Saturday, 30 January 2021

छोटे से धमाके के पीछे छिपे हो सकते हैं बड़े खतरे




भले ही  जान - माल का ज्यादा नुकसान न हुआ हो लेकिन दिल्ली में इजरायली दूतावास के समीप कल शाम हुआ बम धमाका न सिर्फ राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती है अपितु इससे हमारे देश की विदेश  नीति भी प्रभावित हो सकती है।  इस बारे में उल्लेखनीय ये है कि ख़ुफिय़ा एजेंसियों ने गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में किसी बड़ी वारदात की आशंका जताई  थी।  उसके चलते सुरक्षा प्रबंध काफी चाक --  चौबंद कर  दिए गये थे।  यूँ भी ऐसे अवसरों पर अव्वल दर्जे की सतर्कता रखी जाती है।  और फिर उस दिन किसान संगठनों की ट्रैक्टर परेड को लेकर भी पुलिस और प्रशासन हरकत में था।  बावजूद उसके लालकिले वाला हादसा हो गया।  किसानों को बेकाबू होने से भी नहीं  रोका जा सका।  उसे अपराधिक घटना मानकर प्रकरण भी  दर्ज कर  लिए गये।  जांच के बाद गिरफ्तारियों की भी  सम्भावना व्यक्त की जा रही है ।  लेकिन सुरक्षा एजेंसियां इस बात को लेकर संतुष्ट हो चली थीं  कि किसी आतंकवादी घटना से दिल्ली बची रही।  किसान  आन्दोलन के भी ठन्डे पड़ने के आसार नजर आने लगे लेकिन अचानक राकेश टिकैत के पैंतरे के बाद दिल्ली के विभिन्न बाहरी हिस्सों में किसान  आन्दोलन ने फिर जोर पकड़ लिया जिससे पुलिस और प्रशासन दोनों दबाव में थे।  उधर राजपथ पर गणतंत्र दिवस का समापन समारोह बीटिंग दि रिट्रीट चल रहा था जिसमें राष्ट्रपति , उपराष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री सहित तमाम अति विशिष्टजन मौजूद थे।  उसी समय लगभग दो किलोमीटर दूर इजरायली दूतावास के पास रोड डिवाइडर पर कम तीव्रता का  धमाका हुआ जिससे आस पास खड़े वाहनों के कांच चटक गये।  दूतावास वाले इलाके में हर समय कड़ी सुरक्षा रहती है इसलिये इस धमाके से चारों तरफ हड़कंप मच गया।  जाँच दल को  वहां  इजरायली दूतावास को संबोधित एक चिट्ठी भी मिली जिसमें इसे ट्रेलर बताया गया है । इससे ये आशंका बढ़ गई कि इसके बाद कोई बड़ा हादसा हो सकता है।  मामले की जांच की जा रही है जिसके चलते गृह मंत्री अमित शाह ने बंगाल  दौरा भी रद्द कर दिया।  प्राथमिक संकेत में उक्त घटना के पीछे ईरान और  अमेरिका के बीच चल रही तनातनी को कारण माना जा रहा है।  चूँकि इजरायल पश्चिम एशिया में अमेरिका का सबसे बड़ा समर्थक है इसलिए उसके दूतावास को निशाना बनाया गया।  इसके साथ ही  ईरान द्वारा भारत को  ये आगाह करना  भी हो सकता है कि वह उसकी कीमत पर यदि इजरायल और अमेरिका से नजदीकी बढ़ाएगा तो उसे नुकसान हो सकता है।  याद रहे भारत और ईरान के आपसी  रिश्ते बहुत मधुर रहे जिसका उदहारण सस्ता तेल आयात था लेकिन अमेरिका के दबाव में वह समझौता खटाई में पड़ने से ईरान ने चीन की तरफ झुकाव प्रदर्शित किया।  संयोगवश  कल ही भारत और इजरायल के कूटनीतिक रिश्तों की 29 वीं सालगिरह भी थी।  हालांकि सीधे - सीधे ईरान पर संदेह करना जल्दबाजी होगी क्योंकि आतंकवादी संगठन अक्सर जाँच को भटकाने के लिए भ्रम पैदा करते हैं।  लेकिन दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था पर इस घटना ने सवालिया निशान लगा दिए हैं।  खबर है कि इजरायल अपनी जांच टीम दिल्ली भेजने वाला है जो ऐसे मामलों में बहुत ही पेशेवर मानी जाती है।  उसके आने के बाद मामले के बारे में और अधिक विश्लेषण करना होगा।  इसके पीछे पाकिस्तान की भूमिका से भी इंकार नहीं किया जा सकता जो कश्मीर के रास्ते अभी भी आतंकवाद को पाल - पोस रहा है।  पश्चिम एशिया में इजरायल द्वारा हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात के साथ दोस्ताना समझौते से काफी हलचल है।  भारत भी लगातार इजरायल के करीब आता जा रहा है।  हो सकता है ये ईरान को बर्दाश्त न हो लेकिन वह अपने दूरगामी हितों के मद्देनजर भारत से सीधा पंगा नहीं लेगा।  ऐसे में इस धमाके की सूक्ष्म जाँच जरूरी है क्योंकि धमाका करने वालों ने ट्रेलर की बात कहकर चेतावनी भी दी है जो वैसे तो गले नहीं उतरती लेकिन इस्लामी जगत में आतंकवाद के इतने चेहरे हैं कि उनको  पहिचनाना कठिन हो गया है।  और फिर वे  भी माफिया गैंग की तरह आपसी समझौते करते हुए एक दूसरे की मदद किया करते हैं।  दिल्ली में चल रहे किसान  आन्दोलन के कारण यूँ भी लाखों की भीड़ है जिसकी वजह से पुलिस और प्रशासन दोनों अतिरिक्त दबाव में हैं।  ऐसे में इस तरह की वारदात भले ही देखने में छोटी हो लेकिन उसके पीछे छिपे बड़े खतरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 29 January 2021

