Wednesday, 11 December 2019

शिवसेना : नीतिगत पलायन को मजबूर



नागरिकता संशोधन विधेयक पर शिवसेना ने लोकसभा में सरकार का साथ दिया था लेकिन कहा जा रहा है कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा नाराजगी व्यक्त किये जाने के बाद शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने पलटी मारी और राज्यसभा में विधेयक के समर्थन को लेकर किन्तु-परन्तु लगाते हुए शर्तें रख दीं। महाराष्ट्र और मराठी माणूस तक सीमित रहने वाले श्री ठाकरे को अचानक दूसरे राज्यों की चिंताएं भी सताने लगीं। पार्टी के अत्यंत मुखर प्रवक्ता संजय राउत से जब लोकसभा में समर्थन के बाद राज्यसभा में आनाकानी के बारे में पूछा गया तो वे बोले कि लोकसभा में जो हुआ उसे भूल जाओ। आज की भारतीय राजनीति में इस तरह से पलटी मारना कोई नई बात नहीं है। भाजपा के साथ बिहार में सरकार चला रहे जनता दल (यू) में भी इस विधेयक को समर्थन पर अंतर्कलह की खबर है। लेकिन उसका अनेक नीतिगत मामलों में भाजपा के साथ मतभेद जाहिर है परन्तु शिवसेना और भाजपा दोनों का वैचारिक आधार एक समान है। एनसीपी और कांग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री बनने के बाद विधानसभा में भी श्री ठाकरे ने भाजपा को सुनाते हुए साफ तौर पर कहा था कि हिंदुत्व उनकी स्थायी नीति है। लोकसभा में उक्त विधेयक का समर्थन किये जाने से लगा कि शिवसेना श्री ठाकरे के उस दावे को सही साबित कर रही है लेकिन गत दिवस उनके बयान से ऐसा महसूस हुआ कि शिवसेना सत्ता की लालच में कांग्रेस के दबाव के आगे झुकने को तैयार हो गई। राज्यसभा में उसका अंतिम रुख क्या रहेगा ये अभी तक साफ़ नहीं है लेकिन यदि उसने विरोध में मत दिया तब माना जाएगा कि उद्धव ठाकरे पूरी तरह जाल में फंस चुके हैं। उल्लेखनीय है तीन तलाक के मामले में कांग्रेस भी ऐसी ही दुविधा की शिकार थी। लोकसभा में तो उनकी पार्टी ने सरकार का साथ दिया लेकिन राज्यसभा में उसका निर्णय बदल गया। इस अलटी-पलटी का उसे जबर्दस्त नुकसान हुआ। क्योंकि वह मुसलमानों और हिन्दुओं में से किसी का भी विश्वास नहीं जीत सकी। शिवसेना ने सत्ता के लिये भले ही पूरी तरह विपरीत विचारधारा वाली पार्टियों से गठजोड़ कर लिया हो लेकिन उसकी छवि एक हिंदूवादी पार्टी की ही मानी जायेगी। और उससे हटने का परिणाम उसकी पहिचान नष्ट हो जाने के तौर पर सामने आये बिना नहीं रहेगा। नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध में अनेक नेताओं ने साफ तौर पर आरोप लगाया कि भाजपा, भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की राह पर चल रही है। शिवसेना की अपनी वैचारिक पृष्ठभूमि हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना से ही जुड़ी हुई थी। स्व. बाल ठाकरे ने कभी भी उसे छिपाया नहीं। उद्धव ठाकरे के अब तक के नीतिगत वक्तव्य भी प्रखर हिंदुत्व पर ही केन्द्रित थे लेकिन ऐसा लगता है सत्ता सुन्दरी के सान्निध्य में आते ही वे अपने स्वर्गीय पिता की तेजस्विता को तिलाजंलि देने को मजबूर हो गए। अभी तक भाजपा पर ये आरोप लगा करता था कि वह विपक्ष में रहते हुए जिन मुद्दों को लेकर आक्रामक रहा करती है उन्हें सत्ता में आने के बाद किनारे कर देती है। कांग्रेस ने तो उप्र विधानसभा के पिछले चुनाव में राम मन्दिर बनाने के वायदे के साथ ही अपना प्रचार शुरू किया था। राहुल गांधी ने अयोध्या के मंदिरों में मत्था टेक कर खुद को हिंदूवादी दिखाने का भरसक प्रयास किया। बाद में गुजरात और कर्नाटक विधानसभा चुनाव में तो वे हिन्दू नेता से भी एक कदम आगे बढ़कर ब्राह्मण के रूप में खुद को पेश करने लगे। मंदिरों और मठों में धोती पहिनकर अनुष्ठान करते हुए उनके चित्र भी खूब प्रसारित हुए। बाद में मानसरोवर की यात्रा करते हुए उन्होंने शिवभक्त होने का भी दावा किया। लेकिन उनके प्रयासों को आम जनता में कोई अहमियत नहीं मिली। दूसरी तरफ  सत्ता में आते ही अपने मूल मुद्दों से मुंह मोड़ लेने वाली भाजपा ने बड़ी ही चतुराई से तीन तलाक़ और अनुच्छेद 370 जैसे जटिल मामलों को आसानी से निपटा दिया। नागरिकता संशोधन भी उसकी नीतियों का ही हिस्सा है और जैसी कि राजनीतिक क्षेत्रों में चर्चा है कि इससे फुर्सत पाते ही मोदी सरकार समान नागरिक संहिता लागू करने की तरफ  कदम बढ़ाएगी। लोकसभा में परसों बोलते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने साफ कहा भी कि ये सब भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में किये गए वायदे ही थे। उस दृष्टि से देखें तो शिवसेना ने नागरिकता संशोधन विधेयक पर जिस तरह से अपने रुख में परिवर्तन के संकेत दिए उससे उसे तात्कालिक फायदा भले हो लेकिन दूरगामी नुकसान से वह नहीं बच सकेगी। राजनीति में स्थायी दोस्त और दुश्मन नहीं होने की बात को चाहे जितना भी स्वाभाविक मान लिया जाए लेकिन किसी पार्टी की नीतियां और सिद्धांत तो स्थायी होने चाहिए क्योंकि उन्हीं से तो उसकी पहिचान होती है। शिवसेना और भाजपा के बीच अधिकतर मुद्दों पर वैचारिक साम्यता होने के बावजूद आक्रामकता का अंतर जरूर था। दूसरी बार सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा ने अपनी मूल पहिचान को तो और भी पुख्ता कर लिया लेकिन जो शिवसेना बाबरी ढांचे के विध्वंस का श्रेय लेने में नहीं डरी वह श्रीमती गांधी की नाराजगी से ही अपनी नीति छोड़ बैठी। उद्धव ठाकरे भले ही पहली बार सत्ता में आए है लेकिन उन्हें राजनीतिक अनुभव काफी लम्बा है। उस आधार पर उनका बदला हुआ रुख चौंकाने वाला है। यदि आगे भी वे इसी तरह घुटने टेकते रहे तो बड़ी बात नहीं महाराष्ट्र में भी कर्नाटक के नाटक का मंचन हो जाए।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 10 December 2019

