Thursday, 8 February 2024

बेहतर होगा मुस्लिम समाज खुद होकर सुधारवादी पहल करे



उत्तराखंड विधानसभा ने समान नागरिक संहिता विधेयक पारित कर दिया। इसके साथ ही अब ये संभावना  है कि भाजपा शासित अन्य राज्य भी इस दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं।  दरअसल  स्व.राजीव गांधी के शासनकाल में सर्वोच्च न्यायालय ने शाह बानो के पक्ष में गुजारा भत्ता संबंधी जो फैसला सुनाया था वह समान नागरिक संहिता की मांग को तेज करने का आधार बना। बाद में जब राजीव सरकार द्वारा संसद में उक्त फैसले को रद्द करवा दिया गया तो उसके समर्थकों  को जबरदस्त हथियार हाथ लग गया। सच तो ये है कि स्व.गांधी को जितना राजनीतिक नुकसान बोफोर्स कांड ने पहुंचाया उतना ही शाह बानो वाले फैसले को पलटने से पहुंचा । उसके बाद देश में मिली - जुली सरकारों का दौर चलता रहा । लेकिन 2014 में  नरेंद्र मोदी की जो सरकार बनी उसे स्पष्ट बहुमत हासिल होने के कारण भाजपा अपने मुख्य नीतिगत मुद्दों पर आगे बढ़ी। तीन तलाक , धारा 370 और राम मंदिर के मामले में सफलता प्राप्त होने के बाद अब समान नागरिक संहिता ही शेष है। रोचक बात ये है। कि इसके पक्ष और विपक्ष दोनों में प्रस्तुत याचिकाओं को सर्वोच्च न्यायालय ने ये कहते हुए रद्द कर दिया कि यह संसद के क्षेत्राधिकार का विषय है। ये  भी महत्वपूर्ण है कि उत्तराखंड भले समान नागरिक संहिता लागू करने वाले पहले राज्य के तौर पर प्रचारित हो रहा हो किंतु गोवा में तो यह पुर्तगाली शासन के समय से ही लागू  है। और यह भी कि उसका न मुस्लिम विरोध करते हैं और न ही ईसाई। लेकिन देश के अन्य राज्यों में  समान नागरिक संहिता लागू करने का मुस्लिम समाज ये कहकर विरोध करता है कि पर्सनल लॉ से छेड़छाड़ उनके धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप होगा जो संविधान में अल्पसंख्यकों को प्रदत्त सुरक्षा के मद्देनजर अनुचित है। लेकिन संविधान में सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार की बात भी तो कही गई है। संविधान सभा में  इस विषय पर उस समय के दिग्गज नेताओं ने भी खुलकर अपने विचार रखे थे। ये मुद्दा शायद कभी नहीं उठता यदि पंडित नेहरू की सरकार ने हिंदू विवाह , उत्तराधिकार , पैतृक संपत्ति सहित कुछ और कानूनों में रद्दोबदल न किया जाता। हिन्दू कोड बिल को लेकर कांग्रेस में भी अंतर्विरोध थे।  डा. आंबेडकर द्वारा जब इसे पेश किया गया तब  यह संसद में पारित न हो सका जिस पर उन्होंने मंत्री पद छोड़ दिया। संविधान सभा के अध्यक्ष के तौर पर भी डा.राजेंद्र प्रसाद उसके पक्ष में नहीं थे। अंततः 1955 में अनेक टुकड़ों में उसे पारित करवा लिया गया। कांग्रेस में जो हिंदूवादी नेता उस दौर में थे वे भी नेहरू जी के आभामंडल के सामने ज्यादा कुछ न कर सके। उसी के बाद से हिंदूवादी संगठनों ने ये कहना शुरू कर दिया कि जब बहुसंख्यक होने के बाद भी हिंदुओं के पर्सनल लॉ में सुधार के नाम पर बदलाव किया गया तब मुस्लिम पर्सनल लॉ को समयानुकूल बनाने में सरकार पीछे क्यों रही? जनसंघ के उदय के बाद से ही समान नागरिक संहिता की मांग लगातार उठती आ रही है जो 2014 के बाद से और तेज हो गई। उत्तराखंड की पहल के बाद अब यह मुद्दा और जोर पकड़ेगा। हो सकता है लोकसभा चुनाव में भी यह भाजपा के प्रचार का हिस्सा बने। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण का उत्तर देते हुए कहा भी कि अपने तीसरे कार्यकाल में उनकी सरकार कुछ कड़े और बड़े फैसले लेगी। जाहिर है समान नागरिक संहिता उनमें से एक होगी। वैसे अनेक मुस्लिम देशों में एक से अधिक विवाह , तलाक , हलाला , संपत्ति में उत्तराधिकार जैसे अनेक मामलों में बदलाव किया जा चुका है , जिनमें पाकिस्तान भी एक है। भारत में चूंकि मुसलमान वोट बैंक बनकर रह गए हैं इसलिए उनके तुष्टीकरण का खेल चलता रहा। लेकिन उनकी सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति को सुधारने के दिशा में वे नेता कुछ नहीं करते जो उनके वोट के बलबूते पर राजनीति चलाया करते हैं। मुस्लिम समुदाय को चाहिए कि वह समाज सुधार की प्रक्रिया के प्रति खुले मन से आगे आए। उसे ये देखना और सोचना चाहिए कि जब अनेक इस्लामिक देशों ने सदियों से  प्रचलित रीति - रिवाजों को बदलने में संकोच नहीं किया तब भारत जैसे धर्म निरपेक्ष कहे कहे वाले देश में उसका विरोध करने का अर्थ क्या है ? समान नागरिक संहिता में  प्रस्तावित किसी बात पर ऐतराज होना तो स्वाभाविक है किंतु उसे सिरे से नकार देना  समाज को विकास की राह पर आगे बढ़ने से रोकना ही है। कट्टरपंथी लोग हिंदुओं में भी कम नहीं हैं किंतु उसके बाद भी उनका बहुमत समय की जरूरत के अनुरूप खुद को ढालते रहने के  कारण ही तरक्की की राह पर आगे निकल गया। समान नागरिक संहिता को इस्लाम विरोधी कहकर उसका अंध विरोध करने की मानसिकता त्यागकर मुस्लिम समाज के समझदार लोगों को खुद होकर पर्सनल लॉ में बदलाव करने की पहल करना चाहिए। ऐसा करने से वे उस पराजयबोध से बच जायेंगे जिसके वे इन दिनों शिकार हैं।


 - रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 7 February 2024

हरदा हादसे के जिम्मेदार नौकरशाहों को भी सह अभियुक्त बनाया जाए


म.प्र के हरदा शहर की  पटाखा फैक्ट्री में गत दिवस हुए अग्निकांड में एक दर्जन से ज्यादा मौतों के अलावा सैकड़ों लोगों के घायल होने की खबर है। बारूद के भंडार में आग लगने के बाद धमाकों की आवाज से पूरा शहर दहल उठा। दूर - दूर तक के मकान धमाके में हिल गए। राह चलते लोग भी बारूदी धमाकों के शिकार हुए। अभी मरने वालों की सही  संख्या का पता नहीं चल सका है क्योंकि फैक्ट्री में कार्यरत अनेक मजदूर लापता हैं। मलबा हटाए जाने के बाद ही सही स्थिति सामने आयेगी। पटाखा फैक्ट्री में इस तरह के हादसे होना स्वाभाविक होता है क्योंकि जहां बड़ी मात्रा में बारूद का भंडार हो वहां छोटी सी असावधानी से आग भड़क जाती है। जाहिर है इस व्यवसाय का लाइसेंस देने के पहले  संबंधित सरकारी विभाग अग्निशमन सहित अन्य सुरक्षा प्रबंधों की जांच करते होंगे। उक्त फैक्ट्री के बारे में जो जानकारी आई  उसके अनुसार नियम विरुद्ध कार्य करने के कारण  उसे प्रशासन ने बंद कर दिया किंतु संभागायुक्त ने उक्त आदेश पर स्थगन आदेश जारी करते हुए फैक्ट्री खोलने की अनुमति दे दी। अब जबकि हादसे की खबर देश भर में फैल चुकी है । मुख्यमंत्री से लेकर  पूरा प्रशासन कड़ी कार्रवाई करने की घोषणा कर रहा है । पहले से ही जमानत पर चल रहे फैक्ट्री मालिक को दोबारा गिरफ्तार भी कर लिया गया। घायलों का इलाज हरदा और भोपाल के अस्पतालों में हो रहा है। भुगतान दिवस होने की वजह से बड़ी संख्या में मजदूर हादसे के समय फैक्ट्री में जमा थे। ऐसी आशंका है कि धमाकों में कुछ श्रमिकों का पूरा परिवार ही भस्म हो गया। फैक्ट्री का रिहायशी इलाके में होना भी स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। मुख्यमंत्री डा.मोहन यादव का ये कहना तो बिलकुल सही है कि दोषियों पर ऐसी कार्रवाई करेंगे कि दोबारा किसी की जुर्रत ऐसी गड़बड़ी करने की न हो। लेकिन हर बड़ी जानलेवा दुर्घटना के बाद दिखाई जाने वाली सख्ती यदि सही समय पर बरती जावे तो उनको रोका जा सकता है। हाल ही में गुना जिले में हुए बस हादसे में काफी संख्या में यात्रियों के मारे जाने के बाद भी मुख्यमंत्री ने परिवहन आयुक्त से लेकर जिले के तमाम अधिकारियों को हटा दिया । जांच शुरू होने के बाद जो तथ्य सामने आए वे प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार के साथ ही राजनेताओं और नौकरशाहों के  गठजोड़ को उजागर करने वाले थे। दुर्घटनाग्रस्त बस की हालत बेहद खराब थी। उसके बाद भी उसे चलाए जाने की अनुमति दी गई। बस मालिक सत्ताधारी पार्टी के नेता परिवार का होने से वह सम्भव हुआ होगा। उसके बाद पूरे प्रदेश में परिवहन महकमा सक्रिय हुआ। दो - चार दिनों तक जहां देखो वहां व्यवसायिक वाहनों की फिटनेस सहित अन्य  जांच कराने का नाटक हुआ । और उसके बाद सब कुछ ढर्रे पर लौट आया। गत वर्ष जबलपुर के एक निजी अस्पताल  में हुए अग्निकांड में अनेक लोग जान गंवा बैठे थे । उक्त  अस्पताल में एक ही निकासी द्वार  के अलावा आग बुझाने के समुचित इंतजाम नहीं थे। घटना के बाद शहर में फायर आडिट का अभियान चला। अनेक नए अस्पतालों और बहुमंजिला भवनों के निर्माण की अनुमति रोक ली गई। उसके पहले भोपाल के हमीदिया अस्पताल में भी आग लगने की घटना ने पूरे प्रदेश में हलचल मचा दी थी। उसके बाद भी अग्निशमन को लेकर प्रदेश भर में जांच का अभियान चला। लेकिन उसमें कितनी ईमानदारी रही ये हरदा के हादसे से सामने आ गया। बारूद के उपयोग से जुड़े  किसी भी व्यवसाय को रिहायशी इलाके में चलाए जाने की अनुमति देना अपराधिक उदासीनता ही कही जाएगी। उस दृष्टि से संभागायुक्त द्वारा बंद की जा चुकी फैक्ट्री को शुरू करने की अनुमति किस आधार पर दी गई वह सामने आना चाहिए । ऐसे काम केवल दो कारणों से होते हैं  जिनमें पहला राजनीतिक दबाव और दूसरा भ्रष्टाचार ,जो घूसखोरी की शक्ल में होता  है। हरदा  का हादसा एक तमाचा है प्रशासनिक व्यवस्था के निकम्मेपन पर । मुख्यमंत्री डा.यादव ने सत्ता संभालते ही अपने सख्त तेवर दिखाने शुरू कर दिए थे। गुना बस कांड के बाद हरदा अग्निकांड ने आपदा प्रबंधन की अग्रिम सावधानियों की असलियत का पर्दाफाश कर दिया है। मुख्यमंत्री को  प्रदेश भर के प्रशासनिक अधिकारियों को सख्त हिदायत देना चाहिए कि नियम विरुद्ध यदि इस तरह के व्यवसाय की जानकारी सामने आई तो संबंधित अधिकारी को  बराबर का दोषी माना जाएगा  । हरदा का हादसा हुआ ही इस वजह से कि  रिहायशी  इलाके में नियम विरुद्ध चलाई जा रही  पटाखा फैक्ट्री को सील करने के बाद दोबारा खोलने की अनुमति एक बड़े साहब ने दे दी। इसलिए ऐसे हादसों में उन नौकरशाहों को भी सह अभियुक्त बनाया जाना जरूरी हो गया है जो मौत के ऐसे मंजर पैदा करने में सहायक बनते हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 6 February 2024

