Thursday, 10 November 2022

वकील का चेहरा देख फैसला देने का आरोप धोना बड़ी चुनौती



भारत के 50 वें मुख्य न्यायाधीश की शपथ लेने के बाद धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ ने कहा कि वे बातों से नहीं अपितु काम से भरोसा हासिल करेंगे | हालाँकि ये स्पष्ट नहीं है कि ऐसा उन्होंने अपने बारे में कहा या समूची न्यायपालिका को ध्यान में रखकर | श्री चंद्रचूड़ को बहुत ही कुशल और निडर न्यायाधीश माना जाता है | अनेक  महत्वपूर्ण फैसलों में सरकार के विरुद्ध दिए गए फैसलों से वे अपनी निष्पक्षता साबित करते रहे हैं | इसीलिये राजनीतिक क्षेत्रों में चर्चा थी कि शायद केंद्र सरकार उनकी वरिष्टता की उपेक्षा करते हुए किसी और को मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी सौंपेगी किन्तु जब अवकाश प्राप्त मुख्य  न्यायाधीश ने उनके नाम की अनुशंसा भेजी तो सरकार ने बिना देर लगाये उसे मंजूर कर लिया |   उल्लेखनीय है श्री चंद्रचूड के पिता भी देश के मुख्य न्यायाधीश रहे हैं | उनकी शिक्षा विश्व के सुप्रसिद्ध हार्वर्ड विवि में हुई  और विधि क्षेत्र का अनुभव उन्हें इस पद के योग्य साबित करने पर्याप्त है | उच्च न्यायालय में न्यायाधीश और मुख्य न्यायाधीश से देश के मुख्य न्यायाधीश बनने तक का उनका सफर अनेक चर्चित फैसलों से भरा रहा जिसमें अपने पिता द्वारा दिये  गये पुराने फैसले के विरुद्ध दिया गया निर्णय भी है | लेकिन न्यायपालिका विश्वास के जिस संकट से गुजर रही है उसे देखते हुए श्री चंद्रचूड़ को लगभग दो साल के कार्यकाल में फैसले सुनाने के अलावा न्याय को सहज , सुलभ और सस्ता बनाने के लिए साहसिक कदम उठाने होंगे | स्मरणीय है कुछ समय पहले जयपुर में हुए एक कार्यक्रम में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की मौजूदगी में कानून मंत्री किरण रिजिजू और राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने खुलकर कहा था कि बड़े वकीलों की महंगी फीस के चलते आम आदमी न्यायमंदिर की सीढ़ियाँ तक चढ़ने का साहस नहीं कर पाता | मुख्य न्यायाधीश के सामने ये कहने का दुस्साहस भी दोनों ने किया कि न्यायाधीश वकील का चेहरा देखकर फैसला सुनाते हैं | आम तौर पर इस तरह की टिप्पणियाँ सुनने में आती रही हैं  किन्तु सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के सामने देश के कानून मंत्री और एक राज्य के मुख्यमंत्री द्वारा सुनाई गयी खरी – खरी बातों का समुचित स्पष्टीकरण वे नहीं दे सके जो साधारण बात नहीं थी  | और शायद श्री चंद्रचूड के लिए भी ऐसा करना कठिन होगा क्योंकि अदालत में वकालत शुरू करने से लेकर मुख्य न्यायाधीश बनने तक के दौर में उन्हें उन विसंगतियों का भली – भांति ज्ञान होगा जिनकी वजह से  न्यायपालिका के बारे में ये अवधारणा जनमानस में गहराई तक पैठ बना चुकी है कि वहां फैसले होते हैं किन्तु न्याय नहीं | यद्यपि किसी अधिवक्ता की फीस कितनी हो ये तय कर पाना कानूनन सम्भव नहीं है और न ही केंद्र सरकार द्वारा गरीबों के लिए शुरू की गयी मुफ्त इलाज जैसी सुविधा कानूनी सहायता के रूप में दिया जाना संभव होगा । लेकिन श्री चंद्रचूड अपने पिता के सान्निध्य के कारण चूंकि बचपन से ही न्यायपालिका से जुड़े माहौल में रहे इसलिए उन्हें उसमें निहित विडम्बनाओं का भी अच्छी तरह से एहसास होगा | अदालतों में लगे मुकदमों के अंबार की तुलना में  न्यायाधीशों की अपर्याप्त संख्या भी न्याय में विलम्ब का कारण है और यहीं से पक्षकार के आर्थिक शोषण और मानसिक प्रताड़ना की शुरुआत होती है | हालाँकि अनेक मामले ऐसे होते हैं जिनकी सुनवाई लंबी चलती है किन्तु जिन प्रकरणों में न्याय प्रक्रिया जल्द संपन्न की जा सकती है उनको भी जब लम्बा खींचा जाता है तब उसकी सार्थकता पर लगने वाले सवालिया निशान और गहरे हो जाते हैं | यदि जैसा उन्होंने आश्वस्त किया है श्री चंद्रचूड वाकई अपने कामों से लोगों का भरोसा जीतना चाहते हैं तो उन्हें त्वरित और सस्त्ते न्याय की व्यवस्था  करनी चाहिए | वकीलों की मोटी – मोटी फीस कम करवाना तो उनके बस में नहीं होगा किन्तु  दिग्गज वकीलों के चेहरे देखकर फैसले किये जाने जैसे आरोपों से न्यायपालिका को मुक्त करवा सकें तो ये क्रांतिकारी होगा | विशिष्ट हस्तियों के मामले में ये देखने में आया है कि नामचीन वकील के खड़े होते ही न्यायाधीश के व्यवहार में नरमी आ जाती है | एक विख्यात अभिनेता के बेटे के नशीली दवाओं के मामले में पकडे जाने पर जमानत अर्जी टलती रही लेकिन ज्योंही एक बड़े  वकील पैरवी करने आये बेटा जेल से बाहर आ गया | सलमान खान को सजा हुई तो दिल्ली से विख्यात वकील विशेष विमान से आये और उस दौरान ऊपरी अदालत जमानत देने उनका इंतजार करती बैठी रही | ऐसी अनेक बातें हैं जिन्हें यदि सुधारा जा सके तो न्यायपालिका के प्रति व्याप्त  असंतोष और अविश्वास कम किया जा सकता है | वैसे जो भी नया मुख्य  न्यायाधीश उच्च और सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्त होता है वह शुरू में तो अच्छे सपने दिखाता है लेकिन कुछ समय बाद न्यायपालिका में व्याप्त अव्यवस्था के सामने उसकी  लाचारी दिखाई देने लगती है | श्री चंद्रचूड को उनके कार्यकाल में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए प्रचलित कालेजियम प्रणाली को बदलकर राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की पुनर्स्थापना के प्रयास पर केंद्र सरकार के साथ टकराव का सामना करना पड़ सकता है | उल्लेखनीय है संसद द्वारा बनाए गये  आयोग को सर्वोच्च न्यायालय ने  असंवैधानिक बताकर रद्द कर दिया था | हाल ही में कानून मंत्री ने संसद में बयान दिया था कि कालेजियम व्यवस्था की जगह आयोग की स्थापना किये जाने की मांग जोर पकड रही है | इससे संकेत मिला कि सरकार आयोग की स्थापना का विधेयक दोबारा संसद में लाने जा रही है | ऐसा होने पर श्री चंद्रचूड का रुख सरकार और न्यायपालिका के बीच का सम्बन्ध और संतुलन तय करेगा |  यदि वे सचमुच  भरोसा जीतना चाहते हैं तो उन्हें खुद होकर कालेजियम प्रथा समाप्त करने की पहल करनी चाहिये जिससे न्यायपालिका की गुणवत्ता और छवि दोनों में सुधार हो सके |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 9 November 2022

