Wednesday, 18 January 2023

देखें प्रधानमंत्री की सलाह को भाजपाई कितना मानते हैं



 
भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  भाजपा को राजनीतिक दल से ऊपर उठकर सामाजिक आन्दोलन बनाने की जो बात कही वह सभी दलों के लिए एक नेक सलाह है | भाजपा रास्वसंघ के प्रचारक रहे स्व.  दीनदयाल उपाध्याय को अपना वैचारिक मार्गदर्शक मानती है | जब स्व. डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ की स्थापना की और संघ से सहायता मांगी तब दीनदयाल जी को  राजनीतिक क्षेत्र में भेजा गया | डा. मुखर्जी चूंकि जल्द चल बसे इसलिए वैचारिक अभिभावक की भूमिका में दीनदयाल जी ही   आ गये  | हालाँकि बाद में अटल बिहारी वाजपेयी , नानाजी देशमुख , सुंदर सिंह भंडारी और कुशाभाऊ ठाकरे जैसे प्रचारक भी संघ से जनसंघ में आये किन्तु पार्टी के सैद्धांतिक चेहरे के रूप में  स्व. उपाध्याय का नाम ही लिया जाता  है | जब भाजपा  के रूप में जनसंघ का पुनर्जन्म हुआ तब उसने भी दीनदयाल जी के उस चिन्तन को ही आत्मसात किया जिसमें समाज के अंतिम छोर के व्यक्ति के उत्थान को सत्ता का उद्देश्य बताया  गया है | महात्मा गांधी और डा. राममनोहर लोहिया के विचार भी इसी पर जोर देते रहे | वामपंथी चिंतन का भी मूल आधार आर्थिक और सामाजिक विषमता  मिटाना ही है | वैसे राजनीति को सामाजिक आन्दोलन बनाने का सबसे सफल प्रयोग गांधी जी ने स्वाधीनता संग्राम के रूप में किया जिसमें  आजादी के बाद  की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था के बारे में उनकी  सोच  झलकती थी | लेकिन उनके अनुयायी सत्ता की मृग मरीचिका में उलझकर रह गये | भारत में समाजवादी चिंतन भी मूलतः कांग्रेस की कोख से ही निकला था इसलिए वह भी सत्ता की भूल भुलैया में  अपनी साख खो बैठा | उसके बाद अवसर मिला विशुद्ध भारतीय चिंतन पर आधारित राजनीति करने का दावा करने वाली भाजपा को जो बीते नौ साल से देश के साथ ही अनेक राज्यों की सत्ता पर काबिज है | हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर उसने शून्य से शिखर तक की यात्रा तो कर ली किन्तु स्व. उपाध्याय द्वारा जो उपदेश दिया गया उसे कार्यरूप में परिणित करने का उद्देश्य अभी भी पूरा नहीं हो सका | भले ही 80 करोड़ लोगों को मुफ्त खाद्यान्न और लाखों लोगों को आवास मिल गया किन्तु आर्थिक और शैक्षणिक विषमता के कारण बहुत बड़ा वर्ग आजादी के लाभों से वंचित है | प्रधानमंत्री चूंकि स्वयं संघ के प्रचारक  रहे हैं इसीलिये उनके द्वारा भाजपा को सामाजिक आंदोलन में बदलने की बात कहे जाने पर आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि  रास्वसंघ ने भी बीते कुछ वर्षों में वन्चित और उपेक्षित वर्ग को मुख्यधारा में लाने का जो अभियान चला रखा है उसी के कारण जातिवादी ताकतों की राजनीति कमजोर पड़ी है | हाल ही में छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में ईसाई मिश्नारियों द्वारा किये जाने वाले धर्मांतरण के विरुद्ध  आदिवासी जिस तरह से संगठित होकर सामने आये वह उन्हीं प्रयासों का  सुपरिणाम है | उस दृष्टि से श्री मोदी का सन्देश  भाजपा के सुरक्षित भविष्य के लिए सुझाया गया नुस्खा है | दरअसल प्रधानमंत्री जान चुके हैं कि सत्ता की अंधी दौड़ में शामिल राजनीतिक दल यदि समाज से कट जाता है तो एक सीमा के बाद उसका पराभव  सुनिश्चित है | और ये भी कि तात्कालिक लाभ बांटकर सत्ता भले ही प्राप्त कर ली जाये लेकिन बिना सामाजिक जुड़ाव के वह भी ज्यादा नहीं टिकती | कांग्रेस के अलावा प. बंगाल में वामपंथियों और सामाजिक न्याय के नाम पर जातिवादी राजनीति करने वाले समाजवादियों की जो स्थिति आज है उससे भाजपा ने सबक न लिया तब उसका भी वैसा ही हश्र होना तय है | और यही श्री मोदी की चिंता का विषय है | इस बारे में स्व. नानाजी देशमुख का उदाहरण सामने है जिन्होंने केंद्र सरकार का मंत्री पद त्यागकर राजनीति से सन्यास ले लिया और चित्रकूट में ग्रामोदय विवि के रूप में एक ऐसा आदर्श स्थापित किया जो गांधी जी के ग्राम स्वराज , लोहिया जी के समतामूलक समाज और दीनदयाल जी के एकात्म मानववाद का श्रेष्ठतम समन्वय है | देखने वाली बात ये होगी कि प्रधानमंत्री ने भाजपा को सामाजिक आन्दोलन के तौर पर विकसित करने की जो बात कही वह जमीन पर कितनी उतरती है क्योंकि उनकी पार्टी भी ऊपरी तौर पर तो बाकी  दलों की तरह  सत्ताभिमुखी नजर आती है | नब्बे के दशक में जब उसका सितारा उदय होने लगा था तब लालकृष्ण आडवाणी ने दो बातें कही थीं | पहली तो ये कि भाजपा देश का  राजनीतिक एजेंडा तय  करती है और दूसरा वह पार्टी विथ डिफ़रेंस है | तात्कालिक परिस्थितियों में चूंकि जनता अन्य सभी को आजमा चुकी थी इसलिए उसने भाजपा पर भरोसा  जताना शुरू किया जिसका चरमोत्कर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के राज्याभिषेक के रूप में सामने आया | उन्होंने सत्ता संभालते ही समाज के वंचित और उपेक्षित तबके के उत्थान पर ध्यान केन्द्रित किया और सरकारी  तौर -- तरीकों में आमूल बदलाव करते हुए जनधन खातों के रूप में ऐसी व्यवस्था ईजाद की जिसने दलालों को अलग कर दिया | उसी का असर रहा कि पांच साल बाद श्री मोदी को पहले से भी बड़ा जनादेश प्राप्त हुआ | उनके दूसरे कार्यकाल का अंतिम दौर शुरू हो चुका है | ऐसे समय में आम तौर पर सत्ता में बैठे नेता चुनावी रणनीति पर विचार करते हैं | जाहिर है भाजपा में भी ऐसा चल रहा होगा लेकिन राष्ट्रीय कार्यकारिणी में प्रधानमंत्री ने भाजपा को एक सामाजिक उपक्रम में बदलने का जो आह्वान किया वह 21 वीं सदी की राजनीतिक शैली बन सकती है | श्री मोदी को ये एहसास हो चला है कि राजनीति का जो मौजूदा स्वरूप है उसके प्रति आम जनता के मन में सम्मान घटता जा रहा है | ऐसे में यदि वह सत्ता की दौड़ से समय निकालकर  समाज के साथ जुड़ने का प्रयास करे तब विचारधारा के विस्तार के साथ ही सामाजिक विखंडन को रोकने में सहायक बन सकती है | लेकिन सवाल ये है कि उनकी इस सदिच्छा को कितने भाजपा नेता और महत्वाकांक्षाओं का बोझ लिए घूम रहे कार्यकर्ता सम्मान देते हैं ? दरअसल प्रधानमंत्री की दूरदर्शी सोच यही है कि पार्टी को अपना सामाजिक आधार इतना मजबूत कर लेना चाहिए जिससे वह किसी या कुछ नेताओं पर निर्भर न रहे | अन्य राजनीतिक दलों के लिए भी ये एक संकेत है |


रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 17 January 2023

तीसरे विश्वयुद्ध की तरफ बढ़ रहा यूक्रेन संकट



यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध को एक साल होने आ रहा है | 24 फरवरी 2022 को रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने विश्व जनमत को ठेंगा दिखाते हुए यूक्रेन पर बम बरसाना शुरू दिया | शुरुआत में लग रहा था कि यूक्रेन पिद्दी साबित होकर कुछ दिनों में ही घुटने  टेक देगा किन्तु अमेरिका सहित अनेक यूरोपीय देशों ने अपने दूरगामी हितों के मद्देनजर उसे आर्थिक और सामरिक सहायता देकर  मुकाबला करने का हौसला प्रदान किया | यही वजह है कि बुरी  तरह बर्बाद हो जाने के बावजूद वह आज भी रूस का सामना कर रहा है | हालाँकि पूरा देश धीरे – धीरे खंडहर बनता जा रहा है | बिजली , पानी , चिकित्सा और शिक्षा जैसी तमाम व्यवस्थाएं चौपट हो चुकी हैं | रूस के हवाई हमले रोजमर्रे की गतिविधि हो गए हैं | नागरिक ठिकानों पर मिसाइलें दागकर पुतिन अपनी  बदहवासी का परिचय दे रहे हैं | बीच – बीच में परमाणु हमले की धमकी भी सुनाई देती है | 11  महीने में  रूस अब तक जीत क्यों नहीं सका और यूक्रेन ने अब तक पराजय स्वीकार क्यों नहीं की ये हैरानी का विषय है | यदि रूस बिना जीते कदम पीछे खींच ले तो भी जितना नुकसान इस युद्ध में यूक्रेन का  हुआ है उससे उबरने में  उसे अनेक दशक लग जायेंगे | इस युद्ध का कारण रूस द्वारा यूरोपीय देशों को निर्यात की जाने वाली गैस और कच्चे तेल के आपूर्ति में यूक्रेनी भूमि और बंदरगाहों के उपयोग का अधिकार है | 2014 में इसी उद्देश्य से उसने उसके बेहद महत्वपूर्ण बंदरगाह क्रीमिया पर बलात कब्जा कर लिया था जो एक तरह का परीक्षण था | जब पुतिन ने देखा कि  उस कदम का दुनिया में ख़ास विरोध नहीं हुआ तब उन्होंने दूसरे चरण में दोनों देशों की सीमा पर स्थित अनेक यूक्रेनी  राज्यों में अलगाववादी आन्दोलन खड़े कर उन्हें अपने देश में शामिल करने की रणनीति बनाई | युद्ध शुरू करने के बाद कुछ हिस्सों में इकतरफा जनमत संग्रह करवाकर उनका विलीनीकरण भी कर लिया | इस युद्ध का अर्थव्यवस्था के साथ ही   वैश्विक शक्ति संतुलन पर जबर्दस्त प्रभाव पड़ा है | शुरुआत में युद्ध की प्रत्यक्ष वजह यूक्रेन द्वारा अमेरिकी वर्चस्व वाले नाटो नामक सैन्य संधि से जुड़ने का फैसला माना  गया था जिसके अंतर्गत अमेरिका की फौजें रूस की सीमाओं के निकट आकर बैठ जातीं जो पुतिन को गंवारा नहीं था | इसीलिये उन्होंने  उसके पहले ही हमला कर दिया गया | यूक्रेन इसके बारे में बेखबर नहीं था लेकिन उसे भरोसा रहा कि अमेरिका उसकी ढाल बनकर खड़ा  हो जायेगा किन्तु यहीं वह धोखा खा गया | चूंकि उसके नाटो से जुड़ने की प्रक्रिया अंतिम रूप नहीं ले सकी थी लिहाजा अमेरिका ने सीधे मैदान में आने की जगह दूर रहकर सहायता करने की नीति अपनाई | दरअसल अफगानिस्तान से लस्त – पस्त होकर निकले अमेरिका को ये डर सता रहा था कि कहीं यूक्रेन की आग में उसके हाथ न झुलस जाएँ | इसी कारण वह और उसके साथी यूक्रेन को रूस से टकराने के लिए मदद तो देते रहे जिससे रूस का मंतव्य अब तक पूरा नहीं  हो सका | लेकिन इस युद्ध के जारी रहने से दुनिया के सामने आर्थिक संकट के साथ ही अशांति की समस्या भी पैदा हो गयी है | लड़ाई जिस मोड़ पर आकर अटकी है उसे देखते हुए परिस्थितियाँ लघु विश्व युद्ध की तरफ बढ़ रही हैं जिसका  अंजाम परमाणु युद्ध के रूप में दुनिया को भोगना पड़ सकता है | और ऐसा हुआ तब पाकिस्तान जैसे गैर जिम्मेदार देश अपनी परमाणु शक्ति का अविवेकपूर्ण उपयोग कर सकते हैं | लेकिन इस सबके बीच संरासंघ की लाचारी जिस तरह से सामने आई है उसे देखते हुए उसकी उपयोगिता और प्रभाव पर विचार किया जाना जरूरी है | ऐसा लगता है वह कुछ विश्व शक्तियों का बंधुआ बनकर रह गया है | वरना अभी तक  बैठकर विवाद सुलझाने की पहल उसे करनी थी | अतीत में ऐसी ही परिस्थितियों के दौरान संरासंघ ने अपनी सेना  तैनात कर युद्ध रोकने का प्रयास किया था | लेकिन मौजूदा संकट में  उसकी तरफ से ऐसी किसी भी पहल की जानकारी नहीं मिली | इससे लगता है उसने दुनिया को चंद बड़ी ताकतों  के रहमो करम पर छोड़ दिया है | ये बात किसी से छिपी नहीं है कि पृथ्वी के किसी भी कोने में होने वाली लड़ाई के पीछे विश्वशक्तियों की भूमिका रहती है | यही खेल यूक्रेन में रूस खेल रहा है जिसे विश्व संगठन हाथ पर हाथ धरे बैठा  देख रहा है | ऐसे में इस संगठन की उपयोगिता पर सवालिया निशान लगना स्वाभाविक है | दरअसल जब तक वह  महज पांच बड़े देशों की मर्जी से बंधा रहेगा तब तक उसकी लाचारी इसी तरह बनी रहेगी | ऐसे में जरूरत इस बात की है कि तीसरी दुनिया की उभरती ताकतों के रूप में भारत और ब्राजील को भी इसकी निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जावे | ये सवाल भी उठ रहा है कि संरासंघ के महासचिव ने रूस के राष्ट्रपति पुतिन से अब तक युद्ध रोकने के बारे में बात क्यों नहीं की और की तो नतीजा क्या निकला ? माना कि यह दो देशों के बीच का  मसला है किन्तु आज  दुनिया के एक कोने में होने वाली घटना का असर सब दूर नजर आता है | यदि संरासंघ ने जल्द  कारगर उपाय नहीं किये तो कुछ ताकतवर देश मिलकर अपने स्वार्थ और अहंकार में पूरे विश्व को युद्ध की आग में झोकने से बाज नहीं आयेंगे | रूस और यूक्रेन की लड़ाई  उसी का पूर्वाभ्यास लगता है |