महंगा सौदा : विचार की कीमत पर सरकार



महाराष्ट्र में जोर का झटका धीरे से खा चुकी भाजपा को कर्नाटक विधानसभा की 15 सीटों के उपचुनावों के परिणामों से जबर्दस्त राहत मिली होगी। 12 सीटों पर उसके प्रत्याशी जीत गए वहीं जीता हुआ एक निर्दलीय उसका बागी है। कांग्रेस को मात्र दो सीटें मिलीं जबकि देवगौड़ा परिवार की पार्टी जनता दल (एस) का फट्टा साफ हो गया। ये उपचुनाव कांग्रेस और जनता दल (एस) से टूटकर आये विधायकों की सदस्यता रद्द होने के कारण हुए थे। इन सभी को भाजपा ने टिकिट दे दी। चुनाव परिणाम के बाद मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने जीते हुए 12 में से 11 विधायकों को मंत्री बनाये जाने का ऐलान कर दिया। इन नतीजों ने कर्नाटक में छाई राजनीतिक अस्थिरता दूर कर दी। येदियुरप्पा सरकार के पास अब पर्याप्त बहुमत हो गया है। भाजपा विरोधी जो गठबंधन विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस और जनता दल (एस) ने मिलकर बनाया था वह अपने ही अंतर्विरोधों में छिन्न - भिन्न हो गया। आजकल दोनों ही दल एक दूसरे को दोषी ठहराने में जुटे हैं। सही बात तो ये है कि कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया जनता दल (एस) के नेता कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनाने के पक्ष में नहीं थे किन्तु सोनिया गांधी ने भाजपा को किसी भी कीमत पर रोकने के लिए उनकी ताजपोशी करवा दी। कुछ महीनों तक तो इसे भाजपा की बड़ी शिकस्त के तौर पर देखा गया लेकिन लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिली शानदार जीत ने इस गठबंधन की जड़ें खोद दीं। इसमें दो राय नहीं कि भाजपा ने कुमारस्वामी सरकार को गिराने के लिये जो कुछ भी किया वह नैतिकता के लिहाज से किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता था क्योंकि जो विधायक कांग्रेस और जनता दल (एस) को छोड़कर आये वे भाजपा के सिद्धांतों के प्रति आकृष्ट तो थे नहीं। कुमारस्वामी सरकार में मंत्री पद नहीं मिलने से नाराज होकर भाजपा के साथ सौदेबाजी के चलते वे पाला बदलकर आ गये। चूँकि भाजपा के लिए भी सत्ता हासिल करना प्रमुख मिशन बन गया है इसलिये उसके दरवाजे सभी के लिए खोल दिए गए हैं। बीते दिनों महाराष्ट्र में देवेन्द्र फडऩवीस द्वारा एनसीपी के भ्रष्ट नेता कहे जाने वाले अजीत पवार के साथ आनन फानन में सरकार बनाने का जो प्रयोग किया गया उसके बाद ये पूरी तरह से स्पष्ट हो गया कि किसी भी तरह से सत्ता हासिल करने से भाजपा को परहेज नहीं रहा। लेकिन राजनीति नामक खेल के प्रचलित नियमों में अनुचित कुछ नहीं रहा इसलिए भाजपा को भी अपराधी होने से मुक्ति मिल जाती है। अब सवाल ये है कि क्या कांग्रेस से आये 11 विधायकों को मंत्री बना दिए जाने से पार्टी के भीतर असंतोष नहीं बढ़ेगा? यूँ भी सभी दलबदलुओं को टिकिट दिए जाने से पार्टी कार्यकर्ताओं में नाराजगी थी। महाराष्ट्र और हरियाणा में भी भाजपा ने अपने पुराने विधायकों और मंत्रियों की टिकिटें काटकर नए नवेले लोगों को उपकृत किया जिसका नुकसान भी उसे उठाना पड़ा। 2014 के बाद भाजपा ने अपना प्रभावक्षेत्र निश्चित रूप से राष्ट्रव्यापी बना लिया। यहाँ तक कि पूर्वोत्तर के लगभग सभी राज्यों में पार्टी की दमदार उपस्थिति महसूस की जाने लगी। त्रिपुरा से सीपीएम को उखाड़ फेंकने के साथ ही बंगाल में डेढ़ दर्जन से ज्यादा लोकसभा सीटें जीतना साधारण उपलब्धि नहीं कही जा सकती। बावजूद इसके ये कहना गलत नहीं होगा कि भाजपा का विकास भी हारमोन का इंजेक्शन लगाकर रातों-रात बढ़ाई गई लौकी जैसा ही है जो स्वादरहित होने के साथ शरीर को नुकसान भी पहुंचाती है। दरअसल 2014 में मिली ऐतिहासिक सफलता के बाद भाजपा के दिमाग आसमान पर चढ़े जिसके कारण वह अपने मूल आधार से कटने लगी। यही वजह है कि उसके परम्परागत गढ़ दिल्ली मप्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़ एक - एक कर उसके हाथ से निकल गए और हाल ही में महाराष्ट्र में भी वह गच्चा खा गयी। गुजरात में उसे फीकी जीत मिली वहीं हरियाणा में भी उसे बहुमत नहीं मिलने पर गठबंधन करना पड़ा। कर्नाटक में उपचुनावों के नतीजों से भले ही महाराष्ट्र का गम कुछ कम हो गया हो लेकिन इसे सैद्धांतिक जीत मान लेना सच्चाई से आँखें चुराने जैसा ही होगा। यूँ भी येदियुरप्पा की छवि भ्रष्ट नेता की है जो जेल तक जा चुके हैं। अतीत में भाजपा ने उन्हें बाहर का रास्ता भी दिखा दिया था लेकिन जातिगत समीकरणों के कारण उन्हें मजबूरन वापिस लाकर मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाना पड़ा। हालाँकि उन्होंने अपनी राजनीतिक ताकत और उपयोगिता दोनों साबित कर दीं। कर्नाटक में कांग्रेस और जनता दल (एस) की सरकार को गिराना येदियुरप्पा के ही बस की बात थी लेकिन उसके लिए भाजपा को जो भी करना पड़ा उससे उसका वैचारिक पक्ष कमजोर हुआ है। इसके पहले पूर्वोत्तर के राज्यों सहित गोवा में भी वह ऐसा कर चुकी है। लेकिन सत्ता की इस अंधी दौड़ में वह कहने को तो बहुत कुछ हासिल कर रही है लेकिन जो उसे खोना पड़ रहा है उसका मूल्य सत्ता से कई गुना ज्यादा है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 9 December 2019

