Thursday, 13 October 2022

बकरीद में बचे तो .... खड़गे को किससे खतरा



 2014 के लोकसभा चुनाव में 15 लाख रूपये वाली बात का स्पष्टीकरण देते हुए भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष अमित शाह ने कह दिया वह तो एक जुमला था | फिर क्या था विपक्ष उनके पीछे पड़ गया और मोदी सरकार को जुमला सरकार कहकर मजाक उड़ाया जाने लगा | राजनेताओं के मुंह से निकली अनेक बातें लम्बे समय तक उनका पीछा नहीं छोड़तीं | सोशल मीडिया के प्रादुर्भाव के बाद तो पलक झपकते कोई भी बात दूर - दूर तक फ़ैल जाती है | नेताओं के साथ ये मुसीबत भी है कि वे जहाँ जाते हैं पत्रकार उनसे सवाल पूछने लगते हैं | ऐसा ही गत दिवस भोपाल में कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव लड़ रहे मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ हुआ | चुनाव प्रचार हेतु कांग्रेस कार्यालय में प्रवास के दौरान पत्रकारों ने जब उनसे पूछा कि क्या अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी या वे प्रधानमंत्री पद हेतु कांग्रेस का चेहरा होंगे तो श्री खड़गे  ने उत्तर दिया कि बकरीद में बचेंगे तभी तो मोहर्रम में नाचेंगे | हालांकि ये कहावत बहुत प्रचलित नहीं है किन्तु इसके माध्यम से उस बकरे की पीड़ा व्यक्त की गई है जिसे बकरीद पर काटा जाने वाला हो | लेकिन उन्होंने इसका उपयोग जिस सन्दर्भ में किया उसका आश्य स्पष्ट न होने से उक्त टिप्पणी उनके लिए मुसीबत का सबब बन गई | सबसे पहले तो इस बात पर उनकी आलोचना शुरू हुई कि मुस्लिम समुदाय जिस मोहर्रम में मातम मनाता है उसमें श्री खड़गे नाचने की बात कह रहे हैं वहीं  कुछ आलोचकों का कहना है कि उन्होंने मुस्लिम धर्मावलम्बियों की भावनाओं का अपमान किया है | बवाल मचने के बाद हो सकता है वे किसी की भावनाओं को ठेस पहुंची हो तो खेद है , कहकर पिंड छुड़ा लें और साथ में खुद के गैर हिन्दी भाषी होने का रक्षा कवच धारण करें किन्तु उनकी टिप्पणी के राजनीतिक निहितार्थ निकाला जाना स्वाभाविक है | इस बारे में उल्लेखनीय है कि भले ही राहुल गांधी सफाई ने ये सफाई दी हो कि कांग्रेस का अगला अध्यक्ष लोकतान्त्रिक तरीके से चुना जायेगा और वह रिमोट कंट्रोल से नहीं चलेगा किन्तु कांग्रेसजन ही नहीं वरन राजनीति में जरा सी भी रूचि रखने वाला जानता है कि श्री खड़गे  गांधी परिवार के प्रायोजित प्रत्याशी हैं | और इसीलिये वे जहां भी जा रहे हैं उनको जबरदस्त समर्थन और स्वागत हासिल हो रहा है | जबकि उनके प्रतिद्वंदी शशि थरूर द्वारा बौद्धिकता पर ज्यादा जोर दिए जाने से  उनके तर्क और तथ्य अनसुने किये जा रहे हैं | यहाँ तक कि जी – 23 में उनके साथ शामिल असंतुष्ट कहे जा रहे नेता भी उनके साथ खुलकर आने में संकोच कर रहे हैं | स्मरणीय है कि अशोक गहलोत द्वारा गांधी परिवार की इच्छानुसार कांग्रेस अध्यक्ष बनने से बचने की बजाय रायता फैला दिए जाने के बाद दिग्विजय सिंह  भारत जोड़ो यात्रा छोड़कर अध्यक्ष का नामांकन भरने दिल्ली आये और उनके बुलावे पर म.प्र से उनके समर्थक दिल्ली में जमा भी हो गए थे | लेकिन रातों - रात बाजी पलट गयी | राजस्थान के राजनीतिक घटनाक्रम ने कांग्रेस आलाकमान को  जिस तरह चौंकाया उसके बाद अचानक से श्री सिंह को खिसकाकर श्री खड़गे  की ताजपोशी का इंतजाम किया गया | जिस नाटकीय ढंग से वह सब हुआ  उससे ये चर्चा भी चली कि सोनिया गांधी ने राहुल गांधी के प्रत्याशी को बदल दिया | ऐसा ही राजस्थान के बारे में भी सुनने मिला कि राहुल और प्रियंका वाड्रा की इच्छा के बावजूद श्रीमती गांधी ने सचिन पायलट को गद्दी पर बिठाने की बजाय श्री  गहलोत को खुल्ल्मखुल्ला बगावत के बावजूद अभय दान दे दिया | वास्तविकता जो भी हो लेकिन एक तरफ श्री गांधी का ये कहना कि अगला अध्यक्ष रिमोट से नहीं चलेगा किन्तु दूसरी तरफ श्री खड़गे  द्वारा बकरीद में बचे तो जैसी बात कहकर ये संकेत दे दिया कि उनके भविष्य पर भी आशंकाओं के बादल मंडरा रहे हैं | अर्थात अध्यक्ष चुने जाने के बावजूद उनकी गद्दी सुरक्षित रहेगी ये पक्का नहीं है | यद्यपि वे गांधी परिवार के प्रति वे अपनी असंदिघ्ध निष्ठा का प्रदर्शन करते नहीं थक रहे | उनके विरुद्ध लड़ रहे श्री थरूर जानते हैं कि उनका विरोध केवल सांकेतिक रह गया है | श्री खड़गे के साथ पर्याप्त बहुमत होने की बात स्वीकार करने के बाद भी वे अपनी प्रचार सामग्री हर मतदाता तक पहुँचाने में लगे हैं और पत्रकार वार्ता में उन सभी मुद्दों को विस्तार से रख रहे हैं जिन्हें जी  23 गुट के नेताओं द्वारा बीते दो सालों से उठाया जाता रहा है | सही बात ये है कि उसी के कारण कांग्रेस में अध्यक्ष का चुनाव करवाया जा रहा है जिसकी विशेषता ये है कि दोनों प्रत्याशियों में गांधी परिवार का सदस्य नहीं है | बावजूद इसके श्री खड़गे स्वतंत्र होकर निर्णय ले सकेंगे इसमें हर किसी को संदेह है और वह गलत भी नहीं है | उनके द्वारा भोपाल में जिस कहावत को उद्धृत किया गया वह भले ही गलती से उनके मुंह से निकली हो लेकिन उसके जरिये उनके मन में समाया डर भी सामने आ गया | वरना पत्रकारों के सवालों का जवाब वे ये कहते हुए भी दे सकते थे कि प्रधानमंत्री के चेहरे का निर्णय समय आने पर किया जावेगा | सही मायनों में कांग्रेस वर्तमान में जिस द्वन्द से गुजर रही है वह उसकी दिशाहीनता बढ़ा रहा है | अव्वल तो पार्टी अध्यक्ष का चुनाव भारत जोड़ो यात्रा के दौरान करवाने से ध्यान भटकने वाली बात हो रही है | दूसरी तरफ राजस्थान में जिस तरह से श्री गहलोत ने गांधी परिवार के प्रति निष्ठा दिखाने के बावजूद राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के लिए मुख्यमंत्री पद छोड़ने से इंकार किया उसके कारण भी पार्टी में गांधी परिवार की वजनदारी कम हुई है |  ऐसे में श्री खड़गे  द्वारा बकरीद में  बचे तो मोहर्रम में नाचेंगे जैसी टिप्पणी कर प्रथम परिवार के लिए भी परेशानी पैदा कर दी है क्योंकि इस बात का जवाब वे नहीं दे पा रहे कि आखिर  बकरीद पर बचे जैसी बात से उनका आशय क्या था और उन्हें किससे खतरा है ?

-रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 12 October 2022

सं.रा.संघ की हालत भारत के चुनाव आयोग जैसी हो गयी



रूस और यूक्रेन की जंग खतरनाक स्थिति में पहुँच रही है | 2014 में जब रूस ने यूक्रेन के क्रीमिया बंदरगाह पर बलात कब्ज़ा किया तब विश्व जनमत ने उसकी उपेक्षा की | इससे उसकी हिम्मत और बढ़ गयी | यूक्रेन के कुछ रूसी भाषी सीमावर्ती प्रान्तों में विद्रोही गतिविधियों को राष्ट्रपति पुतिन सैन्य मदद देकर अस्थिता फैलाते  रहे | उनके विस्तारवादी रवैये से आशंकित यूक्रेन ने अमेरिका के नेतृत्व वाले सैन्य संगठन नाटो में शामिल होने की पहल की जिससे रूस को लगा कि अमेरिका उसकी देहलीज पर आकर बैठ जाएगा | और इसी कारण उसने इस साल फरवरी में यूक्रेन पर ऐलानिया हमला कर दिया | बीते लगभग आठ माह में यूक्रेन में हजारों  नागरिक मारे जा चुके हैं जिनमें बच्चे और वृद्ध भी हैं | देश का बड़ा हिस्सा  मलबे में बदल चुका है | बिजली , सड़क , पेयजल , शिक्षा संस्थान  , अस्पताल  , परिवहन व्यवस्था  सभी रूस के हमलों में तबाही  के शिकार हो चुके हैं | लाखों  यूक्रेनी नागरिक पड़ोसी देशों में शरण लेने मजबूर हो गये | भारत के हजारों छात्र भी पढाई बीच में छोड़ घर लौट आये जिससे वहाँ के  हालात का अंदाज लगाया जा सकता है | यद्यपि शुरुआत में लगा था कि रूस की विशाल सैन्यशक्ति के सामने यूक्रेन दो – चार दिन में ही घुटने टेक देगा लेकिन उसके राष्ट्रपति जेलेंस्की ने जिस साहस का परिचय दिया वह अकल्पनीय है | युद्ध शुरू होते ही जब अमेरिका सहित उसके  समर्थक देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाकर आर्थिक नाकेबंदी की तब ये लगा था कि वह सीधे तौर पर यूक्रेन की तरफ से लड़ाई में कूद सकता है | लेकिन उसने यूक्रेन को आर्थिक और सामरिक सहायता देने का विकल्प चुना | इसी वजह से वह अभी तक रूस के सामने न सिर्फ डटा हुआ है अपितु उसके कब्जे में गये अनेक इलाके  दोबारा छीन लिए | दूसरी तरफ  रूस ने अपने कब्जे वाले चार सीमावर्ती प्रान्तों में अपनी सेना की मौजूदगी में फर्जी  जनमत संग्रह करवाकर उन्हें अपना हिस्सा बनाने का दांव चल दिया | जबकि ऐसा काम सं.रा.संघ के निरीक्षण में होना चाहिए था | दो दिन पहले यूक्रेन की राजधानी कीव पर दर्जनों मिसाइलें दागकर  पुतिन ने ये दर्शा दिया कि उनको न  विश्व जनमत की परवाह है और न  उनमें मानवता है |  जहां तक बात रूस की है तो आर्थिक प्रतिबंधों ने उसकी कमर भी तोड़ी है और इसीलिए घर में ही पुतिन को विरोध का सामना भी करना पड़ रहा है | लेकिन कच्चा तेल , गैस और गेंहू के विशाल भंडारों के कारण वे यूरोप के उन देशों को झुकाने में कामयाब हो रहे हैं जो इन चीजों के लिए रूस पर निर्भर रहे हैं  | सर्दियों की आहट के साथ ही समूचा यूरोप ऊर्जा संकट से जूझने मजबूर हो चला है जिससे बचने रूस से गैस का आयात अनिवार्य है | वैसे भी इस युद्ध के पीछे पुतिन की योजना यूरोप के साथ अपने व्यापार के लिए यूक्रेन की धरती और बंदरगाहों का उपयोग करने की मजबूरी खत्म करना है | क्रीमिया बंदरगाह पर बलपूर्वक कब्ज़ा उसकी बानगी थी | यदि उसी समय सं.रा.संघ और अमेरिका सहित दुनिया के अन्य ताकतवर देश उसके विरुद्ध खड़े होते तब शायद पुतिन   यूकेन पर आक्रमण की हिम्मत  न दिखाते | ये देखते हुए कहना गलत न होगा कि विश्व में शांति स्थापित करने के उद्देश्य से बना सं.रा.संघ अपनी उपयोगिता खो बैठा है | बीते महीनों में रूस के विरुद्द्ध सुरक्षा परिषद में जो भी प्रस्ताव आये वे वीटो कर दिए गए | भारत और चीन ने तो शुरुआत में ही रणनीतिक और आर्थिक मजबूरी के साथ ही वैश्विक शक्ति संतुलन की दृष्टि से तटस्थ रहने का निर्णय कर लिया था | कुछ समय बाद यूरोपीय देश भी रूस के साथ व्यापार जारी रखने मजबूर हो गए | वैसे भी  कोरोना के बाद आर्थिक गतिविधियाँ पटरी पर लौटने लगी थी | लेकिन इस युद्ध ने जबरदस्त नुकसान कर दिया | मौके का लाभ लेकर प. एशिया के तेल उत्पादक देश कच्चे तेल के दाम बढाते जा रहे हैं | भारत इसकी वजह से जबरदस्त नुकसान में है जहां अपनी जरूरत का 85 फीसदी कच्चा तेल आयात होता है | यूक्रेन से सूरजमुखी का आना बंद होने से खाद्य तेल के दाम आसमान छूने लगे हैं | सबसे बड़ी बात ये है कि जिस तरह पुतिन  परमाणु हमले की धमकी दे रहे हैं वह खतरनाक संकेत है | ऐसा वे दुनिया को महज डराने के लिए कर रहे हैं या वाकई वे उस हद तक जा सकते हैं , इसका अंदाज लगाना कठिन है क्योंकि उनके मन की थाह पाना किसी के लिए भी संभव नहीं है | लेकिन इस संकट का हल नहीं कर पाने में सं.रा.संघ की विफलता या यू नकारापन बेहद चिंताजनक है | रूस की देखा देखी चीन भी ताइवान को हथियाने के लिए हमलावर रुख दिखा रहा है | दरअसल  पुतिन और  जिनपिंग जैसे  राजनेता विश्व शान्ति के लिए हमेशा से खतरा बनते आये हैं | इनसे दुनिया को बचाने के लिए ही  सं.रा.संघ की स्थापना की गई थी | लेकिन सुरक्षा परिषद में  अमेरिका , रूस , ब्रिटेन , फ़्रांस के अलावा चीन  को वीटो का जो अधिकार दे दिया गया उसकी वजह से इन देशों को विश्व जनमत की उपेक्षा करने की छूट मिल गयी | यूक्रेन संकट में रूस जिस तरह से पूरी दुनिया को ठेंगे पर रखने का दुस्साहस कर रहा है उसके बाद सं.रा.संघ की भूमिका और भविष्य पर भी विचार करना जरूरी हो गया है | उसकी मौजूदा स्थिति तो भारत के चुनाव आयोग जैसी हो गई है जिसे सम्मान तो सब देते हैं लेकिन उसकी मानता कोई नहीं क्योंकि उसकी दशा बिना दांत और नाखूनों वाले शेर जैसी है |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 11 October 2022