सत्तापक्ष को स्वेच्छाचारी बनाने में विपक्ष का योगदान भी कम नहीं





किसान आन्दोलन के बीच आज से संसद का बजट अधिवेशन शुरू हो गया  । राष्ट्रपति ने संसद के दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन में अपना परम्परागत अभिभाषण दिया   जिसमें सरकार की उपलब्धियों का बखान  है । इस बारे में ये बड़ी ही रोचक बात है कि संवैधानिक मुखिया होने के नाते राष्ट्रपति महोदय को संसद के  दोनों सदनों को सम्बोधित करने का अवसर तो मिलता है किन्तु  वे अपना भाषण खुद तैयार नहीं करते ।  सरकार उन्हें जो लिखकर देती है उसे ही उन्हें पढ़ना  होता है । इसीलिये राष्ट्रपति का अभिभाषण सही मायनों में सरकार का प्रशस्तिगान होता है । शायद यही वजह है कि जिस राष्ट्रपति के पास विपक्ष गाहे - बगाहे सरकार की शिकायतें लेकर जा पहुँचता है उसी के अभिभाषण का  विरोध करते हुए उसके प्रति सरकार द्वारा पेश किये जाने वाले धन्यवाद प्रस्ताव का विरोध करने में जरा भी संकोच नहीं करता । और तो और अनेक अवसरों पर उसका बहिष्कार तक कर देता है । आज भी वैसा ही होने का ऐलान अनेक विपक्षी दलों द्वारा किया गया है । किसान आन्दोलन को लेकर वैसे भी विपक्ष के पास सरकार को घेरने का बड़ा अवसर है । गत वर्ष बजट सत्र के खत्म होते तक देश में कोरोना की आहट सुनाई देने लगी थी । आखिऱ - आखिर में तो आनन - फानन में काम निबटाकर सत्रावसान  कर दिया गया और उसके बाद हुए संसद के सत्र कोरोना के साये में होने से सदस्यों .  खास तौर पर विपक्ष को ज्यादा अवसर नहीं  मिल सका । उस दृष्टि से तकरीबन एक वर्ष बाद इस बजट सत्र  के बहाने विपक्ष को दोनों सदनों में  अपनी बात कहने का पर्याप्त अवसर मिलेगा । लेकिन राष्ट्रपति के अभिभाषण का बहिष्कार करने के फैसले से विपक्ष एक बार फिर नकारात्मक रुख दिखा रहा है । व्यवहारिक बात ये है कि जिस अभिभाषण को सुनना विपक्ष गैरजरूरी समझता है उस पर धन्यवाद प्रस्ताव का विरोध वह किस मुंह से करेगा ? लेकिन संसदीय प्रजातंत्र में ये सब बहुत ही सामान्य हो चला है । पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्व. अरुण जेटली ने तो कहा भी था कि सदन से बहिर्गमन अथवा मतदान में भाग नहीं लेना भी एक तरह का विरोध ही है । लेकिन दूसरे नजरिये से देखें तो संसद की गरिमा के प्रति जनप्रतिनिधियों के उदासीन रवैये के कारण ही देश की सर्वोच्च पंचायत के प्रति आम जनता के मन में सम्मान घटता जा रहा है । लेकिन इसके लिये केवल  वर्तमान विपक्ष  को दोषी  ठहराना न्यायोचित नहीं होगा क्योंकि भाजपा भी जब मुख्य  विपक्ष की  भूमिका में रही तब उसने भी पूरे के पूरे सत्र को हंगामे की भेंट चढाने  में संकोच नहीं किया । इस तरह ये बात पूरी तरह साबित हो चुकी है कि संसद की गम्भीरता के प्रति  लगभग  सभी राजनीतिक दल बेहद लापरवाह हैं जिसका दुष्परिणाम ये हुआ कि जिस मंच पर देश और जनता से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों  पर सार्थक बहस होनी चाहिए वे होहल्ले में दबकर रह जाते हैं । सत्तापक्ष तो सदैव यही चाहता रहा है कि वह अपने बहुमत के बल पर बिना बहस या कम से कम चर्चा के अपने प्रस्ताव पारित करवाता जाए । लेकिन उसकी इस नीति को सफल बनाने में विपक्ष का योगदान भी कम  नहीं है क्योंकि वह अधिकतर समय तो हंगामा ही करता रहता है जिस वजह से सभापति बैठक को स्थगित कर देते हैं । ऐसा होते - होते सत्र खत्म होने आ जाता है और तब सरकार फटाफट सारे विधेयक और अन्य फैसले करवा लेती है जिसके बाद   विपक्ष  छाती पीटता रह जाता है । आजादी के बाद लम्बे समय तक संसद के दोनों सदनों में कांग्रेस के पास विशाल बहुमत होता था । लेकिन कम संख्या  के बावजूद विपक्ष के नेता अपने तर्कपूर्ण  भाषणों से बहस शब्द को सार्थकता प्रदान किया करते थे । उस दौर में टीवी पर सीधे प्रसारण की व्यवस्था नहीं होने के बाद भी विपक्षी सांसद उन्हें दिए गये समय का समुचित उपयोग करते हुए अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करते थे । संसद के पुस्तकालय में उस दौर की कार्यवाही में विपक्षी सांसदों के अनेक ऐतिहासिक भाषण पढ़े जा सकते हैं जिन्होंने पंडित नेहरु और इन्दिरा जी जैसे ताकतवर प्रधानमंत्रियों तक को झकझोर कर रख दिया था । अनेक ऐसे विपक्षी नेता थे जो संसद में अपने प्रभावशाली भाषणों के कारण ही बार - बार चुनाव जीतकर आते रहे । आज का विपक्ष उस दृष्टि से खुद को साबित करने में विफल रहा है । सत्ता पक्ष के लिए कमजोर या उदासीन विपक्ष भले ही सुविधाजनक हो लेकिन संसदीय प्रजातंत्र और जनता के हितों की रक्षा के लिए ये जरूरी है कि विरोध में बैठे सांसद सदन जैसे राष्ट्रीय मंच का भरपूर उपयोग करते हुए सत्ता पक्ष को स्वेच्छाचारी बनने का मौका न दें । कोरोना काल की वजह से बीता एक साल संसदीय गतिविधियों के लिहाज से काफी खराब रहा । लेकिन अब जबकि उसका प्रकोप कम हो गया है तब विपक्ष को चाहिए वह संसद के एक - एक क्षण  का उपयोग जनहित के लिए करे । उसे ये नहीं भूलना चाहिए कि संसद की एक मिनिट  की कार्यवाही पर जनता के लाखों रूपये खर्च होते हैं । यदि इस सत्र  में विपक्ष का दायित्वबोध जाग सके तो ये उसके साथ - साथ देश के लिए भी अच्छा  होगा । 
                                                                   - रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 28 January 2021