जिस अख़बार के साथ पाठकों का समर्थन हो उसे कोई नहीं झुका सकता



 9 नवम्बर 1989 थी  वो तारीख जिस दिन मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस का पहला अंक सम्माननीय पाठकों के हाथ आया था | वह दौर जबर्दस्त  राजनीतिक उठापटक का था | देश नई करवट ले रहा था | मंडल और मंदिर के मुद्दों के कारण पूरा राष्ट्र आंदोलित था और  सियासी समीकरण नया आकार ले रहे थे | महत्वाकांक्षाओं के विकृत रूप में सामने आने से  समाज को जातियों में खंडित करने का तानाबाना सामाजिक न्याय के नाम पर बुना जा रहा था | बेमेल गठबंधन और अवसरवाद समूचे राजनीतिक विमर्श पर हावी होने से जनमानस भ्रमित था | स्थापित प्रतिमाएं ध्वस्त होने के साथ ही नए भगवानों की प्राण प्रतिष्ठा की जा रही थी | कुल मिलाकर असमंजस चरम पर था | अविश्वास , अनिश्चितता और अस्थिरता के कारण सर्वत्र भ्रम और भय का माहौल बन गया | उस  माहौल में महाकोशल की राजनीतिक चेतनास्थली संस्कारधानी जबलपुर में जब एक नए सांध्य दैनिक का उदय हुआ तब उसके लिए अपनी जगह बनाना आसान नहीं था | लेकिन देखते - देखते मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस पाठकों की आदत बन गया | अपनी निर्भीक प्रस्तुति और सटीक टिप्पणियों के कारण उसे जनता का प्यार और समर्थन जिस मात्रा में मिलने लगा उसने हमारा हौसला बुलंद किया और हम साहस के साथ अपने कर्तव्य का निर्वहन करने में समर्थ हो सके | आज तीन दशक से ज्यादा का समय बीत चुका है | देश और दुनिया में बड़े परिवर्तन इस दौरान हुए हैं | राजनीति , अर्थव्यवस्था , कला , संस्कृति , समाचार माध्यम सभी में तब्दीली देखी जा सकती  है | सत्ता के  स्वरूप और संस्कृति में भी आमूल परिवर्तन हो गया है | कहना गलत न होगा कि राजनीति की दिशा पूरी तरह उलट गयी है | 1989 में तेजी से उभार ले रही हिन्दू लहर अब राष्ट्रीय मुख्यधारा बन चुकी है जबकि  मंडलवादी राजनीति अपने ही बनाए जाल में उलझकर दम तोड़ती जा रही है | देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी अपनी प्रतिष्ठा बचाए  रखने के लिए संघर्ष कर रही है | भारत आर्थिक और सामरिक दृष्टि से विश्व के बड़े देशों के साथ बराबरी से बैठने की स्थिति में आ गया है | कोरोना जैसी महामारी का मुकाबला जिस कुशलता के साथ देश ने किया उसकी वजह से आम भारतीय का आत्मविश्वास और मजबूत हुआ है | दुनिया भर में भारतीय समुदाय अपने बुद्धिकौशल और पौरुष के बलबूते सम्मान और समृद्धि अर्जित कर रहा है | ब्रिटेन में ऋषि सुनक के प्रधानमन्त्री बन जाने से भारत का प्रभाव और प्रतिभा नए रूप  में सामने आई है | 33 साल की इस यात्रा में मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस एक जागरूक और जिम्मेदार समाचार पत्र के रूप में लगातार पाठकों के साथ बना रहा | हमने स्वस्थ पत्रकारिता की ध्वजा को जिस मजबूती से थामे रखा उसके कारण पत्रकारिता पर मंडराते  विश्वास के संकट के बावजूद इस समाचार पत्र ने अपनी विश्वसनीयता कायम रखी जो आज भी उसकी पहिचान बनी हुई है | लेकिन इस गौरव को हासिल करने के लिए हमें अनगिनत परेशानियों , अवरोधों और विरोध का सामना करना पड़ा | तकनीक में तेजी से होने वाले बदलाव के कारण लघु  और मध्यम  श्रेणी के समाचार पत्रों के सामने पूंजी का जबरदस्त संकट उत्पन्न होता जा रहा है | उसके साथ ही डिजिटल माध्यम के विकास ने समाचार पत्रों के लिए नई प्रतिस्पर्धा पेश कर दी है | लेकिन मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस इस सबसे अविचलित रहकर आगे बढ़ता जा रहा है | हमारे पाठकों का हम पर जो विश्वास है वह हमारी ऊर्जा का अक्षत स्रोत है | निःस्वार्थ भाव से हमें सहयोग देने वाले विज्ञापनदाताओं की उदारता हमारा संबल है | जिसके कारण पत्रकारिता के आदर्शों को अक्षुण्ण रखते हुए  संघर्षपथ पर बिना रुके  चलते रहने के लिए हम प्रतिबद्ध हैं | जिसे पढ़े बिना शाम अधूरी है का जो विशेषण हमारे साथ शुरू से ही जुड़ा हुआ है , उसे बरकरार रखने हम संकल्पबद्ध भी हैं और समर्पित भी | आने वाला समय बेहद चुनौतीपूर्ण है | राजनीतिक घटनाचक्र भी तेजी से घूम रहा है | अगले साल म.प्र और उसके बाद लोकसभा का चुनाव होगा | समाचार माध्यमों के लिए ये समय अपनी साख बचाने का है | आरोपों और आक्षेपों की चौतरफ़ा बौछार के बीच उन्हें अपनी छवि के लिए जो संघर्ष करना पड़ रहा है उसके लिए काफी हद तक वे स्वयं भी जिम्मेदार हैं | लेकिन मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस अपने पाठकों को विश्वास दिलाता है कि हम आपके विश्वास की रक्षा करने में पीछे नहीं रहेंगे | दबाव और बहाव पहले भी आते रहे और आगे भी आयेंगे परन्तु उनके सामने झुकने की तासीर हमारी नहीं है | लिहाजा भविष्य में भी इन्हीं तेवरों के साथ ये यात्रा जारी रहेगी क्योंकि जिस अख़बार के साथ पाठकों का समर्थन हो उसे कोई नहीं झुका सकता |

