Sunday, 16 April 2023

उन सफेदपोशों का पर्दाफाश भी जरूरी जो इन सांपों को पालते -पोसते हैं



माफिया अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ की कल रात प्रयागराज में हुई हत्या ने राजनीतिक हलचल के अलावा योगी प्रशासन की भी नींद उड़ा दी है। इस संबंध में गुप्तचर एजेंसियों के साथ ही प्रयागराज पुलिस की भूमिका भी जांच का विषय है। मौके पर मौजूद 17 पुलिसकर्मियों को तो निलंबित कर दिया गया किंतु सवाल ये है कि हत्यारे युवकों ने जिस आसानी से अपना काम किया उससे लगता है कि अतीक और अशरफ के साथ चल रहे पुलिस वाले या तो पूरी तरह बेफिक्र थे या फिर उनमें से कुछ की भूमिका  संदिग्ध थी। हत्यारे साधारण अपराधी बताए जा रहे हैं , ये देखते हुए उन्होंने महज प्रसिद्ध होने के लिए माफिया सरगना की हत्या जैसा जोखिम उठाया और वह भी कैमरों के सामने , ये बात गले नहीं उतरती। ऐसा लगता है वे तीनों किसी अन्य के लिए काम कर रहे थे। अतीक का पुलिस रिमांड मिलते ही ये खबरें आने लगीं कि उसने उमेश पाल की हत्या की योजना का खुलासा कर दिया है। यही नहीं तो अनेक ऐसे लोगों के नाम भी उगल दिए जिनसे उसका लेन - देन था। पूछताछ के तत्काल बाद की  गई छापेमारी में अनेक बिल्डर , चार्टर्ड एकाउंटेंट  और राजनीतिक नेता जांच एजेंसी के राडार पर आ गए थे। ये आशंका भी गलत नहीं है कि अभी भी पुलिस महकमे में अतीक के टुकड़ों पर पलने वाले लोग बैठे हों जो पूरी जानकारी संबंधित लोगों तक पहुंचाते रहे। अपराधों की दुनिया में बड़े काम के लिए छोटे लोगों को औजार बनाया जाना आम है। ऐसे में ये आशंका प्रबल है कि ज्योंही  अतीक को संरक्षण देने और उसके साथ आर्थिक रिश्ते रखने वालों के नाम उजागर होने का समय आया त्योंही उसका काम तमाम कर दिया गया। इस तरह उसकी हत्या से  अनेक ऐसे पन्ने अधखुले रह सकते हैं जो राजनीति के अनेक चमकदार चेहरों को काला करने के साथ ही उनको जेल भिजवा सकते थे । 2017 के विधानसभा चुनाव में अतीक की टिकिट काटने को लेकर अखिलेश यादव की  चाचा शिवपाल से तकरार हो गई थी। जिसके बाद शिवपाल ने  सपा छोड़ नया दल बना लिया था। आज चाचा - भतीजे दोनों अतीक की हत्या पर एक साथ योगी सरकार पर आरोपों की झड़ी लगा रहे हैं। लेकिन उसके आपराधिक कारनामों के विरोध में उनके मुंह से एक शब्द नहीं फूट रहा। यही हाल मायावती का भी है। कांग्रेस इस मुद्दे पर बंटी हुई है। जबकि ओवैसी का मातम तो कम होने का नाम ही नहीं ले रहा। दरअसल उ.प्र में स्थानीय निकाय चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। ऐसे में सभी दलों में मुस्लिम मतों को खींचने की होड़ मची है। यही वजह है कि सपा ,बसपा और ओवैसी झांसी में हुए असद के  एनकाउंटर के बाद से ही मुसलमानों की मिजाजपुर्सी में जुटे हुए थे। कल रात हुए हत्याकांड के बाद से तो मुसलमानों के बीच अतीक को शहीद बनाकर उनके मन में ये बात बिठाने की कोशिश शुरू हो गई है कि योगी सरकार अपराधियों के सफाए के नाम पर केवल उनकी जमात पर ही निशाना साध रही है। बहरहाल , अतीक और अशरफ के एक साथ मारे जाने के बाद हत्यारे युवकों से पुलिस क्या और कितना उगलवा पाती है ये जिज्ञासा का विषय है। उनके पास हथियार मिलने से एक बात तो तय है कि वे साधारण अपराधी नहीं थे । जिस आत्मविश्वास के साथ उन्होंने अतीक और अशरफ को ढेर करते ही पिस्तौलें फेंक हाथ उठाकर सरेंडर - सरेंडर की आवाजें लगाना शुरू कर दिया और एक तो जमीन पर ही लेट गया , उससे उनके पेशेवर होने का सन्देह गलत नहीं है। अगर उनका उद्देश्य केवल शोहरत हासिल करना था तो वे अतीक और अशरफ को चांटा मारकर भी चर्चित हो जाते , जिसकी सजा भी मामूली थी।लेकिन हत्या जिस तरह की गई उसके बाद उनकी जिंदगी जेल के सीखचों के पीछे  कट जायेगी। अब ये पुलिस सहित अन्य जांच एजेंसियों पर निर्भर है कि उनसे हत्या के पीछे की असली वजह उगलवा पाती हैं या नहीं ? उन तीनों युवकों की पीठ पर किसी नेता , व्यवसायी अथवा विदेशी संगठन का हाथ होने की आशंका के चलते सच्चाई सामने आना जरूरी है ताकि अतीक को प्यादे से वजीर बनवाने के बाद सस्ते में निपटाने वालों के चेहरे बेनकाब कर राजनीति और अपराध जगत का याराना उजागर किया जा सके। योगी सरकार ने अपराधियों के विरुद्ध जो अभियान चला रखा है उसकी देश भर में बेहद अनुकूल प्रतिक्रिया है । लेकिन  इस कांड के बाद बात अब केवल अपराधियों तक ही नहीं अपितु उन सफेदपोशों तक भी पहुंच गई है जो अपने स्वार्थों के लिए इन जहरीले सांपों को पालते - पोसते हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 15 April 2023