मोदी के आक्रामक अंदाज के मुकाबले विपक्ष के पास रणनीति का अभाव


राष्ट्रपति के अभिभाषण के प्रति धन्यवाद प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर साल लंबा भाषण देते हुए विपक्ष पर जोरदार हमले करते हैं। ऐसा ही उन्होंने गत दिवस भी किया जिसमें सरकार की उपलब्धियों के बखान को आगामी लोकसभा चुनाव के  प्रचार के तौर पर देखा जा सकता है । अपनी चिर - परिचित शैली में उन्होंने कांग्रेस पर प्रहार में कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी और विपक्ष पर यहां तक ताना मारा कि अगले चुनाव में वह दर्शक दीर्घा में नजर आएगा। पिछले स्वाधीनता दिवस पर भी उन्होंने कहा था कि आगामी वर्ष भी वे ही लाल किले की प्राचीर पर ध्वजारोहण करेंगे। गत दिवस लोकसभा में उन्होंने वही आत्म विश्वास दोहराते हुए दावा किया कि 2024  में  भाजपा 370 और एनडीए 400 से ज्यादा सीटें जीतेगा। उन्होंने विपक्षी गठबंधन पर भी निशाना साधा। परिवारवाद पर श्री मोदी हमेशा से ही मुखर रहे हैं। लाल किले से दिए भाषण में भी उन्होंने इस पर हमला बोला था। वैसे भी प्रधानमंत्री काफी हौसले वाले इंसान हैं जो जय - पराजय में अपना संतुलन बनाए रखने के साथ ही अवसर को भुनाने में कभी पीछे नहीं रहते। राहुल गांधी की न्याय यात्रा के कारण कांग्रेस उसमें उलझी हुई है। वहीं दूसरी और नीतीश कुमार के अलग होने के अलावा ममता बैनर्जी के तेवरों से विपक्षी गठबंधन में बिखराव के आसार बढ़ रहे हैं । अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल भी कांग्रेस पर अपनी मर्जी थोपने पर अमादा हैं । इसका प्रभाव संसद में भी देखने मिल रहा है। उल्लेखनीय है 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले म.प्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनाव में भाजपा की पराजय ने मोदी सरकार की वापसी के प्रति आशंका उत्पन्न कर दी थी। लेकिन वह गलत साबित हो गई। उसके विपरीत इस बार उक्त तीनों राज्यों में भाजपा ने धमाकेदार अंदाज में वापसी करते हुए कांग्रेस का मनोबल तोड़ने में कामयाबी हासिल कर ली है। इसके अलावा इस बार प्रधानमंत्री के पास  उपलब्धियों का लंबा ब्यौरा है। 2014 में सत्ता में आने के बाद उन्होंने जिन योजनाओं और कार्यक्रमों को प्रारंभ किया था उनके प्रति जनविश्वास बढ़ा है। मोदी की गारंटी नामक  नया नारा  उसी आत्मविश्वास का परिचायक है जिसके बल पर वे 370 और 400 सीटों का दावा कर पा रहे हैं।  22 जनवरी को अयोध्या में निर्मित भव्य राम मंदिर में प्राण - प्रतिष्ठा के अवसर पर पूरे देश में जिस तरह से  हर्षोल्लास नजर आया वह भाजपा के पक्ष में वैसी ही लहर का संकेत दे रहा है जैसी 1984 में कांग्रेस के पक्ष में नजर आई थी । विपक्ष के अधिकांश दल भी इस बात को समझ चुके हैं कि कांग्रेस ने प्राण - प्रतिष्ठा समारोह की उपेक्षा कर बहुत बड़ी गलती कर डाली । और इसीलिए वे उससे छिटकने के संकेत दे रहे हैं। आज खबर आई कि उद्धव ठाकरे भी प्रधानमंत्री के विरुद्ध तीखी बयानबाजी से बचते हुए उनके साथ पुराने संबंधों का हवाला देते हुए सौजन्यता का प्रदर्शन करने लगे हैं। इन सबके कारण प्रधानमंत्री का मनोबल ऊंचा होना स्वाभाविक है। कोरोना काल में अर्थव्यवस्था को जो ग्रहण लगा था वह हट चुका है और भारत की विकास दर पूरी दुनिया को आकर्षित कर रही है। विदेशी मोर्चे पर भी हमारी स्थिति बेहद मजबूत है तथा श्री मोदी विश्व के सबसे लोकप्रिय लोकतांत्रिक शासक के तौर पर स्थापित हो चुके हैं। दुनिया के बड़े देश तक भारत के महत्व को स्वीकारने लगे हैं। सही बात तो ये है कि विपक्ष अपनी धार खोता चला जा रहा है। उसका गठबंधन कागज पर बने तो महीनों बीत गए किंतु न उसका कोई सर्वमान्य नेता है और न ही नीति। सीटों के बंटवारे को लेकर विभिन्न घटक दलों के बीच में जबरदस्त अविश्वास है । नीतीश कुमार के साथ छोड़ देने के बाद गठबंधन में कोई भी ऐसा नेता नहीं है जो सभी को एकजुट रख सके। मौजूदा  संसद का ये अंतिम सत्र है और इसमें भी विपक्ष सरकार को घेरने में सफल होता नहीं दिखता । ऐसा नहीं है कि उसके पास हमले करने लायक मुद्दे न हों किंतु आपसी समन्वय का अभाव और दिशाहीनता के कारण वह उसका लाभ नहीं  उठा पाता। होना तो ये चाहिए था कि श्री गांधी न्याय यात्रा को विराम देकर संसद में विपक्ष की तरफ से सरकार पर हमले की अगुआई करते। लेकिन उन्होंने इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया। बहरहाल विपक्ष में व्याप्त अव्यवस्था के बीच प्रधानमंत्री ने अपने चुनाव अभियान को पूरे जोर - शोर से शुरू कर दिया है। वे लगातार राज्यों का दौरा करते हुए विकास की नई योजनाओं की शुरुआत के जरिए मोदी की गारंटी के प्रति भरोसा बढ़ा रहे हैं। वहीं कांग्रेस सहित बाकी विपक्ष अभी तक अपनी रणनीति ही नहीं बना सका। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 5 February 2024