श्री महाकाल लोक : आध्यात्मिकता और आधुनिकता का संगम



कुछ लोगों को यह धन का अपव्यय लगता होगा | लेकिन वाराणसी में विश्वनाथ कारीडोर के बाद म.प्र के उज्जैन में स्थित महाकाल मदिर के समूचे परिसर को सुविकसित कर जिस श्री महाकाल लोक का आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकार्पण कर रहे हैं उसके दीर्घकालिक लाभों से कोई भी समझदार व्यक्ति इंकार नहीं कर सकता | स्मरणीय है गुजरात में सरदार सरोवर बाँध के पास जब सरदार वल्लभभाई पटेल की विशाल प्रतिमा बनवाने का फैसला हुआ था तब उसे भी धन की बर्बादी बताकर उँगलियाँ उठाई गईं थीं | दुनिया की सबसे ऊंची इस मूर्ति के निर्माण की योजना मुख्यमंत्री  रहते हुए श्री  मोदी ने बनाई थी और उसका लोकार्पण प्रधानमंत्री बनकर किया | बीते कुछ सालों में ही उस स्थल पर रिकॉर्ड पर्यटक आ चुके हैं जिसके  कारण उस समूचे इलाके में आर्थिक विकास की गति त्तेज हो गयी | इसी तरह वाराणसी में विश्वनाथ कारीडोर परियोजना का अनेक स्थानीय लोगों ने भी विरोध किया | उनका कहना रहा कि उसकी वजह से काशी का मूल स्वरूप नष्ट हो जाएगा | लेकिन श्री मोदी ने अपने संसदीय क्षेत्र में गंगा घाटों के विकास से जो शुरुआत की उसका चरमोत्कर्ष विश्वनाथ परिसर के लोकार्पण के तौर पर जब सामने आया तो उसने विदेशों में रह रहे हिन्दुओं का ध्यान तो खींचा ही , गैर हिन्दुओं के मन में भी उत्सुकता जाग्रत की | हालाँकि वाराणसी सनातनी श्रद्धालुओं के साथ देशी – विदेशी पर्यटकों को हमेशा से आकर्षित करता रहा है | उसके  उपनगरीय क्षेत्र सारनाथ में दुनिया भर से बौद्ध धर्मावलम्बी आते हैं | उस दृष्टि से विश्वनाथ मंदिर और उसके निकटवर्ती क्षेत्र का कायाकल्प निश्चित तौर पर दूरंदेशी भरा फैसला था | उस प्रकल्प के पूर्ण हो जाने के बाद वाराणसी में आने वाले श्रृद्धालुओं की संख्या में जबरदस्त वृद्धि होना इसकी सार्थकता का प्रमाण है | इस वजह से वहां पर्यटन उद्योग के साथ ही व्यापार - व्यवसाय में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है | इस अनुभव के बाद उज्जैन स्थित ऐतिहासिक महाकाल मंदिर परिसर के साथ ही उससे जुड़े अन्य धार्मिक स्थलों का सुनियोजित विकास कर जिस श्री महाकाल लोक का निर्माण किया गया है वह निश्चित तौर पर वहां भी वाराणसी जैसा उत्साहजनक वातावरण उत्पन्न करने में सहायक होगा | स्मरणीय है उज्जैन सनातन धर्म का प्राचीनतम केंद्र रहा है | यहाँ 12 साल बाद  सिंहस्थ नामक कुम्भ मेला भरता है | भगवान श्रीकृष्ण ने इसी नगरी में सांदीपनि गुरु के आश्रम में शिक्षा ग्रहण की थी | वाराणसी , मथुरा और अयोध्या की तरह उज्जैन को भी विश्व की प्राचीनतम नगरियों में माना जाता है | भगवान शंकर यहाँ महाकाल के तौर पर प्रतिष्ठित हैं | इस ज्योतिर्लिंग के दर्शनार्थ प्रतिदिन हजारों लोग आते हैं | यहाँ की भस्म आरती का अनुभव तो बेहद विलक्षण होता है | उस दृष्टि से महाकाल मंदिर परिसर में स्थानाभाव के कारण लगातार बढ़ती जा रही श्रृद्धालुओं की संख्या के मद्देनजर व्यवस्था नहीं हो पा रही थी | इसके अलावा उपेक्षित पड़े अन्य धार्मिक स्थलों तक श्रृद्धालु नहीं जा पाते थे और जो जाते भी वे वहां की दुरावस्था देखकर दुखी होते थे |  श्री महाकाल लोक के लोकार्पण के बाद अब उज्जैन विश्व भर में वाराणसी की तरह ही आकर्षण का नया केंद्र बनेगा , ये उम्मीद गलत नहीं है | इस बारे में ये  भी शोचनीय है कि जिन धार्मिक