Thursday, 8 February 2024
बेहतर होगा मुस्लिम समाज खुद होकर सुधारवादी पहल करे
Wednesday, 7 February 2024
हरदा हादसे के जिम्मेदार नौकरशाहों को भी सह अभियुक्त बनाया जाए
म.प्र के हरदा शहर की पटाखा फैक्ट्री में गत दिवस हुए अग्निकांड में एक दर्जन से ज्यादा मौतों के अलावा सैकड़ों लोगों के घायल होने की खबर है। बारूद के भंडार में आग लगने के बाद धमाकों की आवाज से पूरा शहर दहल उठा। दूर - दूर तक के मकान धमाके में हिल गए। राह चलते लोग भी बारूदी धमाकों के शिकार हुए। अभी मरने वालों की सही संख्या का पता नहीं चल सका है क्योंकि फैक्ट्री में कार्यरत अनेक मजदूर लापता हैं। मलबा हटाए जाने के बाद ही सही स्थिति सामने आयेगी। पटाखा फैक्ट्री में इस तरह के हादसे होना स्वाभाविक होता है क्योंकि जहां बड़ी मात्रा में बारूद का भंडार हो वहां छोटी सी असावधानी से आग भड़क जाती है। जाहिर है इस व्यवसाय का लाइसेंस देने के पहले संबंधित सरकारी विभाग अग्निशमन सहित अन्य सुरक्षा प्रबंधों की जांच करते होंगे। उक्त फैक्ट्री के बारे में जो जानकारी आई उसके अनुसार नियम विरुद्ध कार्य करने के कारण उसे प्रशासन ने बंद कर दिया किंतु संभागायुक्त ने उक्त आदेश पर स्थगन आदेश जारी करते हुए फैक्ट्री खोलने की अनुमति दे दी। अब जबकि हादसे की खबर देश भर में फैल चुकी है । मुख्यमंत्री से लेकर पूरा प्रशासन कड़ी कार्रवाई करने की घोषणा कर रहा है । पहले से ही जमानत पर चल रहे फैक्ट्री मालिक को दोबारा गिरफ्तार भी कर लिया गया। घायलों का इलाज हरदा और भोपाल के अस्पतालों में हो रहा है। भुगतान दिवस होने की वजह से बड़ी संख्या में मजदूर हादसे के समय फैक्ट्री में जमा थे। ऐसी आशंका है कि धमाकों में कुछ श्रमिकों का पूरा परिवार ही भस्म हो गया। फैक्ट्री का रिहायशी इलाके में होना भी स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। मुख्यमंत्री डा.मोहन यादव का ये कहना तो बिलकुल सही है कि दोषियों पर ऐसी कार्रवाई करेंगे कि दोबारा किसी की जुर्रत ऐसी गड़बड़ी करने की न हो। लेकिन हर बड़ी जानलेवा दुर्घटना के बाद दिखाई जाने वाली सख्ती यदि सही समय पर बरती जावे तो उनको रोका जा सकता है। हाल ही में गुना जिले में हुए बस हादसे में काफी संख्या में यात्रियों के मारे जाने के बाद भी मुख्यमंत्री ने परिवहन आयुक्त से लेकर जिले के तमाम अधिकारियों को हटा दिया । जांच शुरू होने के बाद जो तथ्य सामने आए वे प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार के साथ ही राजनेताओं और नौकरशाहों के गठजोड़ को उजागर करने वाले थे। दुर्घटनाग्रस्त बस की हालत बेहद खराब थी। उसके बाद भी उसे चलाए जाने की अनुमति दी गई। बस मालिक सत्ताधारी पार्टी के नेता परिवार का होने से वह सम्भव हुआ होगा। उसके बाद पूरे प्रदेश में परिवहन महकमा सक्रिय हुआ। दो - चार दिनों तक जहां देखो वहां व्यवसायिक वाहनों की फिटनेस सहित अन्य जांच कराने का नाटक हुआ । और उसके बाद सब कुछ ढर्रे पर लौट आया। गत वर्ष जबलपुर के एक निजी अस्पताल में हुए अग्निकांड में अनेक लोग जान गंवा बैठे थे । उक्त अस्पताल में एक ही निकासी द्वार के अलावा आग बुझाने के समुचित इंतजाम नहीं थे। घटना के बाद शहर में फायर आडिट का अभियान चला। अनेक नए अस्पतालों और बहुमंजिला