Monday, 27 August 2018

सब पर भारी पड़ेंगे पेट्रोल-डीजल

पेट्रोल-डीजल की कीमतें रिकार्ड तोड़ रही हैं। अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियां इसके लिए बेशक उत्तरदायी हैं किंतु भारत सरीखे देश के लिए कच्चे तेल की कीमतों में उछाल बहुत मायने रखता है क्योंकि ये अपनी जरूरतों का 85 प्रतिशत आयात करता है। उससे भी बड़ी बात ये है कि पेट्रोल-डीजल की आसमान छूती कीमतों के बावजूद भी भारत में इनकी खफत दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है। एक जमाने में तो स्कूटर ही प्रतिष्ठा का सूचक होता था लेकिन अब तो चौपहिया वाहन भी किसी की रईसी नहीं दिखाता क्योंकि छोटे और मझोले किस्म की कार मध्यमवर्गीय स्तर की मानी जाने लगी है। एसयूवी और उससे भी आगे विलासिता की प्रतीक कारें धड़ाधड़ बिक रही हैं। पहले केवल महानगरों में नजर आने वाली लम्बी-लम्बी कारें अब बी श्रेणी के शहरों में भी दिखाई देने लगी हैं। यहां तक कि ग्रामीण क्षत्रों में भी साधारण जीप से ऊपर उठकर 15-20 लाख वाले वाहन जमकर बिक रहे हैं। मोटर सायकिल तो निम्न मध्यम वर्ग तक की प्राथमिकता बन चुकी है। महानगरों को छोड़कर सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का चूंकि सर्वत्र अभाव है इसलिए निजी वाहनों का उपयोग लोगों की मजबूरी है। इस वजह से पेट्रोल-डीजल भी दूध और पानी की तरह दैनिक जि़न्दगी की जरूरत बन गई है। इस कारण कच्चे तेल का आयात बढ़ता ही जा रहा है। हाल ही के कुछ महीनों में देश का व्यापार घाटा जिस तरह बढ़ा है उसमें अन्य बातों के अलावा कच्चे तेल का आयात भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों ने भी भारत की मुसीबतें बढ़ा दी हैं क्योंकि ईरान से उसे सस्ता तेल मिल जाया करता था। वैश्विक परिस्थितियां जिस तरह बदल रही हैं उनके मद्देनजर भारत में पेट्रोल-डीजल क्रमश: 100 और 90 रुपये प्रति लीटर तक पहुंचने की आशंका निर्मूल नहीं है। लेकिन हाथ पर हाथ धरे बैठने रहने से भी इसका हल नहीं निकलने वाला। सरकार की मजबूरी ये है कि वह पेट्रोलियम पदार्थों की राशनिंग करने जैसा अलोकप्रिय कदम भी नहीं उठा सकती। ऐसे में केवल एक ही बात जो आसानी से की जा सकती है और वह है उक्त वस्तुओं पर लगाया जा रहा कर घटाकर जनता को राहत देना। मोदी सरकार के सत्ता में आने बाद से लम्बे समय तक कच्चे तेल के दाम घटते गए या स्थिर रहे। बावजूद उसके पेट्रोल-डीजल की कीमतों में उसी अनुपात से कमी नहीं की गई जबकि वृद्धि होने पर कीमतें उछलते देर नहीं लगी। इस बारे में केंद्र सरकार ने जो आश्वासन अतीत में दिए उनके आधार पर जनअपेक्षा है कि कम कीमतें रहने के समय की गई मुनाफाखोरी के एवज में अब उसे राहत मिले जो न्यायोचित है। मोदी सरकार की तरफ से कई मंत्री इंफ्रास्ट्रक्चर संबंधी विकास कार्यों के लिए पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि का औचित्य साबित करते रहते हैं किंतु इससे अर्थव्यव्यस्था के बाकी क्षेत्र कितने प्रभावित होते हैं