Friday, 18 November 2022

उद्धव ठाकरे : न इधर के रहे न उधर के रहे



शिवसेना उद्धव गुट के प्रवक्ता संजय राउत ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा दिए गए वीर सावरकर विरोधी बयान से नाराज होकर महा विकास आघाड़ी नामक गठबंधन तोड़ने की चेतावनी दे डाली | उद्धव  ठाकरे द्वारा उक्त बयान से असहमति व्यक्त करने के बाद उनके प्रवक्ता  द्वारा गठबंधन से अलग होने की बात इस बात का संकेत है कि उनको अब कांग्रेस के साथ जुड़ने का नुकसान समझ में आने लगा | सही बात ये है कि स्व. बाल ठाकरे द्वारा स्थापित शिवसेना जिस रास्ते पर चलती आई उसमें कांग्रेस और राकांपा के साथ हाथ मिलाने की  गुंजाईश ही नहीं थी | यद्यपि बीते कुछ सालों  में बेमेल गठबंधन का सबसे बड़ा उदाहरण जम्मू कश्मीर में भाजपा और पीडीपी की मिली जुली सरकार रही | लेकिन बाद में ये स्पष्ट हो गया कि भाजपा ने वह पांसा बहुत ही सोच समझकर चला था | इसीलिए जब महबूबा मुफ्ती की सरकार गिराने के बाद धारा 370 को मोदी सरकार द्वारा  विलोपित किया गया तो वह पाप भी पुण्य में बदल गया | उसके ठीक विपरीत उद्धव ने श्री राउत और रांकापा नेता शरद पवार के चक्रव्यूह में फंसकर अपनी फजीहत करवा ली | भाजपा के साथ दशकों पुराना उनका गठबंधन दरअसल हिंदुत्व और राष्ट्रवाद को पर आधारित था | लेकिन अपने स्वर्गीय पिता की दूरगामी सोच  के विरुद्ध जाते हुए उद्धव ने सत्ता का मोह पाल लिया |  भले ही वे  मुख्यमंत्री बन बैठे और उनके बेटे आदित्य को भी  सत्ता का सुख मिल गया परन्तु शिवसेना की पूरी पुण्याई समंदर में डूब गयी | मुम्बई में आतंकवाद के सरगना दाउद  इब्राहीम के संरक्षक होने का आरोप शिवसेना जिन श्री पवार पर लगाया करती थी उन्हीं की शरण में उद्धव का जाकर बैठ जाना पार्टी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों को हजम नहीं हो रहा था | स्मरणीय है कि गांधी परिवार शिवसेना के साथ गलबहियां करने के प्रति अनिच्छुक था किन्तु श्री पवार ने सोनिया गांधी से मिलकर उनको राजी कर लिया | लेकिन  खींचातानी खत्म नहीं हुई और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष  आगामी चुनाव अलग लड़ने की घोषणा दोहराते रहे | पूर्व में भी  श्री गांधी ने वीर सावरकर के बारे में तमाम ऐसी बातें कहीं जिनसे शिवसेना आगबबूला तो हुई  लेकिन सत्ता गंवाने  का साहस श्री ठाकरे न दिखा सके और बड़ी – बड़ी बातें करने वाले श्री राउत भी मिमियाकर रह गए | सही बात ये है कि कांग्रेस उस सरकार में आधे – अधूरे मन से शामिल थी क्योंकि सत्ता की असली मलाई शिवसेना और राकांपा खा रही थी  | बावजूद उसके शिवसेना में अंतर्विरोध उभरने लगे क्योंकि ठाकरे परिवार और श्री राउत जैसे कुछ दरबारियों को ही पूरा लाभ मिल रहा था | अंततः वह गठबंधन बिखराव का शिकार हो गया और अवसर की तलाश में बैठी भाजपा ने एकनाथ शिंदे की ताजपोशी करवाकर साबित कर दिया कि राजनीति केवल संभावनाओं  ही नहीं अपितु आश्चर्यचकित करने वाली बातों की भी समानार्थी है | महा विकास  आघाड़ी सरकार के गिरने से राकांपा  और कांग्रेस का तो कुछ गया नहीं लेकिन उद्धव ठाकरे का समूचा राजनीतिक वैभव  खत्म हो गया | यदि श्री पवार और कांग्रेस उनकी सरकार गिराते तब उनके पास पिता की विरासत तो रहती | लेकिन श्री शिंदे ज्यादा चतुर निकले जिन्होंने हिंदुत्व से भटकने का आरोप लगाकर उद्धव से सत्ता तो छीनी ही ,  पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह भी विवादग्रस्त बना दिया | कुल मिलाकर श्री ठाकरे उस खेल में  न इधर के रहे न उधर के रहे वाली हास्यास्पद स्थिति में आ खड़े हुए | यही कारण है कि उनकी नाराजगी से बेफिक्र होकर श्री गांधी लगातार वीर सावरकर के विरुद्ध कुछ न कुछ कहते रहे | इन्तेहा तो तब हो गई जब महाराष्ट्र आकर उन्होंने वही हिमाकत की जिसके बाद श्री राउत को गठबंधन छोड़ने की  धमकी देनी पड़ी | इस प्रकार कांग्रेस ने उद्धव को बुरी तरह फंसा लिया है | यदि वे गठबंधन तोड़ते हैं तब राहुल मुसलमानों को खुश करने में कामयाब हो जायेंगे जो कांग्रेस और  शिवसेना की जुगलबंदी से खफा होकर असदुद्दीन ओवैसी में संभावनाएं देखने लगे थे और यदि उद्धव आघाड़ी से पृथक नहीं होते तो हिन्दुओं के बीच उनका बचा – खुचा जनाधार भी दरक जाएगा |  एक संभावना ये भी जन्म ले सकती है कि वे दोबारा भाजपा के साथ आयें और एकनाथ शिंदे को आगे रखते हुए शिवसेना के एकीकरण की स्थितियां उत्पन्न होने दें | दरअसल उनकी समझ में आ गया है कि श्री शिंदे और भाजपा का गठजोड़ हिन्दू मतों को आकर्षित करने में सक्षम है जबकि कांग्रेस और रांकपा के साथ रहकर भी वे मुस्लिम मतों को आकर्षित नहीं कर सकेंगे | जमानत पर जेल से बाहर आते ही श्री राउत ने जिस तरह से शिंदे सरकार द्वारा किये गए अच्छे कार्यों को सराहा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह से मिलने की इच्छा व्यक्त की वह किसी  रणनीति का हिस्सा हो सकता है | बहरहाल वीर सावरकर के  बहाने उद्धव अपने राजनीतिक पाप धोने का प्रयास कर  रहे हैं | इसमें वे कितने  सफल होंगे ये कहना कठिन है क्योंकि भाजपा दोबारा  दबाव की राजनीति को सहन करने के पहले दस बार सोचेगी | वैसे भी उद्धव और आदित्य दोनों अपनी आक्रामकता और विश्वसनीयता गँवा चुके हैं इसलिए  वे जिसके साथ रहेंगे उसके लिए बोझ साबित होंगे | शायद श्री गांधी ने भी यही सोचकर महाराष्ट्र में ही सावरकर जी पर  निशाना साधा ताकि ठाकरे परिवार खुद गठबंधन से दूर हो जाए | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 17 November 2022

