Thursday, 31 December 2020

अंतत: बात ले - देकर ही बनेगी



किसान संगठनों के साथ केंद्र सरकार की बातचीत में गत दिवस जिन दो बिन्दुओं पर सहमति बनी वे आन्दोलन की मुख्य मांगें भले न हों लेकिन इसका सुखद पहलू ये है कि संवादहीनता खत्म हुई। सरकार की ओर से आये  दोनों मंत्रियों ने किसानों के साथ उनके लंगर में भोजन कर कूटनीतिक चतुराई दिखाई जो ऐसे मामलों में खाई पाटने में सहायक बनती है। बहरहाल पराली जलाने पर लगने वाला जुर्माना और बिजली को लेकर आने वाले नए प्रावधान के बारे में सरकार के आश्वासन के बाद भले ही किसानों ने आज की ट्रैक्टर रैली रद्द कर दी लेकिन तीनों कानून वापिस लेने के साथ ही एमएसपी को कानूनी शक्ल दिए बिना समझौता न करने की जिद अभी भी बनी हुई है। यद्यपि कल की बातचीत काफी सौहार्द्रपूर्ण माहौल में हुई बताई जा रही है किन्तु सरकार की तरफ से उक्त दोनों मुद्दों पर समिति बनाये जाने के प्रस्ताव को किसान संगठनों ने एक बार फिर खारिज कर दिया। लेकिन जैसी खबरें आ रही हैं उनसे लगता है कि किसान संगठनों में आन्दोलन को लम्बा खींचने के सवाल पर एक राय नहीं बन पा रही। सरकार को उम्मीद है 4 जनवरी की बैठक तक किसान नेताओं के रुख में और लचीलापन आयेगा जिससे गतिरोध दूर करना आसान हो जाएगा। हालाँकि क्या होगा ये आज कह पाना कठिन है क्योंकि किसानों के संगठनों में अलग-अलग मानसिकता के लोग हैं और सभी की ताकत एक जैसी नहीं हैं। ये भी सही है कि किसी आन्दोलन को अनिश्चितकाल तक खींचने से उसका असर घटने लगता है। पंजाब और हरियाणा में कुछ समय बाद  ही रबी फसल पकने की स्थिति बनने लगेगी और तब किसान भी खेतों में लौटने को बेताब होने लगेंगे। एमएसपी को लेकर भले ही किसान संगठनों और सरकार के बीच बात न बन पाई हो लेकिन सच्चाई ये है कि खरीफ फसल की सरकारी खरीद जमकर हुई जिसका लाभ पंजाब और हरियाणा के किसानों को भी मिला। इसी तरह रबी फसल को खरीदने के लिए भी सरकारी तैयारियां शुरू हो गईं हैं। ऐसे में किसानों को दिल्ली में रोके रखना आसान नहीं होगा। यही वजह है कि अपनी मुख्य मांगों पर अड़े रहने के बावजूद किसानों ने न सिर्फ सरकार का न्यौता स्वीकार कर बातचीत में हिस्सा लिया बल्कि पिछली बैठकों की  अपेक्षा शांत भी रहे। दूसरी तरफ वार्ताकार बनकर आये दोनों मंत्रियों ने भी लंगर में ही आहार ग्रहण किया और उस दौरान भी वातावरण खुशनुमा रहा। आगे की बैठकों में दोनों पक्ष और आगे बढ़ेंगे ये उम्मीद कल की बातचीत के बाद बढ़ गयी  है। जहां तक सरकार का पक्ष है तो एक बात साफ़ है कि वह तीनों कानून वापिस लेने की शर्त पर बात आगे बढ़ाने को राजी शायद ही हो। ऐसे में संभावना यही है कि एक समिति बनाकर समझौते के बिंदु तय किये जायेंगे। आगामी सप्ताह तक सर्वोच्च न्यायालय का अवकाश भी खत्म हो जायेगा और हो सकता है वह उसके समक्ष विचाराधीन याचिका पर ये निर्देश सरकार और किसान संगठनों को दे कि फि़लहाल कानूनों पर अमल स्थगित किया जाये और समिति बनाकर किसी निष्कर्ष तक पहुँचने तक आन्दोलन भी ठंडा  रखा जाये। ऐसे मामलों में परदे के पीछे भी बहुत कुछ चलता है। पंजाब सरकार को भी  लगने लगा है कि आन्दोलन के बेनतीजा जारी रहने का असर राज्य की  अर्थव्यवस्था के साथ ही कानून-व्यवस्था पर भी पड़े बिना नहीं रहेगा। ऐसे में यदि 4 जनवरी की बातचीत में युद्धविराम की स्थिति बन जाये तो आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि दोनों पक्ष जाहिर तौर पर भले अपनी बात पर अड़े रहने का एहसास करवा रहे हैं किन्तु भीतर से उन्हें भी ये महसूस हो रहा है कि ले-देकर ही बात बनेगी। दिल्ली वासियों के साथ ही पूरा देश इस गतिरोध के शांतिपूर्ण हल की प्रतीक्षा कर रहा है। बीत रहे साल से जुड़ी कड़वी यादें नए साल में साथ न रहें ये चाहत हर किसी की है। ऐसे में बेहतर तो यही  होगा कि हठधर्मिता त्यागकर व्यापक संदर्भ में चीजों को देखते हुए ऐसा निर्णय हो जो तात्कालिक लाभ की बजाय  दूरगामी फायदों का आधार बने ।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 30 December 2020

