Saturday, 8 April 2023

पवार का नया पावर गेम शुरू



राकांपा ( राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ) के संस्थापक शरद पवार ने एक बार फिर ये साबित कर दिया कि वे राजनीति के कितने बड़े खिलाड़ी हैं | बीते कुछ दिनों के भीतर ही उन्होंने कांग्रेस की उस व्यूह रचना को छिन्न  – भिन्न का कर दिया जिसके जरिये राहुल गांधी को विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा बनाकर 2024 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के मुकाबले प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर खड़ा किया जाना है | विपक्ष की एकता हेतु जितनी भी मुहिम फिलहाल चल रही हैं उनमें से अधिकतर में श्री पवार की सलाह ली जा रही है | प.बंगाल का पिछले चुनाव जीतने के फौरन बाद ममता बैनर्जी ने जब कांग्रेस से अलग विपक्ष का मोर्चा बनाने की घोषणा करते हुए राहुल गांधी की क्षमता पर संदेह जताया तब वे सबसे पहले मुम्बई जाकर श्री पवार से ही मिलीं | यद्यपि उन्हें कोई  आश्वासन इस मराठा नेता ने नहीं दिया | उसके बाद और भी विपक्षी नेता उनसे मिलते रहे किन्तु श्री पवार ने केवल उनकी बात सुनकर चलता कर दिया | भारत जोड़ो यात्रा के सन्दर्भ में उनके द्वारा राहुल के प्रयास की प्रशंसा तो की गई लेकिन यात्रा के बीच में या श्रीनगर में उसके समापन पर कांग्रेस के न्यौते पर वे न खुद गए और न ही उनकी पार्टी का कोई अन्य नेता | लेकिन इस दौरान वे कांग्रेस के साथ भी  मेलजोल बनाये रहे जिसका कारण महाराष्ट्र में महा विकास अगाड़ी नामक गठबंधन है जिसमें रांकापा के साथ कांग्रेस  और शिवसेना भी शामिल हैं | इस बेमेल गठजोड़ के शिल्पकार भी श्री पवार ही हैं | लेकिन बीते कुछ दिनों में ही श्री पवार ने जिस  तरह से पैंतरेबाजी की उसकी वजह से विपक्ष के भीतर खलबली मच गयी है | कांग्रेस को तो मानो सांप सूंघ गया है | जनवरी में हिंडनबर्ग की रिपोर्ट आने के बाद से राहुल गांधी को जैसे ब्रह्मास्त्र की प्राप्ति हो गयी क्योंकि उसमें गौतम अडानी के आर्थिक साम्राज्य के विरुद्ध जो खुलासे किये गए उनसे राजनीति तो गरमाई ही कुछ दिनों तक तो ऐसा लगा कि देश की अर्थव्यवस्था ही धराशायी हो जायेगी | भारतीय स्टेट बैंक और जीवन बीमा निगम जैसे संस्थानों द्वारा अडानी समूह में किये गए निवेश को डूबता हुआ माना जाने लगा और इसके लिए राहुल और उनके प्रचारतंत्र ने सीधे – सीधे श्री मोदी को कठघरे में खड़ा करने की रणनीति तैयार कर ली | संसद के बजट सत्र की शुरुआत से ही इस मामले में जेपीसी बनाये जाने की मांग के साथ  संसद न चलने देने की जिद ठान ली गयी | बाद में श्री गांधी ने ब्रिटेन में जो भाषण दिए उनके लिए माफी मांगे  जाने को  सत्तापक्ष ने प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाते हुए संसद को ठप्प करने का जवाबी दांव चल दिया | इस शीतयुद्ध के दौरान ही सूरत की अदालत से आये  फैसले से राहुल की लोकसभा सदस्यता चली गयी जिसने आग में  घी का काम  किया | और जो विपक्षी दल अभी तक जेपीसी के मुद्दे पर दूर थे वे भी सहानुभूति लेकर कांग्रेस के साथ उठने - बैठने लगे जिसमें आम आदमी पार्टी भी शामिल थी | लेकिन जोश में आकर राहुल ने पत्रकार वार्ता में माफी