कर्नाटक का नाटक भारी पड़ेगा भाजपा को



कर्नाटक में विधानसभा चुनाव के लिए एक महीने से भी कम समय बचा है | विभिन्न राजनीतिक दल अपने – अपने उम्मीदवारों की सूची जारी कर रहे हैं | जिन विधायकों की टिकिट काट दी गयी अथवा जिन लोगों को उम्मीदवारी नहीं दी गयी उनमें से अनेक नाराजगी दिखा रहे हैं | पार्टी से त्यागपत्र देने के अलावा आनन – फानन दूसरी पार्टी में चले जाना या फिर निर्दलीय मैदान में उतरने की घोषणा खबरों में हैं |  सबसे ज्यादा बवाल मचा है भाजपा में | जिसके तमाम वरिष्ट नेता कोप भवन में जा बैठे हैं | इनमें पूर्व मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री स्तर के लोग भी हैं | हालाँकि भाजपा ने आसन्न खतरे को भांपते हुए पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को चुनाव अभियान की कमान सौंप दी है परन्तु ऐसा लगता है सत्ता  विरोधी रुझान से ज्यादा पार्टी को अपनी अंतर्कलह से खतरा है | आलाकमान मान - मनौवल  में जुटा हुआ है | लेकिन अनेक बुजुर्ग नेताओं द्वारा  टिकिट वितरण पर खुलकर रोष व्यक्त किये जाने से पार्टी के सामने जबरदस्त संकट उत्पन्न हो गया है | कुछ वरिष्ट नेताओं ने खुले  विरोध का रास्ता नहीं पकड़ा किन्तु राजनीति से सन्यास लेकर  दबाव बढ़ा दिया | आयु को उम्मीदवारी का मापदंड बनाकर जिन लोगों की टिकिटें काटी गईं वे दिल्ली जाकर गृहमंत्री अमित शाह के अलावा पार्टी अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के सामने  विरोध व्यक्त करने से भी नहीं चूके | इस असाधारण स्थिति की वजह से भाजपा आलाकमान काफी परेशानी में है क्योंकि दक्षिण के इस प्रवेश द्वार में यदि पराजय मिली तब निकट भविष्य में होने वाले राजस्थान , म.प्र , छत्तीसगढ़ और तेलंगाना विधानसभा के चुनाव में उसके सामने परेशानी पैदा हो जायेगी | हालाँकि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की स्थिति भी कुछ ख़ास अच्छी नहीं है किन्तु कर्नाटक के ही मल्लिकार्जुन खरगे के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन जाने के बाद से वह मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने  में जुटी है | प्रदेश सरकार छवि के मामले में वैसे ही काफी बदनाम है जिस वजह से येदियुरप्पा को हटाकर बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री बनाये जाने का लाभ फ़िलहाल तो नजर नहीं आ रहा | अब तक जितने भी चुनाव पूर्व सर्वेक्षण आये उनमें भी भाजपा कांग्रेस से पिछड़ती दिखाई गयी है | ऐसे में अब उसकी उम्मीदें जनता दल ( एस ) के प्रदर्शन पर टिकी हैं जो भाजपा  विरोधी मतों में बंटवारा करते हुए कांग्रेस का नुकसान कर सकता है | हालाँकि 2018 में भी ऐसा हो चुका है जब  भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर भी बहुमत से थोड़ी सी दूर रह गई | येदियुरप्पा ने शपथ भी ले ली किन्तु इस्तीफा देना पड़ा | बाद में जनता दल ( एस ) के कुमार स्वामी को समर्थन देकर कांग्रेस  ने मिली जुली सरकार भी बना ली जिसे कुछ समय बाद दलबदल करवाकर भाजपा ने गिरवा दिया और सत्ता हासिल कर ली | यही खेल बाद में म.प्र में भी  दोहराया गया | लेकिन चुनाव के ठीक पहले भाजपा में जिस तरह का नाटक कर्नाटक में चल रहा है वह उसके लिए खतरे  का संकेत है | दरअसल दूसरी पार्टी से आये लोगों के जरिये तात्कालिक लाभ अर्जित करने की नीति कालान्तर में नुकसानदेह साबित होती है | इन बाहरी लोगों की मिजाजपुर्सी में पार्टी के अपने भरोसेमंद कार्यकर्ताओं और तपे – तपाए नेताओं की उपेक्षा होती है | ये कहानी पूरे देश में चल रही है | राजस्थान में भाजपा की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के भ्रष्टाचार की जांच को  लेकर अनशन  करने वाले सचिन पायलट को गत दिवस केन्द्रीय मंत्री गजेन्द्र शेखावत ने पार्टी  में आने का न्यौता दे डाला | ऐसा नहीं है कि अन्य दलों से आये सभी लोगों का विरोध होता हो क्योंकि उनमें से कुछ ऐसे लोग भी हैं जो वैचारिक तौर पर काफी मूल्यवान साबित होते हैं | असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और केरल के राज्यपाल आरिफ मो. खान उन लोगों में से हैं जिन्होंने पार्टी को अपने कार्य और विचार से मजबूती प्रदान की | लेकिन सतपाल मलिक जैसे भी हैं जो राज्यपाल रहते हुए भी प्रधानमंत्री की आलोचना करते रहे | प.बंगाल में तो भाजपा को इन दलबदलुओं का बेहद कड़वा अनुभव हुआ | पार्टी  अपने विस्तार के लिए नए लोगों को  जोड़े ये तो ज्ररूरी है लेकिन ऐसा करते समय उसे ये भी देखना चाहिए उनकी वजह से कहीं अपने घर में तो दरार नहीं पड़ रही | दूसरी बात ये कि एक कैडर आधारित पार्टी में जो नीति और सिद्धांतों की राजनीति करने का दावा करती है अनुशासन की डोर इतनी कमजोर कैसे होने लगी कि उसे अपंने खून पसीने से सींचने वाले भी सत्ता के मोहपाश में जकड़ गए | कर्नाटक जैसी  समस्या आने वाले समय में म.प्र में भी  आ सकती है क्योंकि यहाँ भी कांग्रेस से आये  दर्जन भर से ज्यादा नेता सत्ता में हिस्सेदार हैं जिनको लेकर विधानसभा चुनाव  के समय नाराजगी के हालात बन सकते हैं | यद्यपि कर्नाटक में भाजपा के लिये राहत की खबर ये है कि शरद पवार ने भी राकंपा के लगभग 50 प्रत्याशी उतारने का ऐलान कर दिया है | लेकिन भाजपा अपने दम पर बहुमत का आंकड़ा छू सकेगी इसमें आज के हालात में तो संदेह है | हालाँकि उसे उम्मीद है कि प्रधानमंत्री की छवि के कारण उत्तराखंड और गोवा की तरह कर्नाटक में भी उसकी नैया किनारे लग जायेगी किन्तु यही आशावाद उसे हिमाचल प्रदेश में ले डूबा था जो संयोग से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का गृह राज्य है | सही बात ये है कि सत्ता के सुखद सान्निध्य में रहकर भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं के मनोभाव भी बदल गए हैं और नई भर्ती के तहत जो लोग पार्टी में आ रहे हैं उनके लिये राजनीति सेवा के बजाय एक पेशा है दौलत और शोहरत कमाने का जिनकी देखासीखी पार्टी का कथित देव - दुर्लभ कार्यकर्ता भी सत्ताभिमुखी होता जा रहा है |