तो पंजाब को भी बंगाल जैसा नुकसान उठाना पड़ेगा



कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे किसान आन्दोलन के अंतर्गत पंजाब   में निजी कम्पनी के मोबाईल टावरों को क्षतिग्रस्त किया जाना मूर्खतापूर्ण कदम है | आन्दोलनकारी मानते हैं कि नये कानून इस कंपनी को लाभ पहुँचाने के  लिए ही  बनाये गये हैं | यद्यपि राज्य के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह ने  आंदोलन का समर्थन करने के बावजूद  मोबाइल टावरों में तोड़फोड़ करने वालों के विरुद्ध अपराधिक मामले दर्ज करने के आदेश दिए लेकिन उसका खास असर नहीं  होता दिख रहा |  अब तक 1600  से ज्यादा टावरों के क्षतिग्रस्त होने से संचार सेवाओं पर बुरा असर पड़ रहा है | न सिर्फ मोबाइल फोन अपितु इंटरनेट  सुविधा बधित होने से विद्यार्थियों , व्यावसायिक और औद्योगिक प्रतिष्ठानों तथा बैंकिंग सेवा के साथ ही शासकीय कामकाज पर भी बुरा असर पड़ने की खबर है | कोरोना काल में लाखों लोग इन्टरनेट के जरिये घर बैठे काम कर  रहे हैं | वहीं विद्यालय , महाविद्यालय से लेकर तो विश्वविद्यालय भी  ऑन लाइन पढ़ाई करवा रहे हैं | आर्थिक लेनदेन  नगदी के साथ ही डिजिटल होने से इन्टरनेट की  अनिवार्यता बढ़ गई है | यही वजह है कि अमरिंदर सिंह ने  फ़ौरन मोबाइल टावरों को नुकसान पहुँचाने  वालों के विरुद्ध कानून कार्रवाई के आदेश दिए  | हालाँकि ये  स्पष्ट नहीं है कि इस बारे में उनकी सरकार कितनी ईमानदार है क्योंकि वे आन्दोलनकारी किसानों से  सीधे पंगा लेने से भी बच रहे हैं | आन्दोलनकारियों  की मांगें और तौर - तरीके किस हद तक उचित हैं ये अलग विषय है लेकिन मोबाइल टावरों को क्षति पहुँचाने जैसी हरकत का दूरगामी नुकसान समूचे पंजाब को उठाना पड़ सकता है | इस बारे में बंगाल का उदाहरण सबसे सटीक है | ब्रिटिश काल से ही कोलकाता औद्योगिक दृष्टि से काफी विकसित रहा | आजादी के बाद भी उसकी वह स्थिति जारी रही किन्तु ज्योंही वहां वामपंथी शासन आया उसके बाद से औद्योगिक इकाइयों को परेशान किया जाने लगा | नक्सली आन्दोलन ने ने बची - खुची कसर पूरी कर दी | नतीजा ये निकला कि नए उद्योग तो  आना बंद हुए ही पहले से कार्यरत इकाइयों ने भी अपना कारोबार समेटना शुरू कर दिया | वामपंथियों की विध्वंसकारी नीतियों के कारण कोलकाता सहित पूरे राज्य में औद्योगिक विकास का पहिया थम गया | यहाँ तक कि छोटे - छोटे व्यापारी तक लाल झंडे की आड़ में होने वाले उत्पात से त्रस्त हो गए | दूसरी तरफ आजादी के बाद से पंजाब में न सिर्फ कृषि बल्कि औद्योगिक विकास भी जमकर हुआ | इस राज्य के लोगों ने परिश्रम की पराकाष्ठा करते हुए खेत और कारखाने दोनों में अपनी उद्यमशीलता का परिचय दिया जिससे वह  देश के  अग्रणी  राज्यों में शुमार हो सका | हालाँकि तकनीक के विकास की वजह से  परम्परागत उद्योगों के सामने भी अस्तित्व का संकट है लेकिन नए उद्योगों के विकास की सम्भावनाएं भी तभी बन सकेंगी जब राज्य में राजनीतिक स्थिरता के साथ ही कानून - व्यवस्था की  स्थिति अच्छी रहे | वैसे भी नब्बे के दशक में खलिस्तानी आतंक के कारण पंजाब का औद्योगिक विकास बुरी तरह से प्रभावित हुआ जिसका हरियाणा ने जमकर उठाया | किसान आन्दोलन का अंजाम क्या होगा ये आज कह पाना कठिन है क्योंकि तीनों कृषि कानूनों को वापिस लेने की मांग मंजूर करना केंद्र सरकार के लिए नई मुसीबतों को न्यौता देने जैसा होगा | दूसरी तरफ किसान संगठन इससे कम पर मानने राजी नहीं हैं | हो सकता है आज की बातचीत से कुछ रास्ता निकल आये लेकिन मोबाइल टावरों के अलावा निजी कम्पनियों के शो रूम , मॉल और पेट्रोल पम्पों को बंद करवाने या उनमें तोड़फोड़ करने जैसी  वारदातों से पंजाब में निवेश करने के इच्छुक लोग छिटक सकते हैं | किसान आन्दोलन में अनेक ऐसे लोग भी  हैं जो कृषि के साथ ही  उद्योगों से भी जुड़े हुए हैं | इस वर्ग को चाहिए  आन्दोलन को गलत  दिशा में जाने से रोके  | उल्लेखनीय है पंजाब उन राज्यों में से है जहां के लाखों लोग अप्रवासी के रूप में विदेशों में बसे हैं | पंजाब की  आर्थिक समृद्धि में उनकी  जबरदस्त भूमिका रही है | मौजूदा आन्दोलन को  कैनेडा और ब्रिटेन जैसे देशों से जिस तरह का आर्थिक सहयोग मिल रहा है वह इसका प्रमाण है | इन अप्रवासियों में अनेक ऐसे भी होंगे जो निकट भविष्य में पंजाब में निवेश करने वाले हों | ऐसे लोगों की भले ही किसान आन्दोलन के साथ सहानुभूति  हो किन्तु  औद्योगिक इकाइयों के साथ तोड़फोड़ जैसी घटनाएँ जारी रहीं तब वे भी यहाँ पैसा फंसाने से पहले सौ बार सोचेंगे | इसीलिये ये जरूरी है कि किसान आन्दोलन अपनी सीमाओं में ही रहे | किसी कम्पनी विशेष से  खुन्नस निकालने के फेर में पूरे उद्योग जगत को नाराज करना पंजाब के लिए नुकसानदेह होगा | मोबाइल सेवा को बाधित करना तो बहुत ही नासमझी भरा कदम है | विरोधस्वरूप किसी कम्पनी की सेवाएँ छोड़ देना तो ठीक है लेकिन उसको बाधित करने से और लोग भी परेशान होते हैं और पूरी संचार तथा संवाद की प्रक्रिया रुकती है | दिल्ली के दरवाजे पर जमे  हजारों किसानों ने अब तक शान्ति बनाये रखी | अनेक बार घोषणा करने के बावजूद वे दिल्ली को पूरी तरह नहीं घेर सके तो उसके पीछे जनता की नारजगी से बचना ही कारण था किन्तु पंजाब से आ रही खबरें आन्दोलन के हिंसक होने के संकेत दे रही हैं | किसान नेताओं को ये बात ध्यान रखनी होगी कि खलिस्तान के आन्दोलन को भी पंजाब के अधिकांश  सिखों  का समर्थन इसलिए नहीं मिल सका क्योंकि उसकी वजह से आम जनता  की परेशानियां बढ़ चली थीं | पंजाब सरकार समय रहते  किसान आन्दोलन के नेताओं को इस बारे में आगाह करे वरना पंजाब का औद्योगिक ढांचा चरमराने की नौबत आये बिना नहीं रहेगी |

- रवीन्द्र वाजपेयी

राष्ट्रीय विकल्प के तौर पर कांग्रेस जरूरी है लेकिन .....



