Thursday, 15 February 2024

उच्च सदन की उच्चता बनाए रखना अपेक्षित भी है और आवश्यक भी


म.प्र सहित अनेक राज्यों से राज्यसभा उम्मीदवारों के नाम सामने आ गए हैं। इस चुनाव में विभिन्न पार्टियां अपने संख्याबल के मुताबिक प्रत्याशी उतारती हैं। जिस पार्टी के पास  निर्धारित कोटे से अधिक मत होते हैं वह या तो दूसरी पार्टी में सेंध लगाकर अपने अतिरिक्त प्रत्याशी को जिताने का प्रयास करती है या  किसी धनकुबेर या अन्य हस्ती के साथ सौदेबाजी कर लेती है। राज्यसभा संसद का स्थायी सदन है। इसे उच्च सदन भी कहा जाता है । इसका गठन उन लोगों के लिए किया गया था जो पूर्णकालिक राजनीति तो नहीं करते किंतु देश को उनके योगदान की ज़रूरत होती है। ऐसे लोग चूंकि चुनाव लड़ना पसंद नहीं करते और लड़ते भी हैं तो जीत नहीं पाते ,  लिहाजा विभिन्न पार्टियां अपनी पसंद के इन लोगों को राज्यसभा में लाती हैं। कुछ विशिष्ट गैर राजनीतिक हस्तियों को राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत भी किया जाता है।  राज्यसभा सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है । बीते एक - दो दिनों में जिन उम्मीदवारों के नाम सामने आए उनमें कांग्रेस नेत्री सोनिया गांधी और भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा भी हैं। सपा ने फिल्म अभिनेत्री जया बच्चन को फिर अवसर दिया तो भाजपा ने महाराष्ट्र में कांग्रेस से दो दिन पहले आए अशोक चव्हाण को प्रत्याशी बना दिया । म.प्र में केंद्रीय मंत्री डा.मुरुगन भी भाजपा की सूची में है जो मूलतः तमिलनाडु के हैं किंतु वहां भाजपा के पास आवश्यक  संख्या बल न होने से उन्हें दूसरी बार यहां से राज्यसभा भेजा जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस द्वारा सागरिका घोष नामक महिला पत्रकार को उच्च सदन भेजने की जानकारी भी आई जो प्रख्यात पत्रकार राजदीप सरदेसाई की धर्मपत्नी हैं। कुछ केंद्रीय मंत्री भी उनके मूल राज्य की बजाय अन्य राज्य से उतारे जा रहे हैं। लेकिन इससे हटकर प्रश्न ये है कि राज्यसभा जिस उद्देश्य के लिए बनाई गई थी , क्या प्रत्याशी चयन करते समय राजनीतिक पार्टियां उसका ध्यान रखती हैं ? अभी तक जो नाम विभिन्न पार्टियों के सामने आए हैं उनमें से अनेक ऐसे हैं जो सिर्फ इसलिए नहीं चौंकाते क्योंकि वे अनजान चेहरे हैं या सक्रिय राजनीति से उनका वास्ता नहीं बल्कि इसलिए क्योंकि उनका कृतित्व इस सदन के अपेक्षित मापदंड के  मुताबिक अपर्याप्त  लगता है। समाज के पिछड़े , वंचित और दलित वर्ग के ऐसे लोगों को राज्यसभा में लाना तो समझ में आता है जो भले ही प्रचार से दूर रहकर समाज की भलाई हेतु कार्य करते रहे हों , परंतु राजनीतिक सौदेबाजी और जातिगत वोटबैंक को साधने के लिए किसी को उच्च सदन में लाना औचित्यहीन है। देश की राजनीति चूंकि जाति के जंजाल में बुरी तरह उलझकर रह गई है इसलिए प्रत्येक राजनीतिक दल के भीतर जाति आधारित दबाव समूह बन गए हैं । अनेक ऐसे व्यक्तियों को , जिनके नाम और उपनाम से भले पता न चले परंतु उम्मीदवार बनाने के साथ ही उनकी जाति की जानकारी दे दी जाती है। ऐसा करने से उस जाति विशेष के लोग खुश होते हों किंतु राज्यसभा सांसद बन जाने के बाद व्यक्ति पर जाति की छाप लगने से अन्य वर्ग उससे छिटकने लगते हैं । ये देखते हुए बेहतर होगा राजनीतिक दल यदि पिछड़े ,  दलित या आदिवासी वर्ग के किसी उम्मीदवार को मैदान में उतारते हैं तो जाति के बजाय उसके सामाजिक योगदान का उल्लेख होना चाहिए। मौजूदा  केंद्र सरकार द्वारा पद्म पुरस्कारों के लिए अनेक ऐसे गुमनाम व्यक्तियों का चयन किया गया जो चुपचाप समाज की बेहतरी के लिए काम करते रहे।  लेकिन उनकी जाति या समुदाय का बखान न करते हुए केवल उनके कारनामों को प्रचारित करने से उनके प्रति स्वप्रेरित सम्मान उत्पन्न होता है। इसी तरह राज्यसभा के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा जिन उम्मीदवारों का चयन किया जाता है उनकी जाति की बजाय राजनीति के अलावा भी सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान को  प्रचारित किया जाए तो वे सीमित दायरे से निकलकर पूरे समाज के लिए सम्मानित बन सकते हैं। जाति के नाम पर चल रहे क्षेत्रीय दलों से तो इस बारे में कोई अपेक्षा करना व्यर्थ है किंतु भाजपा और कांग्रेस को तो कम से कम उम्मीदवारों की जाति के बजाय  शैक्षणिक और पेशेवर योग्यता के अलावा सामाजिक जीवन में योगदान को चयन का आधार बनाना चाहिए। समय आ गया है जब लोकसभा और राज्यसभा के स्वरूप में अंतर स्पष्ट नजर आए। संसद के उच्च सदन की उच्चता बनाए रखना संवैधानिक दृष्टि से अपेक्षित ही नहीं आवश्यक भी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 14 February 2024

