Friday, 17 November 2017

योगी ने ठीक कहा.....

अयोध्या में राम जन्मभूमि के विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय में नियमित सुनवाई शुरू होने के पहले ही आर्ट ऑफ लिविंग के प्रणेता श्री श्री रविशंकर ने मध्यस्थता की जो पहल की वह ठीक तरह से शुरू होने के पहले ही फुस्स होती दिख रही है। सुन्नी मुसलमानों की ओर से तो सुलह की किसी भी गुंजाइश से खुले तौर पर इन्कार किया जाता रहा है लेकिन जिस शिया समुदाय को मंदिर के पक्ष में झुकता माना जाता था उसमें भी एक राय नहीं बन सकी। उधर मन्दिर आंदोलन से जुड़े रहे अनेक साधु-सन्त और उनके संगठनों ने भी रविशंकर की मध्यस्थता पर सवाल उठा दिए। ये चर्चा भी चल पड़ी कि श्री श्री को अचानक मन्दिर मामले में टांग अड़ाने की क्या सूझ गई? यद्यपि वे बाबा रामदेव की तरह ऐलानिया भाजपा के पक्ष में खुलकर नहीं बोलते किन्तु धीरे-धीरे वे भी कांग्रेस से दूर होते चले गए। रामदेव जहां ठेठ हरियाणवी स्टाईल में कांग्रेस का विरोध करते हैं जो उनके साथ मनमोहन सरकार द्वारा किये गए दुव्र्यवहार की स्थायी प्रतिक्रिया कही जा सकती है किंतु श्री श्री के प्रति कांग्रेस एवम अन्य विपक्षी दल उतने आक्रामक नहीं रहते। इसकी वजह उनका शांत स्वभाव और विवादों से दूर रहने की प्रवृत्ति हो सकती है लेकिन बीते कुछ सालों में ये आध्यात्मिक हस्ती भी भाजपा के काफी करीब आती गई। इसीलिए कुछ दबी जुबान तो कुछ खुलकर कह रहे हैं कि मंदिर विवाद में सुलह करवाने की यह कोशिश गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा की राह में आ रही परेशानियों को दूर करने का दांव है। सच्चाई जो भी हो किन्तु बिना किसी ठोस तैयारी के श्री श्री का बीच में कूद पडऩा निरुद्देश्य या अकारण नहीं हो सकता। बाबा रामदेव का इस मुहिम से निर्लिप्त रहना भी अर्थपूर्ण है। दरअसल उप्र में भारी बहुमत की सरकार बनते ही मन्दिर निर्माण की कोशिशें तेज हो गई थीं। संयोगवश शिया मुस्लिमों के कुछ नेताओं के साथ आ खड़े होने से भाजपा के हौसले और बुलन्द हो गए। मुख्यमंत्री श्री योगी ने दीपावली को अयोध्या में जो झंका-मंका खींचा उससे भी संकेत मिला कि राम मंदिर की राह में आ रही रुकावटें दूर करना योगी सरकार के साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर भी भाजपा की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में है। न्यायालयीन प्रकरण में शिया समुदाय द्वारा विवादित स्थल पर सुन्नियों की बजाय शियाओं के हक सम्बन्धी दावा भी भाजपा को अपने अनुकूल लग रहा था। लेकिन अचानक श्री श्री का अयोध्या आ धमकना और विभिन्न पक्षों से बात शुरू कर देना इस मामले में नया मोड़ कहा जाने लगा। उनका मुख्यमंत्री श्री योगी से मिलना ध्यान खींचने वाला रहा किन्तु बात ज्यादा आगे बढऩे के पहले ही  पटरी से उतर गई। मंदिर आंदोलन के वरिष्ठ नेता पूर्व सांसद रामविलास वेदान्ती तक ने श्री श्री की दखलंदाज़ी पर ऐतराज व्यक्त कर दिया वहीं श्री योगी ने भी रविशंकर से हुई भेंट के बाद ये कहकर इस पहल की हवा निकाल दी कि बातचीत का समय निकल चुका है। कुल मिलाकर जैसा उन्होंने खुद कहा वे कोई प्रस्ताव लेकर नहीं अपितु महज आम सहमति के लिए ज़मीन तैयार