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 8 November 2022

वरना सामाजिक ढांचे में आ रही दरारें और चौड़ी होती जायेंगी



सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने गत दिवस आर्थिक दृष्टि से कमजोर सामान्य वर्ग के लिए नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश हेतु 10 प्रतिशत आरक्षण संबंधी संविधान संशोधन को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं को निरस्त करते हुए इस बारे में व्याप्त अनिश्चितता खत्म कर दी | 8 जनवरी 2019 को लोकसभा चुनाव के पहले संसद ने उक्त संशोधन को स्वीकार किया था जिसे राष्ट्रपति के अनुमोदन के बाद कानून की शक्ल मिल गयी | फरवरी में ही उसके विरुद्ध याचिका सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष पेश हो गई | अपने कार्यकाल के अंतिम दिन मुख्य न्यायाधीश यू. यू. ललित ने कल संशोधन की वैधता के पक्ष में फैसला सुनाया | हालाँकि पांच सदस्यीय संविधान पीठ के दो सदस्यों ने याचिकाओं को जायज ठहराया वहीं श्री ललित सहित तीन न्यायाधीशों ने उक्त क़ानून को संविधान की मूल भावना के विरुद्ध बताने वाली याचिकाओं को मंजूर करने लायक नहीं समझा | बहरहाल चूंकि सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने सवर्ण गरीबों को 10 फीसदी आरक्षण पर मुहर लगा दी है इसलिए इस बारे में बहस और विवाद समाप्त होने  चाहिए | आरक्षण का मूल उद्देश्य आर्थिक , सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से वंचित वर्ग के लोगों को विकास की राह पर आगे लाना था | देश की  आजादी के समय जो सामाजिक स्थिति थी उसमें अनु.जाति और जनजाति के लिए आरक्षण का जो प्रावधान संविधान में किया गया उसके औचित्य  और आवश्यकता से कोई इंकार नहीं कर सकता था | जातिगत भेदभाव से ग्रसित समाज का बड़ा तबका सदियों से उपेक्षित और प्रताड़ित था | वर्ण व्यवस्था का विकृत स्वरूप जब जाति के तौर पर स्थापित हुआ तब समाज में विषमता और विद्वेष बढ़ता गया | इसे दूर करने के लिए महात्मा गांधी सहित अनेक समाज सुधारकों ने बड़े – बड़े आन्दोलन किये | उनका असर भी हुआ और छुआछूत को लेकर  समाज में व्याप्त अवधारणा काफी कुछ बदलने के बाद भी जातिगत भेदभाव बना हुआ था | आरक्षण ये सोचकर लागू किया गया था कि कुछ सालों बाद अनु. जाति और जनजाति के लोग शैक्षणिक रूप से आगे बढ़कर आर्थिक रूप से मजबूत होंगे जिसके आधार पर उनकी सामाजिक स्थिति में  सुधार होगा | लेकिन ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि नौकरी और शिक्षा के लिए आरक्षण मिलने के बाद भी समाज की  मानसिकता अपेक्षित स्तर पर नहीं बदली | उसका परिणाम ये  हुआ कि  आरक्षण की समयावधि तो बढ़ाई जाती रही लेकिन वह अपने उद्देश्य में कितना सफल हुआ ये देखने के प्रति लापरवाही की वजह से आरक्षण अंतहीन प्रक्रिया में बदल गया |  धीरे – धीरे वह अपने उद्देश्य से भटककर वोट बटोरने का औजार बन बैठा | उसके बाद दौर आया ओबीसी आरक्षण का | 1989 में वीपी सिंह की सरकार बनने के बाद समाजवादियों के दबाव में आकर मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की गईं | उस फैसले ने सामाजिक भेदभाव मिटाने की कोशिशों को बड़ा धक्का पहुँचाया | कुछ राज्यों ने जब अति पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने का दांव चला तब आरक्षण की सीमा तय करने का मुद्दा उठा | इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने 50 फीसदी की सीमा तय कर दी किन्तु तमिलनाडु सहित अनेक राज्यों ने बड़ी ही चतुराई से उसके उल्लंघन की भी कानूनी स्वीकृति प्राप्त कर ली  | म.प्र में ओबीसी आरक्षण को लेकर काफी समय से कानूनी पेंच फंसा हुआ है | इसकी  वजह से स्थानीय निकाय के चुनाव भी कुछ समय के लिए टालने पड़े थे |  नौकरी के बाद पदोन्नति में आरक्षण के प्रावधान भी विवादों के घेरे में है | इन सबकी वजह से सामाजिक विद्वेष बढ़ रहा है | यद्यपि वह सतह पर भले न आये लेकिन राजनीतिक स्वार्थों के कारण जातिगत खाई और चौड़ी होती जा रही है | जाति से उपजाति , पिछड़े से  अति पिछड़े और दलित से महादलित तक की यात्रा में इतने हिचकोले हैं कि आरक्षण नामक गाडी के पुर्जे – पुर्जे आवाज करने लगे हैं  | आर्थिक दृष्टि से गरीब सामान्य वर्ग की जातियों को दिये गए 10 फीसदी आरक्षण को कुछ लोग इसे  समाप्त करने की दिशा में बढ़ाया गया कदम भी मानते हैं | इसके विरोधी ये कहने में नहीं चूकते कि जातिगत आरक्षण को हटाकर आर्थिक दृष्टि से कमजोर सभी वर्गों को आरक्षण का  लाभ दिलाने के लिए मोदी सरकार योजनाबद्ध तरीके से काम कर रही है | हालाँकि भाजपा और उसके वैचारिक अभिभावक रास्वसंघ की ओर से ये दोहराया जाता रहा है कि जब तक जरूरत रहेगी तब तक आरक्षण जारी रखा जावेगा | लेकिन दूसरी  तरफ ये भी सही है कि क्रीमी लेयर के लोगों के बढ़ते जाने से आरक्षित वर्ग के लोगों के बीच भी  वर्ग भेद उत्पन्न होने लगा है | वरना महादलित और अति पिछड़े वाली बातें सामने नहीं आतीं | ये देखते हुए आर्थिक स्थिति के आधार पर आरक्षण लागू किये जाने की मांग जोर पकड़ने लगी है | यही वजह है कि अब सभी राजनीतिक दलों द्वारा सवर्ण जातियों  को लुभाने की चालें  चली जा रही हैं | सर्वोच्च न्यायालय का ताजा फैसला नये राष्ट्रीय विमर्श को जन्म दे सकता है | हालाँकि वोट बैंक के मकड़जाल में फंसे राजनीतिक दल इस बारे में साहस के साथ मुंह खोलेंगे ये सोचना जल्दबाजी होगी | लेकिन समय आ गया है जब इस विषय पर सुलझे हुए मन से विचार होना चाहिए | भारतीय सामाजिक व्यवस्था का मूल स्वरूप वर्ग संघर्ष की बजाय वर्ग समन्वय पर जोर देता है | समाज से यदि जातिगत भेदभाव की दीवार हटाना है तो आरक्षण को भी युक्तियुक्त बनाना होगा | वरना सामाजिक ढांचे में आ रही दरारें और चौड़ी होती चली जायेगी |  