मुआवजा: जिम्मेदारी से बचने का आसान तरीका



केंद्र के साथ ही दिल्ली और बिहार सरकार ने मरने वालों और घायलों के लिए मुआवजे की घोषणा कर दी। दिल्ली भाजपा संगठन ने भी आर्थिक सहायता देने की दरियादिली दिखाई है। बीते रविवार की सुबह देश की राजधानी की  अनाज मंडी नामक घनी बस्ती की एक गली में स्थित बैग बनाने वाली फैक्ट्री में आग लग गयी जिसकी वजह से वहां सो रहे 5 मजदूर तो जलकर मर गए और 38 धुंए की वजह से दम घुटने के कारण जान गँवा बैठे। गली इतनी संकरी थी कि फायर ब्रिगेड  को 400 मीटर दूर से पाइप लगाकर आग बुझानी पड़ी। जो चित्र आये हैं उनसे स्पष्ट है कि बिजली के खम्बों पर जिस तरह तारों के गुच्छे झूल रहे हैं उनकी वजह से कभी भी कुछ भी अनहोनी घट सकती है। आग कैसे लगी ये तो जाँच से पता चलेगा लेकिन जो स्थितियां घटनास्थल की बताई जा रही हैं उनके अनुसार फैक्ट्री पूरी तरह से अवैध थी। उसका पंजीयन और प्रदूषण नियंत्रण विभाग से अनापत्ति जैसी जरूरी  औपचारिकताएँ पूरी नहीं थी। इसका कारण ये था कि उस स्थान पर इस तरह के कार्य की अनुमति ही सम्भव नहीं थी। फैक्ट्री में कार्यरत अधिकतर मजदूर बिहार के बताये जाते हैं। कम मजदूरी की वजह से वे सभी उसी परिसर में रहते और सोते थे। दिल्ली के अनेक इलाके इतने घने बसे हैं कि वहां किसी तरह का विकास संभव ही नहीं है। एक तरफ तो राष्ट्रीय राजधानी होने के कारण एक हिस्सा अंतर्राष्ट्रीय मानकों के मुताबिक विकसित  करने की मुहिम चला करती है वहीं बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जो बदहाली का जीता जागता प्रमाण है। और वहां रह रहे लोग नारकीय हालातों में जिन्दगी गुजारने मजबूर हैं। इन इलाकों में हजारों इस तरह के कारोबार चलते हैं जिनकी कोई अनुमति नहीं ली गयी। संकरी गलियों के कारण वहां अग्नि शमन वाहनों का पहुंचना संभव नहीं है। बिजली के तार भी खतरनाक तरीके से झूलते देखे जा सकते हैं। संक्षेप में कहें तो ये इलाके अव्यवस्था के  समानार्थी हैं। चूंकि दिल्ली में विधानसभा चुनाव नजदीक है इसलिए सरकारों के अलावा दिल्ली भाजपा ने भी मरने वालों को पांच लाख देने की मेहरबानी की। दिल्ली में बिहारी मतदाता बहुत बड़ी संख्या में बसे हुए हैं। इसीलिये पार्टी ने भोजपुरी गायक मनोज तिवारी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया। दिल्ली में राज्य सरकार आम आदमी पार्टी की है तो नगर निगम भाजपा के कब्जे में। दोनों तरफ से आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला भी चल पड़ा है। सरकारी और गैर सरकारी दोनों स्तरों पर दु:ख व्यक्त किये जाने की औपचारिकता भी निभाई जा रही है। फैक्ट्री मालिक को गैर इरादतन हत्याओं के आरोप में गिरफ्तार भी किया जा चुका है। 1997 में दिल्ली के उपहार सिनेमा में हुए अग्निकांड के बाद भी काफी हल्ला मचा था। लेकिन दो दशक से ज्यादा बीत जाने पर भी राष्ट्रीय राजधानी की दुर्दशा दूर नहीं हुई। बल्कि ये कहना भी गलत नहीं होगा कि हालात और बदतर हो गए हैं। जिस महानगर में केंद्र , राज्य और स्थानीय तीनों शासन एक साथ मौजूद हों वहां इंसानी जिंदगियां इस तरह सस्ते में जलने और घुटने से खत्म हो जाएँ तो डूब मरने की बात है। केवल मुआवजा  बाँट देने और फैक्ट्री मालिक को गिरफ्तार कर दण्डित कर देना ही समस्या का हल नहीं है। नगर निगम के अमले के अलावा उस क्षेत्र के पार्षद की भी ये जिम्मेदारी थी कि वह इस तरह के अवैध कारोबारों पर रोक लगवाता। लेकिन उसको तो केवल वोट बटोरने से मतलब रहता है। प्रश्न ये है कि बीते सात दशक की आजादी के बाद भी यदि देश की राजधानी के भीतर लाखों लोग कीड़े-मकोड़े की तरह बसर करने बाध्य हों तब शहरी विकास पर लुटाये जाने वाले करोड़ों-अरबों रूपये का औचित्य क्या है ? मोदी सरकार ने देश में सौ स्मार्ट सिटी बनाने की जो योजना शुरू की वह कितनी सफल है उसके लिए ज्यादा दूर जाने की जरूरत ही क्या है जब केंद्र सरकार की नाक के नीचे आधा सैकड़ा के लगभग लोग दर्दनाक हालातों में मारे जाएँ। हमारे देश में हर समस्या का हल मुआवजा मान लिया गया है। बलात्कार और दुर्घटना के शिकार लोगों को मुआवजा, घायलों को इलाज और ज्यादा हुआ तो प्रभावित परिवार के किसी सदस्य को सरकारी नौकरी जैसे तरीके अपनाकर जनाक्रोश शांत करने का प्रयास किया  जाता है। लेकिन स्थायी हल की तरफ ध्यान नहीं दिए जाने से बीमारी यथावत बनी रहती है। संदर्भित  दुर्घटना चूँकि दिल्ली में घटित हुई इसलिए वह राष्ट्रीय स्तर का समाचार बन गई किन्तु ईमानदारी से सर्वेक्षण करें तो देश के सभी हिस्सों में हादसों के ऐसे ही अड्डे मौजूद हैं जिनकी अनदेखी के पीछे लापरवाही भी है और सरकारी विभागों का भ्रष्टाचार भी। आम जनता और जनप्रतिनिधि भी उदासीन रहते है। शहरों में बढ़ती आबादी के कारण पुरानी बसाहट वाले इलाकों में सर्वत्र अव्यवस्था का बोलबाला नजर आता है। विकास के नाम पर बेतहाशा धन खर्च होने के बाद भी करोड़ों लोग बदहाली में जीने मजबूर हैं। कुछ दिन हल्ला मचेगा और सरकारी विभाग भी मुस्तैदी दिखायेंगे लेकिन इसी बीच कहीं दूसरी घटना हो जायेगी जिसके बाद पूरा ध्यान उस पर केन्द्रित हो जायेगा। गलतियों से नहीं सीखना हमारा राष्ट्रीय चरित्र बन गया है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 7 December 2019

