Friday, 6 August 2021

दो साल में धारा 370 हटाये जाने का औचित्य साबित हो गया



जम्मू – कश्मीर से धारा  370 हटे कल  दो वर्ष बीत गये | इस निर्णय से नाराज  कश्मीरी नेताओं ने पुरानी स्थिति बहाल करने की मांग  के साथ ही केंद्र सरकार पर सवाल दागते हुए उस फैसले से हुए फायदों के बारे में जानना चाहा | हाल ही में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने भी ये बयान देकर  अपनी फजीहत करवा ली थी  कि कांग्रेस के सत्ता में लौटने पर धारा 370 को दोबारा अस्तित्व में लाने पर विचार किया जावेगा | भले ही उनकी पार्टी के ही अनेक नेताओं ने उस बयान को निजी बताकर पल्ला झाड़ना चाहा किन्तु हमेशा की तरह श्री सिंह की बेलगाम जुबान ने पार्टी को शोचनीय स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया | बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने तो यहाँ तक कह दिया कि उक्त धारा को हटाये जाने से देश का नाम विश्व भर में कलंकित हो गया | विपक्ष में और भी ऐसी पार्टियाँ और नेता हैं जिनको जम्मू – कश्मीर में अलगाववाद को पालने – पोसने वाली धारा 370 हटाये जाने का उतना ही दुख है जितना अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार के अलावा हुर्रियत के नेताओं को | ये बात बिलकुल सही है कि  उक्त निर्णय का क्या प्रभाव पड़ा उसका समीक्षात्मक आकलन होना चाहिए | जहाँ तक बात जम्मू और कश्मीर से लद्दाख अंचल को अलग कर दो केंद्र शासित क्षेत्र  बनाने की है तो वह पूरी तरह सही साबित हुई | अलग केंद्र शासित क्षेत्र बन जाने से लद्दाख के विकास की  गति दोगुनी – चौगुनी हो गई है | चीन की सीमा से सटे लद्दाख का सैन्य दृष्टि से जो महत्व है उसके मद्देनजर उसका केन्द्र शासित होना अत्यावश्यक था | गत वर्ष हुए सीमा विवाद के दौरान उक्त निर्णय की जरूरत भी साबित हो गई | इसी तरह जम्मू – कश्मीर को विधानसभा  के बावजूद  पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं देना भी समयोचित था | हालांकि केंद्र सरकार लगातार  आश्वस्त करती आ रही है कि स्थितियां सामान्य होने पर पूर्ण राज्य की श्रेणी दे दी जायेगी किन्तु विधानसभा के नए चुनाव के पहले सीटों का  परिसीमन किये जाने पर भी घाटी के नेताओं के पेट में दर्द है | दरअसल  370 के रहते तक घाटी में विधानसभा सीटों की संख्या ज्यादा होने से जम्मू को नेतृत्व से वंचित रखने की कुटिल नीति अपनाई जाती रही | बीते दो साल में  वहां नए सिरे से परिसीमन की प्रक्रिया शुरू की गई जिसके बाद घाटी और जम्मू के बीच राजनीतिक असंतुलन खत्म होने की  उम्मीद बढ़ गई है | कश्मीर रियासत के भारत में विलय के बाद भी वहां कार्यरत हजारों सफाई मजदूरों को नागरिकता और मताधिकार से वंचित रखा गया था | इस विसंगति को भी दूर कर दिया गया | जम्मू – कश्मीर की लड़की का किसी अन्य राज्य के लड़के से विवाह होने पर उसे अपनी पैतृक संपत्ति में अधिकार नहीं मिलता था | इस फैसले को भी हाल ही में बदल दिया गया | सबसे बड़ा मुद्दा 370 की आड़ में पनपने वाला  आतंकवाद था |  घाटी में तो वह कुटीर उद्योग का रूप ले चुका था | आतंकवादी को पकड़ने