कांग्रेस ने विगत दिवस अपना  136 वां स्थापना  दिवस मनाया। इस मौके पर देश भर में पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने पार्टी के प्रति अपनी निष्ठा  प्रदर्शित करते हुए उसे दोबारा मजबूत करने का संकल्प लिया। वैसे तो ये महज एक रस्म थी लेकिन इस साल पार्टी के पूर्व और भावी अध्यक्ष  माने जा रहे  राहुल गांधी स्थापना दिवस के पहले ही विदेश चले गये। उनका गंतव्य हमेशा की तरह गोपनीय रखे  जाने पर सफाई दी गई कि वे इटली में अपनी नानी से मिलने गए हैं । पार्टी की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी भी राष्ट्रीय मुख्यालय में आयोजित समारोह में नहीं पहुँची जबकि वे दिल्ली  में ही थीं। इसका कारण उनकी  अस्वस्थता बताया गया जो काफ़ी हद तक सही है। लेकिन कांग्रेस के प्रथम परिवार के दोनों सदस्यों की गैर मौजूदगी पर न सिर्फ भाजपा अपितु राजनीति में रूचि रखने वाले अनेक लोगों ने व्यंग्य बाण छोड़े। जहाँ तक बात श्रीमती गांधी की है तो उनके स्वास्थ्य संबंधी जानकारी सर्वविदित है। वे अक्सर अस्पताल में भी भर्ती होती रहती हैं। जाँच हेतु विदेश भी उन्हें जाना पड़ता है किन्तु ऐसे समय जब पार्टी के सामने   भाजपा से लड़ने के साथ ही  अपने घर में चल रही कलह से भी जूझने जैसी समस्या खड़ी हो तब राहुल के   गैर हाजिर रहने से देश भर के  कार्यकर्ताओं में निराशा का  भाव  आना स्वाभाविक है। चूंकि उनकी अधिकतर विदेश  यात्राओं को पूरी तरह गोपनीय रखा जाता है इसलिए उन पर सदैव सवाल खड़े होते रहे हैं। मौजूदा प्रवास  यदि केवल नानी से मिलने के लिए है तब भी ये पूछा जाना गैर वाजिब नहीं होगा कि क्या वे दो दिन बाद नहीं जा सकते थे ? पहले भी  संसद में अनेक महत्वपूर्ण मुद्दों पर  पार्टी का पक्ष रखने की बजाय श्री गांधी विदेश यात्रा पर जाते रहे। एक साल तो  बजट सत्र जैसे महत्वपूर्ण अवसर पर वे पूरे समय देश के बाहर कहाँ  रहे ये आज भी रहस्य है। सुरक्षा के मद्देनजर ये गोपनीयता भले ही आवश्यक हो लेकिन देश की सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी के वास्तविक सर्वोच्च नेता के साथ जुड़ी इस तरह की बातें भारतीय संदर्भ में अटपटी लगती हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में राहुल ही कांग्रेस  के  चेहरे थे। पूरे चुनाव अभियान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर उन्होंने जिस तरह हमले किये उससे ऐसा लगा कि वे खुद को अगला प्रधानमंत्री मान बैठे थे किन्तु नतीजों ने ये साबित कर दिया कि जनता ने उन्हें उस  लायक नहीं समझा। अगर कांग्रेस की संख्या लोकसभा में 100 तक भी पहुँच जाती  तब शायद श्री गांधी अपनी पीठ थपथपा  सकते थे लेकिन वह  एक बार फिर आधे शतक के करीब आकर ठहर गई जिसके बाद उन्होंने अध्यक्ष पद तो छोड़ दिया परन्तु उत्तराधिकारी चुनने में पार्टी ने महीनों गँवा दिए और फिर सोनिया जी को ही  कामचलाऊ अध्यक्ष बना दिया जो  स्वास्थ्य अच्छा नहीं होने से वे पार्टी को पर्याप्त समय नहीं दे पाईं। वहीं राहुल भी बयानों के तीर छोडऩे से ज्यादा कुछ न कर सके। इससे दुखी होकर अंतत: पार्टी के ही दो दर्जन नेताओं ने सोनिया जी को  चिट्ठी  लिखकर अपनी  चिंता और नाराजगी जाहिर कर डाली जिसके बाद का वृतान्त  जगजाहिर है। कुछ दिनों पहले  सुलह की कोशिश भी हुई जिसके बाद दोबारा श्री गांधी की ही ताजपोशी पर सहमति बनने का संकेत दिया गया। संगठन चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने के बारे में भी  कुछ निर्णय हुए। ये सब देखते हुए स्थापना  दिवस पर यदि राहुल पूरे देश में फैले कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने का काम  करते तो वह बेहद रचनात्मक कदम होता। लेकिन एक बार फिर वे मौके पर चौका लगाने से चूक गए। प्रश्न उठ सकता है कि कांग्रेस के भीतर  जो चल रहा है उससे किसी और को क्या लेना देना ? लेकिन इसका जवाब ये है कि कांग्रेस महज एक राजनीतिक दल नहीं  अपितु  संसदीय लोकतंत्र की जरूरत भी है। देश एक ही राष्ट्रीय पार्टी के एकाधिकार का दुष्परिणाम आपातकाल के रूप में देख चुका है। इंदिरा इज इण्डिया और इण्डिया इज इंदिरा जैसा दरबारी संस्कृति वाला नारा राष्ट्रीय विकल्प के अभाव के कारण ही सुनाई दिया था।   बीते छ: साल में जिस तरह की राजनीतिक परिस्थितियां बनती आ  रही हैं उनसे कांग्रेस के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराते दिखने लगे हैं। न सिर्फ जनता अपितु कांग्रेसजन भी काफी  निराश हो चले हैं। चूंकि  दूसरी पंक्ति के नेतृत्व को समय रहते विकसित होने का अवसर नहीं दिया गया इसलिए बतौर उत्तराधिकारी कोई चेहरा भी  नजर नहीं आ रहा। किसी  राजनीतिक पार्टी के जीवन में जय-पराजय आती-जाती रहती हैं किन्तु  राष्ट्रीय पार्टी के रूप में संसदीय संतुलन बनाये रखने के लिए कांग्रेस का सशक्त रहना  जरूरी है। क्षेत्रीय दल संसद में कितनी भी बड़ी संख्या में जीतकर आ जाएँ लेकिन उनका दृष्टिकोण संकुचित होने से वे राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावशाली नहीं हो पाते। कांग्रेस बेशक अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है लेकिन न केवल  उसका बना  रहना बल्कि सशक्त विपक्ष के तौर पर संसद और सड़कों पर मौजूदगी प्रजातंत्र की अच्छी सेहत के लिए जरूरी है। आज की स्थिति में देश सक्षम विपक्ष की कमी को महसूस करने लगा है फिर भी  कांग्रेस यदि जनता का विश्वास नहीं जीत पा रही तो  उसके लिए वह स्वयं जिम्मेदार है। लोकतंत्र में चुनावी जीत का बहुत महत्व है किन्तु विपक्षी दल संसद या विधानसभा के बाहर भी जनहित के लिए संघर्ष कर सकते हैं। कांग्रेस के लिए आज ऐसा ही मौका है।  लेकिन इसके लिए उसे एक गतिशील पार्टी के तौर पर सामने आना होगा। कांग्रेस एक ऐतिहसिक पार्टी है लेकिन यदि वह इसी तरह चलती रही तब वह इतिहास बन जाए तो आश्चर्य नहीं होगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी


भारत तो नहीं टूटेगा शिवसेना जरूर छिन्न-भिन्न हो सकती है



शिवसेना के प्रवक्ता संजय राउत राज्यसभा के सदस्य होने के साथ-साथ ही पार्टी द्वारा संचालित सामना नामक अख़बार के सम्पादन का दायित्व भी सँभालते हैं। आये दिन उनके तीखे बयान और लेख चर्चा में रहने के साथ ही विवाद खड़े करते हैं। गत दिवस उन्होंने सामना में प्रकाशित अपने विशेष कालम में लिखा कि यदि केंद्र सरकार को ये एहसास नहीं हुआ कि हम अपने राजनीतिक लाभ के लिये लोगों को नुकसान पहुंचा रहे हैं तो जैसे सोवियत संघ से टूटकर विभिन्न हिस्से अलग हो गए वैसा ही हमारे देश में होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। शिवसेना और भाजपा के बीच चूंकि राजनीतिक दूरियां काफी बढ़ चुकी  हैं इसलिए श्री राउत समय-समय पर जहर बुझे तीर छोड़ते रहते हैं। उनके अधिकांश बयानों में भाषायी  मर्यादा की धज्जियां उडाई जाती रही हैं। चूंकि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे उनको रोकते-टोकते नहीं हैं इसलिए ये माना जा सकता है कि श्री राउत जो भी बोलते हैं वह पार्टी का अधिकृत विचार है। राजनीतिक पार्टियों की ओर से उनके प्रवक्ता अथवा अन्य नेतागण जो भी टिप्पणी या प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं उसे नीतिगत माना जाता है। यदि वे ऐसी कोई बात बोल  जाते हैं जो पार्टी की नीतियों से मेल न खाती हो तब ये सफाई दी जाती कि वे उनके निजी विचार थे। उस दृष्टि से देखें तो अब तक श्री राउत के संदर्भित लेख पर शिवसेना की तरफ से कोई टीका-टिप्पणी नहीं किये जाने से  स्पष्ट है कि पार्टी उनके विचारों से सहमत है। लेकिन भारत के सोवियत संघ की तरह विघटित होने संबंधी बात ऐसी नहीं है जिसे किसी नेता की नासमझी अथवा मूर्खता मानकर उपेक्षित किया सके। वरना भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे नारे लगाने वाले भी बेकसूर ठहराए जाने लगेंगे । अपनी उग्र  छवि के बावजूद शिवसेना राष्ट्रीय एकता और अखंडता की रक्षा को  लेकर सदैव बेहद संवेदनशील रही है । राजनीतिक मतभेदों के बावजूद भी उसकी तरफ से इस तरह की  बात कभी सुनने  नहीं मिली  जबकि मराठी अस्मिता उसकी राजनीति का आधार रहा है । आजादी के बाद 500 से अधिक रियासतों का भारत संघ में विलय कुछ अपवादों को छोड़कर जिस सरलता और सहजता से संभव हुआ उसका कारण  प्राचीनकाल से भारत का एक राष्ट्र के तौर कायम रहना ही था । आजादी के उपरान्त  तेलंगाना में साम्यवादियों  का सशस्त्र विद्रोह भी असफल हो गया । उसके बाद से पूर्वोत्तर के बड़े  इलाके में विदेशी ताकतों के संरक्षण में अलगाववादी संगठनों द्वारा हिंसा का सहारा लेकर भारत से अलग होने के लिए लम्बा संघर्ष किया गया  किन्तु अंतत: उन्हें भी संघीय ढांचे के अंतर्गत आकर प्रजातान्त्रिक प्रक्रिया को स्वीकार करना पड़ा । बीते अनेक दशकों से  चीन के  टुकड़ों पर पलने वाले नक्सली भारत को तोड़ने के सपने देख रहे हैं लेकिन उन्हें इसलिए सफलता नहीं मिल रही क्योंकि आतंक  के बावजूद जनमानस न तो उनसे डरा और न ही प्रभावित हुआ। पंजाब में खालिस्तान के नाम पर देश के को खंडित करने का जोरदार प्रयास भी अंतत: अपनी मौत मर गया क्योंकि  अलग पहिचान बनाये रखने के बाद भी सिख समुदाय ने  भारत से अलग होने वाली सोच को ठुकरा दिया।  कश्मीर घाटी ने भी अलगाववाद और  आतंक का लम्बा  दौर देखा लेकिन कश्मीरी पंडितों को आतंकित कर घाटी छोड़ने के लिए मजबूर भले कर  दिया गया हो लेकिन कश्मीर को भारत से अलग करने का षडयंत्र कामयाब न हो सका  तो उसकी वजह इस देश की प्राकृतिक संरचना और प्राचीनता ही है । तमिलनाडु में भी भारत से अलग होकर पृथक तमिल राष्ट्र बनाने की मुहिम शुरू हुई  जिसका फैलाव श्रीलंका तक हुआ जहां लिट्टे नामक आतंकवादी संगठन ने गृहयुद्ध की परिस्थितियां तक उत्पन्न कर दीं किन्तु वह प्रयास भी आखिरकार असफल रहा क्योंकि तमिलनाडु की जनता को   तमिल भाषा और द्रविड़ पहिचान  के प्रति आकर्षण के बावजूद भारत से अलग होना मंजूर नहीं हुआ। ये सब देखते हुए संजय राउत ने जो चेतावनी दी वह गीदड़ भभकी  से ज्यादा कुछ नहीं। आश्चर्य है महाराष्ट्र सरकार में शामिल रांकापा और कांग्रेस दोनों ने इस बारे में कुछ भी  कहना उचित नहीं समझा। भाजपा  ने जरूर श्री राउत के विरुद्ध मामला कायम करने की  मांग  की है । लेकिन ये बात केवल राजनीतिक आरोप - प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहना चाहिए क्योंकि भारतीय संसद के उच्च सदन का एक वरिष्ठ  सदस्य देश के टुकड़े होने की बात करे तो ये एक गम्भीर मुद्दा है । आश्चर्य की बात है कि पत्रकार होने के बावजूद श्री राउत को ये ज्ञान नहीं है कि भारत भले ही राज्यों का संघ है किन्तु ये राज्य सोवियत संघ में शामिल विभिन्न देशों की तरह न होकर इस देश के अभिन्न हिस्से थे । इसलिए राजनीतिक मतभेदों के बावजूद राष्ट्रीय एकता और अखंडता के सवाल पर संसद से ग्राम पंचायत तक पूरा देश एकमत है । आपातकाल के दौरान जब इंदिरा गांधी ने मौलिक अधिकार समाप्त करते हुए पूरे विपक्ष को जेल में ठूंस दिया तब भी देश को तोड़ने जैसी बात कहीं सुनाई नहीं दी । और लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के अंतर्गत ही आपातकाल की शक्ल में आई तानाशाही पर जीत हासिल की गई । 1947 से  देश में चले आ रहे एकदलीय प्रभुत्व का दौर भी 1977 में  खत्म हो गया । बहुदलीय गठबंधन सरकारें  भी आती - जाती रहीं । राजनीतिक अस्थिरता का आलम भी देश ने देखा और  स्थायित्व भी देख रहा है । लेकिन किसी भी दौर में देश के टूटकर बिखरने जैसी बात यदि नहीं हुई तो उसका कारण भारत की सांस्कृतिक एकता ही थी जिसका  सोवियत संघ में सर्वथा अभाव था क्योंकि वह एक कृत्रिम रचना थी । संजय राउत ने जो  कुछ भी लिखा वह बेहद  गैर जिम्मेदाराना है । बेहतर तो यही होगा कि उद्धव ठाकरे उनके विरुद्ध ऐसी कार्रवाई करें जिससे उनकी प्रमाणिकता साबित हो । यदि वे ऐसा नहीं करते तब ये माना जाएगा कि शिवसेना अपने संस्थापक बाल ठाकरे की विरासत को समंदर में डुबोने पर आमादा है । शिवसेना को ये याद रखना चाहिए कि उसके नासमझ नेता के कहने मात्र से ये देश तो टूटने वाला नहीं है किन्तु यदि उसने उनकी जुबान पर लगाम नहीं  लगाई तब ये पार्टी जरूर छिन्न - भिन्न हो जायेगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 26 December 2020