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Friday, 14 April 2023

एनकाउंटर : अपराधी से सहानुभूति रखना भी अपराध है



उ.प्र के कुख्यात माफिया अतीक अहमद के बेटे असद और उसके एक साथी को राज्य पुलिस के विशेष कार्यदल ने कल झांसी के पास मुठभेड़ में मार गिराया | ये दोनों उमेश पाल हत्याकांड में आरोपी थे और लम्बे समय से फरार थे |  उनके मारे  जाने की  खबर पर  उ.प्र सहित देश भर से आई ज्यादातर प्रतिक्रियाओं में कार्रवाई का समर्थन करते हुए  योगी सरकार की इस बात के लिए प्रशंसा की गयी कि वह प्रदेश से माफिया राज खत्म करने की अपनी प्रतिबद्धता पर मुस्तैदी से डटी है | उल्लेखनीय है  अनेक दशकों से 100 से अधिक अपराधों का आरोपी अतीक अपने राजनीतिक संपर्कों के कारण बचता आ रहा था | लेकिन योगी सरकार के आने के बाद उसका संरक्षण बंद हो गया और हाल ही में उसे हत्या के पहले मामले में आजीवन कारावास हुआ | लेकिन इसके पहले ही एक हत्याकांड के चश्मदीद गवाह की प्रयागराज में जिस तरह बीच सड़क पर हत्या की गई उससे ये जाहिर हुआ कि उसका आपराधिक जाल अभी  भी कायम  है | उस हत्याकांड में असद को भी साफ़ देखा गया जो गिरफ्तारी से बचने के लिए  फरार हो गया और अंततः गत दिवस पुलिस के साथ हुई  मुठभेड़ में मारा गया | योगी सरकार के राज में अब तक 100 से ज्यादा अपराधियों के एन्काउंटर हो चुके हैं | इनमें सबसे ज्यादा चर्चित विकास दुबे का रहा | जिसके बाद योगी आदित्यनाथ को ब्राह्मणों का विरोधी प्रचारित किया गया | जो भी अपराधी मारा गया उसकी जाति और धर्म का हवाला देकर राजनीति की गयी | लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में योगी सरकार की वापसी ने साबित कर दिया कि अपराधियों के विरुद्ध की गयी आक्रामक कार्रवाई को जनता ने पसंद किया | ये बात तो आम जन भी मानने लगे हैं कि इस राज्य की कानून व्यवस्था में आश्चर्यजनक सुधार हुआ है | हालाँकि अभी भी अनेक माफिया सकिय हैं लेकिन मुख्यमंत्री योगी ने  आर्थिक ढांचे को तहस - नहस करते हुए उनकी कमर तोड़ने का जो अभियान छेड़ रखा है उसके अनुकूल परिणाम  सतह पर दिखाई देने लगे हैं | लेकिन दूसरी तरफ राजनीतिक जमात में कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्हें माफिया के सफाए के तरीके पर ऐतराज है | और इसीलिये गत दिवस असद की मौत के बाद सपा , बसपा , कांग्रेस और तृणमूल सहित असदुद्दीन ओवैसी ने एनकाउंटर को फ़र्जी बताते हुए उसकी उच्च स्तरीय जाँच कराये जाने की मांग कर डाली | अखिलेश यादव को इस बात पर आपत्ति है कि योगी सरकार अदालत को नजरंदाज करते हुए दंड प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर रही है | जाति और धर्म विशेष को निशाना बनाये जाने की बात भी वे ऐसी हर घटना के बाद कहते ही  हैं | मायावती भी उन्हीं के अंदाज में बोलती दिखीं  |  ऐसी ही टिप्पणियां करते हुए कांग्रेस और तृणमूल ने  योगी सरकार पर कानून हाथ में लेने के साथ ही धार्मिक भेदभाव करने का आरोप लगाया। सबसे गुस्से में नजर आए असदुद्दीन ओवैसी जिनके अनुसार ये असद का नहीं संविधान का एनकाउंटर था। इन सब प्रतिक्रियाओं में पुलिस और योगी सरकार को कठघरे में खड़ा किया गया जो नई बात नहीं है किंतु किसी ने भी ये कहने का साहस नहीं दिखाया कि असद ने बीच सड़क पर एक आदमी की हत्या की थी जिसका पूरा दृश्य सीसी कैमरे में कैद है। उक्त में किसी ने भी उसे आत्मसमर्पण की सलाह पहले दी हो ये सुनने में नहीं आया।  उल्लेखनीय है कि खालिस्तान समर्थक उग्रवादी अमृतपाल सिंह भी लंबे समय से फरार है ।लेकिन अनेक सिख नेताओं और संगठनों द्वारा उससे आत्मसमर्पण के अपील की जा चुकी है । लेकिन ऐसा अनुरोध  असद से किसी ने नहीं किया । उसके पिता अतीक भी  संवाददाताओं से बात करते हुए अपनी जान को खतरा होने का रोना तो रोते रहे परंतु फरार बेटे को आत्मसमर्पण का संदेशा देने की समझदारी नहीं सिखाई।और शायद इसी  पश्चताप की अभिव्यक्ति उनकी उस टिप्पणी से हुई जिसमें बेटे की मौत का जिम्मेदार खुद को माना गया। बहरहाल , जिस तरह असद और उसके पहले हुए एनकाउंटरों का विरोध कतिपय राजनेताओं द्वारा किया जाता रहा , उसे देखकर कश्मीर घाटी के उन दिनों की याद ताजा हो उठती है जब किसी आतंकवादी के मारे जाने पर उसे शहीद घोषित करते हुए उसके जनाजे में जनसैलाब उमड़ पड़ता था। दुख की  बात ये है कि अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी जैसे माफिया सरगनाओं को सपा और बसपा जैसे दलों का संरक्षण मिलता रहा। ये बात भी काफी तेजी से उछाली जा रही  है कि योगी सरकार केवल उन्हीं अपराधी तत्वों पर कार्रवाई कर रही है जो विपक्षी पार्टियों से जुड़े हुए हैं । जाति और धर्म के आधार पर एनकाउंटर का आरोप तो पुराना है । लेकिन इस आधार पर  विकास दुबे अतीक , मुख्तार और असद जैसे लोगों के प्रति सहानुभूति रखना क्या अपराधों को संरक्षण देना नहीं है ? रोचक बात ये है अतीक से जुड़े तमाम मामलों में सपा और बसपा भी जुड़े नजर आते हैं । ऐसे दुर्दांत अपराधियों को विधायक और सांसद बनाकर मजबूती प्रदान करने में इन दोनों दलों का हाथ किसी से छिपा नहीं है। लेकिन जिस उमेश पाल की नृशंस हत्या की गई  उसके परिवार के प्रति संवेदना प्रगट करने  अखिलेश , मायावती और ओवैसी में से कौन गया ? अतीक 100 से  ज्यादा मामलों में आरोपी है लेकिन उसे सजा तो अब जाकर मिली और वह भी पहले मामले में । अब सोचिए बाकी के प्रकरणों का निपटारा होने में कितने साल या दशक लगेंगे? अतीक और मुख्तार द्वारा अवैध तरीकों से अर्जित अचल संपत्ति पर बुलडोजर चलाए जाने का भी विरोध किया जाता है। वैसे किसी भी एनकाउंटर की जांच होनी ही चाहिए क्योंकि  किसी व्यक्ति को गलत तरीके  से मारा गया तब  दोषियों को दंडित किया जाना जरूरी है , किंतु क्या अपराधी की निंदा करने का साहस उन नेताओं में है जो एनकाउंटर को फर्जी बताकर पुलिस को ही हत्यारा साबित करने में जुट जाते हैं । उल्लेखनीय है उमेश पाल की हत्या के बाद अतीक की पत्नी भी फरार है। यदि उन्हें  पुलिस से डर  है तो वे सीधे अदालत या किसी अन्य राज्य में आत्मसमर्पण कर सकते थे । ऐसे में हत्या के आरोपी का पुलिस से बचकर भागना ही उसके अपराध को प्रमाणित कर देता है और ऐसे लोगों की मौत पर आंसू बहाने वाले भी चोर - चोर , मौसेरे भाई की कहावत को चरितार्थ कर रहे  है। उ. प्र की पुलिस और योगी सरकार पर आरोप लगाने वाले नेताओं और समाचार माध्यमों में बैठे कथित मानवाधिकारवादियों को इस बात का जवाब देना चाहिए कि ऐसे माफिया सरगनाओं को सांसद और विधायक बनवाने का पाप जिनके हाथों से हुआ , क्या उनको उसका पश्चाताप है ? यदि हां , तो वे अतीक और उनके कुनबे द्वारा किए गए  अपराधों को संरक्षण दिए जाने के लिए सार्वजनिक तौर पर क्षमा याचना करें । लेकिन बजाय ऐसा करने के वे अपराधियों के प्रति ही सहानुभूति व्यक्त करने में जुटे हैं।जहां तक बात अखिलेश और मायावती की है तो ये कहना गलत नहीं है कि उन्हीं की वजह से उ.प्र में माफिया पनपा ही नहीं  बल्कि संसद और विधानसभा में भी बैठने की हैसियत में आ गया। रही बात पक्षपात की तो योगी सरकार को ये प्रमाणित करना चाहिए कि उसकी कार्रवाई निष्पक्ष है और भाजपा से जुड़े अपराधी तत्वों का भी अंजाम वैसा ही होगा । समय आ गया है जब अपराधी को समूचे समाज का दुश्मन मानकर समुचित दंड दिया जाए। और यदि उसके लिए एनकाउंटर की जरूरत पड़े तो उसमें हिचकने की  जरूरत नहीं है , वरना अपराधों की अमर बेल फैलती ही चली जायेगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी 