ये देखा जाना भी जरूरी है। बिन पानी सब सून की तरह अब बिन पेट्रोल-डीजल सब सून वाला दौर आ गया है। लेकिन भारत के इर्द-गिर्द स्थित छोटे-छोटे देशों तक में इनके दाम भारत की तुलना में काफी कम होना ये दर्शाता है कि हमारे देश में सरकार चाहे केंद्र की हो या फिर राज्यों की वह पेट्रोल-डीजल पर भारी-भरकम कर लगाकर आम जनता का तेल निकाल रही हैं। जीएसटी लागू होने के पहले उम्मीद थी कि सरकार पेट्रोलियम पदार्थो को उसके अन्तर्गत लाकर लोगों को राहत प्रदान करेगी किन्तु केंद्र सरकार की ढिलाई और राज्यों की रुखाई ने वह उम्मीद तोड़ दी जिससे सरकारी मुनाफाखोरी पूर्ववत जारी रही। अब जबकि पानी गर्दन से ऊपर आने को है तब एक बार फिर ये मांग उठना स्वाभाविक कि सैकड़ों अन्य वस्तुओं के साथ पेट्रोल-डीजल को भी जीएसटी के दायरे में लाकर उनकी कीमतों को युक्तियुक्त किया जाए। यद्यपि जीएसटी काउंसिल में शामिल राज्य इसके लिए कितने राजी होंगे ये कहना मुश्किल है लेकिन भाजपा और उसके सहयोगियों की अधिकतर राज्यों में सत्ता होने से ऐसा करना कठिन भी नहीं लगता। निकट भविष्य में कुछ राज्यों के साथ ही लोकसभा चुनाव भी सन्निकट हैं तब भाजपा के रणनीतिकार इस मामले में उदासीन क्यों हैं ये समझ से परे है। मोदी सरकार ने विभिन्न मोर्चों पर जो उपलब्धियां हासिल की हैं वे पेट्रोल-डीजल की कीमतों के आगे बेअसर होकर रह जाती हैं। चूंकि ये आम जनता से जुड़ा विषय है इसलिए चुनाव पर असर डाले बिना नहीं रहेगा। यदि अभी भी सरकार नहीं चेती तो फिर ये कहने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि भाजपा का हश्र 2004 की तरह हो सकता है जब स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की उज्ज्वल छवि और इंडिया शाइनिंग के धुआंधार प्रचार अभियान के बावजूद सत्ता उसके हाथ से खिसक गई थी। मौजूदा संदर्भ में नरेंद्र मोदी को लेकर भी वही स्थिति है। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने यदि बुद्धिमत्ता नहीं दिखाई तो चुनाव में सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबन्दी, जीएसटी और तीन तलाक जैसे मुद्दे काम नहीं आएंगे। भाजपा को अर्थशास्त्र की ये युक्ति नहीं भूलना चाहिए कि मनुष्य की प्रत्येक क्रिया आर्थिक परिस्थितियों से प्रभावित होती है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 25 August 2018

सत्ता में थे तब संघ पर रोक क्यों नहीं लगाई

राहुल गांधी ने लंदन में रास्वसंघ की तुलना अरब देशों के कुख्यात मुस्लिम ब्रदरहुड नामक संगठन से कर डाली। इसके पहले वे जर्मनी में भी संघ के विरुद्ध काफी कुछ बोल चुके थे। भाजपा और मोदी सरकार पर उनकी नीतिगत टिप्पणियां तो समझ में आती हैं किंतु रास्वसंघ की तुलना मुस्लिम ब्रदरहुड सरीखे संगठन से करना राहुल की अपरिपक्वता का एक और उदाहरण है। वैसे ये पहला अवसर नहीं है जब उन्होंने इस तरह का गैर जिम्मेदाराना बयान दिया हो। जर्मनी में डोकलाम विवाद पर उनकी टिप्पणी के बाद पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में वे निरुत्तर होकर रह गये थे। सिंगापुर में भी भारतीय समुदाय से संवाद करते हुए वे अनेक श्रोताओं के सवालों का जवाब नहीं दे पाए। इतेहां तो तब हो गई जब भारत में ही युवाओं के एक आयोजन में वे एनसीसी संबंधित प्रश्न पर बोल पड़े ये क्या है मुझे नहीं पता। शायद ही कोई महीना ऐसा जाता होगा जब कांग्रेस अध्यक्ष का कोई न कोई बयान उनकी और उनकी पार्टी की फज़ीहत न करवाता हो। राहुल अब राजनीति के नौसिखिया भी नहीं कहे जा सकते। एक दशक से भी ज्यादा समय से वे संसद में हैं। पहले उपाध्यक्ष और अब बतौर अध्यक्ष कांगे्रस पार्टी का नेतृत्व भी कर रहे हैं। ऐसे में उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे अपने सार्वजनिक बयानों को तथ्यों पर आधारित रखा करें किन्तु 50 के होने जा रहे राहुल कुछ न कुछ ऐसा बोल जाते हैं जिससे उनका बचकाना उजागर हो। रास्वसंघ के बारे में बोलकर वे अल्पसंख्यक समुदाय का तुष्टीकरण करना चाहते हैं। रास्वसंघ से सैद्धांतिक मतभेद रखना उनका अधिकार है और उस लिहाज से उनके द्वारा उसकी आलोचना करना स्वाभाविक है लेकिन विदेश में बैठकर संघ को मुस्लिम ब्रदरहुड जैसा आतंकवादी संगठन कहना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता। इस संबंध में सीधा -सीधा प्रश्न ये है कि 2004 से 2014 तक कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार के ज़माने में संघ पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया गया?  आखिर ये हिन्दू संगठन बीते चार साल में बदल गया हो ऐसा भी नहीं हैं। उसका गणवेश भले परिवर्तित हुआ हो लेकिन उसके सिद्धांत, नीतियां और कार्यप्रणाली नहीं बदली। यदि राहुल उसे मुस्लिम ब्रदरहुड जैसा संगठन मानते हैं तब उन्हें इस बात का जवाब भी देना चाहिए कि उनकी पार्टी की सरकार ने संघ के विरुद्ध क्या कार्रवाई की और नहीं तो क्यों? संघ पर गांधी जी की हत्या के आरोप में राहुल पर मानहानि का मुकदमा महाराष्ट्र की एक अदालत में विचाराधीन है। अब उन्होंने ये नया बखेड़ा खड़ा कर दिया। इस संबंध में उल्लेखनीय बात ये है कि रास्वसंघ पर कांग्रेस के शासनकाल में तीन मर्तबा प्रतिबंध लगाया जा चुका है लेकिन बाद में उसे उठाना पड़ गया। न्यायालय में भी इस संगठन के विरुद्ध अब तक कोई आरोप साबित नहीं हुआ। ये बात सही है कि संघ पूरी तरह से हिंदुओं का संगठन है किंतु उसकी तुलना मुस्लिम ब्रदरहुड से करना किसी भी दृष्टि से तर्कसंगत नहीं है। मुस्लिम ब्रदरहुड को अनेक अरब देशों ने प्रतिबन्धित कर रखा है किन्तु रास्वसंघ पर ऐसी कोई रोक उसकी विरोधी विचारधारा वाली सरकार द्वारा भी नहीं लगाया जाना राहुल की ताजा टिप्पणी को तथ्यहीन साबित करने के लिए पर्याप्त है। हाल ही में संघ के एक समारोह में पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी बतौर मुख्य वक्ता शामिल हुए थे। वे जीवन भर कांग्रेसी रहे और संघ के कटु आलोचक भी। उसके बावजूद यदि वे इस संगठन के मंच पर जाने में नहीं डरे तब