आन्दोलन का पहले जैसा दबाव और प्रभाव शायद ही रहे




 गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में जो दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम हुआ उसकी पूरे देश में रोषपूर्ण प्रातिक्रिया हुई | यहाँ तक कि किसान आन्दोलन में शामिल अनेक लोगों ने भी ये माना कि दो महीने तक आन्दोलन को अहिंसक बनाये रखने की कोशिशें एक दिन में व्यर्थ चली गईं | विपक्ष भले ही सरकार पर इसका दोष मढ़ रहा हो तथा लालकिले पर हुई घटना के सूत्रधार का सम्बन्ध भाजपा से जोड़कर  साबित करना चाह रहा हो कि वहां जो कुछ भी हुआ वह सब सरकार द्वारा प्रायोजित था , लेकिन जिस तरह की जानकारी आती जा रही है उसके बाद एक बात  पूरी तरह साफ़ है कि आन्दोलन के नेता मिट्टी के माधव साबित हुए | उन्होंने भीड़ तो जबरदस्त बटोर ली किन्तु उसे नियन्त्रित करने की योग्यता और क्षमता उनमें नहीं होने से ट्रैक्टर   परेड शुरू होने के पहले ही अनियंत्रित हो चुकी थी | किसान संगठनों द्वारा सरकार पर दबाव बनाने के लिए बिना सोचे - समझे ही ट्रैक्टरों को दिल्ली आने की दावत तो दे डाली लेकिन ऐसा करते समय ये देखने की जहमत नहीं उठाई गयी कि ट्रैक्टर का मालिक  और उसकी पृष्ठभूमि क्या है ? यदि ट्रैक्टरों की संख्या कुछ हजार होती तब शायद आयोजक और प्रशासन दोनों के लिए उसे नियंत्रित करना आसान होता |  लेकिन अपनी ताकत दिखाने के फेर में बिना सोचे - समझे जो भीड़ जमा की गई उसने पूरे आन्दोलन को कलंकित कर दिया और वे आरोप और आशंकाएं सही  साबित हो गईं कि किसानों की आड़ में देश विरोधी तत्व किसी बड़ी घटना को अंजाम देने वाले हैं | लालकिले पर जिस तरह से धार्मिक ध्वज फहराया गया उससे उसी धर्म के अनुयायी किसान और उनके नेता भी अपराधबोध से दबे हुए  ये कहते सुने गये कि उस एक कृत्य ने पूरे आन्दोलन को शर्मसार कर दिया | यही वजह रही कि गत दिवस दो संगठनों ने आन्दोलन से किनारा करते हुए अपने शिविर खत्म कर दिए जिससे कुछ मार्ग खुल भी गये | इसी के साथ ये खबर भी आ गई कि कुछ गांवों के लोगों ने आन्दोलनकारियों को उनके इलाके की सड़क से तम्बू हटाने के लिए कह दिया है | कुछ किसान आन्दोलन के हिंसक होने के बाद खुद भी घर लौटने की सोचने लगे हैं | गणतंत्र दिवस के दिन दिल्ली में जो कुछ भी हुआ उसके दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करने की बात दिल्ली पुलिस द्वारा कही गयी है और जैसा सुना जा रहा है उसके अनुसार गृह मंत्रालय ने भी इस बारे में उसे खुला हाथ दे दिया है | गत दिवस 200 गिरफ्तारियों के अलावा आधा दर्जन किसान नेताओं के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज किये जाने से उक्त खबर की पुष्टि भी हो गयी | देर रात मिले समाचार के अनुसार किसान नेताओं को मिली विदेशी आर्थिक मदद की भी जांच की जायेगी | इसके बाद भी  आन्दोलन को जारी रखने की घोषणा किसान नेताओं द्वारा की गयी लेकिन ये बात पूरी तरह सही है कि अपरिपक्व नेतृत्व और अधकचरी रणनीति के कारण उसमें पहले जैसी चमक नहीं रहेगी | केंद्र सरकार द्वारा  किसान संगठनों के साथ वार्ता जारी रखे जाने की इच्छा व्यक्त किये जाने के बावजूद अब किसान संगठनों के नेता किस मुंह से बातचीत करेंगे ये भी बड़ा सवाल है | अब तक आन्दोलन को गुरुद्वारों से जो सहयोग मिलता रहा वह आगे भी इसी तरह जारी रह सकेगा इसमें संदेह है | सिख समुदाय में भी अनेक लोग मुखर होकर आन्दोलन में निशान साहेब और निहंगों के उपयोग पर विरोध  जता रहे हैं |  ऐसे में आन्दोलन जारी रहने पर भी उसका दबाव और प्रभाव पूर्ववत शायद ही रह पायेगा | इसकी सबसे बड़ी वजह उसका नैतिक स्वरूप खो बैठना है | इसमें दो मत नहीं है कि बीते दो माह से कड़ाके की सर्दी में बैठे किसानों के प्रति काफी लोगों की जो सहानुभूति थी उसमें  गणतंत्र दिवस पर हुई गुंडागर्दी के बाद जबरदस्त कमी आई | टीवी के जरिये जो दृश्य देश भर ने देखे उनसे इस आन्दोलन में देश विरोधी ताकतों की भागीदारी अपने आप प्रमाणित हो गई |