अबू धाबी में हिन्दू मंदिर का शुभारंभ राष्ट्रीय गौरव का विषय



अबू धाबी में स्वामीनारायण संप्रदाय के  भव्य मंदिर का आज शुभारंभ हो रहा है। प्रधानमंत्री इस आयोजन के लिए गत दिवस वहां पहुंच गए। उन्होंने इस बारे में जो जानकारी दी वह सुनकर वाकई सुखद आश्चर्य हुआ क्योंकि संयुक्त अरब अमीरात में हिन्दू धर्म के अनुसार सार्वजनिक रूप से पूजा - पाठ विशेष रूप से मूर्ति पूजा की अनुमति नहीं थी। लेकिन बीते कुछ दशकों में कुछ छोटे - छोटे देशों के इस समूह में भारतीयों की संख्या जिस तेजी से बढ़ी उसने उन्हें अमीरात की जरूरत बना दिया। ये कहना गलत नहीं है कि यदि ये भारतीय वापस आ जाएं तो वहां की व्यवस्था गड़बड़ा जायेगी। व्यवसायी वर्ग के अतिरिक्त भी दुबई और अबूधाबी में श्रमिक , तकनीशियन , ड्राइवर जैसे कामों में भारतीय बड़ी संख्या में कार्यरत हैं। इनके अलावा इन्फ्रा स्ट्रक्चर के कार्यों में भी भारतीय कंपनियों की काफी सहभागिता है। भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच आपसी व्यापार भी लगातार बढ़ता जा रहा है। भारत से लाखों सैलानी हर साल दुबई  जाते हैं। इस प्रकार संयुक्त अरब अमीरात के साथ हमारे रिश्ते व्यापार और कूटनीति से ऊपर भावनात्मक स्तर पर पहुंच गए हैं। आज जिस मंदिर का शुभारंभ हो रहा है उसके लिए अबू धाबी के शासक ने बड़ी ही उदारता से भूमि प्रदान की जो किसी इस्लामिक देश में कल्पनातीत  है। इसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया जाना पूरी तरह सही होगा क्योंकि उन्होंने अपने दस वर्ष के कार्यकाल में  संयुक्त अरब अमीरात के शाही परिवारों से आत्मीय रिश्ते बना लिए। यही वजह है कि पाकिस्तान और भारत के बीच किसी भी प्रकार के विवाद की स्थिति में वे हमारे पक्ष में खड़े नजर आए। निश्चित रूप से इसके पीछे उन लाखों भारतीयों का भी योगदान है जिन्होंने  अपने परिश्रम और सदाचरण से वहां की सरकार और समाज का विश्वास अर्जित किया। दुनिया के अनेक देशों में स्वामी नारायण संप्रदाय के भव्य मंदिर बने हैं किंतु अबूधाबी का यह मंदिर उन लोगों के मुंह पर तमाचा है जो भारत में मंदिर बनाए जाने पर नाक सिकोड़ते हैं। इसी के साथ ये मुस्लिम कट्टरपंथियों के लिए भी सबक है जो अतीत में मंदिरों को तोड़कर बनाई गई मस्जिदों पर हिंदुओं के दावे को स्वीकार करने की सौजन्यता दिखाने के बजाय उसमें अड़ंगे लगाया करते हैं।  अयोध्या में गत 22 जनवरी को राममंदिर के शुभारंभ के अवसर पर समूचे विश्व के सनातन प्रेमियों ने हर्षोल्लास मनाया किंतु मुस्लिम समाज का बड़ा वर्ग  कोपभवन में बैठा रहा। उसके प्रवक्ता भी अपनी खीझ व्यक्त करने से बाज नहीं आए। बाबरी ढांचे को दोबारा खड़ी करने जैसी डींगें भी हांकी गईं। पाकिस्तान ने भी राममंदिर के निर्माण को लेकर बकवास करते हुए भारत के मुसलमानों को भड़काने  के उद्देश्य से बयान जारी किए। यहां तक कि संरासंघ तक में शिकायत की। लेकिन अबूधाबी के मुस्लिम शासकों द्वारा प्रदत्त 27 एकड़ के भूखंड पर  बना यह मंदिर इस्लामिक कट्टरपंथियों के लिए जबरदस्त संदेश है। हालांकि सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर अनेक प्रतिक्रियाओं में संयुक्त अरब अमीरात के हुक्मरानों की  आलोचना करते हुए कहा जा रहा है कि अरब की धरती पर हिन्दू मंदिर के निर्माण की अनुमति विनाश की शुरुआत है। किसी ने यहां तक टिप्पणी कर डाली कि ऐसा लगता है जैसे इस्लामिक जगत में भी हिंदुत्व को स्वीकार किया जाने लगा है। लेकिन इस मंदिर का विरोध करने वाले  कट्टरपंथियों को ये सोचना चाहिए कि  सारी दुनिया में आतंकवाद के कारण मुस्लिमों को संदेह की नजर से देखा जाता है । यूरोप के जिन देशों ने सीरिया संकट के बाद अरब देशों से भाग कर आए लोगों को मानवीय आधार पर शरण दी वे आतंकवाद का दंश भोगने के बाद अब उनको निकाल बाहर करने की सोचने लगे हैं। दूसरी तरफ  दुनिया भर में फैले हिंदुओं के साथ ऐसी समस्या उत्पन्न नहीं हुई । अबू धाबी में बना मंदिर उनकी इसी साख का प्रमाण है । वैसे तो इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे इस्लामिक देशों में भी हिन्दू मंदिर प्राचीनकाल से हैं परंतु किसी अरब देश में इतना भव्य नया मंदिर बनना भारत की कूटनीतिक से अधिक सांस्कृतिक विजय है । संयुक्त अरब अमीरात ने  इस्लामिक कानून से चलने वाली सत्ता होने के बावजूद अपने देश को विकास के रास्ते पर आगे बढ़ाने हेतु उदारवादी रवैया दिखाते हुए पूरी दुनिया से लोगों को वहां आकर काम करने और कमाने का  अवसर दिया। लेकिन हिन्दू मंदिर बनाने के लिए पहले अनुमति और फिर भूमि प्रदान करना इस बात का प्रमाण है कि वहां के शासक भारत और भारतीयों के महत्व को महसूस कर उनके प्रति सम्मान का भाव रखते हैं। इस मंदिर को इसीलिए धर्म विशेष से न जोड़कर राष्ट्रीय गौरव के तौर पर देखा जाना चाहिए। 
 

