंद तबका है , ऐसे फसादों पर उसके मौन रहने  से  ये शक होने लगता है कि इस समुदाय में गलत बात का विरोध करने का साहस किसी में नहीं बचा है | बीते कुछ महीनों में करौली , खरगौन , जहांगीर पुरी , कानपुर और उसके बाद गत दिवस नमाज के बाद विभिन्न शहरों में जिस तरह की घटनाएं हुईं वे किसी धारावाहिक की पटकथा का हिस्सा प्रतीत होती  हैं  | हिन्दुओं के  जुलूस निकलते समय हुए विवाद का दंगे में बदल जाना एक बारगी समझ भी आता है  किन्तु पहले कानपुर और फिर कल नमाज के बाद मस्जिद से निकली भीड़ ने जिस तरह का हिंसक व्यवहार किया वह सरासर आतंकवाद है जिसका उद्देश्य देश की सत्ता को चुनौती देना है | जरूरी हो गया है जब नमाज पढने वालों का रिकॉर्ड  मस्जिद में दर्ज किया  जावे जिससे पता चल सके कि वहां से बाहर निकले किन  लोगों ने दंगा फैलाने का आपराध किया | प. बंगाल और झारखंड में तो गैर भाजपा सरकारें हैं लेकिन उ.प्र की  योगी सरकार का दंगाइयों से निपटने का तरीका पूरी तरह जायज है क्योंकि मजहब के नाम पर अंधे लोगों को प्यार – मोहब्बत की भाषा समझ में नहीं आती | यदि आने वाले जुमे पर भी यही  रवैया रहा तो फिर  मस्जिदों में  नमाज पढने वालों का पंजीयन कर उन्हें पहिचान पत्र  दिया जाना अनिवार्य करना पड़ेगा | वरना पुलिस के साथ ही कानून का पालन करने वाले नागरिकों में निराशा और नाराजगी  बढ़ेगी | इसके पहले कि जुमे की नमाज या अन्य किसी अवसर पर संगठित  पत्थरबाजी , आगजनी , लूटपाट और पुलिस बल पर हमले नियमित गतिविधि का रूप ले लें ,  इस प्रवृति पर ही  बुलडोजर चलाना जरूरी है | कश्मीर घाटी में अंतिम सांस गिन रहा आतंकवाद देश के भीतरी हिस्सों में न फैलने पाए ये देखना आन्तरिक  सुरक्षा के लिए बेहद आवश्यक  है | जिन उपद्रवियों ने पुलिस के जवानों और अधिकारियों को घायल किया है उनको  हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया जाना चाहिये | दरअसल  दंगा महज एक अपराध नहीं अपितु मानसिकता है जिसे कड़ाई से कुचलना जरूरी है | धर्मनिरपेक्ष देश में शांति के साथ नमाज का अधिकार प्रत्येक मुसलमान को है लेकिन फसाद का किसी को भी नहीं |

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Friday, 10 June 2022

राष्ट्रपति चुनाव : नीतीश कर सकते हैं उलटफेर



 भारत के अगले राष्ट्रपति का चुनाव कार्यक्रम गत दिवस घोषित हो गया | इस हेतु 18 जुलाई को मतदान और 21 जुलाई को परिणाम घोषित होंगे | वर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का कार्यकाल  24 जुलाई को समाप्त होने वाला है | पिछली मर्तबा श्री कोविंद आसानी से चुन लिए गये थे | दलित होने के नाते उनको भाजपा के विरोधी दलों का समर्थन भी मिला था | लेकिन इस बार केंद्र में सत्तारूढ़ एनडीए के पास तकरीबन 10 हजार मत कम पड़ रहे हैं जिनकी भरपाई उड़ीसा के नवीन पटनायक और आंध्र के जगन मोहन रेड्डी से किये जाने की उम्मीद भाजपा कर रही है | चूंकि अभी तक उसने अपने उम्मीदवार के बारे में कोई संकेत नहीं दिया इसलिए अन्य दलों से समर्थन की सम्भावना स्पष्ट नहीं है किन्तु प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी  सहित गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा के शीर्ष नेताओं ने राष्ट्रपति चुनाव जीतने के लिए पांसे चलने शुरू कर दिए हैं | श्री मोदी और श्री पटनायक की हाल में हुई मुलाकात को इसी से जोड़कर देखा जा रहा है | देश के वर्तमान राजनीतिक माहौल में चूंकि भाजपा के विरुद्ध ममता बैनर्जी , स्टालिन , विजयन , चन्द्रशेखर राव , उद्धव ठाकरे और हेमंत सोरेन  जैसे विपक्षी मुख्यमंत्री सक्रिय हैं वहीं कांग्रेस किसी भी सूरत में भाजपा प्रत्याशी का समर्थन नहीं करेगी | राजस्थान और छत्तीसगढ़ में उसकी सरकार है जबकि महाराष्ट्र में वह शिवसेना और रांकपा तथा झारखंड में  गठबंधन सरकार का हिस्सा है | भाजपा की तरह ही विपक्ष  भी अभी तक राष्ट्रपति चुनाव के बारे में कोई नाम तय नहीं कर सका है |  जो गणित सामने आया है उसके अनुसार एनडीए के पास निर्वाचक मंडल के 49 और विपक्ष के पास 51 फीसदी मत है | हालांकि  विपक्ष में एकजुटता  और सामंजस्य का अभाव होने से भाजपा अपना उम्मीदवार जिताने के प्रति आश्वस्त तो है लेकिन उसके  सबसे प्रमुख सहयोगी जनता दल ( यू ) के तेवर देखते हुए  उलट – पुलट होने की आशंका भी है | कुछ समय पहले तक ये चर्चा थी कि बिहार के मुख्यमंत्री  नीतीश कुमार को भाजपा राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति बनाने की सोच रही है | लेकिन बीते कुछ महीनों से वे  जिस तरह से उसको परेशान कर रहे हैं उसकी वजह से  लगता है उस सम्भावना की भ्रूण हत्या हो गई है | नीतीश सरकार द्वारा जाति आधारित जनगणना का फैसला निश्चित तौर पर भाजपा को चिढाने वाला है | लालू यादव के परिवार के साथ उनके मेल – मुलाक़ात और सौजन्यता के आदान –प्रदान से भी ये अटकलें हवा में तैर रही हैं कि नीतीश एक बार फिर अपने पुराने साथी के साथ चले जायेंगे | हालाँकि अब तक  उनकी तरफ से कोई कदम नहीं उठाया गया किन्तु उनकी सियासत को जानने वाले ये अनुमान लगा रहे हैं कि वे भाजपा  को बड़ा झटका देने की तैयारी में हैं और उस दृष्टि से राष्ट्रपति चुनाव सबसे अच्छा अवसर हो सकता है | उल्लेखनीय है विपक्ष के पास देश के संवैधानिक प्रमुख हेतु सबसे वजनदार प्रत्याशी शरद पवार नजर आते हैं लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर वे हारने के लिए मैदान में नहीं उतरना चाहेंगे | ऐसे में नीतीश यदि भाजपा से नाता तोड़कर विपक्ष के साझा उम्मीदवार बनते हैं तब भाजपा की मुश्किलें और बढ़ जावेंगी क्योंकि अभी जो अंतर मामूली नजर आ रहा है वह और बड़ा हो जाएगा | यदि नीतीश इस चुनाव  में भाजपा के विरुद्ध उतर गए तब मुकाबला बेहद कडा होने के साथ ही रोचक हो जाएगा क्योंकि उनके भाजपा का साथ छोड़ते ही 2024 का विपक्षी गठबंधन आकार लेने लगेगा | हालाँकि उसमें प्रधानमंत्री पद को लेकर काफी खींचातानी है लेकिन राष्ट्रपति पद के लिए नीतीश कुमार विपक्ष के लिए मुंह माँगी मुराद साबित होंगे | उनके विपक्ष के साथ आने से बड़ी बात नहीं नवीन  पटनायक और जगन मोहन रेड्डी भी भाजपा को ठेंगा दिखा दें | हालाँकि फ़िलहाल इस बात पर यकीन कर पाना कठिन लगता है लेकिन नीतीश बेहद अनुभवी और चतुर राजनेता हैं | वे इस बात को अच्छी तरह जान  चुके हैं कि बिहार में अब उनके पास करने के लिए   कुछ बचा नहीं है और भाजपा जिस तरह अपने पैर वहां जमाती