सावरकर विवाद : दादी और पोते में कौन सच



 कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अग्रणी स्वाधीनता संग्राम सेनानी वीर सावरकर के बारे में गत दिवस जो कहा उससे महाराष्ट्र की राजनीति में उबाल आने के साथ ही कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ सकती हैं | उल्लेखनीय है वीर सावरकर की गिनती उन अग्रणी स्वाधीनता संग्राम सेनानियों में होती है जिन्होंने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध जमकर संघर्ष किया था | ब्रिटेन में पढ़ते हुए ही वे क्रांतिकारियों के सम्पर्क में आ गए थे | गिरफ्तार कर भारत लाये जाते समय पानी के जहाज से कूदकर तैरते हुए फ्रांस की सीमा तक पहुँच जाने और उसके बाद अंडमान की सेलुलर जेल में आजीवन कारावास की सजा भोगने के वृतान्त उनकी तेजस्विता के प्रमाण हैं | श्री गांधी ने गत दिवस भारत जोड़ो यात्रा के दौरान महाराष्ट्र के अकोला में एक पत्र की प्रतिलिपि पत्रकारों को दिखाकर उसे वीर सावरकर का माफीनामा बताया जिसमें उन्होंने अंग्रेजों का आज्ञाकारी सेवक बनने की मंशा व्यक्त की थी  | उस पत्र को गांधी जी ,पं. नेहरु और सरदार पटेल के साथ धोखा बताते हुए श्री गाँधी ने कहा कि उन तीनों ने जेल में रहना पसंद किया किन्तु माफी नहीं माँगी | उनके इस बयान पर भाजपा का नाराज होना तो स्वाभाविक ही था लेकिन बीते कुछ समय से कांग्रेस के सहयोगी बने हुए पूर्व मुख्यमंत्री और शिवसेना के एक गुट के नेता उद्धव ठाकरे ने भी असहमति व्यक्त की है | हालाँकि उन्होंने अपने चिर -परिचित तेवर दिखाने से परहेज किया जिसका कारण गठबंधन की मजबूरी है |  लेकिन शिवसेना से अलग हुए मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने श्री गांधी की कड़े शब्दों में आलोचना करते हुए इसे महाराष्ट्र का अपमान बताया | राज्य के अनेक हिस्सों में श्री गांधी के पुतले जलाये गये और विरोध प्रदर्शन हुए | वीर सावरकर के एक परिजन ने उनके विरुद्ध पुलिस में रिपोर्ट भी दर्ज करवाई है | चूंकि मामला राजनीतिक है इसलिए  बयानबाजी का आदान - प्रदान भी चल पड़ा है | यद्यपि ये पहला अवसर नहीं है जब किसी कांग्रेस नेता ने वीर सावरकर के बारे में इस तरह की बात कही हो | देखा - सीखी पार्टी के अन्य  नेता और कार्यकर्ता भी उनका अनुसरण करते हुए आपत्तिजनक बातें कहते रहे हैं | दरअसल कांग्रेस की वीर सावरकर से नाराजगी के पीछे महात्मा गांधी की हत्या कही  जाती  है किन्तु उस  मामले में उन पर लगाये आरोप साबित नहीं हुए | और इसीलिये प्रधानमंत्री रहते हुए राहुल की दादी इंदिरा गांधी ने वीर सावरकर के जन्म शताब्दि के आयोजन के प्रति अपनी शुभकामनाएँ देते हुए उनको भारत का महान सपूत कहते हुए अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध उनके  साहसिक संघर्ष को स्वाधीनता संग्राम का महत्वपूर्ण अध्याय निरुपित किया था  | 20 मई 1980 को प्रधानमंत्री के अधिकृत लेटर हेड पर लिखित उक्त पत्र शासकीय