मांगे जाने के सवाल पर कह दिया कि वे सावरकर नहीं गांधी हैं | उल्लेखनीय है लम्बे समय से वे सावरकर के माफीनामे को लेकर बयानबाजी करते रहे हैं | लेकिन इस बार उनकी  टिप्पणी उनके गले पड़ गयी | पहले तो उद्धव ने विरोध जताया और कांग्रेस द्वारा बुलाई बैठकों से दूरी बना ली और उसके बाद श्री पवार ने  बैठक में पहुंचकर कांग्रेस को समझा दिया कि राहुल को रोका जावे अन्यथा महाराष्ट्र में गठबंधन टूट जाएगा | यही नहीं उन्होंने कांग्रेस सहित बाकी विपक्षी दलों को भी बता दिया कि सावरकर के प्रति महाराष्ट्र में बेहद सम्मान है | उनकी बात का असर भी हुआ और राहुल ने उसके बाद सावरकर के बारे में कहना बंद कर दिया | लेकिन बीते रविवार को नागपुर प्रेस क्लब में श्री पवार ने सावरकर को महान देशभक्त और समाज सुधारक बताते हुए  अंडमान की सेलुलर जेल में उनके द्वारा सही गयी यातनाओं का उल्लेख तो किया ही लेकिन अडानी विवाद में कांग्रेस द्वारा जेपीसी की मांग से असहमति व्यक्ति करते हुए कह दिया कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बनाई गयी जाँच समिति के बाद इसका कोई  औचित्य नहीं रह जाता क्योंकि वह समिति ज्यादा बेहतर है | उनके उक्त बयान के बाद कांग्रेस भौचक रह गई | हालाँकि रांकापा ने संसद में भी जेपीसी के मामले में तटस्थ भाव अपना रखा था किन्तु सार्वजनिक तौर पर उस मांग को निरर्थक बताकर उन्होंने ये संकेत दे दिया कि वे कांग्रेस को इतनी  छूट  नहीं  देंगे जिससे वह मोदी विरोधी राजनीति का नेतृत्व करने लायक बन जाए | और फिर कल उन्होंने एक साक्षात्कार में न सिर्फ जेपीसी की उपयोगिता को ही नकार दिया अपितु हिंडनबर्ग  रिपोर्ट की प्रामाणिकता पर भी संदेह जताकर राहुल और कांग्रेस की धडकनें बढ़ा दीं | यही नहीं तो श्री पवार ने भारत के उद्योगपतियों के योगदान की प्रशंसा करते हुए यहाँ तक कह दिया कि पहले टाटा – बिरला निशाने पर हुआ करते थे लेकिन अब अम्बानी और अडानी पर हमले हो रहे हैं | उनके अनुसार अडानी को जानबूझकर लक्ष्य बनया गया जिनका देश में बिजली उत्पादन में बड़ा योगदान है | उनके इस बयान के बाद कांग्रेस ने फौरन उनके निजी विचार बताकर पिंड छुड़ाया किन्तु संसद सत्र के समाप्त होते ही रांकापा नेता द्वारा कांग्रेस की लाइन के एकदम विपरीत चल देने से विपक्षी एकता की तमाम कोशिशों को तो पलीता लगा ही लेकिन उसके साथ ही नए राजनीतिक समीकरण बनने की संभावनाएं भी पैदा कर दीं | ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि उनके भतीजे अजीत पवार ने भी दो दिन पहले ही अरविन्द केजरीवाल द्वारा प्रधानमंत्री की शैक्षणिक योग्यता पर उठाये  जा रहे सवाल का विरोध किया था | राजनीति की नब्ज जानने वाले श्री पवार के इस दांव के परिणाम और उद्देश्यों का अध्ययन करने में जुट गए हैं | जिस तरह एक झटके में उन्होंने सावरकर मुद्दे पर राहुल को मुंह बंद रखने मजबूर किया और अब जेपीसी की मांग की हवा निकालते हुए हिंडनबर्ग रिपोर्ट को रद्दी की टोकरी में फेंकते हुए अडानी सहित तमाम उद्योगपतियों का बचाव किया , वह साधारण बात नहीं है | कांग्रेस को इतना बड़ा झटका तो राहुल को सजा मिलने और सदस्यता जाने से भी नहीं लगा था जितना श्री पवार ने कल दे डाला |