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Tuesday, 13 February 2024

भारत की शानदार कूटनीतिक सफलता


कतर में जासूसी के आरोप में गिरफ्तार 8 पूर्व भारतीय नौसेना अधिकारियों को अगस्त 2022 में  गिरफ्तार करने के बाद गत वर्ष अक्टूबर में मृत्युदंड दिए जाने की जानकारी आई तो परिवारजनों के अलावा पूरा देश चिंता में पड़ गया। केंद्र सरकार पर जनता और विपक्ष का दबाव भी आने लगा। इसके बाद बिना शोर मचाए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रयास शुरू किए। पहली सफलता मृत्यदंड को आजीवन कारावास में बदले जाने के तौर पर मिली। उसके बाद  विदेश मंत्री एस.जयशंकर , राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और कतर में रह चुके प्रधानमंत्री कार्यालय में पदस्थ विदेश सेवा के एक पूर्व अधिकारी द्वारा बनाई कार्ययोजना के कारण कतर के अमीर द्वारा उक्त सभी को माफी दे दी गई और कल वे भारत लौट भी आए। समूचे अभियान को जिस कुशलता से संचालित किया गया वह परिपक्व कूटनीति का शानदार उदाहरण है। 135 करोड़ की आबादी वाले देश के कुछ नागरिकों की जान किसी अन्य देश में संकट में पड़ने पर सामान्य दृष्टि से सरकार उसे प्रतिष्ठा का विषय बनाए ये जरूरी नहीं लगता । लेकिन सही सोच ये है कि देश के बाहर रह रहे हर भारतीय  की चिंता करना सरकार का कर्तव्य है। जो पूर्व नौसेना अधिकारी कतर में गिरफ्तार हुए वे पेशेवर अपराधी नहीं थे। एक निजी कम्पनी के लिए वहां काम करने के दौरान वे किसी गलतफहमी वश ही गिरफ्तार हुए होंगे। कतर में इस्लामिक कानून लागू होने से बेहद सख्ती है। लेकिन भारत सरकार की प्रशंसा करनी होगी जिसके प्रयासों से उनको फांसी के तख्ते से सुरक्षित वापस लाया जा  सका । देखने में भले ये छोटी सी बात लगे किंतु इससे भारत की प्रतिष्ठा के साथ ही कूटनीतिक वजनदारी भी प्रमाणित हुई और आम भारतीय का आत्मविश्वास भी बढ़ा है। प्रधानमंत्री और उनके नेतृत्व में कार्यरत सभी लोग इस कामयाबी के लिए अभिनंदन के पात्र हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