दूसरों को फंसाने फेंके जाल में खुद फंस गए केजरीवाल


दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी मंत्रीमंडलीय साथी आतिशी को नोटिस सौंपने के लिए उनके निवास पर  घंटों इंतजार करना पड़ा। पहले प्रयास में दोनों नेता घर पर नहीं मिले। और जब मिले तो नोटिस देने आए अधिकारियों को खरी - खोटी सुनाते हुए केंद्र सरकार पर आरोपों की झड़ी लगा दी।  इन दोनों ने  सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया था कि भाजपा द्वारा 25 - 25 करोड़ रु. में आम आदमी
पार्टी के विधायकों को खरीदने का प्रयास किया जा रहा है। इसके विरुद्ध भाजपा ने रिपोर्ट दर्ज करवाकर श्री केजरीवाल  और  आतिशी से ये बताने कहा कि विधायकों को खरीदने का प्रस्ताव देने वाला कौन था ? अब जबकि अपराध शाखा द्वारा दोनों को बाकायदा नोटिस भेजकर  विधायकों को 25 करोड़ रु . का प्रस्ताव देने वाले का नाम बताने कहा तब संवैधानिक पद पर विराजमान  नेताओं को अपने आरोप के पक्ष में प्रमाण देना चाहिए। लेकिन ऐसा करने के बजाय वे  केंद्र सरकार और भाजपा पर भड़ास निकालने में जुटे हैं। उनको आज नोटिस का जवाब देना है। इसके पहले शराब घोटाले में श्री केजरीवाल ईडी द्वारा अनेक  समन दिए जाने के बावजूद पूछताछ के लिए उपस्थित नहीं हुए और आए दिन अपनी गिरफ्तारी का शिगूफा छोड़ा करते हैं। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी ईडी के कई समन रद्दी की टोकरी में फेंक दिए किंतु आंख - मिचौली करते रहने के बाद अंततः वे उसके सामने पेश हुए और गिरफ्तार कर लिए गए। हो सकता है यदि वे पहले बुलावे पर ही जाकर अपना बयान देते तब ये नौबत नहीं आती। केजरीवाल जी भी यदि ईडी के अनेक बुलावे ठुकराने के बाद गिरफ्तार किए जाएं तो फिर उनके पास सहानुभूति अर्जित करने का अवसर भी नहीं रहेगा। ऐसे मामलों में एक बात और विचारणीय है कि मुख्यमंत्री और मंत्री पद पर विराजमान व्यक्ति संविधान की रक्षा और उसके पालन की शपथ लेने के उपरांत ही कुर्सी पर बैठता है। ऐसे में किसी वैधानिक जांच एजेंसी द्वारा पूछताछ हेतु बुलाए जाने पर उनका उपस्थित न होना एक दो मर्तबा तो व्यस्तता या अन्य किसी कारण से समझ में आता है , लेकिन छह - आठ समन के बाद भी  अवहेलना करना इस बात का प्रमाण  है कि कानून के प्रति उनके मन में तनिक भी सम्मान नहीं हैं। इन नेताओं को इस बात का जवाब देना चाहिए कि इनके मातहत कार्यरत कोई अधिकारी अथवा कर्मचारी इनके द्वारा बुलाए जाने पर  उपस्थित न हो तो क्या उसे ये बख्श देंगे ? अरविंद और आतिशी ने जब खुले आम अपने विधायकों को खरीदे जाने का आरोप भाजपा पर लगाया तो फिर संबंधित व्यक्ति की पहचान भी उनको स्पष्ट करना चाहिए थी। और फिर 25 करोड़ की राशि साधारण नहीं है अतः उनके द्वारा लगाया  आरोप  बेहद गंभीर है। जब भाजपा ने आरोपों की पुष्टि करवाने के लिए विधिवत कार्रवाई की तब ये उनका कानूनी दायित्व है कि वे उसको सत्य सिद्ध करें या उसका जो भी दंड हो उसको भुगतें। स्मरणीय है सत्ता में आने से पहले आम आदमी पार्टी की ओर से श्री केजरीवाल ने देश के सबसे भ्रष्ट नेताओं की सूची जारी की थी। उस पर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और स्व.अरुण जेटली सहित अनेक लोगों ने  मानहानि का प्रकरण दर्ज करवाया । ऐसा होते ही केजरीवाल जी की सारी हेकड़ी जाती रही और फिर वे उन सभी के सामने लिखित माफीनामा लेकर यह याचना करते दिखाई दिए कि प्रकरण वापिस ले लें । जिन लोगों से उन्होंने माफी मांगी उनमें विक्रम मजीठिया , श्री गडकरी , स्व.जेटली  और स्व. शीला दीक्षित जैसे अनेक दिग्गज रहे। सबसे रोचक बात ये है कि  कपिल सिब्बल से भी अरविंद ने माफी मांगी जो आजकल ऐसे नेताओं के बचाव में खड़े होते हैं। उनके माफीनामे पर  कांग्रेस नेता अजय माकन ने कटाक्ष भी किया था कि केजरीवाल को अपना नाम बदलकर माफीवाल कर लेना चाहिए । आम आदमी पार्टी के संयोजक आजकल उन तमाम नेताओं के साथ गठबंधन में शामिल हो रहे हैं जिन्हें वे भ्रष्टाचार का सिरमौर बताते रहे। हालांकि उनकी समूची राजनीति विरोधभासों और पलायनवाद पर टिकी रही किंतु इस प्रकरण में एक बार फिर उनके समक्ष  मुसीबत आ खड़ी हुई है। भाजपा पर उनकी पार्टी के विधायकों को 25 - 25 करोड़ में खरीदने का प्रस्ताव देने का आरोप  उनके गले में पड़ गया है। यदि उनके पास इसका कोई प्रमाण होता तो निश्चित रूप से वे अपराध शाखा का नोटिस लेने में विलंब नहीं करते और अब तक उन कथित लोगों के नाम सार्वजनिक कर चुके होते जिन्होंने विधायकों को खरीदने की पेशकश की थी। ऐसा लगता दूसरों को  फंसाने के लिए फेंके गए जाल में केजरीवाल एंड कंपनी खुद फंसती जा रही है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 3 February 2024