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 27 January 2021

गणतंत्र दिवस पर गुंडातंत्र का निर्लज्ज प्रदर्शन



स्वयंभू किसान नेता योगेन्द्र यादव के अनुसार  26 जनवरी को ही दिल्ली में किसानों की ट्रैक्टर परेड निकालने का मकसद ये दर्शाना था कि अब तक तंत्र ही  गण पर हावी रहा लेकिन अब गण के  तंत्र पर हावी होने का समय आ गया है | उनकी ये  बात भी  अच्छी लगी कि किसान भी यदि गणतंत्र दिवस मनाना चाहें तो इसमें गलत क्या है ?  दिल्ली पुलिस  ने किसान संगठनों को समझाया कि गणतंत्र दिवस पर राजधानी में अतिरिक्त सुरक्षा प्रबंध की वजह से पुलिस बल काफी व्यस्त रहता है अतः ट्रैक्टर परेड किसी और दिन निकाली जाए |  ये भी बताया गया कि ख़ुफ़िया रिपोर्टों के अनुसार देश विरोधी ताकतें गणतंत्र दिवस के दिन गड़बड़ी करने की फिराक में हैं | लेकिन वे जिद पर अड़े रहे और उसके बाद पुलिस ने कई दौर की बातचीत के बाद कुछ शर्तें तय  करते हुए अनुमति दे दी | उसके अनुसार ट्रैक्टर परेड दिल्ली के बाहर निकाली  जानी थी | मात्र 5 हजार ट्रैक्टरों की अनुमति दी गई जिसमें अधिकतम तीन लोग बैठ सकते थे तथा ट्रैक्टर के पीछे  ट्राली की अनुमति भी नहीं थी | हथियार रखने पर भी पूरी तरह मनाही थी | परेड का समय दोपहर 12  से शाम 5 बजे तक था जिससे कि राजपथ पर होने वाली गणतंत्र दिवस की परम्परागत परेड के आयोजन में व्यवधान न आये | किसान  नेताओं ने पूरी तरह शांतिपूर्ण आयोजन के साथ ही गणतंत्र दिवस की गरिमा बनाए रखने की प्रतिबद्धता भी दर्शाई थी लेकिन राजपथ की परेड खत्म होने के पहले  ही किसानों ने दिल्ली में घुसना  शुरू कर दिया | पुलिस द्वारा लगाये  बैरिकेड्स तोड़ डाले गये और उसकी बसों को ट्रैक्टरों से धकेलकर क्षतिग्रस्त किया गया | चूंकि  पुलिस बल राजपथ के अलावा अन्य  जगहों पर तैनात था इसलिए किसानों को उत्पात मचाने का अवसर मिल गया और देखते ही  देखते दो महीने से दिल्ली की सीमा पर चल रहा किसानों का शांतिपूर्ण आन्दोलन अराजकता में बदल गया | पूरे देश और दुनिया ने ये देखा कि ट्रैक्टर परेड के नाम पर किस तरह से आतंक का माहौल बनाया गया | दोपहर 12 बजे के पहले ही आन्दोलन अराजक हो उठा था और जो तथाकथित किसान नेता एक दिन पहले तक शांति और व्यवस्था की गारंटी देते फिर रहे थे वे इस बात का रोना रोते दिखाई देने लगे कि हिंसा करने वाले  बाहरी तत्व हैं | भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने तो राजनीतिक दलों पर उपद्रव की जिम्मेदारी डालकर बचने की कोशिश की | हालाँकि वे किसी भी दल का नाम बताने से कतरा गये | योगेन्द्र यादव भी बड़ी ही मासूमियत से हिंसा की निंदा करते हुए लुप्त हो गए | बाकी नेताओं ने वीडियो के जरिये शान्ति की अपीलें तो जारी कीं किन्तु उनमें से किसी ने भी उपद्रवियों को रोकने की हिम्मत नहीं दिखाई जिससे ये संदेह पुख्ता हो गया कि जो कुछ भी  हो रहा था उसमें उनकी मौन सहमति थी | लेकिन बाद में  समूचा माहौल लालकिले पर जाकर केन्द्रित हो गया जहाँ कुछ लोगों ने उसकी प्राचीर पर चढ़कर उस ध्वज दंड पर खालसा पंथ और   किसान यूनियन का झंडा फहरा दिया जिस पर 15 अगस्त को प्रधानमंत्री राष्ट्रध्वज फहराकर देश को संबोधित करते हैं | इसके अलावा वामपंथी पार्टी का हंसिया - हथौड़ा चिन्ह्युक्त लालझंडा भी लहराया गया |  प्राचीर के बगल वाली गुम्बद पर भी ऐसा ही  किया गया | इसके बाद एक निहंग ने तलवार से करतब दिखाने शुरू कर दिए | लालकिले की सुरक्षा में तैनात जवानों पर  तलवारों से हमला करने की कोशिश भी की गई | इस घटना