करने गये थे किंतु मुस्लिम तो छोडिय़े हिन्दू संगठनों तक ने श्री श्री को ठीक से घास नहीं डाली। रही सही कसर पूरी कर दी श्री योगी के बयान ने। ये सब देखने के बाद लगा कि श्री श्री ने कहीं बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना की तर्ज पर बिन बुलाए मेहमान की तरह आकर अपनी किरकिरी तो नहीं करवाई। वेदान्ती जी और श्री योगी की प्रतिक्रिया से लगता है कि उनकी कोशिश को भाजपा में भी अपेक्षित समर्थन नहीं मिल सका। बहरहाल इतना जरूर हुआ कि मुसलमानों द्वारा सुलह के लिए दो टूक असहमति व्यक्त किये जाने से हिन्दू जनमानस में एक बार फि र से मन्दिर मुद्दा जीवंत हो उठा। वैसे मुख्यमंत्री श्री योगी की ये टिप्पणी कि बातचीत का समय निकल चुका, मायने रखती है क्योंकि दोनों पक्षों में कोई भी झुकने या पीछे हटने के लिए रज़ामंद नहीं हो तब अदालत के फैसले का इन्तेज़ार करना ही मज़बूरी बन गई है। इसी बीच  मुसलमानों को मोटी रकम देकर विवादित स्थल से दूर मस्जि़द बनाने के लिए तैयार करने की कथित कोशिश सम्बंधी स्टिंग से सनसनी मची किन्तु वह भी कोई असर न दिखा सकी। इन सब से यही लगता है कि केंद्र सरकार सहित हिन्दुओं -मुसलमानों के संगठनों और राजनीतिक दलों को सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध करना चाहिए कि वह जन्मभूमि विवाद पर जल्द निर्णय करे। अलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जो फैसला दिया उसके आधार पर ही आगे बढऩा ठीक रहेगा वरना अतीत में देश की राजनीति को हिलाकर रख देने वाला ये मुद्दा यूँ ही नासूर बना रहेगा। योगी जी ने बातचीत का समय निकल जाने की बात कहकर गेंद न्यायपालिका के पाले में ही खिसका दी है। भले ही शिया समुदाय का रुख लचीला हो गया हो किन्तु सुन्नी इतनी आसानी से मानेंगे ये खुशफहमी पालना मूर्खों के स्वर्ग में विचरण करने जैसा है। रही श्री श्री रविशंकर की पहल तो वे दिल मिलें न मिलें, हाथ मिलाते रहिये की शायराना समझाइश पर अमल करते रहें उसमें किसी को कोई ऐतराज नहीं होगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 16 November 2017

गुणवत्ता की उपेक्षा से विवादित होता आरक्षण

सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ द्वारा सरकारी नौकरियों में  पदोन्नति को भी आरक्षण के दायरे में रखे जाने को लेकर पिछले निर्णयों के विरुद्ध लगी याचिकाओं को संविधान पीठ के विचार हेतु भेजे जाने के फैसले पर उत्पन्न कानूनी विवाद से एक बात तो साफ हो गई कि न्यायपालिका भी राजनीतिक बिरादरी की तरह इस सम्वेदनशील विषय पर कोई निर्णय लेने में हिचकिचाती है। 11 साल पहले पांच न्यायाधीशों की पीठ ने  पदोन्नति में आरक्षण को वाजिब बताने के बावजूद ये हिदायत दी थी कि ऐसा करने से पहले सरकार को अपर्याप्त प्रतिनिधित्व और पिछड़ेपन के समुचित आंकड़े जुटाने होंगे।