Monday, 13 March 2023

पांच साल काम करने वालों को चुनाव के समय चप्पलें नहीं घिसना पड़तीं



जो विद्यार्थी पूरे साल ध्यानपूर्वक अध्ययन करते हैं उनको  परीक्षा के समय रात – रात भर जागकर न तो रट्टा मारना पड़ता है और न ही गैस पेपर और कुंजियों में सिर खपाना होता है | वे कभी इस बात की  शिकायत भी नहीं करते कि पर्चा कठिन आया था | इसी तरह सत्ता में बैठे जो नेता पांच साल पूरी निष्ठा से जनता से किये गए वायदों को पूरा करने के साथ ही जनहित के अन्य कार्यों पर ध्यान देते हैं उनको न तो चुनाव के समय मुफ्त खैरात  रूपी घूस देने की  जरूरत पड़ती हैं और न ही दबाव में आकर नीतिगत समझौते की मजबूरी झेलनी पड़ती है | इन दिनों देश के अनेक राज्यों में  विधानसभा  चुनाव होने जा रहे हैं | इनके लिए राजनीतिक दलों द्वारा  अपनी रणनीति  को अंतिम रूप दिया जा रहा है | कुछ राज्यों में सीधी लड़ाई हो रही है तो कुछ में गठबंधन की बिसात बिछने के संकेत हैं | पुराने दुश्मनों से दोस्ती के साथ ही बरसों से साथ चल रहे मित्र दूरी बनाते नजर आ रहे हैं | चूंकि राजनीति में  विचारधारा , सिद्धांतों और आदर्शों की जगह नहीं बची और हर निर्णय सत्ता  हासिल करने से प्रेरित है इसलिए बेमेल  गठबंधन से भी  कोई शर्म नहीं करता |  आजकल ये चर्चा जोरों पर है कि प. बंगाल के स्थानीय निकाय चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को हराने के लिए कांग्रेस और वामपंथी दल भाजपा के साथ जुगलबंदी कर रहे हैं | जिस पर इन  पार्टियों के वरिष्ट नेता कह रहे हैं कि स्थानीय चुनावों में इस तरह के गठजोड़ होना आम बात  है | इसी तरह जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं वहां सत्ताधारी दल के साथ ही विपक्ष भी मतदाताओं को  नए - नए लालीपॉप दिखाकर अपने पाले में खींचने की कोशिश में जुटा हुआ है | 2004 में वाजपेयी  सरकार के दौर में शासकीय कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना बंद करते हुए नई योजना लागू की गयी | उसके बाद दस साल तक कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार रही जिसने उसी  योजना को  जारी रखा उसके बाद कुछ राज्यों में भी कांग्रेस  की सरकारें बनी | लेकिन  किसी को भी पुरानी पेंशन की सुध नहीं आई | हाल ही में हुए  हिमाचल प्रदेश के  विधानसभा चुनाव में कांग्रेस द्वारा पुरानी पेंशन लागू करने का जो वायदा  किया उसी की वजह से वह चुनाव जीत गयी | छत्तीसगढ़  और राजस्थान की कांग्रेस सरकारों ने भी आगामी चुनाव को देखते हुए पुरानी पेंशन की वापसी कर डाली | भाजपा की केंद्र सरकार पुरानी  पेंशन योजना को बहाल करने राजी नहीं है | कांग्रेस समर्थक माने जाने वाले रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन और योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया सहित अनेक अर्थशास्त्री भी चेतावनी  दे चुके हैं कि पुरानी पेंशन योजना  दोबारा लागू करने से सरकारी खजाना खल्लास हो जायेगा | लेकिन चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस की राज्य सरकारें अपने ही पुराने सलाहकारों को अनसुना कर रही हैं | सवाल ये भी है कि बीते चार सालों तक वे इस बारे में उदासीन क्यों बनी रहीं ? ताजा संकेतों के  मुताबिक म.प्र की भाजपा सरकार ने भी पुरानी पेंशन की बहाली पर मंथन शुरू कर दिया है | उसे डर है कि सरकारी कर्मचारी कांग्रेस के पक्ष में न झुक  जाएं | अन्य राज्यों में भी इसी  तरह  के चुनाव जीतू कदम उठाये  जा रहे हैं | ये सब देखकर लगता है कि राजनीतिक नेता चाहे वे सत्ता में  हों या विपक्ष में ,  अपनी  साख खोते जा रहे हैं | यदि सत्ता  में रही  पार्टी  चुनाव पूर्व किये वायदों को पूरा करती जाए और जनता की तकलीफों का सही समय पर इलाज करे तब उसे चुनाव के समय दबाव में आकर ऐसे निर्णय करने की जरूरत नहीं पड़ेगी जिन्हें आर्थिक या अन्य कारणों वह  से टालती रही | यही बात विपक्ष पर भी लागू होती है जो अपना दायित्व सही तरीके से निभाए तो उसे जनता को  अव्यवहारिक वायदे नहीं  करने पड़ेंगे | मसलन म.प्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लाड़ली बहना योजना शुरू करते हुए महिलाओं को 1 हजार देने की शुरुआत की तो कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने कांग्रेस की सरकार बनने पर उसे बढ़ाकर 1500 रु. प्रति माह करने का वायदा कर दिया | सवाल ये है कि सत्ता में रहते हुए श्री नाथ को ऐसा करने का ध्यान क्यों नहीं रहा ? इस संदर्भ में राजनीतिक दलों को उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से सबक लेना  चाहिए जो लगातार पांचवी बार मुख्यमंत्री बने | देश के राजनीतिक घटनाचक्र में उनका नाम कभी - कभार ही सुनाई देता है | विभिन्न महत्वपूर्ण मुद्दों पर श्री पटनायक देश  और अपने राज्य के हित को ध्यान में रखते हुए नीति तय करते हैं | उनका भाजपा और कांग्रेस दोनों से मतभेद है लेकिन चाहे केंद्र की सरकार में कोई भी रहा हो , वे सबके साथ सामंजस्य बिठाकर काम करने के लिए जाने जाते हैं | देश में जो राजनेता सबसे कम विवादग्रस्त हैं उनमें श्री पटनायक सबसे अव्वल हैं | सता में रहते हुए वे बिना हल्ला मचाये काम  करते हैं | इसीलिये उड़ीसा बीमारू राज्य के कलंक को धोने में सफल हो रहा है | चुनाव में आसमानी वायदों की जरूरत उनको इसलिए नहीं पड़ती क्योंकि वे पुराने वायदे निभाने में सफल रहते हैं | उड़ीसा स्वर्ग  बन गया हो ऐसा नहीं है लेकिन काम से काम रखने की शैली ने श्री पटनायक को अजेय बना दिया | अन्य राजनेताओं को उनकी विचारधारा भले ही पसंद न आती हो लेकिन उनमें कुछ न कुछ ऐसा गुण तो है जिसकी वजह से वे लगातार 25 सालों से गद्दी पर जमे रहने के बाद  भी निर्विवाद हैं | घूम फिरकर बात वही पूरे साल पढ़ने वाले विद्यार्थी पर आकर टिक जाती है जिनसे राजनेता प्रेरणा ले लें तो उन्हें चुनाव के समय घुटने टेकने के नौबत ही नहीं आयेगी | लेकिन दुर्भाग्य ये है कि राजनीति चलाने वाले नेताओं के मन में ये बात बैठ चुकी है कि पूरे पांच साल चाहे भले कुछ न करो लेकिन चुनाव आते ही मतदाताओं को उपहार बांटने से उनकी नैया पार हो जाएगी  | जब तक चुनाव घोषणापत्र को हलफनामे की तरह कानूनी स्वरूप नहीं दिया जाता तब तक ये विसंगति बनी रहेगी |