ये मानना गलत नहीं है कि राहुल द्वारा संघ के बारे में आये दिन लगाए जाने वाले आरोप बे सिर पैर के हैं। वरना वे श्री मुखर्जी की संघ के आयोजन में जाने की सार्वजनिक आलोचना करते। केवल अपने राजनीतिक स्वार्थ पूरे करने के लिए संघ पर आरोप लगाने की ये परंपरा वैसे तो इंदिरा जी के समय से चली आ रही है। छद्म धर्मनिरपेक्षता के प्रभावस्वरूप मुस्लिम वोटों की लालच में संघ को कोसना काँग्रेस की नीति रही किन्तु उससे संघ को फायदा ही हुआ। जब-जब भी उस पर प्रतिबंध लगाए गए, वह और भी ताकतवर होकर निकला। आज यही एक ऐसा संगठन है जिसकी मौजूदगी पूरे देश में है। समाज के लगभग सभी क्षेत्रों में संघ के अनुषांगिक संगठन अपनी भूमिका का सफलतापूर्वक निर्वहन कर रहे हैं। पं नेहरू की जिस सरकार ने संघ पर पहला प्रतिबंध लगाया था उसी ने 1962 के चीनी हमले के बाद 1963 के गणतंत्र दिवस की परेड में रास्वसंघ को आमंत्रित किया और 3 हजार गणवेशधारी स्वयंसेवक राजपथ पर सेना के जवानों के पीछे-पीछे परेड करते हुए निकले। इसी तरह कन्याकुमारी में बने विवेकानन्द शिला स्मारक के सूत्रधार और रास्वसंघ के वरिष्ठ प्रचारक स्व.एकनाथ रानाडे के आमंत्रण पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी उस स्मारक का उद्घाटन करने गईं थीं जबकि उन्हें भलीभांति ज्ञात था कि उस स्मारक के निर्माण में स्व.रानाडे और उनके पीछे संघ की सक्रिय भूमिका रही। कहने का आशय इतना ही है कि जिस संघ को राहुल मुस्लिम ब्रदरहुड जैसा बता रहे है उसके कार्यों से उनके परनाना और दादी भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकीं। देश और विदेश में रास्वसंघ को आतंकवादी बताने वाले राहुल में हिम्मत है तो उन्हें अभी से ये घोषणा कर देनी चाहिए कि यदि सत्ता मिली तब वे रास्वसंघ और विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत उसके अनुषांगिक संगठनों पर प्रतिबंध लगा देंगे और यदि वे ऐसा नहीं करते तब उनके आरोप धूल में ल_ मारने जैसे ही होंगे। अतीत में दिग्विजय सिंह सरीखे नेताओं ने संघ को लेकर जिस तरह की सस्ती टिप्पणियां कीं उसका खामियाजा काँग्रेस भुगत चुकी है। राहुल ने उससे कोई सीख नहीं ली ये देखकर आश्चर्य होता है। गत दिवस एक समारोह में प्रसिद्द उद्योगपति रतन टाटा  संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत के साथ मंच पर बैठे। उसके बाद ये कहने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि प्रणव मुखर्जी और रतन टाटा को देश और दुनिया के बारे में जितनी समझ है उसके आगे राहुल गाँधी कहीं नहीं ठहरते। संघ को लेकर उनके ताजे बयान और टिप्पणियां न सिर्फ  उनके अपितु उनकी पार्टी के लिए भी कितनी नुकसानदेह होंगी ये जानने के लिए ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा क्योंकि चुनाव सन्निकट हैं ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 24 August 2018

सोशल मीडिया पर आत्मनियंत्रण जरूरी