- रवीन्द्र वाजपेयी  


Friday, 4 November 2022

गुजरात चुनाव से बदलेंगे राष्ट्रीय राजनीति के समीकरण



गुजरात विधानसभा चुनाव की तारीखें घोषित हो गई | उसके पहले हिमाचल प्रदेश के चुनाव हो चुके होंगे | दिसंबर के पहले सप्ताह में दोनों परिणाम आने के बाद राष्ट्रीय राजनीति के समीकरणों में बड़ा बदलाव होने की संभावना है | इसकी एक वजह इस बार वहाँ त्रिकोणीय मुकाबला होना है | आम आदमी पार्टी पंजाब की शानदार सफलता के बाद हिमाचल प्रदेश और गुजरात के चुनावों में पूरे जोर - शोर से उतरी है | हालांकि  उसकी मौजूदगी गुजरात में ज्यादा महसूस की जा रही है | इसकी वजह भी साफ़ है | दरअसल अरविन्द केजरीवाल की सोच ये है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के गृह प्रदेश में यदि उनकी पार्टी धमाकेदार प्रदर्शन कर सकी तो राष्ट्रीय स्तर पर ये सन्देश जायेगा कि भाजपा से सामने आकर टकराने का साहस केवल  आदमी पार्टी में ही है | इस बारे में उल्लेखनीय  है कि आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा के विरुद्ध विपक्ष का संयुक्त मोर्चा बनाने की जो कवायद अब तक चली है उसका नेतृत्व कौन करेगा ये निश्चित नहीं है | कांग्रेस को अब तक ये गुमान है कि बिना उसके झंडे तले गैर भाजपा गठबंधन बन ही नहीं सकता | दूसरी तरफ ममता बैनर्जी हमेशा की तरह मेरी मुर्गी की डेढ़ टांग चिल्लाती फिरती हैं | तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव की अपनी राजनीति है | कुल मिलाकर विपक्ष की समस्या ये है कि श्री मोदी के मुकाबले उसका चेहरा कौन होगा ये पक्का नहीं हो पा रहा |  अब तक जो देखने में आया है उससे ये लगता है कि कांग्रेस को तो श्री केजरीवाल से खुन्नस है ही क्योंकि आम आदमी पार्टी ने पहले दिल्ली और  फिर पंजाब में उसका सूपड़ा साफ़ कर दिया | हिमाचल प्रदेश और गुजरात में भी इस पार्टी के मैदान में उतरने का सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को ही होगा क्योंकि भाजपा विरोधी मतों में वही बटवारा करेगी | राजनीतिक विश्लेषक भी ये मानकर चल रहे हैं कि भले ही उक्त दोनों राज्यों में आम आदमी पार्टी कुछ ख़ास न कर  सके किन्तु वह कांग्रेस का खेल बिगाड़ने में सक्षम जरूर है | श्री केजरीवाल की रणनीति भी यही है | उन्हें मालूम है कि जिन राज्यों में अन्य क्षेत्रीय दल मजबूत हैं वहां उनकी दाल नहीं गलने वाली लेकिन जहाँ कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा संघर्ष है वहां तीसरी ताकत के रूप में वे अपनी उपस्थिति इस एहसास के साथ करवाना चाहते हैं कि कांग्रेस डूबता जहाज है अतः भाजपा का विकल्प आम आदमी पार्टी ही बनेगी | इस दावे की वजनदारी इसलिए बढ़ जाती  है क्योंकि कांग्रेस के अलावा यही ऐसी विपक्षी पार्टी है जिसकी एक से अधिक राज्यों  में सरकारें हैं | दूसरी बात ये है कि श्री केजरीवाल  ने दिल्ली के मुख्यमंत्री के तौर पर मुफ्त बिजली और पानी के साथ ही शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में जो काम किया उसकी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा है | हिमाचल प्रदेश और गुजरात दोनों में श्री केजरीवाल दिल्ली सरकार की इन्हीं उपलब्धियों के आधार पर मतदाताओं को लुभाने में जुटे हैं | उन्हें कितनी कामयाबी मिलेगी ये तो चुनाव परिणाम आने के बाद ही स्पष्ट होगा लेकिन इतना जरूर है कि कांग्रेस की हालत