केन्द्रों में रोजाना हजारों श्रृद्धालु आते हों  और विशेष अवसरों पर ये संख्या लाखों में चली जाती है उनमें समय के साथ सुविधाओं के विकास और सौन्दर्यीकरण पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया ? देश के जिन  प्रमुख धार्मिक स्थलों में यात्रियों अथवा पर्यटकों के लिए समुचित व्यवस्थाएं समय के साथ विकसित की गईं उनके प्रति आकर्षण भी बढ़ा है | इसके  साथ ही किसी भी धार्मिक या ऐतिहासिक स्थल पर आने वाले को  उसके इतिहास के बारे में पर्याप्त जानकारी भी  मिलनी चाहिए | विशेष रूप से विदेशी पर्यटकों के अलावा भी अनेक ऐसे लोग होते हैं जो धार्मिक आस्था के साथ ही उस स्थल के बारे में जो विस्तृत और प्रामाणिक जानकारी चाहते हैं वह  वहां लगे किसी सूचना फलक के सिवाय और कहीं नहीं मिलती | श्री महाकाल लोक के बारे में जो अधिकृत जानकारी आई है उसके अनुसार  समूचे परिसर में इस तीर्थ से जुड़ी ऐतिहासिक और पौराणिक जानकारी मूर्तियों , चित्रों  और साहित्य के रूप में आगंतुकों को सुलभ होगी | जो लोग धार्मिक आस्था न रखते हों वे भी उज्जैन की प्राचीनता के बारे में जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं | दुनिया भर में भारत की धार्मिक और आध्यात्मिक परम्पराओं पर शोध कार्य हो रहे हैं | ज्योतिर्लिंगों के अलावा देश में जितनी भी शक्ति पीठ हैं वे सब पूरी दुनिया को आकर्षित करती रही हैं | उस दृष्टि से उन्हें महज धार्मिक केंद्र तक सीमित न रखते हुए यदि पूरी तरह विकसित करते हुए उनके  इतिहास की विधिवत जानकारी का दस्तावेज आने वालों को मिल सके  तो  भारत में नये किस्म का पर्यटन विकसित किया जा सकता है | सबसे बड़ी बात ये है कि सनातन धर्म के जो  सबसे प्रमुख आस्था केंद्र हैं उनमें सामान्य स्तर की सुविधाएँ होने से वहां आने वाले श्रृद्धालु भी कटु अनुभव लेकर लौटते हैं | दुनिया के जितने भी विकसित देश हैं उन्होंने अपने धार्मिक स्थलों को बेहद खूबसूरत बनाकर दूसरे धर्मों में विश्वास रखने वालों को वहां आने प्रेरित किया है | उस लिहाज से वाराणसी और उज्जैन में क्रमशः विश्वनाथ कारीडोर  और श्री महाकाल परिसर का सौन्दर्यीकरण करते हुए बिखरे पड़े पौराणिक महत्त्व के स्थलों को एक ही इकाई के रूप में परिवर्तित करना सराहनीय है | बेशक ऐसे प्रकल्पों पर अरबों का खर्च  होता है लेकिन इसकी वजह से सम्बंधित स्थान पर आने वालों की संख्या बढ़ने से न सिर्फ होटल और टैक्सी व्यवसायी  अपितु स्थानीय दुकानदार भी अच्छी खासी कमाई करते हैं | इन्टरनेट के कारण आजकल पर्यटन स्थलों की जानकारी आसानी से दुनिया में कहीं  भी बैठे व्यक्ति को मिल जाती है |  ट्रेवलिंग एजेंसी का कारोबार भी इसीलिये बढ़ता  जा रहा है | लेकिन  पर्याप्त ध्यान नहीं दिए जाने से दक्षिण एशिया के छोटे - छोटे देशों से भी  कम पर्यटक हमारे  देश में आते हैं | सरदार पटेल की मूर्ति , विश्वनाथ कारीडोर और उसके बाद श्री महाकाल लोक जैसे स्थल नए भारत की तस्वीर पूरी दुनिया के सामने पेश करने में सहायक होंगे , इसमें शक नहीं है | म.प्र को इस वर्ष सबसे स्वच्छ प्रदेश होने के साथ पर्यटन हेतु भी राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार मिला है | श्री महाकाल लोक के लोकार्पण के बाद प्रदेश में आने वाले सैलानियों की संख्या में और वृद्धि होना अवश्याम्भावी है | केंद्र और राज्य दोनों की सरकारें इस उपलब्धि के लिए अभिनन्दन की हकदार हैं |