Thursday, 13 April 2023

नीतीश अपनी कमजोरी पर पर्दा डालने विपक्षी एकता की मुहिम चला रहे



बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार देश के सर्वाधिक अनुभवी राजनेताओं में हैं | 1974 में बिहार के जिस  छात्र आन्दोलन ने देश में बड़े राजनीतिक परिवर्तन का सूत्रपात किया उससे वे भी जुड़े रहे | मूल रूप से समाजवादी विचारधारा के अनुयायी नीतीश  समन्वयवादी माने जाते हैं | इसीलिये उन्होंने अनेक मुद्दों पर वैचारिक मतभेदों के बावजूद भाजपा के साथ गठबंधन किया और वाजपेयी शासन में मंत्री भी रहे | उसी दौरान उनको बिहार का मुख्यमंत्री भी बनाया गया लेकिन बहुमत के अभाव में वे त्यागपत्र देने मजबूर हुए | कालान्तर में उनकी राजनीतिक यात्रा गाड़ी बदल – बदलकर आगे  बढ़ती रही | कभी जनता दल  , तो कभी समता पार्टी के रूप में वे सियासत के मैदान में बने रहे | भाजपा के साथ रहते हुए भी नरेंद्र मोदी से परहेज के कारण वापस लालू के साथ चले जाना और फिर लौटकर उन्हीं मोदी से मिलकर सत्ता में बने रहने के बाद दूसरी बार लालू के बेटों के साथ गठबंधन करने के कारण उनके साथ जुड़ा सुशासन बाबू नामक विशेषण पल्टूराम में बदल गया | इसमें  दो राय नहीं है कि लालू के राज में बिहार जिस बदहाली और बदनामी के दौर से गुजरा उससे नीतीश ने न  सिर्फ राहत दिलवाई अपितु राज्य को विकास की राह पर आगे भी बढ़ाया | लेकिन वे अपनी दम पर वह करिश्मा नहीं कर सके | उनके सुशासन में भाजपा साथ रही वर्ना वे लालू के एम - वाय ( मुस्लिम – यादव ) समीकरण को छिन्न – भिन्न नहीं कर पाते | लेकिन इतना होने के बाद भी  उनको  मन ही मन ये डर लगता रहा कि देर - सवेर भाजपा  बिहार में सबसे बड़ी ताकत बन जायेगी | इसीलिए एनडीए में रहते हुए भी नरेंद्र  मोदी के साथ मंच  साझा करने से बचते हुए उनको बिहार में चुनाव प्रचार से रोकने का दबाव भी उन्होंने डाला | हालाँकि श्री मोदी से परेहज तो स्व. रामविलास पासवान ने भी खूब किया लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के साथ गठबंधन करने के बाद वे जीवन पर्यंत उसके साथ रहे जबकि नीतीश बाबू बीते नौ साल में कई मर्तबे पाला बदल चुके हैं | 2013 तक उनको भाजपा से दिक्कत न थी लेकिन जैसे ही श्री मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनाये गए , उनकी उम्मीदें टूट गईं | दरअसल अटल जी के सक्रिय  राजनीति से दूर होने और  2009 में लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में एनडीए को लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद से ही  उनको लगने लगा था कि भाजपा उन्हें ही  2014 में पेश करेगी | मुख्यमंत्री के तौर पर उनका प्रदर्शन सराहनीय था और बहुमत न आने पर अन्य दलों से उनके नाम पर सहयोग मिलने की संभावना भी थी | हालाँकि बतौर मुख्यमंत्री श्री मोदी को ज्यादा प्रशंसा मिल रही थी लेकिन 2002 के गुजरात दंगों का जिन्न उनकी राह में रूकावट  था | नीतीश सोच रहे थे कि जिस तरह आडवाणी जी की  उग्र हिंदुत्व की छवि की वजह से अटल जी को भाजपा आगे लाई , वैसा ही कुछ उनके पक्ष में भी हो जायेगा | लेकिन जब भाजपा ने श्री मोदी पर दांव लगाया तो गुजरात दंगों के बाद वाजपेयी सरकार छोडकर चले गए  स्व. पासवान ने तो वापस एनडीए का दामन थाम लिया लेकिन नीतीश अलग होकर बैठ गए | केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद उन्होंने फिर एक बार उन्हीं लालू से गठबंधन किया जिनको जेल भिजवाने में उनका भी हाथ था | और उन दोनों के गठजोड़ ने  2015 के विधानसभा चुनाव में मोदी लहर को रोकने का कारनामा कर दिखाया जो वाकई बड़ी बात थी | और उसी के बाद एक बार फिर ये कहा जाने लगा कि नीतीश बाबू भविष्य में प्रधानमंत्री पद के लिए विपक्ष के उम्मीदवार