पतली करने में वे कामयाब नजर आ रहे हैं | अब तक चुनाव पूर्व जितने भी सर्वेक्षण आये हैं वे सभी उक्त दोनों राज्यों में भाजपा की सरकार लौटने की उम्मीद जता रहे हैं |  यद्यपि ऐसे सर्वेक्षण अनेक बार बुरी तरह गलत भी साबित हुए हैं | विशेष रूप से हिमाचल प्रदेश में चूंकि छोटी विधानसभा है इसलिए मुकाबला नजदीकी हो सकता है | वैसे आम आदमी पार्टी चाह रही है कि दोनों राज्यों में  त्रिशंकु विधानसभा बने जिससे सत्ता का रिमोट कंट्रोल उसके हाथ आ जाए | लेकिन गुजरात में इसकी सम्भावना कम है और भाजपा 2017 की अपेक्षा बेहतर प्रदर्शन करने के आत्मविश्वास से भरपूर है क्योंकि अहमद पटेल के न रहने से कांग्रेस के पास कोई रणनीतिकार नहीं बचा | राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पार्टी ने वहां का प्रभारी बनाया जरूर लेकिन वे अपने ही राज्य में घिर गये हैं | दूसरे , राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के दौरान जिस तरह की नौटंकी उन्होंने की उसके बाद कांग्रेस के भीतर ही उनकी विश्वसनीयता कम हुई है | आम आदमी पार्टी कांग्रेस में उत्पन्न शून्य को भरते हुए गुजरात में खुद को दूसरे स्थान पर स्थापित करने में जुटी हुई है | कांग्रेस के टूटे हुए मनोबल का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उसके सबसे बड़े स्टार प्रचारक राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा पर हैं और उनका  चुनाव वाले इन दोनों राज्यों में प्रचार करने का कोई कार्यक्रम नहीं है | प्रियंका वाड्रा ने हिमाचल प्रदेश में मोर्चा संभाला जरूर है लेकिन उ.प्र में उनके नेतृत्व में कांग्रेस के दयनीय प्रदर्शन के बाद इस पहाड़ी राज्य में भी उनसे किसी चमत्कार की उम्मीद राजनीति के जानकार नहीं कर रहे हैं | वैसे 70 विधायकों और चार लोकसभा सीटों के कारण हिमाचल प्रदेश राष्ट्रीय राजनीति में ज्यादा असर नहीं रखता | हालाँकि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा का गृह राज्य होने से यहाँ  उनकी प्रतिष्ठा दांव पर है | और फिर यहाँ हर चुनाव में सरकार बदल जाने का सिलसिला चला आ रहा है किन्तु आम आदमी पार्टी के कूदने के कारण कांग्रेस को नुकसान होना तय है | रही बात गुजरात की तो पिछले चुनाव में भाजपा को बहुमत प्राप्त करने में पसीना आ गया था | हालाँकि बाद में उसने कांग्रेस में जमकर तोड़फोड़ मचाई और पांच साल सरकार भी चलाई | लेकिन मुख्यमंत्री सहित पूरे मंत्रीमंडल को बदलने की मजबूरी भी उसे झेलनी पड़ीं | सत्ता विरोधी रुझान को टालने के लिए प्रधानमंत्री ने लगातार गुजरात के दौरे किये और गृह मंत्री भी मौका पाते ही अपना घर बचाने आते रहे हैं | आम आदमी पार्टी हालाँकि ये दावा कर रही है कि मुकाबला उसके और भाजपा के बीच है लेकिन सर्वेक्षणों में उसे तीसरे स्थान पर ही दिखाया जा रहा है | इस बात को  जानते तो श्री केजरीवाल भी  हैं लेकिन उनका निशाना कांग्रेस है | अगर वे गुजरात में मुख्य विपक्षी दल बन सके तो अगले साल राजस्थान , म.प्र और छत्तीसगढ़ के चुनाव में वे पूरी ताकत झोंकेगे जहाँ  कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधी लड़ाई होती रही है | लोकसभा चुनाव आने से पहले श्री केजरीवाल अपनी पार्टी को भाजपा का मुकाबला करने में सक्षम साबित करने के जिस अभियान में जुटे हैं उसका भविष्य काफी हद तक गुजरात चुनाव के नतीजों से तय हो जाएगा |