रवीन्द्र वाजपेयी 


Saturday, 11 March 2023

सीबीआई और ईडी की निर्भीकता के साथ निष्पक्षता भी जरूरी



पूरे देश में इस समय सबसे बड़ा मुद्दा ईडी और सीबीआई द्वारा विपक्षी नेताओं पर छापेमारी और गिरफ्तारी बना  हुआ है | जिस तरह एक के बाद एक विपक्षी  नेताओं पर शिकंजा कसा  जा रहा है उसे देखते हुए लगता है आने वाले दिनों में कुछ और बड़े नेता जेल के भीतर नजर आयेंगे | दिल्ली शराब घोटाले में मनीष सिसौदिया की गिरफ्तारी के बाद  आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के भी लपेटे में आने का संकेत गत दिवस ईडी द्वारा अदालत में पेश किये गए दस्तावेजों से मिला | संयोगवश कल ही ईडी ने नौकरी के बदले जमीन घोटाले में लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार के साथ रिश्तेदारों और करीबियों के यहाँ छापे मारे | तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.सी राव की पुत्री और विधान परिषद सदस्य के. कविता से भी आज ईडी दिल्ली शराब घोटाले में पूछताछ हो रही है | सोनिया गांधी और राहुल गांधी भी नेशनल हेराल्ड मामले में ईडी द्वारा आरोपी बनाये जा चुके हैं | उद्धव ठाकरे के करीबी संजय राउत और  महारष्ट्र के दो पूर्व मंत्री भी ईडी द्वारा जेल भेजे गए | ये फेहरिस्त काफी  लम्बी है जिसके बारे में कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले स्वाधीनता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से भ्रष्टाचारियों को जेल भेजने की बात कही थी | भ्रष्ट नेताओं पर सीबीआई और ईडी कार्रवाई करें इसमें किसी को ऐतराज नहीं है | अनेक भ्रष्ट नेता जेल जा चुके हैं | जिनमें स्व.जयललिता,  ओमप्रकाश चौटाला और लालू जैसे नाम हैं | इनको मिली सजा को किसी ने गलत नहीं कहा | लेकिन सीबीआई और ईडी द्वारा की जा रही ताबड़तोड़ कार्रवाई के बारे में विपक्षी नेता चिल्ला – चिल्लाकर कह रहे हैं कि केंद्र सरकार इन संस्थाओं का दुरुपयोग विपक्ष का मनोबल तोड़ने के लिए कर रही है | और बिना पर्याप्त सबूतों के ही गिरफ्तारी के जरिये आतंक का वातावरण बनाया जा रहा है | ये आरोप भी है कि उक्त संस्थाएं भाजपा नेताओं के भ्रष्टाचार पर आँख मूँद लेती हैं | सीबीआई और ईडी के निशाने पर रहे अनेक नेताओं के विरुद्ध चल रही जाँच और अन्य कार्रवाई   उनके भाजपा में आते ही या तो बंद कर दी गयी या उसकी गति धीमी हो गयी | इनमें मुकुल राय , शुबेंदु अधिकारी , हिमन्ता बिस्वा सरमा और नारायण राणे के नाम प्रमुखता से लिए जाते हैं | आम आदमी पार्टी इस आरोप को अनेक मर्तबा दोहरा चुकी है कि श्री  सिसौदिया पर भी शराब घोटाले में बरी करने के एवज  में भाजपा में शामिल होने का दबाव डाला गया था | विपक्ष द्वारा ये आरोप भी तेजी  से लगाया जा रहा है कि कर्नाटक के एक भाजपा विधायक के बेटे के यहाँ करोड़ों रूपये नगद मिलने के बावजूद ईडी ने उसका संज्ञान नहीं लिया जबकि श्री सिसौदिया के यहाँ से सीबीआई को एक पैसा तक नहीं मिला फिर भी उनको  जेल में डाल दिया  | भाजपा शासित राज्यों के मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच के बारे में दोहरा रवैया अपनाने का आरोप भी  लग रहा है | इसमें दो मत नहीं है