-रवीन्द्र वाजपेयी  

Monday, 10 October 2022

उ.प्र में कांग्रेस को अस्तित्वहीन कर गये मुलायम सिंह यादव



समाजवादी पार्टी के संस्थापक उ.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री और देश के पूर्व रक्षा मंत्री मुलायम सिंह यादव का आज लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया | नेता जी नाम से लोकप्रिय 82 वर्षीय स्व. यादव ने राजनीति में एक लम्बी पारी खेली | तीन बार मुख्यमंत्री और 7 बार सांसद बने मुलायम सिंह राजनीति के उन मैदानी खिलाड़ियों में थे जिन्होंने अपना वैचारिक सफर गैर कांग्रेसवाद के प्रवर्तक स्व. डा. राममनोहर लोहिया की रहनुमाई में शुरू किया था लेकिन उनके जीवन का उत्तरार्ध गैर भाजपा राजनीति की सोच के चलते बीता | वे  उन - बचे खुचे नेताओं में थे जिन्होंने लोहिया जी की लाल टोपी को जीवित रखा | यहीं नहीं तो संसद में धोती युग के भी वे गिने – चुने प्रतिनिधियों में थे | वे उ.प्र जैसे महत्वपूर्ण  राज्य के उन चंद नेताओं में थे जिन्होंने  शून्य से शिखर तक की यात्रा अपने बलबूते हासिल की | हालाँकि उनकी  समाजवादी पहिचान केवल लाल  टोपी तक सीमित रह गई थी | 1977 के  बाद केंद्र में बनी जनता पार्टी की सरकार जब अपने आंतरिक विग्रहों के कारण गिरी तो उसके सबसे बड़े कारणों में समाजवादी ही थे | दोहरी सदस्यता जैसा विवाद उठाकर स्व. मधु लिमये ने जो  भूल की उसने  कांग्रेस को तो पुनर्जीवित किया ही ,  स्व. इंदिरा गांधी  पर लगे आपातकाल रूपी दाग को भी धो डाला | उसके बाद 1989 में गैर कांग्रेसी एकता का प्रयोग विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के तौर पर हुआ जिसे भाजपा और वामपंथी दोनों बाहर से समर्थन दे रहे थे | लेकिन वह भी बीच रास्ते  दम तोड़ बैठा | उसके बाद उ.प्र की राजनीति में मुलायम सिंह एक नए अवतार में उभरे और वह था उनके मुस्लिम परस्त होने का जिसके कारण उन्हें मुल्ला मुलायम तक कहा जाने लगा | अयोध्या जा रहे  कारसेवकों पर गोलियां चलाने का पाप जीवन भर उनके साथ चिपका रहा | हालाँकि बाबरी ढांचे के गिरने के बाद हुए विधानसभा चुनाव में कांशीराम के साथ गठबंधन कर उन्होंने हिन्दू ध्रुवीकरण को नाकाम कर दिया लेकिन बसपा के साथ  उनकी दोस्ती ज्यादा नहीं चली और कांशीराम की उत्तराधिकारी  मायावती के साथ गेस्ट हाउस कांड के बाद तो दोनों जानी दुश्मन जैसे होकर रह गये | हालाँकि 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा – बसपा फिर एक साथ आये परन्तु  तब तक मुलायम सिंह की स्थिति दयनीय हो चुकी थी |  2012 में भाई शिवपाल और अनुयायी आज़म खान की उपेक्षा कर उन्होंने अखिलेश को राजगद्दी पर बिठाने का जो निर्णय लिया उससे परिवार और पार्टी दोनों बिखराव का शिकार होकर रह गये | पिछले लोकसभा चुनाव में शारीरिक तौर पर अशक्त हो चुके नेताजी के लिए तब शर्मनाक स्थिति उत्पन्न हो गई जब मैनपुरी सीट पर  प्रचार हेतु मायावती उनके साथ मंच पर आकर बैठीं और भाषण दिया | लेकिन जिस तरह स्व. जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन की कृपा से बिहार में उभरे लालू प्रसाद ने समाजवाद के नाम पर परिवारवाद को ताकतवर बनाया वही मुलायम सिंह ने उ.प्र में किया और उससे भी बड़ी बात ये कि डा. लोहिया की माला जपने वाले इन दोनों नेताओं ने समूची राजनीति जातिवाद को बढ़ावा देकर की | उसके लिए वे मुस्लिम तुष्टीकरण करने में भी  नहीं शरमाये जिसकी वजह से एम – वाई ( मुसलिम -  यादव ) नामक नया समीकरण पैदा हो गया | संयोग से उ.प्र सर्वाधिक लोकसभा सदस्यों के कारण राष्ट्रीय राजनीति में विशेष वजनदारी रखता है इसीलिये  चौध्र्री चरण सिंह , विश्वनाथ प्रताप सिंह तथा चंद्रशेखर की तरह मुलायम सिंह ने भी प्रधानमंत्री बनने के लिए काफी हाथ पाँव चलाये लेकिन उसमें वे विफल रहे  | उनकी सबसे बड़ी  विशेषता ये थी कि राजनीतिक लाभ के लिए किसी भी हद तक चले जाते थे | अखिलेश ने उन्हें न सिर्फ भाइयों  अपितु करीबी दोस्तों से भी दूर कर दिया था | शिवापाल के अलावा अमर सिंह . बेनीप्रसाद वर्मा और आज़म खान तक नेताजी से छिटकते गये | एक ज़माना था जब उनके पुश्तैनी  कस्बे सैफई का जलवा लखनऊ से ज्यादा था | ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि गांधी परिवार का गढ़ बने रहे रायबरेली और अमेठी में सैफई की तुलना में 10 फीसदी काम भी नहीं हुआ | सैफई महोत्सव में अमिताभ बच्चन और सलमान खान जैसे फ़िल्मी सितारे अमरसिंह के जरिये ही आया करते थे | अनिल अम्बानी जैसा घोर पूंजीपति सपा से राज्यसभा सदस्य बना  | जया बच्चन को राज्यसभा में भेजते रहना अमर  और मुलायम की जोड़ी का करिश्मा  था | सहारा समूह के संस्थापक सुब्रतो राय के साथ भी समाजवादी मुलायम की दांत काटी रोटी थी | कुश्ती के शौक़ीन मुलायम सिंह ने राजनीति के अखाड़े में हर उस दांव को आजमाया जो सत्ता तक पहुंचा सके | लेकिन इसी के चलते वे अपना मूल स्वरूप खो बैठे और समाजवादी पार्टी एक पारिवारिक कम्पनी में बदल गई | नतीजा भी वैसा ही हुआ और उनके जीवन के अंतिम दौर में शिवपाल ने अलग दल बना लिया | दूसरी पत्नी के पहले पति से पैदा हुए बेटे की पत्नी भाजपा में आ गई | यहाँ तक कि नेता जी के मजबूत गढ़  आजमगढ़ और रामपुर में भी उनकी पार्टी हार गयी | बावजूद इस सबके मुलायम सिंह  उ.प्र और  राष्ट्रीय राजनीति में लम्बे समय मजबूती के साथ जमे रहे तो उसकी वजह उनका बेहद व्यवहारिक होना था जिसके कारण वे अवसर का लाभ उठा लेते थे | अटल जी के प्रधानमंत्री रहते प्रोफेसर अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति बनाए जाने की पहल  करने वाले मुलायम सिंह दोबारा जब उनका नाम उछला तो  पलटी मार गए क्योंकि सोनिया गांधी किसी भी सूरत में उनको नहीं चाहती थी | कुल मिलाकर मुलायम सिंह विविधता और अनिश्चितताओं से भरे ऐसे व्यक्तित्व थे जो केवल और केवल राजनीति करते थे | इससे इतर सोचना उनके स्वभाव मे नहीं था | 2012 तक अपनी पार्टी के वे निर्विवाद नेता रहे लेकिन अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाये जाने के  बाद धीरे – धीरे वे हाशिये पर धकेले जाने लगे थे | बीते तकरीबन दो साल से उनकी चर्चा केवल उनके स्वास्थ्य समाचारों के कारण होती रही |  उनके न रहने से उ.प्र की राजनीति में निश्चित रूप से खालीपन आएगा | सबसे बड़ी बात अखिलेश और शिवपाल के बीच तलवारें खिंचना तय  है | भले ही 1977 के बाद से वे कांग्रेस के प्रति पहले जैसे कठोर नहीं रहे लेकिन उनको इस बात का श्रेय तो दिया ही जा सकता है कि उन्होंने  मुस्लिम वोट बैंक को अपने पाले में खींचकर कांग्रेस को उ.प्र में पूरी तरह अस्तित्वहीन कर दिया , अन्यथा इस राज्य में भाजपा इतनी मजबूत न हो पाती |