फास्ट टैग के साथ ही टोल टैक्स की दरें भी घटाई जाएं




भारत सरकार ने फैसला किया है कि आगामी 1 जनवरी से सभी चार पहिया वाहनों में फ़ास्ट टैग जरूरी होगा | इसका  उद्देश्य टोल नाकों पर समय की बर्बादी रोककर ईंधन का अपव्यय रोकना है जो पर्यावरण संरक्षण के लिए भी  लाभप्रद होगा | फ़ास्ट टैग दरअसल टोल टैक्स की प्रीपेड व्यवस्था है | इसके जरिये वाहन मालिक टोल टैक्स का अग्रिम भुगतान करते हैं जिससे वाहन में लगे  टैग से उसे नाके में बिना रुके निकलने की सुविधा रहेगी और  टैक्स का भुगतान स्वचालित तरीके से होता जायेगा | नाकों के अलावा बैंकों और अन्य संस्थाओं में भी फ़ास्ट टैग खरीदने की सुविधा दी जा रही है | नाकों पर होने वाले विलम्ब और गुंडागर्दी से केवल ट्रक और बस वाले ही नहीं अपितु निजी चार पहिया वाहन वाले भी  हलाकान  थे | ये कहना गलत न होगा कि टोल  ठेके ज्यादतार बाहुबलियों के अलावा  छद्म रूप से  राजनेताओं के पास होने से आम वाहन  चालक उनकी ज्यादती का विरोध करने का साहस नहीं कर पाता | ट्रक चालकों से  मनमाना टैक्स वसूलने के नाम पर घंटों  परेशान करना बहुत ही आम शिकायत है | इसे देखते हुए ट्रांसपोर्ट ऑपरेटर्स के राष्ट्रीय संगठन ने परिवहन मंत्री नितिन गडकरी से मिलकर एकमुश्त टोल टैक्स चुकाने का प्रस्ताव देते हुए  नाके खत्म किये जाने का अनुरोध भी किया था |  स्मरणीय है सत्ता में आने से पहले श्री  गडकरी भी इस टैक्स को  समाप्त किये जाने के पक्षधर थे | हालाँकि राजमार्गों के विकास के लिए सरकार को धन की जो आवश्यकता है उसे देखते हुए टोल टैक्स पूरी तरह खत्म करना तो  सम्भव नहीं लगता | खुद श्री गडकरी भी अब  ये कहने  लगे  हैं कि अच्छे हाईवे पर चलना है तब टोल टैक्स तो देना ही पड़ेगा | पूरी दुनिया में टोल टैक्स का प्रचलन है | इसी  के साथ ये अवधारणा भी वैश्विक स्तर  पर सर्वमान्य होती जा रही है कि किसी भी देश में  विकास का मापदंड वहां की सड़कें विशेष रूप से हाईवे होते हैं | प्रथम  विश्व युद्ध के बाद आई आर्थिक महामंदी से उबरने के लिए अमेरिका में बड़े पैमाने पर राजमार्गों और पुलों आदि का निर्माण किया गया जिसने निश्चित रूप से उस देश की तकदीर और तस्वीर दोनों बदल दीं | भारत में राजमार्गों को विश्वस्तरीय बनाकर सड़क परिवहन को सरल , सुरक्षित और सुविधाजनक बनाने की परिकल्पना को पूर्व प्रधानमन्त्री स्व. अटलबिहारी वाजपेयी ने मूर्तरूप देते हुई स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना का शुभारम्भ किया था  | उसी के साथ उन्होंने गाँवों को पक्की सड़क से जोड़ने का जो बीड़ा उठाया उसने ग्रामीण  विकास की असीम सम्भावनाओं को जन्म दिया | हालांकि 2004 में उनकी  सरकार चली जाने के बाद मनमोहन शासन  में राजमार्गों के निर्माण  की गति धीमी रही वरना अब तक स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना पूरी हो चुकी होती | 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार के आने के बाद संयोगवश श्री  गडकरी को परिवहन मंत्रालय दिया गया और उन्होंने वाजपेयी सरकार के रुके काम को गति देते हुए देश भर में राजमार्गों का