रवीन्द्र वाजपेयी 
 

Monday, 16 January 2023

बजट में करों का बोझ कम हो : छोटे व्यापारी को भी मिले सामाजिक सुरक्षा



संसद का बजट सत्र आगामी 31 जनवरी से प्रारंभ होने जा रहा है और बजट तैयार करने की प्रक्रिया भी अंतिम दौर में है  | हालांकि उसका बड़ा हिस्सा तो तय हो चुका होगा लेकिन कर प्रस्ताव अंतिम  वक्त पर ही आकार लेते हैं क्योंकि वित्त मंत्रालय विभिन्न औद्योगिक – व्यापारिक संगठनों के प्रतिनिधि मंडलों से राय मशविरा करने के बाद ही निर्णय करता है | कर्मचारी जगत से भी इस बारे में सरकार को ढेर सारे सुझाव मिलते हैं | हालाँकि उसके तकनीकी पहलुओं से तो आम जनता को  सरोकार नहीं होता लेकिन कराधान संबंधी प्रस्ताव उसे सीधे प्रभावित करते हैं इसलिए उसकी रूचि ये जानने में ही होती है कि बजट से उसकी जेब भरेगी या और खाली होगी ?  हमारे देश में बजट  पर चुनावी राजनीति की छाया रहती है इसलिए ये उम्मीद की जा रही है कि इस वर्ष 10 राज्यों के चुनाव होने के साथ ही चूंकि 2024 के लोकसभा चुनाव के पूर्व केंद्र सरकार का ये आखिरी पूर्ण बजट होगा इसलिए आम जनता के लिए राहत का पिटारा खोला जा सकता है | जहाँ तक बात आयकर की है तो ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि आबादी का बहुत ही छोटा हिस्सा उससे प्रभावित होता है लेकिन उपभोक्ता बाजार को ये तबका चूंकि प्रभावित करता है लिहाजा इसका ध्यान रखा जाना जरूरी है | और फिर इस वर्ग में कर्मचारियों की संख्या ज्यादा होने से जनमत पर भी ये असर डालता है | इसलिये उम्मीद लगाई जा रही है कि मोदी सरकार आयकर छूट के जरिये इसे राहत देगी | देश में दूसरे बड़े दबाव समूह के तौर पर किसान हैं | दो साल पहले चले लम्बे आन्दोलन के बाद सरकार ने किसानों के हित में अनेक निर्णय किये जिनमें समर्थन मूल्यों में वृद्धि प्रमुख थी | रही बात उद्योग जगत की तो सरकार किसी की भी हो उसके हितों की चिंता करती है क्योंकि अर्थव्यवस्था के पहिये को वही गति प्रदान करता है | लेकिन इन सबसे अलग हटकर बहुत बड़ी संख्या जनता के उस हिस्से की है जो स्वरोजगार से जुड़ा है या फिर निजी क्षेत्र में साधारण सी नौकरी करता है | व्यापारी वर्ग में भी ज्यादातर लघु और मध्यमवर्गीय ही हैं परन्तु  ये वर्ग चूंकि संगठित नहीं है इसलिए सरकार के कानों तक अपनी आवाज नहीं पहुंचा पाता | उस दृष्टि से प्रधानमंत्री द्वारा सबका साथ , सबका विकास और सबका विश्वास नामक जो नारा दिया गया उसकी झलक आगामी बजट में दिखाई देगी , ऐसी  उम्मीद सब कर रहे हैं  | एक बात और जो कचोटती है वह ये कि जिस सामाजिक सुरक्षा के नाम पर सरकारें अरबों खरबों खर्च करती हैं उससे व्यवसायी  समुदाय वंचित है | जीवन भर तरह – तरह के करों से सरकार का खजाना भरने वाले व्यापारी के साथ किसी भी प्रकार की अनहोनी हो जाने पर उसके परिवार वालों पर मुसीबत  का पहाड़ टूट पड़ता है | कोरोना के दौरान बड़ी संख्या में युवा व्यवसायी मृत्यु का शिकार हुए जिससे उनके आश्रितों का भविष्य अंधकारमय हो गया | किसी व्यापारी की अचानक मृत्यु होने पर उसके परिजनों को किसी भी प्रकार की सामाजिक सुरक्षा न मिलना अनुचित है  | अपेक्षा है बजट में इस वर्ग के लिए ऐसी किसी योजना का समावेश होगा जिससे किसी अनहोनी के बाद  उसके परिजन किसी तरह मोहताज न हों | दुनिया की पाँचवीं  सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुके भारत में वर्तमान कर ढांचा  विकास के लिए ज्यादा से ज्यादा धन अर्जित करने के उद्देश्य पर टिका  है | पहले  टैक्स वसूलकर हाइवे बनाना और उसके बाद टोल टैक्स लगाकर उसकी कीमत वसूलना उसी सोच का प्रमाण  है | लोक कल्याणकारी राज्य में संपन्न वर्ग से कर लेकर वंचित वर्ग के उत्थान पर खर्च करने का चलन होता है | लेकिन हमारे देश की जो कर प्रणाली है उसमें गरीब व्यक्ति को भी  अप्रत्यक्ष तौर पर उन करों का भुगतान करना पड़ता है जो संपन्न वर्ग से अपेक्षित  हैं | कोरोना  काल में चूंकि अर्थव्यवस्था डगमगा गई थी जिसकी वजह से सरकार ने अनेक रियायतें बंद कर दीं | यद्यपि गरीबों को मुफ्त खाद्यान्न और निःशुल्क इलाज की सुविधा तो जारी है किन्तु रेल यात्रा में विभिन्न वर्गों को मिलने वाली छूट बंद है | विशेष तौर पर वरिष्ट नागरिकों के लिए तो ये सुविधा न्यायोचित है | इसी तरह पेट्रोल और डीजल की कीमतों में पेट्रोलियम कम्पनियों की मुनाफाखोरी घटाने पर इस बजट में ध्यान दिया जाना जरूरी है क्योंकि भले ही महंगाई के आंकड़ों पर सरकार कुछ भी कहे लेकिन कोरोना के दौरान  जो दाम बढ़े वे कम नहीं हुए | हालाँकि महंगाई में वैश्विक परिस्थितियों का भी योगदान  है लेकिन पेट्रोल - डीजल पर लगाये जाने वाले करों का औचित्य साबित करने का कोई आधार नहीं है | ऐसे में बजट से सबसे बड़ी अपेक्षा यही है कि उन पर लगाया जा रहा कर कम किया जाए जिससे जनता पर पड़ रहा बोझ घटने के कारण परिवहन खर्च में  कमी होने से चीजों के दाम गिरें | कुल मिलाकर आशय ये है कि सरकार को करों पहाड़ छोटा करते हुए आय बढ़ाने के सिद्धांत को अमल में लाना चाहिए | वर्तमान में करों की दरें सरकार के लिए भले ही लाभ का सौदा हों लेकिन उन्हें जनता पर बोझ  कहना गलत नहीं होगा | भारत की सड़कें अमेरिका जैसी  बनाने के फेर में उस जैसा भारी कराधान तब तक औचित्यपूर्ण नहीं है जब तक हमारे देश की  प्रति व्यक्ति औसत आय अमेरिका जैसी न हो जाये | हालाँकि ये मान लेना तो ख्याली पुलाव पकाने जैसा होगा कि करों के ढांचे में बहुत बड़ा बदलाव आगामी बजट में देखने मिलेगा लेकिन मोदी सरकार के पास ये अवसर है कर प्रणाली में सकारात्मक सुधार करने का | सरकार में बैठे लोगों को ये बताने की जरूरत नहीं है कि करों की ज्यादा दरें  उनकी चोरी और सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार को पालने – पोसने में मददगार होती हैं | 

रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 13 January 2023

भौगोलिक दूरी भी शरद भाई से जबलपुर की भावनात्मक निकटता में बाधक नहीं बन सकी



1975 की जनवरी देश की राजनीति में एक नया सन्देश लेकर आई ,जब विपक्ष के साझा  प्रत्याशी शरद यादव ने कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे स्व. सेठ गोविन्द दास के निधन से रिक्त हुई जबलपुर लोकसभा सीट के उपचुनाव में उनके पोते रवि मोहन को भारी अंतर से हरा दिया | उस समय देश में स्व. जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में छात्र आन्दोलन आकार ले रहा था | स्व. यादव जबलपुर वि.वि के छात्र नेता थे और उस समय रायपुर की जेल में बंद थे | 1971 का लोकसभा और 1972 का विधानसभा चुनाव हारने के कारण जनसंघ उस उपचुनाव  के प्रति अनमना था | तभी  खबर आई कि श्री यादव  उसमें  हाथ आजमाना चाहते थे लेकिन  वे जिस समाजवादी पार्टी से ताल्लुकात रखते थे उसका प्रभाव इतना था नहीं कि वे जमानत भी बचा पाते | इसलिए उनने जेल से ही जनसंघ के स्थानीय नेताओं को सन्देश भेजा कि वे उनका समर्थन करें तो कांग्रेस को टक्कर दी जा सकती है | हालांकि उनकी जनसंघ वालों से ज्यादा नहीं पटती थी किन्तु बिन बुलाये आई मुसीबत नुमा उस उपचुनाव से छुटकारा पाने के लिए जनसंघ ने श्री यादव के  ऑफर को सहर्ष स्वीकार कर लिया और वे सर्वदलीय  प्रत्याशी बन गए |  कांग्रेस के गढ़ रहे जबलपुर में सेठ जी के पौत्र को हराना सपने देखना जैसा था | उल्लेखनीय है गोविन्द दास जी संविधान सभा के सदस्य रहने के बाद 1952 से लगातार लोकसभा सदस्य बनते रहे | लेकिन चुनाव प्रचार शुरू होते ही श्री यादव के पक्ष में महौल बनने लगा | इसका कारण बतौर छात्र नेता बनी संघर्षशील युवा की छवि थी जबकि रवि मोहन पूरी तरह सार्वजनिक जीवन से दूर थे | और फिर देश भर से विपक्षी नेताओं ने जबलपुर आकर प्रचार किया | अंतिम सभा मालवीय चौक पर स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की थी जिसमें जनसैलाब उमड़ पड़ा | सभा स्थल से लगभग  एक किलो मीटर दूर तक लाउड स्पीकर लगाये गए थे | उस सभा ने चुनाव परिणाम का अग्रिम ऐलान कर दिया था | उस तरह श्री यादव अचानक देश में परिवर्तन के प्रतीक  बन गए | इंदिरा गांधी के एकाधिकारवादी रवैये के विरुद्ध जयप्रकाश जी के नेतृत्व में चल रहे आन्दोलन के साथ जुड़ने में विपक्षी दलों की हिचक उस उपचुनाव ने दूर कर दी | लोकसभा में श्री यादव का प्रवेश भारतीय राजनीति में एक नए युग का शुभारम्भ बन गया | कालान्तर में लालू यादव , राम विलास पासवान , मुलायम सिंह यादव , नीतीश कुमार जैसे जो नेता समाजवादी धारा से निकलकर राजनीति में चमके वे सब उस समय छात्र राजनीति के इर्द गिर्द ही सिमटे थे | जून माह में आपातकाल आ गया और विपक्ष कैद कर दिया गया | परिणामस्वरूप  एक दूसरे के साथ हाथ मिलाने से भी कतराने वाले  विपक्षी  जनता पार्टी के रूप में गले मिलने राजी हुए  और  1977  के  लोकसभा चुनाव ने केंद्र में कांग्रेस की सत्ता का पहली बार खात्मा किया | शरद यादव दूसरी बार जीतकर लोकसभा पहुंचे | लेकिन अपने अंतर्विरोधों के चलते वह सरकार 27 महीनों में दम तोड़ बैठी | रास्वसंघ को मुद्दा बनाकर दोहरी सदस्यता का जो विवाद स्व. मधु लिमये ने शुरू किया वह उस राजनीतिक प्रयोग की असमय मौत का कारण बन गया | इंदिरा जी की तानाशाही का विरोध करने वाले अनेक दल कांग्रेस के जाल में फंस गए | चौधरी चरण सिंह की प्रधानमंत्री बनने की इच्छा तो पूरी हो गयी किन्तु कुछ ही दिनों में कांग्रेस ने अपनी बैसाखी खींच ली  | 1980 के  मध्यावधि चुनाव में इंदिरा जी सत्ता में लौट आईं | जबलपुर से शरद यादव लोकदल से  मैदान में उतरे  किन्तु जनसंघ के अलग हो जाने से उनकी जमानत जप्त  हो गयी | उसके तुरंत बाद वे इस शहर को छोड़कर नए ठिकाने की तलाश में निकल गए | चौधरी चरण सिंह , देवीलाल और चंद्रशेखर  की मदद से उन्होंने दिल्ली में अपने लिए जगह बनाई और राज्यसभा में आ गये | राजनीतिक जोड़ - तोड़ में उनका कोई मुकाबला नहीं था जिसके चलते  उ.