विनम्र श्रद्धांजलि |

-रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 8 October 2022

आर्थिक मंदी : चिंता की बजाय चिंतन से निकलेगा रास्ता



अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष सहित विश्व के अनेक वित्तीय संस्थानों द्वारा इस बात की पुष्टि कर दी गयी है कि वैश्विक स्तर पर आर्थिक मंदी का आगमन हो चुका  है और ये दौर 2008 की  मंदी से ज्यादा व्यापक और भयावह होगा | जो आंकड़े मुद्रा कोष ने अनुमानित किये हैं उनके अनुसार दुनिया भर में मांग घटने से उत्पादन में जो कमी आगामी सालों में आने वाली है वह तकरीबन 4 लाख करोड़ अमेरिकी डालर की होगी जो जर्मनी की कुल अर्थव्यवस्था के बराबर है | अमेरिका में तो विकास दर नकारात्मक होने के संकेत आने लगे हैं | कोरोना संकट के बाद से अब तक चीन की अर्थव्यवस्था संभल नहीं सकी है | ब्रिटेन में भी आर्थिक ढांचा गड़बड़ा रहा है | ऐसे में भारत इस स्थिति से अछूता रहेगा ये मान लेना अपने आपको धोखा देना होगा | लेकिन हमारे देश में राजनेताओं , अर्थशास्त्रियों और कुंठा का शिकार हो चुके कतिपय पत्रकारों द्वारा जिस  तरह का  निराशाजनक वातावरण बनाया जा रहा है वह देशहित में नहीं है | हालाँकि बीते कुछ समय से हमारे निर्यात में आई कमी से डालर के दाम लगातार बढ़ते जा रहे हैं | 82 रु. से ज्यादा उसका विनिमय मूल्य निश्चित रूप से परेशानी  पैदा करने वाला है | उसकी वजह से विदेशी मुद्रा का जो भंडार लबालब था उसमें भी उल्लेखनीय गिरावट आई है | अमेरिका में बैंकों द्वारा जमा पर ब्याज दरें बढ़ा दिए जाने से भी विदेशी निवेश भारतीय पूंजी बाजार से निकल रहा है | हालाँकि दुनिया भर के  शेयर बाजार जिस तरह से लड़खड़ा रहे हैं उनकी तुलना में हमारी स्थिति बेहतर है | सबसे अच्छी बात ये  देखने में आ रही है कि बैंकिंग क्षेत्र बहुत ही अच्छा प्रदर्शन कर रहा है | कोरोना संकट के बाद उत्पन्न हालातों में अर्थव्यवस्था सुस्त हो चली थी किन्तु जैसे ही हालात सामान्य हुए उसने तेजी से वापसी की | इसका सबसे बड़ा सबूत जीएसटी के संग्रह में प्रति माह हो रही वृद्धि है | औद्योगिक उत्पादन का सूचकांक भी सुधार के संकेत दे रहा है | उपभोक्ता बाजार में मांग भी लगातार ऊपर जा रही है | ऑटोमोबाइल और हाऊसिंग सेक्टर तो कोरोना पूर्व की स्थिति से बेहतर हालत में आ गये हैं | इलेक्ट्रानिक वाहनों के उत्पादन और बिक्री में जिस तरह से तेजी हो रही है वह अर्थव्यस्था में आ रहे क्रांतिकारी बदलाव की ओर इशारा करती है | हालाँकि रूपये का मूल्य गिरते जाने से कच्चे तेल के आयात का खर्च बढ़ता जा रहा है लेकिन इलेक्ट्रानिक वाहनों का उत्पादन यदि इसी तरह बढ़ा तो आने वाले वर्षों में कच्चे तेल का आयात घटाने की जिस  कार्ययोजना पर परिवहन मंत्री नितिन गडकरी कार्य कर रहे हैं वह फलीभूत हो सकती है | बहरहाल इस बारे में जो बात  सबसे ज्यादा विचारणीय है वह है अर्थव्यवस्था को लेकर नकारात्मक  वातावरण  बनाने से बचना | जिस तरह  किसी चीज के अभाव का प्रचार होते ही व्यापारी और ग्राहक दोनों जमाखोरी करने लगते हैं वैसी ही स्थिति आर्थिक संकट का ढिंढोरा पीटने पर बनती है | भारत के बारे में दुनिया के लगभग सभी वित्तीय संस्थान  रहे हैं कि वैश्विक मंदी से वह आसानी से निपटने में सक्षम है और इसके पीछे सबसे बड़ा  कारण आम भारतीय की  संयमित जीवनशैली है | भले ही जमा पर ब्याज दरें पूर्वापेक्षा बहुत कम हो चुकी हैं लेकिन उसके बाद भी आम भारतीय बचत के संस्कारों को नहीं भूला और यही हमारी  सबसे बड़ी शक्ति है | लेकिन एक वर्ग ऐसा है जो अर्थव्यवस्था को लेकर भय का वातावरण बनाने में जुटा है | हालाँकि ये मान लेना निहायत मूर्खता होगी कि दुनिया भर में आर्थिक हालात बिगड़ने का हमारी अर्थव्यवस्था पर कोई असर नहीं पड़ेगा लेकिन 135 करोड़ का विशाल उपभोक्ता परिवार और तेजी से विकसित घरेलू औद्योगिक ढांचे के साथ स्वदेशी का भाव भारतीय अर्थतंत्र को खतरे की स्थिति से बचाए रखने में काफी हद तक सहायक हो सकता है बशर्ते बजाय हड़बड़ाहट में फैसले करने के सार्थक चिंतन के साथ आने वाले संकट का समना करने की योजना बनाई जाए | इसके लिए सबसे पहले सरकार को अपने फ़िज़ूल अर्थात गैर उत्पादक खर्चों में कटौती करनी चाहिए | घाटे में चल रहे सार्वजनिक क्षेत्रों के उद्यमों के विनिवेश को विपक्ष द्वारा देश बेचने का नाम दिया जा रहा है लेकिन इन सफ़ेद हाथियों को खुराक देते  रहने का दुष्परिणाम झेलने के बाद ऐसा करना बहुत ही सही था | उनसे प्राप्त धन विकास कार्यों विशेष रूप से इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए उपयोग किया जावे तो आर्थिक मंदी पर प्रभावी तरीके से काबू  किया जा सकेगा | उसके साथ ही सरकार को छोटे निवेशकों को बचत के लिए  आकर्षित करने के उपाय तलाशने होंगे | हालाँकि बाजार में मांग बनाये रखने के लिए मुद्रा की तरलता बनाये रखना जरूरी है लेकिन ये भी सही है कि महंगाई के कारण उत्पन्न हालातों के मद्देनजर मुद्रास्फीति पर नियन्त्रण करने के रास्ते भी निकालने होंगे | ये तो तय है कि मंदी आ रही है और कहीं रूस - यूक्रेन युद्ध ने खतरनाक मोड़ लिया तो वैश्विक अर्थव्यवस्था में होने वाली उथल पुथल का अंदाज  लगाना और कठिन हो जाएगा | लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों युद्धरत देशों पर  दबाव बनाकर लड़ाई रुकवाने का प्रयास कर रहे हैं उससे ये उम्मीद भी बढ़ रही है कि भारत एक विश्व शक्ति के रूप में जिस तरह स्थापित हो रहा है उसके दूरगामी लाभ हमारी अर्थव्यवस्था को जरूर हासिल होंगे | लेकिन देखने  वाली बात ये भी है कि सब कुछ हमारी सोच के मुताबिक हो जाए ये  जरूरी नहीं | इसलिए बेहतर है चिंता छोड़ चिंतन का सहारा लेते हुए आर्थिक मंदी से निपटने हेतु आपातकालीन योजना बनाकर उसका ईमानदारी से पालन किया जावे जिससे आग लगने के बाद कुआ खोदने वाली विडंबना से देश बच सके | इसके साथ ही ये भी उचित होगा कि सरकार समय – समय पर आर्थिक स्थिति की सच्चाई से देश को अवगत करवाती रहे जिससे खुशफहमी और निराशा दोनों से बचा जा सके |

- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 7 October 2022

बढ़ती मुस्लिम आबादी यूरोपीय देशों के लिए भी सिरदर्द बनने लगी



दशहरा के दिन अपने स्थापना दिवस पर रास्वसंघ के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत ने जनसँख्या असंतुलन दूर करने के लिए आबादी नियन्त्रण के लिए प्रभावशाली कदम उठाने की बात कही थी | अपने उद्बोधन में उन्होंने विश्व के अनेक देशों का उदाहरण देते हुए उनके विघटन की वजहों में जनसँख्या असंतुलन को ही बताया था | संघ चूंकि हिंदूवादी संगठन है लिहाजा डा. भागवत के वक्तव्य को मुस्लिम विरोधी मानकर देखा जाना स्वाभाविक है | लेकिन बीते कुछ दिनों से ब्रिटेन से जो खबरें आ रही हैं उनको सुनने के बाद जनसँख्या असंतुलन के खतरों को समय रहते दूर न किया गया तो भारत में भी वैसी ही  स्थिति उत्पन्न होना सुनिश्चित है | जो आंकड़े आये हैं उनके अनुसार ब्रिटेन में अवैध रूप से घुसे अप्रवासियों में 90 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम देशों से आये थे | ये भी बताया गया है कि इंग्लिश चैनल पार कर समुद्री रास्ते से ब्रिटेन में घुसने के बाद इन मुस्लिम घुसपैठियों को उनके समुदाय के लोग अपने ठिकानों में छिपाए रखते हैं | ब्रिटेन में हुए हालिया दंगों के बाद सरकार को इस बात की चिंता सताने लगी है कि यदि मुस्लिम आबादी इसी तरह बढ़ती रही तो ब्रिटेन में जनसंख्या का असंतुलन सामाजिक सौहार्द्र को नुकसान पहुंचाएगा | भारतीय मूल की गृह मंत्री सुएना ब्रेवनमेन ने इस बारे में चिंता जताते हुए कहा है कि बीते कुछ वर्षों में ब्रिटेन में सांप्रदायिक दंगों में चिंताजनक वृद्धि हुई है जिनमें मुस्लिम आबादी की भूमिका ही ज्यादा रही है | ब्रिटेन , यूरोप के उन देशों में है जहाँ पाकिस्तान सहित ऐसे  देशों से आये मुस्लिम  बड़ी संख्या में आकर बसे हुए हैं जहाँ कभी उसका राज था | लेकिन बीते कुछ सालों में सीरिया संकट के बाद से वहां शरणार्थी  बनकर आये मुस्लिम आंतरिक सुरक्षा के साथ ही कानून व्यवस्था के लिए जिस तरह खतरा बनते जा रहे हैं उससे सुरक्षा एजेंसियां चिंता में पड़ गई हैं |  गौर् करने वाली बात ये है कि सांप्रदायिक दंगों में मुस्लिमों ने प्रमुख रूप से हिन्दू समुदाय और उनके धार्मिक स्थलों पर ही हमले किये | ईसाई समुदाय और चर्च से बचकर चलना उनकी रणनीति का हिस्सा है ताकि वे अंग्रेजों के गुस्से से बचे रहें | ब्रिटेन से लौटे अनेक भारतीयों ने इस बारे में जो बताया उससे लगता है कि आने वाले कुछ सालों के बाद ब्रिटेन में मुस्लिम समुदाय आंतरिक सुरक्षा और कानून – व्यवस्था के लिए समस्या बने बिना नहीं रहेगा | ब्रिटेन के अलावा फ्रांस  , जर्मनी , डेनमार्क आदि में भी मुस्लिम शरणार्थियों ने समूहबद्ध होकर हिंसक वारदातों को अंजाम दिया | इस्लाम के विरुद्ध टिप्पणियाँ करने वालों की नृशंस हत्या और बम विस्फोट जैसी घटनाओं के बाद ये देश अब शरणार्थियों को अपने यहाँ बसाने पर पछता रहे हैं लेकिन उन्हें निकालना  बस के बाहर हो चुका है | ब्रिटेन में मुस्लिम आबादी पहले से ही काफी है | अनेक परिवार तो पीढ़ियों से बसे हुए हैं | इस वजह से वहां के राजनीतिक ढांचे में भी उनकी मौजूदगी प्रभावशाली होती गई | राजधानी लन्दन के महापौर जैसा पद पाकिस्तानी मूल के मुस्लिम  के पास रह चुका है | 1947 के बाद ब्रिटेन की नीति पाकिस्तान परस्त होने से वहां से आये मुस्लिमों को ख़ास महत्व मिलने से मुस्लिम अप्रवासी बढ़ते गये | लेकिन बीते कुछ दशकों में अरब और अफ्रीकी देशों से भी बड़ी संख्या में मुस्लिम अप्रवासियों ने ब्रिटेन में डेरा जमा लिया | शुरुआत में तो ये सामान्य अप्रवासियों जैसे रहे लेकिन जबसे इस्लामिक आतंकवाद का फैलाव हुआ तबसे ब्रिटेन में मुस्लिम आबादी में अपने आवसीय इलाके विकसित करने की मानसिकता उत्पन्न हुई जिसका परिणाम  इनकी गोलबंदी के रूप में देखने मिला | ब्रिटेन के सभी बड़े शहरों में मुस्लिम बस्तियां जिस तरह बढ़ती जा रही हैं उसके कारण अवैध रूप से आने वाले अप्रवासियों को भूमिगत रहने की सुविधा मिल जाती है | पिछले कुछ महीनों में हुए सांप्रदायिक उत्पात के दौरान मुस्लिम  हमलावरों ने मुंह पर कपड़ा बांधकर अपनी पहिचान जिस तरह छिपाई उससे ये संदेह पुख्ता होता है कि वे अवैध रूप से वहां रह रहे हैं | यूरोपीय यूनियन के तमाम देश सीरिया संकट के समय वहां से आये शरणार्थियों के प्रति मानवीय संवेदनाओं के कारण बेहद उदार रहे | वहां की जनता ने भी इस बारे में अपनी  सरकारों पर दबाव डाला | ये भावना अमेरिका और कैनेडा तक फ़ैली | लेकिन इस बारे में चौंकाने वाली बात ये रही कि पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण अपना देश छोड़ने मजबूर हुए शरणार्थी यूरोप के ईसाई बहुल देशों में ही क्यों गए ? इस्लाम के सबसे पवित्र केंद्र मक्का में आने वाले हज यात्रियों से करोड़ों डॉलर हर साल कमाने वाले सऊदी अरब के अलावा कच्चे तेल से मालामाल हुए संयुक्त अरब अमीरात में शामिल देशों में भी शायद ही कोई शरणार्थी आया हो | सीरिया के साथ खड़े रूस ने भी किसी को पनाह नहीं दी | ऐसे में ये शोध का विषय है कि सीरिया संकट के बाद शरणार्थियों का रेला थोक के भाव अपने पड़ोसी संपन्न अरबी देशों की बजाय यूरोप ही क्यों गया ? सवाल और भी हैं | लेकिन ब्रिटेन से आ रही ताजा खबरों के बाद मुस्लिम अप्रवासियों और अवैध घुसपैठियों के कारण वहां जनसँख्या के असंतुलन को लेकर जो चिंता गृहमंत्री ने जताई उसके बाद बड़ी बात नहीं अन्य यूरोपीय देश भी इस बारे में सचेत होकर कोई एकदम उठायें | हालाँकि जिस तरह से मुस्लिम आबादी ने इन देशों में अपनी जड़ें जमा ली हैं उन्हें देखते हुए उनको आसानी से न तो बेदखल किया जा सकेगा और न ही उनके द्वारा की जाने वाली आतंकवादी शैली की वारदातों को रोकना सम्भव रहा  | ये देखते हुए भारत को भी सावधान हो जाना चाहिए क्योंकि पूरे यूरोप में जितने मुस्लिम शरणार्थी या अप्रवासी अवैध रूप से जाकर बस गये उससे कई गुना भारत में दशकों पहले आ चुके थे और वह क्रम आज भी जारी है | दुर्भाग्य से हमारे देश की राजनीति में वोट बैंक चूंकि राष्ट्रहित पर भारी पड़ जाता है लिहाजा शरणार्थी बनकर आये मुस्लिम अब मालिकाना हक मांगने लगे हैं | ऐसे में जरूरी हो गया कि पानी सिर के ऊपर आ जाने के पहले इस समस्या के ठोस हल के बारे में सोचा जाए | ब्रिटेन की कुल आबादी से कहीं ज्यादा तो भारत में बांग्लादेश से आये शरणार्थियों और उनकी औलादों की संख्या हो चुकी होगी | उसके बाद भी म्यांमार से आये रोहिंग्या मुस्लिमों को शरण देने की वकालत की जाती है | वैश्विक परिदृश्य पर निगाह डालने से लगता है कि मुस्लिम अप्रवासियों और शरणार्थियों के कारण  आबादी के असंतुलन से उत्पन्न समस्या अब वैश्विक होती जा रही है |  