-रवीन्द्र वाजपेयी 

Thursday, 3 November 2022

पायलट के कटाक्ष में छिपे हैं कई संकेत



राजस्थान में कांग्रेस की अंतर्कलह थमने का नाम नहीं ले रही | हालाँकि आलाकमान के समझाने पर दोनों खेमों द्वारा ऐसा दर्शाया जाता रहा  कि सब कुछ समान्य है परंतु  मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और मुख्यमंत्री बनने के लिए लम्बे समय से हाथ -  पांव मार रहे सचिन पायलट के बीच बयानों के तीर नहीं रुके  | इसमें कौन ज्यादा दोषी है और कौन कम , ये कह पाना कठिन है क्योंकि दोनों के बीच चल रहा शीतयुद्ध सत्ता की खातिर है | एक बार तो श्री पायलट राजस्थान से अपने समर्थक विधायकों को लेकर भाजपा के संरक्षण में हरियाणा जाकर बैठ गए थे | हालाँकि सरकार गिराने के लिए पर्याप्त संख्याबल जुटाने में असफल रहने के कारण वे वापिस लौट आए किन्तु उनके और मुख्यमंत्री के बीच दिखावटी सौहार्द्रता के बावजूद मनो - मालिन्य बना रहा | सबसे बड़ा पेच ये है कि गांधी परिवार चाहता तो था कि सचिन को राजस्थान की गद्दी पर बिठा दिया जाए लेकिन श्री गहलोत को हिलाने की उसकी सारी कोशिशें बेकार साबित हुई. | उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष बनाकर श्री पायलट का रास्ता साफ़ करने की कोशिश भी बुरी तरह फुस्स साबित हुई | श्री गहलोत ने उस दौरान जिस तरह के तेवर दिखाए उनसे कांग्रेस आलाकमान के साथ ही गांधी परिवार की  धाक को भी धक्का पहुंचा | उससे भी ज्यादा हंसी का पात्र बने श्री पायलट जिनकी स्थिति मुख्यमंत्री के धोबी पछाड़ दांव से न घर के रहे न घाट के वाली होकर रह गई | श्री गहलोत भी अवसर मिलते ही बिना झिझके उनके बारे में जो कुछ कहते रहे उससे साफ़ हो गया कि वे झुकने तैयार नहीं हैं | कांग्रेस अध्यक्ष का पद ठुकराकर उन्होंने जब राजस्थान की सत्ता को प्राथमिकता दी तभी ये साफ़ हो चला था कि वे श्री पायलट के प्रति किसी भी प्रकार की उदारता बरतने के लिए तैयार नहीं हैं | हालाँकि बीते कुछ महीनों से मुख्यमंत्री के बारे में सचिन ने कोई तीखी बात नहीं कही जिसकी वजह ये मानी जा रही थी कि संभवतः उनको पार्टी आलाकमान  ये आश्वासन दे चुका है कि देर सवेर उनके अच्छे दिन आएंगे | कांग्रेस अध्यक्ष के  चुनाव के दौरान श्री गहलोत ने जिस तरह का पैंतरा दिखाया उसके बाद ये कयास लगाये जाने लगे थे कि गांधी परिवार  उनको पहले जैसा महत्व शायद नहीं देगा | कांग्रेस विधायक दल का नया नेता चुनने के लिए जयपुर आये पर्यवेक्षक मल्लिकार्जुन खरगे और अजय माकन के साथ जिस तरह का अपमानजनक व्यवहार गहलोत समर्थक विधायकों ने किया वह कांग्रेस के लिए अभूतपूर्व था | उन दोनों ने दिल्ली लौटकर आलाकमान को जो रिपोर्ट दी उसके बाद कुछ विधायकों को नोटिस भी दिए गए लेकिन अभी तक किसी का बाल बांका तक न हुआ | इसका कारण उनको श्री गहलोत का संरक्षण प्राप्त होना ही था | कुछ समय बाद मुख्यमंत्री राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में भी शामिल होकर लौट आये | उसके बाद ये लगा कि शायद गांधी परिवार ने उनको अभयदान दे दिया है | बीच में राजस्थान में हुए निवेशक सम्मेलन में उद्योगपति गौतम अडाणी की जब उन्होंने खुले मंच से तारीफ़ की तो कांग्रेस के भीतर खुसफुसाहट  शुरू हुई क्योंकि श्री गांधी लगभग रोजाना ही अम्बानी और अडाणी की तीखी आलोचना  किया करते हैं | लेकिन आश्चर्य तब हुआ जब उन्होंने भी ये कहते हुए श्री गहलोत को क्लीन चिट दे दी कि राजस्थान में उन्हें गलत तरीके से उपकृत नहीं किया जावेगा और यदि वैसा हुआ तब वे सबसे पहले उसका विरोध करेंगे | धीरे – धीरे ये बात तय मान ली गई कि श्री गहलोत ही आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का चेहरा होंगे | ऐसे में सवाल ये उठने लगा कि सचिन का भविष्य क्या होगा ? भले ही वे अपनी तरफ से मुख्यमंत्री के विरुद्ध कुछ बोलने से बचते रहे लेकिन श्री गहलोत ने उनके बारे में बोलने में ज़रा सी भी नरमी नहीं दिखाई | लेकिन अचानक ऐसा कुछ हो गया जिससे दोनों के बीच की खटास फिर सामने आने लगी | हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसी  आयोजन में श्री गहलोत की तारीफ़ कर डाली जो कि ऐसे अवसरों पर राजनीतिक सौजन्यता का हिस्सा होता है | लेकिन श्री पायलट ने उसे मुद्दा बनाते हुए ये कटाक्ष कर दिया कि प्रधानमंत्री ने ऐसी ही प्रशंसा गुलाम नबी आजाद की भी की थी | स्मरणीय है राज्यसभा से विदाई के समय दिए गए भाषण में श्री मोदी ने श्री आज़ाद के प्रति जिस तरह की आत्मीयता और  प्रशंसा भरे उद्गार  व्यक्त किये उसके बाद ही ये कयास लगाये जाने लगे थे कि वे कांग्रेस से किनारा करने वाले हैं | ये बात भी सही है कि राज्यसभा की सदस्यता के कारण ही न सिर्फ श्री आजाद अपितु कपिल सिब्बल और आनंद शर्मा जैसे वरिष्ट नेता तक कोप भवन में बैठ गये | जी 23 नामक समूह इसलिए अस्तित्व में आया था | श्री सिब्बल तो पार्टी छोड़कर सपा से राज्यसभा टिकिट लेकर उच्च सदन में लौट आये | श्री शर्मा ने भी भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा से मिलकर सनसनी मचा दी थी किन्तु अभी तक वे पार्टी में बने हुए हैं | दूसरी तरफ गुलाम नबी ने जम्मू  कश्मीर में अपनी अलग पार्टी बना ली | श्री पायलट ने श्री मोदी द्वारा की गई प्रशंसा के बहाने श्री गहलोत पर जो तीर छोड़ा उसका वैसे तो प्रभाव होता नजर नहीं आता | लेकिन इससे ये संकेत मिला है कि मुख्यमंत्री ने जिस तरह से अपनी सक्रियता समूचे राज्य में बढ़ा दी है वह उनके बढे हुए आत्मविश्वास का प्रमाण है परन्तु अचानक श्री पायलट ने उन पर जो व्यंग्य बाण छोड़ा उसे आसानी से हवा में नहीं  उड़ाया जा सकता | इसे आने वाले किसी बड़े राजनीतिक घटनाक्रम की आहट भी समझा जा सकता है | बहरहाल राजस्थान में कांग्रेस को जितना खतरा भाजपा से है उससे भी ज्यादा श्री पायलट से नजर आ रहा है क्योंकि वे घायल शेर जैसी  मानसिकता दर्शा रहे हैं | उन्हें धीरे – धीरे ही सही ये लगने लगा है कि उनके पास खोने को कुछ नहीं है इसलिए वे इस बार ऐसा वार  कर सकते हैं जो खाली न जाए | वैसे भी चुनाव के समय घात – प्रतिघात के नए – नए रूप देखने मिलते हैं |

- रवीन्द्र वाजपेयी


 