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 7 April 2023

सड़क जाम करने पर सजा तो संसद जाम करने पर क्यों नहीं



वैसे तो संसद के सभी सत्र महत्वपूर्ण होते हैं लेकिन बजट सत्र की अहमियत कुछ ज्यादा ही होती है जिसमें  आगामी साल के लिए देश की आर्थिक  दिशा तय की  जाती है | इसके अलावा भी कुछ महत्वपूर्ण विधेयकों सहित विधायी कामकाज निपटाए जाते हैं | बजट सत्र के प्रारम्भ में राष्ट्रति दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में अपना अभिभाषण देते हैं जो एक तरह से सरकार का नीति वक्तव्य होने से उस पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान जोरदार बहस होती है | इस सत्र की अवधि भी सबसे लम्बी होती है | मोदी सरकार ने बजट को फरवरी में प्रस्तुत किये जाने की जो  व्यवस्था की उसकी वजह  से अब नया वित्तीय वर्ष शुरू होते ही विभिन्न मंत्रालयों को खर्च हेतु मिलने वाली राशि उपलब्ध होने से विकास योजनाओं के काम में विलम्ब नहीं होता | इसी तरह रेलवे का अलग बजट बंद करते हुए उसे भी आम बजट के साथ जोड़ दिया गया | इसके कारण बजट पर चर्चा हेतु ज्यादा समय सांसदों को मिलने लगा | लेकिन कल समाप्त हुए सत्र में अभूतपूर्व स्थिति देखने में मिली | उसकी वजह से वित्त विधेयक जैसा अति महत्वपूर्ण विषय भी बिना बहस के ही पारित हो गया | और भी कुछ विधेयक हैं जिन पर सदन में बहस नहीं हुई क्योंकि हंगामे के कारण सदन ठीक से चला ही नहीं | अमूमन सत्र के आख़िरी दिन सदन का माहौल कुछ  हल्का फुल्का  रहता है | शिकवे – शिकायतों के बजाय हास -  परिहास भी देखने मिलता है | लेकिन बीता सत्र इसका अपवाद बन गया | पहले चरण में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर तो फिर भी कुछ  बहस हुई लेकिन दूसरा तो एक तरह से बेकार ही चला गया | इसके लिए दोषी कौन है ये अंतहीन बहस है जिसका फैसला कोई नहीं कर सकता | उल्लेखनीय है संसद के हर सत्र के पहले लोकसभाध्य्क्ष और राज्यसभा के सभापति सर्वदलीय बैठक बुलाकर सदन को सुचारू रूप से संचालित करने हेतु सभी पार्टियों से सहयोग मांगते हैं और उसमें मौजूद विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि इस बात के प्रति आश्वस्त करते हैं कि सत्र की कार्यसूची में शामिल विषयों पर सार्थक विचार – विमर्श किया जावेगा | लेकिन पहले दिन दिवंगतों को श्रद्धांजलि देने के बाद अगले दिन से ही सत्ता और विपक्ष के बीच बाहें चढ़ाने की प्रतियोगिता शुरू हो जाती है | इसके पीछे देश और जनता से जुड़ा हुआ कोई मुद्दा हो तो टकराव समझ में आता है किन्तु निजी हितों के साथ राजनीतिक स्वार्थों के चलते सदन को ठप्प किया जाना जनता के साथ धोखाधड़ी है | गत दिवस समाप्त हुए बजट सत्र के दूसरे चरण में हुईं कुल 15 बैठकों में 5 घंटे  भी कार्यवाही नहीं चल सकी | जो जानकारी आई है उसके अनुसार पूरे बजट सत्र के दौरान लोकसभा में निर्धारित समय का तकरीबन 35 फीसदी और राज्यसभा में 24 फीसदी कामकाज हुआ | सांसदों की गैर जिम्मेदारी का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि दोनों सदनों में प्रश्नकाल तक ठीक से नहीं चला | विपक्ष द्वारा अडानी मामले में जेपीसी की मांग और फिर सत्ता पक्ष की ओर से  विदेशी धरती पर दिए गए भाषण पर राहुल गांधी के माफीनामे की जिद ने पूरे सत्र को एक तरह से बर्बाद कर दिया | विपक्ष का काले कपड़े पहनकर विरोध करना भी एक नई परिपाटी को जन्म  दे गया | वहीं सत्ता में बैठे लोगों द्वारा सदन को बाधित करना एक नए अध्याय की शुरुवात जैसा है | सत्र को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किये जाने के बाद दोनों पक्ष  एक दूसरे को दोषारोपित कर रहे हैं | विपक्ष ने कल शाम लोकसभाध्यक्ष द्वारा दी गई दावत का भी बहिष्कार किया | इस बारे में  चिंताजनक बात ये भी है कि अब लड़ाई केवल सरकार और विपक्ष के बीच सीमित नहीं रहकर आसंदी तक भी पहुँचने लगी है | कुल मिलाकर ये कहना गलत नहीं है कि  संसदीय प्रजातंत्र जिन श्रेष्ठ परम्पराओं से प्रेरित और प्रभावित होता है उनके प्रति हमारे मौजूदा जनप्रतिनिधियों में लेश मात्र भी सम्मान नहीं बचा है | वरना दोनों सदनों में कुछ सदस्य तो ऐसे होते जो कहते , वे बिना काम किये सदन की बैठक का भत्ता नहीं लेंगे और इस बात के लिए आन्दोलन करते कि सदन की कार्यवाही को ठप्प करना उनके संवैधानिक अधिकार पर कुठाराघात है | ये सवाल भी उठने लगा है कि क्यों न लोकसेवक की श्रेणी में आने वाले सांसदों द्वारा सदन को बाधित करने जैसा कृत्य दंडनीय अपराध माना जाये | ये बात अब चुभने लगी है कि सड़क पर चकाजाम करने वाले आन्दोलनकारियों पर तो अपराधिक प्रकरण दर्ज हो जाता है किन्तु संसद को जाम  करने वाले सीना तानकर घूमा करते हैं | ये विडंबना ही है कि  जिन लोगों के हाथ में कानून बनाने का अधिकार है वे विधि द्वारा स्थापित संसद की समूची व्यवस्था को ठप्प करने में लेशमात्र भी नहीं हिचकते | अपवादस्वरूप किसी मामले में सदन में अपना विरोध करने हेतु विपक्ष सत्याग्रह स्वरूप कुछ करे तो बात समझ में आती है किन्तु गर्भगृह में आने के साथ ही आसंदी तक जा पहुंचना तो वाकई  संस्कारों की कमी का परिचायक है | इसी तरह सत्ता पक्ष अपने बहुमत के घमंड में सदन को अपनी मर्जी से चलाना चाहे तो वह स्थिति भी आदर्श नहीं हो सकती |   बेहतर हो इस मुद्दे पर राष्ट्रीय विमर्श प्रारंभ हो | सर्वोच्च न्यायालय को भी इसका संज्ञान लेना चाहिए क्योंकि संविधान के संरक्षक के रूप में संसदीय प्रणाली में आने वाली विकृतियों को दूर करना उसका भी दायित्व है | संसद के बजट सत्र का साफ़ शब्दों में कहें तो जिस तरह से सत्यानाश किया गया वह अच्छा संकेत नहीं है क्योंकि इसके बाद होने वाले सत्र में भी यदि विपक्ष जेपीसी और सत्तापक्ष माफीनामे की जिद पर अड़ा रहा तो फिर संसद अपनी उपयोगिता ही खो देगी जो देश के भविष्य के लिए किसी दुर्भाग्य से कम न होगा |