रिकॉर्ड के साथ ही इन्टरनेट पर भी उपलब्ध है | इतना ही नहीं इंदिरा जी की सरकार ने सावरकर जी की जन्म शताब्दि के अवसर पर उनके सम्मान में डाक टिकिट भी जारी किया था | ये भी सुनने में आया कि श्रीमती गांधी ने जन्म शताब्दि समारोह हेतु 11 हजार रु. का आर्थिक सहयोग भी निजी तौर पर दिया था | ऐसा नहीं है कि ये सब बातें कांग्रेस के वरिष्ट नेताओं से छुपी हुई हों क्योंकि अतीत में जब भी  इस तरह का विवाद उठाने की कोशिश  हुई तब – तब इंदिरा जी का उक्त पत्र और डाक टिकिट जारी किये जाने की जानकारी मय दस्तावेज के सामने आई | पता   नहीं राहुल इन सच्चाइयों से आंखें चुराने का प्रयास क्यों करते हैं ? और फिर कांग्रेस की वर्तमान हालत में सावरकर जी का हाथ तो हैं नहीं क्योंकि वे तो 1966 में ही चल बसे थे | हिन्दू महासभा नामक जिस राजनीतिक दल से उनका सम्बन्ध था वह भी राष्ट्रीय राजनीति में अप्रासंगिक है | भाजपा और शिवसेना के दोनों धड़े निश्चित तौर पर सावरकर जी के प्रशंसक हैं और उसका कारण उनका प्रखर हिन्दुवादी होना था | स्वाधीनता सेनानी के अलावा उन्हें समाज सुधारक के रूप में भी जाना जाता रहा है | छुआछूत के विरूद्ध उनके प्रयास काफी सफल भी हुए | वे उच्च कोटि के लेखक और कवि भी थे | ऐसा लगता है जो ऐतिहासिक भूल वामपंथियों ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के विरुद्ध विषवमन के रूप में की वही श्री गांधी वीर सावरकर की आलोचना करते हुए दोहरा रहे हैं | आज प. बंगाल में वामपंथी पूरी तरह हाशिये पर धकेल दिये गए तो उसका कारण नेताजी और स्वामी विवेकानन्द सरीखे महापुरुषों से घृणा रखना ही था | कांग्रेस को यह  समझना चाहिए कि वीर सावरकर पर एक उंगली उठाने से बाकी उसी की ओर उठती हैं | इंदिरा जी ने तो स्वाधीनता संग्राम अपनी आँखों से देखा था | वे हिंदूवादी राजनीति की आलोचक भी रहीं इसीलिये 1969 के कांग्रेस विभाजन के बाद उनकी वामपंथियों से निकटता बढ़ी | उनके शासन काल में रास्वसंघ पर प्रतिबंध भी लगा | आपातकाल के बाद 1980 में दोबारा सत्ता में लौटने के बाद वीर सावरकर की प्रशंसा में लिखा पत्र और उनके सम्मान में डाक टिकिट जारी किया जाना ये साबित करने के लिए काफी है कि स्वाधीनता सेनानी के तौर पर श्रीमती गांधी उन्हें कितना आदर  देती थीं  | जब श्री गांधी ने  पहली बार सावरकर जी की देशभक्ति पर सवाल खड़े किये थे तब भी इंदिरा जी का संदर्भित पत्र सामने आया था | ऐसे में उन्हें सच्चाई से अवगत हो जाना चाहिए था परन्तु ऐसा लगता है राजनीतिक परिपक्वता के मामले में वे अभी भी कच्चे हैं | अब जबकि उन्होंने एक बार फिर वीर सावरकर को घेरने का प्रयास किया है तब उन्हें अपनी स्वर्गीय दादी द्वारा प्रधानमंत्री रहते हुए उनके बारे में जो कहा गया उस पर भी टिप्पणी करने का साहस दिखाना चाहिए | देश को ये जानने का अधिकार है कि सावरकर जी के बारे में जो इंदिरा जी लिख गईं क्या उनका पोता उससे झूठ साबित करने की हद तक जाएगा ?