या घेरने वाले सुरक्षा बलों पर पथराव को हुर्रियत ने रोजगार से जोड़ दिया | लड़कों के साथ लड़कियां भी पैसों की खातिर पत्थरबाज बनने लगीं | आतंकवादी की अंतिम यात्रा में इस तरह जनसैलाब उमड़ता जैसे  कोई देशभक्त शहीद हुआ हो | धारा 370 की विदाई के बाद  ऐसी  घटनाओं पर किस हद तक नियन्त्रण हो सका ये जगजाहिर है | बीती गर्मियों में वहां जितनी बड़ी संख्या में पर्यटक आये वह इस बात का जीवंत प्रमाण था कि आतंक  का माहौल कम होता जा रहा है | ये आशंका भी जताई जाती थी कि राजनीतिक  नेताओं की रिहाई के बाद घाटी एक बार फिर अशांत हो जायेगी लेकिन पत्ता तक  नहीं खड़का | पंचायत चुनाव भी बड़ी ही शांति से संपन्न हुए | हालाँकि हुर्रियत नेता अब भी नजरबंदी में हैं लेकिन वे पहले से ही चुनाव का बहिष्कार करते रहे हैं | बीते दिनों प्रधानमन्त्री ने विधानसभा चुनाव करवाए जाने को लेकर राज्य के तमाम राजनीतिक नेताओं की जो बैठक बुलाई उसमें आने के लिए महबूबा मुफ्ती ने ये शर्त रख दी कि पाकिस्तान से भी बात की जाए लेकिन जब उनको लगा कि कोई और उनका साथ नहीं दे रहा तब वे चुपचाप बैठक में आ गईं जिसमें उन सबको साफ़ बता दिया गया कि परिसीमन के बाद ही चुनाव होंगे | बैठक के बाद बाहर निकले नेताओं के तेवर बता रहे थे कि उनकी अकड़ खत्म हो चली है | अगली बैठक के लिए भी सभी ने खुशी –  खुशी राजामंदी दे दी | गुलाम नबी आजाद , फारुख और उमर अब्दुल्ला तथा महबूबा मुफ्ती के  अलावा छोटी पार्टियों के नेताओं की भाव भंगिमा से साफ़ था कि वे ये मान चुके हैं कि 370 के पुनर्जीवित होने के कोई आसार नहीं हैं | गत दिवस उमर ने ये तंज कसा कि 370 खत्म होने के बाद भी आखिर कश्मीरी पंडित घाटी में वापिस क्यों नहीं लौटे ? लेकिन ये सवाल पूछने के पहले अब्दुल्ला परिवार को इस बात का जवाब देना चाहिये था  कि वे अपनी अपनी माँ – बहिनों की  आबरु और जान बचाने की खातिर खौफनाक हालातों में रातों - रात अपना सब कुछ छोड़कर घाटी से भागकर अपने ही देश में शरणार्थी क्यों बने ? और क्या उमर  और उनके वालिद फारुख ने कभी उनके शिविरों  में जाकर उनका दुःख बांटते हुए उन्हें वापिस लौटाने का प्रयास किया ? ये बात पूरी तरह सही है कि अभी कश्मीर घाटी से पलायन करने वाले हिन्दुओं में घर वापिसी का साहस नहीं पैदा हो सका | लेकिन ये तथ्य  भी विचारणीय है कि 370 हटने के बाद  स्थिति सामान्य होने का समय आता उसके पहले ही कोरोना आ गया जिसकी वजह से समूचा देश अस्त – व्यस्त हो गया |  हालात जिस तरह सुधर रहे हैं और घाटी पर केंद्र सरकार का प्रभाव पूरी तरह कायम होता जा रहा है उसकी वजह से वहां जनता भी आतंकवाद के विरुद्ध मुंह खोलने लगी है | हालांकि देश विरोधी ताकतें अभी भी  सक्रिय हैं लेकिन उनका प्रभावक्षेत्र सीमित होता जा रहा है | ये देखते हुए  उम्मीद की जा सकती है कि 370 की अगली पुण्य तिथि आते तक घाटी के लोगों को भी ये समझ में आने लगेगा कि अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार ने विशेष दर्जे के नाम पर अपना स्वार्थ तो साबित किया किन्तु जनता को सिवाय गरीबी , बदहाली , बेरोजगारी और आतंक के और कुछ नसीब नहीं हुआ | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 5 August 2021