कि भ्रष्ट नेताओं के गले में फंदा डाले जाने से आम जनता  खुश होती है |  कोलकाता में ममता बैनर्जी की सरकार के वरिष्ठ मंत्री की महिला मित्र के निवास पर  मिले करोड़ों रूपये मिलने के बाद उस मंत्री के साथ खड़ा होने कोई तैयार नहीं है | मोदी सरकार ने अपने आपको भ्रष्टाचार के आरोपों से बचाए रखा ये भी अब तक तक माना  जा रहा है किन्तु विपक्ष के इस आरोप का  भाजपा   के पास कोई जवाब नहीं है कि क्या उसके सभी नेता राजा हरिश्चन्द्र के अवतार हैं और भ्रष्टाचार के मामलों में फंसे लोग  जब भाजपा में आ जाते हैं तब उनको अभयदान और ईमानदारी का प्रमाण पत्र कैसे मिल जाता है ? विपक्ष के जिन नेताओं को ईडी अथवा सीबीआई ने जांच के घेरे में लिया वे दोषी हैं या  निर्दोष,  ये तो अदालत में ही तय होगा लेकिन भाजपा के तमाम वे नेता जो उक्त दोनों एजेंसियों की जाँच के दायरे  में हैं उनके बारे में ढुलमुल रवैये से एक तो उनकी विश्वसनीयता पर संदेह होता है वहीं  केवल विपक्ष के नेताओं पर निशाना साधे जाने से निष्पक्षता पर भी आंच आती है | यद्यपि महज इस वजह से नेशनल हेराल्ड और दिल्ली  शराब घोटाले के आरोपियों के विरुद्ध जाँच  रोक देना  या लालू के परिवार को ईमानदार मानकर छोड़ देना  किसी भी दृष्टि से स्वीकार करने योग्य नहीं होगा | लेकिन जब बात जाँच एजेंसियों की प्रामाणिकता की होने लगे तब उसे केवल विरोधियों का दुष्प्रचार मानकर हवा में उड़ा देना भी सही नहीं है | इस बारे  में ध्यान देने योग्य बात ये है कि ईडी और सीबीआई को निष्पक्ष होते हुए दिखना भी चाहिये क्योंकि भारतीय जन मानस में भावुकता बहुत है | इसी कारण भ्रष्टाचार के आरोप में दोषी पाये जाने के बाद जेल में रहने के बाद  कोई राजनीतिक नेता जब छूटता है तब वह बजाय मुंह छिपाए घूमने के जनता के बीच जाकर हमदर्दी बटोरता है | जयललिता , ओमप्रकाश चौटाला , लालू , येदियुरप्पा जैसे और  भी अनेक उदाहरण हैं जहां जेल से छूटा नेता भीड़ एकत्र करते हुए जनता का समर्थन प्राप्त करने में कामयाब हो जाता है | ऐसे में ईडी और सीबीआई जैसी संस्थाओं की कार्यप्रणाली में निष्पक्षता नहीं रही तो फिर जिन लोगों को वह सीखंचों में डाल रही है वे बाहर निकलने के बाद फिर अपनी नेतागिरी चमकाने में लग जायेंगे | और इससे भी बड़ी बात प्रधानमंत्री की अपने छवि के लिए जरूरी है कि वे इन संस्थाओं के लपेटे में केवल विपक्षी नेताओं को फंसाए जाने संबंधी अवधारणा को गलत साबित करते हुए भाजपा में बैठे दागी नेताओं पर भी वैसी ही कार्रवाई करें जैसी अन्य पर हो रही है | इस बारे में एक बात आम जनता में चर्चा का विषय है कि सीबीआई और ईडी किसी भी मामले में शुरुआत तो बड़े ही जोरशोर से करती हैं लेकिन उसे अंजाम तक पहुँचाने में जो लम्बा समय लगता है उसकी वजह से मामले की गम्भीरता खत्म हो जाती  है | उस दृष्टि से ईडी और सीबीआई जो कदम उठा रही हैं वे बिलकुल सही हैं | भ्रष्टाचार इस देश को दीमक की तरह चाट रहा है इसलिए उसके खात्मे से पवित्र काम  दूसरा नहीं होगा लेकिन उसमें निर्भीकता के साथ ही पारदर्शिता , प्रामाणिकता और निष्पक्षता भी उतनी ही जरूरी है | वरना अच्छा काम भी लोकनिंदा का पात्र बन जाता है |