निर्माण जोरशोर से प्रारम्भ करवा दिया | इसके सुपरिणाम भी देखने मिल रहे हैं |  विशेष रूप से व्यावसायिक वाहनों मसलन ट्रक और बस चालकों को उच्चस्तरीय हाईवे के साथ ही फ्लायओवर के कारण समय और ईंधन की बचत तो होने लगी किन्तु टोल नाके की अव्यवस्था के चलते वे हलाकान थे और सरकार को भी टैक्स की वसूली के सही आंकड़े न मिलने से  नाका भी  निर्धारित समय सीमा के बाद भी जारी रहता था | निश्चित रूप से इस गोरखधंधे को नेता और नौकरशाहों के  गठजोड़ का संरक्षण रहा  | फास्ट टैग व्यवस्था  लागू होने के बाद से टोल नाकों पर होने वाली गुंडागर्दी और जबरिया वसूली पर काफ़ी रोक लगी है । लेकिन बीते कुछ समय से ये शिकायतें  मिल रही थीं कि निजी टोल नाकों पर फ़ास्ट टैग लगा होने के बाद भी नगद भुगतान लिया जाता है | 1 जनवरी से फ़ास्ट टैग अनिवार्य होने के बाद अब नगद भुगतान की व्यवस्था पूरी तरह रुकना चाहिए | दूसरी बात ये है कि शहरों से सटे कस्बों तक आने - जाने के लिए लगने वाले टोल टैक्स में छूट  जरूरी है | इसका कारण ये है कि ऐसे अनेक कस्बों से कुछ दूर  पहले राजमार्ग निकलने के कारण लोगों को अपने घर से खेत तक आने जाने के लिए भी  टोल नाके से गुजरना होता है | ये समस्या देश भर में सैकड़ों जगह देखने मिल रही है जिससे लोगों में नाराजगी है | बेहतर हो श्री गडकरी व्यक्तिगत रूचि लेकर स्थानीय परिवहन को टोल टैक्स से राहत दिलवाने की व्यवस्था करें और एक न्यूनतम दूरी तक आने - जाने पर गैर व्यवसायिक वाहनों के लिए राहत की  नीति बने | वैसे सड़क मार्ग से लंबी यात्राएँ करने वाले ये सवाल भी उठाने लगे हैं कि जब नये वाहन के पंजीयन के समय ही रोड टैक्स का एकमुश्त भुगतान  ले लिया जाता है तब टोल टैक्स का क्या औचित्य है ? वैसे भी  अब चार पहिया वाहन केवल धन्ना सेठों की सवारी नहीं रही | भारत के विशाल मध्यम वर्ग में भी भले ही छोटी हो किन्तु कार रखने का चलन बढ़ चला है | देश में आई ऑटोमोबाइल क्रांति के पीछे मध्यमवर्ग के जीवन स्तर में हुआ सुधार भी बड़ा कारण है | कोरोना काल में अपने वाहन से लम्बी यात्रा करने का चलन भी तेजी से बढ़ा है  | चूँकि फ़ास्ट टैग प्रणाली  पूरी तरह से लागू हो जाने के बाद टोल टैक्स  से सरकार को होने वाली आय में पर्याप्त वृद्धि होगी और नाके वालों की अवैध वसूली पर भी विराम लगेगा इसलिए जरूरी है कि टैक्स की दरों में कमी की जाये जिससे सड़क परिवहन सुचारू और सस्ता हो | वर्तमान में तो 1 रूपये प्रति किमी से भी  ज्यादा टोल टैक्स लग जाता है | परिवहन मंत्री जमीनी सच्चाई से वाकिफ हैं इसलिये उनसे  अपेक्षा की जा सकती है कि वे राजमार्गों के निर्माण में रूचि लेने के साथ ही  टोल टैक्स व्यवस्था में व्याप्त  विसंगतियों की ओर भी ध्यान देंगे | राजमार्गों को विश्वस्तरीय बनाना समृद्ध और विकसित भारत का प्रतीक तो होगा लेकिन उसके साथ ही ये भी जरूरी  होगा कि  उस पर चलने के सुख से आम आदमी को वंचित न किया जाए | फ़ास्ट टैग प्रणाली से सरकार के साथ ही जनता को भी फायदा मिले तभी उसकी सार्थकता है ।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 25 December 2020