ज्वालामुखी के सक्रिय होने का संकेत .....



हैदराबाद पुलिस ने कल सुबह उन चारों को मार गिराया जिन्हें बीते सप्ताह एक महिला पशु चिकित्सक के साथ दुष्कर्म करने के बाद जलाकर मारने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। बकौल पुलिस गत दिवस प्रात:काल वह चारों आरोपियों को जाँच के सिलसिले में दुष्कर्म की जगह लेकर गयी थी। वह समय इसलिए चुना गया जिससे कि वहां भीड़ एकत्र न हो जाये। जाँच के दौरान उन चारों ने भागने की कोशिश की। पुलिस से हथियार छीने और फिर हमला कर दिया, ईंट और पत्थर भी उठाकर फेंकने शुरू कर दिए जिससे दो पुलिस कर्मी घायल भी हो गए। आत्मरक्षार्थ पुलिस ने गोलियां चलाईं और चारों आरोपी ढेर हो गए। एन्काउटर की खबर देश भर में फैल गयी। घटनास्थल पर जनता की भीड़ आ गई। पुलिस जिंदाबाद के नारे लगने लगे, पुष्पवर्षा हुई। पुलिसवालों को जनता ने कन्धों पर उठा लिया। पूरे देश में हैदराबाद पुलिस की प्रशंसा के पहाड़ खड़े किये जाने लगे। चंद अपवाद छोड़कर सभी ने माना कि बलात्कारियों को इसी तरह दंडित किया जाना चाहिए। रात में घर लौट रही उक्त महिला चिकित्सक के साथ हुए अमानवीय हादसे के बाद से देश भर में आक्रोश था। महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को लेकर जबर्दस्त बहस चल पड़ी। सड़क से संसद तक गुस्सा दिख रहा था। राज्यसभा में जया बच्चन ने दुष्कर्मियों को जनता के हवाले करने जैसा सुझाव तक दे डाला। बलात्कार की बढ़ती घटनाओं के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारणों के साथ उन्हें रोकने के विभिन उपायों पर भी विमर्श चल पड़ा। निर्भया कांड के दोषियों को अब तक फांसी नहीं लगने को लेकर व्यवस्था पर पर सवाल कड़े किये जाने लगे। न्यायपालिका की सुस्ती को कठघरे में खड़ा किया गया। अदालत द्वारा फांसी सुनाये जाने के बाद भी दया याचिका के नाम पर दोषियों को जीवित रखे जाने की आलोचना होने लगी। कोई इस्लामी कानून के अनुसार दण्डित करने की सलाह देने लगा तो किसी ने उन्हें नपुंसक बनाने जैसा सुझाव दे डाला। जिसके मन में जो आया उसने वह कहा। हालाँकि हैदराबाद पुलिस ने 24 घंटों के भीतर ही चारों आरोपियों को पकड़ लिया था लेकिन उसके बाद भी देश भर से आती रही बलात्कार की खबरों ने जनता के गुस्से को और बढ़ा दिया। विशेष रूप से लड़कियां जिस तरह से मुखर होकर सामने आईं वह समाज में दुष्कर्म को लेकर व्याप्त असंतोष का परिचायक माना गया। ये सब चल ही रहा था कि उप्र के उन्नाव में एक और दर्दनाक काण्ड हो गया। एक वर्ष पहले एक युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म के आरोप में जेल में बंद आरोपियों ने जमानत पर छूटकर आने के बाद उस युवती को चाकू से घायल किया और फिर तेल डालकर आग लगा दी। जलती हुई अवस्था में वह युवती लगभग एक किलोमीटर दौड़ती हुई अपने घर के पास आकर गिर गई। बाद में उसे दिल्ली इलाज के लिए भेजा गया लेकिन 90 फीसदी जली होने के कारण गत रात्रि उसका देहांत हो गया। उक्त घटना के बाद हैदराबाद काण्ड से उपजा गुस्सा चरम पर जा पहुंचा। ऐसे में जब हैदराबाद पुलिस द्वारा चारों आरोपियों को मार गिराने की खबर आई तो उसके समर्थन में जो सकारात्मक प्रतिक्रियाएं सुनने मिलीं उनसे लगा कि जनता का गुस्सा कुछ कम हुआ। जो पुलिस खलनायक थी वही अचानक महानायक बन गयी। लेकिन ज्यों