होंगे | लेकिन  जल्द ही उनकी अक्ल ठिकाने आ गई और महज दो साल बाद ही  वे लालू कुनबे से पिंड छुडाकर मोदी शरणं गच्छामि हो गए | 2019 के लोकसभा चुनाव में भी वे भाजपा के साथ रहे | लेकिन महज  एक मंत्री पद दिए जाने से नाराज होकर केंद्र सरकार से अपनी  पार्टी जद ( यू ) को दूर रखा | यद्यपि बाद में उनकी मर्जी के बिना उनके राज्यसभा सदस्य आरसीपी सिंह मोदी सरकार में मंत्री बन गए जिनसे नीतीश की नाराजगी इस हद तक बढ़ी कि उन्हें राज्यसभा चुनाव में दोबारा टिकिट न देकर मंत्री पद और पार्टी दोनों से हटने मजबूर होना पड़ा | हालाँकि 2020 में नीतीश और भाजपा ने विधानसभा चुनाव मिलकर लड़ा और कड़े मुकाबले में जैसे – तैसे बहुमत मिलने के बाद वे मुख्यमंत्री भी बने किन्तु उनकी पार्टी भाजपा से बहुत पीछे रह जाने की वजह से वे भविष्य के प्रति चिंतित हो उठे | उनकी नाराजगी की वजह स्व. पासवान के बेटे चिराग द्वारा एनडीए में रहते हुए भी जद ( यू ) प्रत्याशियों के विरुद्ध उम्मीदवार लड़ाए जाने से थी क्योंकि उसी के कारण उनकी पार्टी को अनेक सीटें गंवाना पड़ीं | ये भी सुनने में आया कि भाजपा ने उनसे केंद्र की राजनीति में आने के लिए कहा | बात तो उनको राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति बनाने की भी चली किन्तु कभी नागरिकता संशोधन बिल तो कभी जातिगत जनगणना जैसे  मुद्दों पर वे भाजपा को  असमंजस में डालते रहे | और अंततः पुरानी कहानी दोहराते हुए इस्तीफा दिया और उसके फ़ौरन बाद लालू की पार्टी राजद सहित अन्य गैर भाजपा दलों के साथ गठबंधन कर सरकार बना ली  | जिन तेजस्वी के भ्रष्टाचार के सवाल पर उन्होंने महागठबंधन तोड़ा था उन्हीं के साथ फिर जुड़ गए | और तो और ये कसम भी खाने लगे कि दोबारा भाजपा के साथ नहीं जायेंगे | लेकिन उनको ये बात समझ में आने लगी है कि उनकी पार्टी का भविष्य बिहार में सुरक्षित नहीं है | आरसीपी सिंह के बाद उपेन्द्र कुशवाहा भी साथ छोड़ गए | लालू कुनबा फिर अपनी हरकतों पर जिस तरह उतर आ या है उससे वे परेशान तो हैं लेकिन  अकेले दम पर चुनाव लड़ने की क्षमता बची नहीं | इसीलिए कुछ समय से विपक्षी एकता का राग छेड़ रहे थे | और इसी सिलसिले में गत दिवस दिल्ली आकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से भी मिल लिए | जिसके बाद से ही मोदी विरोधी प्रचारतंत्र उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बताने लगा | स्मरणीय है नीतीश कांग्रेस को ये सन्देश भेजते रहे हैं कि वह गठबंधन के नेता बनने का लालच छोड़ दे | उनका ये दावा भी चर्चा में आता रहा कि सभी विपक्षी एक साथ आ जाएँ तो 2024 में भाजपा को हराया जा सकता है | लेकिन उनकी ये कवायद ज्यादा असरकारक इसलिए नहीं होगी क्योंकि अब वे विपक्ष के बड़े नेता नहीं रह गए हैं | ममता , केसीआर , शरद पवार , स्टालिन और अखिलेश की तरह उनका जनाधार नहीं बचा | उनके पास विधानसभा में 50 से भी कम विधायक हैं | उनसे ज्यादा बिहार में तेजस्वी चर्चित हैं | ऐसे में विपक्षी एकता की उनकी कोशिश अपनी कमजोरी पर पर्दा डालने का का प्रयास है | सबसे बड़ी बात ये हैं कि सात बार मुख्यमंत्री बनने में पांच मर्तबा उनको भाजपा का सहारा मिला | इसलिए बाकी विपक्षी दल उन पर ज्यादा भरोसा नहीं कर पा रहे | यहाँ तक कि बिहार के कांग्रेस नेता भी उनसे रुष्ट बताये जाते हैं | बीच – बीच  में उनके वापस भाजपा के साथ जाने की खबरें भी  उड़ा करती हैं | इन सबके कारण नीतीश अपनी छवि और विश्वसनीयता दोनों गँवा चुके हैं | विपक्षी एकता की उनकी मुहिम दरअसल अपने को प्रासंगिक दिखाने का प्रयास है | लेकिन दोबारा लालू  परिवार के साथ जुड़कर उन्होंने अपनी साख को जो नुकसान पहुँचाया उसकी भरपाई  आसानी से  होने वाली  नहीं है |