रवीन्द्र वाजपेयी 


Thursday, 6 April 2023

समाचार माध्यम : स्वतंत्रता आवश्यक किंतु स्वच्छंदता अनुचित




केरल के एक मलयालम चैनल मीडिया वन पर केंद्र सरकार द्वारा लगाई गई रोक को सर्वोच्च न्यायालय ने इस आधार पर हटा दिया  क्योंकि सरकार की आलोचना इसका आधार नहीं हो सकता । उक्त चैनल द्वारा प्रसारित सामग्री को केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्रालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानते हुए उसके लायसेंस नवीनीकरण करने पर प्रतिबंध लगा दिया था। केरल उच्च न्यायालय द्वारा भी इस निर्णय को सही ठहराया गया किंतु गत दिवस मुख्य न्यायाधीश डी. वाय. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने उस फैसले को उलटते हुए कहा कि समाज के संचालन के लिए स्वतंत्र समाचार माध्यम जरूरी है और आलोचना को हमेशा सरकार का विरोध नहीं कहा जा सकता और इस तरह के प्रतिबंधों से लगता है कि प्रेस को हमेशा सरकार का समर्थन करना चाहिए। श्री चंद्रचूड़ ने चैनल की याचिका विचारार्थ स्वीकार करते हुए कहा कि  अंतरिम आदेश के लागू रहने तक चार सप्ताह के भीतर उसके लायसेंस का सूचना प्रसारण  मंत्रालय नवीनीकरण करे। उल्लेखनीय है मीडिया वन पर आरोप था कि उसके अंशधारकों के प्रतिबंधित जमायत ए इस्लामी से संबंध हैं और वह नागरिकता संबंधी कानूनों के विरुद्ध अल्पसंख्यकों को भड़काता था जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हो गया। सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र के उस निर्णय को लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह मानते हुए चैनल पर रोक लगाने के फैसले पर अंतरिम आदेश जारी कर दिया। सतही तौर पर देखें तो लोकतंत्र की मूलभूत आवश्यकता के लिए प्रेस की स्वतंत्रता से भला कौन  इंकार करेगा ? विशेष रूप से वर्तमान परिस्थितियों में जब समाचार माध्यमों की विश्वसनीयता और सम्मान अब तक के  सबसे निचले स्तर पर है। सही मायनों में तो  समाचार पत्रों की स्वतंत्रता संपादक के कर्मचारी बन जाने से कब की खत्म हो चुकी है। रही बात टीवी चैनलों की तो उनकी पत्रकारिता व्यावसायिकता और ग्लैमर में उलझकर रह गई । ये वैसे ही है जैसे व्यवसायिक सिनेमा ने कला फिल्मों को घाटे का सौदा बना दिया और ओटीटी नामक माध्यम ने वास्तविकता के नाम पर गाली - गलौच और अश्लीलता को परोसकर बॉक्स आफिस के कथित दबदबे की धज्जियां उड़ा दीं। समाचार पत्र यदि किसी बड़े औद्योगिक घराने का है तब तो उसकी नीति और नीयत दोनों सत्ताभिमुखी हो जाती हैं। और यदि वह किसी छोटी हैसियत वाले का है तो सरकारी विज्ञापन की मजबूरी उसकी निष्पक्षता और निर्भीकता को पूरी तरह न सही किंतु काफी हद तक तो प्रभावित करती ही है। यही वजह है कि समाचार पत्र जन सरोकार की बजाय व्यावसायिक प्रतिबद्धता के प्रतीक बन गए हैं । टीवी चैनलों का आर्थिक प्रबंधन तो वैसे भी रहस्यों से घिरा है क्योंकि परदे पर जो लोग दिखते हैं वे केवल कठपुतली हैं जिनकी डोर  पीछे बैठे लोगों के हाथ होती है । यही वजह है कि उनसे निष्पक्षता की उम्मीद निरर्थक है। इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय को ये कहना पड़ा कि स्वतंत्र प्रेस , मजबूत लोकतंत्र के लिए जरूरी है और आलोचना को सरकार का विरोध मान लेना गलत है।लेकिन इस बारे में ये बात भी विचारणीय है कि क्या ये स्थिति अचानक बन गई ? देश के आजाद होने के बाद लंबे समय तक एक ही पार्टी के निर्बाध शासन से प्रेस भी उसके आभामंडल से प्रभावित था। पत्रकारों की सूची में स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ी हस्तियां होने से उसमें वैचारिक एकरूपता थी। हालांकि धीरे - धीरे और धाराएं भी मुख्यधारा की पत्रकारिता से जुड़ीं किंतु सत्ता के विपरीत चलने की सजा उन्हें भोगनी पड़ी। आज जो राजनीतिक मंडली पत्रकारिता की स्वतंत्रता का गाना गाती फिरती है उसके शासनकाल में ही पहली बार देश ने सेंसरशिप का  दंश  सहा था । बीते तीन दशक में  समाज के हर क्षेत्र की तस्वीर बदल गई है। बाजारवाद ने लोगों की  मानसिकता  और प्राथमिकता दोनों में परिवर्तन कर दिया। ऐसे में समाचार माध्यम भी नए कलेवर में आ गए  तो चौंकने वाली बात नहीं होनी चाहिए।वैसे भी तकनीक का प्रभाव बढ़ने से पत्रकारिता में संवेदनशीलता घटी है। स्वतंत्रता के नाम पर स्वच्छंदता ने पैर पसार लिए तो  चमक - दमक में दायित्वबोध लुप्त होकर रह गया । इसका सबसे बड़ा नुकसान ये हुआ कि भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे नारों को अभिव्यक्ति के अधिकार का रूप दे दिया गया। जिस वीरप्पन डाकू को पुलिस नहीं ढूंढ पाती थी उसका साक्षात्कार लेकर एक पत्रकार महानायक बन गया। आतंकवादी से बातचीत को साहसिक पत्रकारिता मान लिया गया और  नक्सलियों से सहानुभूति को जनवादी सोच का नाम दिया जाने लगा  । परिणामस्वरूप नग्नता की तेज हवा में नैतिकता के वस्त्र उड़े जा रहे हैं। ऐसी स्थिति में जब कोई  व्यक्ति या संस्थान अभिव्यक्ति  के नाम पर मर्यादाओं की लक्ष्मण रेखा लांघता है तब उसे स्वतंत्रता कहकर प्रोत्साहित करना भी लोकतंत्र की नसों में धीमा जहर घोलने जैसा है। अभिव्यक्ति  और धर्मनिरपेक्षता की आड़ में इस देश में जो खतरनाक खेल चलता आया  उसमें समाचार माध्यमों का भी एक वर्ग शामिल हो गया है। इसके पीछे कौन लोग हैं , ये तो नजर नहीं आता लेकिन उनके द्वारा जो भी किया जाता है वह देश को भीतर से कमजोर करने का जरिया बनता जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने प्रेस की स्वतंत्रता का महत्व प्रतिपादित करते हुए  तो ढेर सारी नसीहतें दे दीं किंतु जिन लोगों के कारण पत्रकारिता अपनी नैसर्गिक पवित्रता खोती जा रही है उनका पर्दाफाश भी जरूरी है। दरअसल पत्रकारिता को कथित सेलेब्रिटीज  की बजाय दोबारा उन लोगों के हवाले  करना होगा जो श्रमजीवी की बजाय कर्मजीवी हों और जिनको पैकेज से ज्यादा मान - सम्मान में रुचि रहे। उल्लेखनीय है पत्रकारिता की अनावश्यक सक्रियता न्यायपालिका को भी चुभती  है , तभी वह मीडिया ट्रायल के बारे में तीखी टिप्पणी करता रहता है। इसलिए इस प्रश्न का उत्तर भी मिलना चाहिए कि किसी व्यक्ति या संगठन के बारे में बेहद कड़वी बात कहने को तैयार बैठे सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी आलोचना की वैसी छूट प्रेस को क्यों नहीं  दी जैसी उसने संदर्भित फैसले में  सरकार को सुझाई है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Wednesday, 5 April 2023