- रवीन्द्र वाजपेयी

कांग्रेस के गले की फ़ाँस बन रहा राजस्थान



राजस्थान कांग्रेस शासित सबसे प्रमुख राज्य है | मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पार्टी के वरिष्ट नेता है जिन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जा रहा था किन्तु वे मुख्यमंत्री पद छोड़ने राजी नहीं हुए | और जब पार्टी के केन्द्रीय पर्यवेक्षक के तौर पर वर्तमान अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और महामंत्री अजय माकन नए नेता का चयन करने जयपुर गए तब गहलोत समर्थक विधायकों ने उनकी उपेक्षा करते हुए अलग से बैठक कर डाली जिसकी वजह से श्री गहलोत के स्थान पर सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाने की आलाकमान की योजना  धरी की धरी रह गयी | उल्लेखनीय है मुख्यमंत्री को गांधी परिवार का करीबी माना जाता रहा है | इसीलिये जब श्री पायलट  उनके विरुद्ध बगावत का झंडा उठाये हुए कुछ विधायकों के साथ हरियाणा जा बैठे थे उस समय भी आलाकमान ने श्री गहलोत का साथ दिया था | लेकिन बीते कुछ समय से वह सचिन को उपकृत करने की मासिकता दिखा रही थी जिसके लिए श्री गहलोत को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का दांव चला गया | लेकिन जादूगर रहे मुख्यमंत्री ने हाथ की सफाई को पकड़ लिया और अपने समर्थक विधायकों के जरिये  आलाकमान से आये पर्यवेक्षकों को खाली हाथ लौटने जैसी परिस्थिति उत्पन्न करवा दी | उपेक्षा और अपमान का सामना करने के बाद दिल्ली लौटकर श्री खरगे और श्री माकन ने उनकी अवहेलना करने वाले विधायकों के विरुद्ध अनुशासन का डंडा चलाने की अनुशंसा सोनिया गांधी से की किन्तु श्री गहलोत ने आकर उनसे क्षमा याचना करते हुए अध्यक्ष के चुनाव से कन्नी काट ली | जिसके बाद श्री खरगे को मैदान में उतारा गया | उस दौरान राहुल गांधी की  भारत जोड़ो यात्रा शुरू हो जाने की वजह से पार्टी मुख्यालय सुनसान पड़ा हुआ था | श्रीमती गांधी खुद होकर फैसला करने में असमर्थ थीं क्योंकि श्री  गहलोत को ज़रा सा छेड़ने पर राजस्थान की सरकार हाथ से निकल जाने का खतरा था | और फिर मौका मिलते ही श्री गहलोत ने यात्रा में शामिल होकर राहुल की मिजाजपुर्सी कर डाली | उसके बाद उनका  आत्मविश्वास और बढ़ गया तथा वे आगामी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर तेजी से सक्रिय हो उठे | श्री खरगे के अध्यक्ष बन जाने के बाद भी महीना भर बीतने आया लेकिन राजस्थान में केन्द्रीय पर्यवेक्षकों को ठेंगा दिखाने वाले कांग्रेस विधायकों के विरुद्ध कार्रवाई और श्री गहलोत को हटाये जाने के सांकेतिक विरोध स्वरूप विधानसभा अध्यक्ष को अपना त्यागपत्र देने वाले विधायकों का मसला लंबित रखा गया | शायद आलाकमान भी ये मान बैठा था कि राजस्थान में यथास्थिति बनाये रखना ही सुरक्षित है | लेकिन गत दिवस अचानक खबर आई कि श्री माकन ने राष्ट्रीय अध्यक्ष को पत्र लिखकर कहा कि चूंकि उनकी दी गई रिपोर्ट पर गहलोत समर्थक उपद्रवी  विधायकों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की गयी  लिहाजा उनका राष्ट्रीय महामंत्री बना रहना निरर्थक है |  उनके त्यागपत्र का कारण ये बताया जा रहा है कि गहलोत समर्थक जिन विधायकों पर गाज गिराने की सिफारिश उन्होंने की उनको भारत जोड़ो यात्रा संबंधी महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा गया है | ज़ाहिर है ऐसा मुख्यमंत्री की सलाह और स्वीकृति से ही हुआ होगा | देखना यह है कि श्री खरगे और गांधी परिवार इस मामले में क्या कदम उठाता है क्योंकि श्री माकन दिल्ली के हैं और वहां होने जा रहे स्थानीय निकाय के चुनाव में उनकी बेरुखी कांग्रेस के लिए दूबरे में दो आसाढ़ वाली कहावत चरितार्थ कर देगी | उनके खफा होने  का एक कारण ये भी है कि अपमान तो उनका और श्री खरगे का एक साथ हुआ लेकिन वे तो अध्यक्ष बनकर संतुष्ट हो चले लेकिन उनकी अपनी किरकिरी हो गयी जो भेजे गए थे मुख्यमंत्री को हटवाने किन्तु चंद विधायकों की बदसलूकी पर उन्हें दण्डित तक नहीं करवा सके | निश्चित तौर पर ये किसी भी नेता के लिए अपमानजनक स्थिति है | लेकिन श्री माकन ने जो कदम उठाया वह अप्रत्यक्ष रूप से गांधी परिवार के लिए चेतावनी है क्योंकि ये बात सभी जानते हैं कि बतौर अध्यक्ष श्री खरगे इस बारे में निर्णय लेने का खतरा शायद ही उठाएंगे | हालाँकि श्री माकन की हस्ती इतनी बड़ी भी नहीं है कि वे गांधी परिवार से टकरा सकें लेकिन उनका त्यागपत्र और उसके कारणों से इतना तो स्पष्ट हो गया है कि कांग्रेस के उच्च नेतृत्व पर अनिर्णय की जो प्रवृत्ति हावी हो गई है उसके कारण अनेक समस्याएँ जन्म ले रही हैं | राजस्थान का मसला जिस तरह उलझा उसके लिए जितनी श्री गहलोत और श्री पायलट के बीच की रस्साकशी जिम्मेदार है उतना  ही कांग्रेस आलाकमान का लटकाऊ रवैया जिसकी वजह से वह चाहते हुए भी मुख्यमंत्री पद पर अपनी पसन्द का व्यक्ति नहीं बिठा पा रहा | सबसे बड़ी बात ये है कि न तो पार्टी ने श्री पायलट द्वारा अतीत में दिखाए बगावती तेवरों पर  कार्रवाई की और न ही वह गहलोत समर्थक   विधायकों की स्वेच्छाचारिता पर अंकुश लगाने का साहस कर पा रही है | इसी का लाभ उठाकर श्री माकन ने अपना गुस्सा व्यक्त करने का साहस दिखाया |  इस समूचे प्रकरण में पार्टी  का उच्च नेतृत्व जिस प्रकार किंकर्तव्यविमूढ़ होकर बैठा हुआ है उससे अनुशासनहीनता करने वालों के हौसले बुलंद हो रहे हैं | कहाँ तो श्री गांधी के हवाले से ये सुनाई दिया था कि  चाहे सरकार चली जाए लेकिन अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं  की जायेगी और कहाँ अनुशासन की धज्जियां उड़ाने वालों को उनकी यात्रा के इंतजाम में लगाया जा रहा है | श्री माकन का त्यागपत्र वैसे तो शायद ही स्वीकार होगा लेकिन इसके जरिये उन्होंने श्री खरगे के सामने एक चुनौती तो पेश कर ही दी है | जिससे वे कैसे निबटते हैं इसी से उनकी कार्यशैली की बानगी मिल जायेगी |