प्र के बदायूँ और बाद में बिहार के मधेपुरा से वे लोकसभा में आते रहे और  जब हारे तो राज्यसभा में आने में सफल रहे | 1989 और उसके बाद बनी अनेक सरकारों में मंत्री रहने के बाद वे  अटल जी की सरकार के हिस्से भी रहे | समाजवादी राजनीति  के मूल चरित्र में मिलने ,  बिछड़ने और फिर मिलने का जो गुण है उसके अनुरूप वे भी कभी लालू तो कभी नीतिश के साथ आये - गए | जॉर्ज फर्नांडीज के साथ भी उनके संबंध नर्म – गर्म रहे | एनडीए के संयोजक का पद भी संभाला | लेकिन इस आवाजाही में वे अपनी राजनीतिक जमीन  नहीं बना सके | और आखिर में ये स्थिति आ गयी कि राष्ट्रीय राजनीति  में रिंग मास्टर की भूमिका निभाने वाले शरद भाई दिल्ली में एक सरकारी मकान के लिए तरस गए | लंबे समय से  अस्वस्थ होने के कारण वे राजनीति की मुख्य धारा से दूर थे | कल रात ज्योंहीं उनके न रहने की  खबर आई , बीते लगभग पांच दशक का राजनीतिक घटनाचक्र याद आने लगा | जबलपुर के मालवीय चौक से चलकर दिल्ली के राजनीतिक मंच पर उन्होंने जिस तरह अपने को प्रतिष्ठित किया वह आसान नहीं था | शरद भाई के तौर पर अपनी मित्र मंडली में लोकप्रिय श्री यादव ने जबलपुर छोड़ तो दिया लेकिन जब भी यहाँ आते संघर्ष के दिनों के साथियों से मिलना  नहीं भूलते | यहां से जो भी दिल्ली गया उससे वे बड़ी ही आत्मीयता से मिले और उसकी मदद की | उनका चला जाना राजनीति के एक अध्याय की समाप्ति है | आजादी के बाद देश में हुए दो परिवर्तनों में उनकी भूमिका रही | मंडल आयोग के जरिये ओबीसी आरक्षण से सोशल इन्जीनियरिंग नामक जो प्रयोग हुआ उसके शिल्पकारों में भी वे  रहे | हालाँकि उनका राजनीतिक जीवन अस्थिरता और वैचारिक भटकाव के बीच झूलता रहा | लेकिन नाटे कद की शारीरिक रचना के बावजूद उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में अपना कद बहुत ऊंचा किया और लगातार  बनाये रखा | इसमें दो राय नहीं हैं कि 1980 में हारने के बाद वे जबलपुर न छोड़ते तो म.प्र में तीसरी शक्ति की  कमी  शायद न रहती | जितनी उठापटक उन्हें दूसरों की जमीन पर पैर ज़माने के लिए करनी पड़ी  उतनी यहाँ  करते तब शायद उनके  राजनीतिक सफर का अंत  भी उतना ही जोरदार रहता जितना उसका आरम्भ था | ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि शरद यादव और जबलपुर के बीच भावनात्मक निकटता में  भौगोलिक दूरी और भौतिक अनुपस्थिति कभी बाधक नहीं बनी | शायद उनके मन में भी जबलपुर छोड़ने की तड़प रही होगी | उनके निधन से इस अंचल में उनके अनगिनत चाहने वालों के साथ ही उन लोगों को भी दुःख है  जिनका उनसे कभी वास्ता नहीं पड़ा क्योंकि चाहे दिल्ली के लिए पहली सीधी ट्रेन क़ुतुब एक्सप्रेस हो या रेल जोन जैसी उपलब्धि , उसके साथ उनका नाम स्थायी रूप से जुड़ा हुआ है और सदैव रहेगा | लम्बे समय तक वे राष्ट्रीय राजनीति में जबलपुर की पहिचान रहे | ऐसे शख्स का न रहना निश्चित तौर पर खलने वाला है | महाकोशल की इस चेतनास्थली ने देश और दुनिया को एक से बढ़कर  एक विभूतियाँ  दीं किन्तु राजनीति के क्षेत्र में आजादी के बाद से राष्ट्रीय स्तर पर शरद यादव ने जिन शिखरों को छुआ वह किसी और के लिए न तो संभव हुआ और न ही निकट भविष्य में संभव होता दिखता है | शरद भाई को स्वर्गीय लिखना अच्छा तो नहीं लग रहा लेकिन विधि के इस विधान को स्वीकार करना ही नियति है |