रवीन्द्र वाजपेयी 


Friday, 10 March 2023

आम आदमी पार्टी के सामने छवि और विश्वसनीयता का संकट



आम आदमी पार्टी जिस तेजी से राजनीतिक परिदृश्य पर उभरी उसके बाद ये कहा  जाने लगा था कि वह 2024 तक राष्ट्रीय विकल्प के तौर पर स्थापित हो जायेगी | दिल्ली विधानसभा के दो चुनाव जिस धमाकेदार अंदाज में उसने जीते उसी की पुनरावृत्ति पंजाब में भी हुई जहां उसने कांग्रेस , अकाली दल और भाजपा सभी का सफाया कर दिया | हालाँकि गोवा , उत्तराखंड , हिमाचल और गुजरात के विधानसभा चुनाव उसके लिए निराशजनक रहे | बावजूद उसके दिल्ली नगर निगम पर कब्जा करने से उसका हौसला बेशक मजबूत हुआ है | और इसी वजह से पार्टी के सर्वेसर्वा  दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कर्नाटक के दौरे पर चले गए और उसके बाद उनके छत्तीसगढ़ , म.प्र और राजस्थान प्रवास का कार्यक्रम भी बन गया है जहां  इसी साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं | राष्ट्रीय पार्टी बनने की महत्वाकांक्षा श्री केजरीवाल के मन में पहले दिन से ही  थी और उसी के अंतर्गत उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव  में ही वाराणसी में नरेंद्र मोदी के मुकाबले खड़े होने का दुस्साहस किया | यही नहीं पार्टी के संस्थापकों में रहे कवि कुमार विश्वास को अमेठी और योगेन्द्र यादव को भी  गुडगाँव से मैदान में उतार दिया | ये तीनों तो  चुनाव हार  गए लेकिन पंजाब में पार्टी के चार सदस्य जीतकर आये  जिनमें से एक भगवंत सिंह मान आजकल उस राज्य के मुख्यमंत्री हैं | उसके बाद श्री केजरीवाल के नेतृत्व में दिल्ली की विधानसभा में  पार्टी को ऐतिहासिक बहुमत मिला | आम आदमी पार्टी का जन्म दिल्ली में अन्ना हजारे द्वारा लोकपाल की मांग को लेकर किये गए 12 दिवसीय अनशन के बाद हुआ था | उसके मूलभूत आदर्शों में ईमानदारी , सादगी और  सेवा भाव थे | सत्ता में आने पर सरकारी वाहन , बंगला और वेतन आदि से परहेज की बात भी कही गयी | लेकिन  सरकार बनाते ही बतौर मुख्यमंत्री श्री केजरीवाल और उनके मंत्रियों ने सारी  सुविधाएं प्राप्त कर लीं | विधायकों के वेतन - भत्ते बढ़ा देने  के साथ ही उनमें से अनेक को मंत्री का दर्जा देकर सत्ता का सुख प्रदान कर  दिया गया | इससे असंतोष फैला और जल्द ही संस्थापक सदस्य  शांति भूषण , प्रशांत  भूषण , कुमार विश्वास , योगेन्द्र यादव और डा. आनंद कुमार पार्टी से निकल गए या निक़ाल दिए गए | उसके राज्यसभा सदस्यों में से संजय सिंह और राघव चड्डा को छोड़ दें तो एक भी ऐसा नहीं है जो पार्टी के सिद्धांतों और आदर्शों के मापदंडों पर खरा उतरता हो | चंदे के बारे में जिस पारदर्शिता का उदाहरण  शुरुआती दौर में पेश किया गया वह  भी धीरे - धीरे हवा - हवाई होकर रह गया | 2014 में पंजाब की चार लोकसभा सीटें जीतने वाला करिश्मा 2019 में केवल भगवंत सिंह मान की एक सीट पर सिमट गया | और जब वे मुख्यमंत्री बने तब उनके द्वारा रिक्त की गयी संगरूर सीट पर भी अकाली दल ( अमृतसर ) के सिमरनजीत सिंह मान  जीत गए जो खालिस्तान समर्थक माने जाते हैं | इस तरह दो राज्यों में भारी बहुमत वाली सरकार चला रही आम आदमी पार्टी का लोकसभा में एक भी सदस्य नहीं है | दिल्ली की सातों सीटों पर भी वह बुरी तरह हारी | इस सबके बाद जब उसने राष्ट्रीय पार्टी के रूप में खुद को स्थापित करने का जो प्रयास किया उसमें उसकी सैद्धांतिक प्रतिबद्धता का क्षरण होता चला  गया | धीरे – धीरे ये बात सामने आने लगी कि वह भी अन्य राजनीतिक पार्टियों की तरह सत्ता के मकड़जाल में फंसकर रह गयी है और उसके लिए वह किसी भी हद तक जाने तैयार है | पंजाब चुनाव में जब उस पर खालिस्तान समर्थकों से समर्थन लेने का आरोप लगा तब सहसा विश्वास नहीं हुआ किन्तु भगवंत सिंह मान के मुख्यमंत्री बनते ही पंजाब में नब्बे के दशक वाले हालात नजर आने लगे हैं | मुफ्त बिजली और पानी के आश्वासन खजाने के खाली होने से पूरे नहीं हो पा रहे | दिल्ली में भी बिजली की  सब्सिडी घटाने का प्रस्ताव है | जिन मोहल्ला क्लीनिक  और सरकारी विद्यालयों का गुणगान पूरे देश में किया जाता है वे भी अव्यवस्था के  शिकार हो रहे हैं | दिल्ली और पंजाब के मुख्यमंत्री अपने राज्यों की समस्याएँ हल करने की बजाय दूसरे राज्यों  में सरकार बनाने के लिए घूम रहे हैं | इसी बीच दिल्ली का शराब घोटाला उभरकर सामने आ गया जिसमें आम आदमी पार्टी में दूसरे नम्बर की हैसियत रखने वाले उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया गिरफ्तार कर  लिए गए | और उन पर सीबीआई और ईडी दोनों ने शिकंजा कस दिया है | भले ही श्री  केजरीवाल और उनकी पार्टी के अन्य नेता कुछ भी कहें  लेकिन जिस तरह की जानकारी  सामने आ रही है उससे लगता है कि बिना आग लगे धुंआ नहीं निकलता | हालाँकि इस मामले में अंतिम निर्णय तो अदालत करेगी किन्तु इस तरह के घोटालों से किसी भी पार्टी या नेता की छवि और  विश्वसनीयता को होने वाला  नुकसान  दूरगामी असर वाला होता है | और कोई पार्टी होती तो इतनी हायतौबा नहीं मचती लेकिन जो पार्टी स्वयं को गंगा की तरह पवित्र मानने का दावा करती थी जब  उसके दामन पर इस तरह के छींटे पड़ते हैं तब आम जनता द्वारा लगाई  गयी उम्मीदें टूटती हैं | बीते कुछ दिनों में इस घोटाले के बारे में जो कुछ भी जानकारी आई है उसके बाद आम आदमी पार्टी के सामने बड़ा संकट उत्पन्न हो सकता है | वैसे भी आन्दोलन से निकली राजीतिक पार्टियों की आयु ज्यादा नहीं होती | आम आदमी पार्टी भी उसी दिशा में बढ़ती दिख रही है |

रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 7 March 2023

विपक्षी गठबंधन मेंढ़क तोलने से भी कठिन काम




लोकसभा चुनाव के लिए एक साल ही बचा है | यद्यपि नई  सरकार का गठन 2024 की मई के अंतिम सप्ताह  में होगा लेकिन उसकी उठापटक शुरू हो चुकी है | भाजपा तो चुनाव को लेकर हर समय सक्रिय रहती है जिसमें  उसका  विशाल संगठनात्मक ढांचा मददगार बनता है | रास्वसंघ भी अदृश्य शक्ति के रूप में उसकी व्यूहरचना को मजबूती प्रदान करता है | एक समय था जब पार्टी उत्तर भारत और  सवर्ण जातियों तक ही सीमित  थी किन्तु नब्बे के दशक से उसका जो उत्थान शुरू हुआ वह 2014 में चरमोत्कर्ष पर जा पहुंचा | उसके बाद उसने अपने को राष्ट्रीय स्वरूप देने का अभियान चलाया | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस मुक्त भारत का जो नारा उछाला उसका अभिप्राय भाजपा को राष्ट्रीय क्षितिज पर स्थापित करना था | और ये कहना  गलत नहीं है कि उसने उस उद्देश्य को काफी हद तक पा लिया है | हालाँकि अभी भी कुछ राज्यों में सफलता उससे दूर है और पूर्वोत्तर के  कुछ राज्यों  में वह क्षेत्रीय दलों के साथ सत्ता में हिस्सेदार  है | पंजाब में भी अकाली दल के साथ रहने से उसका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं बन सका किन्तु अब वह अपना जनाधार बढ़ा रही है |  तमिलनाडु  में उसकी पकड़ न के बराबर है वहीं केरल में संघ का कार्य  फ़ैल जाने के बावजूद भाजपा अभी भी संघर्ष की स्थिति में  है | हालाँकि राष्ट्रीय स्तर पर वह सबसे ज्यादा सांसद और विधायकों के साथ कांग्रेस को बहुत पीछे छोड़ने में कामयाब हो गयी | परिणाम ये हुआ कि एक ज़माने में गैर कांग्रेसवाद के नाम पर विपक्षी गठबंधन बना करते थे लेकिन अब भाजपा के विरोध में विपक्षी पार्टियाँ एकजुट होने के लिए मजबूर हो गई हैं | यहाँ तक कि जो कांग्रेस विरोधी पार्टियों के साथ बैठने में संकोच  करती थी वही अब गठबंधन के लिए आतुर है | अन्य विपक्षी पार्टियाँ भी इस बात पर एकमत हैं कि अगले लोकसभा चुनाव में मोदी लहर को रोकने के लिए  एकजुट होना जरूरी है | कुछ नेता इसके लिए प्रयास भी कर रहे हैं | सबसे ताजा उदाहरण तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के जन्म दिवस पर चेन्नई  में हुआ जमावड़ा है | जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के अलावा फारुख अब्दुल्ला , तेजस्वी यादव और अखिलेश यादव शामिल हुए | इन सभी  ने 2024 के लिए विपक्ष का गठबंधन बनाने पर जोर दिया | गौरतलब है राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के  श्रीनगर में समापन पर सभी विपक्षी दलों को न्यौता भेजा गया था लेकिन केवल  नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी ही उसमें शरीक हुए | जिससे ये संकेत गया कि विपक्ष कांग्रेस को साथ तो रखना चाहता है लेकिन उसके झंडे तले आने को राजी नहीं  है | श्री गांधी की यात्रा में इसीलिये विपक्ष के इक्का – दुक्का नेताओं की ही उपस्थिति रही | इसका सबसे बड़ा कारण क्षेत्रीय दलों के कतिपय नेताओं की महत्वाकांक्षाएं हैं | मसलन ममता बैनर्जी द्वारा लोकसभा चुनाव में अकेले उतरने की घोषणा के साथ ही इस दावे को दोहराना कि भाजपा का मुकाबला वे ही कर सकती हैं |  हाल ही में पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में कांग्रेस द्वारा  वामपंथी दलों के साथ गठबंधन से वे बहुत नाराज हैं | प. बंगाल के विधानसभा चुनाव में भी दोनों एक साथ थे | तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. सी. राव भी कांग्रेस के विरोध का सामना अपने राज्य में करने के कारण उससे दूर रहना चाह रहे हैं | विपक्षी एकता में कांग्रेस के रोड़ा बनने का सबसे नया प्रमाण मिला दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया की गिरफ्तारी के विरोध में  विपक्षी नेताओं द्वारा प्रधानमंत्री को लिखे गए पत्र पर कांग्रेस के किसी नेता के हस्ताक्षर नहीं होने से | इस पत्र पर शरद पवार ,  के.सी.राव ,  ममता बैनर्जी , अरविन्द केजरीवाल , भगवंत  सिंह मान , फारुख अब्दुल्ला , उद्धव ठाकरे , अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव के हस्ताक्षर थे | इनमें श्री केजरीवाल और श्री मान को हटा दिया जावे तो महज 7 विपक्षी नेता ही बचते हैं | नीतीश कुमार  , स्टालिन , नवीन पटनायक और  जगनमोहन रेड्डी के अलावा वामपंथी  नेताओं ने भी इस पत्र से दूर रहना ही बेहतर समझा | हालाँकि सभी विपक्षी पार्टियों ने गिरफ्तारी का विरोध किया लेकिन कांग्रेस दोहरा रवैया अपना रही है | सीबीआई और ईडी के जरिये  विपक्षी नेताओं को परेशान करने को लेकर तो वह आवाज उठाने में संकोच नहीं करती किन्तु आम आदमी पार्टी से उसकी पटरी नहीं बैठती क्योंकि उसी की वजह से दिल्ली और पंजाब  में उसका सफाया हो गया | साथ ही वह गुजरात के बाद म.प्र , छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान में भी अपने उम्मीदवार उतारने जा रही है जिससे कांग्रेस को नुकसान होना तय है | आम आदमी पार्टी से कांग्रेस और गांधी परिवार इसलिए भी रुष्ट है क्योंकि जब नेशनल हेराल्ड मामले में सोनिया गांधी और राहुल पर ईडी ने शिकंजा कसा तब उसने उसका विरोध  नहीं किया |  इस प्रकार ये बात सामने आती जा रही है कि बिना अपनी अगुआई के कांग्रेस किसी भी विपक्षी गठबंधन को स्वीकार नहीं करेगी | वहीं दूसरी तरफ विपक्ष के भी अनेक छत्रप गठबंधन की इच्छा रखते हुए भी कांग्रेस के पीछे चलने की बजाय उसे अपने पीछे चलने के लिए मजबूर करना चाहते हैं | हालाँकि श्री सिसौदिया की गिरफ़्तारी के बाद श्री केजरीवाल की अकड़ कुछ कम तो हुई है लेकिन उनका कांग्रेस के साथ ही विपक्ष के अनेक  दलों से तालमेल  कठिन है | दरअसल  वे खुद को भाजपा के राष्ट्रीय विकल्प के तौर पर देखते हैं जो अन्य पार्टियों को शायद ही रास आये | ऐसे में विपक्षी गठबंधन  मेंढ़क तौलने जैसे कवायद बनती जा रही है जिसमें एक को बिठाओ तो दूसरा कूद जाता है | संकट के समय में भी कांग्रेस द्वारा आम आदमी पार्टी से दूरी बनाये रखना विपक्षी एकता की कोशिशों को बाधित करने जैसा ही है |

रवीन्द्र वाजपेयी 

Monday, 6 March 2023

पूर्वी भारत से मजदूरों का पलायन आखिर कब तक ?