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 16 November 2022

जनसंख्या नियंत्रण कानून की सख्त जरूरत



दुनिया की आबादी 8 अरब हो गई और भारत अगले  साल चीन को पीछे छोड़कर सबसे ज्यादा जनसँख्या वाला देश बन जाएगा | वैश्विक आबादी में अगली एक अरब की वृद्धि जिन देशों से अपेक्षित है उनमें  भारत , पाकिस्तान , कांगो , मिस्र , इथियोपिया , नाइजीरिया , फिलीपींस और  तंजानिया माने जा रहे हैं | इसका अर्थ ये है कि अव्वल तो चीन ने अपनी जनसँख्या वृद्धि पर जबर्दस्त नियंत्रण किया और दूसरा यह  कि दुनिया के संपन्न देश अभी भी आबादी बढ़ने के मामले में पीछे हैं | उक्त आठों देश अफ्रीका और एशिया महाद्वीप में स्थित हैं | जिनमें कुछ बेहद गरीब हैं  तो कुछ विकास की राह पर धीरे – धीरे बढ़ रहे हैं | केवल भारत ही है जो आर्थिक दृष्टि से उत्थान की ओर है | उल्लेखनीय तथ्य ये भी है कि दुनिया की आबादी में पिछली एक अरब  की वृद्धि में भारत का योगदान 15 फीसदी से ज्यादा है | बाली में चल रहे जी 20 देशों के सम्मलेन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की विशाल जनसँख्या के आधार पर दुनिया के बड़े देशों को तो दो टूक समझा दिया कि इतने बड़े उपभोक्ता बाजार की उपेक्षा करना अब उनके लिये संभव नहीं है इसलिए  भारत के बिना दुनिया का काम नहीं चल सकता | उन्होंने भारत की बढ़ती सामर्थ्य का उदाहरण देते हुए बताया कि उसने अपनी विशाल आबादी को कोरोना का टीका लगाने जैसा काम बेहद कुशलता से करने के साथ ही दुनिया भर को टीके की आपूर्ति भी की | श्री मोदी ने अमेरिका  के राष्ट्रपति जो बाईडेन की तरफ इशारा करते हुए कहा कि अमेरिका की कुल जनसँख्या से ज्यादा तो भारत में गरीबों के बैंक खाते हैं | जनसँख्या का आंकड़ा 8 अरब तक पहुंचते ही ये बात भी सामने आई कि चीन अपनी जनसँख्या में स्थिरता आने से चिंतित है और एक बच्चे की नीति में शिथिलता देने की तैयारी कर रहा है | ये भी सुनने में आ रहा है कि अगली एक अरब  की वृद्धि पिछले से ज्यादा समय में होगी | और बढ़ती औसत आयु के बावजूद जनसंख्या में बढ़ोतरी की गति पूर्ववत न होकर मंद पड़ेगी | लेकिन आंकड़ों के इस खेल के बीच हमारे लिये  चिंता का विषय ये है कि चीन जहां आर्थिक विकास के चरम पर है वहीं भारत आज भी अपने 80 करोड़ लोगों को मुफ्त खाद्यान्न देने की मजबूरी से गुजर रहा है | इसका कारण ये है कि हम  समय रहते अपने मानव संसाधन को उस तरह काम पर नहीं लगा पाए जैसा चीन ने कर दिखाया | भारत में परिवार नियोजन का नाम बदलकर परिवार कल्याण करने के बाद उस कार्यक्रम का कैसा बंटाधार हुआ ये सब जानते हैं | यहाँ तक कि दीवारों पर हम दो हमारे दो और छोटा परिवार सुखी परिवार जैसे नारे तक दिखाई देना बंद हो गए | किसी भी राजनीतिक दल के घोषणापत्र में जनसँख्या नियंत्रण सम्बन्धी कोई कार्ययोजना नहीं दिखती | हालाँकि बीते कुछ समय से राजनीतिक क्षेत्रों में चर्चा है कि केंद्र सरकार समान नागरिक संहिता के साथ ही जनसँख्या नियंत्रण कानून भी लाने जा रही है | यद्यपि इस बारे में कोई  अधिकृत जानकारी नहीं है | वैसे भाजपा शासित कुछ राज्यों में  समान नागरिक संहिता लागू किये जाने का मुद्दा आम  विमर्श बन गया है | गोवा में तो वह पहले से लागू  है | लेकिन जनसँख्या नियंत्रण संबंधी कानून बनाने का अधिकार चूंकि केंद्र के पास है इसलिए इस बारे में पहल उसे ही करनी पड़ेगी | लेकिन ऐसे विषयों पर राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हितों के मद्देनजर विचार होना चाहिए | मसलन मुस्लिम समुदाय में परिवार नियंत्रण के बारे में जो अरुचि है वह सदैव आलोचना के घेरे में रही | हालाँकि शिक्षित हो चुके मुसलमान भी एक या दो बच्चों की अवधारणा को स्वीकार करने लगे हैं लेकिन धर्मान्धता के प्रभावस्वरूप अपनी आबादी बढ़ाने की मानसिकता बहुतेरे मुस्लिमों में आज भी है | हिन्दुओं में भी अशिक्षा के कारण अनेक  निम्न वर्गीय लोग परिवार नियोजन को लेकर लापरवाह नजर आते हैं | इसके कारण केंद्र और राज्य सरकारों के काफी आर्थिक संसाधन लोक कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च हो जाते हैं | मोदी सरकार ने जनधन खातों के जरिये सीधे बैंकों में राशि जमा करवाने की जो व्यवस्था की उसके कारण भ्रष्टाचार बेशक घटा लेकिन सरकार पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ कम नहीं हो पा रहा | सबसे बड़ी बात ये है कि इतनी बड़ी आबादी के भोजन के लिए देश में पैदा होने वाला खाद्यान्न भले कम न पड़े लेकिन शिक्षा और  स्वास्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की समुचित व्यवस्था आज तक नहीं हो  सकी | आज देश के सामने जितनी भी समस्याएँ हैं उनके मूल में कहीं न कहीं जनसंख्या वृद्धि है जिसके कारण समूचा आर्थिक नियोजन गड़बड़ा जाता है | ये देखते हुए देशहित का तकाजा है कि केंद सरकार बिना देर किये जनसंख्या नियंत्रण संबंधी कानून बनाये | इसे लेकर राजनीतिक बवाल मचना स्वाभाविक है | धर्मनिरपेक्षता पर आघात जैसी बातें भी सुनाई देंगी परन्तु  जिस तरह जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाने का साहसिक कदम  उठाया गया ठीक वैसी ही मुस्तैदी जनसंख्या नियंत्रण के मामले में भी दिखानी चाहिए क्योंकि चीन से ज्यादा जनसँख्या होना गौरव की बात नहीं होगी बल्कि जब आर्थिक प्रगति के मामले में हम उसे पीछे छोड़ेंगे उस दिन सही  मायनों में हम विश्व शक्ति कहलाने लायक होंगे | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 15 November 2022