ज्यों दिन आगे बढ़ा त्यों-त्यों एन्काउन्टर की सत्यता और औचित्य पर सवाल भी खड़े किये जाने लगे। असदुद्दीन ओवैसी के अलावा, सीताराम येचुरी, अरविन्द केजरीवाल और भाजपा की मेनका गांधी ने पुलिस की कार्रवाई को न्याय व्यवस्था का उल्लंघन बताया। यहाँ तक कहा गया कि यदि इस तरह से चलेगा तो फिर न्यायालयों की जरूरत ही क्या रह जायेगी? अतीत में हुए अनेक फर्जी एन्काउटरों के हवाले से पुलिस द्वारा बताई कहानी की विश्वसनीयता को भी संदेह  के घेरे में रखा जाने लगा। हालाँकि मारे गये आरोपियों के प्रति किसी ने हमदर्दी दिखाने की जुर्रत तो नहीं की किन्तु ये पूछने वाले भी सामने आ गये कि पुलिस ने जिन चारों को आरोपी बनाकर पकड़ा वे वास्तविक अपराधी थे या जनता के गुस्से से बचने के लिए चार निरपराधों को बलि का बकरा बना दिया गया ये भी कहा गया कि किसी को बचाने के लिए किसी और के गले में फंदा डाल दिया गया। राजनीतिक पार्टियों के भीतर भी मतभिन्नता दिखी। रामगोपाल यादव और जया बच्चन अलग जुबान में बोले तो अरविंद केजरीवाल और उनके राज्यसभा सदस्य संजय सिंह की प्रतिक्रिया भिन्न थी। मायावती ने तो उप्र की पुलिस को भी हैदराबाद पुलिस का अनुसरण करने की समझाइश दे डाली। दूसरी तरफ इस बात पर चिंता भी जताई गयी कि एन्काउंटर की सत्यता जाने बिना चार लोगों की मौत पर जश्न मनाना उन्माद और अपरिपक्वता का परिचायक है जिसके दूरगामी नतीजे खतरनाक होंगे। समूची प्रतिक्रियाओं का लब्बोलुआब ये रहा कि बलात्कार के दोषियों को जल्द से जल्द कड़े से कड़ा दंड मिलना चाहिए। इसके लिए न्याय प्रक्रिया को तदनुसार ढालने की जरूरत पर भी बल दिया गया। हैदराबाद पुलिस के कृत्य की जांच उच्च न्यायालय ने आदेशित कर दी है। मावाधिकार आयोग का दौरा कार्यक्रम बन गया है। मृतकों के पोस्ट मार्टम की वीडियो बनाने कह दिया गया है। दो चार दिनों में मामला ठंडा होने के बाद भी आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला जारी रहेगा। राजनीतिक रोटियां सेंकी जाती रहेंगी। और तब तक उन्नाव की तरह दूसरा कोई जघन्य कांड हो जाएगा। सवाल ये है कि समाज में व्याप्त गुस्से को शांत करने का तरीका क्या है? उन्माद किसी भी दृष्टि से उचित नहीं होता। भीड़ की विवेकशून्यता भी प्रमाणित सत्य है। लेकिन आम जनमानस इस हद तक उत्तेजित क्यों और कैसे हो गया ये सोचने की जरूरत कोई नहीं समझ रहा। हैदराबाद पुलिस ने जनता के गुस्से पर पानी डालने के लिए वह कदम उठाया। यदि ये मान लिया जाए तब भी इस सवाल का जवाब तो ढूंढना ही पड़ेगा कि आखिर जनता इतने गुस्से में क्यों आई? पुलिस को कानून हाथ में लेने का अधिकार नहीं है। लेकिन कल जिस तरह की उग्र प्रतिक्रियाएँ सुनने मिलीं उनमें बिना कुछ कहे भी न्यायपालिका निशाने पर आ गयी। ये कहना गलत नहीं होगा कि दुष्कर्मियों को न्याय प्रणाली से बाहर निकलकर उनके किये की सजा देने जैसी भावना का प्रगटीकरण सोये हुए ज्वालामुखी के सक्रिय होने का संकेत है। इसे ठीक तरह से नहीं समझा गया तो उससे निकलने वाला लावा कितना नुक्सान पहुंचाएगा ये कह पाना कठिन है। संसद और सरकार तो जब करेंगे तब करेंगे लेकिन समाज को भी तो अपनी जिम्मेदारी और भूमिका तय करनी होगी क्योंकि अंतिम परिणाम तो उसे ही भोगने पड़ते हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 6 December 2019