म.प्र का अंतरिम बजट : मोहन सरकार की अच्छी शुरुआत


म.प्र की डा. मोहन यादव सरकार ने गत दिवस 1 अप्रैल से 31 जुलाई तक की अवधि के लिए रु.1,45,229 करोड़ का अंतरिम बजट प्रस्तुत किया। हालांकि प्रदेश सरकार चाहती तो वित्तीय वर्ष 2024 - 25 के लिए पूर्ण बजट भी ला सकती थी।लेकिन लोकसभा चुनाव नजदीक होने की वजह से  चूंकि केंद्र सरकार द्वारा भी अंतरिम बजट पेश किया गया इसीलिए म.प्र सरकार को भी वैसा ही करना पड़ा । दरअसल  केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को विभिन्न मदों में दी जाने वाली राशि का प्रावधान पूर्ण बजट में ही किया जाएगा । ऐसे में इस अंतरिम बजट को चार माह तक के लिए तदर्थ व्यवस्था के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। लेकिन ये  बजट पूरे साल के प्रारंभिक एक तिहाई हिस्से को प्रभावित करने वाला है इसलिए इसकी समीक्षा करना औचित्यपूर्ण है। विशेष रूप से इसलिए भी क्योंकि मुख्यमंत्री डा.यादव की सरकार का यह प्रथम बजट होने से उनकी आर्थिक नीतियों का एहसास करवाने वाला है। उस दृष्टि से देखें तो इस बजट पर मोदी की गारंटी के साथ ही विधानसभा चुनाव में भाजपा द्वारा पेश किए संकल्प पत्र की छाया स्पष्ट तौर पर दिखाई देती है। लाड़ली बहना योजना को जारी रखने के बारे में विपक्ष शुरू से संदेह जताता रहा है। लेकिन मोहन सरकार ने लगातार दो महीनों से 10 तारीख को उक्त योजना की राशि लाभार्थी महिलाओं के खाते में जमा करवाकर विपक्ष के प्रचार को गलत साबित कर दिया । साथ ही अंतरिम बजट से इस बात की पुष्टि कर दी कि शिवराज सरकार द्वारा प्रारंभ जनकल्याण की सभी योजनाएं जारी रहेंगी। इसी के साथ ही केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा स्वीकृत सभी जनहितैषी और विकास संबंधी योजनाओं पर प्रदेश में अमल लिए जाने का प्रावधान भी किया गया है। इसमें दो राय नहीं हैं कि म.प्र पर काफी कर्ज है । इसके बाद भी सरकार ने  86 हजार करोड़ कर्ज लेने का इरादा जताया है जो निश्चित तौर पर चिंता का कारण है। प्रदेश सरकार को इस बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। भले ही ऋण , रिजर्व बैंक द्वारा स्वीकृत सीमा के भीतर हो किंतु उसके ब्याज की अदायगी का बोझ अंततः प्रदेश के विकास को प्रभावित करता है। इस अंतरिम बजट की सबसे अच्छी बात ये है कि इसमें यदि किसी नई योजना की घोषणा नहीं की गई तो नया कर भी नहीं लगाया गया। हालांकि विपक्ष ने इसे निराशजनक बताया है किंतु वर्तमान हालात में वित्तमंत्री का दायित्व संभाल रहे उप मुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा इससे बेहतर और कुछ नहीं कर सकते थे। संक्षेप में कहें तो म.प्र का अंतरिम बजट प्रधानमंत्री द्वारा वर्णित  गरीब, युवा ,महिला और किसान नामक चार जातियों पर केंद्रित है। इसलिए डा.मोहन यादव सरकार की अच्छी शुरुआत कहना हर दृष्टि से सही होगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 12 February 2024