विपक्ष अपने ही जाल में फंस रहा : बिना बहस निर्विरोध पारित हो रहे विधेयक



गत दिवस सदन के बाहर पूर्व केन्द्रीय मंत्री और अकाली सांसद हरसिमरत कौर बादल की कांग्रेस सांसद  रवनीत सिंह बिट्टू से तीखी बहस हो गई | हुआ यूँ कि अकाली सांसद सदन के बाहर कृषि कानूनों का विरोध कर रही थीं  |  इसी बीच श्री बिट्टू ने ये तंज कस दिया कि वे  किसान हितैषी होने का  दिखावा कर रही  हैं जबकि उनके मंत्री रहते  हुए ही कृषि कानून पारित हुए थे और तब वे उनकी प्रशंसा कर रही थीं | इस पर श्रीमती बादल बिफर गईं और कानूनों के विरोध में मंत्री पद त्यागने का हवाला देते हुए पूछा कि कानून पारित होते समय राहुल गांधी और कांग्रेसी संसद सदन से उठकर क्यों चले गये थे ? हरसिमरत के सवाल का मकसद दरअसल ये साफ़ करना था श्री गांधी ने उन कानूनों के विरोध में मतदान करने से बचने के लिए सदन से बाहर जाने की नीति अपनाई | हालाँकि इस तरह हरसिमरत कांग्रेस सांसद  द्वारा उठाये सवाल  से बच नहीं सकीं किन्तु  ये बात सामने आ गई कि संसद में बहस की बजाय विपक्ष द्वारा हंगामे और बहिर्गमन जैसे कदमों से वह सत्ता पक्ष के लिए मैदान खाली  छोड़ देता है | यद्यपि इसके लिए केवल मौजदा विपक्ष को ही दोषी ठहराना न्यायोचित नहीं होगा क्योंकि भाजपा ने भी विपक्ष में रहते हुए अनेक सत्र हंगामे की बलि चढ़वाए  जिसे स्व. अरुण जेटली ने उचित भी ठहराया था | लेकिन अब कांग्रेस सहित बाकी विपक्षी पार्टियाँ मौजूदा सत्र को चलने नहीं दे रहीं तब  प्रधानमन्त्री उसे लोकतंत्र विरोधी बताने में संकोच नहीं कर रहे | इस सबके बीच ये खबर भी ध्यान देने योग्य है कि विपक्षी सदस्य आसंदी के पास आकर शोर - शराबा किया करते हैं  और सरकार उसी दौरान बिना किसी बहस अथवा औपचारिक विरोध के एक – दो विधेयक धीरे से पारित करवा लेती है | ऐसे में जब भविष्य में विपक्ष उन पर सवाल उठाएगा तब उससे भी वही पूछा जाएगा जो हरसिमरत कौर बादल ने रवनीत सिंह बिट्टू से पूछा |  उल्लेखनीय है कि संसद के हर सत्र  के पहले सदन के अध्यक्ष सर्वदलीय बैठक आहूत कर सदन को सुचारू रूप से चलाने की अपील करते हैं और उस बैठक में उपस्थित नेतागण  लोकतंत्र की दुहाई देते हुए अच्छी बातें तो  करते हैं लेकिन सत्र की शुरुवात होते ही हंगामा देखने मिलता है | मौजूदा सत्र वैसे भी संक्षिप्त  है , उस पर भी  अधिकतर समय हंगामे में बर्बाद होता रहा तो विपक्ष अपने संवैधानिक संसदीय अधिकार को खुद होकर ही गंवा देगा | वर्तमान में अनेकानेक समस्याएँ हैं जिन पर संसद में लम्बी बहस हो सकती है  | विपक्ष द्वारा सरकार की घेराबंदी  अपनी जगह ठीक है लेकिन  उसे ये नहीं भूलना चाहिए कि  बहुमत नहीं  होने से वह सरकार को गिरा नहीं सकता और इसलिए उसे बहस के  लिए उपलब्ध हर अवसर को लपक लेना चाहिए | सामान्यतः उसकी कोशिश ऐसे नियम के अंतर्गत बहस की  होती है जिस पर मतदान कराया जा सके | लेकिन सत्ता पक्ष इसके लिए राजी न होकर विपक्ष को उकसा देता है और इस चाल में फंसकर वह हंगामे का सहारा लेते हुए सदन के माध्यम से देश  तक