भवनों के निर्माण की अनुमति रोक ली गई। उसके पहले भोपाल के हमीदिया अस्पताल में भी आग लगने की घटना ने पूरे प्रदेश में हलचल मचा दी थी। उसके बाद भी अग्निशमन को लेकर प्रदेश भर में जांच का अभियान चला। लेकिन उसमें कितनी ईमानदारी रही ये हरदा के हादसे से सामने आ गया। बारूद के उपयोग से जुड़े किसी भी व्यवसाय को रिहायशी इलाके में चलाए जाने की अनुमति देना अपराधिक उदासीनता ही कही जाएगी। उस दृष्टि से संभागायुक्त द्वारा बंद की जा चुकी फैक्ट्री को शुरू करने की अनुमति किस आधार पर दी गई वह सामने आना चाहिए । ऐसे काम केवल दो कारणों से होते हैं जिनमें पहला राजनीतिक दबाव और दूसरा भ्रष्टाचार ,जो घूसखोरी की शक्ल में होता है। हरदा का हादसा एक तमाचा है प्रशासनिक व्यवस्था के निकम्मेपन पर । मुख्यमंत्री डा.यादव ने सत्ता संभालते ही अपने सख्त तेवर दिखाने शुरू कर दिए थे। गुना बस कांड के बाद हरदा अग्निकांड ने आपदा प्रबंधन की अग्रिम सावधानियों की असलियत का पर्दाफाश कर दिया है। मुख्यमंत्री को प्रदेश भर के प्रशासनिक अधिकारियों को सख्त हिदायत देना चाहिए कि नियम विरुद्ध यदि इस तरह के व्यवसाय की जानकारी सामने आई तो संबंधित अधिकारी को बराबर का दोषी माना जाएगा । हरदा का हादसा हुआ ही इस वजह से कि रिहायशी इलाके में नियम विरुद्ध चलाई जा रही पटाखा फैक्ट्री को सील करने के बाद दोबारा खोलने की अनुमति एक बड़े साहब ने दे दी। इसलिए ऐसे हादसों में उन नौकरशाहों को भी सह अभियुक्त बनाया जाना जरूरी हो गया है जो मौत के ऐसे मंजर पैदा करने में सहायक बनते हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Tuesday, 6 February 2024
मोदी के आक्रामक अंदाज के मुकाबले विपक्ष के पास रणनीति का अभाव
राष्ट्रपति के अभिभाषण के प्रति धन्यवाद प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर साल लंबा भाषण देते हुए विपक्ष पर जोरदार हमले करते हैं। ऐसा ही उन्होंने गत दिवस भी किया जिसमें सरकार की उपलब्धियों के बखान को आगामी लोकसभा चुनाव के प्रचार के तौर पर देखा जा सकता है । अपनी चिर - परिचित शैली में उन्होंने कांग्रेस पर प्रहार में कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी और विपक्ष पर यहां तक ताना मारा कि अगले चुनाव में वह दर्शक दीर्घा में नजर आएगा। पिछले स्वाधीनता दिवस पर भी उन्होंने कहा था कि आगामी वर्ष भी वे ही लाल किले की प्राचीर पर ध्वजारोहण करेंगे। गत दिवस लोकसभा में उन्होंने वही आत्म विश्वास दोहराते हुए दावा किया कि 2024 में भाजपा 370 और एनडीए 400 से ज्यादा सीटें जीतेगा। उन्होंने विपक्षी गठबंधन पर भी निशाना साधा। परिवारवाद पर श्री मोदी हमेशा से ही मुखर रहे हैं। लाल किले से दिए भाषण में भी उन्होंने इस पर हमला बोला था। वैसे भी प्रधानमंत्री काफी हौसले वाले इंसान हैं जो जय - पराजय में अपना संतुलन बनाए रखने के साथ ही अवसर को भुनाने में कभी पीछे नहीं रहते। राहुल गांधी की न्याय यात्रा के कारण कांग्रेस उसमें उलझी हुई है। वहीं दूसरी और नीतीश कुमार के अलग होने के अलावा ममता बैनर्जी के तेवरों से विपक्षी गठबंधन में बिखराव के आसार बढ़ रहे हैं । अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल भी कांग्रेस पर अपनी मर्जी थोपने पर अमादा हैं । इसका प्रभाव संसद में भी देखने मिल रहा है। उल्लेखनीय है 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले म.