Wednesday, 2 November 2022

सुनी जो उनके आने की आहट गरीबखाना सजाया हमने



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गत दिवस गुजरात के मोरबी में गए और पुल टूटने के कारण हुई दुर्घटना में घायल लोगों से अस्पताल में मिलकर उन्हें ढांढस बंधाया | श्री मोदी चूंकि गुजरात के ही हैं और वहां जल्द विधान सभा चुनाव होने वाले हैं इसलिए उनका  वहां जाना स्वाभाविक ही था | घायलों की सहानुभूति अर्जित करने के लिए अन्य दलों के नेता भी ऐसा करते हैं और इसे गलत नहीं कहा  जा सकता | लेकिन महत्वपूर्ण ये नहीं कि प्रधानमंत्री ने जाकर घटनास्थल का मुआयना कर हादसे के कारणों की जानकारी ली और अस्पताल में जाकर घायलों से मिलकर उनका हौसला बढ़ाया , बल्कि ये कि उनके आने के पहले आनन फानन में अस्पताल में रंग रोगन करवाया गया , नये  वाटर कूलर रखे गये | और भी जो कमियां छिपाई  जा सकती थीं उन पर पर्दा डालने का भरपूर प्रयास अस्पताल प्रबंधन और जिला प्रशासन द्वारा किया गया | प्रधानमंत्री के आने पर साफ़ - सफाई , यातायात  नियंत्रण और सुरक्षा की दृष्टि से किये जाने इंतजाम अपनी जगह  उचित हैं | लेकिन जिस तरह की दुर्घटना मोरबी में हुई उसके बाद श्री मोदी के वहां आकर घायलों से मिलने के अवसर पर किया जाने  वाला दिखावा ये साबित  करने के लिए काफी है कि हमारे देश में सरकारी मशीनरी की सोच और कार्यपद्धति कश्मीर से  कन्याकुमारी तक एक जैसी है | प्रधानमंत्री गुजरात के 12 वर्षों तक मुख्यमंत्री रह चुके हैं | ऐसे में उनको वहाँ  की जमीनी हकीकत न पता हो ये असंभव है | और फिर यदि वे किसी  जलसे में आ रहे होते तो उस स्थान की साज - सज्जा का औचित्य भी होता परन्तु जिस दुर्घटना में लगभग 150 लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए उसके बाद शासन – प्रशासन का ध्यान इस बात पर होना चाहिये कि घायलों के इलाज की बेहतर व्यवस्था हो | प्रधानमंत्री के आगमन का लाभ लेकर अस्पताल की बेहतरी के  लिए मदद लेने का प्रयास भी उचित रहता | लेकिन बजाय उसके सरकारी अमला रंगाई – पुताई के काम में उलझ गया | ऐसा नहीं है कि श्री मोदी की  नजरों  से वह छिपा रहा हो लेकिन वे भी बतौर मुख्यमंत्री ये सब  देखते रहे हैं | अच्छा होता यदि वे खुद होकर राज्य शासन के जो मंत्री वहां  थे उन्हें फटकार लगाते इस तरह के दिखावटी इंतजाम पर नाराजी जताते | शायद मौके की नजाकत भांपते हुए वे चुप रहे जिसके पीछे चुनाव भी हो सकते हैं किन्तु समय आ गया है जब इस तरह के कर्मकांड रोकने  की दिशा में काम हो | समाचार माध्यम तो अक्सर ऐसे मामलों में सरकारी तंत्र की खिचाई करते ही हैं लेकिन राजनीतिक पदों पर विराजमान महानुभाव इस तरह के सामंतवादी क्रिया - कलापों के विरुद्ध आवाज क्यों नहीं उठाते ये बड़ा सवाल है | अंग्रेजों के ज़माने में ये सब होना स्वाभाविक था क्योंकि वे इस देश को अपना गुलाम समझते थे | मुम्बई में इंग्लैण्ड के सम्राट के आगमन पर गेट वे बनाया जाना इसका प्रमाण था | लेकिन आजादी के 75 साल बीत जाने के बाद भी हमारी सोच में वही कुछ बना रहना शोचनीय है | मोरबी के अस्पताल में ऐसा होना कोई पहली घटना नहीं थी इसलिए किसी को उस पर आश्चर्य नहीं हुआ | पूरे देश में आये दिन इस तरह की नाटकबाजी चला करती है | प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के आने पर उनके ठहरने वाले विश्राम गृह में सब कुछ नया कर दिया  जाता है ।  जिन रास्तों से उनकी सवारी निकलने वाली होती है  उन्हें भी रातों – रात सुधार दिया जा जाता है | यदि दो – चार दिन का समय भी मिल जाता है तब तो पूरी सड़क नई बना दी जाती है | मौजूदा राष्ट्रपति बेहद गरीब हालात से आई हैं | प्रधानमंत्री भी साधारण परिस्थितियों से उठकर इस पद पर आये हैं | उन्हें इस देश और यहाँ के लोगों के दुःख – दर्द अच्छी  तरह से पता हैं | राजनीतिक क्षेत्र में कार्य करते समय वे उन दुर्दशाओं का प्रत्यक्ष दर्शन और अनुभव कर चुके होंगे | ऐसे में उनसे अव्यवस्था को छिपाना मायने नहीं रखता | होना तो ये चाहिए कि बड़े ओहदों पर बैठे महानुभाव खुद होकर इस तरह के दिखावों पर रोष व्यक्त करते हुए इस बात को पूछें कि इस सबकी क्या आवश्यकता थी ? उल्लेखनीय है अति विशिष्ट जनों के आगमन पर होने वाले खर्च में भारी भ्रष्टाचार होता है | ऑडिट करने वाले भी प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के कार्यक्रमों पर हुए खर्च पर ऐतराज करने से डरते हैं | मोरबी के अस्पताल में श्री मोदी के आने के खबर के बाद हुए रंग – रोगन से अस्पताल की समूची व्यवस्था चरमराई होगी | वहां भर्ती मरीजों को भी बेशक परेशानी झेलनी पड़ी | लेकिन राज्य  सरकार ने जिला प्रशासन और उसने अस्पताल प्रबंधन को कसा होगा कि प्रधानमंत्री के वहां आने के पहले सब कुछ चकाचक हो जाना चाहिए और ऊपर से आये हुक्म के मुताबिक़ श्री मोदी के आगमन के पहले अस्पताल को चमका दिया जाए | प्रधानमंत्री की सुरक्षा का सवाल आड़े आता है अन्यथा यदि वे अस्पताल का औचक निरीक्षण करें तब उन्हें समझ आयेगा कि वास्तविकता क्या है ? ये चलन पूरे देश में एक समान है | मंत्री के दौरे पर आयोजन स्थल पर गड्ढे खोदकर गमले गाड़ दिए जाते हैं जो उनके जाते ही निकाल लिए जाते हैं | और भी  जो कुछ किया जाता है वह जगजाहिर है | सवाल ये है कि जिन उच्च पदस्थ लोगों को जनता की तकलीफें दिखाई जानी चाहिए उनसे उनको छिपाना अव्वल दर्जे की मूर्खता भी है और धोखेबाजी भी | आश्चर्य इस बात का है कि जिन लोगों के सामने ये दिखावा किया जाता है वे भी हकीकत से वाकिफ होने पर भी शांत बने रहते हैं | 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 1 November 2022