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Wednesday, 12 April 2023

केवल दर्जा ही नहीं अपितु सोच भी राष्ट्रीय होना चाहिए



गत दिवस चुनाव आयोग द्वारा आम आदमी पार्टी को  राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा देने के साथ ही राकांपा और तृणमूल सहित कुछ दलों को राष्ट्रीय दलों की सूची से बाहर कर दिया गया | इस हेतु जो मानक तय किये गए हैं उन पर आम आदमी पार्टी ने अपने को साबित कर दिया | मसलन दिल्ली और पंजाब में सरकार बनाने के साथ ही गोवा और गुजरात विधानसभा चुनाव में मिले मतों के आधार पर उसे राष्ट्रीय पार्टी  की हैसियत दे दी गयी | पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल सहित  अन्य नेताओं ने इस पर खुशी जाहिर करने के साथ ही कहा कि इतनी कम अवधि में यह दर्जा हासिल करना किसी उपलब्धि  से कम नहीं है | श्री केजरीवाल ने यह विश्वास भी जताया कि अब आम आदमी पार्टी स्वयं को राष्ट्रीय विकल्प के तौर पर बेहतर तरीके से पेश कर सकेगी | उसका आशावाद गलत भी नहीं है क्योंकि 2014 में महानगर पालिका जैसी दिल्ली विधानसभा पर काबिज होने के बाद उस करिश्मे को दोबारा दोहराना और फिर पंजाब जैसे राज्य में भारी बहुमत के साथ सत्ता में आना निश्चित तौर पर किसी भी ऐसे राजनीतिक दल के लिए गर्व करने लायक है जिसका  भारत में स्थापित राजनीतिक विचारधाराओं से कोई वास्ता नहीं है | यह पार्टी न तो जाति की बात करती है और न ही धर्म की | भाषा , क्षेत्र या ऐसे ही किसी और सम्वेदनशील मुद्दे से भी वह दूर है | उसका उदय अन्ना हजारे के लोकपाल आन्दोलन की कोख से हुआ था | और तब भ्रष्टाचार के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई उसका घोषणापत्र था | लेकिन उसे सत्ता मिली उन वायदों से जो पूरी तरह स्थानीय  और आम आदमी की दैनिक ज़िन्दगी से जुड़े थे | मुफ्त बिजली , पानी , सरकारी विद्यालयों में गुणवत्ता युक्त शिक्षा और मुहल्ला  क्लीनिक जैसी बातें दिल्ली के लोगों के मन में बैठ गईं और उन्होंने इस पार्टी को आजमाने का फैसला किया | 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रचंड मोदी लहर में आम आदमी पार्टी ने जमानत जप्ती का रिकॉर्ड तो बनाया परन्तु  श्री केजरीवाल ने वाराणसी में नरेंद्र मोदी के मुकाबले उतरकर भविष्य का संकेत दे दिया | कुछ महीनों बाद ही वे दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए | सातों लोकसभा सीटें जीतने वाली भाजपा तीन विधायकों तक सिमट गयी वहीं कांग्रेस का तो सूपड़ा ही साफ हो गया | इसी के साथ श्री केजरीवाल की महत्वाकांक्षाएं भी परवान चढ़ने लगीं और बजाय दिल्ली की राजनीति में सीमित रहने के वे सीधे प्रधानमंत्री से टकराने की नीति पर चलने लगे | देश के भ्रष्ट नेताओं की सूची  जारी करते हुए  पार्टी ने अपने आपको दूध का धुला और श्री केजरीवाल को राजा हरिश्चन्द्र का अवतार साबित करने का दांव भी चला | चूँकि दिल्ली की जनता से किये वायदे पूरे किये गए इसलिए देश भर में इस पार्टी को लेकर उत्सुकता पैदा हुई | हालांकि अभी तक दो राज्य ही उसके कब्जे में आये हैं | गोवा और गुजरात में वह इस अंदाज में लड़ी जैसे वहां भी दिल्ली और पंजाब की कहानी दोहराई जायेगी किन्तु उसकी उम्मीदें पूरी नहीं हो सकीं | हालाँकि वायदे तो उसने दिल्ली वाले ही किये किन्तु मतदाताओं पर उसका असर बहुत सीमित रहा | लेकिन उस कारण वह राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने में जरूर सफल हो गई जिसके अपने फायदे हैं,  विशेष रूप से लोकसभा चुनाव में | सही बात तो ये है कि ये पार्टी उन राज्यों में ही पैर जमा पा रही है जहां कांग्रेस और भाजपा में सीधा मुकाबला है | लेकिन जहां भी अन्य क्षेत्रीय दल मजबूत हैं वहां आम आदमी पार्टी का प्रभाव अपेक्षानुसार नहीं बढ़ रहा | दरअसल श्री केजरीवाल की समस्या ये है कि वे सभी नेताओं और पार्टियों को भ्रष्ट मानते रहे हैं | ऐसे में किसी के साथ गठबंधन में उनको हेटी लगती है | यद्यपि भाजपा के विरोध में वे अन्य विपक्षी दलों के साथ उठते - बैठते तो रहे लेकिन जब भी गठबंधन की बात होती है तो वे मेरी मुर्गी की डेढ़ टांग साबित करते हुए अलग हो जाते हैं | हाल ही में अपने दाहिने हाथ कहे जाने जाने वाले मनीष सिसौदिया की गिरफ्तारी के बाद मजबूरन वे कांग्रेस के साथ मिलकर ईडी और सीबीआई के विरुद्ध आवाज उठाने लगे | और राहुल गांधी की सदस्यता समाप्त किये जाने का विरोध भी उन्होंने किया क्योंकि अपने दो पूर्व मंत्रियों के जेल जाने के बाद उनकी ईमानदारी का दावा कमजोर पड़ने लगा | यहाँ तक कि लालू प्रसाद यादव के परिजनों पर पड़े छापे का भी आम आदमी पार्टी ने विरोध किया |  ऐसे में राष्ट्रीय पार्टी बन जाने के बाद वह अपने को भाजपा और कांग्रेस के विकल्प के तौर पर किस आधार पर पेश करेगी ये बड़ा सवाल है | एक बात और भी है कि मुफ्त उपहार की जो राजनीति इस पार्टी की पहिचान बनी उसे तो अन्य दलों ने  भी अपना लिया | कुछ तो उससे भी आगे निकल चुके हैं | भाजपा और काग्रेस भी चुनावों में खैरात बाँटने में किसी से पीछे नहीं हैं | और फिर श्री केजरीवाल तथा आम आदमी पार्टी के अन्य नेता देश के सामने कोई विचारधारा पेश करने में विफल हैं | देश की सुरक्षा और विदेश नीति के साथ ही अर्थव्यवस्था जैसे गंभीर मुद्दों पर इस पार्टी का दृष्टिकोण एक तो अस्पष्ट है और जो है भी वह भी मुख्यधारा  से मेल नहीं खाता | अरविन्द केजरीवाल न  तो अब पहले जैसे ईमानदार माने जा रहे हैं और न ही उनकी पार्टी की छवि भी वैसी रही | यही वजह है कि आम आदमी पार्टी के अधिकांश संस्थापक सदस्यों को तो या तो बाहर निकाल दिया गया या फिर वे खुद छोड़कर चलते बने | अब जबकि वह  राष्ट्रीय पार्टी  बन चुकी है तब उसे अपनी सोच को भी राष्ट्रीय बनाना होगा | मुफ्त बिजली - पानी जैसे मुद्दे तो  अपनी जगह हैं  लेकिन जब तक पार्टी राष्ट्रीय के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर अपना दृष्टिकोण  सामने नहीं रखती तब तक उसे व्यापक स्तर पर सफलता की उम्मीद नहीं करनी चाहिए | और ये भी कि व्यर्थ की बातों में उलझने की वजह से दिल्ली और पंजाब की सरकार के विरुद्ध असंतोष के स्वर सुनाई देने लगे हैं |