प्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनाव में भाजपा की पराजय ने मोदी सरकार की वापसी के प्रति आशंका उत्पन्न कर दी थी। लेकिन वह गलत साबित हो गई। उसके विपरीत इस बार उक्त तीनों राज्यों में भाजपा ने धमाकेदार अंदाज में वापसी करते हुए कांग्रेस का मनोबल तोड़ने में कामयाबी हासिल कर ली है। इसके अलावा इस बार प्रधानमंत्री के पास उपलब्धियों का लंबा ब्यौरा है। 2014 में सत्ता में आने के बाद उन्होंने जिन योजनाओं और कार्यक्रमों को प्रारंभ किया था उनके प्रति जनविश्वास बढ़ा है। मोदी की गारंटी नामक नया नारा उसी आत्मविश्वास का परिचायक है जिसके बल पर वे 370 और 400 सीटों का दावा कर पा रहे हैं। 22 जनवरी को अयोध्या में निर्मित भव्य राम मंदिर में प्राण - प्रतिष्ठा के अवसर पर पूरे देश में जिस तरह से हर्षोल्लास नजर आया वह भाजपा के पक्ष में वैसी ही लहर का संकेत दे रहा है जैसी 1984 में कांग्रेस के पक्ष में नजर आई थी । विपक्ष के अधिकांश दल भी इस बात को समझ चुके हैं कि कांग्रेस ने प्राण - प्रतिष्ठा समारोह की उपेक्षा कर बहुत बड़ी गलती कर डाली । और इसीलिए वे उससे छिटकने के संकेत दे रहे हैं। आज खबर आई कि उद्धव ठाकरे भी प्रधानमंत्री के विरुद्ध तीखी बयानबाजी से बचते हुए उनके साथ पुराने संबंधों का हवाला देते हुए सौजन्यता का प्रदर्शन करने लगे हैं। इन सबके कारण प्रधानमंत्री का मनोबल ऊंचा होना स्वाभाविक है। कोरोना काल में अर्थव्यवस्था को जो ग्रहण लगा था वह हट चुका है और भारत की विकास दर पूरी दुनिया को आकर्षित कर रही है। विदेशी मोर्चे पर भी हमारी स्थिति बेहद मजबूत है तथा श्री मोदी विश्व के सबसे लोकप्रिय लोकतांत्रिक शासक के तौर पर स्थापित हो चुके हैं। दुनिया के बड़े देश तक भारत के महत्व को स्वीकारने लगे हैं। सही बात तो ये है कि विपक्ष अपनी धार खोता चला जा रहा है। उसका गठबंधन कागज पर बने तो महीनों बीत गए किंतु न उसका कोई सर्वमान्य नेता है और न ही नीति। सीटों के बंटवारे को लेकर विभिन्न घटक दलों के बीच में जबरदस्त अविश्वास है । नीतीश कुमार के साथ छोड़ देने के बाद गठबंधन में कोई भी ऐसा नेता नहीं है जो सभी को एकजुट रख सके। मौजूदा संसद का ये अंतिम सत्र है और इसमें भी विपक्ष सरकार को घेरने में सफल होता नहीं दिखता । ऐसा नहीं है कि उसके पास हमले करने लायक मुद्दे न हों किंतु आपसी समन्वय का अभाव और दिशाहीनता के कारण वह उसका लाभ नहीं उठा पाता। होना तो ये चाहिए था कि श्री गांधी न्याय यात्रा को विराम देकर संसद में विपक्ष की तरफ से सरकार पर हमले की अगुआई करते। लेकिन उन्होंने इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया। बहरहाल विपक्ष में व्याप्त अव्यवस्था के बीच प्रधानमंत्री ने अपने चुनाव अभियान को पूरे जोर - शोर से शुरू कर दिया है। वे लगातार राज्यों का दौरा करते हुए विकास की नई योजनाओं की शुरुआत के जरिए मोदी की गारंटी के प्रति भरोसा बढ़ा रहे हैं। वहीं कांग्रेस सहित बाकी विपक्ष अभी तक अपनी रणनीति ही नहीं बना सका।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Monday, 5 February 2024