ने किसान आन्दोलन के प्रति थोड़ी सी भी सहानुभूति रखने वाले को क्रोधित कर दिया | राष्ट्रध्वज और राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक स्थल का अपमान और वह भी गणतंत्र दिवस के दिन हर सच्चे भारतीय को नागवार गुजरा  | पूरे दिन राष्ट्रीय राजधानी में गुंडातंत्र का नगा नाच होता रहा लेकिन किसान नेता उसकी निंदा करने की बजाय बलि के बकरे खोजने में लग गये | दिल्ली  पुलिस को भी इस बात के लिए दोषी ठहराया जाने लगा कि गड़बड़ी होने संबंधी खुफिया रिपोर्टों के बाद भी उसने जरूरी कदम क्यों नहीं उठाये ? सतही तौर पर ये आरोप सच भी लगता है | बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जिन्होंने लाल किले पर हुए उत्पात को  रोकने में पुलिस की  विफलता पर सोशल मीडिया के जरिये अपने गुस्से का इजहार किया |  लेकिन इस बारे में दिल्ली पुलिस के आला अफसरों की तारीफ़ करनी होगी जिन्होंने गणतंत्र दिवस को खूनी होने से बचा लिया | ये कहना गलत नहीं है कि उपद्रवकारियों के साथ ही कुछ किसान नेताओं ने पुलिस को उकसाने का भरसक प्रयास किया | सामान्यतः ऐसे हालातों में पुलिस की तरफ से गोली चला दी जाती  है | कुछ  ट्रैक्टर  चालक तो पुलिस वालों को कुचलने का प्रयास करते हुए टीवी कैमरों में कैद भी हो गए | किसानों के हाथ में डंडे और तलवारें होना अन्दोलन के हिंसक तत्वों के हाथ में चले जाने का प्रमाण है | इसी तरह लाल किले में शस्त्र लेकर दरवाजा तोड़ते हुए घुसने वालों को भी वहां तैनात पुलिस बल गोली मार सकता था किन्तु उसने संयम बनाये रखा वरना कल दिल्ली में बड़ी संख्या में लाशें बिछ सकती थीं और ऐसा होने पर पूरे देश के किसानों को भड़काने का सुनियोजित षड्यंत्र सफल हो जाता | दिल्ली पुलिस उपद्रव करने वालों की पहिचान कर उन पर मामले कायम करने में जुट गई है | दूसरी तरफ किसान संगठन अपने धरने को यथावत जारी रखने की बात कह रहे हैं | बकौल योगेन्द्र यादव 1 फरवरी को किसान संसद भवन तक मार्च करते हुए उसका घेराव करेंगे | लेकिन गत दिवस जो नजारा दिखाई दिया उसके बाद इस तरह  के किसी भी आयोजन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए | किसान अन्दोलन के नाम पर चल रहे धरने के दो माह बाद भी गतिरोध जस का  तस है |  आगे बातचीत की गुंजाईश भी नहीं दिख रही | ऐसे में जरूरी है अब सरकार को भी सख्ती दिखानी चाहिए | किसान संगठनों और उनके  नेताओं की प्रामाणिकता का परीक्षण करने के बाद जो विघटनकारी तत्व हैं उनके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई देश के ज्यादातर लोग चाहते हैं | किसानों से सभी की सहानुभूति पहले भी थी और आगे भी रहेगी लेकिन उनकी आड़ में देशविरोधी गतिविधियों को प्रश्रय देने वालों को कड़े से कड़ा दंड दिया जाना चाहिए | जिन किसान नेताओं से अब तक बातचीत की जाती रही उनकी विश्वसनीयता तो मिट्टी में मिल गई |  ये भी  साबित हो गया कि वे आग भड़का तो सकते हैं लेकिन उसे बुझाने की उनमें न अक्ल है और न ही मंशा | ऐसे नेताओं से किसी भी तरह का सम्वाद अब निरर्थक है | किसानों को भी चाहिए वे ऐसे नेताओं के बहकावे में आने से बचें जिन्होंने उन्हें ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया जहां से लौटना और आगे बढ़ना दोनों मुश्किल  हैं | ये कहना भी काफी हद तक सही है कि किसान आन्दोलन में अब देश विरोधी तत्व  पूरी तरह से घुस आये  हैं | इसलिए उसके तौर - तरीके बदले जाने चाहिए | अन्यथा जिस तरह गत दिवस यह आन्दोलन कलंकित हुआ उससे भी ज्यादा खराब स्थिति आगे भी बन सकती है |

- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 25 January 2021

जय जवान - जय किसान और जय विज्ञान के साथ जय संविधान का भी उद्घोष हो



देश के दूसरे प्रधानमन्त्री स्व.लालबहादुर शास्त्री ने नारा दिया था जय जवान - जय किसान | वर्तमान प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने उसे विस्तार देते हुए जय जवान - जय किसान - जय विज्ञान कर  दिया | कहने को ये दोनों नारे हैं लेकिन उनके साथ जुड़ी भावनाओं का राष्ट्रीय जीवन में बहुत महत्व है | बीते एक वर्ष में हमारे देश ने जवान , किसान और विज्ञान तीनों की शानदार भूमिका देखी | गत वर्ष गणतंत्र दिवस के समय कोरोना नामक संकट की पदचाप सुनाई देने लगी थी | दो महीने के भीतर ही वह हमारे घर में घुस आया जिससे  एक अभूतपूर्व स्थिति उत्पन्न हुई और पूरा देश ठहर गया | 135  करोड़ से भी ज्यादा की आबादी वाले देश में लॉक डाउन करने का निर्णय बहुत ही जोखिम भरा था | जरा सी चूक अराजकता और अव्यवस्था का कारण बन सकती थी लेकिन भारत के लोगों ने पूरी दुनिया को  दिखा  दिया कि संकट के समय वे  किस तरह एकजुट होकर खड़े होते हैं  | दो महीने से भी ज्यादा पूरा देश  ठहरा रहा  | सब कुछ बंद होने से लोग घरों में रहने मजबूर हो गए | रेल , बस , हवाई जहाज जैसी  सेवाएँ ठप्प होने से जो जहाँ था उसे वहीं रुकना पड़ा | निश्चित रूप से वे अकल्पनीय हालात थे किन्तु  जनता ने जिस अनुशासन का परिचय दिया वह परिपक्वता के साथ ही  दायित्वबोध का अप्रतिम उदहारण बन गया | इसी बीच सीमाओं पर हलचल हुई और चीन द्वारा लद्दाख क्षेत्र में घुसपैठ  किये जाने से युद्ध की नौबत आ गई | गलवान घाटी में हुए खूनी संघर्ष के बाद तनाव चरम पर आ गया | कोरोना से जूझ रहे देश  के सामने सीमा पर आये संकट ने चिंता बढ़ा दी | लेकिन हमारी सेनाओं के हौसले ने चीन को ये एहसास करवा दिया कि 1962 और 2020 के भारत में बहुत अंतर है और अब उसे ईंट का जवाब पत्थर से दिया जाएगा | संभवतः  उसको लग  रहा था कि लॉक डाउन से लड़खड़ाई अर्थव्यवस्था की वजह से भारत सीमा पर सेना की तैनाती का खर्च शायद ही वहन कर  सकेगा जिससे  वह अपने मंसूबे पूरे करने में कामयाब हो जाएगा | लेकिन उसकी उम्मीदों पर पानी फिर गया | हमारे नेतृत्व ने सेना को खुली छूट के साथ ही  भरपूर संसाधन भी दिए जिसके कारण चीन ही नहीं वरन  पूरी दुनिया को ये सन्देश  गया कि भारत का महाशक्ति बनना कपोल कल्पना नहीं अपितु वास्तविकता है | कोरोना के कारण बनी परिस्थितियाँ बेहद चिंताजनक थीं | दुनिया के विकसित देशों में  जिस बड़े पैमाने पर मौत का मंजर  दिखाई दिया उससे हमारे यहाँ भी भय का माहौल था  | विशाल  आबादी , घनी बसाहट और चिकित्सा सुविधाओं की खस्ता हालत के चलते महामारी की आशंका गलत न थी | लेकिन सरकार और जनता के बेहतरीन  समन्वय ने  उसे  निर्मूल साबित कर दिया | लॉक डाउन के चलते जब समूचा उद्योग - व्यापार बंद था तब भी हमारे किसानों ने अपने खेतों में पसीना बहाना जारी रखा जिसका सुपरिणाम रबी फसल में  रिकॉर्ड पैदावार के तौर पर दिखाई दिया | इसी कारण केंद्र  सरकार लॉक डाउन के दौरान 80 करोड़ लोगों को मुफ्त खाद्यान्न बाँटने जैसा दूरदर्शी फैसला लेने की हिम्मत जुटा सकी | सीमा पर जवान और खेतों में किसान अपनी शानदार भूमिका से देश का मनोबल बढ़ाने में कामयाब हुए तो  इस महामारी से लड़ने वाला टीका ( वैक्सीन ) बनाने के लिए हमारे वैज्ञानिकों ने दिन रात एक कर दिया | दुनिया के अनेक देशों में विकसित कोरोना के टीके का भारत  में उत्पादन करने के साथ ही हमारे वैज्ञानिकों ने  विशुद्ध भारतीय टीका भी रिकॉर्ड समय में विकसित करते हुए पूरी दुनिया को चमत्कृत कर दिया | आज एक तरफ जहाँ  देश में दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान   शुरू हो चुका है  वहीं पड़ोसी बांग्ला देश से लेकर सुदूर लैटिन अमेरिकी  देश ब्राजील तक को  भारत में बनी कोरोना वैक्सीन की आपूर्ति  हमारी वैज्ञानिक क्षमता का गौरव गान कर रही है | दरअसल  बीते एक वर्ष में  जय जवान - जय किसान जय - विज्ञान के नारे को यथार्थ में बदलकर ये दिखा दिया गया  कि आज का भारत किसी भी मुसीबत से लड़कर उस पर विजय हासिल करने की क्षमता अर्जित कर चुका है | लेकिन ये  तभी संभव हो सका जब देशवासियों ने जबरदस्त अनुशासन और धैर्य के साथ बेहतर समन्वय का उदाहरण पेश किया , जिसके अभाव में हम शायद ही कुछ कर  पाते | गणतंत्र दिवस का पर्व वस्तुतः  एक अवसर है जब हम इस बात का मंथन करें कि संकट न रहने पर भी  देश को सुव्यवस्थित किस तरह बनाकर रखा जा सके क्योंकि गणतंत्र का निहितार्थ ही व्यवस्था है | ये कहना न अनुचित होगा और न ही अप्रासंगिक कि देश  के भीतर कुछ ताकतें हैं जो अराजक हालात बनाने के लिए भरसक कोशिशें कर रही हैं | लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में विश्वास न होने से हिंसा और अव्यवस्था फैलाकर समूचे ढांचे को तहस - नहस करना इनकी कार्यप्रणाली का हिस्सा है | जनता के मन में  व्यवस्था के प्रति असंतोष भड़काकर सामाजिक ताने - बाने को छिन्न - भिन्न करने का प्रयास करने वालों को पहिचानकर उन्हें बेनकाब करना गणतंत्र की सुरक्षा के लिए नितान्त आवशयक है | बीते एक साल की काली रात जैसी परिस्थितियों से तो देश सफलतापूर्वक निकल आया लेकिन जिन विघ्नसंतोषियों को ये कामयाबी चुभ रही है वे सही मायनों में जवानों , किसानों और वैज्ञानिकों की मेहनत पर पानी फेरने पर आमादा हैं | उनकी कुत्सित मानसिकता पर कड़ा प्रहार किये बिना गणतंत्र की सलामती नामुमकिन है | इसलिए अब जय जवान - जय किसान - जय विज्ञान के साथ - साथ जय संविधान का नारा भी लगाया जाना जरूरी है | ध्यान देने वाली बात ये है कि 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस पर होने वाले आयोजन केवल रस्म अदायगी नहीं बल्कि सार्थक  चिंतन का अवसर है जो किसी भी देश को एकजुट रखने के लिए निहायत जरूरी है |