खजाना इतना ही भरा हुआ है तो पेट्रोल – डीजल सस्ता करो



राजस्थान सरकार ने रसोई गैस का सिलेंडर 500 रु. में देने की जो व्यवस्था की है उसके पीछे जनकल्याण कम और चुनावी रणनीति ज्यादा है | मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने रक्षाबंधन पर महिलाओं को स्मार्ट फोन बाँटने का ऐलान  भी किया है | वर्ष के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए ऐसी ही घोषणाएं अन्य चुनावी राज्यों में भी हो रही हैं | म.प्र में इन दिनों लाड़ली बहना योजना की धूम है | छत्तीसगढ़ में भी भूपेश बघेल ने खजाना खोल दिया है | जो मांगोगे वही मिलेगा का दौर चल रहा  है | केंद्र सरकार अभी से आगामी लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुट गयी है | उसी के चलते नए साल के बजट में आयकर छूट की सीमा बढ़ाई गयी है | क्षेत्रीय दलों की सरकार वाले राज्यों की सियासत  तो विशुद्ध मुफ्त उपहारों पर चलती है | भारतीय राजनीति में ऐसे दांव पेंच नए नहीं रहे | इनकी  शुरुआत कब और किसने की ये तो शोध का विषय है लेकिन ये तरीका अब सर्वदलीय बन गया है  | बाजारवादी सोच केवल आर्थिक मामलों तक सीमित नहीं रही अपितु सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र में इसकी उपस्थिति और प्रभाव देखा जा सकता है | नरेंद मोदी के विरोध में बोलने वाले भी  स्वीकार करते हैं कि भले ही वे हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के सहारे सत्ता में आये लेकिन मुफ्त अनाज और प्रधानमन्त्री आवास योजना के अंतर्गत गरीबों को मकान उनकी सफलता का सबसे बड़ा कारण है | 2016 में नोटबंदी होने के बाद 2017 के  उ.प्र विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली धमाकेदार सफलता में उक्त योजनाओं का बड़ा योगदान था | इसी तरह जीएसटी से परेशान गुजरात के व्यापारी समुदाय ने भी फिर भाजपा की सरकार बनवा दी | हालाँकि दिल्ली में आम आदमी पार्टी के मुफ्त उपहार भाजपा और कांग्रेस  दोनों पर भारी पड़ गए जिसका असर पंजाब में भी देखने मिला | यद्यपि अब तक दिल्ली मॉडल को तीसरे किसी राज्य की जनता ने स्वीकार नहीं किया किन्तु मुफ्त बिजली , पानी , शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे वायदों के साथ अरविन्द केजरीवाल प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल होने की कोशिश में जुटे हैं | केंद्र सरकार द्वारा प्रारंभ की गयी आयुष्मान भारत योजना को राज्यों में और दरियादिली से लागू किया जा रहा है | बावजूद इसके कि वे सभी अपने दैनंदिन खर्चों तक के लिए आये दिन रिजर्व बैंक से कर्ज उठाते हैं | लोक कल्याणकारी राज्य की व्यवस्था में जनता को राहत देना बुरा नहीं है | राजा – महाराजा भी संकट के समय प्रजा के लिए खजाने खोला करते थे | लेकिन  तब और अब के आर्थिक प्रबंधन में जमीन आसमान का  फर्क है | मसलन राजशाही में समूचा विकास राजमहल और राजधानी के इर्द गिर्द होता था | लेकिन लोकशाही में विकास की रोशनी राष्ट्रपति भवन तक ही सीमित नहीं रहती | इसीलिये सड़क , बिजली , पानी , शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी चीजों पर सरकार को ध्यान देना पड़ता है | ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि आजादी के 75 साल बाद भी हम अपनी जनता तक मूलभूत  सुविधाएं उस स्तर तक नहीं पहुंचा सके जितनी कि अपेक्षित और आवश्यक थीं | हालाँकि हालात पूर्वापेक्षा काफी सुधरे हैं लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना है | इस बारे में ये कहना सही होगा कि संचार क्रांति के कारण अब जनता की आवाज सुनाई देने लगी है | देश के किसी  भी कोने की जानकारी सत्ता के गलियारों तक पहुँचने की वजह से लोगों की अपेक्षाएं भी लगातार बढ़ रही हैं | लेकिन लोगों के जीवन स्तर को सुधारकर उन्हें खुशहाली की ओर ले जाने के बजाय तात्कालिक फायदों के जरिये  आकर्षित करने का चलन राजनेताओं ने अपना लिया है जिसके चलते समूची राजनीति चुनाव केन्द्रित होकर रह गयी है | इसके लिए किसी एक नेता या पार्टी को दोषी ठहराना गलत होगा क्योंकि घुमा फिराकर सभी का आचरण एक जैसा है | मुफ्त उपहारों के साथ ही जातिगत आरक्षण भी वह झुनझुना है जिसके जरिये मतदाताओं को गोलबंद किया जाता है | हालाँकि धीरे – धीरे ये बात साफ़ होती  जा रही है कि आरक्षण जिस सरकारी नौकरी के लिए बना  उसमें भी लगातार कमी आ रही है | चूंकि  उसकी  अधिकतम सीमा  निश्चित है ,  ऐसे में कोटे के भीतर कोटे का खेल चल रहा है | पिछड़ों में अति पिछड़े  और दलित में भी अति दलित खोजे जा रहे हैं | देखा सीखी ऊँची कही जाने वाली जातियों ने भी आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग के साथ दबाव बनाना शुरू कर दिया है | जो राजनीतिक दल खुलकर आरक्षण की राजनीति नहीं करते वे सोशल इन्जीनियरिंग जैसे फैशनेबल शब्दों का इस्तेमाल करते हुए अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं | लेकिन इतना सब होने के बाद भी मूल समस्याएँ जस की तस हैं | राजनीति करने वाला हर नेता अपने विरोधी पर आरोप लगाया करता है कि वह बेरोजगारी और महंगाई को रोकने में नाकाम है | लेकिन सरकारी नौकरियों में कटौती करते हुए निजी क्षेत्रों की सेवाएं लेने और स्थायी की जगह दैनिक वेतन भोगी या संविदा कर्मियों की नियुक्ति से काम चलाने की नीति पर सभी चल रहे हैं | दरअसल सारे राजनीतिक दल समझ चुके हैं कि जनता की याददश्त बेहद कमजोर होती है | इसीलिये पुराने वायदों को रद्दी की टोकरी में फेंककर नयी सूची पेश कर दी जाती है |   जिन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं उनकी सत्ता में बैठे लोगों को नए वायदे जारी करने के पूर्व पिछले चुनाव में पेश किये गए घोषणापत्र का लेखा- जोखा पेश करते हुए अधूरे रह गये  वायदों को के लिए  क्षमा मांगनी चाहिए | लेकिन यह  ईमानदारी होती तो आज राजनेताओं की छवि भी इतनी खराब नहीं होती | बहरहाल जिन भी राज्यों की सरकारें चुनाव के कारण जनता पर मुफ्त खैरातों की बरसात कर रही हैं उनसे पूछा जाना चाहिए कि यदि उनके खजाने भरे हुए हैं तो पेट्रोल और डीजल पर लगाया जाने वाला भारी - भरकम  टेक्स कम क्यों नहीं करते ? और जीएसटी काउन्सिल में इन चीजों को उसके दायरे से बाहर लाने का साहस क्यों नहीं दिखाते ? जबकि महंगाई को बढाने में सबसे ज्यादा हाथ इन्हीं  दोनों का होता है | चूंकि जनता भी चुनाव के समय बजाय स्थायी मुद्दों के दूसरी बातों में भटक जाती है इसलिए नेतागण वायदों की झड़ी लगा देते हैं | गैस सिलेंडर सस्ता करने अथवा महिलाओं को नगद देने की बजाय  पेट्रोल – डीजल को उनके असली दामों पर बेचने की व्यवस्था क्यों नहीं की जाती इसका जवाब कोई नहीं देना  चाहता  |