दूसरों को फंसाने फेंके जाल में खुद फंस गए केजरीवाल
दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी मंत्रीमंडलीय साथी आतिशी को नोटिस सौंपने के लिए उनके निवास पर घंटों इंतजार करना पड़ा। पहले प्रयास में दोनों नेता घर पर नहीं मिले। और जब मिले तो नोटिस देने आए अधिकारियों को खरी - खोटी सुनाते हुए केंद्र सरकार पर आरोपों की झड़ी लगा दी। इन दोनों ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया था कि भाजपा द्वारा 25 - 25 करोड़ रु. में आम आदमी
पार्टी के विधायकों को खरीदने का प्रयास किया जा रहा है। इसके विरुद्ध भाजपा ने रिपोर्ट दर्ज करवाकर श्री केजरीवाल और आतिशी से ये बताने कहा कि विधायकों को खरीदने का प्रस्ताव देने वाला कौन था ? अब जबकि अपराध शाखा द्वारा दोनों को बाकायदा नोटिस भेजकर विधायकों को 25 करोड़ रु . का प्रस्ताव देने वाले का नाम बताने कहा तब संवैधानिक पद पर विराजमान नेताओं को अपने आरोप के पक्ष में प्रमाण देना चाहिए। लेकिन ऐसा करने के बजाय वे केंद्र सरकार और भाजपा पर भड़ास निकालने में जुटे हैं। उनको आज नोटिस का जवाब देना है। इसके पहले शराब घोटाले में श्री केजरीवाल ईडी द्वारा अनेक समन दिए जाने के बावजूद पूछताछ के लिए उपस्थित नहीं हुए और आए दिन अपनी गिरफ्तारी का शिगूफा छोड़ा करते हैं। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी ईडी के कई समन रद्दी की टोकरी में फेंक दिए किंतु आंख - मिचौली करते रहने के बाद अंततः वे उसके सामने पेश हुए और गिरफ्तार कर लिए गए। हो सकता है यदि वे पहले बुलावे पर ही जाकर अपना बयान देते तब ये नौबत नहीं आती। केजरीवाल जी भी यदि ईडी के अनेक बुलावे ठुकराने के बाद गिरफ्तार किए जाएं तो फिर उनके पास सहानुभूति अर्जित करने का अवसर भी नहीं रहेगा। ऐसे मामलों में एक बात और विचारणीय है कि मुख्यमंत्री और मंत्री पद पर विराजमान व्यक्ति संविधान की रक्षा और उसके पालन की शपथ लेने के उपरांत ही कुर्सी पर बैठता है। ऐसे में किसी वैधानिक जांच एजेंसी द्वारा पूछताछ हेतु बुलाए जाने पर उनका उपस्थित न होना एक दो मर्तबा तो व्यस्तता या अन्य किसी कारण से समझ में आता है , लेकिन छह - आठ समन के बाद भी अवहेलना करना इस बात का प्रमाण है कि कानून के प्रति उनके मन में तनिक भी सम्मान नहीं हैं। इन नेताओं को इस बात का जवाब देना चाहिए कि इनके मातहत कार्यरत कोई अधिकारी अथवा कर्मचारी इनके द्वारा बुलाए जाने पर उपस्थित न हो तो क्या उसे ये बख्श देंगे ? अरविंद और आतिशी ने जब खुले आम अपने विधायकों को खरीदे जाने का आरोप भाजपा पर लगाया तो फिर संबंधित व्यक्ति की पहचान भी उनको स्पष्ट करना चाहिए थी। और फिर 25 करोड़ की राशि साधारण नहीं है अतः उनके द्वारा लगाया आरोप बेहद गंभीर है। जब भाजपा ने आरोपों की पुष्टि करवाने के लिए विधिवत कार्रवाई की तब ये उनका कानूनी दायित्व है कि वे उसको सत्य सिद्ध करें या उसका जो भी दंड हो उसको भुगतें। स्मरणीय है सत्ता में आने से पहले आम आदमी पार्टी की ओर से श्री केजरीवाल ने देश के सबसे भ्रष्ट नेताओं की सूची जारी की थी। उस पर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और स्व.