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Tuesday, 11 April 2023

अपराध मुक्त चुनाव : जनता को ही कुछ करना होगा




चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा पेश करते हुए अपराधी तत्वों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए कानून बनाने की गुजारिश की है | जिन प्रत्याशियों के विरूद्ध अपराधिक प्रकरणों में आरोप पत्र दाखिल हो जाते हैं उनको चुनाव लड़ने से रोकने हेतु प्रस्तुत याचिका पर आयोग ने साफ़ कहा कि वह चुनावों को अपराध मुक्त करवाने हेतु संकल्पबद्ध है | लेकिन ऐसा करने के लिए उसके पास कोई वैधानिक अधिकार नहीं है | उस हलफनामे पर न्यायालय द्वारा केंद्र सरकार को नोटिस देकर जवाब माँगा गया है | इस बारे में सबसे रोचक बात ये है कि चुनाव आयोग ने इच्छा तो व्यक्त कर दी किन्तु शक्ति न होने की लाचारी भी जता दी | वैसे भी उसे बिना दांत वाला शेर कहा ही जाता है। जिसकी बानगी चुनावों के दौरान पकड़े जाने वाले काले धन को लेकर होने वाली कार्रवाई से मिलती है। उन छापों में करोड़ों रुपए जप्त होने के बाद कितने लोगों को दंडित किया गया इसकी कोई जानकारी नहीं मिलती। अन्य अनियमितताओं को रोक पाने में भी आयोग फिसड्डी साबित होता रहा है। स्व.टी. एन शेषन के कार्यकाल में  चुनाव आयोग का जो दबदबा कायम हुआ वह धीरे - धीरे कम होता चला गया। चुनाव खर्च कहने को तो सीमित किया गया है लेकिन निर्धारित सीमा में प्रमुख राजनीतिक दलों का कोई उम्मीदवार अपवादस्वरूप ही चुनाव लड़ता होगा। लेकिन जहां तक बात अपराध मुक्त चुनाव की है तो वह केवल चुनाव आयोग के बस में नहीं है। संदर्भित याचिका में की गई मांग यदि मान ली जावे तो फिर राजनीतिक दलों के पास उम्मीदवारों का टोटा पड़ जायेगा और फिर केवल आरोप पत्र के आधार पर ही यदि चुनाव लड़ने से वंचित किया जावे तो फिर उस प्रावधान का दुरुपयोग भी होना तय है । न्यायशास्त्र भी मानता है कि जब तक किसी को न्यायालय सजा न दे तब तक उसको दोषी मान लेना उसके प्रति अन्याय होता है। ऐसी स्थिति में ले देकर नैतिकता का ही आसरा बच रहता है जिसके अंतर्गत किसी अपराधिक प्रकरण में अपने विरुद्ध आरोप पत्र पेश हो जाने के बाद निर्दोष साबित होने तक  व्यक्ति खुद होकर चुनाव लड़ने से पीछे हट जाए। अक्सर ये उदाहरण दिया जाता है कि स्व.लालबहादुर शास्त्री ने रेल दुर्घटना होने पर रेल मंत्री के पद से त्यागपत्र देकर अपनी नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार की थी किंतु उसके उलट दिल्ली सरकार के दो मंत्री अपराधिक प्रकरण में जेल में हैं किंतु पद छोड़ने की शराफत उन्होंने नहीं दिखाई। ऐसी ही स्थिति महाराष्ट्र में उद्धव सरकार के दो मंत्रियों के साथ देखने मिली। जिनमें से एक तो गृहमंत्री थे। ऐसे में चुनाव आयोग तो क्या संसद भी इस बारे में कानून बनाएगी ये सोचना ही व्यर्थ है क्योंकि शायद ही कोई राजनीतिक दल इस हेतु तैयार होगा। याचिका कर्ता की अर्जी पर चुनाव आयोग द्वारा अपराधमुक्त चुनाव हेतु सहमत होने के बाद भी बिना संकोच किए अपनी मजबूरी बताते हुए गेंद सर्वोच्च न्यायालय के जरिए सरकार के पाले में खिसका दी गई । चार सप्ताह बाद सरकार और समय मांगेगी , जो उसे दिया जाना अवश्यंभावी है किंतु वह भी अंत में अपने हाथ खड़े कर देगी , ये मान लेना गलत नहीं होगा। और जहां तक सर्वोच्च न्यायालय की बात है तो वह ज्यादा से ज्यादा सरकार को कानूनी प्रावधान बनाने हेतु सुझाव अथवा निर्देश दे सकता है। लेकिन संसद का जो रवैया आजकल देखने में आ रहा है इसके चलते शायद ही वहां इस  बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे पर कोई बात करने राजी होगा क्योंकि बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की संसद और विधानसभाओं में है जिनके विरुद्ध अपराधिक प्रकरण संबंधी आरोप पत्र अदालतों में पेश किए जा चुके हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि चुनावों को अपराधियों से मुक्त करवाने की मुहिम क्या कानूनी और व्यवहारिक दिक्कतों के चलते फुस्स हो जायेगी , और क्या अतीक अहमद जैसे लोग लोकसभा और विधानसभा में आते रहेंगे ? इस तरह के और भी सवाल हैं जिनका उत्तर खोजे बिना लोकतंत्र और चुनाव प्रक्रिया की पवित्रता को बनाए रखना असंभव है। और तब समाज की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह गंभीर मामलों में आरोपित खराब छवि के व्यक्ति को हरवा दी , फिर चाहे वह किसी भी पार्टी अथवा पद से जुड़ा क्यों न हो । जिन विकसित देशों में लोकतंत्र अपने सही स्वरूप में संचालित है वहां सरकार और कानून से ज्यादा समाज ऐसे मामलों में सख्त है। जिसकी वजह से अवांछित तत्व चुनाव लड़ने का साहस ही नहीं कर पाते। भारत में चूंकि चुनाव संबंधी समूची सोच लोकतंत्र के भविष्य के बजाय भाषा , क्षेत्र , जाति और धर्म के बाद फिर राजनीतिक जमात पर आधारित है इसलिए यहां नैतिकता की बात सोचने की  फुरसत किसी को नहीं है। जब संविधान की शपथ लेने वाले जेल में रहकर भी मंत्री पद नहीं छोड़ते तब और कुछ कहने को रह ही कहां जाता है ?