मतान्तरण : अतीत की गलतियों को सुधारने का समय



सर्वोच्च  न्यायालय द्वारा छल , लालच और जोर – जबरदस्ती से किये जाने वाले मतान्तरण के आरोपों संबंधी याचिका पर सुनवाई  करते हुए कहा गया कि यदि वे  सही हैं तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए  खतरा है , जिसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए | याचिकाकर्ता ने मतांतरण रोकने के लिए क़ानून बनाने की जो मांग की उस पर अदालत ने केंद्र सरकार से हलफनामा माँगा है | उल्लेखनीय है म.प्र और उड़ीसा में इस बारे में पहले से कानून बने हुए हैं और उनके अंतर्गत  कार्रवाई भी की जाती रही है | उक्त कानूनों को सर्वोच्च न्यायालय ने सही ठहरा दिया था | उस आधार पर याचिकाकर्ता की मांग में वजनदारी प्रतीत होती है |  उसके द्वारा चिंता जताए जाने के बाद हो सकता है केंद्र सरकार भी इस दिशा में आगे बढ़े | बहरहाल ये मुद्दा काफी समय से राष्ट्रीय विमर्श का विषय बना हुआ है | हालाँकि पूर्ववर्ती केंद्र सरकारें चूंकि इस बारे में उदासीन रहीं इसलिए देश के बड़े हिस्से में मतान्तरण एक सुनियोजित अभियान के रूप में चलता रहा | विशेष रूप से आदिवासी क्षेत्रों में मतान्तरण का काफी जोर देखा जा सकता है | बिहार , झारखण्ड , उड़ीसा , म.प्र और छत्तीसगढ़ में चूंकि अनु. जनजाति की जनसंख्या काफी ज्यादा है लिहाजा वहां मतान्तरण थोक के भाव हुआ | इसके पीछे जितनी गलती ईसाई मिशनरियों की है  उससे ज्यादा हमारे देश के राजनताओं की भी रही  जो अपने राजनीतिक स्वार्थ की खातिर देश के दूरगामी हितों को ताक पर रख देते हैं | इसमें दो राय नहीं हैं कि मिशनरियां शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं के साथ अनु.जाति और जनजाति बहुल इलाकों में डेरा जमाकर लोगों को आकर्षित करती हैं | भारत के संविधान में अपने धर्म का प्रचार करना जायज माना  गया है | स्वेच्छा से यदि कोई व्यक्ति अपना धर्म त्यागकर दूसरे को अपनाना चाहता है तब वह भी कानून की कसौटी पर सही है | इसी तरह यदि किसी को धर्म में रूचि नहीं  है और वह नास्तिक  बना रहना चाहता है तो उसे  आस्तिक बनने बाध्य नहीं किया जा सकता | सबसे  बड़ी बात ये है कि धर्म या मत को मानना पूरी तरह निजी मामला है | मसलन एक परिवार में एक से ज्यादा धर्म के अनुयायी हो सकते हैं | लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के सामने जो विषय विचाराधीन है वह धमकाकर , छल – कपट अथवा लोभ – लालच से मत या धर्म बदले जाने के विरुद्ध कानून बनाये जाने का है | भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है लेकिन प्रमाणित सत्य ये है कि बहुसंख्यक हिन्दुओं अथवा हिंदुत्व के करीब समझे जाने वाले भारतीय मूल के बाकी धर्म , पंथ या मत में आस्था रखने वाले जिस इलाके में अल्पसंख्यक होते हैं वे समस्या ग्रस्त बन जाते हैं |  ये बात सेकुलर जमात को कड़वी लग सकती है और उसके पैरोकार गंगा – जमुनी तहजीब का राग अलापने लगेंगे किन्तु  सर्वोच्च न्यायालय की ये टिप्पणी विचारणीय है कि  मतान्तरण राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है | याचिकाकर्ता ने जो आरोप लगाए हैं वे किसी से छिपे नहीं हैं | ताजा जानकारी के अनुसार पंजाब में दलित वर्ग के सिख भी  बड़ी संख्या में ईसाई धर्म अपना रहे हैं | सही बात ये है कि ईसाई मिशनरियों द्वारा अपना अभियान ज्यादातर उन्हीं इलाकों में चलाया  जाता है जहां आर्थिक और सामाजिक विषमता है | छुआछूत को  भी इसका जिम्मेदार माना जाता है | लेकिन देखने वाली बात ये है कि बीते सात दशक में देश में मतान्तरण के अधिकांश मामले आदिवासी इलाकों में हुए | इसका कारण उनका समाज की मुख्यधारा से  कटा रहना है जिसके लिए हिन्दू समाज के जिम्मेदार लोग और धर्माचार्य भी  कम जिम्मेदार नहीं हैं | ये बात भी गलत नहीं है कि मत या धर्म  परिवर्तन कर चुके बहुतेरे लोगों को ये पता ही नहीं होता कि उनसे क्या करवा लिया गया | यहाँ तक भी ठीक है लेकिन चूंकि  मतान्तरण के प्रभावस्वरूप राष्ट्रविरोधी गतिविधियाँ संचालित होती हैं अतः  उनको रोकना जरूरी हो जाता है | उड़ीसा और म.प्र में जो कानून बना है उसके प्रभावस्वरूप गैर कानूनी तरीके से मतान्तरण करवाने वालों पर कानून का शिकंजा कसता है | इसका अच्छा प्रभाव भी नजर आने लगा है | आतंकवाद और नक्सलवाद जैसी समस्याओं को बढावा देने में भी धर्म परिवर्तन का बड़ा योगदान है | केंद्र सरकार को चाहिए वह याचिका के संदर्भ में सकारात्मक रवैया प्रदर्शित करते हुए राष्ट्रीय स्तर पर कानून बनाये जाने को लेकर सर्वोच्च न्यायालय को तत्संबंधी जानकारी दे | देश विरोधी शक्तियों ने धर्म निरपेक्षता की आड़ में जो कुछ अब तक किया उसका दुष्परिणाम देखने के बाद भी यदि हम सावधान नहीं हुए तब ये मान लेना होगा कि हमने अतीत की ऐतिहासिक भूलों से कुछ नहीं सीखा | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 12 November 2022