कांग्रेस न्याय यात्रा में व्यस्त : विपक्षी गठबंधन में सब अस्त व्यस्त


ऐसा लगता है इंडी नामक विपक्षी गठबंधन जंग में उतरने के पहले ही बिखराव की ओर बढ़ रहा है। राहुल गांधी की न्याय यात्रा भी इसे कमजोर करने का कारण बन रही है। अभी तक के संकेत गठबंधन और कांग्रेस दोनों के लिए अशुभ कहे जायेंगे। यात्रा के प. बंगाल में घुसते ही तृणमूल कांग्रेस नेत्री ममता बैनर्जी ने राज्य की सभी लोकसभा सीटों पर अकेले लड़ने की घोषणा कर दी।  वे इस बात से नाराज थीं कि  न्याय यात्रा के पूर्व  उनके आग्रह के बावजूद भी श्री गांधी ने उनसे फोन पर बात नहीं की। गत दिवस  सुश्री बैनर्जी का बयान आ गया कि कांग्रेस लोकसभा की 40  सीटें भी नहीं जीत सकेगी। उन्होंने  चुनौती दी कि यदि उसमें हिम्मत है तो वह भाजपा को वाराणसी और प्रयागराज में परास्त करके दिखाए। उन्होंने ये ताना भी मारा कि वह न जाने किस अहंकार में जी रही है। हालांकि वे काफी  पहले से ही राहुल और  कांग्रेस को अक्षम बता चुकी थीं।  विपक्षी मोर्चा बनने के बाद उन्होंने कांग्रेस से साफ कह दिया कि वे उसके लिए वही दो सीटें छोड़ेगी जिन पर 2019 में वह जीती थी। न्याय यात्रा से उनकी खुन्नस इसलिए भी बढ़ी क्योंकि उसमें वामपंथी शामिल हुए। नीतीश कुमार के पाला बदल लेने के बाद ममता ही इंडी की सबसे बड़ी नेता कही जा सकती हैं जिनका प.बंगाल के अलावा एक दो राज्यों में कुछ असर है। जहां तक बात तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन की है तो वे अपने राज्य के अलावा पांडिचेरी तक ही सिमटे  हैं। एनसीपी के दिग्गज  शरद पवार का करिश्मा भी ढलान पर है। भतीजे अजीत की बगावत के बाद  विपक्षी गठबंधन के बजाय उन्हें अपनी बेटी सुप्रिया सुले के राजनीतिक भविष्य की चिंता सताए जा रही है । कहा तो ये भी जा रहा है कि अजीत के भाजपा में जाने की योजना भी चाचा की  ही तैयार की हुई थी। देर - सवेर अपनी बेटी के  राजनीतिक भविष्य को सुरक्षा चक्र प्रदान करने के लिए वे भी श्री मोदी के मोहपाश में फंस जाएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। स्मरणीय है कि आज भले ही नीतीश कुमार को पलटूराम और ऐसे ही न जाने कितने विशेषणों से विभूषित किया जा रहा है परंतु राष्ट्रीय राजनीति में शरद पवार काफी पहले से  पाला बदलने और धोखा देने के लिए कुख्यात रहे हैं। मुख्यमंत्री बनने के लिए अपने राजनीतिक गुरु स्व.बसंत दादा पाटिल की पीठ में छुरा भौंकने में भी उन्होंने शर्म नहीं की। 1999 के लोकसभा चुनाव के पूर्व  सोनिया गांधी के विदेशी मूल को बहाना बनाकर उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा देकर एनसीपी बना ली।   