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Tuesday, 4 April 2023

सीबीआई को अपनी निष्पक्षता और स्वायत्तता साबित करनी होगी



ऐसे समय जब केन्द्रीय जाँच एजेंसी सीबीआई विपक्ष के निशाने पर है तब उसकी हीरक जयंती पर आयोजित समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ये कहना मायने रखता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने में आज राजनीतिक इच्छाशक्ति की कोई कमी नहीं है और अधिकारियों को बेहिचक भ्रष्ट लोगों के विरुद्ध कार्रवाई करना चाहिए , भले ही वे कितने भी ताकतवर हों | उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा कि भ्रष्टाचार न्याय और लोकतंत्र दोनों की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है और सीबीआई की जिम्मेदारी इससे देश को मुक्त कराना है | श्री मोदी ने जाँच  एजेंसी के अधिकारियों को संबोधित करते हुए ये भी कहा कि दशकों से भ्रष्टाचार का लाभ उठा चुके लोगों ने उसको बदनाम करने का एक तंत्र बना रखा है जिससे उसे विचलित न होते हुए अपना काम निडर होकर करते रहना चाहिए | प्रधानमंत्री ने उक्त अवसर पर और भी बहुत कुछ कहा लेकिन उस सबका सार यही है कि उनकी सरकार ने राजनीतिक हस्तियों के भ्रष्टाचार के विरुद्ध जो अभियान छेड़ रखा है उसे यह जाँच एजेंसी अंजाम तक पहुंचाए | इसमें दो मत नहीं है कि सीबीआई देश की बेहद सक्षम जांच एजेंसी है | उसकी विश्वसनीयता इसी बात से जानी जा सकती है कि किसी भी राज्य में बड़ी आपराधिक घटना या भ्रष्टाचार का काण्ड सामने आने पर उसी से जांच करवाने हेतु जनता भी सामने आती रही है | विपक्ष में बैठे दल भी राज्य की पुलिस अथवा अन्य जांच एजेंसी पर अविश्वास जताते हुए मामला सीबीआई को सौंपने की माँग करते थे | अनेक संगीन  वारदातों में अपराधियों तक पहुँचने में सीबीआई ने उल्लेखनीय कार्य किया है | लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले के आरोप में जेल भिजवाने का श्रेय भी इसी एजेंसी को है | स्व. जयललिता भी इसी के कारण सजा भोगने मजबूर हुईं | लेकिन इससे अलग हटकर देखें तो अनेक ऐसे  प्रकरण हुए जिनमें  सीबीआई के हाथ बांध दिए गए और उसकी जांच राजनीति के फेर में फंसकर बेनतीजा रह गयी | उ.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री स्व.मुलायम सिंह यादव और मायावती दोनों के मामले सीबीआई को  वापस लेने मजबूर किया गया था क्योंकि उस समय की केंद्र सरकार को इनका समर्थन चाहिए था l बाद में सर्वोच्च न्यायालय के दखल के बाद उन्हें दोबारा खोला गया किंतु उससे एजेंसी की स्वतंत्रता पर संदेह बन गया। इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय ने उसके बारे में पिंजरे में बंद तोते जैसी टिप्पणी की। कालांतर में उसके कुछ उच्च पदस्थ अधिकारी भी भ्रष्टाचार के मामले में पकड़े गए। लेकिन जबसे केंद्र में मोदी सरकार आई है इस एजेंसी ने राजनेताओं और उनके सहयोगियों की गर्दन में फंदा डालने में जो  तेजी दिखाई उसकी वजह से एक तरफ तो उसकी तारीफ हो रही है  वहीं  दूसरी ओर ये आरोप भी लग रहा है कि उसके निशाने पर केवल विपक्ष के लोग ही हैं। इस आरोप को तब वजन मिलता है जब भाजपा के साथ चले जाने वाले आरोपियों की जांच बंद कर दी जाती है।  हालांकि ऐसे आरोपों से विचलित होकर इस एजेंसी का काम रुक जाए ये तो ठीक नहीं है किंतु केंद्र सरकार को विपक्ष न सही किंतु आम जनता को तो ये भरोसा दिलाना ही होगा कि सीबीआई राजनीतिक प्रतिशोध या पक्षपात से पूरी तरह परे है। ऐसा न होने पर  भ्रष्टाचार में लिप्त नेता जनता की सहानुभूति अर्जित करने में सफल हो जायेंगे। हालांकि आरोप तो न्यायपालिका पर भी लग रहे हैं किंतु उसकी भूमिका जांच एजेंसी की रिपोर्ट के बाद शुरू होती है। इसके अलावा सीबीआई को इस आरोप से भी बचना होगा कि वह छोटी मछलियों को ही फंसा पाती है और भ्रष्टाचार करने वाले मगरमच्छ बच जाते हैं । किसी जांच एजेंसी की हीरक जयंती उसके लिए आत्मावलोकन का अवसर भी है। उस दृष्टि से प्रधानमंत्री ने उससे जो अपेक्षा की उसे पूरा करने के साथ ही उसे आम जनता में भी ये छवि कायम रखनी होगी कि उसकी स्वायत्तता पर किसी का नियंत्रण नहीं है। इसके लिए जरूरी है वह सत्ता से जुड़े भ्रष्ट चेहरों को भी उजागर करे क्योंकि देश को लूटने वालों की न कोई पार्टी होती है न ही सिद्धांत।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Monday, 3 April 2023