व्हाट्स एप ने भारत सरकार के उस अनुरोध को ठुकरा दिया जिसमें असत्य और आधारहीन समाचारों का स्रोत बनाने कहा गया था। कंपनी का तर्क है कि ऐसा करने पर व्हाट्स एप का उपयोग करने वाले की निजता भंग हो जाएगी।  दरअसल ये सारा विवाद हाल ही में घटित कुछ हिंसक घटनाओं को लेकर व्हाट्स एप पर प्रसारित उन खबरों या संदेशों से उत्पन्न हुआ जो फारवर्डेड मैसेज कहलाते हैं। इस प्रक्रिया में ये पता लगाना कठिन होता है कि संदेश की शरूवात किसने की। भारत सरकार ने व्हाट्स एप संचालकों से उसी मूल स्रोत की जानकारी उपलब्ध करवाने की व्यवस्था करने कहा जिस पर उसने अपनी असमर्थता व्यक्त कर दी। वैसे हाल ही में किसी संदेश को 5 लोगों से ज्यादा भेजने पर रोक जरूर लग गई है किंतु उसके बावजूद भी व्हाट्स एप पर तथ्यहीन जानकारी और संदेशों के प्रसारण का सिलसिला नहीं रुक सका। इस बारे में ये कहना गलत नहीं होगा कि निजी अथवा सामूहिक संवाद के इस सरलतम माध्यम ने सोशल मीडिया को बहुत ही ताकतवर माध्यम बना दिया। इसके जरिये न सिर्फ  विचारों और सूचनाओं अपितु चित्रों का भी आदान प्रदान पलक झपकते संभव हो गया है।  इससे बढ़कर व्हाट्स एप फोन का काम भी करता है। वीडियो कॉलिंग का विकल्प तो सोने पे सुहागा जैसा है।  विदेश में रहकर अपने देश में संपर्क बनाये रखने में इसका उपयोग बेहद क्रांन्तिकारी साबित हुआ लेकिन जिस तरह  विज्ञान वरदान या अभिशाप जैसे विषय पर आज भी बहस चला करती है ठीक वैसे ही सोशल मीडिया खास तौर पर व्हाट्स एप भी लोगों को बोझ या सिरदर्द लगने लगा है। व्हाट्स एप पर बने समूह अपनी सार्थकता खोने लगे हैं। यद्यपि इसकी उपयोगिता और सम्प्रेषण में मिलने वाली मदद से इंकार करना सच्चाई से मुंह मोडऩे जैसा होगा किन्तु ये कहना भी गलत नहीं है कि उपयोगकर्ताओं के गैर जिम्मेदाराना आचरण ने इस माध्यम को विवादग्रस्त बनाते हुए इसकी विश्वसनीयता को सन्देह के घेरे में खड़ा कर दिया है। किसी अफवाह को व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी की उपज बताकऱ मज़ाक बनाना भी सामान्य हो गया है। हाल ही में भीड़ की हिंसा और ऐसे ही कुछ संवेदनशील मामलों में व्हाट्स एप के गलत उपयोग के बाद सरकार हरकत में आई और उसके संचालकों से किसी आपत्तिजनक खबर अथवा जानकारी के मूल स्रोत का पता लगाने की व्यवस्था करने कहा। जिसे उसने सिरे से नकार दिया और निजता के उल्लंघन का बहाना बनाकर हाथ खड़े कर दिए। केंद्र सरकार व्हाट्स एप पर प्रसारित होने वाली आपत्तिजनक जानकारी के दोषी का पता लगाने के लिए आगे क्या कदम उठाती है ये देखने वाली बात होगी क्योंकि अगर वह चुपचाप बैठ गई तब उसकी किरकिरी तो होगी ही व्हाट्स एप के उपयोगकर्ताओं में बैठे अनगिनत शरारती तत्वों का हौसला और बुलन्द होता जाएगा। सोशल मीडिया पर सिर्फ  असत्य खबरें ही नहीं अपितु अश्लील सामग्री प्रसारित करने का कारोबार खूब चल रहा है। दरअसल केंद्र सरकार की मुसीबत ये भी है कि विदेश में बैठा व्यक्ति बड़े आराम से भारत में कोई भी ऐसी बात प्रसारित कर देता है जो हमारे सामाजिक मूल्यों के