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 6 October 2022

जनसँख्या असंतुलन : डा. भागवत की चिंता संघ की दूरदर्शी सोच का प्रमाण



वैसे तो रास्वसंघ के प्रमुख डा. मोहन भागवत राष्ट्रीय महत्व के सम - सामयिक विषयों पर अपना मत व्यक्त करते रहते हैं परन्तु  विजयादशमी के दिन संघ के स्थापना दिवस पर नागपुर में आयोजित होने वाले समारोह में संघ प्रमुख का भाषण एक तरह से संगठन का नीति वक्तव्य होता है | गत दिवस इस अवसर पर उन्होंने जो उद्बोधन दिया उसमें न सिर्फ संघ के स्वयंसेवकों और समर्थकों अपितु पूरे देश के लिए एक सन्देश है | सबसे बड़ी बात ये है कि संघ की भूमिका अब केवल शाखा लगाने तक सीमित न रहकर राष्ट्र जीवन से जुड़े प्रत्येक क्षेत्र तक फ़ैल गयी है | उसी का परिणाम है कि राष्ट्रवाद की भावना देश के सभी हिस्सों में नजर आने लगी है | पूर्वोत्तर के वे इलाके जो कभी मुख्यधारा से कटने की वजह से ईसाई मिशनरियों द्वारा रचित षडयंत्र के वशीभूत अलगाववाद की मानसिकता में रंग चुके थे , आज राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत हैं | वहां की राजनीति पर राष्ट्रवाद का प्रभाव स्पष्ट रूप से नजर आने के पीछे रास्वसंघ का योगदान सर्वोपरि है | संघ प्रमुख ने कल आबादी संबंधी मसला उठाते हुए जिस तरह उसके नियन्त्रण में धर्म विशेष द्वारा उत्पन्न की जाने वाली बाधाओं को राष्ट्रहित के विरुद्ध बताया उसमें एक तबका साम्प्रदायिकता सूंघ सकता है | लेकिन सही बात है कि जनसँख्या असंतुलन देश के अनेक हिस्सों में बड़ी समस्या बनकर उभरा है | आतंकवाद के तौर पर आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बने पीएफआई जैसे संगठन भी इसी असंतुलन का दुष्परिणाम हैं | हमारे देश के वामपंथी जिस चीन को अपना आदर्श मानते हैं उसने इस संकट को समय रहते भांप लिया और उइगर मुसलमानों पर शिकंजा कसकर अपने देश में इस्लामी आतंकवाद को पनपने से पहले ही कुचल दिया | उसके विपरीत हमारे देश में वोट बैंक की वजह से अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के फेर में ज्यादातर राजनीतिक दलों ने जनसँख्या असंतुलन के खतरे को  नजरअंदाज किया जिसका खामियाजा हम भोग भी रहे हैं | हाल ही में संघ प्रमुख ने मस्जिद जाकर  कुछ मुस्लिम धर्मगुरुओं से भेंट की तब संघ विरोधी दलों ने  तंज कसा कि वह राहुल गांधी की यात्रा की प्रतिक्रिया है | कुछ ने यहाँ तक कह डाला कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ  मतभेद हो जाने से संघ ने अपनी नीति बदली है | लेकिन ऐसे लोग इस संगठन की नीतियों  और कार्यप्रणाली के बारे में जाने बिना ही बेसिर पैर की बातें करते हैं | सही बात ये है कि संघ की सोच और उसके कार्य राष्ट्रहित पर केन्द्रित होते हैं | चूंकि राजनीति भी राष्ट्रीय जीवन को प्रभावित करती है इसलिए संघ राजनीतिक मसलों पर भी अपनी राय रखने में संकोच नहीं करता | जिस तरह महात्मा गांधी ने आजादी की लड़ाई को राजनीति तक सीमित न रखते हुए अछूत  उद्धार ,हिन्दी , स्वदेशी , स्वच्छता , ग्राम विकास जैसे प्रकल्पों के जरिये समाज को संगठित कर सकारात्मक दिशा देने का काम किया , ठीक वैसे ही संघ भी समाज से जुड़े प्रत्येक क्षेत्र में अपनी संगठन शक्ति के माध्यम से भारतीयता की भावना को सुदृढ़ बनाने प्रयासरत है | लम्बे समय तक उसके प्रति कौतुहल का भाव बना रहा लेकिन अपनी कर्मठता और प्रतिबद्धता की वजह से उसके प्रति जन सामान्य में आकर्षण जागा | उसी कारण संघ विरोधी अनेक राजनीतिक नेता ये कहते सुने जा सकते हैं कि वे भी हिन्दू हैं | वहीं धर्मनिरपेक्षता का  ढोल पीटने वाले दलों का चुनाव प्रचार अब हिन्दू मंदिरों से शुरू होने लगा है | कारसेवकों पर गोलियां बरसाने वाले भी अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनवाने का वायदा चुनावी घोषणापत्र में करने लगे | कोई चुनावी मंच से काली जी की वंदना में जुटा है तो कोई हनुमान चालीसा का पाठ करता नजर आता है | कहने का आशय ये है कि हिंदुत्व भारतीय राजनीति में जिस तरह प्रभावी तत्व के रूप में नजर आने लगा है उसके पीछे संघ की नीतियों के प्रति बढ़ता आकर्षण ही है | संघ प्रमुख ने  विजयादशमी उत्सव पर गत दिवस राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विषयों पर संघ का दृष्टिकोण जिस तरह से प्रस्तुत किया उससे उसके आलोचकों को भी ये समझ में आ जाना चाहिए  कि इस संगठन की सोच कितनी व्यापक और जमीन से जुड़ी है | आज देश के सामने जो समस्याएँ हैं उनका हल ढूढ़ने के लिए विदेशों की ओर निहारने की बजाय अपनी अन्तर्निहित प्रतिभा का विकास करना संघ की नीति है और इसीलिये शिक्षा हो या अर्थव्यवस्था , वह उनमें  भारतीय दृष्टिकोण के समावेश का समर्थक है | डा. भागवत ने संघ में महिलाओं की भूमिका को लेकर किये जाने वाले मिथ्या प्रचार का भी सप्रमाण उत्तर दिया | मातृभाषा में शिक्षा के साथ परिवार में मिलने वाले संस्कारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने सांस्कृतिक और सामाजिक ढांचे की मजबूती को सबसे बड़ी जरूरत बताकर ये साबित कर दिया कि संघ समाज से जुड़े सभी मुद्दों पर पैनी नजर रखता है | इस बारे में  उल्लेखनीय है कि जनसँख्या नीति केंद्र सरकार की कार्ययोजना का हिस्सा है | संघ प्रमुख के उद्बोधन के बाद इस दिशा में सरकार के कदम तेजी से बढ़ सकते हैं क्योंकि समाज के भीतर  इस बारे में अनुकूल वातावरण बनाने में संघ की भूमिका बेहद प्रभावशाली रही है | आगामी डेढ़ वर्ष देश में राजनीतिक गहमागहमी बनी रहेगी | गुजरात , हिमाचल , जम्मू  कश्मीर , म.प्र , छत्तीसगढ़ , राजस्थान और उसके बाद लोकसभा चुनाव के साथ ही कुछ राज्यों के चुनाव होंगे | इस कारण राजनीतिक ध्रुवीकरण की कोशिशें तेजी से चल रही हैं | तमाम विपक्षी दल मिलकर भाजपा के विरुद्ध जो मोर्चा बनाना चाह रहे हैं उसके पीछे दरअसल संघ का ही भय है | राहुल गांधी भी अपनी यात्रा में संघ के विरुद्ध ही ज्यादा बोलते हैं | ऐसे में संघ प्रमुख ने गत दिवस जो सन्देश दिया वह उन सभी के लिए स्पष्ट संकेत है जो उसे लेकर दिन - रात प्रलाप किया करते हैं | पुरानी कहावत है जिसकी शक्ति बढ़ती है उसी के शत्रु बढ़ते हैं | रास्वसंघ इसका सबसे अच्छा उदाहरण है |

- रवीन्द्र वाजपेयी