रेलवे के आधुनिकीकरण में साधारण यात्रियों की उपेक्षा न हो



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए जो काम कर रहे हैं वह निश्चित रूप से उत्साहवर्धक है | देश भर में राजमार्ग , पुल , फ्लाय ओवर आदि बनाने के लिए भूतल परिवहन मंत्री नितिन गडकरी की विरोधी भी तारीफ करते हैं | इसी  तरह देश में हवाई अड्डों और बंदरगाहों के निर्माण का अभियान भी जिस तेजी से चल रहा है जिसकी  वजह से उड्डयन  और नौ परिवहन के क्षेत्र में जबरदस्त तरक्की दिखने लगी है | महानगरों से निकलकर अब मेट्रो ट्रेन अपेक्षाकृत छोटे शहरों में शुरू किये जाने का काम भी जोरों पर है | हाल ही में  शहरी परिवहन के एक और नए साधन के रूप में रोप वे का भी जिक्र आया | ये भी पता चला कि अभी तक इसका प्रयोग पर्वतीय क्षेत्रों में ही किया जाता था किन्तु अब शहरों में भी एक स्थान से दूसरे तक जाने के लिए रोप वे की सुविधा उपलब्ध होगी | ये सब सुनने से लगता है कि भारत वाकई में विकसित देशों  की कतार में खड़ा होने के करीब है | वैसे भी परिवहन सुविधा किसी भी देश की गतिशीलता का परिचायक होती है |  लेकिन इस सबके बावजूद रेल भारत में आम जनता के आवागमन का सबसे सुलभ और सस्ता साधन है | आजादी के बाद नई रेल पटरियां बिछाने के काम पर तो जरूरत के मुताबिक ध्यान नहीं दिया गया | लेकिन राजनीतिक नेताओं के दबाव की वजह से नई रेलगाड़ियां शुरू की जाती रहीं जिनमें करोड़ों यात्री प्रतिदिन सफर करते हैं | पटरियों की कमी का कारण ही है कि विश्व का सबसे बड़ा रेल नेटवर्क होने के बावजूद सुविधा , सुरक्षा और समयबद्धता के मामले में भारतीय रेल अब भी विश्वस्तरीय मापदंडों से पीछे है |  सुपरफास्ट कही जाने वाली गाड़ियाँ तक अतिरिक्त शुल्क लेने के बाद भी  घंटों तो क्या अनिश्चितकालीन विलम्ब से चलती हैं जिनके लिए किसी को भी जवाबदेह ठहराने की व्यवस्था हमारे देश में अब तक नहीं बनी | हालाँकि लम्बी दूरियों की गाड़ियों के चलाये जाने से देश के एक कोने से दूसरे में जाने वालों को आसानी हो गयी है किन्तु सोचने वाली बात ये भी है कि ऐसी गाड़ियों में वातानुकूलित और स्लीपर श्रेणी के डिब्बों की भरमार होती है जबकि साधारण टिकिट वालों के लिए बमुश्किल दो डिब्बे | ऐसे में भीड़ वाले समय में साधारण यात्रियों को अकल्पनीय  कष्ट उठाने पड़ते हैं  | बहरहाल भारतीय रेल ने देश को जोड़े रखने का जो काम किया उसके लिए उसकी प्रशंसा न की जाए तो अन्याय होगा किन्तु आजकल बात  वंदे भारत एक्सप्रेस की चल्र रही है जिनमें वैश्विक स्तर की सुविधाओं के साथ तेज गति और समयबद्धता के अलावा दुर्घटना रोकने की तकनीकी व्यवस्था भी रहेगी |  वन्दे भारत गाड़ियों  को केंद्र सरकार नए भारत के प्रतीक के तौर पर पेश कर रही है इसलिए अधिकतर स्थानों पर  हरी झंडी दिखाने के लिए स्वयं प्रधानमंत्री मौजूद रहते हैं | इन गाड़ियों के बारे में यात्रियों की प्रतिक्रियाएँ भी बेहद उत्साहवर्धक हैं | इनके कारण विदेशी पर्यटक भी आकर्षित होंगे और हवाई सेवाओं पर दबाव कम होने से उनकी टिकिटें भी सस्ती होंगी जिनको लेकर काफी मुनाफाखोरी होती रहती है | लेकिन इस तरह की आधुनिक गाड़ियाँ चलाने के साथ ही आम जनता की सुविधा को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए | रेलवे अपने स्टेशनों को भी हाई टेक बना रहा है | प्रधानमंत्री ने इस बारे में अपने पहले कार्यकाल  उनको हवाई अड्डे जैसा स्वरूप देने की परिकल्पना रखी थी जिस पर कोरोना काल में काफी काम हुआ | इस दौरान  नई पटरियां बिछाने के साथ ही पुलों में सुधार आदि के काम तेजी से कर लिए गए | संकटकाल का वह रचनात्मक उपयोग नेतृत्व की दूरदर्शिता और रेलवे प्रशासन की कर्मठता का उदाहरण है | हालाँकि रेलवे में आधुनिकता के साथ  गुणवत्ता के विकास की कीमत यात्रियों को बढ़े हुए किराए और रियायतें बंद होने  के रूप में चुकानी पड़ रही है | विशेष रूप से वरिष्ट नागरिकों में इसे लेकर बेहद नाराजगी है |  कोरोना के बाद उत्पन्न हालातों में ऐसा होना अस्वाभाविक नहीं था लेकिन अब अर्थव्यस्था सुचारु रूप से चल रही है जिसका प्रमाण बीते वित्तीय वर्ष में जीएसटी संग्रह में हुई 22 फीसदी की वृद्धि है | तब रद्द की गयी  रियायतों को  पुनः प्रारंभ किया जाना भी जनहित ही होगा | इस बारे में रेल मंत्री की तरफ से अनेक आश्वासन भी आये लेकिन नतीजा शून्य ही है | आम जनता के मन में ये डर है कि सार्वजनिक क्षेत्र के इस सबसे बड़े उपक्रम में जिस तरह से निजीकरण का प्रवेश हो रहा है उसे देखते हुए कहीं वह मुनाफाखोरी के मकड़जाल में फंसकर संवेदनशीलता को किनारे न रख दे | इसीलिये ये देखना जरूरी है कि निजीकरण का उपयोग सेवाओं और रखरखाव में गुणवत्ता बनाये रखने के लिए भले ही किया जावे किन्तु वह लोगों का रोजगार छीने तथा आम जनता के कन्धों पर असहनीय बोझ बढ़े तो लोगों में उसे लेकर असंतोष बढ़ेगा जिसकी बानगी अक्सर देखने मिलती है | सरकार कुछ मार्गों पर निजी मालगाड़ियाँ चलाने की जिस योजना पर काम कर रही है वह स्वागतयोग्य है | लेकिन यात्री गाड़ियों का परिचालन निजी हाथों में सौंपने के पहले ये देखना जरूरी रहेगा कि इससे रेलवे का अपना ढांचा कहीं बैठ न जाए | भारतीय रेल राष्ट्रीय एकता का चलता फिरता संदेश है | आम भारतीय यात्री की ये आज भी पहली पसंद है | इसीलिए इसे उसकी पहुंच में बनाये रखना जरूरी है | वंदे भारत जैसी गाड़ियां बेशक चलें किन्तु साधारण  हैसियत वाले  भारतीय नागरिक के हितों की उपेक्षा न हो इसकी चिंता रखना ही चाहिए | वरना  रेल के डिब्बे में लिखे उस वाक्य की सार्थकता खत्म हो जायेगी कि भारतीय रेल आपकी संपत्ति है |