विनम्र श्रद्धांजलि |  

रवीन्द्र वाजपेयी 
 


Thursday, 12 January 2023

झगड़े में संसद और न्यायपालिका दोनों की छवि खराब होगी



आम तौर पर उपराष्ट्रपति ज्यादा चर्चा में नहीं रहते | राज्यसभा के पदेन सभापति के अलावा वे कुछ सरकारी संस्थाओं के मुखिया भी  होते हैं | संवैधानिक ओहदे की वजह से विवादित  विषयों पर बोलने से भी वे परहेज करते हैं | राष्ट्रपति के रहते हुए वैसे भी उनकी भूमिका सीमित होती है और फिर संसदीय प्रजातंत्र में प्रधानमंत्री का चेहरा ही समूचे तंत्र में नजर आता है | लेकिन नए उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ अपने पूर्ववर्तियों से अलग दिखने  का संकेत दे रहे हैं | राज्यसभा की  आसंदी पर विराजमान होते ही उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को असंवैधानिक बताते हुए न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कालेजियम व्यवस्था को जारी रखने संबंधी फैसले पर जिस तरह निशाना साधा उससे लग गया कि वे महत्वपूर्ण मामलों में अपनी राय व्यक्त करने से पीछे नहीं हटेंगे | यद्यपि उनके उस वक्तव्य पर सर्वोच्च न्यायालय ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की किन्तु श्री धनखड़ उससे अविचलित रहते  हुए खुलकर अपने विचार व्यक्त करने में संकोच नहीं करते | इसका ताजा प्रमाण है जयपुर में पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में उनका भाषण जिसमें उन्होंने विधायिका की सर्वोच्चता में न्यायपालिका  के हस्तक्षेप को गलत मानते हुए कहा कि वे इससे सहमत नहीं हैं कि संसद कानून बनाये और सर्वोच्च न्यायालय उसे रद्द कर दे | संसद द्वारा लिए गए फैसले की किसी अन्य संस्था द्वारा समीक्षा किये जाने पर सवाल उठाते हुए श्री धनखड़ ने पूछा कि क्या संसद द्वारा बनाया कानून तभी लागू माना जायेगा जब उस पर अदालत की मुहर लग जाए  ? उपराष्ट्रपति ने ये भी कहा कि संसद सर्वोच्च है जिसके बनाये गए कानूनों को अन्य संस्था द्वारा अमान्य करना प्रजातंत्र के लिए अच्छा नहीं है | उक्त सम्मलेन में देश भर से आये विधानसभा और विधान परिषदों के सभापतियों के अतिरिक्त लोकसभा अध्यक्ष और  राजस्थान के मुख्यमंत्री की उपस्थिति में विधायिका द्वारा पारित कानूनों पर अदालतों की दखलंदाजी पर खुलकर चर्चा हुई | अनेक वक्ताओं ने कहा कि अदालतों को मर्यादा के भीतर रहकर काम करना चाहिए | कुछ समय पहले जयपुर में ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और केन्द्रीय कानून मंत्री किरण रिजजू ने सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के सामने कहा था कि अदालतें वकीलों का चेहरा देखकर फैसला सुनाती हैं | इस सबसे ऐसा लगता है कि विधायिका और न्यायपालिका के बीच चल रहा शीत युद्ध और त्तेज होगा | हालाँकि श्री रिजजू भी समय – समय पर न्यायपालिका की भूमिका पर टीका – टिप्पणी करते रहे हैं जिसका न्यायाधीशों ने बुरा भी माना | अब चूंकि बीड़ा उपराष्ट्रपति ने उठाया है इसलिए कहा जा सकता है कि आने वाले समय में न्यायपालिका , विधायिका और कुछ हद तक कार्यपालिका के बीच टकराव खुलकर सामने आयेगा | इसकी वजह एक तो कालेजियम द्वारा नए न्यायाधीशों की नियुक्ति हेतु भेजी गई सिफारिशों को केंद्र सरकार द्वारा लम्बे समय से लंबित रखा जाना है | और दूसरा ये कि सरकार राष्ट्रीय न्यायिक  आयोग संबंधी विधेयक दोबारा संसद में लाने के संकेत दे रही है जिससे न्यायपालिका और संसद के बीच रस्साकशी और तेज हो जायेगी | सबसे रोचक बात ये है उपराष्ट्रपति अग्रिम मोर्चे पर नजर आ रहे हैं जो कि राज्यसभा के सभापति के साथ ही  पेशे से अधिवक्ता होने के नाते दोहरी भूमिका में हैं | वैसे न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधी कालेजियम व्यवस्था के विरुद्ध अनेक बातें सामने आ चुकी हैं | न्यायपालिका के भीतर भी एक वर्ग है जिसे ये लगता है कि इस प्रणाली में अनेक विसंगतियां हैं | राजनीतिक क्षेत्र में भी न्यायिक नियुक्ति आयोग बनाये जाने पर आम तौर पर सहमति है | इसीलिये  सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उसे रद्द किये जाने के बाद से संसद की सर्वोच्चता और न्यायपालिका द्वारा उसके निर्णयों को रद्द करने पर बहस चल रही है | गौरतलब है न्यायपालिका द्वारा अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर की जाने वाली टिप्पणियाँ भी  आलोचना का कारण बनती रही हैं | सुनवाई के दौरान अनेक न्यायाधीश ऐसी बातें कह जाते हैं जो  फैसलों या आदेशों में तो शामिल नहीं की जातीं किन्तु उनके कारण सरकार की स्थिति खराब होती है | हमारे देश में न्यायपालिका के प्रति सम्मान का जो भाव है उसके कारण उसकी आलोचना करते समय भी काफी सतर्कता बरती जाती है | लेकिन न्यायिक सक्रियता के अतिरेक से वह लिहाज टूट रहा हैं | ऐसे में  पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में व्यक्त  भावनाओं का शुद्ध मन से  संज्ञान लिया जाना जरूरी है | विधायिका और न्यायपालिका के बीच नियन्त्रण और सन्तुलन होना चाहिए न कि टकराव क्योंकि उससे दोनों की छवि पर आंच आयेगी जो कि पहले  ही काफी खराब हो चुकी है |