अरुण जेटली सहित अनेक लोगों ने मानहानि का प्रकरण दर्ज करवाया । ऐसा होते ही केजरीवाल जी की सारी हेकड़ी जाती रही और फिर वे उन सभी के सामने लिखित माफीनामा लेकर यह याचना करते दिखाई दिए कि प्रकरण वापिस ले लें । जिन लोगों से उन्होंने माफी मांगी उनमें विक्रम मजीठिया , श्री गडकरी , स्व.जेटली और स्व. शीला दीक्षित जैसे अनेक दिग्गज रहे। सबसे रोचक बात ये है कि कपिल सिब्बल से भी अरविंद ने माफी मांगी जो आजकल ऐसे नेताओं के बचाव में खड़े होते हैं। उनके माफीनामे पर कांग्रेस नेता अजय माकन ने कटाक्ष भी किया था कि केजरीवाल को अपना नाम बदलकर माफीवाल कर लेना चाहिए । आम आदमी पार्टी के संयोजक आजकल उन तमाम नेताओं के साथ गठबंधन में शामिल हो रहे हैं जिन्हें वे भ्रष्टाचार का सिरमौर बताते रहे। हालांकि उनकी समूची राजनीति विरोधभासों और पलायनवाद पर टिकी रही किंतु इस प्रकरण में एक बार फिर उनके समक्ष मुसीबत आ खड़ी हुई है। भाजपा पर उनकी पार्टी के विधायकों को 25 - 25 करोड़ में खरीदने का प्रस्ताव देने का आरोप उनके गले में पड़ गया है। यदि उनके पास इसका कोई प्रमाण होता तो निश्चित रूप से वे अपराध शाखा का नोटिस लेने में विलंब नहीं करते और अब तक उन कथित लोगों के नाम सार्वजनिक कर चुके होते जिन्होंने विधायकों को खरीदने की पेशकश की थी। ऐसा लगता दूसरों को फंसाने के लिए फेंके गए जाल में केजरीवाल एंड कंपनी खुद फंसती जा रही है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Saturday, 3 February 2024
कांग्रेस न्याय यात्रा में व्यस्त : विपक्षी गठबंधन में सब अस्त व्यस्त
ऐसा लगता है इंडी नामक विपक्षी गठबंधन जंग में उतरने के पहले ही बिखराव की ओर बढ़ रहा है। राहुल गांधी की न्याय यात्रा भी इसे कमजोर करने का कारण बन रही है। अभी तक के संकेत गठबंधन और कांग्रेस दोनों के लिए अशुभ कहे जायेंगे। यात्रा के प. बंगाल में घुसते ही तृणमूल कांग्रेस नेत्री ममता बैनर्जी ने राज्य की सभी लोकसभा सीटों पर अकेले लड़ने की घोषणा कर दी। वे इस बात से नाराज थीं कि न्याय यात्रा के पूर्व उनके आग्रह के बावजूद भी श्री गांधी ने उनसे फोन पर बात नहीं की। गत दिवस सुश्री बैनर्जी का बयान आ गया कि कांग्रेस लोकसभा की 40 सीटें भी नहीं जीत सकेगी। उन्होंने चुनौती दी कि यदि उसमें हिम्मत है तो वह भाजपा को वाराणसी और प्रयागराज में परास्त करके दिखाए। उन्होंने ये ताना भी मारा कि वह न जाने किस अहंकार में जी रही है। हालांकि वे काफी पहले से ही राहुल और कांग्रेस को अक्षम बता चुकी थीं। विपक्षी मोर्चा बनने के बाद उन्होंने कांग्रेस से साफ कह दिया कि वे उसके लिए वही दो सीटें छोड़ेगी जिन पर 2019 में वह जीती थी। न्याय यात्रा से उनकी खुन्नस इसलिए भी बढ़ी क्योंकि उसमें वामपंथी शामिल हुए। नीतीश कुमार के पाला बदल लेने के बाद ममता ही इंडी की सबसे बड़ी नेता कही जा सकती हैं जिनका प.बंगाल के अलावा एक दो राज्यों में कुछ असर है। जहां तक बात तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन की है तो वे अपने राज्य के अलावा पांडिचेरी तक ही सिमटे हैं। एनसीपी के दिग्गज शरद पवार का करिश्मा भी ढलान पर है। भतीजे अजीत की बगावत के बाद विपक्षी गठबंधन के बजाय उन्हें अपनी बेटी सुप्रिया सुले के राजनीतिक भविष्य की चिंता सताए जा रही है । कहा तो ये भी जा रहा है कि अजीत के भाजपा में जाने की योजना भी चाचा