भारतीय खाद्यान्न का निर्यात अगली क्रांति कर सकता है



कुछ समय पहले केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी का एक वीडियो बड़ा चर्चित हुआ जिसमें उन्होंने भारतीय कृषि के उत्थान के लिए बड़े ही व्यवहारिक सुझाव दिए थे। उनके अनुसार किसानों को बदलते समय की जरूरतों के मुताबिक अपने उत्पादों का चयन करना चाहिए जिससे वे ज्यादा कमाई करने के साथ ही मांग और पूर्ति के अर्थशास्त्रीय सिद्धांत से बंधने की बजाय अपने उत्पाद को बेचने के लिए स्वतंत्र और स्वायत्त हों। उल्लेखनीय है श्री गडकरी ने महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में नए-नए प्रयोग करते हुए किसानों को मजबूर के बजाय मजबूत बनाने के लिए काफी काम किया जिसके अच्छे परिणाम भी आये। उनका कहना है कि खेती को ढर्रे से निकालकर बहुमुखी बनाए बिना किसान की आय बढ़ाना असंभव है। भारत में साल दर साल अन्न का उत्पादन तो बढ़ रहा है लेकिन वह मुख्यत: गेंहू और धान पर केन्द्रित होने से इनका तो अतिरिक्त उत्पादन होता है जबकि दलहन और तिलहन का उत्पादन हमारी जरूरतों के अनुसार न होने से उनका आयात किया जाता है। खाद्य तेल में मिलावट के पीछे भी यही कारण है। दूसरी बात जो श्री गडकरी ने कही वह ये कि हमारे देश में रिकॉर्ड कृषि उत्पादन का लाभ राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को तभी हो सकता जब उसे गोदामों में सड़ाने की बजाय निर्यात करें। उल्लेखनीय है भारत दुनिया में खाद्यान्न पैदा करने वाला अग्रणी देश बन जाने के बाद भी निर्यात के क्षेत्र में काफी पीछे है। दूसरी तरफ सरकारी गोदामों में जो भण्डार है वह आने वाले दो से तीन साल तक घरेलू जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है। एक समय था जब भारत में खाद्यान्न की मारामारी थी और हमें अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और कैनेडा से गेंहू मंगवाकर राशन दुकानों के माध्यम से बंटवाना पड़ता था। लेकिन सत्तर के दशक में हरित क्रांति के माध्यम से आत्मनिर्भरता का लक्ष्य पूरा करने के साथ ही घरेलू जरूरतों को पूरा करने के बाद बचा खाद्यान्न सरकारी खरीद के जरिये सुरक्षित अन्न भंडार के तौर पर गोदामों में रखा जाने लगा। इसका प्रत्यक्ष लाभ इस वर्ष कोरोना के कारण लगाये गये लम्बे लॉक डाउन के समय देखने मिला जब केंन्द्र सरकार ने गरीबों को मुफ्त और सस्ता खाद्यान्न देकर देश को अराजकता से बचा लिया। श्री गडकरी ने अपने संदर्भित वक्तव्य में इस ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि न केवल किसान अपितु सरकार के लिए भी ये जरूरी है कि अनाज के निर्यात के लिए ठोस प्रयास किये जाएं जिससे किसान को उसकी मेहनत और सरकार को उसके निवेश का समुचित लाभ मिलने के साथ ही दलहन और तिलहन के आयात के कारण बनने वाले व्यापार असंतुलन की  स्थिति को सुधारा जा सके। श्री गडकरी ने किसानों को जैव ईंधन के उत्पादन सम्बन्धी जो सुझाव दिए वे खेती के लिए क्रांतिकारी हो सकते हैं। हाल ही में प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने प्रतिवर्ष गोदामों में उचित रखरखाव के अभाव में सड़ने वाले अनाज की जो कीमत बताई वह आँखें खोल देने वाली है। यदि उसे रोका न गया तब किसान की तरह सरकार की लिए भी अनाज की खरीदी बड़े घाटे का कारण बनती जायेगी। लेकिन निर्यात के क्षेत्र में हमारे कदम तभी आगे बढ़ सकते हैं जब उत्पादों की गुणवत्ता और पैकिंग वगैरह अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो। भारतीय उद्योग जगत इस कार्य में जिस तरह रूचि लेने लगा है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि आगामी कुछ वर्षों के भीतर भारत अनाज के सबसे बड़े उत्पादक के साथ ही निर्यातक भी बन सकेगा। कोरोना काल में चीन ने हमारे चावल को बड़ी मात्रा में खरीदा और ताजा समाचार के अनुसार बांग्ला देश से भी चावल का बड़ा ऑर्डर मिला है। वैश्विक मांग को देखते हुए भारत ने थाईलैंड और इंडोनेशिया जैसे बड़े चावल निर्यातक देशों की तुलना में प्रतिस्पर्धात्मक कीमतों का प्रस्ताव देकर निर्यात के क्षेत्र में जिस तरह कदम आगे बढ़ाये वह एक शुभ संकेत है। परम्परागत किसानी से अलग उच्च और पेशेवर शिक्षा प्राप्त युवाओं का एक वर्ग उन्नत कृषि के उद्देश्य से मैदान में उतरा है जिसे घरेलू और वैश्विक बाजार के माहौल के साथ मांग सम्बंधी सम-सामयिक जानकारी रहती है। भारतीय कृषि में वैल्यू एडिशन की जो जरूरत है उसे पूरा करने के अपेक्षा इस वर्ग से है। मौजूदा किसान आन्दोलन का क्या अंजाम होगा ये अलग विषय है लेकिन इस बहाने भारतीय कृषि में समयानुकूल सुधारवादी बदलाव की जरूरत को समझकर तद्नुसार फैसले लेने की जरूरत है। ये मानकर चलना भी गलत न होगा कि इस आन्दोलन के माध्यम से जो वैचारिक मंथन हो रहा है उसमें अमृत रूपी जो तत्व निकलेगा वह भारत के किसानों को स्वर्णिम भविष्य की ओर ले जा सकता है। समय आ गया है जब किसानों की आय को केवल दोगुना ही क्यों कई गुना बढ़ाने के प्रकल्प तैयार हों। लेकिन उसके लिए किसानों को भी ढर्रे से निकलकर कुछ खतरे उठाने होंगे। हरित क्रांति ने देश को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाया लेकिन अब अगली क्रान्ति किसान को आत्मनिर्भर बनाने के लिए होनी चाहिए जिसके लिए नितिन गडकरी जैसे व्यवहारिक राजनेता के विचारों पर अमल करना लाभदायक हो सकता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 24 December 2020