रवीन्द्र वाजपेयी 


Wednesday, 11 January 2023

निवेशक सम्मेलन की सफलता के लिए नौकरशाहों पर नकेल जरूरी




म.प्र का इंदौर नगर इन दिनों वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है | प्रवासी भारतीयों के दो दिवसीय जलसे के बाद आज से वहां ग्लोबल इन्वेस्टर्स मीट प्रारम्भ हुई | जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आभासी माध्यम से संबोधित किया | म.प्र सरकार द्वारा आयोजित यह सम्मलेन चूंकि विधानसभा चुनाव वाले साल में हो रहा है लिहाजा ये मान  लेना गलत नहीं होगा कि इसके जरिये  मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जनता को ये विश्वास दिलाना चाहते हैं कि उनकी सरकार प्रदेश के आर्थिक विकास के लिए पूरी तरह कटिबद्ध है | इसमें दो मत नहीं कि कभी बीमारू राज्य कहलाने वाला म.प्र अब विकास की दौड़ में काफी आगे बढ़ा है | बिजली  , पानी , सड़क आदि के क्षेत्र में  जो उल्लेखनीय प्रगति 2003 के बाद से हुई उसकी वजह से ये निवेशकों के लिए आदर्श राज्य बन गया है | भूमि की उपलब्धता भी काफी है | केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार होने से भी स्थितियाँ निवेश के अनुकूल हुई हैं | ऐसे में श्री चौहान का ये प्रयास अपेक्षित परिणाम दे सकता है | सबसे बड़ी बात ये है कि प्रवासी सम्मलेन की वजह से अनेक विदेशी निवेशक पहले से ही इंदौर में मौजूद हैं और उन्हें इस प्रदेश में उद्योग - व्यापार की संभावनाओं का अध्ययन करने का अवसर भी मिला होगा | इंदौर चूंकि हमेशा से ही इस दिशा में आगे रहा है इसलिए भी इस आयोजन  को सफलता मिलने की आशाएं हैं । लेकिन सम्मेलन समाप्त होने के बाद जो खेल शुरू होता है उस पर नजर रखना मुख्यमंत्री के लिए जरूरी है | अब तक के अनुभव बताते हैं कि सम्मेलन के दौरान जो निवेशक  उद्योग लगाने हेतु प्रस्ताव हस्ताक्षरित करते हैं वे बाद में  पीछे हट जाते हैं | इसका असली कारण नौकरशाही है जो निवेश के लिए आने वालों को खून के आंसू रुलाने से बाज नहीं आती | सम्मलेन के समय तो मुख्यमंत्री चूंकि खुद उपस्थित रहते हैं इसलिए अफसरशाही विनम्रता और सौजन्यता की प्रतिमूर्ति बनी रहती है किन्तु आयोजन खत्म होते ही वह अपने ढर्रे पर लौट आती है जिससे निवेशक हतोत्साहित हो जाते हैं | ये देखते हुए श्री चौहान को चाहिये कि वे सम्मलेन में आये निवेश प्रस्तावों पर तेजी से अमल करवाने के लिए समूची प्रक्रिया पर निरन्तर नजर रखें ताकि प्रदेश में पूंजी  लगाने के इच्छुक उद्योगपतियों को भटकना न पड़े | इस बारे में श्री मोदी की कार्यशैली अनुकरणीय है | गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने उस राज्य को निवेशकों की पहली पसंद बनाने में सफलता हासिल की तो उसकी वजह उनसे संपर्क बनाए रखते हुए बाधाओं  को तत्काल दूर करने के बारे में मुख्यमंत्री कार्यालय का मुस्तैद रहना था | चोटी के उद्योगपतियों को गुजरात में निवेश हेतु राजी करने के बाद वे व्यक्तिगत संपर्क रखते हुए उनको प्रोत्साहित किया करते थे | प. बंगाल से टाटा कम्पनी की  नैनो कार का कारखाना गुजरात ले आने की घटना उद्योग जगत में काफी चर्चित हुई थी | चूंकि मुख्यमंत्री स्वयं सतर्क रहते इसलिए नौकरशाही भी अपने दायित्व का निर्वहन करने में पीछे नहीं रही | इस ग्लोबल इन्वेस्टर्स मीट के उपरान्त श्री चौहान को भी चाहिए वे मुख्यमंत्री कार्यालय में निवेश प्रस्तावों संबंधी एक विशेष सेल बनाकर उनकी दैनंदिन प्रगति पर नजर रखें | पिछले अनुभवों को देखते हुए ऐसा करना नितान्त आवश्यक है | आज  श्री मोदी ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए  एम.पी अजब है ,गजब है के साथ और सजग भी जोड़कर श्री चौहान की जिम्मेदारी बढ़ा दी है | चुनावी वर्ष होने से मुख्यमंत्री के पास निवेश प्रस्तावों को अमली जामा पहिनाने के लिए बहुत ही कम समय है क्योंकि नवम्बर में होने वाले चुनाव की अधिसूचना जारी होते ही आदर्श आचार संहिता  लागू हो जाने से सरकार नीतिगत निर्णय नहीं कर सकेगी | और विपक्ष भी चुनाव मैदान में उसे घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा | इसलिए जैसे तेवर आजकल श्री चौहान भ्रष्ट और निकम्मे अधिकारियों के विरुद्ध दिखा रहे हैं वैसी ही सख्ती  उन्हें निवेश प्रस्तावों के क्रियान्वयन से जुड़े अधिकारियों पर भी दिखानी चाहिए | प्रधानमंत्री ने एम . पी को अजब और गजब के साथ सजग बताकर सांकेतिक शैली में जो सन्देश प्रदेश सरकार को दिया यदि मुख्यमंत्री उसके निहितार्थ को समझते हुए अपने नौकरशाहों पर कसावट रख सकें तभी निवेशक सम्मेलन का उद्देश्य पूरा हो सकेगा |  