जा रही है उसके कारण अगला विधानसभा चुनाव उनके लिए मुश्किल भरा होगा | ऐसे में यदि वे विपक्ष के प्रत्याशी बनकर राष्ट्रपति चुनाव जीत  जाते हैं तो राष्ट्रपति भवन में बैठने के बाद भी वे राजनीति में प्रासंगिक बने रहेंगे क्योंकि केंद्र सरकार के लिए उनकी उपेक्षा करना  आसान नहीं होगा | 2014 में प्रधानमंत्री की कुर्सी हासिल न कर पाने का मलाल उनको अभी तक है | लेकिन  राजनीतिक मजबूरियों वश न चाहते हुए भी उनको श्री मोदी के साथ आना पड़ा जिनके कारण उन्होंने एनडीए छोड़ा था | लेकिन यदि उनको लगता है कि वे इस मुहिम में सफल नहीं होंगे तब वे श्री पवार को समर्थन देकर भाजपा को गच्चा देने का  दांव खेल सकते हैं | मौजूदा हालात में विपक्ष बुरी तरह से बिखरा हुआ एवं हताश है | कांग्रेस अपने अंतर्द्वंद में ही उलझी  हुई है | तीसरे मोर्चे के स्तम्भ रहे नेता धीरे – धीरे हाशिये पर चले गए | और फिर विपक्षी एकता में प्रधानमंत्री पद पाने की हसरत भी बाधा बन जाती है | परन्तु राष्ट्रपति के चुनाव में यदि नीतीश भाजपा को शह देने के लिए विपक्ष के साथ खड़े हो जाएँ तो श्री मोदी के सामने कठिन स्थिति बन जायेगी |   हालाँकि मोदी - शाह की जोड़ी भी नीतीश सहित विपक्ष की  किसी भी संभावित चाल पर पैनी नजर रख रही होगी  लेकिन  विपक्ष अपने छोटे – छोटे मतभेद  किनारे रख दे तो राष्ट्रपति  चुनाव के जरिये वह प्रधानमंत्री के लिए परेशानी पैदा करने में सफल हो जाएगा | ये सम्भावना किस हद तक वास्तविकता में बदलेगी ये कहना कठिन है क्योंकि जिस तरह श्री मोदी अपने विरोधियों को चौंकाने में सिद्धहस्त हैं ठीक वही गुण श्री पवार और नीतीश में भी है | ये देखते हुए आगामी कुछ सप्ताह राष्ट्रीय राजनीति में बेहद उथल - पुथल भरे होंगे | हालाँकि 1969  के राष्ट्रपति चुनाव में ही सबसे बड़ा धमाका हुआ  जब  इंदिरा गांधी ने कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी के विरुद्ध वीवी गिरि को उतारकर आत्मा की आवाज पर मत देने का आह्वान कर दिया था | श्री गिरि की विजय ने कांग्रेस के दो टुकड़े करवा दिए लेकिन इंदिरा जी राजनीतिक तौर पर शक्तिशाली नेता के तौर पर स्थापित हो गईं | एक बात और उल्लेखनीय है कि इक्का – दुक्का अवसरों को छोड़कर राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री से टकराव लेने की स्थिति उत्पन्न नहीं होने दी लेकिन फिर भी डा. राजेन्द्र प्रसाद के अलावा किसी और राष्ट्रपति को दूसरा कार्यकाल नहीं दिया गया | और वह भी क्योंकि राजेंद्र बाबू उसके लिए अड़ गये थे वरना पंडित नेहरु उन्हें नापसंद करने लगे थे | इसी तरह  डा.एपीजे कलाम को दोबारा राष्ट्रपति बनाने की मुहिम चली भी किन्तु कांग्रेस राजी नहीं हुई | उस दृष्टि से श्री कोविंद मोदी सरकार के  लिए काफी अनुकूल थे किन्तु उनको राष्ट्र्पति भवन में दूसरी पारी शायद ही नसीब हो |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 9 June 2022

जहाँ ताकत दिखाना चाहिए वहां तो दिखाती नहीं कांग्रेस