मुस्लिम समाज को प्रशांत किशोर की बात को गंभीरता से लेना चाहिए


चुनाव विश्लेषक से राजनेता बनने की ओर बढ़ रहे प्रशांत किशोर बिहार में घूम - घूमकर जनता से सीधा संपर्क कर रहे हैं। राजनीति और राजनेताओं के बारे में बेबाक विचार व्यक्त करने में भी वे परहेज नहीं करते। उनके साक्षात्कार समाचार माध्यमों में छाए रहते हैं। 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर श्री किशोर प्रकाश में आए जिन्होंने भाजपा की रणनीति बनाई थी। लेकिन ज्यादा दिनों तक ये रिश्ता नहीं चला और कुछ माह बाद हुए बिहार विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार    का दामन पकड़ा और उनका चुनाव अभियान संचालित कर उन्हें जितवाने में मुख्य भूमिका निभाई। वे मुख्यमंत्री के सलाहकार और जनता दल (यू) में भी शामिल हुए किंतु वहां भी पटरी नहीं बैठी तो फिर चुनाव रणनीतिकार बनकर ममता बैनर्जी के अभियान में शामिल होकर उनको जबरदस्त जीत दिलवाई । इसके अलावा भी कुछ राज्यों में विभिन्न पार्टियों को सेवाएं देते रहे किंतु बीते एक दो सालों से जन सुराज अभियान नामक संगठन बनाकर बिहार के कोने - कोने में घूमकर लोगों को व्यवस्था की बुराइयों के साथ उनके कर्तव्यों का स्मरण करवा रहे हैं । देर सवेर राजनीतिक दल बनाकर चुनाव मैदान में उतरने का भी इरादा वे व्यक्त कर चुके हैं। इसी सिलसिले में उन्होंने मुस्लिम समुदाय के बीच कुछ ऐसी बातें कहीं जो निश्चित रूप से आंखें खोलने वाली हैं। उन्होंने साफ तौर पर ये कहा कि मुस्लिमों की वर्तमान दुरावस्था का कारण  भाजपा नहीं हैं । ये कहना भी गलत होगा कि उनको लालू या अन्य भाजपा विरोधी संगठनों ने ठगा है।  असलियत ये है कि मुसलमानों ने अपने रहनुमा चुनने में भारी भूल की जिसका खामियाजा वे भुगत रहे हैं। उन्होंने याद दिलाया कि मोहम्मद पैगंबर साहब ने  नसीहत दी थी कि जिस कौम को अपने रहनुमाओं की समझ न हो वह मुसीबत में फंसती है। उनके कहने का आशय ये था कि मुसलमानों में डर पैदा करने वाली पार्टियों ने उनके वोट तो जमकर बटोरे लेकिन उनकी भलाई के बारे में नहीं सोचा। यही बात असदुद्दीन ओवैसी भी अक्सर कहा करते हैं कि मुसलमानों को कांग्रेस , सपा और राजद जैसे दलों का पिछलग्गू बनने की बजाय अपना स्वयं का नेतृत्व विकसित करना चाहिये जो उनकी स्थिति का आकलन करते हुए उनकी जरूरतों को जमीनी स्तर पर समझकर पूरा करे। ये बात बिलकुल सही है कि आजादी के 76 साल बाद भी मुसलमान मुख्यधारा से अलग - थलग बने हुए हैं। उनके बीच से राजनीतिक नेता तो बहुत सारे निकले किंतु उनका अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं बन सका। कहने को तो देश के राष्ट्रपति के अलावा केंद्र तथा राज्यों में तमाम मंत्री मुस्लिम समाज