रवीन्द्र वाजपेयी 




Tuesday, 10 January 2023

वरना जोशीमठ जैसे हादसे होते ही रहेंगे



अब ये तय हो चुका है कि जिस तरह टिहरी बाँध बन जाने से गढ़वाल अंचल के अनेक स्थान जलमग्न हो गये उसी तरह जोशीमठ का बड़ा हिस्सा भी अतीत होने जा रहा है | जो स्थितियां अब तक सामने में आई हैं उनके अनुसार उसे  खाली करने के सिवाय कोई और रास्ता नहीं है | उसके साथ ही सैकड़ों अन्य गाँवों में  भी विस्थापन  प्रारंभ हो गया है | जिस तरह से वहां धरती धंस रही है उसे देखते हुए किसी बड़े भूगर्भीय बदलाव की आशंका से लोगों में दहशत है | अपना आशियाना उजड़ते देख रहे लोगों के मन पर क्या बीत रही होगी ये वे ही जानते हैं | जोशीमठ का स्वरूप क़स्बानुमा ही है | सर्दियों में भगवान बद्रीनाथ यहीं आकर विराजते हैं | शंकराचार्य जी की पीठ भी यहीं है | बद्रीनाथ धाम का यह प्रवेश द्वार होने से भी महत्वपूर्ण है | चीन सीमा के सन्निकट होने से यह सैन्य दृष्टि से काफी संवेदनशील माना जाता है | बद्रीनाथ के अलावा फूलों की घाटी और औली नामक पर्यटन स्थल जाने के लिए भी जोशीमठ शुरुआती स्थल है | शाम के बाद चूंकि उक्त  स्थलों तक जाने की अनुमति नहीं होती , लिहाजा ये  सैलानियों और पर्यटकों के रात्रिकालीन विश्राम का केंद्र बन गया था | औली को पर्यटन स्थल के रूप में  काफ़ी बाद में विकसित किया गया लेकिन बद्रीनाथ की यात्रा तो सदियों से होती आ रही है | पहले ज़माने में  तीर्थयात्री पैदल आते थे और  रास्ते भर स्थानीय लोगों के लकड़ी से  बने मकान उनके आश्रय स्थल होते थे जिन्हें चट्टियां कहा जाता था | लेकिन जब से सडकें बनीं और मोटर वाहन से आना - जाना सुलभ हुआ तब से जोशीमठ बद्रीनाथ के पहले रात्रिकालीन पड़ाव बन गया | और  वहां स्थानीय लोगों के साथ ही बाहरी व्यवसायियों ने होटल और अतिथि गृह बनाने शुरू कर दिये  | ध्यान  देने वाली  बात ये है कि दशकों पूर्व तकनीकी रिपोर्ट में दी गई चेतावनी का उल्लंघन करते हुए भी इसको कस्बे से शहर बनाने की कोशिश होती रही | पहाड़ी भूमि  की क्षमता और तासीर को उपेक्षित करते हुए  निर्माण के लिए पहाड़ों को खोदा - तोड़ा गया जिसका दुष्परिणाम अब जाकर नजर आया | आज वहां दो आलीशान होटल धराशायी किये जा रहे है | पूरे शहर को तीन हिस्सों में बांटकर लोगों को सुरक्षित स्थान पर रखने की योजना भी बन गई है | केन्द्र सरकार हर स्थिति से निपटने को तैयार है | जोशीमठ के लोगों को बचाने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय में हो रही बैठकें इसका प्रमाण है | लेकिन ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि एक बार फिर आग लगने पर कुआ खोदने की परम्परा दोहराई जा रही है | उत्तरकाशी सहित उत्तराखंड के अनेक इलाकों में भूस्खलन की घटनाओं से बहुत नुकसान हो चुका है | पहाड़ से मलबा गिरने के कारण अनेक स्थानों पर नदी का जलस्तर ऊपर उठ जाने से दर्जनों  गाँव उजड़ने को मजबूर हो गए | ये स्थिति केवल गढ़वाल में नहीं अपितु समूचे उत्तराखंड और हिमाचल के अनेक स्थानों की है | हिमालय पर्वतमाला भूकम्प की दृष्टि से बेहद संवेदनशील होने के कारण उसमें  चल  रहे विकास कार्यों  से होने वाले नुकसान की अनदेखी के कारण कब क्या हो जाए ये फ़िलहाल तो कोई नहीं बता पायेगा लेकिन जो कुछ भी हो रहा है उसके लिए न  तो प्रकृति को दोष दे सकते हैं और न ही पर्वतों और नदियों को क्योंकि  उनकी अपनी दुनिया है जिसमें मानवीय दखलंदाजी एक सीमा तक ही  स्वीकार्य है | लेकिन ज्योंही मनुष्य अपने ज्ञान और उससे अर्जित शक्ति पर अहंकार करते हुए प्रकृति से छेड़खानी करता है तो एक सीमा  के बाद वह अपना  क्रोध व्यक्त किये बिना नहीं मानती | पर्वतों की दुर्गम तीर्थ यात्रा के पीछे का उद्देश्य भी आमोद - प्रमोद नहीं था | इसीलिए उसमें होने वाले कष्टों में भी यात्री आनंद की अनुभूति करते थे | लेकिन अब समूचा परिदृश्य बदल गया है | तीर्थयात्रा और पर्यटन के घालमेल का परिणाम ही जोशीमठ के मौजूदा हालात के तौर पर सामने है | आजकल वन्य प्राणियों के बस्तियों में घुसने और जहरीले सर्पों के घरों में डेरा ज़माने की खबरें आये दिन सुनाई देती हैं | इसका कारण उनके ठिकाने में किया जाने वाला अतिक्रमण है | जंगलों की बेरहमी से कटाई और शहरों के असीमित विस्तार की वजह से इन प्राणियों के संसार  में मानवीय दखल के  कारण मजबूरी या प्रतिशोधस्वरूप वे हमारी बस्ती और घरों में आने लगें तो उनका कसूर नहीं है | प्रकृति की जो रचना है उसको नुकसान पहुँचाने की भारी कीमत चुकाने के बावजूद भी हमें अक्ल नहीं आ रही तो फिर जोशीमठ जैसे हादसों की पुनरावृत्ति होती रहेगी |

रवीन्द्र वाजपेयी