अपनी  बात  पहुँचाने का मौका खो देता है | दुर्भाग्य से वर्तमान सत्र में भी सरकार और विपक्ष के बीच समन्वय नहीं बन पाने के  कारण  बहुत कम समय ही विधायी काम हो पा रहा है | विपक्ष को  केवल उस एक उदहारण से सीख लेनी  चाहिए जब स्व. अटलबिहारी वाजपेयी को  13 दिन चली सरकार के  विश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान ये एहसास हो चला था कि वे बहुमत का इंतजाम नहीं कर सके | लेकिन उन्होंने बड़ी ही  चतुराई से सदन के माध्यम से समूचे देश को जिस तरह संबोधित किया उसने जनमानस पर जबरदस्त छाप छोड़ी और अगले चुनाव में श्री वाजपेयी फिर प्रधानमन्त्री बने | विपक्ष में अनेक वरिष्ठ सांसद  प्रभावशाली वक्ता भी हैं | वे यदि बहस में हिस्सा लें तो जनता को सरकार की गलतियाँ बता सकते हैं | उनके अलावा जो युवा सांसद पहली अथवा दूसरी बार चुनकर आये हैं , सदन नहीं चलने से उनकी प्रतिभा सामने नहीं आ पाती | और भी कई बातें हैं जिनकी वजह से संसद का चलना जनहित में होता है | विपक्ष हंगामे के जरिये क्या करना चाहता है ये तो वही बेहतर बता सकता है लेकिन ऐसा करने से वह हाथ आये अवसर को गंवा रहा  है | रही बात सरकार की तो वह हंगामे के बाद भी  अपना काम तो कर ही लेती है और जो विधेयक इस दौरान पारित होते हैं उनको निर्विरोध पारित माना जाएगा |  

-रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 4 August 2021

अवैध शराब : संरक्षण देने वालों के गले में भी फंदा डालने की व्यवस्था हो


 
म.प्र सरकार ने अवैध शराब बनाने वालों को मृत्युदंड देने जैसा जो कानून बनाने का फैसला किया वह प्रथम दृष्टया तो बहुत ही उचित प्रतीत हो रहा है | अवैध शराब के कारोबार से सरकार को आबकारी के रूप में मिलने वाली आय का नुकसान होने के अलावा जहरीली शराब से  बड़ी संख्या में होने वाली मौतों का खतरा बना रहता है | म.प्र सरकार के खजाने में वैध शराब की बिक्री से भरपूर आवक होती है | शराब  दुकानों की नीलामी दर भी हर साल बढ़ जाती है | जबसे मनरेगा आया है तबसे ग्रामीण इलाकों में भी देशी के अलावा अंग्रेजी शराब का विक्रय काफी बढ़ गया है | कोरोना काल में लॉक डाउन के दौरान शराब की बिक्री अधिकारिक तौर पर भले बंद थी किन्तु शराब विक्रेताओं ने पीने वालों को पिछले दरवाजे से बेरोकटोक बोतलें  उपलब्ध करवाई | इसकी वजह से सरकार को राजस्व की हानि हुई | इसीलिये लॉक डाउन खत्म होने के बाद शराब दुकानों को खोलने का समय अन्य दुकानों से ज्यादा रखा गया | अब तो शराब को घर पहुँचाने जैसी व्यवस्था भी विचाराधीन है | इस बारे में सबसे रोचक बात ये है कि महंगाई का असर शराब की  बिक्री पर नहीं पड़ता | हर बजट में शराब महंगी  होती जाती है | दुकानों की बोलियाँ भी ऊंची दरों पर लगती हैं | बार में बिकने वाली शराब पर भी भारी कराधान होता है | आबकारी विभाग बिक्री बढ़ाने हेतु  दबाव भी बनाता है | लेकिन इसके समानांतर  नकली शराब का कारोबार भी जमकर चलता है ,  जिसकी आड़ में जहरीली  शराब भी बन जाया करती है जिसे पीने वाले मौत के मुंह में चले जाते हैं | शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने इसे