लगे हाथ पूर्व सांसदों की मुफ्तखोरी भी रोकी जाए



हालाँकि इतने बड़े देश की अर्थव्यवस्था में 17 करोड़ बहुत बड़ी रकम नहीं है लेकिन कुछ बातें ऐसी हैं जिनका सांकेतिक महत्व होता है। उस दृष्टि से संसद की कैंटीन में मिलने वाले भोजन पर दी जाने वाली रियायत खत्म करने का निर्णय आम जनता के मन को संतोष देने वाला है। संसद भवन की कैंटीन में केवल वर्तमान एवं पूर्व सांसद ही नहीं उनके साथ आये लोगों के अलावा संसद भवन में कार्यरत कर्मचारी भी भोजन, नाश्ता आदि ग्रहण करते हैं। वहां खाने की चीजें इतनी सस्ती हैं कि दातों तले उंगली दबाने मजबूर हो जाना पड़ता है। पहले तो इस तरफ  किसी का ध्यान नहीं गया लेकिन बीते कुछ सालों जब भी खाने-पीने की चीजें महंगी होतीं तब-तब संसद की कैंटीन का सस्ता भोजन आलोचना और ईष्र्या का विषय बन जाता। 2014 में मोदी सरकार आने के बाद कीमतें थोड़ी बढ़ाई गईं लेकिन उसके बाद भी इस कैंटीन में खाना बाजार के सस्ते से सस्ते रेस्टारेंट की अपेक्षा बेहद मामूली दाम पर उपलब्ध था। धीरे-धीरे सांसदों को भी जनता के मन में व्याप्त नाराजगी का एहसास हुआ और फिर एक समिति बनाकर इस रियायत को खत्म करने का विचार शुरू हुआ जो गत दिवस जाकर अंजाम पर पहुँच सका। 2 रूपये की चपाती और 5 रूपये की दाल आज के दौर में कल्पनातीत है लेकिन संसद की कैंटीन में इसी कीमत पर इनकी उपलब्धता निश्चित रूप से जनता को खलने वाली थी। चिकन करी और मटन करी जैसे मांसाहारी व्यंजन क्रमश: 50 और 45 रुपये में मिलना भी सपने देखने जैसा है। मात्र 5 रु. में बढिय़ा चाय और कॉफी भला दिल्ली की फुटपाथों पर खड़े ठेले पर भी नहीं मिलेगी। स्मरणीय है प्रधानमंत्री बनने के बाद एक बार नरेंद्र मोदी भी इस कैंटीन में खाना खाने जा पहुंचे थे और उन्होंने उसका बाकायदा भुगतान भी किया। शाकाहारी भोजन का उनका देयक मात्र 50-60 रु. ही बना। हो सकता है वे इस कैंटीन की सस्ती दरों को लेकर होने वाली आलोचना के मद्देनजर ही मुआयना करने गए हों। सच्चाई जो भी हो, बहरहाल गत दिवस तदाशय की खबरें आ गईं जिनके अनुसार संसद भवन की कैंटीन में मिलने वाला सस्ता भोजन अब सामान्य दरों पर ही उपलब्ध होगा। रेलवे द्वारा इस कैंटीन को होने वाले घाटे की आपूर्ति सरकार करती रही। हालाँकि जैसा कि पूर्व में कहा गया कि केवल सांसद ही नहीं बल्कि संसद भवन में कार्यरत कर्मचारी, अधिमान्य पत्रकार, संसद की कार्रवाई देखने आने वाले पासधारी भी इस कैंटीन के सस्ते भोजन का लाभ उठाते थे परन्तु आलोचना का केंद्र केवल सांसद ही बनते रहे। यद्यपि 1 जनवरी 2016 से इस कैंटीन में लागत खर्च पर भोजन सामग्री बेची जाने की व्यवस्था की गयी थी किन्तु उसके बाद भी जो दरें निर्धारित की गईं वे बहुत ही कम थीं। इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है हमारे देश में चली आ रही वीआईपी संस्कृति। वाहनों पर बत्तियां लगाना बंद होने के बाद मोदी सरकार ने दिल्ली में सरकारी बंगला घेरे बैठे नेताओं पर भी शिकंजा कसा। सांसद नहीं रहने पर भी सरकारी फ्लैट या बंगला कब्जाए रहने की सुविधा छीन लिए जाने से सरकार का करोड़ों रु. बच गया। वरना नए सांसदों को आवास खाली नहीं होने के कारण पांच सितारा होटलों में ठहराया जाता था। हाल ही में गांधी परिवार की एसपीजी सुरक्षा खत्म किये जाने पर हुए विवाद में भी ये बात चर्चा में आई कि आखिर कब तक किसी व्यक्ति या परिवार को प्रधानमन्त्री स्तर की सुरक्षा दी जाए, जिस पर लाखों रु. रोज का खर्चा होता है। भारत में लोकतंत्र है जिसे जनता के द्वारा, जनता का और जनता के लिए शासन कहा जाता है। लेकिन बीते सात दशक के दौरान लोक और तन्त्र के बीच का अंतर लगातार बढ़ाया जाता रहा। ये अच्छी बात है कि जनप्रतिनिधियों को मिल रही सुविधाएँ अब जनचर्चा का विषय बनने लगी हैं। संसद की कैंटीन में मिलने वाले सस्ते भोजन पर मात्र 17 करोड़ की सब्सिडी से देश गरीब नहीं हो रहा था लेकिन इसके कारण आम जनता के मन में ये भाव जरुर पैदा होता था कि लोकशाही के इस दौर में भी राजा और प्रजा के बीच अंतर है। इसी तरह सांसदों के वेतन और भत्तों में चाहे जब की जाने वाली वृद्धि भी जनाक्रोश का बड़ा कारण बनती रही है। इसे लेकर भी मोदी सरकार ने व्यवस्था की है। अपने वेतन-भत्ते बढ़ाने में सांसदों द्वारा की जाने वाली मनमानी रोकने के लिए आयोग की व्यवस्था भी चर्चा में है। लुटियंस की बनाई दिल्ली के पुराने बंगले तोड़कर बहुमंजिला इमारतों में फ्लैट बनाकर सांसदों को उनमें रखने की शुरुवात भी हो चुकी है जिससे उनकी सुरक्षा और सुविधाओं पर होने वाला खर्च तो घटा ही, साथ ही बेशकीमती सरकारी जमीन भी खाली हो गई। मोदी सरकार ने सांसदों और मंत्रियों की सुख-सुविधाओं को घटाने लिए अनेक कदम उठाये हैं लेकिन पूर्व सांसदों को मिलने वाली पेंशन, मुफ्त रेल यात्रा पास और इलाज की जो सुविधा है उस पर भी विचार होना चाहिए। लम्बी समयावधि तक सांसद रहे व्यक्ति के पास यदि कमाई का कोई साधन न हो और उसने केवल जनसेवा में ही खुद को समर्पित कर रखा हो तब तो उसके शेष जीवन के लिए सरकार को सोचना चाहिए लेकिन जिनके पास आय के पर्याप्त साधन हों और जो सियासत के साथ ही किसी व्यवसाय से जुड़े हुए हों उनको जीवन भर दी जाने वाली मुफ्त सुविधाएँ सरासर गलत हैं। एक दिन भी सांसद रह जाने वाला उम्र भर सरकारी दामाद बनकर रहे ये लोकतंत्र का मजाक नहीं तो और क्या है ? संसद की कैंटीन में सस्ता भोजन बंद होने के बाद पूर्व सांसदों की मुफ़्तखोरी पर भी रोक लगाना जनापेक्षा है। उनकी देखासीखी पूर्व विधायकों के लिये भी जनता के कर की मोटी रकम मुफ्त लुटाई जाने लगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 5 December 2019