लेकिन कुछ सालों बाद  कांग्रेस के करीब आकर डा.मनमोहन सिंह की सरकार में मंत्री भी बन गए।  इसीलिए वे  पूरी तरह अविश्वसनीय माने जाते हैं। ये सब देखते हुए इंडी की दशा और दिशा दोनों गड़बड़ाती दिख रही हैं । राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार विपक्षी गठबंधन के तमाम घटक जिस प्रकार अपनी ढपली अपना राग लेकर घूम रहे हैं वह उसके भविष्य को लेकर आशंकित कर रहा है। ममता के  सभी सीटों पर लड़ने के ऐलान के बाद जब राहुल ने सीटों के बंटवारे को लेकर बातचीत चलने जैसी टिप्पणी करते हुए उनकी नाराजगी दूर करना चाहा तो तृणमूल नेत्री ने कांग्रेस को 40 सीटें मिलने की भविष्यवाणी कर दूध में नींबू निचोड़ दिया। महाराष्ट्र में श्री पवार और उद्धव ठाकरे भी कांग्रेस को बड़ा भाई मानने राजी नहीं हो रहे। आम आदमी पार्टी ने पंजाब के बाद हरियाणा में भी अकेले लड़ने की धौंस दिखा दी। 22 जनवरी को अयोध्या स्थित राम मंदिर में मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर समूचे देश में जो स्वस्फूर्त वातावरण निर्मित हुआ उसने कांग्रेस को पिछले पैरों पर धकेल दिया । उक्त आयोजन का आमंत्रण मिलने के बावजूद उसमें शामिल नहीं होने के उसके  निर्णय को राजनीतिक विश्लेषक बहुत बड़ी गलती मान रहे हैं । यद्यपि श्री पवार और ममता सहित ज्यादातर विपक्षी नेता उस दिन अयोध्या नहीं गए किंतु पूरे देश में कांग्रेस जन जिस उत्साह के साथ राम नाम की माला जपते दिखे उसके बाद ये साफ हो गया कि पार्टी का सामान्य कार्यकर्ता ही नहीं अपितु नेतागण भी राम मंदिर निर्माण के कारण पैदा हुई हिन्दू लहर से भयाक्रांत हैं। आचार्य प्रमोद कृष्णम तो खुले आम पार्टी लाइन के विरुद्ध बोलते जा रहे हैं । और तो  और वे प्रधानमंत्री को अपने एक अयोजन का निमंत्रण पत्र देने उनसे भेंट तक कर आए। चौंकाने वाली बात ये है कि विपक्षी गठबंधन में आ रही दरारों को भरने की फुरसत किसी नेता को नहीं है। नीतीश कुमार इसमें सक्षम थे किंतु वे  खुद ही भाजपा की गोद में जा बैठे। पवार साहेब से अपना घर ही नहीं संभल रहा। जहां तक बात ममता की है तो उनके साथ किसी की पटरी नहीं बैठती। बच रहते हैं मल्लिकार्जुन खरगे तो अव्वल तो उनको कोई भाव देता नहीं है और वैसे भी उनका पूरा ध्यान न्याय यात्रा पर लगे रहने से वे विपक्षी एकता के लिए कुछ नहीं कर पा रहे। यदि कुछ दिन और ऐसा ही चला तब इस गठबंधन के छिन्न - भिन्न होने की आशंकाएं प्रबल होती चली जाएंगी।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 2 February 2024