रोकने के लिए कड़ा दंड देने का जो प्रावधान किया वह समय की मांग है | अवैध शराब पीने से मृत्यु  या अपंग होने पर उसको बनाने वाले को कम अवधि से आजीवन कारावास और फांसी तक का प्रावधान नए कानून में होगा | लेकिन शराब के सेवन को कम करने के बारे में सरकार की कोशिशें बहुत ही हास्यास्पद  हैं और जो हैं भी वे असर नहीं छोड़ पातीं | नशा मुक्ति केंद्र भी सरकारी कर्मकांड का पर्याय हैं | सवाल ये है कि केवल कमाई के फेर में शराब की बिक्री को बढ़ाने के प्रयास कहाँ तक सही हैं ? हालाँकि सरकार ये दावा करती है कि शराब की  नई दुकानें नहीं खोली जायेंगीं किन्तु इससे भी नशे के कारोबार पर कोई  फर्क नहीं पड़ता | इसका कारण है सरकार के अपने महकमे , जिनको शराब व्यवसाय से जबरदस्त ऊपरी कमाई  होती है | इस धंधे में राजनेताओं की हिस्सेदारी भी समस्या बनी हुई है क्योंकि उनके गिरेबान पर हाथ डालने की हिम्मत किसी की नहीं पड़ती | जहाँ तक इसके  अवैध  कारोबार का प्रश्न  है तो चाहे वह चोरी  छिपे बिकने वाली  हो या फिर नकली और जहरीली शराब  , पुलिस और आबकारी विभाग की जान -  बूझकर की गई अनदेखी ही उसके बढ़ने में सहायक है | अवैध शराब को बनाने  वाले आम  तौर पर तभी पकड़  में आते हैं जब कोई जानलेवा  हादसा होता है या फिर सरकारी अमले से उनका पंगा हो जाए | अन्यथा पैसे के प्रभाव से पुलिस और आबकारी विभाग वाले  इस धंधे को बेझिझक संरक्षण देते  हैं | म.प्र सरकार जो नया कानून ला रही है वह निश्चित रूप से अवैध और जहरीली शराब बनाने वालों के मन में डर पैदा करने में सक्षम हो सकता है |  लेकिन जब तक पुलिस और आबकारी विभाग के लोग इस बारे में ईमानदार नहीं होंगे तो कानून का पालन सही तरीके से हो पाना नामुमकिन है  | उलटे वह उनकी ऊपरी कमाई का साधन  बन  जावेगा |  बेहतर होता अवैध शराब बनाने वाले के पकड़े जाने पर उस इलाके के पुलिस और आबकारी महकमे के लोगों पर भी दंडात्मक कार्रवाई की व्यवस्था हो अन्यथा कानून केवल किताबों में कैद होकर रह जाएगा |

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 3 August 2021

अफगानिस्तान भी सीरिया की राह पर : चीन के दखल से अमेरिका - रूस चिंतित



अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों की अंतिम रूप से विदाई होते ही वहां गृहयुद्ध और तेज होने की आशंका मजबूत होती जा रही है | तालिबानी कट्टरपंथी तेजी से बड़े भूभाग को अपने कब्जे में लेते जा रहे हैं | उनकी कार्यपद्धति में जरा सा भी बदलाव नहीं आया | अपने विरोधियों की वे नृशंस हत्या करने से बाज नहीं आ रहे | काबुल में बैठी  अफगान सरकार की सेना हालाँकि तालिबानों से मुकाबला करने के साथ ही ये दावा कर रही है कि उन्हें देश पर काबिज नहीं होने जायेगा | उसने कबीलों के सरदारों को भी हथियार देकर अपने पक्ष में लड़ने के लिए राजी कर लिया है | वैसे  बीते 20 सालों में अफगानी समाज में सुधारवादी लोगों की संख्या में अच्छी खासी वृद्धि हुई तथा  महिलाओं में शिक्षा और नौकरी के प्रति रूचि बढ़ी है | अनेक युवतियों ने बिना डरे टीवी चैनलों को दिए साक्षात्कार में कहा कि वे तालिबान के दबाव में