नागरिकता संशोधन : राजनीतिक हित से जरूरी राष्ट्रहित



केंद्र सरकार द्वारा संसद में पेश किये जाने वाले नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर राजनीतिक हल्ला शुरू हो गया है। गत दिवस इसे मंत्रिपरिषद की मंजूरी मिलने के बाद विपक्षी दलों की मोर्चेबंदी भी तेज हो चली है। लोकसभा में तो सरकार के पास पर्याप्त बहुमत है इसलिए विधेयक को पारित करवाने में विशेष दिक्कत नहीं जायेगी। लेकिन जहां तक राज्यसभा का प्रश्न है तो शिवसेना के एनडीए से अलग होने के बाद भाजपा को उच्च सदन में संख्याबल जुटाना होगा। तीन तलाक और अनुच्छेद 370 जैसे मुद्दों पर राज्यसभा में जिस आसानी से सरकार ने बहुमत हासिल किया उसकी वजह से सत्ता पक्ष आत्मविश्वास से भरपूर है किन्तु ये कहना भी गलत नहीं होगा कि सत्ता पक्ष में ही पूर्वोत्तर के अनेक सांसद इस विधेयक से नाराज हैं। दरअसल इस विधेयक का मूल उद्देश्य उन गैर मुस्लिमों को भारत की नागरिकता देने के नियम आसान करना है जो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से निर्वासित होकर भारत आने मजबूर हो जाते हैं। इनमें से अनेक ऐसे हैं जो वर्षों पहले वहां से प्रताडि़त होकर भारत आ गए थे लेकिन नागरिकता नहीं मिलने से अभी भी कानूनी रूप से भारत के नागरिक नहीं बन पाए। इनके भारत आने के पीछे मुख्य वजह वहां धार्मिक आधार पर इनका उत्पीडऩ ही है। जिन तीन देशों से आने वालों के लिए ये सुविधा प्रस्तावित है वहां से न सिर्फ  हिन्दुओं बल्कि जैन, बौद्ध, पारसी, सिख और ईसाई धर्मावलम्बियों को प्रताडि़त किए जाने की खबरें आम हैं। उनके धर्मस्थल या तो नष्ट किये जा रहे हैं या फिर उन्हें अपवित्र करने की हरकतें होती हैं। बहू-बेटियों का अपहरण करते हुए उन्हें मुसलमान बनाने की घटनाएँ भी आम होती जा रही हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिन्दुओं सहित बाकी गैर मुस्लिम धर्म के अनुयायियों की जनसंख्या निरंतर घटती जा रही है। वहीं अफगानिस्तान में तालिबान के उदय के बाद से हिन्दू और सिख अपने को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। नागरिकता संशोधन विधेयक में केवल छह धर्मों से जुड़े लोगों को भारतीय नागरिकता देने के नियमों में लचीलापन लाने की वजह से भाजपा के परम्परागत विरोधी दल उसका विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि ऐसा करना धार्मिक आधार पर भेदभाव होगा। उक्त तीन देशों से आने वाले गैर मुस्लिम लोगों को नागरिकता देने के मामले में भारत में उनके रहने की समयावधि घटा दी गई है। वहीं उनके पास कोई वैध दस्तावेज नहीं होने पर भी उन्हें जेल नहीं भेजा जाएगा। ममता बैनर्जी और आरजेडी सहित कांग्रेस और वामपंथी विशेष रूप से इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं लेकिन भाजपा से हाल ही में अलग हुई शिवसेना ने भी धार्मिक आधार पर नागरिकता देने का सैद्धांतिक आधार पर विरोध करने का जो इशारा किया वह महाराष्ट्र की सत्ता मिलने के साथ जुड़ी मजबूरी का नतीजा माना जा रहा है। वैसे ताजा जानकारी के अनुसार शिवसेना खुद को मुस्लिमपरस्त कहलाने से बचने के लिए मतदान के दौरान सदन से बहिर्गमन करने की रणनीति पर चलेगी। लेकिन उसका ऐसा करना चौंकाने वाला होगा। नागरिकता संशोधन विधेयक का ज्यादातर लाभ उक्त तीन देशों से पलायन कर भारत आये हिन्दुओं को ही मिलेगा क्योंकि उनकी संख्या ज्यादा है। चूँकि हिन्दुओं का दुनिया में और कोई देश नहीं है इसलिए उनका भारत आना ही स्वाभाविक है। विशेष रूप से ऐसे लोगों के लिए तो भारत ही आसरा है जिनकी आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है। हिन्दुओं के बाद सबसे ज्यादा ऐसे लोग सिख हैं जो मुख्य रूप से पाकिस्तान और अफगनिस्तान से आये हैं। पूर्वोत्तर राज्यों के हिन्दुओं को ये डर सताने लगा है कि बांग्लादेश से आये हिन्दू इन राज्यों के नागरिक बनकर वहां के मूल वाशिंदों के अधिकारों में बटवारा करेंगे। सवाल और भी हैं। लेकिन इस विधेयक का सकारात्मक पहलू ये भी है कि उसमें केवल हिन्दू, सिख, बौद्ध और जैन ही नहीं बल्कि पारसी और ईसाई भी भारत की नागरिकता आसानी से हासिल करने के पात्र हो जायेंगे। जहां तक बात मुसलमानों को दूर रखने की है तो सरकार का मानना है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान चूँकि इस्लामिक देश हैं इसलिए वहां के मुसलमानों को भारतीय नागरिकता देने का कोई औचित्य नहीं है और ऐसा करने से बांग्लादेश से आने वाले मुसलमानों की संख्या को सम्भालना मुश्किल होगा। 1971 के बाद से भारत में घुस आये बांग्लादेशियों की समस्या पहले से ही लाइलाज बनी हुई है। एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर) नामक योजना भी विसंगतियों की शिकार होकर रह गई। उस दृष्टि से नागरिकता संशोधन विधेयक काफी उदार होगा क्योंकि इसमें हिन्दुओं के अलावा जैन, सिख और बौद्धों के साथ ही पारसी और ईसाईयों को भी भारतीय नागरिकता देने के नियमों में दी जा रही ढील का लाभ मिलेगा। जो भी पार्टियां इसका विरोध कर रही हैं उनकी चिंता का विषय केवल इतना है कि विधेयक पारित होने के बाद बरसों से भारत में रह रहे हिन्दुओं का नाम मतदाता सूची में शामिल हो जाएगा। दूसरी तरफ  जो मुस्लिम उक्त तीन देशों से बिना वैध दस्तावेजों के भारत आकर रह रहे हैं उन्हें नागरिक नहीं बनाये जाने से वे घुसपैठिये माने जायेंगे मतदाता सूची से तो उनका नाम अलग होगा ही शासन द्वारा दी जाने वाली बाकी सुविधाओं से भी उन्हें वंचित किया जाएगा। कांग्रेस, वामपंथी और तृणमूल कांग्रेस के साथ ही आरजेडी जैसी पार्टियों को मुस्लिम मतदाताओं के हाथ से खिसक जाने का भय सताने लगा है लेकिन इस विधेयक को देश के दूरगामी राष्ट्रीय हितों के परिप्रेक्षय में देखा जाना चाहिए। शिवसेना जैसी पार्टी द्वारा विधेयक के समर्थन की बजाय सदन से गैर हाजिर रहने का संकेत उसके नीतिगत भटकाव का प्रमाण है। अच्छा होगा यदि यह विधेयक सर्वसम्मति से पारित हो क्योंकि इसमें भाजपा को क्या हासिल होगा ये उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना ये कि इसके पारित होने से देश को लाभ होगा। दुर्भाग्य से हमारे देश में राष्ट्रहित पर राजनीतिक हित हावी होते रहे हैं। बांग्लादेश से आये करोड़ों घुसपैठियों को देश का नागरिक बनाने वाले नेताओं और पार्टियों को तात्कालिक सियासी फायदा भले मिलता रहा हो लेकिन वे देश के लिए जो समस्या पैदा कर गये उसका दुष्परिणाम किसी से छिपा नहीं है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 4 December 2019

महिला सुरक्षा : जो भी जरूरी हो किया जाये



आग लगने के बाद कुआ खोदने वाली कहावत हमारे देश में सबसे अच्छी तरह से चरितार्थ होती है। गत दिवस सोशल मीडिया पर उप्र के हरदोई शहर से एक अच्छी खबर आई। रात में सड़क पर अकेले जा रही एक युवती को देखकर गश्त पर निकले पुलिस अधीक्षक ने अपनी गाड़ी रोककर उससे बात की और तब पता चला कि वह एक होटल में कर्मचारी है और अपनी पारी खत्म होने के बाद घर लौट रही थी। पुलिस अधीक्षक फौरन उक्त होटल गए और उसके प्रबंधन को फटकारते हुए आदेश दिया कि रात में किसी महिला कर्मचारी के घर लौटने की स्थिति में उसे सुरक्षित घर पहुंचाने हेतु वाहन उपलब्ध करवाया जावे। हालांकि होटल मालिक इस आदेश का कितना पालन करेंगे ये कह पाना कठिन है लेकिन छोटी सी यह खबर किसी अच्छी व्यवस्था की शुरुवात बन सकती है। वैसे कॉल सेंटर, एयर लाइंस, टीवी चैनल सहित सितारा होटलों में रात को घर लौटने वाले कर्मचारियों, खास तौर पर महिला कर्मियों के लिए ऐसी सुविधाएँ हैं लेकिन कम आय वाली नौकरियों में इस तरह की बात सोचना भी सपना है। बहरहाल हरदोई की उक्त घटना के बाद गत दिवस पंजाब सरकार ने भी कुछ फोन नम्बरों की जानकारी देते हुए ये आदेश जारी कर दिया कि रात्रि में किसी अकेली महिला का फोन आने पर उसको पुलिस वाहन में घर छोडऩे की व्यवस्था की जावे। निश्चित रूप से ये एक आदर्श स्थिति होगी जिससे पुलिस की छवि सुधरने के साथ ही शासन और प्रशासन में आम जनता का भरोसा बढ़ेगा। एक टीवी चैनल की पत्रकार ने गत रात्रि लखनऊ में कुछ घंटे विभिन्न बस स्टाप वगैरह पर गुजारने के बाद अपने जो अनुभव सुनाये उनके मुताबिक उसे किसी सार्वजनिक स्थान पर कहीं भी पुलिस नहीं दिखाई दी। पास खड़े पुरुषों द्वारा अभद्र टिप्पणियाँ भी उसे सुननी पडीं। हैदराबाद की घटना के बाद देश भर में महिलाओं की जो रोषपूर्ण प्रतिक्रियाएं सुनाई दे रही हैं उनमें पुलिस व्यवस्था में कमी की शिकायत भी आम है। इसका दूसरा पहलू ये भी है कि बढ़ती आबादी के अनुपात में पुलिस बल उतना नहीं बढ़ा। किसी नेता या अन्य विशिष्टजन के आगमन पर उसकी सुरक्षा के लिए तो पुलिस की व्यवस्था कर दी जाती है लेकिन आम जनता को भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है। पुलिस के पास वाहन आदि की पर्याप्त व्यवस्था भी नहीं है। ऐसे में पंजाब सरकार द्वारा महिलाओं को घर पहुँचाने के लिए पुलिस वाहन की सुविधा देने का फरमान कितना कारगर हो सकेगा ये बड़ा सवाल है। इसके साथ ये भी सोचने वाली बात है कि क्या हमारे देश की पुलिस इतनी विश्वसनीय है कि रात के समय सुरक्षित घर लौटने के लिए अकेली महिला बेखौफ उसकी मदद ले सके। उल्लेखनीय है कि देश के अनेक थानों में पुलिस कर्मियों द्वारा महिलाओं के साथ आपत्तिजनक व्यवहार किये जाने की घटनाएँ प्रकाश में आती रही हैं। और फिर अपराधियों से पुलिस की संगामित्ती भी जगजाहिर है। हो सकता है पंजाब की देखासीखी कुछ और राज्य भी महिलाओं को रात के समय पुलिस वाहन की सुविधा देने की घोषणा कर दें। हालांकि इस व्यवस्था की सफलता पर अनगिनत प्रश्नचिन्ह हैं। फिर भी इसका स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि समाज का वातावारण जिस तरह से दूषित होता जा रहा है उसके मद्देनजर महिलाओं का सम्मान और सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। आधुनिकता के फेर में युवा पीढ़ी में खुलापन आने के साथ उसकी आड़ में जिस तरह का उन्मुक्त व्यवहार देखने मिल रहा है वह चिंता का कारण है। महिलाओं के मन में व्याप्त असुरक्षा का भाव किसी भी स्थिति में अच्छा नहीं है। उसे दूर करने के लिए जो भी करना पड़े वह किया जाना चाहिए। लेकिन इसमें ज्यादा देर ठीक नहीं होगी क्योंकि पानी सिर से ऊपर गुजरने की स्थिति में आ चुका है और लोगों की नाराजगी इस हद तक बढ़ती जा रही है कि सड़क से संसद तक ये मांग उठने लगी है कि दुष्कर्मियों को कानून की अदालत की बजाय जनता के हवाले कर दिया जाए जिससे उन्हें उनके किये की सजा जल्दी से जल्दी दी जा सके।

-रवीन्द्र वाजपेयी