से बने । उच्च और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायपालिका के उच्च पदों पर  भी अनेक मुस्लिम आसीन रहे। कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी मुस्लिम समाज से बड़ी - बड़ी हस्तियां निकलीं किंतु राजनीतिक नेतृत्व की अग्रिम पंक्ति में उन्हें स्थान नहीं मिला। जिन राजनीतिक दलों ने उनका हितचिंतक बनने का दिखावा किया उनका स्वार्थ केवल उनके वोट कबाड़ने तक सीमित रहा।।बाबरी कांड के बाद  कांग्रेस से नाराज होकर मुस्लिम समुदाय ने मुलायम ,  लालू , ममता और पवार जैसे नेताओं को अपना भाग्यविधाता बनाया । इन नेताओं ने मुसलमानों के मन में रास्वसंघ और भाजपा के विरुद्ध जहर तो खूब भरा लेकिन उनके सामाजिक , शैक्षणिक और आर्थिक विकास की दिशा में ऐसा कुछ भी नहीं किया जिससे वे बदहाली से बाहर आ पाते। उल्टे उन्हें और धर्मांध बनाकर मुल्ला या मौलवियों की मानसिक गुलामी करने की ओर धकेल दिया। नतीजा ये हुआ कि मुसलमान राजनीति का मोहरा बनकर किनारे लगा दिया गया। मुस्लिम वोट बैंक कभी जीत की गारंटी हुआ करता था किंतु उत्तरप्रदेश सहित अनेक राज्यों में हुए चुनावों में मुसलमानों की गोलबंदी भी बेअसर साबित होने लगी है। इसका कारण हिंदुओं का ध्रुवीकरण है। इसीलिए अब कांग्रेस जैसी पार्टी भी खुद को हिंदू हितचिंतक साबित करने में लगी है। अरविंद केजरीवाल मंच से हनुमान चालीसा और ममता बैनर्जी चंडी पाठ करते हुए खुद को हिंदू दिखाने का दावा करती हैं । राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा मंदिरों में जाकर पूजा - पाठ करते फोटो प्रचारित करते दिखाई देते हैं। कमलनाथ ने खुद को हनुमान भक्त घोषित कर रखा है।  सभी को समझ आ रहा है कि अब हिंदुत्व ही राजनीतिक सफलता का  मूल मंत्र है। इसके लिए मुस्लिमों को महज वोट बैंक बनाकर रखने  वाले राजनेता ही जिम्मेदार हैं । प्रशांत किशोर ने मुस्लिम समाज को इन्हीं से बचने की समझाइश दी है। हालांकि मुसलमानों में भी अब  एक वर्ग ऐसा  हो गया है जो इस्लाम के नाम पर उन्हें मुख्य धारा से अलग किए जाने के  षडयंत्र को समझकर उसके विरुद्ध सोचने और बोलने लगा है किंतु अधिकांश मुस्लिम समाज अभी भी मुल्लाओं और मौलवियों के इशारों पर नाचता देखा जा सकता है। यहां तक कि अनेक पढ़े - लिखे मुसलमान भी धर्मांधता के शिकंजे में फंसे हुए हैं। श्री किशोर चूंकि बिना लाग - लपेट के बात करते हैं इसलिए उन्होंने साफ शब्दों में मुस्लिम समाज को समयानुकूल सलाह दे डाली। उनका जुड़ाव किसी पार्टी या विचारधारा से नहीं होने से उनकी बात निष्पक्ष है। यदि मुसलमान इस बारे में गंभीरता से सोचें तो उनका भविष्य संवर सकता है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 9 February 2024