की ही तैयार की हुई थी। देर - सवेर अपनी बेटी के राजनीतिक भविष्य को सुरक्षा चक्र प्रदान करने के लिए वे भी श्री मोदी के मोहपाश में फंस जाएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। स्मरणीय है कि आज भले ही नीतीश कुमार को पलटूराम और ऐसे ही न जाने कितने विशेषणों से विभूषित किया जा रहा है परंतु राष्ट्रीय राजनीति में शरद पवार काफी पहले से पाला बदलने और धोखा देने के लिए कुख्यात रहे हैं। मुख्यमंत्री बनने के लिए अपने राजनीतिक गुरु स्व.बसंत दादा पाटिल की पीठ में छुरा भौंकने में भी उन्होंने शर्म नहीं की। 1999 के लोकसभा चुनाव के पूर्व सोनिया गांधी के विदेशी मूल को बहाना बनाकर उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा देकर एनसीपी बना ली। लेकिन कुछ सालों बाद कांग्रेस के करीब आकर डा.मनमोहन सिंह की सरकार में मंत्री भी बन गए। इसीलिए वे पूरी तरह अविश्वसनीय माने जाते हैं। ये सब देखते हुए इंडी की दशा और दिशा दोनों गड़बड़ाती दिख रही हैं । राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार विपक्षी गठबंधन के तमाम घटक जिस प्रकार अपनी ढपली अपना राग लेकर घूम रहे हैं वह उसके भविष्य को लेकर आशंकित कर रहा है। ममता के सभी सीटों पर लड़ने के ऐलान के बाद जब राहुल ने सीटों के बंटवारे को लेकर बातचीत चलने जैसी टिप्पणी करते हुए उनकी नाराजगी दूर करना चाहा तो तृणमूल नेत्री ने कांग्रेस को 40 सीटें मिलने की भविष्यवाणी कर दूध में नींबू निचोड़ दिया। महाराष्ट्र में श्री पवार और उद्धव ठाकरे भी कांग्रेस को बड़ा भाई मानने राजी नहीं हो रहे। आम आदमी पार्टी ने पंजाब के बाद हरियाणा में भी अकेले लड़ने की धौंस दिखा दी। 22 जनवरी को अयोध्या स्थित राम मंदिर में मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर समूचे देश में जो स्वस्फूर्त वातावरण निर्मित हुआ उसने कांग्रेस को पिछले पैरों पर धकेल दिया । उक्त आयोजन का आमंत्रण मिलने के बावजूद उसमें शामिल नहीं होने के उसके निर्णय को राजनीतिक विश्लेषक बहुत बड़ी गलती मान रहे हैं । यद्यपि श्री पवार और ममता सहित ज्यादातर विपक्षी नेता उस दिन अयोध्या नहीं गए किंतु पूरे देश में कांग्रेस जन जिस उत्साह के साथ राम नाम की माला जपते दिखे उसके बाद ये साफ हो गया कि पार्टी का सामान्य कार्यकर्ता ही नहीं अपितु नेतागण भी राम मंदिर निर्माण के कारण पैदा हुई हिन्दू लहर से भयाक्रांत हैं। आचार्य प्रमोद कृष्णम तो खुले आम पार्टी लाइन के विरुद्ध बोलते जा रहे हैं । और तो और वे प्रधानमंत्री को अपने एक अयोजन का निमंत्रण पत्र देने उनसे भेंट तक कर आए। चौंकाने वाली बात ये है कि विपक्षी गठबंधन में आ रही दरारों को भरने की फुरसत किसी नेता को नहीं है। नीतीश कुमार इसमें सक्षम थे किंतु वे खुद ही भाजपा की गोद में जा बैठे। पवार साहेब से अपना घर ही नहीं संभल रहा। जहां तक बात ममता की है तो उनके साथ किसी की पटरी नहीं बैठती। बच रहते हैं मल्लिकार्जुन खरगे तो अव्वल तो उनको कोई भाव देता नहीं है और वैसे भी उनका पूरा ध्यान न्याय यात्रा पर लगे रहने से वे विपक्षी एकता के लिए कुछ नहीं कर पा रहे। यदि कुछ दिन और ऐसा ही चला तब इस गठबंधन के छिन्न - भिन्न होने की आशंकाएं प्रबल होती चली जाएंगी।
- रवीन्द्र वाजपेयी