निर्दयता पर न्याय की दया



भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों को उनकी सजा समाप्त करते हुए रिहा करने के आदेश देश की सबसे बड़ी अदालत द्वारा दिए गए हैं। अदालत का मानना है कि 30 वर्ष की सजा के बाद राजीव गांधी के हत्यारों का आचरण जेल मैनुअल के हिसाब से उत्तम कहा जा सकता है। इसके बाद न्यायालय ने उन्हें रिहा करने के आदेश जारी किए हैं। इससे पहले भी भारत के महामहिम राष्ट्रपति के पास इन लोगों की दया याचिका विचारार्थ थी। राजीव गांधी की हत्या में शामिल नलिनी के आग्रह पर श्रीमती सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति से दया याचिका में फांसी की सजा को माफ किए जाने की अपील भी की थी। सोनिया जी ने यह भी कहा था कि वह नलिनी को राजीव गांधी की हत्या के लिए माफ करती हैं! इन सभी घटनाक्रमों को देखते हुए भारत की सबसे बड़ी अदालत ने पूर्व प्रधानमंत्री के हत्यारों में से 6 को रिहा करने के आदेश दिए हैं। इस मामले में कुछ बरी भी हो चुके हैं। इसके बाद यह विषय एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। यहां सवाल यह उठाया जा रहा है कि क्या राजीव गांधी, श्रीमती सोनिया गांधी के पति के अलावा भी कुछ थे? क्या भारत के प्रधानमंत्री की हत्या हो जाने के बाद उसे पारिवारिक विषय बनाते हुए क्षमा कर देना उचित है? यह विषय आखिरकार न्याय व्यवस्था को भविष्य के लिए किस प्रकार से प्रभावित करेगा देखना जरूरी है। यह सवाल भी अपने आप में सामयिक है कि कोई हत्या का अभियुक्त वह भी सहज हत्या का अभियुक्त न होते हुए प्रधानमंत्री की हत्या का अभियुक्त हो , अपने आचरण के कारण सजा से मुक्त होने के की पात्रता रखता है? इन सवालों के उत्तर न केवल भारतीय राजनीतिक गलियारों में अपितु न्याय व्यवस्था की गलियों में भी मांगे जा रहे हैं। भारत की न्याय व्यवस्था के संदर्भ में आज भी किसी प्रकार की आशंका का प्रश्न उत्पन्न नहीं होता। इसके बाद भी अनेकों अवसरों में यह लगता है कि न्यायपालिका कुछ रचनात्मक प्रयोग करने का प्रयास कर रही है। पिछले कुछ समय से सरकार के निर्णयों की समीक्षा संबंधी विषयों को भी इसी संदर्भ के साथ जोड़कर देखा जा सकता है। ठीक उसी प्रकार से भारत के प्रधानमंत्री के हत्यारों को उनके आचरण के कारण समय से पहले रिहा करने का यह प्रसंग भी न्यायपालिका के नए प्रयोगों के रूप में देखा जा रहा है। सामान्यतया आम व्यक्ति को न्याय पाने के लिए ही बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं, वहीं दूसरी तरफ एक हाईप्रोफाइल मामले में अपराधियों के प्रति न्याय की दया का प्रदर्शन भी देखने को मिलता है। आने वाले समय में न्याय व्यवस्था में इस प्रकार के प्रयोगों का कितना लाभ होता है और कितने अपराधी अपने आचरण को समय से पहले सुधार पाते हैं यह गंभीरता पूर्वक देखने का विषय होगा। यदि न्याय व्यवस्था कोई गुणात्मक प्रयोग करना चाहती है तब हाई प्रोफाइल मामलों में और खासकर जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री जैसी हत्या शामिल हो वहां इन प्रयोगों में और अधिक सतर्कता की जरूरत है। अन्यथा हत्या के बाद आचरण सुधार के ड्रामे आम बात होने जैसी स्थिति हो सकती है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 11 November 2022