पढ़ना या काम करना बंद नहीं करेंगी | बुद्धिजीवी वर्ग भी तालिबानी कट्टरता के विरुद्ध बोलने का साहस दिखा रहा है | वैसे  ये बात सही है कि अमेरिका ने इस  देश को अधर में छोड़ दिया है | दो दशक तक यहाँ उसकी फौजों ने  तालिबानों के सफाये के लिए  पूरी ताकत झोंक दी किन्तु वह कामयाब नहीं हो सका | लेकिन जिस तरह उसने इस देश को छोड़ा वह समझ से परे है |  कभी – कभी तो ये लगता है कि अमेरिका  , तालिबान को समाप्त करने नहीं अपितु ईरान , पाकिस्तान और चीन पर नजर रखने आया था | प. एशिया से  वैसे भी उसके आर्थिक और सामरिक हित जुड़े हुए हैं | सोवियत संघ के विघटन के बाद  भले ही पहले जैसा डर उसे नहीं रहा लेकिन पाकिस्तान और ईरान के साथ ही चीन उसके लिए खतरा बना हुआ है | अमेरिका को सबसे ज्यादा किसी ने ठगा तो वह पाकिस्तान ही है जिसने उसके दुश्मनों से याराना बना रखा है | तालिबान इतना ताकतवर न हुआ होता अगर उसे पाकिस्तान से अघोषित सहायता और संरक्षण न मिलता | इसी तरह ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान ने छिपाए रखा जिसे ढूँढने के  लिए अमेरिका ने न जाने कितनी जगह छापे मारे | सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि अमेरिका के प्रमुख प्रतिद्वंदी चीन के साथ पाकिस्तान के बहुत ही नजदीकी रिश्ते हैं | बावजूद इसके वह  पाकिस्तान रूपी सांप को दूध पिलाता रहा | लेकिन पिछले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कठोर रवैया अपनाते हुए उसकी आर्थिक सहायता में काफी कटौती करने के अलावा आधुनिक सैन्य  सामग्री देने पर भी रोक लगा दी | चीन के प्रति भी ट्रंप काफी सख्त रहे | ईरान से तो अमेरिका का विवाद जगजाहिर है ही | अफगानिस्तान में अमेरिकी फौजों की मौजूदगी के दूरगामी उद्देश्य थे लेकिन पाकिस्तान ने तालिबानों को शरण देकर उसके मकसद को पूरा नहीं होने दिया | दरअसल वह  नहीं चाहता कि अफगानिस्तान में स्थिरता आये क्योंकि वहां विकास  होने पर  पाकिस्तान की भूमिका सीमित रह जायेगी | अमेरिकी फौजों के वहां रहते हुए भारत ने विकास कार्यों के लिये अरबों – खरबों का  निवेश कर डाला ,  जिससे पाकिस्तान भयभीत हो चला था  | सरकारी स्तर पर भी काबुल और नई दिल्ली के  मित्रतापूर्ण रिश्ते  उसको रास नहीं आ रहे थे  | कश्मीर घाटी में आतंकवाद फ़ैलाने में   तालिबानी सहायता की वजह से वह पाकिस्तान को प्रिय है  | कुछ ही समय में  अमेरिकी फौजें अफगानिस्तान से अपना डेरा पूरी तरह उठाने वाली हैं लेकिन उसके  पहले ही तालिबानी दस्ते  जिस तरह हमलावर होकर अपना आधिपत्य बढ़ाने में जुट गए हैं उससे  गृहयुद्ध की स्थिति निर्मित हो गई है |  चिंता का सबसे बड़ा कारण है चीन का तालिबान को खुला समर्थन क्योंकि ऐसा होने से वहां भारत के जो भी हित हैं  , विशेष  रूप से विकास  कार्यों में लगा धन , वे खतरे में पड़ जायेंगे | तालिबान के साथ चूंकि भारत के कूटनीतिक सम्बन्ध भी नहीं हैं इसलिए भी आने वाले दिन बेहद परेशानी भरे होंगे | एक बात जो सबसे ज्यादा ध्यान देने योग्य है वह है अफगनिस्तान से होने वाला पलायन | जैसी खबरें आ रही हैं उनके अनुसार बड़ी संख्या में ऐसे लोग