हल्द्वानी का दंगा बड़े षडयंत्र का हिस्सा : तराई में बढ़ती मुस्लिम आबादी चिंता का विषय


उत्तराखंड में नैनीताल जिले के अंतर्गत आने वाला हल्द्वानी शहर बीते दो दिनों से दंगे की आग में झुलस रहा है। कुमाऊं अंचल की तराई में बसे इस नगर में एक अवैध मजार को तोड़ने गए प्रशासनिक अमले पर नाराज मुस्लिम समाज की भीड़ ने हमला कर दिया। उसके बाद निकटवर्ती पुलिस थाने को जलाने और उसमें रखे शस्त्र लूटने की कोशिश भी की गई। पूरे शहर में  पथराव और आगजनी की वारदातें भी कैमरों में कैद हो चुकी हैं। छतों से पत्थर बरसाने का सिलसिला भी चला। सैकड़ों पुलिस वाले घायल हो गए हैं। आधा दर्जन मौतों की भी खबर है। बरेली में तौकीर रजा नामक मौलवी द्वारा दिए भड़काऊ भाषण के बाद वहां भी तनाव व्याप्त है। उल्लेखनीय बात ये है कि उक्त मजार को अवैध निर्माण मानकर तोड़ने का आदेश न्यायालय द्वारा दिया गया था। बावजूद उसके मुस्लिम समाज के सैकड़ों लोगों द्वारा प्रशासनिक दस्ते पर हमला किया जाना ये स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है कि धर्म की आड़ में मुस्लिम धर्मगुरु कानून का पालन करने के स्थान पर व्यवस्था के विरुद्ध बगावत भड़काते हैं। तौकीर रजा ने जिस अंदाज में जान लेने की धमकी  दी वह शुभ संकेत नहीं है। उन्होंने पत्रकारों के सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के बारे में जिस शब्दावली का उपयोग किया वह धर्मांधता के साथ ही उनके दुस्साहस का प्रमाण है। जिस शैली में उन्होंने मुसलमानों को भड़काया वह उनको जेल भेजे जाने के लिए पर्याप्त है। दूसरी तरफ  हल्द्वानी में जो कुछ हुआ उसके बाद उत्तराखंड के इस बेहद शांत इलाके के जनसंख्या संतुलन में आए बदलाव को लेकर चर्चा प्रारंभ हो गई है। इस तराई क्षेत्र में बीते कुछ सालों के भीतर ही मुस्लिम आबादी बेतहाशा बढ़ी। उसमें भी रोहिंग्या मुस्लिमों की खासी संख्या बताई जा रही है। जिस अंदाज में अतिक्रमण हटाने गए शासकीय अमले पर हमले के बाद  थाने को लूटने और जलाने की कोशिश हुई वह क्षणिक आवेश न होकर पूर्व नियोजित लगता है । अदालती आदेश के बाद अवैध रूप से बनाई गई मजार को तोड़ने की जानकारी लगते ही जिस तरह मुसलमानों की भीड़ एकत्र होकर हिंसात्मक हुई उसके पीछे तौकीर रजा जैसे लोगों का दिमाग ही लगता है। गौरतलब है वे बीते कुछ दिनों से ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर मुस्लिम समुदाय को लामबंद करने में जुटे हुए थे। ज्ञानवापी के अलावा आजकल मथुरा की ईदगाह का मसला भी खबरों में  है। अयोध्या में राम मंदिर के प्राण - प्रतिष्ठा समारोह की अभूतपूर्व सफलता के बाद मुस्लिम समाज के अनेक कट्टरपंथी नेता और धर्मगुरु आए दिन ऐसे बयान दे रहे हैं जिनसे सामाजिक सद्भाव नष्ट होने का अंदेशा है । दरअसल इन लोगों को ये भय सता रहा है कि  पुरातत्व सर्वेक्षण में जिस तरह के प्रमाण मिल रहे हैं उनके आधार पर वाराणसी की  ज्ञानवापी और मथुरा की ईदगाह  भी उनसे छिनना तय है।  अयोध्या विवाद का हल तो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से शांति के साथ हो गया । लेकिन ज्ञानवापी और ईदगाह में हिन्दू मंदिर होने की संभावना बढ़ते जाने से मुस्लिम धर्मगुरु और अल्पसंख्यक वोट बैंक के ठेकेदारों की रातों की नींद उड़ी हुई है। इसीलिए आए दिन जहर बुझे बयान देकर  उत्तेजना फैलाई जा रही है। हल्द्वानी की घटना के पीछे कट्टरपंथी मुस्लिमों की खीझ भी है जिसका कारण राज्य विधानसभा में समान नागरिकता विधेयक पारित होना है। प्रसिद्ध पर्वतीय पर्यटन केंद्र नैनीताल की तराई में स्थित हल्द्वानी की शांति व्यवस्था को भंग करने के पीछे जिन तत्वों का हाथ है उन पर तो कड़ी कार्रवाई होगी ही किंतु इस इलाके में मुस्लिम आबादी में बेतहाशा वृद्धि के पीछे देश विरोधी ताकतों की भूमिका की जांच जरूरी है। विशेष रूप से रोहिंग्या मुस्लिमों की बसाहट के अलावा धड़ाधड़ खुलते मदरसे चिंता का विषय है। मैदानी इलाकों को छोड़कर पर्वतीय क्षेत्रों में मुसलमानों की नई - नई बस्तियां चौंकाने वाली हैं। जिस तरह से समूची घटना को अंजाम दिया गया वह  साधारण उपद्रव  न होकर किसी बड़े षडयंत्र को अमली जामा पहनाने जैसा कृत्य है । जिसकी सूक्ष्म जांच करवाने के बाद दोषियों को कड़ी सजा तो दी ही जाए ,किंतु लगे हाथ हल्द्वानी और उसके आसपास कुकुरमुत्ते की तरह उग आईं मुस्लिम बस्तियों की भी जांच कर पता लगाया जाए कि उसके पीछे है कौन? वरना ये लोग समूचे उत्तराखंड को अशांत कर देंगे।