गणतंत्र दिवस पर हार्दिक शुभकामनाओं सहित ,

रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 22 January 2021

विदेशी निवेश की आवक बनाये रखने में बजट की भूमिका महत्वपूर्ण होगी



 हॉलांकि शेयर बाजार की तेजी - मंदी  से समाज का बहुत छोटा तबका जुड़ा होता है लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से ही सही लेकिन वह  पूरे  देश को प्रभावित करती  है | कोरोना काल में औंधे मुंह गिरी अर्थव्यवस्था ने चिंता की लकीरें खींच दी थी | सकल घरेलू उत्पादन में ऐतिहासिक कमी के  कारण विकास दर ने गिरावट का रुख किया और वह सर्दियों में पहाड़ों के तापमान की तरह से ही शून्य से भी  नीचे चली गई | एक विकासशील देश के लिए ये बहुत बड़ा धक्का था | महामारी का भय और उसके साथ ही कारोबारी जगत में सन्नाटे से सर्वत्र चिंता के बादल मंडराते नजर आने लगे | कहाँ तो भारत दुनिया के अग्रणी देशों की बराबरी से बैठने की स्थिति में आने लगा था लेकिन  अचानक उत्पन्न हुई अकल्पनीय परिस्थितियों ने निराशा की गहरी खाई में गिरने के हालात बना दिए | लॉक डाउन का वह दौर अब एक दुस्वप्न जैसा प्रतीत होता है | लेकिन ज्योंही अर्थव्यवस्था को दोबारा सक्रिय किया गया त्योंही अन्धेरा छंटने के आसार नजर आने लगे | अब जबकि वित्तीय वर्ष का अन्तिम समय चल रहा है और दस दिन बाद ही देश के सामने  आगामी कारोबारी साल का  बजट पेश होगा तब शेयर बाजार का 50 हजार का आंकड़ा छू लेना और उसी के साथ ही रिजर्व बैंक द्वारा सकल घरेलू उत्पादन के दोबारा सकारात्मक होने का संकेत मिलना निश्चित रूप से शुभ संकेत है | यद्यपि अभी  भी बाजारों में अपेक्षानुसार रौनक नहीं  लौटी लेकिन कारोबारी जगत में व्याप्त निराशा में जरूर  कमी आने लगी है | आवागमन पर लगे प्रतिबंधों में नरमी से पर्यटन उद्योग में जैसा उत्साह लौटा वह इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि लोगों में कोरोना को लेकर व्याप्त डर  कम हुआ है जो कि संक्रमण में निरंतर कमी आने से स्वाभाविक भी है | अर्थव्यवस्था की सेहत में सुधार का एक कारण कोरोना का टीकाकारण प्रारंभ होना भी है | इसकी वजह से न सिर्फ घरेलू अपितु वैश्विक स्तर पर भारत में व्यापार - उद्योग के लिए अनुकूल परिस्थितियां दोबारा उत्पन्न होने का सन्देश गया | लेकिन जैसा सुनने में आ रहा है उसके अनुसार आम  बजट पेश करते समय केंद्र सरकार के सामने तमाम ऐसी समस्याएँ हैं जिनका हल खोजने में उसे पसीना सकता है | मसलन बीते साल की  नकारात्मक विकास दर से हुए  राजस्व घाटे की भरपाई के साथ बाजार में मांग किस तरह बढ़ाई जाए ये वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के सामने बड़ी चुनौती है | कोरोना काल  में चीन से होने वाले आयात में बड़े पैमाने पर कटौती किये जाने से भारतीय उद्योगों को जरूरी सामान और कच्चे माल की  किल्लत झेलनी पड़ रही है जिसकी वजह से अनेक उत्पादों के दाम बढ़ गये हैं | देश में खाद्यान्न उत्पादन भी  जरूरत से ज्यादा होने की वजह से उसके लिए भी निर्यात  के दरवाजे खोलना जरूरी हो गया है | हॉलांकि चीन से उठकर अनेक कम्पनियाँ भारत में कारोबार ज़माने की तैयारी कर रही हैं लेकिन अभी उसके सुपरिणाम आने में समय लगेगा | घरेलू उद्योगों में लॉक डाउन के  बाद रोजगार में आई कमी दूर होने में भी कुछ वक्त और लग सकता है | सरकारी बैंकों के सामने तो जबरदस्त वित्तीय संकट है | कर्जों की बकाया राशि वसूल करना बड़ी समस्या बन गई है | केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक उन्हें पूंजी उपलब्ध करवाने की कोशिश कर तो रहे हैं लेकिन उनके पास भी संसाधनों का टोटा है | ऐसे में शेयर बाजार में आ रहा विदेशी  निवेश अर्थव्यवस्था को मूर्छावस्था से निकालने वाली संजीवनी साबित हो रहा है | इससे ये सन्देश भी जा रहा है कि दुनिया भर के निवेशकों का  भारतीय उद्योगों के साथ यहाँ की आर्थिक नीतियों पर भरोसा बढ़ा  है | लेकिन इससे जुड़ा सवाल ये भी है कि  केंद्र सरकार संकट के दौर से अर्थतंत्र को निकालने में कितनी उदारता दिखायेगी ? जैसी खबरें हैं उनके अनुसार आयात शुल्क में 5 से 10 फीसदी तक वृद्धि की जा सकती है जिससे आयात महंगा होगा और उत्पादन की लागत बढ़ने  से महंगाई बढ़ेगी | ये देखते हुए सरकार को बहुत ही सोच - समझकर कदम आगे बढ़ाने होंगे | शेयर बाजार से आ रही खबरें निश्चित रूप से उत्साहवर्धक हैं लेकिन ये भी सही है कि इस निवेश को स्थायी मान लेना मूर्खता होगी | विदेशी निवेशकों को भारत की प्रगति से कुछ भी लेना देना नहीं है | वे तभी तक अपनी पूंजी यहाँ रखेंगे जब तक उनको मुनाफे का आश्वासन मिलता रहे | ऐसे में केंद्र सरकार को चाहिए कि वह ऐसा बजट लेकर आये जिससे परदेसी निवेशकों का भरोसा न केवल बना रहे अपितु उसमें और वृद्धि हो |  

-रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 21 January 2021

सरकार ने तो पांसा चल दिया अब किसान संगठनों के जवाब का इन्तजार



किसान आन्दोलन से उत्पन्न गतिरोध को समाप्त करने के उद्देश्य से वार्ताओं का जो सिलसिला बीते एक महीने से भी ज्यादा से चला आ रहा है उसकी 11 वीं कड़ी में गत दिवस भी कोई समाधान नहीं निकला | किसानों ने पहले की  तरह सरकारी भोजन से परहेज किया और अपनी बात पर अड़े रहे | गणतंत्र दिवस  पर ट्रैक्टर रैली निकालने के निर्णय को भी राकेश टिकैत ने ये कहते हुए दोहराया कि वह भी दरअसल परेड ही होगी | यद्यपि राजपथ से अलग दिल्ली के बाहरी इलाके में उसका आयोजन किये जाने की बात कही गई है | सर्वोच्च न्यायालय ने रैली की अनुमति  संबंधी निर्णय दिल्ली पुलिस पर छोड़कर अपना पल्ला झाड़ लिया किन्तु कृषि कानूनों पर संवाद हेतु बनाई समिति का विरोध करने वालों को फटकारा भी | दूसरी ओर किसान संगठनों के साथ हुई बैठक के अंत में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने  नया पांसा फेंकते हुए प्रस्ताव रखा कि केंद्र सरकार सम्बन्धित कानूनों को एक से डेढ़ वर्ष तक स्थगित रखने के साथ  न्यूनतम समर्थन मूल्य ( एमएसपी ) पर विचार हेतु समिति बनाने तैयार है | दोनों पक्ष  इस अवधि में कानूनों से जुड़े सभी मुद्दों पर विचार - विमर्श कर किसी निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं | अचानक आये इस प्रस्ताव से किसान नेता हतप्रभ रह गये | अब तक तो सरकार के  हर सुझाव को रद्दी की टोकरी में फेंका जाता रहा किन्तु उक्त प्रस्ताव पर विचार कर 22 जनवरी तक अपना निर्णय बताने की बात कही गई | जो जानकारी है उसके अनुसार आज किसान  संगठन इस बारे में  अपना रुख स्पष्ट करेंगे | यद्यपि राकेश टिकैत ने आंदोलन जारी रखने के अलावा 26 जनवरी  को ट्रैक्टर रैली निकालने की घोषणा भी कर दी | किसान संगठन  क्या  फैसला लेंगे ये आज उनकी बैठक में तय हो  जाएगा किन्तु सरकार ने अचानक जो रुख  दिखाया उसके पीछे कुछ न  कुछ  बात तो है | कुछ दिन पूर्व पंजाब के एक किसान नेता द्वारा दिल्ली  में अनेक विपक्षी दलों के नेताओं से की गयी  मुलाकात के बाद उन पर आन्दोलन का राजनीतिकरण किये जाने का आरोप लगाया गया  | इस पर उन्होंने आरोप लगाने वालों को रास्वसंघ से जुड़ा बताकर ये संकेत दिया कि आंदोलनरत संगठनों के बीच भी कहीं  न कहीं अविश्वास का भाव है | उस आधार पर ये सोचना गलत न होगा कि कृषि मंत्री द्वारा अचानक दिए गए प्रस्ताव के पीछे भी किसान आन्दोलन से जुड़े कुछ संगठनों की सहमति हो सकती हैं | सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित समिति ने अपना काम  शुरू कर दिया है और कानूनों का समर्थन  करने वाले भी अब खुलकर बोलने लगे हैं | ऐसे में  आन्दोलन को जिद की शक्ल देकर खींचते रहने से उसकी धार कुंद पड़ने का खतरा है | कुछ राज्यों से ऐसी खबरें भी आई हैं जिनसे ये एहसास हो रहा है कि नए कानून किसानों के लिए लाभप्रद हैं | चूँकि न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ बहुत ही कम किसानों  को मिलता है इसलिए पंजाब और हरियाणा के बाहर के किसान इस मुद्दे को ज्यादा महत्व नहीं दे रहे | ऐसे में अब आंदोलनकारी किसान संगठनों को चाहिए वे कृषि मंत्री के प्रस्ताव को थोड़ा घटा - बढ़ाकर स्वीकार कर लें | यद्यपि उनके सामने ये दुविधा है कि सरकार तो पहली बैठक से ही समिति बनाकर मुद्देवार चर्चा का प्रस्ताव देती आ रही है जिसे वे बिना लाग लपेट के ठुकराते रहे किन्तु दूसरी  तरफ ये भी सही है कि कानूनों को वापिस लेने और न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी जमा पहिनाने की मांग पर सरकार ने भी झुकने से इंकार कर दिया | बावजूद इसके यदि किसान संगठन एक वार्ता विफल होने के बाद अगली के लिए रजामंद होते गये तो ये माना जा सकता है कि वार्ता की टेबिल के अलावा भी किसी अन्य माध्यम से बातचीत चल रही थी जिसे दोनों पक्ष छिपाते रहे | हालांकि अभी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि सरकार के ताजा प्रस्ताव पर आन्दोलनकारी संगठन अपनी सहमति देकर धरना समाप्त कर ही देंगे लेकिन उस पर विचार करने की बात कहने से उम्मीद की किरण नजर जरूर आ रही है | किसान संगठनों को भी ये बात तो समझ में आने लगी है कि उनकी हर जिद पूरी होने से रही वहीं आन्दोलन को  बिना परिणाम के लंबा खींचने से उसकी लगाम गलत हाथों में चली जाने का खतरा   भी है | ऐसी स्थिति में कानूनों के अमल को साल - डेढ़ तक स्थगित रखने के प्रस्ताव को  युद्धविराम के तौर पर स्वीकार किये जाने में नुकसान नहीं है | ऐसा होने पर किसान संगठनों के पास भी देश भर के किसानों को अपनी बात समझाने का अवसर मिल जाएगा जो वे अभी तक नहीं कर पाए | जहां तक बात सरकार की है तो वह भी बड़ी ही चतुराई से कदम आगे बढ़ा रही है जिसकी वजह से हर बैठक के पहले और बाद में कड़े तेवर दिखाने के बावजूद किसान संगठन बातचीत से इंकार करने का साहस नहीं कर पा रहे | सरकार ने जो नया प्रस्ताव दिया है उस पर किसान  संगठनों के जवाब का इन्तजार सभी को है क्योंकि इससे ज्यादा झुकने के लिए सरकार शायद ही राजी होगी | वहीं इसे ठुकराने के बाद आन्दोलन में दरार पड़ने की  आशंका बढ़ जायेगी |
- रवीन्द्र वाजपेयी