विकास की राह पर तेजी से बढ़ता देश का हृदय प्रदेश



अपने नाम के अनुरूप देश के मध्य भाग में स्थित मध्यप्रदेश  आज अपना 67 वां स्थापना दिवस मना रहा है | 1 नवम्बर 1956 को राज्य पुनर्गठन के आधार पर जब नए राज्यों की संरचना हुई तब मध्यभारत , महाकोशल , विन्ध्य और भोपाल नामक चार अंचलों  को मिलाकर इस प्रदेश का गठन किया गया | यद्यपि इसकी राजधानी जबलपुर  में प्रस्तावित थी किन्तु राजनीतिक कारणों से भोपाल को वह गौरव हासिल हो गया | उक्त चारों अंचल हिंदी भाषी थे इसलिए उनमें किसी भी तरह का विवाद नहीं हुआ | यद्यपि भौगोलिक और सांस्कृतिक दृष्टि से कुछ भिन्नताएं रहीं किन्तु समावेशी और शांत स्वभाव के कारण चारों के बीच भावनात्मक तौर पर सामन्जस्य और सद्भाव कायम रहा | देश के सबसे विशाल प्रान्त होने का गौरव भी उसे हासिल था | उसकी सीमा उ.प्र . बिहार , राजस्थान ,महाराष्ट्र , गुजरात , आंध्र और उड़ीसा से मिलती थीं | इस वजह से इस प्रदेश में इन सभी राज्यों के लोग आकर बसते गये और देश का दिल कहे जाने वाले इस प्रदेश ने उन सभी को खुले मन से स्वीकार करते हुए अपना बना लिया | यही वजह है कि म.प्र देश की सांस्कृतिक विविधता का जीवंत प्रतीक बन गया |  बाद में 1 नवम्बर 2000 को छत्तीसगढ़ के रूप में इसका एक हिस्सा अलग होकर नया राज्य बना जो खनिज संपदा सम्पन्न होने से आर्थिक  तौर पर काफी समृद्ध तो था ही , बिजली उत्पादन में अग्रणी होने के साथ ही धान के कटोरे के तौर पर उसकी प्रतिष्ठा थी | ऐसे अंचल के अलग होने के बाद ये आशंका व्यक्त की जाने लगी थी कि म.प्र बीमारू राज्य का कलंक शायद ही कभी धो सकेगा | हालाँकि अपनी विशाल वन संपदा , जल की प्रचुरता , उपजाऊ जमीन , सदा नीरा नदियाँ , खनिज उपलब्धता , धार्मिक और ऐतिहासिक  महत्व के केंद्र और राष्ट्रीय उद्यानों के कारण यहाँ विकास की असीम संभावनाएं रहीं किन्तु इच्छा शक्ति और विकासपरक सोच के अभाव के चलते म.प्र अति पिछड़े राज्य की श्रेणी में ही बना रहा | यहाँ की उपजाऊ धरती में सिर्फ अनाज ही नहीं अपितु राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की प्रतिभाओं ने जन्म लिया | कला , साहित्य , शिक्षा , पत्रकारिता , राजनीति , खेल के अलावा भी ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जिसमें यहाँ जन्मी प्रतिभाओं ने अपने कौशल का परिचय न दिया हो | देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बने क्रमशः स्व. डा. शंकर दयाल शर्मा और  भारत रत्न स्व. पं. अटल बिहारी वाजपेयी म.प्र की धरती के ही सपूत थे | यह प्रदेश विकास की अपार संभावनाओं के बाद भी  क्यों पिछड़ा  ये सवाल हर किसी के मन में उठता रहा | लेकिन धीरे – धीरे इसने अपनी क्षमताओं को पहिचाना और देखते – देखते ऊंची छलांगे लगते हुए राष्ट्रीय स्तर पर सभी का ध्यान आकर्षित किया | परिणामस्वरूप बीमारू राज्य का दाग मिटाते हुए यह विकास के नए प्रतीक के तौर पर सामने आया | निवेशकों के लिये ये प्रमुख आकर्षण का केंद्र है | शिक्षा , चिकित्सा , पर्यटन के साथ ही  कृषि के क्षेत्र में बीते कुछ दशकों में जो प्रगति यहाँ हुई वह निश्चित रूप से संतुष्टि का भाव जगाने वाली है | लेकिन अभी वह मुकाम दूर है जहाँ म.प्र को होना चाहिए | अपने अप्रतिम प्राकृतिक सौंदर्य और आधा दर्जन से ज्यादा संरक्षित राष्ट्रीय उद्यानों के कारण यहाँ पर्यटन की बेशुमार संभावनाएं हैं | देश के बीच में स्थित होने से आवागमन भी सुलभ है | रेल और सड़क मार्ग के अलावा वायु मार्ग से भी म.प्र. आना बेहद सरल है | औद्योगिक इकाइयों के लिए बिजली और पानी के अलावा पर्याप्त भूमि की उपलब्धता यहाँ विकास के नए अवसर प्रदान कर रही है | गेंहू के उत्पादन में म.प्र पंजाब और हरियाणा को टक्कर देने की स्थिति में है | राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन के अंतर्गत प्रदेश की  व्यावसायिक राजधानी  इंदौर लगातार देश का सबसे स्वच्छ नगर बना हुआ है | इन सब कारणों से म.प्र विकास की राह पर तेजी से बढ़ रहा है | यहाँ से गुजरने वाले राजमार्ग लोगों को आकर्षित करते हैं | खजुराहो . ओंकारेश्वर , महाकालेश्वर , अमरकंटक , भेडाघाट , सांची जहाँ धार्मिक पर्यटन को आकर्षित करते हैं वहीं पुरातात्विक महत्व के अनगिनत स्थान न सिर्फ सैलानियों वरन शोधकर्ताओं की रुचि का विषय हैं | वन्य जीवन को निकट से देखने के इच्छुक लोगों के लिए कान्हा , बांधवगढ़ , पेच , पन्ना के राष्ट्रीय उद्यान देश – विदेश में ख्याति अर्जित कर रहे हैं | अपनी स्थापना का 67 वां महोत्सव मनाते हुए म.प्र पूरे आत्मविश्वास से भरा हुआ है | यहाँ का माहौल तनावरहित है | कानून व्यवस्था की स्थिति तुलनात्मक दृष्टि से काफी बेहतर है | इसीलिये फिल्मों की शूटिंग के लिए यह फिल्म निर्माताओं की पसंद बनता जा रहा है | आज निश्चित रूप से खुशियों का दिन है | 67 वर्ष का कालखंड किसी प्रदेश के लिए आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त होता है | भले ही प्रारंभिक तौर पर कुछ दशक इस मामले में बेकार चले गये लेकिन अब यह विकास की राह पर पूरी गति से दौड़ रहा है | इसमें न केवल प्रतिस्पर्धा में भाग लेने आत्मबल पैदा हुआ है अपितु जीतने का जूनून भी नजर आने लगा है | हालाँकि राजनीति से ये भी अछूता नहीं है लेकिन अन्य राज्यों की अपेक्षा यहाँ कटुता नहीं है | इस वजह से यहाँ आने वाले भय मुक्त होकर अपना कार्य करते हैं | भाषा और क्षेत्रीय भावनाओं से  उत्पन्न होने वाले विवादों से ये सर्वथा परे है | बड़े अंचल में आदिवासी आबादी होने से यहाँ प्राचीन भारतीय समाज के प्रत्यक्ष अनुभव किये जा सकते हैं | कुल मिलाकर म.प्र एक विकासोन्मुखी राज्य के रूप में राष्ट्रीय परिदृश्य पर अपनी छाप छोड़ते हुए मुख्यधारा से जुड़ा हुआ है | बीते कुछ सालों की उप्लब्धियाँ इसके सुनहरे भविष्य का संकेत हैं | उम्मीद की जा सकती है कि आजादी के अमृत महोत्सव के सुखद संयोग के साथ प्रदेश का यह स्थापना दिवस सुनहरे भविष्य की दिशा में एक बड़ा कदम होगा |

- रवीन्द्र वाजपेयी