अंतरिम बजट : सत्ता में वापसी के आत्मविश्वास का प्रमाण


वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गत दिवस लोकसभा में जो अंतरिम बजट पेश किया उसका सभी अपने - अपने तरीके से विश्लेषण कर रहे हैं। सत्ता पक्ष की नजर में ये समृद्ध भारत का घोषणापत्र है और इसका लाभ समाज के सभी वर्गों को मिलेगा । दूसरी तरफ विपक्ष स्वाभाविक रूप से उसकी आलोचना में जुटा है। ज्यादातर अर्थशास्त्रियों का मानना है मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का यह आखिरी बजट चूंकि महज कुछ महीनों के लिए है इसलिए सरकार के पास करने को ज्यादा कुछ नहीं था फिर भी गरीबों और महिलाओं से जुड़ी योजनाओं पर जोर देकर केंद्र सरकार ने लोकसभा चुनाव में लाभार्थी रूपी अपने वोट बैंक को पुख्ता करने का प्रयास बिना शोर मचाए किया है। इन्फ्रा स्ट्रक्चर का बजट बढ़ने से सीधा लाभ उद्योग - व्यापार को होगा और रोजगार के अवसर खुलेंगे। इसमें दो मत नहीं नरेंद्र मोदी चुनाव जीतने के घिसे - पिटे तरीकों को दोहराने में विश्वास नहीं रखते। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने विकास की जो ठोस बुनियाद रखी उसी के कारण भाजपा वहां अंगद के पैर की तरह जमी हुई है। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने गरीब कल्याण की जिन भी योजनाओं का ऐलान स्वाधीनता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से किया उनको कार्य रूप में परिणित करने की पूरी योजना पहले से तैयार होने से सकारात्मक परिणाम भी जल्द नजर आने लगे। शौचालय , स्वच्छता , उज्ज्वला , आवास , जल आपूर्ति , किसान कल्याण जैसी अनेक योजनाओं के सफल क्रियान्वयन के कारण प्रधानमंत्री की विश्वसनीयता न सिर्फ कायम रही अपितु उसमें निरंतर वृद्धि भी देखी जा सकती है। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर विकास की सही दिशा में देश को ले जाने में वे सफल हुए । इसीलिए मोदी की गारंटी अन्य सभी वायदों और घोषणापत्रों पर भारी पड़ जाती है। अंतरिम बजट से आम लोगों की जो अपेक्षा थी वह निश्चित रूप से पूरी नहीं हुई होगी किंतु प्रधानमंत्री जानते हैं कि किस बीमारी में कौन सी दवा कारगर है ? अपने राजनीतिक विरोधियों के पैंतरों को बेअसर करने की कला भी उन्हें भली - भांति आती है । इसीलिए कुछ दिनों से वे गरीब ,महिला , युवा और कारीगरों को चार जातियां बताकर इन्हीं के कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं। इसका लाभ भी भाजपा को हाल ही में संपन्न म.प्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में छप्पर फाड़कर मिला । श्रीमती सीतारमण के इस अंतरिम बजट में उक्त चारों वर्गों को केंद्रित किया गया है। दरअसल जातिवादी राजनीति करने वाले नेताओं को ये प्रधानमंत्री का जवाब है। वित्तमंत्री द्वारा जितनी भी बजट घोषणाएं की गईं उनका मकसद हर क्षेत्र में गतिशीलता लाना है । और यही संतुलित आर्थिक नीति है । राहुल लगभग रोजाना आरोप लगाते रहते हैं कि सारा पैसा कुछ उद्योगपतियों के पास जा रहा है किंतु वे भूल जाते हैं कि बीते दस वर्षों में देश ने इन्फ्रा स्ट्रक्चर के क्षेत्र में जो चमत्कारिक प्रगति की , उसके कारण समाज के प्रत्येक वर्ग को लाभ मिला है। सड़कों का जाल जिस तेजी के साथ बिछता जा रहा है उससे उद्योग जगत ही नहीं अपितु सामान्य जन भी लाभान्वित हुए क्योंकि जहां से राजमार्ग गुजरते हैं वहां के समीपवर्ती गांव , कस्बे और शहर की तकदीर चमक जाती है। प्रधानमंत्री आवास योजना निर्माण क्षेत्र को मंदी से उबारने साथ ही करोड़ों श्रमिकों को रोजगार देने में सहायक सिद्ध हुई। डायरेक्ट ट्रांसफर व्यवस्था के कारण लाभार्थियों के खाते में पैसा आने से उनकी क्रय शक्ति भी बढ़ी जिसने उपभोक्ता बाजार को संबल दिया। जी.एस.टी के संग्रह में प्रति माह हो रही वृद्धि बाजार में आई रौनक का जीवंत प्रमाण है। दुनिया का सबसे बड़ा मोबाइल बाजार तो भारत है ही , इंटरनेट के उपयोग में भी हम किसी विकसित देश से पीछे नहीं हैं। यथार्थ ये है कि मोदी सरकार ने अर्थव्यस्था को सीमित दायरे से निकालकर बहुमुखी विस्तार दिया जिसका लाभ अब नजर आने लगा है। रक्षा और ग्रामीण विकास पर खर्च बढ़ाए जाने से एक तरफ जहां देश का सुरक्षा तंत्र मजबूत हुआ वहीं दूसरी तरफ कृषि उत्पादन में जबरदस्त वृद्धि होने से भारत आयातक के बजाय निर्यातक बनने की स्थिति में आ गया। चंद्रयान सरीखे अभियान की सफलता ने जहां देश की गौरव पताका को अंतरिक्ष की ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया वहीं हर गांव तक सड़क , बिजली और पीने के पानी जैसी मूलभूत सुविधा के पहुंचने से ग्रामीण भारत की शक्ल ही बदल गई। इसी आधार पर ये उम्मीद जताई जाने लगी है कि आगामी लोकसभा चुनाव में मोदी सरकार के वापस लौटने की संभावना बढ़ती जा रही है। अंतरिम बजट में खैरातों की बौछार न होने का कारण भी यही आत्मविश्वास है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Thursday, 1 February 2024