आम जनता को न तो ई. डी ( प्रवर्तन निदेशालय ) समझ आता है और न ही उसे नेशनल हेराल्ड मामले से कोई सरोकार है | दरअसल उसका ई. डी से कोई वास्ता नहीं पड़ता और दूसरी तरफ नेशनल हेराल्ड की संपत्ति में हुई कथित हेराफेरी भी  उसके संज्ञान में नहीं है | भाजपा के राज्यसभा सदस्य रहे डा. सुब्रमण्यम स्वामी की शिकायत पर ये मामला अदालत के विचाराधीन है | लेकिन हाल ही में ई.डी ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी दोनों को समन भेजकर पूछताछ हेतु बुलाया | श्रीमती गांधी तो कोरोना संक्रमित होने के कारण हाजिर नहीं हो सकीं वहीं राहुल ने विदेश में रहने के कारण 13 तारीख को पेश होने पर सहमति दी | लेकिन इसी के साथ ये समाचार भी आ गया कि श्री गांधी ई.डी के बुलावे पर अकेले नहीं जायेंगे | बल्कि कांग्रेस के समस्त सांसद एवं वरिष्ट नेता दिल्ली स्थित पार्टी मुख्यालय से ई.डी कार्यालय  तक रैली की शक्ल में जायेंगे | पार्टी सूत्रों के अनुसार ये रैली कांग्रेस का शक्ति प्रदर्शन होगी | पार्टी का कहना है कि केंद्र सरकार ई.डी  के जरिये उसके नेताओं को परेशान कर रही है | उसी के विरोध स्वरूप ये रैली निकाली जायेगी | इस रैली का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि इसके लिए पार्टी के सभी सांसदों और वरिष्ठ नेताओं को दिल्ली पहुँचने का निर्देश दिया गया है | लेकिन सवाल ये है कि पिछले दिनों जब कांग्रेस के कोषाध्यक्ष पवन बंसल से भी इसी प्रक्ररण में ई.डी द्वारा पूछताछ की गई थी तब कांग्रेस पार्टी को न ताकत दिखाने की याद रही और न ही उनके पक्ष में बयान जारी किये जाने की | श्री बंसल से ई.डी ने कब पूछताछ कर ली ये पता ही नहीं चला | लेकिन ज्योंही बात गांधी परिवार की आई त्योंही कांग्रेस को ताकत दिखाने का ध्यान आया | सवाल ये है कि अगर श्री गांधी 13 तारीख को साधारण तरीके से ई.डी के सामने पेश हो जाएँ तो क्या उससे कांग्रेस  की  कमजोरी जाहिर हो जायेगी ? और पार्टी मुख्यालय से ई.डी दफ्तर तक सांसदों और बड़े नेताओं की रैली निकालने से उसे ऐसा शक्तिवर्धक टॉनिक मिल जाएगा जो उसकी दुर्बलता को पलक झपकते ही दूर कर दे | पार्टी की मौजूदा हालत वाकई दयनीय है | संगठन के चुनाव लगातार टल रहे हैं | 2019 के  लोकसभा चुनाव में शर्मनाक प्रदर्शन के बाद राहुल गांधी ने नैतिकता के नाम पर  अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया | अनेक महीनों तक  मान  – मनौव्वल  के बाद भी जब वे पद पर बने रहने को राजी नहीं हुए तब पार्टी ने  सोनिया जी को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर गाड़ी खींचने का फैसला किया | वह एक तदर्थ व्यवस्था थी , नया अध्यक्ष चुने जाने तक | लेकिन जहां भाजपा और अन्य विपक्षी दल 2024 के आम चुनाव हेतु अपनी रणनीति बनाने में जुट गये  हैं तब कांग्रेस पूर्णकालिक अध्यक्ष से वंचित है | हाल ही  में उदयपुर में आयोजित नव संकल्प और चिंतन शिविर में परिवारवाद से परहेज किये जाने की बात उठी थी | और भी अनेक ऐसे फैसले लिए गए जिनसे लगा कि पार्टी अतीत में की गयी गलतियों को सुधारकर भविष्य में आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए कमर कसेगी | लेकिन उस शिविर के बाद ही सुनील जाखड़ , हार्दिक पटेल और कपिल सिब्बल ने कांग्रेस से नाता तोड़ लिया | राज्यसभा चुनाव के लिए जिस तरह के प्रत्याशियों का चयन पार्टी नेतृत्व ने किया उसकी चौतरफा आलोचना हुई | भाजपा के घोर