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Saturday, 1 April 2023

रामनवमी जुलूस पर पथराव किसी बड़े षडयंत्र का हिस्सा



रामनवमी के जुलूस पर देश के विभिन्न राज्यों में हुईं पथराव की घटनाएँ चिंता का विषय हैं | गुजरात , प.बंगाल , बिहार और झारखण्ड में रामनवमी के दूसरे  दिन भी उपद्रव हुए जिन्हें सांप्रदायिक कहना गलत नहीं होगा | हालाँकि गैर भाजपा शासित राज्यों में तो ऐसा होना आश्चर्यजनक नहीं होता | विशेष रूप से प. बंगाल में जहां की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी के राज में बांग्लादेशी मुसलमानों का आतंक चरम पर जा पहुंचा है | बिहार में यद्यपि नीतीश कुमार  काफी संतुलित होकर चलते हैं लेकिन जबसे उनके साथ लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी उपमुख्यमंत्री बने हैं तबसे इस राज्य में भी अल्पसंख्यक तुष्टीकरण बढ़ता जा रहा है | झारखंड साम्प्रदायिक तौर पर अपेक्षाकृत शांत माना जाता है लेकिन वहां के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन लगता है खुशफहमी में रहे जिसका लाभ उठाकर उपद्रवियों ने हिन्दुओं  के सबसे बड़े आराध्य की शोभा यात्रा पर हमला करने की जुर्रत कर डाली | लेकिन  सबसे ज्यादा हैरत हुई  हिंदुत्व की प्रयोगशाला कहे जाने वाले गुजरात में जहां बीते दिसंबर में ही भाजपा ने ऐतिहासिक बहुमत के साथ सरकार बनाई | इस राज्य में भी  रामनवमी की शोभायात्रा पर पथराव शोचनीय है | इसी तरह महाराष्ट्र में भी  भाजपा की हिन्दुत्ववादी सरकार के रहते हुए ऐसा होना किसी षडयंत्र की तरफ इशारा करता है | केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा प.बंगाल के राज्यपाल से इस बारे में रिपोर्ट तलब की गई है क्योंकि वहां के हालात सबसे ज्यादा नाजुक बताये जाते हैं | लेकिन केंद्र सरकार को चाहिए वह पूरे देश के बारे में जानकारी एकत्र करे क्योंकि इस तरह के श्रृंखलाबद्ध उपद्रव किसी बड़ी योजना का हिस्सा हो सकते हैं | जिस तरह के वीडियो फुटेज सामने आये हैं उनसे साफ़ है कि पथराव की तैयारी बाकायदा की गई थी | दिल्ली में हुए पिछले दंगे के समय भी छतों से पथराव की घटनाएँ बड़े  पैमाने पर हुईं | बाद में तलाशी होने पर  पत्थरों के अलावा हथियारों और विस्फोटकों की  जप्ती हुई | कांच की बोतलों का भी जखीरा बरामद किया गया | अतीत में उ.प्र में भी इस तरह की वारदातें होती  थीं किन्तु योगी सरकार द्वारा दंगाइयों की संपत्ति राजसात  करने जैसे सख्त कदम उठाकर उनकी कमर तोड़ दी गयी | म.प्र के खरगोन में हुए दंगों के बाद शिवराज सिंह सरकार ने भी योगी के बुलडोजर फॉर्मूले का सहारा लेकर सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने वालों के हौसले ठन्डे कर दिए | गुजरात में तो 2002 के दंगों के बाद हिन्दू और मुस्लिम  समुदाय के बीच सद्भाव बना हुआ था किन्तु इस बार रामनवमी के जुलूस के मौके पर उसमें दरार कैसे आई इस बारे में राज्य सरकार को गंभीरता से सोचकर जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए | अप्रैल का महीना इस दृष्टि से बेहद सम्वेदनशील है | अगले सप्ताह महावीर जयन्ती , गुड फ्रायडे,  हनुमान जयंती और उसके बाद बैसाखी तथा आंबेडकर जयंती आयेंगी | इन अवसरों पर विभिन्न समुदायों द्वारा शोभायात्रा निकालने के साथ ही अनेक सार्वजनिक कार्यक्रम खुले में होंगे  | ये मान लेना निरी मूर्खता होगी कि उपद्रवी केवल हिन्दुओं के जलसों पर हमले करते हैं | देश को भीतर से कमजोर करने वाली ताकतों के टुकड़ों पर पलने वाले ये सांप्रदायिक तत्व कुछ भी करने में संकोच नहीं करेंगे | ये देखते हुए पूरे देश में उक्त आयोजनों के मद्दे नजर सतर्कता रखने की जरूरत है | ध्यान देने योग्य बात है कि पंजाब में खालिस्तानी आन्दोलन के नए दौर में हिन्दुओं के अनेक धर्मस्थानों पर हमले होने की घटनाएं हुईं | जिनका मकसद हिन्दू – सिख एकता को तोड़ना ही है | देश के अन्य हिस्सों में भी कुछ ऐसी हरकतें हुईं जिनके जरिये  सामाजिक सौहाद्र बिगाड़ने का कुचक्र रचा गया | बिहार के शिक्षा मंत्री और उ.प्र में सपा के बड़े नेता कहे  जाने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य ने रामचरित मानस को लेकर जो विवाद पैदा किया उसके बाद हिन्दुओं के इस पवित्र ग्रन्थ की प्रतियों को जलाये जाने जैसी भड़काऊ बातें हुईं | आजकल एक युवती द्वारा मनुस्मृति में आग  लगाकर उससे अपनी सिगरेट सुलगाने का वीडियो प्रसारित कर जातिगत वैमनस्य फैलाने का प्रयास भी हो रहा है  | इसी तरह 2019 के चुनाव के पहले असहिष्णुता का मुद्दा उछालकर देश को अस्थिर करने का प्रयास हुआ जिसे शहरी नक्सली कहे जाने वाले तबके का खुला समर्थन मिला | तथाकथित बुद्धिजीवी , अभिनेता और कलाकार भी उस मुहिम का हिस्सा बने |  ऐसा माहौल बना दिया गया मानो ये देश शरीफों के रहने लायक बचा ही नहीं था | कुछ फ़िल्मी अभिनेताओं के तत्संबंधी बयानों ने भी आग में घी डालने का काम किया | लेकिन जब जनादेश आया तब अवार्ड वापसी गिरोह बेनकाब होकर रह गया | कोरोना काल में देश का प्रगति चक्र कुछ समय के लिए रुक गया था | लेकिन अब स्थिति में जबरदस्त सुधार हुआ है | भारत  हर मोर्चे पर आगे बढ़ रहा है | आम जनता में  आत्मविश्वास भी भरपूर है | पूरी दुनिया हमारे शानदार प्रदर्शन से प्रभावित होकर भारत को 21 वीं सदी की महाशक्ति मान रही है | लेकिन कुछ विघ्नसंतोषियों को ये बर्दाश्त नहीं हो रहा जिसका प्रमाण राजनीतिक उठापटक के साथ ही रामनवमी शोभायात्रा पर किये गए हमलों से मिलता है | इसलिए इस दिशा में कड़े कदम उठाये जाने की जरूरत हैं | दुर्भाग्य से ऐसे मामलों में भी वोट बैंक की सियासत आगे आ जाती है | लेकिन समय आ गया है जब उसकी परवाह किये बिना सांपों का फल कुचलने का साहस दिखाना होगा | राम का विरोध करने वाले राक्षसी मानसिकता के लोग ही हो सकते हैं | अतः उनके साथ वही व्यवहार होना चाहिए जो राक्षसी प्रवृत्ति के विरुद्ध अपेक्षित भी है और आवश्यक भी |

- रवीन्द्र वाजपेयी