अलावा देश की सुरक्षा, एकता और अखण्डता के लिए खतरा बन सकती है। पड़ोसी देश चीन ने तो फेसबुक और व्हाट्स एप के उपयोग पर ही रोक लगा रखी है। हालांकि इसका उद्देश्य चीनी जनता और विश्व समुदाय के बीच दूरी बनाए रखना भी है लेकिन अन्य कुछ देश और भी हैं जहां सोशल मीडिया के उपयोग पर पूरी  तरह रोक तो नहीं है लेकिन स्वतंत्रता को स्वच्छन्दता बनने से रोकने का पुख्ता इंतजाम जरूर हैं। भारत यद्यपि सूचना तकनीक के मामले में विश्व के अग्रणी देशों में है किंतु हमारे पास अभी तक वह तकनीक और इच्छाशक्ति नहीं है जो चीन अपनाता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था और स्वतंत्र न्यायपालिका भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर सोशल मीडिया पर किसी भी तरह के सरकारी नियंत्रण की इजाजत नहीं देते। यही वजह है कि किसी असत्य जानकारी का स्रोत पता करने के लिए सरकार को व्हाट्स एप से अनुरोध करना पड़ा। सरकार कानून बनाकर कितनी रोक लगा सकेगी ये भी कहना मुश्किल है। सही अर्थों में ये तो उपयोगकर्ता पर निर्भर करता है कि वह सोशल मीडिया का किस तरह उपयोग करे? तकनीक के विकास ने अब संचार और संवाद को इतना सस्ता, सरल और सुलभ बना दिया है कि वह आम आदमी के रोजमर्रे के उपयोग की चीज बन गये हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा होती है लेकिन गैर जिम्मेदार लोगों के हाथ लग जाने से वह नुकसानदेह हो जाती है। ये देखते हुए अब भारतीय उपयोगकर्ताओं को न सिर्फ  व्हाट्स एप अपितु फेसबुक सहित सोशल मीडिया के अन्य स्वरूपों में भी आत्मनियंत्रण का परिचय देना होगा। इसके पहले कि सरकार अथवा कोई और गैरजिम्मेदाराना गतिविधियों पर नियंत्रण लगाए लोगों को खुद सुधर जाना चाहिए। सोशल मीडिया को एंटी सोशल ताकतों से बचाना सरकार के साथ-साथ समाज का भी कर्तव्य है ।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 23 August 2018

कुलदीप नैयर : दो सदियों के गवाह

वरिष्ठ पत्रकार और टिप्पणीकार कुलदीप नैयर नहीं रहे । 95 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया । वे पत्रकारों की उस पीढ़ी के सदस्य थे जिसने अपनी युवावस्था में देश का विभाजन खुली आँखों से देखा और उसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव सदैव उन पर बना रहा । उच्च शैक्षणिक योग्यता से सम्पन्न स्व.नैयर ने अनेक पुस्तकें लिखीं जो आज के पत्रकारों के लिए पठनीय हैं क्योंकि उनमें उनके निजी अनुभवों के साथ विख्यात व्यक्तित्वों से जुड़ी वे बातें भी हैं जिनका देश की राजनीति से गहरा सम्बन्ध रहा । नेहरू सरकार के गृहमंत्री रहे स्व.लालबहादुर शास्त्री के प्रेस सलाहकार रहते हुए स्व.