विरोधी पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों तक ने ये  कहने में लेशमात्र संकोच नहीं किया कि कांग्रेस का भविष्य खतरे में है क्योंकि बजाय  सुधार करने के वह गलतियों को दोहराने पर आमादा है | उच्च सदन के लिए  प्रत्याशी चयन चूंकि गांधी परिवार द्वारा ही किया गया इसलिये वही सबके  निशाने पर आ गया | अनेक राज्यों में पार्टी विधायक पाला न बदल लें  इसलिए उनकी घेराबंदी की गयी है |  लेकिन इस सबके बीच जब पता लगाया गया कि श्री गांधी कहां हैं तब पता चला वे किसी आयोजन में गत माह लंदन गये थे | उनके साथ गए अन्य विपक्षी नेता तो कार्यक्रम के बाद देश आ गये लेकिन श्री गांधी लंबे समय तक वहीं रुके रहे | वैसे भी जब – जब देश में बड़ा  राजनीतिक घटनाक्रम होता है  तब आम तौर पर वे विदेश में ही होते हैं | जहां तक नेशनल हेराल्ड मामले में उनसे पूछताछ होनी है तो वह एक कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है | ई.डी उनसे पूछताछ करना चाह रही है तो उस दौरान पार्टी द्वारा रैली निकालकर शक्ति प्रदर्शन करने का क्या औचित्य है और इससे पार्टी या राहुल को कौन सी संजीवनी मिल जायेगी ये बड़ा सवाल है | यदि वे निर्दोष हैं तो ई.डी अथवा अदालत उन्हें जबरन तो दण्डित करेगी नहीं क्योंकि ये प्रकरण दस्तावेजी प्रमाणों पर आधारित है जिसमें सब कुछ खुला – खुला है और झूठी गवाही जैसी कोई आशंका भी नहीं है | बेहतर हो कांग्रेस अपनी ताकत वहां दिखाए जहां उसकी जरूरत है | गांधी परिवार के निजी मामलों में पार्टी के सांसद और अन्य नेताओं की रैली निकालने का उसका निर्णय परिवार - परिक्रमा से ज्यादा  कुछ  भी साबित नहीं होगा | उ.प्र में कुछ दिनों बाद ही  लोकसभा उपचुनाव होने वाले हैं जिनमें पार्टी ने प्रत्याशी नहीं उतारने का फैसला कर अपनी हताशा उजागर कर दी | जबकि  विधानसभा चुनाव में पार्टी की जो दुर्गति हुई उसके बाद जरूरत इस राज्य में ताकत दिखाने की है जहाँ से लोकसभा की 80 सीटें हैं | इस बारे में ये कहना गलत न होगा कि मोदी सरकार की तीखी ज़ुबानी आलोचना करने वाले राहुल ने बीते आठ साल में कांग्रेस की ओर से सरकार के विरोध में एक भी ऐसा प्रदर्शन दिल्ली में नहीं किया जिससे आम जनता को ये लगता कि वे  विपक्ष की भूमिका में अपने दायित्वबोध के प्रति सतर्क हैं  |  इसी उदासीनता का लाभ लेते हुए आम आदमी पार्टी उसके प्रभाव क्षेत्र पर कब्जा करने में सफल हो रही है | हिमाचल और गुजरात विधानसभा के आगामी चुनाव हेतु वह जिस तरह से मोर्चेबंदी कर रही है उससे कांग्रेस को सबसे ज्यादा नुकसान होना तय है | लेकिन इस सबसे बेखबर पार्टी में दरबारी संस्कृति के पैरोकार गांधी परिवार का महिमामंडन करने में ही जुटे रहते हैं | जी – 23  नामक समूह भले ही अपनी मुहिम में नाकामयाब रहा लेकिन उसने जो मुद्दे उठाये और प्रशांत किशोर ने भी पार्टी को दुबारा उभरने के लिये जो सुझाव दिए उनको नजरंदाज करते हुए पुराने ढर्रे को जारी रखने की गलती पार्टी को लगातार गर्त में ले जा रही  है | ऐसे में श्री गांधी के समर्थन में रैली निकालने से  पार्टी को कोई लाभ नहीं होने वाला |  

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 8 June 2022