कुछ और निर्णय भी आए। इनकी वजह से राज्यों की पदोन्नति में आरक्षण की प्रक्रिया ठंडी पड़ गई। गत दिवस दो न्यायाधीशों की पीठ द्वारा उक्त प्रकरण पर एक पुनर्विचार याचिका को सीधे संविधान पीठ को भेजे जाने पर तय किया गया कि खण्डपीठ के निर्णय पर तीन न्यायाधीश ये व्यवस्था देंगे कि क्या खण्डपीठ को ऐसा करने का अधिकार था? उसी के बाद आगे की प्रक्रिया तय होगी। उधर दूसरी तरफ वोट बैंक की लालच में केंद्र और राज्य दोनों की सरकारें पदोन्नति में अजा/अजजा को आरक्षण दिए जाने की पुरजोर वकालत कर रही हैं। वैसे व्यवहारिक तौर पर देखें तो ये मसला वैधानिक कम ,राजनीतिक ज्यादा हो गया है। आरक्षण का आधार आर्थिक की बजाय जाति को बनाए रखने का प्रश्न देश की राजनीति का वह कड़वा सच है जिसने समाज के बीच जातिगत भेदभाव की खाई को और चौड़ा कर दिया है। इसका सबसे अच्छा और ताज़ा उदाहरण गुजरात है जहां सारे मुद्दों को एक तरफ धकेलते हुए पाटीदार आरक्षण की मांग पूरे चुनाव पर हावी हो गई। अन्य राज्य भी ऐसे ही दबावों को झेलने मजबूर हैं। दुर्भाग्य से अपने देश का लोकतंत्र दिमाग की बजाय सिर गिनने पर सिमट गया। इसके चलते योग्यता पर अयोग्यता को हावी होने का मौका मिलने लगा जिसका दुष्परिणाम व्यवस्था के चरमराने के रूप में सामने आता जा रहा है।आरक्षण को एक सामाजिक अनिवार्यता के रूप में संविधान निर्माताओं ने स्वीकार किया था। पिछड़े और वंचित वर्गों को मुख्यधारा में लाना देश के सर्वतोमुखी विकास के लिए जरूरी था। यही वजह रही कि प्रारम्भिक तौर पर किसी ने इसका विरोध नहीं किया किन्तु धीरे-धीरे अजा/अजजा से बढ़ते-बढ़ते बात ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) तक आ पहुंची और अब पिछड़ी कही जाने वाले वे जातियाँ भी अपने वोट की कीमत मांगने लामबंद हो रही हैं जिनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। सही बात ये है कि सरकारी नौकरी में मिल रही सुविधाओं के अलावा जो सुरक्षा जीवनपर्यन्त मिलती है उसके आकर्षण ने परंपरागत रूप से  स्वरोजगार सम्पन्न जातियों में भी आरक्षण की बैसाखी का सहारा लेने की ललक पैदा कर दी लेकिन असली विवाद तब बढ़ा जब पदोन्नति में भी आरक्षण लागू किया गया जो सीधे - सीधे प्रतिभा और योग्यता की कीमत पर होता है। इसे लेकर ही न्यायपालिका ने जब अड़ंगा लगाते हुए कहा कि ऐसा करते समय सरकार को ये देखना होगा कि सम्बन्धित वर्ग का प्रतिनिधित्व सम्बन्धित सेवा में अपर्याप्त है और उसके पिछड़ेपन का आंकड़ा क्या है? निश्चित रूप से यह एक रचनात्मक समाधान होता लेकिन फिर वही वोट बैंक की सियासत आढ़े आ गई। प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री और अन्य नेता तक आरक्षण के लिए कुछ भी कर गुजरने की हुंकार भरते रहते हैं। सवर्ण जातियों के बीच सरकारी नौकरियों में मिलने वाले आरक्षण को लेकर जितना गुस्सा या असन्तोष है उससे अधिक है पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था को लेकर। तुलनात्मक दृष्टि से कम योग्य व्यक्ति का नौकरी में चयन एक सामाजिक उद्देश्य की पूर्ति हेतु जरूरी लग सकता है किंतु पदोन्नति तो कार्यकुशलता और क्षमता के प्रदर्शन का पुरस्कार होना चाहिये। इसीलिए जब काबलियत की उपेक्षा कर आरक्षण के जरिये पदोन्नति दी जाती है तो उससे उत्पन्न कुंठा अंतत: विद्वेष को जन्म देती है जिसका अंतिम परिणाम व्यक्ति की कार्यकुशलता में ठहराव के तौर पर देखने मिल रहा है। सरकारी दफ्तरों में कार्यरत स्टाफ में जो कामचोरी नजर आती है उसका एक कारण पदोन्नति में आरक्षण भी कहा जा सकता है। प्रश्न ये उठता है कि न्यायपालिका ऐसे विषयों को सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर क्यों नहीं निबटाती? 2006 में पांच न्यायाधीशों की पीठ के निर्णय को लेकर अब तक स्थिति स्पष्ट नहीं होना भी शोचनीय है। सबसे ज्यादा जरूरी है राजनीतिक दलों की सोच में बदलाव की जो जाति भेद मिटाने की बजाय उसे बढ़ाने में लगे रहते हैं। आरक्षण का समर्थन और विरोध दोनों ऐसे मुद्दे हैं जिन पर वैचारिक मतभेद से बढ़कर जातिगत संघर्ष की स्थिति तक बन रही है पाटीदार,मराठा,गुर्जर,जाट जैसी जातियों को आरक्षण मिलने के बाद क्या गारंटी है कि ये सिलसिला रुक जाएगा। इसी तरह पदोन्नति में आरक्षण के चलते सरकारी क्षेत्र में सेवा और कार्य का स्तर जिस तरह गिर रहा है वह भी गम्भीर चिंतन का विषय है। यदा कदा निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की जो मांग उठा करती है वह भयावह भविष्य का संकेत है। दो न्यायाधीशों द्वारा मामला पांच न्यायाधीशों की पीठ के विचारार्थ भेजे जाने पर अधिकार और औचित्य का सवाल खड़े हो जाने से असल मुद्दे पर दूसरा विवाद चढ़ बैठा। ये तो जगजाहिर है कि राजनेता चाहे किसी भी पार्टी के क्यों न हों आरक्षण का खुलकर विरोध नहीं कर सकते क्योंकि सवाल घूम फिरकर वही वोट का आ जाता है। घटती सरकारी नौकरियों के कारण सार्वजनिक क्षेत्र में वैसे ही रोजगार दिन ब दिन कम होते जा रहे हैं। ऊपर से आरक्षण को लेकर पैदा हुई अप्रिय स्थितियों से समाज में विघटन के हालात बनने  लगे हैं। आरक्षण को आवश्यक और औचित्यपूर्ण मानने वाले भी दबी जुबान ही सही किन्तु ये स्वीकार करने में नहीं हिचकिचाते कि पदोन्नति करते समय जाति की अपेक्षा योग्यता, क्षमता और कार्यकुशलता मापदण्ड होना चाहिए।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 15 November 2017

फिल्म ही रहने दें तमाशा न बनायें!



बोलने-सुनने और लिखने की आजादी भारतीय संविधान की सबसे बड़ी विशेषता है। तमामतर विरोधाभास के बाद भी इस देश में लोकतंत्र सफल है तो इसकी एक वजह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी है। जाने-अनजाने में हो रहा हो या इसके पीछे कोई कारण हो विगत तीन-चार साल से विरोध ने बर्बरता का रूप ले लिया है। कानून हाथ में लेने की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है। हर दो-चार दिन में कोई न कोई विवाद लोगों के सब्र की परीक्षा लेने लगता है। ताजा मामला रानी पद्मावती पर बनी फिल्म का है। शुरू-शुरू में समझा गया कि शायद यह इस फिल्म को कामयाब बनाने की चाल हो। आजकल ये भी होने लगा है। जिस फिल्म को लेकर जितना हल्ला मचता है वह उतनी ही भीड़ खींचती है। संजय लीला भंसाली बेहद प्रतिभाशाली फिल्म मेकर में शुमार होते हैं। उन्होंने समय-समय पर अपना लोहा भी मनवाया है। जब उनने देवदास बनाई थी तब भी उन पर मूल कहानी से छेड़छाड़ का आरोप लगा था। राजस्थान एवं राजपूत आन-बान-शान की कोई दूसरी मिसाल मुश्किल है। यही वजह है कि रानी पद्मावती पर बनाई गई पिक्चर इस समय चर्चा का विषय बनी हुई है। अभी सेंसर बोर्ड ने इसे प्रमाण पत्र नहीं दिया। इसके चलते सुप्रीम कोर्ट ने भी दखल से इंकार कर दिया है। कई मशहूर फिल्म हस्तियां इस फिल्म की हिमायत कर रही है। ऑडियो-वीडियो के जरिये सफाई देने का प्रयास भी हो रहा है। दुर्भाग्य से केन्द्र से जुड़े लोग इस फिल्म के खिलाफ बोल रहे हैं। भाजपा का सोचना जो भी हो परंतु उसके कुछ बड़े नेताओं की जुबान भी कैंची की तरह चल रही है। कहीं न कहीं इसे वोट बैंक की राजनीति से भी जोड़ा जा रहा है। अलाउद्दीन खिलजी की छवि उस हमलावर की तरह है जिसने अपना सिक्का जमाने के लिये काफी जुल्म-सितम किये। एक राजपूत घराने की रानी होने के नाते पदमावती को भी सताया गया, जान देने के लिए मजबूर किया गया। जाहिर है कि पूरी तरह सिर्फ इतिहास को पर्दे पर उतारा नहीं गया होगा। कुछ फिल्मी तड़के भी लगाये होंगे। वो सब मिर्च-मसाला भी लगाया गया होगा जो आज के दौर में किसी हिन्दी फिल्म को चलाने के लिए बहुत जरूरी हो गया है। टेक्नालॉजी के भरपूर प्रयोग के लिए भी संजय लीला भंसाली जाने जाते हैं। ईमानदारी की बात तो यह भी है कि पद्मावती की मुखालफत कर रहे ज्यादातर लोगों ने यह फिल्म देखी ही नहीं होगी। अधिकांश सुनी-सुनाई या फैलाई गई अफवाह के पीछे भाग रहे हैं। बेहतर यही होगा कि केन्द्र सरकार या अन्य कोई जिम्मेदार दोनों पक्ष को आमने-सामने बिठाकर कोई ऐसा हल निकाले जो सबको मंजूर हो। फिल्म के प्रदर्शन के समय थियेटर में तोड़-फोड़ तथा अन्य हिंसक कदम किसी भी तरह से जायज नहीं कहे जा सकते। फिल्म वाले भी लोगों की भावना से न खेलें अन्यथा उनका धंधा ही खतरे में पड़ जायेगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

खनन नीति: भ्रष्टाचार का विकेंद्रीकरण

मप्र सरकार द्वारा गत दिवस खनन नीति में बदलाव करते हुए नर्मदा की 87 खदानों से रेत उत्खनन का काम 2021 तक ठेकेदारों के पास ही रहने देने और शेष खदानों से पंचायत को रायल्टी चुकाकर खनन किये जाने का निर्णय किया। नर्मदा सेवा यात्रा के दौरान नर्मदा से रेत निकालने पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लगाने के फैसले के कारण मप्र में रेत के दाम आसमान छूने लग गए जिसका सीधा असर निर्माण कार्यों पर पड़ा। पहले से अवैध रेत उत्खनन के लिए आलोचना झेल रही प्रदेश सरकार को रेत की कालाबाज़ारी के लिए और भी ज्यादा आलोचना सहनी पड़ी। चोरी से रेत का खनन और जमाखोरी भी शिवराज सरकार के विरुद्ध बड़ा मुद्दा बन गई। अंतत: कल मंत्रीमंडल ने रेत निकासी की छोटी खदानें ग्राम पंचायत के जिम्मे कर दीं। इसी के साथ खनन पर लगी रोक खत्म होने का रास्ता खुल गया। जल्द ही इस सम्बंध में औपचारिकताएँ भी पूरी कर ली जावेगीं। सरकार की मंशा पर सवाल न उठाया जावे तब भी ये तो कहा ही जा सकता है कि जिस भ्रष्ट नौकरशाही और राजनीतिक संरक्षण के कारण खनन माफिया की लूटखोरी चल रही थी उसका रवैया कैसे बदलेगा? अवैध रेत उत्खनन का कारोबार बिना खनिज विभाग और राजनीतिक नेताओं के साथ माफिया की संगामित्ति के सम्भव नहीं है। ग्राम पंचायत को अधिकार देकर भले ही खनिज विभाग का एकाधिकार खत्म करने की व्यवस्था की गई हो किन्तु पंचायतों में बैठे नेता और अधिकारी भी दूध के धुले तो हैं नहीं जो उनसे राजा हरिश्चंद्र जैसी ईमानदारी की उम्मीद की जाए। सही बात ये है कि रेत खनन राजनीतिक नेताओं,अफसरशाही और इस कारोबार नें लगे ठेकेदारों के गठजोड़ से ही धड़ल्ले से चलता रहा। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि अधिकतर खनन व्यवसायी राजनीतिक नेता या उनके परिजन ही हैं अथवा वे पर्दे के पीछे से उसमें भागीदार हैं। शिवराज सरकार खनन के मामले में पिछली कांग्रेस सरकारों से किसी भी लिहाज से कम बदनाम नहीं है। इसका प्रमाण तब मिला जब भाजपा की बैठक में मुख्यमंत्री सहित संगठन के बड़े नेताओं तक को कहना पड़ा कि कार्यकर्ता मकान,दूकान और खदान से दूर रहें। चिंतन,मनन और खनन जैसे कटाक्ष भी खूब चर्चित हुए। उस दृष्टि से नई रेत खनन नीति की सफलता के प्रति तब तक आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता जब तक राजनीतिक नेता इस व्यवसाय से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े रहेंगे। चुनाव वर्ष में अपनी सरकार की छवि सुधारने के लिए उठाया यह कदम आत्मघाती भी हो सकता है क्योंकि ग्राम पंचायतों के हाथ में रेत उत्खनन का काम आने का मतलब भ्रष्टाचार का विकेंद्रीकरण ही है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 14 November 2017

जैसे हुड्डा वैसे खट्टर


हरियाणा ही नहीं अपितु देश के सबसे ईमानदार कहे जाने वाले आईएएस अधिकारी अशोक खेमका को फिर स्थानांतरित किया जाना राजनीतिक बिरादरी की सोच में एकरूपता का प्रमाण है। 26 वर्ष के सेवाकाल में 51 वीं बार हुआ उनका स्थानांतरण एक तरह से मानसिक प्रताडऩा ही है। पूर्ववर्ती हुड्डा सरकार के भ्रष्टाचार का चि_ा खोलने पर श्री खेमका का जल्दी-जल्दी स्थानान्तरण किये जाने को भाजपा ने जोरदार मुद्दा बनाते हुए उन्हें ईमानदारी का प्रतीक चिन्ह बनाकर कांग्रेस सरकार के विरुद्ध प्रचार का जरिया बनाया था। हरियाणा में कांग्रेस की जबरदस्त पराजय के लिए खेमका प्रकरण भी काफी हद तक जि़म्मेदार माना जा सकता है। उम्मीद की जाती थी कि भाजपा की सरकार बनने के बाद उनकी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा का उचित सम्मान होगा किन्तु खट्टर सरकार ने भी श्री खेमका के प्रति सौतेला व्यवहार जारी रखा। उन्हें मुख्य धारा से अलग माने जाने वाले विभागों में पदस्थ तो किया ही जाता रहा, ऊपर से उन पर तबादला रूपी तलवार भी लटकाई जाती रही। किसी अधिकारी की सेवाएं किस विभाग में , कहाँ और कब तक ली जावें ये सरकार का अधिकार होता है लेकिन अच्छा कार्य करने वालों को बजाय पुरस्कृत करने के, परेशान करने की संस्कृति सभी राजनीतिक दलों में एक जैसी पनप चुकी है। श्री खेमका को जब चाहे यहां से वहां किया जाना ये साबित करने के लिए पर्याप्त है कि सरकार चलाने के मामले में क्या कांग्रेस और क्या भाजपा सभी एक जैसे हैं। अशोक खेमका से सत्ता में बैठे लोगों को खुन्नस की वजह केवल इतनी ही है कि वे समझौतावादी नहीं हैं। उन्हें जिस विभाग में भेजा जाता है वे उसमें व्याप्त गड़बडिय़ों को दुरुस्त करने में जुट जाते हैं जिसकी वजह से उन्हें सत्ताधारियों का कोपभाजन बनना पड़ता है। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर रास्वसंघ के प्रचारक रहे हैं। इस वजह से उनसे उम्मीद की जाती थी कि वे पार्टी विथ डिफरेंस के दावे को सच साबित कर दिखाएंगे लेकिन श्री खेमका के तबादलों का सिलसिला जारी रहना और उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी से वंचित रखना इस बात को स्थापित सत्य बनाने के लिए पर्याप्त है कि सत्ता में आते ही सब एक जैसे हो जाते हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 13 November 2017

चित्रकूट:भाजपा के लिए खतरे की घण्टी

भले ही भाजपा ये कहे कि चित्रकूट विधानसभा सीट पर पहले से ही कांग्रेस काबिज थी, ऐसा कहकर वह कांग्रेस की जीत को महत्व चाहे न दे लेकिन अपनी पराजय को हल्के में लेना उसके लिए आत्मघाती होगा। आम तौर पर ये माना जाता है कि उपचुनाव में विपक्षी दल फायदे में रहता है लेकिन मप्र में शिवराज सिंह चौहान ने अधिकतर उपचुनावों में भाजपा को जीत दिलाकर  कांग्रेस के हौसले पस्त कर रखे थे । कुछ समय पूर्व हुए अटेर उपचुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद अब चित्रकूट में मिली हार ने भाजपा के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। प्रत्याशी चयन को लेकर कांग्रेस में इस बार विवाद नहीं हुआ लेकिन इसके ठीक उलट भाजपा में टिकिट को लेकर जो घमासान मची वह आखिरी तक जारी रही। जिस उम्मीदवार की टिकिट काटने पर बवाल मचा उसे मुख्यमंत्री तक ने बिठाकर समझाया। ऊपरी दिखावे के बाद भी असन्तोष की ज्वाला भीतर-भीतर धधकती रही जिसका नतीजा पराजय के रूप में सामने आ गया। इस जीत से उत्साहित कांग्रेस को यदि ये लगने लगा हो कि मप्र में उसका सूखा खत्म हो गया है तो ये कोरा आशावाद होगा क्योंकि विधानसभा चुनाव के लिए अभी एक वर्ष का समय शेष है। बावजूद इसके भाजपा के लिए एक विचारणीय मुद्दा या यूँ कहें कि चिंता का कारण तो बन ही गया कि शिवराज सिंह का जादू मतदाताओं पर पहले जैसा कायम नहीं रहा। मुख्यमंत्री की चुनाव जिताऊ क्षमता को पूरी तरह खत्म होना मान लेना तो गलत होगा किन्तु ये भी सही है कि उनकी सरकार की उपलब्धियां अब पुरानी पड़ चुकी हैं। दरअसल शिवराज सिंह की जो पकड़ सत्ता और जनता दोनों पर थी वह बीते एक डेढ़ वर्ष में कुछ कमजोर तो पड़ी ही है। भले ही भाजपा इसे नहीं माने किन्तु भ्रष्टाचार के मोर्चे पर मप्र सरकार की छवि भी दिग्विजय सिंह के शासनकाल के अंतिम दिनों सरीखी हो गई है जिसकी वजह से पार्टी के अपने कैडर में निराशा और अपराधबोध है। किसानों से जुड़े मुद्दों और समस्याओं पर शिवराज सरकार की समूची कार्यप्रणाली आलोचनाओं के घेरे में आ खड़ी हुई है। मन्दसौर कांड के बाद प्याज खरीद में घोटाले के उपरांत दाल खरीद को लेकर भी किसान बेहद खफा हैं।उन्हें वाजिब दाम दिलवाने के लिए शुरू की गई भावान्तर योजना भी अव्यवस्था का शिकार होकर रह गई। बिजली संकट दूर करने में भले ही राज्य सरकार अपनी पीठ ठोंक ले किन्तु बिजली के बिलों को लेकर जिस तरह मप्र विद्युत मण्डल की दादागिरी चल रही है उससे आम जनता बहुत रुष्ट है। चित्रकूट की लम्बे अंतर से हार से भाजपा के संगठन में आ गई निष्क्रियता भी उजागर हो गई। प्रत्याशी चयन में मुख्यमंत्री और प्रदेश संगठन की उपेक्षा यदि हुई तो भी कैडर आधारित पार्टी होने का दावा करने वाले संगठन में पहले जैसा स्वस्फूर्त समर्पण नहीं रहा,ये स्वीकार करना ही पड़ेगा। भाजपा के आम कार्यकर्ता में सत्तारूढ़ लोगों के रूखे व्यवहार से