नैयर ने उनसे नेहरू के बाद कौन जैसा प्रश्न  पूछा तब शास्त्री जी ने जवाब दिया था कि उनके दिमाग में तो सिर्फ  उनकी लड़की (इंदिरा) ही हैं । इस वार्तालाप को कुलदीप जी ने अपनी एक चर्चित पुस्तक में उद्धृत भी किया था । शायद यही वजह रही कि आपातकाल के विरोध के कारण इंदिरा जी ने उन्हें जेल भेज दिया किन्तु वे डरे नहीं और मीसा कानून के विरुद्ध अदालत में जोरदार लड़ाई लड़ी। अनेक प्रतिष्ठित अखबारों के सम्पादक रहने के बाद वे बतौर स्तम्भ लेखक सक्रिय रहे । लंदन में भारत के उच्चायुक्त और राज्यसभा के नामांकित सदस्य के रूप में भी उन्होंने अपनी सेवाएं दीं । भारत-पाकिस्तान के संबंधों को सुधारने के लिए उन्होंने खूब कोशिशें कीं। 15 अगस्त को वाघा चौकी पर मैत्री स्वरूप मोमबत्तियां जलाने वाले आयोजन के वे सूत्रधार रहे किन्तु जीवन के अंतिम दौर में स्व.नैयर पत्रकारीय स्वतंत्रता से अलग वैचारिक भटकाव में फंस गए जिससे उनकी निर्विवाद स्वीकार्यता प्रभावित हुई लेकिन एक निर्भीक पत्रकार और विद्वान लेखक के रूप में उनका सम्मान सदैव बना रहा । उनके अवसान से पत्रकारिता जगत की बड़ी हस्ती चली गई । कुलदीप नैयर ने आज़ादी के 25 बरस पहले जन्म लिया और आज़ादी के 70 बरस  बाद तक जीवित रहे । इस प्रकार वे बीसवीं और इक्कीसवीं सदी के बेहद महत्वपूर्ण दौर के साक्षी रहे । युवा पत्रकारों को स्व.नैयर के व्यक्तित्व और कृतित्व का अध्ययन करना चाहिए क्योंकि वे उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे जिसने महात्मा गांधी से लेकर राहुल गाँधी , डॉ राममनोहर लोहिया से लेकर अखिलेश यादव, डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी से लेकर नरेंद्र मोदी और मोहम्मद अली जिन्ना से लेकर असदुद्दीन ओवैसी तक को देखा । 1947 में पाकिस्तान बनने और 1971 में उससे बांग्ला देश के अलग होने का दौर भी उनकी आंखों के सामने से गुजरा । इस आधार पर वे लगभग एक सदी के हालातों के गवाह रहे । उनका निधन एक मूर्धन्य पत्रकार के साथ देश के अतीत से जुड़े एक ऐसे बुजुर्ग का उठ जाना है जिसके पास सुनाने और बताने को बहुत कुछ था । विनम्र श्रद्धांजलि ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

कश्मीर : मुसलमान ही मार रहे मुसलमानों को

पिछली ईद पर फौजी जवान औरंगजेब की हत्या करने के बाद गत दिवस बकरीद पर कश्मीर घाटी में अलगाववादियों ने अपनी वीभत्सता का फिर परिचय दिया तथा अलग-अलग जगहों पर तीन पुलिसकर्मी सहित एक भाजपा नेता को मौत के घाट उतार दिया। इन घटनाओं से ये संकेत मिलता है कि आतंकवाद फैलाकर कश्मीर की आजादी के सपने देखने वाली अलगाववादी ताकतें अब निराश होकर बौखलाने लगी हैं। बीते एक-दो बरस के भीतर ही उन्होंने कश्मीर घाटी के ही फौजी तथा पुलिस के जवानों की जिस बेरहमी से हत्या की उसने उन परिवारों के भीतर आतंकवादियों के प्रति गुस्सा भर दिया। उनके जनाजे में भी क्षेत्रीय जनता बड़ी संख्या में शामिल हुई। प्राप्त जानकारी के मुताबिक सुरक्षा बलों की मुस्तैदी तथा केन्द्र सरकार द्वारा बरती जा रही कड़ाई के कारण घाटी के कुछ खास जिलों में ही अलगाववादी प्रभावशाली रह गए हैं। सीमा पार से होने वाली घुसपैठ पर भी काफी नियंत्रण हो गया है। अलगाववादी संगठनों को मिलने वाली आर्थिक सहायता के रास्ते भी बंद होते जा रहे हैं। इन सबसे परेशान होकर आतंकवादी अब राज्य पुलिस के जवानों को निशाना बनाने लगे हैं। इससे ये पता चल रहा है कि आतंकवाद विरोधी कार्रवाई में सेना के साथ ही पुलिस भी कंधे से कंधा मिलाकर शामिल है। वरना कुछ समय पहले तक ये माना जाता था कि घाटी के पुलिस कर्मी अलगाववादियों के प्रति नरम रवैया रखते हैं। और तो और गत दिवस श्रीनगर की हजरत बल मस्जिद में पूर्व मुख्यमंत्री डा. फारुख अब्दुल्ला के विरुद्ध हुई नारेबाजी और धक्का-मुक्की से भी ये स्पष्ट हो गया कि घाटी में भारत विरोधी ताकतों में एकजुटता खत्म हो गई है। हाल ही में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को श्रद्धांजलि देने दिल्ली में आयोजित सर्वदलीय श्रद्धांजलि सभा में फारुख द्वारा भारत माता की जय के नारे लगाए जाने से नाराज लोगों ने गत दिवस श्रीनगर में उनके साथ जो बदसलूखी की वह काफी कुछ कह गई। उल्लेखनीय बात ये है कि फारुख को कोई देशभक्त नहीं मानता। हाल ही में उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 35 ए को हटाए जाने संबंधी याचिका पर केन्द्र सरकार को जिस तरह धमकाया वह उनके मन में भरे भारत विरोध का ही उदाहरण था। यूं भी कश्मीर घाटी आज जिस त्रासदी से गुजर रही है वह अब्दुल्ला खानदान की ही देन है। फारुख तो यूं भी बहुत बड़ेे नाटकबाज हैं जो गिरगिट को भी रंग बदलने में मात दे सकते हैं। कल के अपमान के बाद उन्हें भी अच्छी तरह समझ में आ गया होगा कि जिस सपोलों को उन्होंने दूध पिलाकर पाला वे ही अब उनके आगे फन फैलाए फुफकार रहे हैं। बकरीद के दिन कश्मीर घाटी में पत्थरबाजी, भारत विरोधी नारे, पाकिस्तान और आईएसआईएस के झंडे आदि नई बात नहीं है किन्तु तीन पुलिसकर्मियों की हत्या से ये स्पष्ट हो गया कि भारत विरोधी ताकतों का हौसला टूटने लगा है। फारुख अब्दुल्ला और उनके बेटे उमर सहित पीडीपी प्रमुख मेहबूबा मुफ्ती के लिए यही समय है जब वे कश्मीर की राजनीति को देश की मुख्यधारा से जोड़ें वरना आने वाले कुछ बरसों के बाद नेशनल कान्फे्रंस और पीडीपी दोनों पूरी तरह अप्रासंगिक होकर रह जायेंगे। शेख अब्दुल्ला और मुफ्ती मोहम्मद सईद की औलादों के रूप में फारुख-उमर और मेहबूबा को जो लाभ मिल गया वह उनकी अगली पीढ़ी को मिलना नामुमकिन है क्योंकि कश्मीर घाटी के भीतर मुख्यधारा की राजनीति पूरी तरह असहाय होकर रह गई है। इसका इससेे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि मुख्यमंत्री बनने पर मेहबूबा मुफ्ती द्वारा रिक्त की गई लोकसभा सीट का उपचुनाव आज तक संपन्न नहीं हो सका। बकरीद पर हुई घटनाएं कश्मीर की जनता के साथ ही फारुख जैसे राजनीतिक नेताओं के लिए भी एक सबक हैं जो दिल्ली में आकर तो भारत माता की जय बोलते हैं लेकिन घाटी में लौटते ही अलगाववादियों के सुर में सुर मिलाने लगते हैं। एक ही दिन में तीन पुलिस कर्मियों की हत्या के बाद कश्मीर की जनता को भी ये समझ जाना चाहिए कि इस्लाम के नाम पर भारत का विरोध कर रहे अलगाववादी मुसलमानों के कितने हमदर्द हैं?

-रवीन्द्र वाजपेयी