मुस्लिम देशों से डरने की जरूरत नहीं : इजरायल की नीति अपनायें

 

इस्लाम के प्रवर्तक के बारे में की गयी टिप्पणी को मुद्दा बनाकर जिस तरह मुस्लिम देश अपना विरोध जता रहे हैं उस पर भारत  द्वारा दिया गया जवाब  इस बात का संकेत है कि हमारी विदेश नीति में दृढ़ता आई है | मुस्लिम सहयोग संगठन ( ओआईसी ) को प्रेषित उत्तर में जिस कड़ी भाषा का उपयोग किया गया वह भी अच्छा संकेत है | लेकिन देश के भीतर एक तबका ऐसा भी है जो मुस्लिम देशों की नाराजगी को बढ़ा – चढ़ाकर इस तरह पेश कर रहा है जैसे वे  हमें सूली पर चढ़ा देंगे | इसे मोदी सरकार की विदेश नीति की विफलता भी बताया जा रहा है | अनेक अरब देशों द्वारा भारतीय सामान की बिक्री रोके जाने के साथ ही भविष्य में कच्चे  तेल और गैस की आपूर्ति पर विपरीत असर पड़ने की आशंका भी जताई जा रही है | जिस भाजपा नेत्री और प्रवक्ता की टिप्पणियों के कारण ये हालात पैदा हुए उनकी पार्टी से छुट्टी किये जाने को मुस्लिम देशों के दबाव का परिणाम बताते हुए ये सवाल  उठाया  जा रहा है कि अब तक उसके विरुद्ध  कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की गई ? नूपुर शर्मा को मिल रही धमकी के मद्देनजर उन्हें दी गई सुरक्षा पर ऐतराज करने वाले भी कम नहीं हैं | कुछ मुस्लिम देशों ने सुश्री शर्मा पर कानूनी कार्रवाई किये जाने की मांग भी भारत सरकार से की है | अल कायदा  नामक दुनिया के सबसे  बड़े मुस्लिम आतंकवादी संगठन ने तो भारत के अनेक बड़े शहरों में धमाके करने की धमकी भी दे डाली है |  निश्चित तौर पर इस सबसे भारत सरकार पर दबाव बढ़ा होगा क्योंकि हिन्दूवादी छवि के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते आठ वर्ष में प्रमुख इस्लामिक देशों के साथ जिस तरह के निकट सम्बन्ध बनाये वे उनके  कूटनीतिक कौशल का प्रमाण बन गये थे | उन्हीं का परिणाम था कि बीते कुछ वर्षों से अरब देशों द्वारा पाकिस्तान की तुलना में भारत  को महत्व दिया जाने लगा | परन्तु मात्र एक बयान ने पूरी तस्वीर बदल दी | लेकिन इस स्थिति में भारत सरकार ने जिस धैर्य का प्रदर्शन अब तक किया वह काबिले गौर है | सबसे बड़ी बात ये है कि अचानक उत्पन्न इस परिस्थिति ने हमें मुस्लिम देशों के बारे में किसी भी प्रकार की खुशफहमी रखने के प्रति आगाह कर दिया है | एक महिला नेत्री के बयान पर अल कायदा द्वारा दी जा रही धमकी की आलोचना करने का साहस किसी भी मुस्लिम देश या मौलवी ने अब तक नहीं दिखाया क्योंकि इन्हीं देशों के पैसों से ही तो उस जैसे आतंकवादी संगठन पलते रहे | अमेरिका द्वारा पाकिस्तान में छिपे ओसामा बिन लादेन को मारने की कार्रवाई का तो मुस्लिम जगत ने जमकर विरोध किया लेकिन हजारों   निरपराधों को मौत के घाट उतारने के जिम्मेदार आतंकवादी को पनाह देने वाले पाकिस्तान के विरुद्ध एक बात भी नहीं कही | इससे साफ़ हो जाता है कि तेल संपदा से मालामाल होने के बावजूद ये इस्लामिक देश धार्मिक कट्टरता से बाहर नहीं आ सके हैं | ऐसे में इन पर पूरी तरह से भरोसा करते रहना खतरे से खाली नहीं है | इनके दोगलेपन का इससे बड़ा सबूत क्या होगा कि जो सऊदी अरब पूरी दुनिया में इस्लाम के प्रचार – प्रसार के लिए बेशुमार धन प्रदान करता है वह  उस अमेरिका का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है जिससे अधिकतर इस्लामिक देश नफरत करते हैं | ये कहना भी गलत न होगा  कि आज पश्चिम एशिया में जो भी अशांति है उसका सबसे बड़ा दोषी अमेरिका ही है | जो इजरायल मुस्लिम देशों को फूटी आँखों नहीं सुहाता वह अमेरिका द्वारा ही पालित – पोषित रहा | यही वजह है कि सऊदी अरब और सं अरब .