देश के प्रत्येक नागरिक को मिले आयुष्मान भारत योजना का लाभ



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गरीब कल्याण कार्यक्रमों के अंतर्गत आयुष्मान भारत नामक जो योजना शुरू की गई उसने देश के करोड़ों साधनहीन लोगों को अस्पताल के कमर तोड़ खर्च से राहत दिलवाई है। इसके अंतर्गत सूचीबद्ध निजी अस्पतालों में भी पांच लाख रुपए तक का इलाज बिना नगद भुगतान किए होने लगा है । इसकी वजह से अव्वल तो सरकारी अस्पतालों में इलाज की झंझट से मुक्ति मिली , दूसरी साधनों के अभाव में  जो मरीज अपनी चिकित्सा विशेष रूप से शल्य क्रिया करवाने में पीछे हट जाते थे , वे भी अब चिकित्सक की सलाह मिलते ही समुचित इलाज करवाने का साहस जुटा लेते हैं। यद्यपि इस योजना के क्रियान्वयन में भी जबरदस्त भ्रष्टाचार होता है। देश के सैकड़ों  निजी अस्पतालों द्वारा फर्जी बिल बनाए जाने के मामले सामने आए। कई जगह तो बिना मरीज को भर्ती किए ही उसका महंगा इलाज करवाए जाने की औपचारिकता का निर्वहन कर सरकार से अवैध वसूली की गई। इस मामले में अनेक चिकित्सक और अस्पताल संचालक गिरफ्तार भी हुए । ये देखते हुए कहा जा सकता है  कि इस योजना का लाभ आम जनता से ज्यादा चिकित्सा माफिया द्वारा उठाया जाता है। जब सरकार की तरफ से कड़ाई की गई तो अनेक निजी अस्पतालों ने आयुष्मान योजना के मरीजों को भरती करने से मना कर दिया या फिर उनसे अग्रिम भुगतान की मांग की जाने लगी। मरीज की अज्ञानता का बेजा लाभ उठाते हुए बढ़ा - चढ़ाकर बिल बनाने का गोरख धंधा तो केंद्र सरकार की कर्मचारियों के लिए संचालित सी.जी. एच. एस में भी होता आया है। ये देखते हुए आयुष्मान योजना में होने वाले भ्रष्टाचार के कारण उसकी उपयोगिता पर सवाल उठने के बावजूद उसकी जरूरत से कोई इंकार नहीं कर सकता । उसके क्रियान्वयन में जो विसंगतियां हैं उन्हें अवश्य दूर किया जाना चाहिए जिससे कि सरकार जो धन इस योजना पर खर्च कर रही है वह मरीज की चिकित्सा पर खर्च हो , न कि बिचौलियों की जेब में जाए। उससे भी बढ़कर अब जरूरत है इस योजना का विस्तार करने की क्योंकि गरीबों के अलावा कम आय वाला बहुत बड़ा वर्ग है जिसके लिए महंगा इलाज करवाना सपने में भी संभव नहीं है। सरकारी अस्पतालों में चूंकि भारी भीड़ होने के अलावा अव्यवस्था का बोलबाला रहता  है इसलिए लोग वहां जाने से कतराते हैं। ये भी सही है कि स्वास्थ्य के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ने के कारण लोग निजी अस्पतालों में जाने लगे हैं। संपन्न वर्ग के जो लोग अपना चिकित्सा बीमा करवा लेते हैं उनके पास तो  सुरक्षा चक्र होता है किंतु बीमा विहीन वह वर्ग जिसे शासन या अन्य किसी माध्यम से इलाज हेतु मदद नहीं मिल पाती उसके लिए चिकित्सा खर्च वहन करना मुश्किल होता है। ये कहना भी गलत न होगा कि चुनिंदा निजी अस्पतालों द्वारा प्रदान की जाने वाली अत्याधुनिक चिकित्सा का खर्च ज्यादा होने से मरीज और उसके परिजन खून के आंसू रोने मजबूर हो जाते हैं। ये बात भी कही जा सकती है कि चिकित्सा अब मिशन और मानवीयता से ऊपर उठकर व्यवसायिकता के मकड़ जाल में उलझकर संवेदनशीलता खो बैठी है। यद्यपि आज भी अनेक चिकित्सक और निजी अस्पताल हैं जो चिकित्सा को व्यवसाय के बजाय मानव सेवा का माध्यम मानकर कार्य करते हैं। टाटा मेमोरियल जैसे संस्थान भी हैं जो इस क्षेत्र में आदर्श कहे जा सकते हैं। विभिन्न न्यासों द्वारा संचालित निजी अस्पताल भी पेशे की पवित्रता के बारे में समर्पित और प्रतिबद्ध हैं। लेकिन 135 करोड़ से भी ज्यादा के आबादी वाले देश में आर्थिक ही नहीं अपितु सामाजिक और शैक्षणिक विषमताओं के कारण चिकित्सा का बढ़ता खर्च बड़ी समस्या बन गया है। ये देखते हुए मोदी सरकार से जन अपेक्षा है कि गरीबों के अलावा भी देश के प्रत्येक नागरिक को चिकित्सा बीमा जैसी सुविधा प्रदान की जाए। आशय ये है कि खाद्यान्न सुरक्षा की तरह ही चिकित्सा सुविधा हर उस व्यक्ति को प्राप्त हो जिसको उसकी जरूरत हो। हालांकि इतना बड़ा कदम उठाने पर सरकार पर जबरदस्त आर्थिक बोझ  आएगा किंतु देश यदि आर्थिक समृद्धि की और बढ़ रहा है तो फिर उसके प्रत्येक नागरिक की चिकित्सा का दायित्व सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए। जो सरकार करोड़ों लोगों को मुफ्त गल्ला तथा आवास दे सकती है और मुफ्त और सस्ती बिजली के अलावा विभिन्न नामों के साथ अनेक कल्याणकारी योजनाएं संचालित कर रही है ,  वह सभी नागरिकों की चिकित्सा की जिम्मेदारी भी ले सकती है। समृद्ध भारत की कल्पना , बिना स्वस्थ नागरिकों के संभव नहीं है। मोदी सरकार ने अपने 10 वर्ष के कार्यकाल में जिस तरह की जनकल्याणकारी योजनाओं को सफलता के साथ लागू किया उसे देखते हुए आयुष्मान भारत योजना का विस्तार करते हुए देश के प्रत्येक नागरिक को उसमें शामिल किया जाना समय की मांग है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी