Wednesday, 5 February 2020

शाहीन बाग़ जैसे तरीके ही देश विभाजन की नींव बने



एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर) को लेकर लोकसभा में गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय द्वारा दिए लिखित जवाब में स्पष्ट कर दिया गया कि अभी तक सरकार द्वारा उस बारे में कोई भी फैसला नहीं किया गया है। प्रधानमन्त्री भी पहले ही सार्वजानिक तौर पर इसे स्पष्ट कर चुके थे। जहां तक बात एनपीआर (राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर) की है तो उसे लेकर भी ये सफाई आ चुकी है कि उसके लिए की जाने वाली पूछताछ में भी किसी से भी नागरिकता प्रमाणित करने वाले दस्तावेज या जानकारी नहीं माँगी जावेगी। श्री राय ने बताया कि एनआरसी लागू करने के पहले केंद्र सरकार राज्यों से विधिवत सलाह मशविरा करेगी। उन्होंने ये भी कहा कि राष्ट्रपति के अभिभाषण में इस बारे में कोई उल्लेख नहीं होने से भी सरकार के दावे की पुष्टि होती है। उल्लेखनीय है दिल्ली विधानसभा चुनाव में सीएए (नागरिकता संशोधन कानून) के साथ ही विपक्ष एनआरसी और एनपीआर का मुद्दा उछालकर भाजपा को घेरने का प्रयास कर रहा है। यही नहीं तो पूरे देश में मुस्लिमों को सामने रखकर ये प्रचार किया जा रहा है कि सीएए लागू करने के बाद एनपीआर और फिर एनसीआर लागू किया जावेगा। दिल्ली के शाहीन बाग़ इलाके में बीते डेढ़ माह से भी ज्यादा समय से जारी मुस्लिम महिलाओं का धरना राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन चुका है। देश के अनेक हिस्सों में उसकी देखासीखी मुस्लिम महिलाएं सड़क पर धरना देकर बैठी हुई हैं। दिल्ली के चुनाव में तो शाहीन बाग़ एक मुख्य मुद्दा बन चुका है। भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी सभी उसे अपने-अपने नजरिये से भुनाने में लगी हुई हैं। प्रधानमन्त्री ने दो दिन पहले एक चुनावी सभा में शाहीन बाग़ के धरने को एक प्रयोग बताकर निशाना साधा। कुल मिलाकर ये स्पष्ट होता जा रहा है कि सीएए के विरोध से शुरू अभियान को एनआरसी और एनपीआर का डर दिखाकर जि़ंदा रखने की कोशिश की जा रही है। इसमें जेएनयू, जामिया मिलिया और अलीगढ़ मुस्लिम विवि जैसे संस्थानों में सक्रिय भाजपा विरोधी वर्ग पूरी तरह से मदद दे रहे हैं। शाहीन बाग़ में गोली चलाने वाले युवक का जुड़ाव आम आदमी पार्टी के साथ निकल आने के बाद अब जामिया में गोली चलाये जाने वाले के बारे में भी ये संदेह गहरा रहा है कि वह भी प्रायोजित था। कहने वाले ये भी कह रहे हैं कि सारा बखेड़ा दिल्ली चुनाव को लेकर है और 8 फरवरी को मतदान होते ही सब शांत हो जाएगा फिर बिहार चुनाव के लिए विपक्ष नया मुद्दा तलाशने में जुटेगा। ये बात साफ है कि सीएए को लेकर सिवाय मुस्लिम समुदाय के किसी और को कोई शिकायत नहीं है। मुस्लिम समुदाय के धरने में इसीलिये चंद सियासी चेहरों के और कोई नहीं समर्थन करता नहीं दिखा। शाहीन बाग़ के आन्दोलन की तारीफ  करने वाले नेतागण भी धरना स्थल पर जाने से इसलिए डरते रहे जिससे दिल्ली का हिन्दू मतदाता कहीं नाराज न हो जाये। अब जबकि लोकसभा में गृह राज्य मंत्री ने लिखित रूप में एनसीआर के बारे में कोई विचार नहीं होने की बात कह दी गयी है तब विपक्ष को भी भय का भूत पैदा करने की अपनी रणनीति को छोड़कर जनता के हित में सही मुद्दे उछालना चाहिए। ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार सारे काम अच्छे ही कर रही है। उसके अनेक निर्णय ऐसे हैं जिनके बारे में विपक्ष को जनता के बीच जाकर अपनी बात रखनी चाहिए। बेरोजगारी और आर्थिक मंदी जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने के लिए उसके पास पर्याप्त मसाला और अवसर है। जनता भी ऐसे विषयों पर सियासी प्रतिबद्धता से उपर उठकर विपक्ष का साथ देती है। लेकिन बीते पांच वर्षों के दौरान ये देखने में आया है कि विपक्ष ऐसे मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश करता रहा जिनसे जनता का सीधा सरोकार नहीं था। 2019 के लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद ये उम्मीद थी कि वह अपनी रणनीति में अपेक्षित सुधार करते हुए देश और जनहित के मुद्दे उठायेगा। लेकिन ऐसा लगता है उसने पिछली गलतियों से सीख नहीं लेने की कसम खा रखी है। सीएए के दिशाहीन विरोध और एनआरसी तथा एनपीआर का हौआ खड़ा कर मुस्लिम समाज में कट्टरपंथी नेतृत्व को पनपने का अवसर देकर विपक्ष ने जो गलती की उसका खामियाजा उसे भविष्य में भुगतना पड़ेगा। सीएए का हल्ला तो देर सवेर ठंडा पड़ जाएगा और एनआरसी पर सरकार का स्पष्टीकरण आने के बाद इसे लेकर भी अनिश्चितता नहीं रहेगी। ऐसे में अब विपक्ष को भी अपनी भूमिका का निर्वहन सही तरीके से करना चाहिए। विशेष रूप से कांग्रेस के लिए ये जरूरी है कि वह राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर व्यवहार करना सीखे। सीएए और एनसीआर उसी के शासन काल में चर्चा में आये थे। बेहतर होता वह वामपंथियों के शातिरपने से बचे जो उसको सामने रखकर अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं। शाहीन बाग़ जैसे आन्दोलन का उसे विरोध करना चाहिए था क्योंकि इस तरह के तौर तरीकों से ही देश के विभाजन की नींव रखी गई थी।

-रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 4 February 2020

अनावश्यक बयानबाजी से भाजपा को नुकसान



कर्नाटक के भाजपा नेता अनंत कुमार हेगड़े काफी फायरब्रांड माने जाते हैं। पूर्व में केन्द्रीय मंत्री भी रह चुके हैं। विवादास्पद बयान देना उनकी आदत है या राजनीति करने की शैली ये तो वही जानते होंगे लेकिन उनके बड़बोलेपन से पार्टी को शर्मसार होना पड़ता है। अपने ताजे बयान में उन्होंने महात्मा गांधी द्वारा किये गये स्वाधीनता संघर्ष को अंग्रेजों की सहमति और सहयोग से किया गया नाटक बता डाला। अब उनके फैलाये रायते को भाजपा नेतृत्व समेटने में लगा है। बिना शर्त माफी मांगने कहा गया है। श्री हेगड़े ने गांधी जी के अनशन वगैरह का भी मजाक उड़ाया। जैसा होता आया है उसे देखते हुए वे माफी मांग लेंगे और फिर बात आई-गई हो जायेगी। श्री हेगड़े पूर्व में भी इसी तरह के बयानों के लिए पार्टी द्वारा हड़काए जा चुके हैं। हालांकि वे अकेले भाजपा नेता नहीं हैं जो इस तरह की उल जलूल और अप्रासंगिक बयानबाजी करते हैं। एक तरफ  तो प्रधानमन्त्री हर भाषण में गांधी जी की प्रशस्ति किया करते हैं वहीं उनकी पार्टी की दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेतागण बिना सिर-पैर की बातें करते हुए अपनी और पार्टी दोनों की भद्द पिटवाने से बाज नहीं आते। गांधी जी और स्वाधीनता संग्राम एक दूसरे के समानार्थी हो चुके हैं। बापू से सैद्धांतिक मतभेद रखना या उनकी नीतियों की आलोचना करने में कुछ भी गलत नहीं है। आजादी की लड़ाई में भी अनेक नेताओं को उनके तौर-तरीके नापसंद थे। ये कहने वाले भी कम नहीं हैं कि पंडित जवाहरलाल नेहरु के प्रति उनका झुकाव ही सुभाषचन्द्र बोस और डा. भीमराव आम्बेडकर की नाराजगी का कारण बना। यहां तक भी माना जाता है कि मो.अली जिन्ना भी कांग्रेस में उंचा ओहदा पाने की महत्वाकांक्षा रखते थे। लेकिन जब उन्हें लगा कि बापू पंडित नेहरु को ही कमान सौंपने का मन बना चुके हैं तब उन्होंने पाकिस्तान का राग अलापा। खैर, ये सब बातें आज के सन्दर्भ में शोधकर्ताओं के लिए रह गईं हैं क्योंकि इतिहास की अपनी जुबान तो होती नहीं और जो कुछ भी उसके हवाले से सामने आता है वह इतिहासवेत्ताओं द्वारा वर्णित होता है जिनकी निष्पक्षता सदैव सवालों के घेरे में रहा करती है। इसीलिये उसके ज्ञात - अज्ञात प्रसंगों पर हर कोई टीका-टिप्पणी करे तो फिर अनावश्यक विवाद उत्पन्न होते हैं। भाजपा एक सिद्धांतवादी पार्टी है जिसकी निश्चित दिशा है लेकिन राजनीति में आलोचना करते समय भी जिस मर्यादा और सौजन्यता की जरूरत होती है उसका ध्यान नहीं रखे जाने से उसकी छवि को धक्का पहुंचता है। विरोधी तो छोडिय़े उसके अपने समर्थक भी इस तरह की टिप्पणियों से खुद को असहज महसूस करते हैं। श्री हेगड़े के पहले भी अनेक भाजपा नेता बापू और उनके तरीकों पर आपत्तिजनक टिप्पणियां कर चुके हैं। हर बार पार्टी नेतृत्व उन्हें सोच-समझकर बोलने की हिदायत के साथ माफी मांगने का निर्देश देता है लेकिन कुछ समय बाद कोई दूसरा नेता अनावश्यक विवाद को जन्म दे देता है। इस कारण से भाजपा के बारे में ये छवि भी बनती है कि उसकी गांधी भक्ति कोरा दिखावा है। नाथूराम गोडसे के बचाव में भी कुछ नेताओं की बयानबाजी के कारण भाजपा को लज्जित होना पडा है। जहां तक बात हिंदुत्व और धर्मनिरपेक्षता की है तो ये बात किसी से भी छिपी नहीं है कि भाजपा हिन्दू हितों की संरक्षक पार्टी है। यद्यपि धर्मनिरपेक्षता के प्रति उसका कोई विरोध नहीं है लेकिन मंदिर आन्दोलन के चरमोत्कर्ष के दौर में लालकृष्ण आडवाणी ने धर्मनिरपेक्षता के प्रचलित मॉडल का मजाक उड़ाते हुए उसे छद्म करार दे कर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नया नारा दिया जिसमें किसी समुदाय विशेष के तुष्टीकरण से परहेज की बात थी। भाजपा के वैचारिक स्रोत रास्वसंघ का तो स्पष्ट कहना है कि हर भारतीय नागारिक की राष्ट्रीयता हिन्दू है। संघ विरोधी वामपंथी इतिहासकार ये साबित करने में जुटे हुए हैं कि आर्य विदेशी नस्ल है और भारत का कोई प्राचीन सांस्कृतिक इतिहास नहीं है। मोदी सरकार आने के बाद ये बहस योजनाबद्ध तरीके से और तेज हो गयी है। लेकिन भाजपा ने जिस तरह सरदार पटेल और महात्मा गंधी के प्रति अपना झुकाव प्रदर्शित किया उसके बाद उसके साथ अनेक ऐसे लोग और पार्टियां भी जुड़ीं जो कभी उसके साथ बैठने तक में सकुचाती थीं। 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले ही भाजपा ने जिस तेजी से अपने पैर पूरे देश में फैलाये उसमें उसकी समन्वयवादी नीतियां भी सहायक बनीं। गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर कट्टर हिंदूवादी नेता की छवि रखने वाले नरेंद्र मोदी के साथ वे रामविलास पासवान भी आकर जुड़ गये जिन्होंने गुजरात दंगों के बाद वाजपेयी मंत्रीमंडल से इस्तीफा दे दिया था। नीतीश कुमार का भाजपा से अलग होकर लालू के पास चला जाना और फिर लौटकर आना भी मामूली बात नहीं थी। शिवसेना की कट्टर छवि की वजह से भाजपा द्वारा उससे दूरी बना लेना भी श्री मोदी के दौर में संभव हुआ। ऐसे में गांधी जी के बारे में व्यर्थ की बातें करने से श्री हेगड़े जैसे नेता समाचारों में सुर्खियां भले बन जाते हों लेकिन ऐसा करते हुए वे पार्टी और विचारधारा दोनों को जबर्दस्त नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसे नेताओं के कारण ही भाजपा केन्द्रीय सत्ता में मजबूती से जमी होने के बावजूद राज्यों की सत्ता गंवाती जा रही है। सही बात तो ये है कि महज चुनाव जीतने के लिए ऐरे-गेरे किसी को भी पार्टी में भर्ती करने के कारण भाजपा की छवि द्वितीय श्रेणी के उस अनारक्षित रेल डिब्बे जैसी होकर रह गयी जिसमें कोई भी आकर बैठ सकता है। भले ही श्री हेगड़े कर्नाटक के जाने-पहिचाने नेता हों लेकिन बापू के बारे में उनका ताजा बयान उनकी घटिया सोच को दर्शाता है जो राजनीतिक तो छोडिय़े साधारण स्तर का चातुर्य भी नहीं कहा जा सकता। बहरहाल पार्टी नेतृत्व ने उनको माफी मांगने का जो आदेश दिया वहीं पर्याप्त नहीं है। यदि भाजपा चाहती है कि उसकी कट्टरवादी छवि में सुधार हो तब उसे श्री हेगड़े और उसी तरह के दीगर नेताओं को शुद्ध हिन्दी में समझा देना चाहिए। प्रधानमन्त्री जिस कुशलता से पार्टी की नीतियों को एक के बाद एक लागू करने में लगे हैं उसके कारण भाजपा की छवि एक मजबूत और राष्ट्रवादी पार्टी के रूप में स्थापित हो गई है लेकिन बीच-बीच में कुछ नेता आपत्तिजनक बयान देकर उस छवि को मटियामेट करने से नहीं चूकते। पार्टी के आला नेताओं को चाहिए कि ऐसे नेताओं को नियंत्रण में रखें वरना किसी दिन इनकी बकवास प्रधानमन्त्री की सारी उपलब्धियों पर पानी फेर देगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 3 February 2020

बजट : रंगहीन , गंधहीन , स्वादहीन



बीते शनिवार को आगामी वित्तीय वर्ष का जो केन्द्रीय बजट लोकसभा में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रस्तुत किया वह एक अबूझ पहेली बनकर रह गया है। विपक्ष को तो खैर उसकी आलोचना करनी ही थी लेकिन सत्ता पक्ष भी ये बताने की स्थिति में नहीं है कि बजट की तारीफ किस आधार पर की जाए। लगता है वित्तमंत्री की सोच में दार्शनिकता ज्यादा है जिसकी वजह से बजट को समझने के लिए ध्यान लगाने की जरूरत पड़े। लेकिन आम बजट कहलाने के कारण यह देश के आम जन को सीधे प्रभावित करता है इसलिए साधारण व्यक्ति भी उसमें अपने लाभ खोजता है। वैसे कड़वा सच तो ये है कि बजट बनता चंद औद्योगिक घरानों के हित संवर्धन के लिए है क्योंकि अर्थव्यवस्था का समूचा खाका उन्हीं पर निर्भर रहता है। जहां तक बात आयकर जैसे प्रत्यक्ष कर की है तो वह सरकारी राजस्व का बहुत ही छोटा हिस्सा है और उसे चुकाने वाले भी आबादी के लिहाज से बेहद कम ही हैं। बावजूद इसके बजट का यही पहलू सबसे ज्यादा चर्चित और विवादित होता है। उस दृष्टि से वित्तमंत्री ने बजाय राहत देने के बाजीगरी का सहारा लिया। एक हाथ से छूट बढ़ाई लेकिन दूसरे हाथ से उसे छीन भी लिया। ऐसा करने के पीछे जो तर्क दिए जा रहे हैं वे बाजारवाद से पे्ररित लगते हैं। करदाता को बचत पर कर छूट दिए जाने की बजाय उसे खर्च करने के लिए प्रेरित करना आर्थिक सुस्ती दूर करने के मद्देनजर एक उपाय हो सकता है लेकिन भारतीय मानसिकता आज भी पश्चिम की उपभोक्ता संस्कृति से सर्वथा भिन्न है। खाओ, पियो मौज करो की बजाय आज की बचत कल की सुरक्षा आम भारतीय के आर्थिक चिंतन का आधार सदियों से रहा है। उस दृष्टि से ऐसी कोई भी व्यवस्था भारतीय परिवेश में आदर्श नहीं हो सकती जो साधारण हैसियत के व्यक्ति को बचत के संस्कार से दूर भगाए। उस दृष्टि से वित्तमंत्री ने आयकर ढांचे में जो बदलाव किये वे अटपटे, अपर्याप्त और कुछ हद तक अनावश्यक भी लगते हैं। यद्यपि उन्होंने करदाताओं को आयकर विभाग द्वारा भयाक्रांत करते हुए प्रताडि़त किये जाने पर रोक लगाने के जो आश्वासन दिए वे जरुर स्वागतयोग्य हैं लेकिन लौट फिरकर बात फिर वहीं आ जाती है कि इससे मध्यमवर्ग को कोई राहत नहीं मिलेगी। इसी तरह निर्मला जी ने अन्य क्षेत्रों के लिए जो प्रावधान किये उनसे आर्थिक सुस्ती दूर हो सकेगी, उसमें भी संदेह है। इन्फ्रास्ट्रक्चर और ग्रामीण विकास के किये अवश्य बजट में जो घोषणाएं की गईं वे निश्चित रूप से असरकारक होगीं किन्तु उनसे तात्कालिक तौर पर राहत की उम्मीद करना बेमानी होगा। ऊर्जा क्षेत्र में एक सुधार अवश्य स्वागत योग्य है जिसके तहत किसान अपनी गैर उपजाऊ भूमि का उपयोग सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए कर सकेंगे तथा अतिरिक्त बिजली ग्रिड के जरिये सरकार खरीद लेगी। देश में ऊर्जा संकट हल करने के साथ ही किसान को सस्ती बिजली देने का ये प्रयास सही सोच है। इसी तरह ग्रामीण विकास के लिए किये गये अन्य प्रावधान भी दूरगामी लाभ देने वाले हैं। जहां तक बात इन्फ्रास्ट्रक्चर की है तो ये इस सरकार का प्रिय विषय रहा है और श्रीमती सीतारमण ने इस क्षेत्र को भरपूर राशि दी है जो सीमेंट, लोहा जैसे उद्योगों को सहारा देने के साथ ही रोजगार भी देगा। इसी तरह सस्ते आवासीय मकान बनाने और खरीदने वालों को करों में दी जा रही छूट की अवधि में वृद्धि भी राहत देने वाली है लेकिन हाऊसिंग क्षेत्र के जो प्रकल्प बंद पड़े हैं उन्हें पुनर्जीवित करने के बारे में बजट में ज्यादा कुछ नहीं है जो व्यापार और रोजगार दोनों के लिए बड़ा सहारा है। मोदी सरकार की दूसरी पारी के इस बजट में शिक्षा, विशेष रूप से चिकित्सा शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना पेश की गई जिसके तहत हर जिले में मेडिकल कालेज खोलकर उसे जिला अस्पताल से जोड़ा जाएगा। देश में डाक्टरों की कमी और बेहतर चिकित्सा सेवाओं को छोटे शहरों तक पहुँचाने की दिशा में ये एक क्रांतिकारी कदम हो सकता है लेकिन अव्वल तो इसमें आर्थिक संसाधनों की कमी बाधक बनेगी वहीं दूसरी तरफ  शिक्षकों का अभाव भी समस्या पैदा करेगा। उल्लेखनीय है देश के अधिकतर मेडिकल कालेजों में अध्यापकों की कमी की वजह से उनकी मान्यता पर सदैव तलवार लटका करती है। विदेशी छात्रों को भारत में शिक्षा ग्रहण करने के लिए अनुकूल वातावरण बनाने और विश्वस्तरीय संस्थान खोलने के लिए निवेश की राह खोलना भी अच्छा निर्णय है बशर्ते इसे ठीक से लागू किया जा सके। अनेक वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ाकर घरेलू उद्योगों को प्राणवायु देने का निर्णय देर से उठाया गया सही कदम है जिसका दायरा और बढ़ाने की जरूरत है। इसी तरह मेक इन इंडिया को और विस्तार देते हुए असेम्बलिंग हब बनाने का प्रावधान भी उत्साहित करता है। ये सोच बड़ी ही सामयिक है क्योंकि अमेरिकी दबाव के कारण चीन से ढेर सारे उद्योग बोरिया-बिस्तर समेटने की तैयारी में है। सस्ते श्रमिक की उनकी जरूरत भारत पूरी कर सकता है। कोरोना वायरस के कारण भी चीन में आर्थिक गतिविधियाँ प्रभावित होना तय है। लेकिन सरकार को अपनी नौकरशाही पर लगाम लगानी होगी जो नये उद्यमियों को चप्पलें घिसवाने में अपनी शान समझती है। इस बजट की सर्वाधिक आलोचना जिस कारण से हो रही है वह है सार्वजनिक उपक्रमों के विनिवेश का फैसला। एयर इंडिया, भारत पेट्रोलियम, आईडीबीआई और रेलवे के बाद भारतीय जीवन बीमा निगम में सरकार द्वारा अपनी हिस्सेदारी बेचकर राजस्व जुटाने को लेकर न केवल विपक्ष बल्कि वरन आम जनता भी सशंकित है। भारत जैसे परम्परावादी देश में तंगी के बाद भी साधारण व्यक्ति तक पुश्तैनी संपत्ति बेचने में शर्म और दर्द दोनों महसूस करता है। उक्त संस्थानों में जीवन बीमा निगम ऐसा है जिससे बड़ी संख्या में देशवासी अपना सुरक्षित भविष्य देखते हैं। इसी तरह रेलवे में निजी ट्रेन चलवाने से शुरू प्रक्रिया अंतत: उसके निजीकरण पर जाकर रुकेगी ऐसा भी प्रचारित हो रहा है। विनिवेश आर्थिक सुधारों की उस सोच पर आधारित है जिसमें घाटे वाली किसी भी इकाई को चलाते रहना निरी मूर्खता के साथ ही आत्मघाती माना जाता है। बीएसएनएल जैसे उपक्रमों का जब तक एकाधिकार रहा तब तक वे खूब फले फूले लेकिन प्रतिस्पर्धा में मात खा गए जिसके लिए सरकार भी कम दोषी नहीं है। एयर इंडिया भी उसी श्रेणी में है। अनेक अर्थशास्त्री घाटे वाले उद्यमों के विनिवेश के प्रशंसक हैं लेकिन आम जनता के मन में सरकार को ये भरोसा जगाना होगा कि वह ऐसा क्यों कर रही है और इससे देश को क्या लाभ होगा? इस बजट की तारीफ  और आलोचना दोनों के लिए गुंजाईश इसलिए कम है क्योंकि एक तो ये आर्थिक मंदी या सुस्ती के दौर का है दूसरी बात जो ज्यादा महत्वपूर्ण है वह है आम चुनाव में अभी चार साल का समय होना। जिन लोगों को ये लगता था कि मोदी सरकार दिल्ली विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर मध्यम आय वर्ग और व्यापारी समुदाय को लुभाने वाले निर्णय करेगी उन्हें निराशा हुई होगी लेकिन पिछले पांच साल का अनुभव ये बताता है कि प्रधानमन्त्री ऐसे फैसले लेने में विश्वास करते हैं जिनका दूरगामी असर पड़े। अर्थव्यवस्था की चिंताजनक स्थिति के बाद भी अति साधारण बजट पेश करने के पीछे एक सोच ये भी है कि आगामी वर्ष में जीएसटी के कारण उत्पन्न समस्याएँ हल हो जायेंगीं और सरकार को पर्याप्त राजस्व मिलने से उसका खर्च बढ़ेगा जिसका असर बाजार में छाई सुस्ती दूर होने के रूप में सामने आयेगा। बहरहाल जैसा शुरू में कहा गया निर्मला सीतारमण के रिकार्ड लम्बाई वाले बजट भाषण में ज्यादातर नाउम्मीदी का एहसास हुआ। इसीलिये आम जनता की नजर में ये एक रंगहीन, गंधहीन और स्वाधीन बजट है। इसके फायदे जब होंगे तब होंगे लेकिन फिलहाल तो इसका आना न आना बराबर ही है।

- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 1 February 2020

घोषणापत्र : घूस का वैधानिक तरीका



केन्द्रीय बजट पेश होने के एक दिन पहले ही भाजपा ने दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिये अपना संकल्प पत्र जारी करते हुए सौगातों की बौछार कर डाली। इनमें छात्राओं को मुफ्त स्कूटी, बेटी को 21 साल की होने पर 2 लाख रु. और गरीबों को 2 रु. प्रति किलो की कीमत पर शुद्ध आटा देने का वायदा है। केजरीवाल सरकार द्वारा दी जा रही पेयजल और बिजली की सब्सिडी यथावत रखने की बात भी संकल्प पत्र में शामिल है। समाज के बाकी तबकों को लुभाने वाले कुछ और वायदे भी संकल्प पत्र का हिस्सा हैं। चूँकि मुफ्त उपहार अब भारतीय चुनावी राजनीति का स्थायी हिस्सा बन चुके हैं इसलिए दिल्ली में भाजपा संगठन के कर्ताधर्ताओं को इसके लिए कसूरवार नहीं ठहराया जा सकता किन्तु सवाल ये है कि देश की राजधानी में भी यदि इस तरह के लालच देने पड़ते हों तब सुदूर हिस्सों में मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए क्या-क्या करना पड़ता होगा ये विश्लेषण का विषय है। आजादी के बाद जब चुनाव शुरू हुए तब ये बात सुनाई देती थी कि फलां प्रत्यशी ने शराब और कम्बल बांटे। किसी जाति विशेष को प्रभावित करने के लिए उनके संगठनों को सामान आदि देने की बातें सामने आती थीं। मतदाताओं पर नियंत्रण रखने वाले बाहुबलियों को खुश रखना भी चुनावी राजनीति का हिस्सा था। मतदाताओं को मतदान केंद्र तक ढोकर लाने के लिए वाहन उपलब्ध करवाना भी आम था। धीरे-धीरे चुनाव आयोग की सख्ती और सुधारवादी कदमों की वजह से उक्त तौर-तरीकों में ये बदलाव हुआ कि जो काम खुले आम होता था वह छुपाकर होने लगा। और उसकी जगह वैधानिक घूसखोरी आ गयी जिसे चुनावी घोषणा पत्र या संकल्प अथवा वचन पत्र का नाम दिया जाने लगा। इसकी शुरुवात किसने की ये भले ही शोध का विषय हो लेकिन आज की भारतीय राजनीति इसके बिना संभव नहीं रही। किसी भी लोक कल्याणकारी शासन व्यवस्था में आम जनता के हितों का संरक्षण शासक का कर्तव्य होता है। राजतंत्र के दौर में भी जो लोकप्रिय शासक हुए उन सबने जनता के हितार्थ अपने खजाने खोले। उस दृष्टि से यदि हमारे देश की राजनीतिक जमातें और उनके नेता चुनाव में मतदाताओं को मुफ्त में कुछ देने का वायदा करते हैं तो उसे गलत ठहराना आसान नहीं होता। प्रजातंत्र की समूची परिकल्पना आखिर है तो जनकल्याण पर केन्द्रित ही। जिन-जिन देशों में जनतांत्रिक प्रणाली सफलतापूर्वक संचालित हो रही है वहां भी जनता के कल्याण के लिए सरकार दिल खोलकर खर्च करती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सार्वजनिक परिवहन, आमोद प्रमोद जैसे विषय सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता में होते हैं। चुनाव के दौरान वहां भी मतदाताओं को लुभाने के लिए अनेक नीतियों और कार्यक्रमों की घोषणा होती है। लेकिन हमारे देश में उसका स्वरूप बेहद घटिया हो गया है। मतदाता को एक तरह से उपभोक्ता मानकर जिस तरह के ऑफर दिए जाने लगे हैं उनकी वजह से चुनावों की पवित्रता नष्ट हुई जिसका दुष्परिणाम अंतत: अर्थव्यवस्था का कचूमर निकलने के तौर पर सामने आ रहा है। जिन राज्यों में सत्ताधीशों ने मुफ्तखोरी को अपनी राजनीति का आधार बनाया वे सत्ता में बने रहने में भले सफल रहे हों लेकिन उनकी अर्थव्यवस्था चौपट हो गई। दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने बिजली-पानी पर जो सब्सिडी दी उससे लोगों को फायदा जरुर हुआ लेकिन दिल्ली सरकार के खजाने पर जो असर पड़ा उसके दूरगामी नुकसान सामने आने बाकी हैं। महानगर होने से दिल्ली में करों से भरपूर आय होती है लेकिन बाकी राज्यों के पास राजस्व वसूली के उतने स्रोत नहीं होने से वहां का आर्थिक प्रबंधन मुफ्तखोरी की वजह से बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। आम जनता के नजरिये से देखें तो ऐसी योजनाएं स्वागतयोग्य हैं लेकिन उनको लागू करने की लिए राज्यों की सरकारें लगातार कर्ज लेती जा रही हैं। उनके भुगतान हेतु उन्हें नये कर लगाने पड़ते हैं। पेट्रोल और डीजल इसके उदहारण हैं। आजकल लगभग हर राजनीतिक दल चुनावों के दौरान किसानों को मुफ्त या सस्ती बिजली के अलावा उनके ऋण माफ करने जैसा वायदा करने में नहीं हिचकता। राहुल गांधी जैसे नेता तो चुनाव प्रचार के दौरान सत्ता में आते ही दस-पंद्रह दिन के भीतर किसानों के कर्ज माफ करने का दावा करने से नहीं चूकते। इसका फायदा भी उनकी पार्टी को मिलता है लेकिन सत्ता में आने के बाद इस वायदे को पूरा करने में जो व्यावहारिक परेशानियां आती हैं उनकी जानकारी मप्र, राजस्थान, पंजाब और छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों से ली जा सकती है। दिल्ली में भाजपा ने स्कूटी और 2 रु. प्रति किलो की कीमत पर आटा देने का जो वायदा किया वह नई बात नहीं है। जिन राज्यों में उसका शासन रहा वहां भी सस्ते अनाज, मुफ्त सायकिल, लड़कियों के खाते में जन्म पर ही एक लाख रु. और मुफ्त शिक्षा जैसे कार्यक्रम चलाये गए लेकिन उसके बाद भी 2018 में पार्टी को अपने ऐसे कुछ राज्य गंवाने पड़ गए जहां वह 10 साल से भी ज्यादा सत्ता में रही। बावजूद इसके मुफ्तखोरी को बढ़ावा देकर चुनाव जीतने की प्रवृत्ति से बचने की बजाय उसे नये रूप में लागू करना ये दर्शाता है कि हमारी राजनीति दिशाहीन हो चुकी है। नब्बे के दशक में जातिवादी राजनीति का नया रूप सामने आया था उसके कारण सरकारी नौकरियों में आरक्षण को नई-नई पैकिंग में पेश किया जाने लगा। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय की गई सीमा रेखा को लांघने का दुस्साहस भी हुआ। इसका जो चुनावी लाभ हुआ वह अपनी जगह है लेकिन सरकार ने नौकरियां बाँटने से ही ही परहेज करते हुए निजीकरण का रास्ता अपना लिया। राजनीतिक फैसलों का प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव अर्थव्यवस्था पर पड़ता ही है। आज देश जिस तरह के आर्थिक भंवर में फंसा है उसके लिए मुफ्त उपहार वाली राजनीति काफी हद तक जिम्मेदार है। गरीबों का उत्थान हर तरह से होना चाहिए लेकिन चुनाव जीतने के लिए मुफ्त उपहार बांटने की इस संस्कृति का कहीं न कहीं तो अंत करना ही पड़ेगा। सर्वोच्च न्यायालय और चुनाव आयोग दोनों ही घोषणापत्र के नाम पर दी जाने वाली सौगातों पर दबी जुबान सवाल उठा चुके हैं। चुनाव सुधारों को लेकर होने वाली चर्चाओं में भी ये विषय उठता है लेकिन राजनीतिक दलों को इसकी चिंता कतई नहीं है। ऐसा लगता है सर्वोच्च न्यायालय को ही कुछ करना पड़ेगा। चुनाव प्रचार के दौरान किसी भिखारी को प्रत्याशी द्वारा कुछ रूपये दिए जाने पर आचार संहिता के उल्लंघन का प्रकरण दर्ज हो जाता हैं लेकिन घोषणापत्र के जरिये खुले आम लालच दिए जाने को गलत नहीं मानना मजाक नहीं तो और क्या है?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 31 January 2020

बजट सत्र : हमेशा की तरह हंगामेदार रहेगा



संसदीय प्रणाली में कुछ परम्पराओं का पालन कर्मकांड की तरह से होता है। उन्हीं में से एक है संसद का सत्र शुरू होने से पहले अध्यक्ष द्वारा सर्वदलीय बैठक बुलाकर सत्र को सुचारू रूप से चलाने के लिए सबसे सहयोग का वायदा ले लेना। इस बैठक में सरकार विपक्ष को अपने मुद्दे उठाने का अवसर देने का आश्वासन देती है तो विपक्ष भी सहयोग का वायदा करता है। इसी कर्मकांड के निर्वहन हेतु गत दिवस लोकसभा अध्यक्ष ने सर्वदलीय बैठक बुलाई जिसमें हमेशा की तरह सत्ता और विपक्ष की तरफ  से संसद की गरिमा बनाए रखने की प्रतिबद्धता दोहराई गई। बजट सत्र होने से  इसका विशेष महत्व है। जैसी संसदीय कार्य मंत्री ने जानकारी दी उसके मुताबिक सरकार 45 नए विधेयक इस दौरान पेश करना चाह रही है। नई लोकसभा बनने के बाद बीते दो सत्रों में सत्ता पक्ष ने जिस तरह की तेजी दिखाई वैसा ही इस बार भी उसका इरादा है वहीं विपक्ष ने कल की बैठक में संकेत कर दिया कि सीएए को लेकर जो उथलपुथल देश भर में है उस पर वह सरकार को घेरने का भरपूर प्रयास करेगा। पिछले सत्र में नागरिकता संशोधन विधेयक पारित करवाकर सरकार ने विपक्ष को शिकस्त दे दी थी किन्तु उसके क़ानून बन जाने के बाद पहले पूर्वोत्तर राज्यों और उनके बाद देश के अनेक हिस्सों में जिस तरह का संगठित विरोध सामने आया उससे विपक्ष का हौसला मजबूत हुआ है। खास तौर पर दिल्ली के जामिया विवि और जेएनयू में हुई घटनाएं तथा शाहीन बाग़ में चल रहे मुस्लिम महिलाओं के धरने की प्रतिक्रियास्वरूप पूरे देश में जो आन्दोलन हो रहे हैं उसके कारण विपक्ष के पास आक्रामक होने के पर्याप्त मुद्दे होंगे। और फिर बजट तो वैसे भी अपने आप में सबसे बड़ा मुद्दा है। अर्थव्यवस्था की चिंताजानक स्थिति की वजह से यूँ भी सत्ता पक्ष रक्षात्मक ही रहेगा। देश के अनेक विश्वविद्यालयों में छात्र संगठन सीएए की आड़ में उग्र बने हुए हैं। मुस्लिम समुदाय ने तो इस कानून के विरोध में आसमान सिर पर उठा रखा है। ऐसी स्थिति में सरकार पर लोक-लुभावन बजट पेश करने का दबाव है जो कि आर्थिक स्थिति के मद्देनजर काफी कठिन कार्य है। सरकार की चिंता का एक और कारण आगामी सप्ताह होने जा रहा दिल्ली विधानसभा का चुनाव भी है। कुछ दिन पहले तक जितने भी अनुमान और आकलन आये उनके अनुसार वहां 2015 की ही तरह अरविन्द केजरीवाल की इकतरफा लहर थी लेकिन ताजा संकेतों के मुताबिक शाहीन बाग़ में चल रहे मुस्लिम महिलाओं के धरने की वजह से दिल्ली में मतों का धु्रवीकरण होने की संभावना भी है जिसके कारण भाजपा को लड़ाई में लौटने की उम्मीद नजर आ रही है। दिल्ली में अगर केजरीवाल सरकार पूर्वानुमानों के मुताबिक अच्छे-खासे बहुमत से लौटी तब बजट सत्र के उत्तरार्ध में विपक्ष के पास हमलावर होने का जबर्दस्त अवसर होगा। ये सब देखते हुए ये आशंका गलत नहीं है कि गत दिवस आयोजित सर्वदलीय बैठक में हुईं अच्छी-अच्छी बातें सत्र शुरू होते ही भुला दी जावेंगी। यूँ भी विपक्ष को गत दिवस जामिया मिलिया विवि में गोली चलने की घटना ने जबर्दस्त हथियार दे दिया है। सीएए को लागू नहीं किये जाने की घोषणा अनेक गैर भाजपा शासित राज्यों की सरकारों द्वारा किये जाने की वजह से भी सत्ता और विपक्ष के बीच आक्रमण और प्रत्याक्रमण का खेल चलेगा। जम्मू-कश्मीर की ताजा स्थिति पर भी सरकार के ऊपर जवाबदेही का दबाव रहेगा। चूँकि बिहार और बंगाल में विधानसभा चुनाव का माहौल बनने लगा है इसलिए भी विपक्ष सरकार पर हावी होने का कोई अवसर नहीं छोड़ेगा। ये भी देखने वाली बात होगी कि बीते दो सत्रों में विपक्षी एकता में सेंध लगाने में सफल हुआ सत्ता पक्ष इस सत्र में भी उस सफलता को दोहरा सकेगा या नहीं? खास तौर पर राज्यसभा में उसके लिए बहुमत का इंतजाम बड़ी समस्या हो सकती है। बावजूद इसके सरकार के पक्ष में भी अनेक बातें हैं। मसलन सीएए के विरोध को लेकर विपक्ष में एक राय नहीं है। बंगाल में तृणमूल कांग्रेस खुलकर इस मुद्दे पर केंद्र से टकराव ले रही है लेकिन वह कांग्रेस और और वामपन्थी दलों द्वारा किये जा रहे आन्दोलन से भी दूरी बनाये हुए है। इसी तरह शिवसेना भी भले ही कांग्रेस और एनसीपी के साथ महाराष्ट्र में गठबंधन सरकार चला रही हैं लेकिन वीर सावरकर के विरुद्ध कांग्रेसी नेताओं द्वारा की गयी बयानबाजी और उसके बाद शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत द्वारा पूर्व प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी के तस्कर सरगना करीम लाला से मिलने आने का खुलासा किये जाने से भी विपक्षी एकता की कमजोरी उजागर हुई है जिसका लाभ सत्ता पक्ष बेशक उठाएगा। खुदा न खास्ता दिल्ली के चुनाव में भाजपा ने विपक्ष के तौर पर भी यदि सम्मानजनक सीटें हासिल कर लीं तब प्रधानमंत्री का हौसला निश्चित रूप से बुलंद होगा। लेकिन ऐसा न हुआ तब विपक्ष सीएए को वापिस लेने के दबाव के अलावा एनपीआर और एनआरसी के बारे में प्रधानमन्त्री से सरकार की नीति स्पष्ट करने का दबाव बनाये बिना नहीं रहेगा। इन विषयों पर नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के बयानों में थोड़ा अंतर होने से सरकार को शर्मसार होना पड़ा था। देश के मौजूदा परिदृश्य को देखते हुए कहना गलत नहीं होगा कि ये सत्र भी काफी हंगामेदार रहेगा। यदि निर्मला सीतारमण ने आर्थिक हालातों का हवाला देते हुए बजट में दरियादिली नहीं दिखाई तब सरकार को सदन और बाहर दोनों तरफ  से आलोचनाएं झेलनी पड़ सकती हैं। वैसे बजट अच्छा होने के बाद भी विपक्ष सरकार को बख्श देगा इसकी संभावना शून्य ही हैं क्योंकि वह इस समय अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। मोदी सरकार ने दूसरी पारी प्रारम्भ करते ही जिस ताबड़तोड़ तरीके से अपने घोषणापत्र के आधारभूत वायदों को जमीन पर उतारने का सिलसिला शुरू किया उसकी वजह से विपक्ष में घबराहट भरी सतर्कता है। जहां तक जनता की अपेक्षा है तो वह चाह रही है कि अर्थव्यवस्था के साथ ही अन्य ज्वलंत विषयों पर सार्थक बहस और देशहित में निर्णय हों। यद्यपि इसकी संभावना कम ही है क्योंकि संसदीय लोकतंत्र में जिस कर्तव्यबोध की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है वह तो न जाने कब का हवा-हवाई हो चुका है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Monday, 27 January 2020

पद्म सम्मान का भी सम्मान रखा जाए



गणतंत्र दिवस पर पद्म सम्मानों की जो घोषणा की गई उसमें कुछ नामों को लेकर आलोचना के स्वर फिर सुनाई देने लगे हैं। ये पहला अवसर नहीं है जब पद्म अलंकरण के लिए चयनित कतिपय व्यक्तियों की पात्रता को लेकर सवाल उठे हों। यद्यपि मोदी सरकार ने चयन प्रक्रिया को बेहद पारदर्शी और युक्तियुक्त बनाया जिसके कारण बीते पांच वर्ष में अनेक ऐसी अनजानी शख्सियतें भी पद्म सम्मान से अलंकृत की जा सकीं जिन्होंने साधारण होते हुए भी असाधारण कार्य किये। समाज के लिए नि:स्वार्थ भाव से रचनात्मक कार्य करने वाले तमाम ऐसे लोग इस दौरान सामने आए जिनके व्यक्तित्व और कृतित्व से देश पूरी तरह बेखबर था। पद्म सम्मानों के लिए चयन करने की पुरानी प्रक्रिया में किये बदलाव से उसमें निष्पक्षता भी आई और वह काफी हद तक सरकारी दबाव से मुक्त भी नजर आने लगी। उसके बावजूद भी हालांकि कुछ नामों को लेकर नुक्ताचीनी होती रही किन्तु कुल मिलाकर काफी हद तक पद्म सम्मानों के वितरण से लोग संतुष्ट नजर आए। लेकिन इस वर्ष गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर जब पद्म सम्मानों के लिए चुने गए लोगों की सूची आई तब एक बार फिर कुछ नामों पर प्रतिकूल प्रतिक्रियाएं आईं। विशेष तौर पर फिल्म जगत से जुड़े कुछ नामों को लेकर सोशल मीडिया पर जनभावनाएं आलोचना और कटाक्षों से भरी हुईं दिखीं। ये भी कहा जाने लगा कि पिछली सरकारों की तरह से ही इस बार भी कुछ लोगों को तुष्टीकरण के लिए पद्म अलंकरण प्रदान किया गया । इनमें पाकिस्तान से आकर भारत की नागरिकता लेने वाले गायक अदनान सामी प्रमुख हैं । अदनान की प्रतिभा को कोई भी नहीं नकार सकता । लेकिन चंद बरस पहले भारत की नागरिकता लेने वाले इस कलाकार का भारतीय परिप्रेक्ष्य में ऐसा कोई योगदान नहीं रहा जिसकी वजह से उसे पद्मश्री दी जाती। यही वजह है कि उनके नाम का ऐलान होते ही आम राय ये सामने आई कि नागरिकता संशोधन कानून में मुस्लिमों को अलग किये जाने के कारण मचे बवाल को ठंडा करने के लिए केंद्र सरकार ने उनका चयन किया । अन्यथा फिल्मी दुनिया में न जाने कितने प्रतिभाशाली संगीतकार हैं जो पद्म सम्मान की कसौटी पर खरे साबित होते हैं । इसके अलावा कुछ और जो नाम हिन्दी फिल्म जगत के चुने गए उनको लेकर भी आलोचना हो रही है । यद्यपि चयनकर्ताओं के पास अपने तर्क और आधार हो सकते हैं किंतु पद्म सम्मान के साथ जुड़ी गरिमा के मद्देनजर वे उसके कतई लायक नहीं कहे जा सकते । कुछ वर्ष पूर्व एक वीडियो यू ट्यूब पर खूब चर्चित हुआ था जिसमें अनेक फिल्मी कलाकारों के बीच हो रही बेहद अश्लील और निम्नस्तरीय बातें सामने आईं । बाद में उन पर उसके लिए मुकदमा भी दर्ज किया गया था । उनमें से दो नाम इस वर्ष पद्मश्री पाने वालों में आने से इन सम्मानों की सार्थकता और उपयोगिता पर नए सिरे से प्रश्न उठ खड़े हुए हैं । पद्म सम्मान नागरिक सम्मान कहे जाते हैं । इनका उद्देश्य समाज में सेवा भाव और रचनात्मकता को विकसित करना है । देश और समाज के लिए विभिन्न क्षेत्रों में अपना नि:स्वार्थ और विशिष्ट योगदान देने वालों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के उद्देश्य से पद्म अलंकरणों की शुरुवात की गई थी। लेकिन शुरुवात से ही इनकी चयन पद्धति में पारदर्शिता का अभाव रहा । यहां तक कि देश का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न भी उस समय विवाद में फंसा जब कुछ प्रधानमंत्रियों ने खुद ही अपना चयन उस हेतु कर लिया । कालांतर में एमजी . रामचंद्रन जैसे को भारत रत्न दिया गया तब भी ये कहा गया कि उसके पीछे उनके द्वारा स्थापित तमिलनाडु की अन्नाद्रमुक पार्टी का केंद्र सरकार के लिए समर्थन हासिल करने का उद्देश्य था। धीरे-धीरे इस हेतु राजनीतिक दबाव भी बनाये जाने लगे। क्षेत्रीय दलों ने अपने दिग्गजों के लिए पद्मभूषण, पद्म विभूषण और भारत रत्न तक के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया । इसके अलावा भी इस हेतु लॉबिंग किये जाने की जानकारी आती रही । यहां तक कि जब विश्व विख्यात सितार वादक पं. रविशंकर को भारत रत्न मिला तब पं. जसराज ने सार्वजनिक तौर पर उसका विरोध किया था । अन्य लोगों के चयन को लेकर भी काफी हल्ला मचा । सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न मिलने की टाइमिंग पर भी प्रश्न उठे। सब देखते हुए ही मोदी सरकार ने पद्म सम्मानों को लेकर सतर्कता बरतते हुए उसे सामान्य जन के लिए सुलभ बनाया । लेकिन लगता है इस बार कुछ ऐसे नाम भी पद्म सम्मान पा गए जिन्हें लेकर सरकार की निर्णय क्षमता पर सवाल उठ रहे हैं । इस बारे में एक सुझाव ये भी आता रहा है कि पद्म पुरस्कारों के लिए खेल, फिल्म एवं साहित्य सहित अन्य क्षेत्रों के लोगों को शामिल न किया जावे क्योंकि उनके लिए उन क्षेत्रों में अलग से पुरस्कार दिए जाते हैं। उदाहरण के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, अर्जुन और राजीव गांधी खेलरत्न, साहित्य अकादमी-ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए जाते हैं । हालांकि ऐसा होना सम्भव होगा ये लगता नहीं क्योंकि पद्म पुरस्कार एक तरह का राजसी एहसास करवाते हैं । लेकिन ये भी सही है कि एक -दो अनुपयुक्त लोगों को सम्मान मिलने पर बाकी की भी अहमियत घटती है । सरकार किसी की हो किन्तु इस तरह के सम्मान में गुणवत्ता को सर्वोच्च महत्व दिया जाना चाहिए अन्यथा इनका महत्व धीरे - धीरे खत्म हो जाएगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 25 January 2020

केवल अधिकार नहीं कर्तव्यों की भी सोचें



2019 के लोकसभा चुनाव के उपरान्त एनडीए संसदीय दल का नेता चुने जाने के बाद नरेंद्र मोदी ने संविधान की पुस्तक पर मत्था टेककर इस बात का संकेत दिया कि उनकी प्रतिबद्धता संविधान के प्रति है। दरअसल उनकी सरकार पर विपक्ष ही नहीं वरन  समाज का एक वर्ग विशेष ये आरोप लगाता रहा था कि वह संविधान की मूल भावना से खिलवाड़ करते हुए  समाज को बांटने का काम कर रही है। असहिष्णुता की आड़ लेकर हर जगह ऐसा वातावरण बना दिया गया जैसे देश में प्रजातंत्र खत्म करते हुए तानाशाही लादी जा रही हो। अभिव्यक्ति की आजादी को खतरे में बताकर भी खूब हल्ला मचा। ये भी कहा जाने लगा कि विभिन्न संस्थानों में एक ही विचारधारा के लोगों को स्थापित किया जा रहा है। शायद यही सब देख कर प्रधानमन्त्री ने दूसरी पारी की शुरुवात में संविधान की पुस्तक पर सिर रखकर आलोचकों को बिना कुछ कहे ही जवाब दे दिया। पहले से ज्यादा बड़ा जनादेश मिलने से उनका आत्मविश्वास भी निश्चित तौर पर बढ़ा जिसका प्रमाण नई लोकसभा के पहले सत्र में ही मिल गया। जिस तरह से जम्मू - कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का फैसला मोदी सरकार ने लिया उससे उसके विरोधियों को ये कहने का अवसर एक बार फिर मिल गया कि संविधान के ढांचे को तोडऩे का दुस्साहस किया जा रहा है। जिस तरह से वहां कर्फ्यू लगाकर संचार सुविधाएं अवरुद्ध की गईं उनसे भी सरकार पर तानाशाही के रास्ते पर चलने का आरोप लगा। लेकिन प्रधानमन्त्री इस सबसे बेपरवाह बने रहे और संसद के शीतकालीन सत्र  में सीएए ( नागरिकता संशोधन कानून ) पारित करवाकर अपने आलोचकों को आसमान सिर पर उठाने का एक अवसर और दे दिया। बीते काफी समय से देश भर में उक्त कानून के विरोध में आन्दोलन हो रहे हैं। राजनीतिक दलों के अलावा छात्र संगठन , बुद्धिजीवी, अभिनेता, कलाकार और अन्य वर्गों  से भी सरकार पर संविधान को ताक़ पर रखे जाने के आरोप उछलने लगे। ये भी कहा जा रहा है कि मोदी सरकार धार्मिक आधार पर भेदभाव करते हुए संविधान की समन्वयवादी सोच को दफन करने पर आमादा है। पूरे देश में ये प्रचार किया जा रहा है कि केंद्र सरकार संविधान के आधार को कमजोर करते हुए फासिस्टवादी व्यवस्था को लागू करना चाह रही है। इस सबके बीच एक बात जो देखने मिल रही है वह ये कि पूरा देश मोदी समर्थकों और मोदी विरोधियों में बंटकर रह गया है। विचारधारा महत्वहीन होती जा रही है और सुविधा के समझौतों के आधार पर राजनीतिक गठबन्धन बन रहे हैं। ऐसे माहौल में गणतंत्र दिवस का आगमन देश के बारे में सोचने का सही अवसर  है। संविधान लागू होने की वर्षगांठ का राष्ट्रीय जीवन में बहुत महत्व है क्योंकि लोकशाही की सफलता संविधान के पालन पर ही निर्भर होती है। संसदीय प्रजातंत्र में तो संवैधानिक मर्यादाओं की विशेष अहमियत होती है। लेकिन  कानून के अलावा कतिपय परम्पराएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण  हैं। इन परम्पराओं का पालन प्रजातंत्र की जड़ों को मजबूत करने में बहुत सहायक होता  हैं। उल्लेखनीय है भारत का संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। जबकि जिस ब्रिटेन के संविधान से यह प्रेरित और प्रभावित है वह अलिखित है। बावजूद उसके हमारे देश में संविधान के प्रति अपेक्षित गम्भीरता नहीं दिखायी देती। इसकी मुख्य वजह राजनीतिक स्वार्थ  ही हैं  जो राष्ट्रीय हितों पर भी भारी  पडऩे लगे हैं। संसद को प्रजातंत्र का सबसे जीवंत प्रतीक चिन्ह कहा जाता है लेकिन संविधान की शपथ लेकर उसमें बैठने वाले सांसद अपनी शपथ का कितना सम्मान करते हैं ये विचारणीय विषय है। संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण देखने वाली जनता को जब ये लगता है कि कानून बनाने वाली संस्था के सदस्य ही नियम  कानूनों के पालन के प्रति  लापरवाह हैं तब वह क्यों उनकी चिंता करे। इसी आधार पर ये कहा जा सकता है कि हमारा गणतंत्र गैर जिम्मेदार व्यवस्था का प्रतीक बनता जा रहा है। देश विरोधी नारे लगाने वाले को रोकने पर अभिव्यक्ति की आजादी के खतरे में पडऩे की बात जिस तरह उछाली जाती है वह बड़े खतरे का संकेत है। संविधान केवल सरकार को मर्यादा में रहने की नसीहत नहीं देता अपितु देश के प्रत्येक नागरिक के लिए एक आचार संहिता का निर्धारण करता है , जिसमें अधिकारों के साथ ही कर्तव्यों का भी संतुलन बनाए रखने की सीख है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि सही मायनों में संविधान कर्तव्यों को स्पष्ट करने वाला ऐसा दस्तावेज है जिसके प्रति श्रद्धा और समर्पण का भाव एक अनिवार्यता है। देश के मौजूदा वातावरण में जो लोग संविधान को खतरे में बताने का ढोल पीट रहे हैं वे ही उसकी धज्जियां उड़ाने पर आमादा हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग देश के टुकड़े करने की मंशा रखने वालों के  समर्थन के रूप में किया जा रहा है। आजादी के नए अर्थ गढ़े जाने लगे हैं। अनेक राज्यों की चुनी हुई सरकारें संसद द्वारा पारित क़ानून को लागू नहीं किये जाने का ऐलान कर रही हैं। संघीय ढांचे को  छिन्न - भिन्न  करने का षडयंत्र चल रहा है। जनादेश से बनी सत्ता को नकारने का जैसा दुस्साहस बीते कुछ महीनों में देखने मिला उसे केवल राजनीतिक असफलता की खीझ मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सही मायनों में ये जनतंत्र की उस मूल भावना का ही तिरस्कार है जो जनता के निर्णय को सर्वोपरि मानती है। संविधान की इस सालगिरह पर देश के वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए ऐसी सोच की जरूरत है जो राजनीतिक नफे-नुकसान की बजाय राष्ट्रीय हितों के अनुकूल हो। कहने को हमारा गणतंत्र सात दशक पुराना हो चुका है लेकिन उसमें परिपक्वता का अभाव साफ़ देखा जा सकता है। चूंकि भारत विविधताओं से भरा देश है इसलिए इसका कोई एक विशिष्ट कारण नहीं है। विविधता में एकता, भारत की विशेषता का नारा चाहे जितना लगाया जाता हो किन्तु उस विविधता को देश की एकता के लिए खतरा बनाने वाली ताकतें खुलकर मैदान में हैं। गणतंत्र दिवस के इस राष्ट्रीय पर्व पर हर जिम्मेदार नागरिक को कुछ समय इस बात पर विचार करने के लिए  भी निकालना चाहिये कि इन ताकतों की कमर किस तरह तोड़ी जाए क्योंकि देश के कमजोर होने पर संविधान भी धीरे-धीरे अपना असर और महत्व खो बैठता है। और ऐसा होना हमारी सार्वभौमिकता को खतरे में डाल सकता है।

गणतंत्र दिवस की अनन्त शुभकामनाएं ।

-रवीन्द्र वाजपेयी