तमिलनाडु के राजनेता सदैव संघीय  ढांचे का राग अलापते हुए अपने राज्य के हितों की  उपेक्षा करने का आरोप लगाते हैं | हिन्दी का विरोध इस राज्य की सभी क्षेत्रीय पार्टियों का सबसे बड़ा हथियार है | आधी सदी से भी ज्यादा दक्षिण का यह राज्य हिन्दी विरोध का गढ़ बन हुआ है | नौबत यहाँ तक आ गई कि गत वर्ष केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा सरकारी कामकाज में हिन्दी का उपयोग बढ़ाये जाने संबंधी बयान  पर द्रमुक सांसद और पूर्व केन्द्रीय मंत्री डी. राजा ने यहाँ तक कह दिया कि  हिन्दी लादने की कोशिश किये  जाने पर उनका राज्य भारत संघ से अलग होने के बारे में सोच सकता है | इस बारे में याद रखने वाली बात है कि श्रीलंका में  तमिल उग्रवाद को द्रमुक का समर्थन था | और जिस तमिल इलम( देश ) की मांग श्रीलंका में लिट्टे नामक आतंकवादी संगठन कर रहा था उसमें तमिलनाडु भी शामिल था | वर्तमान मुख्यमंत्री स्टालिन के पिता स्व. करूणानिधि लिट्टे के समर्थक थे और इसीलिये राजीव गांधी की हत्या के बाद उनकी  सरकार बर्खास्त कर दी गई | वैसे आजकल कांग्रेस और द्रमुक का गठबंधन चल रहा है | हाल ही में स्टालिन के जन्मदिन पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे के अलावा डा. फारुख अब्दुल्ला , तेजस्वी यादव और  अखिलेश यादव ने चेन्नई पहुंचकर 2024 में भाजपा के विरोध में गठबंधन बनाने की मुहिम शुरू की | लेकिन उसके बाद राज्य से बिहारी कामगारों के साथ मारपीट करते हुए वापस जाने का दबाव बनाये जाने की खबरें आने से तेजस्वी यादव और उनके साथ ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए बिहार की जनता को जवाब देना मुश्किल  हो गया | विधानसभा में तेजस्वी ने उन  खबरों को अफवाह बताकर आग में घी डाल दिया | विपक्ष के जबरदस्त दबाव और समाचार माध्यमों में बिहारी श्रमिकों के साथ  मारपीट के सचित्र समाचार आने के  बाद नीतीश सरकार ने सचिव स्तर के अधिकारी वास्तविकता का पता लगाने चेन्नई रवाना भी किये | उधर तमिलनाडु के श्रम मंत्री तथा गृह सचिव ने बिहारी मजदूरों की सुरक्षा का आश्वासन देते हुए उनसे वापस न जाने की अपील भी की | लेकिन जिस बड़ी संख्या में तमिलनाडु में रोजी रोटी कमाने गए श्रमिक अपनी गृहस्थी का सामान बेचकर अपने गाँव लौटे उसके बाद स्टालिन  सरकार के तमाम दावे असत्य साबित हो गए | उल्लेखनीय है तमिलनाडु के कारखानों में बिहार के कामगार बड़ी संख्या में बरसों से कार्यरत हैं | अचानक उनके प्रति स्थानीय लोगों का गुस्सा क्यों पनपा ये वाकई जाँच का विषय है | जो जानकारी मिल रही है उसके अनुसार मजदूरों को हिन्दी में बात करने पर पीटा जा रहा है | उनसे पूछा जाता है कि हिन्दी हो और हाँ कहने पर दुर्व्यवहार के साथ पिटाई की जाती है | ये भी कहा जाता है कि  अपने घर लौट जाओ क्योंकि तुम्हारे कारण हमारा रोजगार छिन रहा है |  इस बारे मे ये जानकारी भी मिली कि तमिलनाडु के युवकों के बीच ये धारणा फैलाई जा रही है कि उत्तर भारत से आने वाले श्रमिक वहां के कारखानों में कम मजदूरी पर भी ज्यादा काम करते हैं इसलिए उनकी संख्या लगातार बढ़ रही है जिससे स्थानीय लोगों को बेरोजगारी का सामान करना पड़ रहा है | लेकिन इसी के साथ ये भी  पता चला है कि टेक्सटाइल उद्योग के बड़े गढ़ सिरपुर के कारखाना मालिक बिहारी मजदूरों को पलायन से रोक रहे हैं क्योंकि बीते कुछ दिनों में ही हजारों की संख्या में उनके लौट जाने से अनेक कारखाने बंद होने की स्थिति में आ गए और बाकी में उत्पादन घट गया | इस बारे में चिंता की बात ये है कि तमिलनाडु से उठी ये भावना यदि पड़ोसी कर्नाटक , केरल , आन्ध्र और तेलंगाना में भी फैली तब उत्तर भारतीय मजदूरों के सामने तो संकट  आयेगा ही उत्तर और  दक्षिण के बीच वैमनस्य का भाव उत्पन्न होगा जिसके दूरगामी नतीजे घातक होंगे | महाराष्ट्र में भी लम्बे समय तक ऐसा ही माहौल रहा और उत्तर भारतीयों के साथ  मारपीट की घटनाएँ होती रहीं | हालांकि तमिलनाडु में जो हो रहा है उसके पीछे हिन्दी को मुद्दा बनाये जाने से लगता है कि कोई न कोई राजनीतिक दल या नेता इस बवाल के पीछे है | लेकिन ये स्थिति बिहार और उ.प्र के लिए भी विचारणीय विषय होना चाहिए | सवाल ये नहीं है कि आज वहां किसकी सरकार है , बल्कि ये कि इन राज्यों से श्रमिकों का पलायन आखिर होता क्यों है ? इस बारे में जान लेना जरूरी है कि ब्रिटिश राज में मॉरीशस और फिजी के साथ ही कैरीबियन देशों में हजारों की संख्या में जो भारतीय मजदूर ले जाये गए थे उनमें से अधिकतर पूर्वी उ.प्र और बिहार के ही थे | उक्त देशों की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा आज भी उन्हीं भारतीय मजदूरों के वंशजों का  हैं जो  हिन्दू नामों के साथ ही हिन्दू धर्म और संस्कृति का पालन करते हैं | कुछ तो वहां के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तक बन गये | इससे स्पष्ट है कि उत्तर भारत के उक्त हिस्सों से श्रमिकों का पलायन नई बात नहीं है | लेकिन आजादी के 75 साल बाद भी पूर्वी भारत में ये शर्मनाक स्थिति क्यों है ये केवल इन राज्यों के लिए नहीं अपितु पूरे देश के लिए विचारणीय प्रश्न है | छत्तीसगढ़ और म.प्र के बुंदेलखंड से भी श्रमिक अन्य राज्यों में ले जाये जाते हैं | पंजाब और कश्मीर में जब आतंकवाद चरम पर था तब भी वहां उक्त राज्यों से श्रमिक जाकर काम करते थे | इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि ये राज्य अपने मजदूरों को काम देने में विफल रहे हैं | हालाँकि विकास के दावे तो आजकल रोजाना सुनने मिलते हैं किन्तु उनके बाद भी कोई व्यक्ति रोजी रोटी की खातिर  अपना घर छोड़कर ऐसे स्थानों पर जाता है जहां की भाषा और खानपान सर्वथा भिन्न है तब उसकी मजबूरी समझी जा सकती है | तमिलनाडु में जो हो रहा है या अतीत में महाराष्ट्र में जो होता रहा उसकी कोई भी समझदार व्यक्ति प्रशंसा नहीं करेगा परन्तु ये भी स्वीकार करना होगा कि देश में विकास संबंधी विषमता के कारण ही इस तरह का पलायन और फिर संघर्ष की  स्थिति बन जाती है | हो सकता है तमिलनाड़ु में हालात फिर सामान्य हो जाएँ किन्तु समय आ गया है जब पिछड़े राज्यों के लोगों को वहीं रोजगार देने की व्यवस्था की जावे | आखिर  जब इन राज्यों  के नेताओं का पिछड़ापन दूर हो सकता है तो जनता का क्यों नहीं ?


रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 4 March 2023

बदलते ऋतु चक्र के खतरे से दुनिया को बचाने आगे आये भारत



इटली का वेनिस शहर अपनी विशिष्टता के  लिए पूरी दुनिया के पर्यटकों को लुभाता है | इस शहर में सड़कों की जगह नहरें हैं जिनमें आवगमन नावों के जरिये होता है | इटली जाने वाले अधिकांश सैलानी वेनिस जाये बिना नहीं रहते | लेकिन इस वर्ष वेनिस की नहरों में पानी सूख चुका है | यहाँ - वहां नावें बंधी देखी जा सकती हैं | तीन साल पहले भी ये स्थिति बनी थी | समुद्र के किनारे बसे वेनिस को इस साल कम बरसात के कारण ये  त्रासदी झेलनी पड़ रही है | विभिन्न टापुओं से बने वेनिस के किनारे का समुद्री जलस्तर नीचे चले जाने की वजह से संकट और गहरा गया है | मौसम वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यूरोप का ऋतु चक्र परिवर्तित हो रहा है  जिसके परिणामस्वरूप आने वाले समय में वहां वर्षा और हिमपात घटता जाएगा | हाल ही में उत्तरी ध्रुव के बड़े हिमशैल के टूटकर समुद्र में आने की खबर से दुनिया भर में चिंता व्यक्त की गई थी | इसकी वजह पृथ्वी के तापमान में असामान्य वृद्धि  ( ग्लोबल वार्मिंग ) मानी जाती है | इस संकट से बचने के लिए विकसित  देशों द्वारा विकासशील देशों पर पर्यावरण को क्षति पहुंचाने वाली गतिविधियाँ रोकने का दबाव डाला जाता है | अनेक अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ भी पर्यावरण संरक्षण हेतु हो चुकी हैं | लेकिन ये विकसित देश ही पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते  है | चूंकि इस बारे में बनने वाली जाँच टीमों में इन्हीं देशों का दबदबा है और सभी प्रमुख अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं को भी यही नियंत्रित करते हैं इसलिए वैश्विक स्तर पर बढ़ते प्रदूषण में इनके योगदान की चर्चा कम होती है | जबकि सच्चाई ये है कि धरती , समुद्र और आकाश तीनों में आज जो प्रदूषण है उसके लिए विकसित देश ही  ज्यादा कसूरवार हैं | औद्योगिक विकास के साथ  तकनीक के उन्नयन और विलासितापूर्ण  जीवन शैली के कारण इनका आम नागरिक प्राकृतिक संसाधनों का जितनी बेरहमी से उपयोग करता है  उसकी वजह से ही पृथ्वी का तापमान बढ़ता चला जा रहा है | ये कहना भी गलत न होगा कि विकसित देशों के लोग सुविधाओं के गुलाम हो चुके हैं | वेनिस की नहरों का सूखना और  उत्तरी ध्रुव से विशाल हिम शैलों का टूटकर समुद्र में आ जाना उस भयावह दृश्य  का एहसास करवाता है जिसे भरतीय दर्शन में प्रलय कहा जाता है | भारत में भी इस साल समय से पहले ग्रीष्म ऋतु का आ धमकना भावी खतरों का संकेत है | यूरोप के साथ अमेरिका में भी गर्मियां अब पहले से ज्यादा  तपने लगी हैं | इस वजह से वहां पंखों का चलन बढ़ने की खबरें हैं | भारत  इस साल जी 20 समूह का अध्यक्ष है | इसके वार्षिक सम्मेलन की गतिविधियाँ शुरू हो गयी हैं | इसके पूर्व में भी अनेक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों और संरासंघ जैसे वैश्विक मंचों पर भारत द्वारा बदलते मौसम और उसके दुष्प्रभाव पर विश्व समुदाय को अपनी चिंताओं के साथ प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण हेतु भारत के प्राचीन ज्ञान के बारे में अवगत कराया जाता रहा है | ऐसे में जी 20 के अध्यक्ष के रूप में भारत को इस सम्मलेन में आर्थिक और राजनयिक मुद्दों के साथ ही पर्यावरण संरक्षण के विषय को जोरदारी से उठाते हुए विकसित देशों के सामने विकासशील देशों की भावनाएं और समस्याओं को इस तरह पेश करना चाहिए जिससे कि उनकी मनमानी पर रोक लगाई जा सके | छोटे – छोटे देशों पर पर्यावरण को क्षति पहुँचाने का आरोप लगाने  वाले दुनिया के चौधरी जिस वासना के शिकार हैं वह आने वाले पीढ़ियों के लिए बड़ी त्रासदी को जन्म देने वाली है |  ऐसे में विकास की समूची अवधारणा को बदलना होगा | दुर्भाग्य से संरासंघ जैसे संगठन इस दिशा में अपनी भूमिका का समुचित निर्वहन करने में विफल रहे हैं | ये देखते हुए भारत को इस मुहिम का नेतृत्व करना चाहिए क्योंकि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में वह ऐसा देश बन चुका है जो विकसित और विकासशील देशों के बीच सेतु का काम कर सकता है | सबसे बड़ी बात ये है कि भारत की छवि एक ईमानदार और जिम्मेदार देश के तौर पर कायम हो चुकी है ,जिसकी कथनी और करनी में अंतर नहीं है और जो शीत युद्ध रूपी गुटबाजी  से दूर रचनात्मक सोच के साथ विश्व बिरादरी में निरन्तर अपनी साख  और धाक  बनाये हुए है | आने वाली गर्मियाँ हमारे देश को जो नया अनुभव देंगी उनके आधार भविष्य की मौसम संबंधी नीति तय करने में भारत दुनिया का नेतृत्व कर सकता है | कोरोना और यूक्रेन संकट में उसकी  निर्णय और नेतृत्व क्षमता शानदार तरीके से उजागर हुई है |

रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 3 March 2023

पूर्वोत्तर के नतीजे : छोटे राज्यों से बड़ा राजनीतिक सन्देश



तीन पूर्वोत्तर राज्यों के चुनाव परिणाम भले ही राष्ट्रीय राजनीति को गहराई तक प्रभावित न करते हों लेकिन संचार क्रांति के इस दौर में देश के किसी भी कोने में होने वाली छोटी - बड़ी घटना की जानकारी सब दूर फ़ैल जाती है और तदनुसार उसका विश्लेषण भी होता है | उस दृष्टि से त्रिपुरा , नगालैंड और मेघालय विधानसभा चुनाव के जो नतीजे आये उनमें  न सिर्फ राजनीतिक दलों अपितु अन्य क्षेत्रों से जुड़े लोगों की भी रूचि देखी गयी क्योंकि उत्तर पूर्व का क्षेत्र अब पहले जैसा  समस्याग्रस्त न रहते हुए विकास के रास्ते पर तेजी से बढ़ रहा  हैं | उच्च स्तरीय राजमार्गों सहित अधो संरचना के अन्य कार्य पूरे देश की तरह वहां भी तेजी से चलने की वजह से  अलगाववादी संगठन कमजोर हुए और मुख्यधारा की राजनीति ने अपने पैर जमाये हैं | हालाँकि कांग्रेस और वामपंथी दलों  की उपस्थिति इन राज्यों में पहले से थी और वे  सरकार  में भी रहे लेकिन  2014 में केंद्र  की सत्ता पर भाजपा के काबिज होने के बाद पूर्वोत्तर की सियासी तस्वीर बदलने लगी और भाजपा ने वहां अपनी उपस्थिति जोरशोर से दर्ज करवा दी | सबसे बड़ा चमत्कार हुआ त्रिपुरा में जो वामपंथी दलों का मजबूत गढ़ था | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्वोत्तर के लगातार दौरे करते हुए वहाँ के लोगों के मन में बैठी इस अवधारणा को काफी हद तक दूर करने में सफलता हासिल की कि वे उपेक्षित हैं | यही वजह रही कि पूर्वोत्तर के वे क्षेत्रीय दल जो भारतीय संघ से जुड़ने से परहेज करते थे भाजपा की  राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रति आकर्षित हुए |त्रिपुरा में वामपंथ की  जड़ों को खोदना आसान न था | कांग्रेस तो  इसमें विफल साबित हुई ही , प. बंगाल से  साम्यवादियों को खदेड़ने वाली ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस भी इस राज्य में नाकाम रही  | लेकिन 2018 में भाजपा ने त्रिपुरा में तो इतिहास रचा ही किन्तु नगालैंड और मेघालय में भी वह क्षेत्रीय दलों के साथ सरकार बनाने में कामयाब हो गयी | इसके अलावा असम , मणिपुर और अरुणाचल में भी उसकी सत्ता है | जानकार इसके लिए मोदी - शाह की जोड़ी के साथ ही रास्वसंघ द्वारा पूर्वोत्तर के आदिवासी तबकों के बीच राष्ट्रवादी भावना के प्रसार  हेतु चलाये जा  रहे प्रकल्पों को श्रेय दे रहे हैं | संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों के अथक प्रयासों का ही परिणाम है कि जो आदिवासी और अन्य जातीय कबीले अलगाववादियों के प्रभाव में भारत विरोधी हिंसक  गतिविधियों में लिप्त थे वे हथियार छोड़कर यदि मुख्यधारा में आये तो ये बड़ी उपलब्धि रही जिसके लिए केंद्र सरकार द्वारा  पूर्वोत्तर को विकास में समान  हिस्सा दिए जाने की नीति भी काफी हद तक सहायक बनी | इस बारे में ये याद रखने लायक है कि प्रधानमंत्री बनने के  पूर्व से ही डा.मनमोहन सिंह असम से राज्यसभा में आते रहे लेकिन वे भी इस अंचल से अलगाववादी ताकतों का हौसला ठंडा करने में विफल रहे | भाजपा की  सफलता इसलिए और मायने रखती है कि  पूर्वोत्तर के राज्यों में ईसाइयत का काफी दबदबा रहा है | इसके अलावा वहां के अनेक आदिवासी समुदाय भी अपने को हिन्दू नहीं मानते | कुछ जातियां तो अलग राष्ट्रीयता का राग अलापती रहीं | लेकिन धीरे – धीरे वहां का समूचा परिदृश्य बदलता लग रहा है | इसके कारण भारत का स्विट्जरलैंड कहे जाने वाले पूर्वोत्तर में पर्यटकों की संख्या में भी वृद्धि होने लगी है | इसलिए इन परिणामों को बजाय राजनीति के  राष्ट्रीय दृष्टिकोण से भी देखना होगा  | कांग्रेस को इस बारे में चिंता और चिन्तन दोनों करना चाहिए कि क्या वजह है जिससे यहाँ के मतदाताओं का उससे मोहभंग होता जा रहा है | उसने वामपंथियों से जो गठबंधन किया वह भी काम नहीं आया और  तीनों राज्यों में उसकी दयनीय स्थिति बन गयी | लेकिन इसके लिए उसका शीर्ष नेतृत्व ही जिम्मेदार है जिसने इन चुनावों को हल्के में लिया और राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को वैतरणी पार कराने वाली मान बैठा  | एक तरफ जहां प्रधानमंत्री , गृह मंत्री और रक्षा मंत्री सहित भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष तीनों राज्यों में पार्टी की जीत के लिए प्रयास करते देखे गए वहीं कांग्रेस यात्रा की खुमारी में डूबी रही | ऐसे में ये मान लेना गलत न  होगा कि कांग्रेस में हौसले की कमी है | झटका तो तृणमूल कांग्रेस को भी लगा है जो सोचती थी कि बंगाल  जैसा जादू इन राज्यों में भी चला लेगी | हालाँकि ये नतीजे कर्नाटक , तेलंगाना , म.प्र , छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनावों पर कितना असर डालेंगे ये पक्के तौर पर कह पाना तो कठिन है किन्तु भाजपा का मनोबल इस बात से जरूर बढ़ा होगा कि वह तीनों राज्यों में सत्ता में वापसी कर सकी | इसके साथ ही जिस प्रकार तृणमूल कांग्रेस ने गत दिवस विपक्षी गठबंधन से अलग रहकर लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा कर डाली उससे भी विपक्षी बिखराव का संकेत  मिल रहा है | सबसे बड़ी बात इन चुनाव परिणामों से ये निकलकर आई कि कांग्रेस विपक्षी गठबंधन की नेता बनने के लिए दबाव डालने की हैसियत खो बैठी है | छोटे छोटे राज्यों में उसका हाशिये पर सिमटता  जाना उसके कद को लगातार घटा रहा है | ऐसे में उ.प्र ,बिहार और महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों में जो क्षेत्रीय दल प्रभावशाली हैं वे उसे भला क्यों भाव देंगे ?

रवीन्द्र वाजपेयी