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Monday, 10 April 2023

राजस्थान में भी पंजाब जैसी गलती कर रही कांग्रेस



राजस्थान के मामले में कांग्रेस आलाकमान फिर वही गलती कर रहा है जिसकी वजह से बीते कुछ सालों में उसके लगभग दो दर्जन  नेता पार्टी छोड़ गए | उनमें से कुछ तो ऐसे थे जिनको गांधी परिवार के बेहद निकट समझा जाता था | हाल ही में गुलाम नबी आजाद द्वारा लिखी गयी किताब में उन हालातों का विवरण भी दिया गया जिनकी वजह से वे स्वयं और पार्टी के कुछ नेता बाहर निकलने मजबूर हो गए | दरअसल कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या ये है कि वह हर फैसला गांधी परिवार पर छोड़ देती है | लेकिन परिवार के तीनों सदस्यों की निर्णय क्षमता बेहद कमजोर है | अव्वल तो वे किसी भी फैसले को टालते रहते हैं और यदि करते हैं तो उनमें मतैक्य नहीं बन पाने से बढ़ते – बढ़ते बात रुक जाती है | पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू  के बीच  लड़ाई की कीमत चुकाने के बाद भी राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच जारी जंग को रोकने का कोई भी सार्थक प्रयास अब तक नहीं किया गया | इस बारे में गांधी परिवार की सबसे बड़ी फजीहत तब हुई जब गत वर्ष पार्टी अध्यक्ष के चुनाव हेतु नामांकन भरने की बजाय  श्री गहलोत ने अपने समर्थक विधायकों से इस्तीफा दिलवाकर  ये संदेश दे दिया कि उनको राजस्थान की सत्ता से हटाने पर सरकार गिर जायेगी | उस मामले में गांधी परिवार को खून का घूँट पीकर रह जाना पड़ा | जयपुर आये दो केन्द्रीय पर्यवेक्षकों को गहलोत समर्थक विधायकों ने जिस  तरह से अपमानित किया और बाद में उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई तो उनमें से एक अजय माकन ने तो अपने पद से ही त्यागपत्र दे दिया | श्री गहलोत के साफ इंकार करने के बाद ही मल्लिकार्जुन खरगे को अध्यक्ष बनाया गया | लेकिन राजस्थान में चल रहा गहलोत – पायलट विवाद दिन ब दिन गंभीर होता चला गया | और अब जबकि विधानसभा चुनाव के लिए मात्र कुछ महीने बचे हैं तब श्री पायलट ने 11 अप्रैल से अनशन करने की घोषणा करते हुए जयपुर से दिल्ली तक पार्टी में खलबली मचा दी | मुद्दा भी ये कि मुख्यमंत्री श्री गहलोत ने भाजपा नेत्री और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के विरुद्ध लगे आरोपों पर कोई भी कार्रवाई नहीं की | उल्लेखनीय है श्री गहलोत और वसुंधरा के निजी सम्बन्ध काफी अच्छे हैं | ये भी कहा जाता है कि जब श्री पायलट अपने समर्थक विधायकों को लेकर गुरुग्राम जा बैठे थे और भाजपा के सहयोग से गहलोत सरकार गिराए जाने की पूरी तैयारी हो गयी थी तब वसुंधरा ने ही रायता फैला दिया क्योंकि उनको इस बात का डर था कि सचिन के आने से पार्टी में उनका भविष्य अंधकारमय हो जायेगा | बहरहाल , श्री पायलट की वह कोशिश उन्हें बहुत महंगी पड़ गयी | उपमुख्यमंत्री सहित संगठन के सभी पद हाथ से निकल गए | उनके समर्थक मंत्री भी लालबत्ती गँवा बैठे | ऐसे में उनकी स्थिति घायल शेर जैसी हो गयी | इसमें दो मत नहीं हैं कि श्री गहलोत ने राजनीतिक चातुर्य के मामले में श्री पायलट को बौना साबित कर दिया | ये जानते हुए भी कि उनको गांधी परिवार का अंदरूनी समर्थन हासिल है ,  सार्वजनिक तौर पर सचिन का मजाक उड़ाने का कोई अवसर मुख्यमंत्री ने नहीं छोड़ा | पार्टी हाईकमान की समझाइश पर श्री पायलट ने काफी संयम बनाये रखा लेकिन जब उन्हें लगा कि समय उनके हाथ से निकलता जा रहा है तब उन्होंने अनशन जैसा फैसला कर डाला | इस विवाद में जितनी गलती श्री गहलोत और सचिन की है उससे ज्यादा गांधी परिवार की है क्योंकि दोनों नेता उसके बेहद करीबी माने जाते रहे हैं | यदि वह समय रहते उन दोनों  का विवाद सुलझाकर बीच का रास्ता निकाल लेता तब नौबत यहाँ तक नहीं आ पाती | राजस्थान के पार्टी प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा भी कल जयपुर जा रहे हैं लेकिन जैसी खबर है अब तक सचिन को अनशन स्थगित करने की सलाह न प्रभारी ने दी और न ही गांधी परिवार ही आगे आया | श्री गहलोत तो ऐसा लगता है अपने इस प्रतिद्वंदी को पार्टी से बाहर निकालने पर आमादा है क्योंकि ऐसा होने के बाद राजस्थान में कांग्रेस पूरी तरह से उनके कब्जे में आ जायेगी | राजनीति के जानकारों का मानना है श्री पायलट के पास भी ज्यादा विकल्प नहीं बचे | वसुंधरा को मुद्दा बनाकर उन्होंने एक तीर से दो निशाने साधे हैं। उनको समझ में आ गया है कि भाजपा में उनकी राह में महारानी रोड़ा बनी रहेंगी। इसलिए अब वे तीसरी शक्ति के तौर पर खुद को स्थापित करने की तरफ बढ़ते हुए राजस्थान में कांग्रेस और भाजपा के विकल्प के तौर पर अपनी जगह  बनाने की सोच रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि  प्रदेश में तीसरा मोर्चा उनकी अगुआई में खड़ा हो सकेगा और त्रिशंकु विधानसभा बनने पर वे किंग मेकर की भूमिका में हो सकते हैं। भविष्य तो कोई नहीं जानता किंतु इतना तय है कि इस प्रकरण से कांग्रेस आलाकमान की कमजोरी एक बार फिर सामने आ गई है जो लंबे समय से चले आ रहे इस विवाद को हल करवाने में नाकामयाब साबित हुआ। इस प्रकरण में एक बात और भी साफ है कि सचिन  कांग्रेस में रहे तो भी श्री गहलोत उन्हें मजबूत  नहीं होने देंगे और केंद्र में चूंकि कांग्रेस की संभावना है नहीं इसलिए वहां भी कोई अवसर नजर नहीं आता। ऐसे में वे क्या करेंगे ये आने वाले दिनों में  स्पष्ट हो जाएगा लेकिन अनके अनशन का निर्णय कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की विफलता का ताजा सबूत है जिसकी वजह से पार्टी को झटके पर झटके लग रहे हैं और छोटे - छोटे दलों के नेता तक उसको आंखें दिखाने का दुस्साहस करने लगे हैं। उद्धव ठाकरे और शरद पवार ने बीते सप्ताह जिस तरह कांग्रेस की जुबान बंद करवाई वह इसका ताजा उदाहरण है।

- रवीन्द्र वाजपेयी