- रवीन्द्र वाजपेयी

न्याय यात्रा विपक्षी गठबंधन के लिए नुकसानदेह साबित हो रही



भाजपा विरोधी तमाम यू ट्यूब पत्रकार इस बात से चिंतित हैं कि जिस विपक्षी गठबंधन को 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का विकल्प माना जा रहा था वह बिखराव का शिकार हो रहा है। इसके लिए वे राहुल गांधी को कसूरवार ठहराते हुए आरोप लगा रहे हैं कि घटक दलों के साथ संवाद शून्यता के कारण चुनाव की रणनीति और सीटों के बंटवारे का फार्मूला तय करने का काम लंबित पड़ा हुआ है। राहुल ने जबसे न्याय यात्रा प्रारंभ की तभी से इंडी की गतिविधियां रुकी हुई हैं। इसीलिए क्षेत्रीय दल स्वतंत्र निर्णय ले रहे हैं। प .बंगाल में ममता बैनर्जी ने इसकी शुरुआत की और उसी क्रम में उ.प्र में सपा नेता अखिलेश यादव ने भी कांग्रेस को 11 सीटें देने का फैसला कर डाला। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे और शरद पवार कांग्रेस के प्रति उदासीन हो रहे हैं। आम आदमी पार्टी ने भी पंजाब और हरियाणा में उसको उपकृत करने से मना कर दिया। वहीं दिल्ली , गुजरात और गोवा में कड़ी शर्तें रख दी हैं। नीतीश कुमार द्वारा भाजपा के साथ चले जाने से बिहार में तेजस्वी यादव सीटों के बड़े हिस्से पर दावा ठोक रहे हैं। यही स्थिति तमिलनाडु और केरल की भी है। दरअसल गठबंधन अस्तित्व में तो आ गया और उसकी कुछ बैठकें भी हुईं किंतु मैदानी स्तर पर आज तक उसकी उपस्थिति दर्ज नहीं हो सकीं। 5 अक्टूबर को भोपाल की जिस रैली में एकता का प्रदर्शन होना था उसे कांग्रेस नेता कमलनाथ ने बिना किसी से सलाह किए ही रद्द करने का फैसला कर डाला। उसके बाद पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के उलझ जाने से अन्य कोई कार्यक्रम नहीं रखा जा सका। दरअसल कांग्रेस सोच रही थी कि उन चुनावों में उसका सितारा बुलंद रहेगा और तब वह सीटों के बंटवारे में अपनी इच्छा थोप सकेगी किंतु उत्तर भारत के तीन राज्यों में वह बुरी तरह पराजित हो गई। उसके बाद हालांकि गठबंधन की बैठक हुई किंतु प्रधानमंत्री के चेहरे और सीटों के बंटवारे पर कोई नीति नहीं बन सकी। होना तो ये चाहिए था कि गठबंधन की संयुक्त रैलियां देश भर में आयोजित कर उन मतदाताओं को आकर्षित किया जाता जो भाजपा विरोधी मानसिकता से प्रेरित और प्रभावित हैं। लेकिन कांग्रेस ने इससे अलग हटकर श्री गांधी की न्याय यात्रा शुरू करने को प्राथमिकता दी। यदि यात्रा गठबंधन के बैनर तले होती तो तमाम विपक्षी दल अपनी सहभागिता देकर इसे प्रभावशाली बनाते किंतु जिन राज्यों से वह गुजर रही है वहां असर रखने वाले क्षेत्रीय दलों को यात्रा में आमंत्रित करने में भी देर की गई जिससे वे कटे रहे। ममता बैनर्जी ने तो अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर करते हुए यहां तक भविष्यवाणी कर दी कि कांग्रेस 40 लोकसभा सीट भी बमुश्किल जीत सकेगी। नीतीश कुमार के किनारा करने के बाद ही कांग्रेस ने अखिलेश यादव को यात्रा में शिरकत करने हेतु आमंत्रित किया । वह भी तब जब वे कांग्रेस को 11 सीटें देने का इकतरफा ऐलान कर चुके थे। कुल मिलाकर इंडी समर्थक विश्लेषक इस बात को लेकर निराश हैं कि वह केवल बैठकों और बयानों तक सीमित है जबकि अभी तक तो उसे जबरदस्त मोर्चा खोल देना चाहिए था। इसका एक कारण ये भी है कि गठबंधन के हिस्सेदार दलों में साम्यवादियों को छोड़कर बाकी सब किसी नेता या परिवार के हित के लिए राजनीति करते हैं जिनके निजी स्वार्थ गठबंधन के सामूहिक हितों पर भारी पड़ रहे हैं। नीतीश कुमार चूंकि सबको जोड़कर रखने वाले नेता थे इसलिए उनके अलग हो जाने के बाद गठबंधन में थोड़ी ही सही किंतु जो कसावट थी वह भी ढीली पड़ने लगी। यही कारण है कि विभिन्न राज्यों से कांग्रेस सहित अन्य पार्टियों से नेताओं और जनप्रतिनिधियों की भाजपा के साथ जुड़ने की खबरें आने लगी हैं। उद्धव ठाकरे के हालिया नर्म बयान के अलावा उ.प्र में कांग्रेस नेता आचार्य प्रमोद कृष्णम द्वारा प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपने आयोजन में आमंत्रित कर भविष्य के संकेत दे दिए गए। वैसे भी वे राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह का बहिष्कार करने के निर्णय के कारण कांग्रेस की खुलकर आलोचना कर रहे हैं। विपक्षी गठबंधन के कमजोर पड़ने का संकेत पश्चिमी उ.प्र के जाट नेता और रालोद प्रमुख जयंत चौधरी की टेढ़ी चाल से भी मिल रहा है जो भाजपा के साथ गठजोड़ की प्रक्रिया में हैं। इस सबके कारण न तो गठबंधन को लेकर जनमानस में उत्सुकता और आकर्षण है और न ही घटक दलों में सामंजस्य बन पा रहा है। इसके विपरीत भाजपा ने अपनी चुनावी मशीनरी को पूरी तरह मुस्तैद कर दिया है। तीन राज्यों में मिली जीत के कारण उसका मनोबल भी ऊंचा है। प्रधानमंत्री खुद समय निकालकर देश के विभिन्न हिस्सों में जा रहे हैं । यदि यही स्थिति रही तो गठबंधन की एकता और उस पर आधारित सफलता की उम्मीद हवा - हवाई होकर रह जायेगी। प्रधानमंत्री द्वारा संसद में भाजपा को 370 और राजग को 400 से ज्यादा सीटें मिलने का जो दावा किया गया उसे भले ही अतिरंजित माना जाए किंतु विपक्षी गठबंधन में तो कांग्रेस द्वारा पिछले प्रदर्शन को दोहराए जाने को लेकर ही विश्वास का अभाव है । 


- रवीन्द्र वाजपेयी