काफी गुस्सा है वहीं विभिन्न पदों पर नियुक्तियों को लेकर जो कंजूसी और उदासीनता  शिवराज सरकार द्वारा दिखाई गई वह अब मंहगी पडऩे लगी है। पार्टी कार्यकर्ता से तो दीनदयाल उपाध्याय के आदर्शों का पालन करने की अपेक्षा की जाती है किंतु सत्ता की मलाई खाने वालों का आचरण और सोच पूरी तरह पांच सितारा होने से निचले स्तर तक गुस्सा और निराशा नजऱ आने लगी है जिसे दूर करना जरूरी है, वरना 2018 के चुनाव में बाजी कठिन से कठिन होती चली जाएगी। जहां तक कांग्रेस का प्रश्न है तो अपनी सीट बचाकर उसने अपना मनोबल तो बढ़ाया ही है। यद्यपि आंतरिक स्तर पर मतभेद उसके भीतर भी कम नहीं हैं। पार्टी अभी तक ये तय नहीं कर सकी कि अगले विधानसभा चुनाव में शिवराज सिंह के मुकाबले वह किसे सामने खड़ा करेगी? उसके संगठन की स्थिति भी संतोषजनक नहीं कही जा सकती। चुनाव में टिकिट वितरण को लेकर पहले सरीखा विवाद मचने की आशंका कायम है। चन्द बड़े नेता अपने समर्थकों को उपकृत करने के फेर में पार्टी हितों को दरकिनार करने में नहीं हिचकेंगे, इसके संकेत अभी से मिलने लगे हैं। और फिर अभी गुजरात के चुनाव बाकी हैं जिस पर भाजपा और कांग्रेस का भविष्य काफी हद तक टिका है। यदि वहां भाजपा अपनी सरकार बचाने में सफल रही तब निश्चित रूप से कांग्रेस की आशाओं पर तुषारापात हो जाएगा क्योंकि राहुल गांधी की वोट खींचू क्षमता पर पहले से लगे प्रश्नचिन्ह तब और गहरे हो जाएंगे। नतीजे उल्टे हुए तब भाजपा के लिए 2018 का मिनी आम चुनाव जीतना ही कठिन होगा, 2019 तो अभी दूर है। कहने को एक उपचुनाव का परिणाम किसी अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने का आधार नहीं माना जा सकता क्योंकि राजनीति रोज नई करवटें बदला करती है जिसकी वजह से समीकरण कब बदल जाएं ये अनुमान लगाना अच्छों - अच्छों के बस में नहीं होता किन्तु हंडी का एक चावल देखकर अंदाज लगाने वाला परंपरागत तरीका भी पूरी तरह कालातीत नहीं हुआ है।उस दृष्टि से चित्रकूट की पराजय भाजपा के लिए जहां आत्मचिंतन का विषय है वहीं कांग्रेस को महज विजयोल्लास में डूबे नहीं रहना चाहिये क्योंकि बहोरीबंद, अटेर के उपचुनाव जीतने के बाद भी उसकी पराजय का सिलसिला चलता रहा है। अपने प्रतिद्वंदी की कमजोरी से लाभ उठाना रणनीति का हिस्सा होता है किंतु  आखिरकार अपनी शक्ति ही सहायक होती है। उस दृष्टि से कांग्रेस में कमजोरियों का ढेर है जिन्हें दूर न किया गया तो 2018 में  बैठे-बिठाए जीत नसीब हो जाएगी ये मान लेना स्वप्नलोक में विचरण जैसा ही रहेगा। उस दृष्टि से चित्रकूट उपचुनाव का परिणाम भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए अवसर है। जो इसके मुताबिक अपनी व्यूहरचना को बड़े मुकाबले की दृष्टि से सुदृढ़ कर ले जाएगा वह फायदे में रहेगा। भाजपा इस पराजय से उपजी निराशा को किस हद तक दूर कर अपने आत्मविश्वास को पुनस्र्थापित कर सकेगी और कांग्रेस इस विजय से प्राप्त उत्साह को कितने समय तक कायम रख सकेगी इसी पर पूरा दारोमदार टिका रहेगा। फिलहाल तो कोई ठोस आकलन या भविष्यवाणी जल्दबाजी होगी क्योंकि भाजपा में शिवराज का विकल्प नहीं दिख रहा और कांग्रेस का सेनापति कौन होगा ये कोई नहीं बता सकता।

रवीन्द्र वाजपेयी