बेहतर होगा सरकार और किसान संगठन ही बीच का रास्ता निकाल लें



जैसी आशंका थी वैसा ही हो रहा है। दिल्ली घेरकर बैठे किसानों का आंदोलन ठहराव की स्थिति में आ गया है। केंद्र सरकार  और किसान नेताओं के बीच  आधा दर्जन औपचारिक और उससे भी ज्यादा अनौपचारिक वार्ताओं के बाद भी अभी तक यही तय नहीं हो सका कि बातचीत के मुद्दे क्या हों? सरकार की मानें तो पहले दौर में किसान संगठनों ने नए कृषि कानूनों में संशोधन पर सहमति  दी थी लेकिन बाद में वे उन्हें वापिस लेने की जिद पकड़कर बैठ गये, जबकि सरकार का रुख  शुरू से ही ये था कि जिन बिदुओं पर  ज्यादा  ऐतराज है उनमें संशोधन  किया जा सकता है। न्यूनतम समर्थन मूल्य के साथ ही सरकारी मंडियों को जारी रखे जाने का आश्वासन मंत्री से लेकर प्रधानमन्त्री तक दे चुके हैं लेकिन किसान संगठन उस पर विश्वास करने तैयार नहीं है। सरकार की तरफ से आये दिन नए- नए प्रस्ताव भेजकर वार्ता शुरू करने की पेशकश की जाती है लेकिन किसान नेता  ये कहते हुए इंकार कर देते हैं कि कानूनों को वापिस लिए बिना कोई बातचीत नहीं की जायेगी। इस रुख से तो  बातचीत की सम्भावना ही खत्म हो जाती है क्योंकि सरकार  कानूनों को वापिस लेने के  लिए राजी हुई  तब  वह फैसला उसकी पराजय से ज्यादा नई - नई समस्याओं को जन्म देने वाला बन सकता है और  इसी तरह के दबाव बनाकर सरकारी फैसले बदलवाने का अंतहीन सिलसिला शुरू हो जाएगा। ये बात पूरी तरह साफ़ हो चुकी है कि किसान संगठन चाहे कितने भी दावे करते रहें लेकिन अभी तक वे अपने आन्दोलन को पंजाब और हरियाणा के अलावा दिल्ली से सटे पश्चिमी उप्र और राजस्थान के कुछ हिस्सों से आगे नहीं बढ़ा सके। दिल्ली की आपूर्ति रोककर सरकार को घुटने  टेकने जैसी धमकियां भी कारगर नहीं पा रहीं क्योंकि एक तो उससे जनता का विरोध किसानों को झेलना पड़ेगा वहीं राष्ट्रीय राजधानी को दूध और सब्जी की दैनिक आपूर्ति  करने वाले पशुपालक और किसान नाराज हो जायेंगे जिन्हें इस आन्दोलन के चलते पहले ही काफी नुक्सान हो चुका है। गत दिवस महाराष्ट्र के अमरावती से खबर आई कि किसान आन्दोलन के कारण वहां का संतरा दिल्ली की मंडी तक नहीं  पहुँच पाने से संतरा उत्पादक किसानों को भारी घाटा उठाना पड़ रहा है। चूँकि दोनों ही पक्ष  अपनी-अपनी बात पर अड़े हुए हैं इसलिए अब देखने वाली बात ये होगी कि  कौन भारी पड़ेगा? जहां तक बात किसानों की है तो वे इसी तरह बिना किसी फैसले के बैठे रहे तब आन्दोलन की  आक्रामकता में क्रमश: कमी आती जायेगी और हो सकता है सरकार उसी का  इन्तजार कर रही हो। दूसरी तरफ किसान संगठनों के नेताओं ने सरकार के साथ वार्ता के लिए जो शर्त रख दी है वह पूरी तरह मान लेना सरकार के लिए भी  कठिन तो है ही। चूँकि आन्दोलन की दिशा न कहते हुए भी भाजपा और प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी विरोधी हो चुकी है  इसलिए  केंद्र सरकार  आसानी से मान जायेगी इसकी संभावना भी कम लग रही  है। जैसी कि जानकारी सत्ता पक्ष के सूत्रों से आ रही है उसके अनुसार प्रधानमन्त्री सहित भाजपा के रणनीतिकार इस आन्दोलन के राजनीतिक परिणाम का आकलन करने में जुटे हैं। प्रधानमंत्री को लगता है कि  अंतत: जिस तरह नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसलों का जबरदस्त विरोध होने के बाद भी चुनाव में भाजपा को जबरदस्त सफलता मिली वैसी ही सम्भावना इस मुद्दे पर उन्हें नजर आ रही है। इसकी वजह ये है कि इसके प्रति जन साधारण तो क्या आम किसान तक पूरी तरह से निर्विकार बना हुआ है। बीते 9 दिसम्बर को आयोजित भारत बंद का सीमित असर ही हुआ। इसके बाद ये अवधारणा भी राष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित होती गई कि आन्दोलन केवल संपन्न किसानों का है और पंजाब तथा हरियाणा के किसान चूंकि पूरी तरह सरकारी खरीद पर निर्भर हैं इसलिए उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी मंडियों के खत्म होने की आशंका सता रही है। देश में सबसे ज्यादा  किसानों वाले राज्य उप्र के पश्चिमी इलाके को छोड़कर बाकी हिस्सों में इस  आन्दोलन की चर्चा तो है लेकिन पक्ष - विपक्ष में किसी तरह का माहौल नजर नहीं आ रहा क्योंकि वहां सरकारी खरीद और समर्थन मूल्य से किसान ज्यादा लाभान्वित नहीं हो पाते। पश्चिमी उप्र भी मुख्यत: गन्ने के लिए जाना जाता है। ऐसे में ये आन्दोलन महज एक धरने की शक्ल में  कब तक जारी रखा जा सकेगा ये बड़ा सवाल है। किसान नेता लगातार कहते आ रहे हैं कि सरकार उन्हें थका देने की रणनीति पर चल रही है किन्तु इसके बाद  भी आन्दोलन में  नित नई ऊर्जा का संचार हो रहा  है और जिस तरह से संसाधन और समर्थन उन्हें मिल रहा है उसके आधार पर वे लड़ाई लंबी खींचने में सक्षम हैं। अब तक जो कुछ भी  हुआ उससे एक बात साफ़ है कि किसान  संगठनों  और सरकार के बीच  संवाद का कोई विश्वसनीय  माध्यम नहीं बन सका। आन्दोलन का नेतृत्व सतह पर भले ही गैर राजनीतिक दिखाई देता हो लेकिन धीरे - धीरे ही सही लेकिन ये बात साबित होती जा रहे है कि उसमें सरकार विरोधी मानसिकता वाले लोगों की भरमार होने से संवाद प्रक्रिया पटरी पर आ ही नहीं पा रही। अकाली दल के भाजपा से अलगाव के बाद तो खाई और चौड़ी हो गई। ऐसे में आंदोलन भले ही जारी हो लेकिन बीते लगभग एक महीने में बात एक इंच भी आगे नहीं बढ़ सकी। सच तो ये है कि बीच का रास्ता  निकाले बिना बात शायद ही बने।  और ये तभी सम्भव होगा जब दोनों पक्ष प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाये बिना समाधान का प्रयास करें। यदि किसान संगठनों और सरकार के बीच सुलह नहीं हो पाती तब सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप अवश्यम्भावी हो जाएगा जो कि अपनी इच्छा संकेतों में बता भी चुका है।

- रवीन्द्र वाजपेयी