लाल टोपी लगाने मात्र से लोहियावादी पहचान नहीं मिलती



राजनीतिक दल किसे अपना उम्मीदवार बनायें ये उनका विशेषाधिकार है |  चूंकि उन्हें जनता से समर्थन लेना होता है इसलिए इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह क्या चाहती है ? संदर्भ उ.प्र की मैनपुरी लोकसभा सीट का है जो समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के निधन से रिक्त हुई है | उस पर होने जा रहे उपचुनाव हेतु सपा ने पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव को उम्मीदवार बनाने की घोषणा की है जो अतीत में भी सांसद रह चुकी हैं | 2019 के चुनाव में वे हार गई थीं | कुछ समय पूर्व आजमगढ़ में हुए उपचुनाव में भी डिम्पल को मैदान में उतारने की चर्चा चली किन्तु टिकिट किसी और को दिया गया तब लगा कि अखिलेश ने परिवारवाद के आरोप से बचने के लिए वह फैसला लिया था | लेकिन एन वक्त पर अचानक वह निर्णय उलट दिया गया और अखिलेश ने अपने चचेरे भाई पूर्व सांसद धर्मेन्द्र यादव को उम्मीदवारी दे दी जो  कि 2019 में पराजित हो चुके थे | उस फैसले को सपा कार्यकर्ताओं और जनता दोनों ने पसंद नहीं  किया और पार्टी के हाथ से उसकी परम्परागत सीट चली गयी | होना तो ये चाहिए था कि अखिलेश उस नतीजे से सबक लेते हुए इस बात का एहसास करते कि उनके राजनीतिक उत्थान में उनके पिता मुलायम सिंह की भूमिका रही है | मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने  पार्टी पर कब्जा करने के लिए  अपने चाचा शिवपाल  यादव और पिता के करीबी अमर सिंह , बेनीप्रसाद वर्मा और पार्टी का अल्पसंख्यक चेहरा रहे आज़म खां को हाशिये पर धकेलते हुए पिता को नाममात्र का अध्यक्ष बना डाला | यही वजह है कि 2012 के बाद से अखिलेश की राजनीति ढलान  पर आती चली गयी | 2014 का लोकसभा , और 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की धमाकेदार जीत के बाद अखिलेश को जनमत का रुझान समझ जाना चाहिए था किन्तु अपने पिता के लचीलेपन और संघर्षशीलता से उन्होंने सीख नहीं ली  और इस मुगालते में बैठे रहे कि घूम -फिरकर  सत्ता उनके पास आ जायेगी | 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जिस अंदाज में वापसी की उसके बाद अखिलेश की पकड़ और कमजोर हुई है  | मुलायम सिंह का स्वास्थ्य लगातार खराब होते जाने से परिवार में बिखराव तेज होने लगा | शिवपाल अपनी अलग पार्टी बनाकर बैठ गये | आज़म खान को जेल जाना पड़ा | सौतेले भाई की  पत्नी 2022 के विधानसभा चुनाव के समय ही भाजपा में शामिल हो गयी  | अनेक  छोटी पार्टियों और जातिगत समीकरणों को साधकर अखिलेश सोचने लगे कि  वे योगी  आदित्यनाथ के आभामंडल को नष्ट कर देंगे लेकिन जब परिणाम आये तो निराशा ही उनके हाथ लगी  |  किसान आन्दोलन का लाभ लेने के लिए लोकदल नेता जयंत चौधरी से हाथ मिलाने की जुगत भी काम नहीं आई | मुसलमानों के दम पर योगी को हराने की रणनीति औंधे मुंह गिरी | जो ओबीसी नेता साथ आये थे वे भी दायें बाएं होने लगे | ओवैसी की पार्टी ने मुसलमानों के बीच नए नेतृत्व की जो ललक पैदा की उसकी वजह से सपा का मुस्लिम जनाधार दरकने लगा | यहाँ तक कि यादव बहुल इलाकों तक में अखिलेश को पहले जैसा समर्थन नहीं मिला | हाल ही में हुए उपचुनावों के नतीजे सपा के लिए किसी झटके से कम नहीं हैं | जब तक मुलायम सिंह जीवित थे तब तक शिवपाल सिंह भी थोड़ा लिहाज रखते थे किन्तु उनका अंतिम संस्कार होते ही उन्होंने संवाददाताओं से बात करते हुए जिस तरह की राजनीतिक टिप्पणियाँ कीं उनसे ये लग गया कि वे ज्यादा समय तक परिवार का संकोच  नहीं करेंगे | ये उम्मीद जताई  जा रही थी दो लोकसभा और हाल ही में संपन्न विधानसभा उपचुनाव हारने के बाद अखिलेश  पार्टी के जनाधार के विस्तार पर ध्यान देंगे लेकिन मैनपुरी सीट परंतु अपनी पत्नी को उम्मीदवार बनाकर उन्होंने एक बार फिर  अपनी सीमित सोच का परिचय दे दिया | हालाँकि इस बात की सम्भावना है कि नेताजी के नाम से लोकप्रिय रहे मुलायम सिंह की मृत्यु के कारण उनके परिवार की परम्परागत मैनपुरी सीट पर सहानुभति लहर में डिंपल जीत जायेंगीं परन्तु उनकी बजाय पार्टी किसी ऐसे नेता को उतारती जो राज्य में उसके संगठन के विस्तार में सहायक होता तब शायद भविष्य की दृष्टि से उसे लाभ मिलता | उस दृष्टि से मुलायम सिंह ज्यादा व्यवहारिक थे जिन्होंने परिवारवाद और जातिवाद तो जमकर चलाया तथा अपने भाई  शिवपाल और रामगोपाल के साथ ही भतीजों को भी उपकृत किया | लेकिन जनेश्वर मिश्र सहित पुराने  समाजवादी छत्रपों को वे सदैव महत्व देते रहे | राष्ट्रीय राजनीति में आने के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पद पर अखिलेश को बिठा दिया लेकिन वहीं से सपा में विघटन की शुरुआत होने लगी | हालाँकि  नेताजी के रहते हुए असंतुष्ट तबका अपनी  नाराजगी को दबाये रहा | लेकिन अब हालात पहले जैसे नहीं हैं | पता नहीं अखिलेश इस वास्तविकता को क्यों नहीं समझ रहे | लोकसभा में पार्टी को अपनी आवाज रखने के लिए जुझारू लोगों की जरूरत है न कि परिवार के सदस्यों की | उ.प्र की राजनीति में सपा दूसरी बड़ी शक्ति मानी जाती है किन्तु ये कहने में कुछ भी  गलत नहीं है कि मुलायम सिंह के न रहने  के बाद उसका आधार बरकरार रखना आसान नहीं होगा | लाल टोपी लगा लेने के बाद भी अखिलेश लोहियावादी पहिचान नहीं रखते और यही उनकी समस्या बन गई है |

- रवीन्द्र वाजपेयी