अमीरात जैसे सम्पन्न मुस्लिम देश इजरायल के साथ  दोस्ती बढाने  में लगे हैं | ये इस बात का प्रमाण है कि मुस्लिम देश जितना गुर्राते हैं , उतना दम उनमें हैं नहीं । वरना अब तक इजरायल का अस्तित्व नजर नहीं आता | भारत के सामने वर्तमान में मुस्लिम देशों ने जिस तरह के दबाव की स्थिति बना दी है वह सतही  तौर पर तो चिंता का कारण लगती है लेकिन सही बात ये है कि उनमें से अधिकतर उसी तरह के आंतरिक दबाव से गुजर रहे हैं जिसका सामना भाजपा को करना पड़ा | बहरहाल प्रधानमंत्री  आपदा में भी अवसर तलाशने की खुद की सलाह पर अमल करते हुए वही रवैया अपनाएँ जो ऐसे संकट में इजरायल द्वारा उपयोग किया जाता है | भारत दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ ही सैन्य दृष्टि से भी काफी मजबूत है | ज्ञान – विज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में हमारी उपलब्धियां वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठा अर्जित कर रही हैं | ऐसे में महज एक  टिप्पणी पर राजनयिक रिश्तों को दांव पर लगा देने  वाले मुस्लिम देशों को ये एहसास करवाना भी देश के दूरगामी हित में होगा कि उनकी नाराजगी भारत जैसे बड़े देश को दबा नहीं सकती | इस मामले में रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध को लेकर अमेरिका  के दबाव के बावजूद  भारत द्वारा जिस तरह तटस्थता की नीति अपनाई गयी उससे हमारी विदेश  नीति की मजबूती सामने आई | किसी धर्म के विरुद्ध आपत्तिजनक बात कहने वाले का समर्थन करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है लेकिन धर्म के नाम पर आतंकवाद का सहारा लेने वालों को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए इजरायल की  नीति – रीति ही कारगर और अनुकरणीय है | 2014  के बाद से ही उसके साथ भारत के व्यापारिक , रक्षा , और कूटनीतिक समबन्धों में आश्चर्यजनक रूप से सुधार हुआ है | भारत  के सामने मुस्लिम देशों के विरोध का जो संकट आ खड़ा हुआ है वैसे इजरायल न जाने कितनी बार झेल चुका है | बेहतर तो यही होगा कि इस्लामिक देशों  की बंदर घुड़कियों से डरने के बजाय उनको साफ़ शब्दों में समझा दिया जावे कि वे पहले खुद धर्म निरपेक्षता सीखें और बाद में भारत को उपदेश  दें | जहां तक बात अल कायदा की है तो देश के मुस्लिम संगठनों को भी खुलकर उसके विरुद्ध आवाज उठाना चाहिए क्योंकि आतंकवादी हमला किसी धर्म विशेष पर न होकर देश पर होता है और उसमें मरने वाले मुसलमान भी  हो सकते हैं | कानपुर में दंगाइयों द्वारा मुस्लिमों की दुकानें जलाया जाना और कश्मीर में आतंकवादियों द्वारा मुस्लिमों की हत्या इसका प्रमाण है | बेहतर हो मुस्लिम राष्ट्रों के दबाव के विरुद्ध देश एक आवाज में बोले अन्यथा आज मुस्लिम देश दबा रहे हैं कल को कोई और आँखें दिखायेगा | 

- रवीन्द्र वाजपेयी