देश छोड़कर जाने की तैयारी कर रहे हैं जो तालिबानी बर्बरता देख चुके हैं | ये सब देखकर लगता है कि भले ही अमेरिका अपना फौजी  लाव – लश्कर समेट रहा हो किन्तु वह अफगानिस्तान में चीन को भी खुलकर नहीं खेलने देगा | अफगानिस्तान  की सीमा पूर्व सोवियत संघ के हिस्से रहे ताजिकिस्तान , कजाकस्तान और  तुर्कमेनिस्तान नामक जिन  तीन देशों से मिलती हैं उनमें ताजिकिस्तान तालिबानों का घोर विरोधी है और उसने उनसे लड़ने के लिए सैन्य तैयारी भी कर ली है | ताजिकिस्तान के राष्ट्रपति ने रूस के राष्ट्रपति पुतिन से भी इस बारे में बात कर ली है जो कि तालिबान से पहले से ही नाराज हैं क्योंकि जब सोवियत संघ ने अफगानिस्तान में डेरा जमा रखा था तब अमेरिका ने ही तालिबानों को उसके विरुद्ध सशस्त्र गुट के तौर पर खड़ा किया था | और जिस तरह से वे चीन के हाथों खेल रहे हैं उससे  भी रूस सतर्क है | हालांकि वह सीधे हस्तक्षेप से बचना चाहेगा लेकिन ताजिकिस्तान की मदद करने से भी परहेज नहीं करेगा | दूसरी तरफ ये खबर भी है कि अमेरिका मध्य एशिया के  किसी देश में सैन्य  अड्डा बनाने की फिराक में है | कुल मिलाकर अफगानिस्तान कहने को अमेरिका के चंगुल से मुक्त हो गया लेकिन अब वह नए चक्रव्यूह में फंसता नजर आ रहा है | प. एशिया के  देश  सीरिया में जिस तरह के हालात बीते अनेक सालों से बने हुए हैं वैसे ही  इस पहाड़ी देश में बनने की आशंका है | चूँकि चीन से रूस और अमेरिका दोनों नाखुश हैं इसलिए उसकी अफगानिस्तान में दखलंदाजी नए  शीतयुद्ध का कारण बन जाये तो आश्चर्य नहीं होगा | उस दृष्टि से आने वाले कुछ महीने बेहद महत्वपूर्ण होंगे | लेकिन इस सबके बीच सवाल ये है कि आखिर तालिबान को धन और हथियार कौन देता है ?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 2 August 2021

सरकारी खजाने के साथ ही जनता की जेब भी भरना चाहिए



जून के निराशाजनक आंकड़ों के बाद जुलाई की समाप्ति पर आई खबर उम्मीदें जगाने वाली है  | जून  में  92 हजार करोड़ के मुकाबले जुलाई में जीएसटी का संग्रह 1. 16 लाख करोड़ जा पहुंचा है |  कोरोना की दूसरी लहर के दौरान  लॉक डाउन में अर्थव्यवस्था की रफ्तार काफी धीमी पड़ गई थी  जिसके कारण आर्थिक विश्लेषण करने वाली  भारतीय और विदेशी एजेंसियों ने वार्षिक विकास दर में काफी कमी कर दी | रिजर्व बैंक ने भी अपने अनुमानों को घटा दिया | हालाँकि पहली लहर से तुलना करें तो दूसरी में उद्योग – व्यापार पूरी तरह रुका नहीं था | निर्माण संबंधी गतिविधियाँ भी कमोबेश जारी रहीं | उत्पादन क्षेत्र भी अपेक्षाकृत सक्रिय रहा | लेकिन बाजार बंद रहने से खुदरा व्यापारी और छोटा कारोबार करने वाले घर बैठने मजबूर थे  | सिनेमा हॉल , रेस्टारेंट और शॉपिंग मॉल के अलावा पर्यटन उद्योग भी बंद रहा | शादियों में   सीमित लोगों की मौजूदगी से उससे जुड़े अन्य कारोबार भी ठन्डे पड़े रहे | लेकिन कृषि जगत ने इस साल भी उम्मीदों से बेहतर परिणाम दिए जिससे खाद्यान्न संकट से देश बचा रहा | वैसे कोरोना की पहली लहर के खत्म होने के संकेत मिलते ही 2020 के अंतिम महीनों में ही आर्थिक गतिविधियों में सुधार के लक्षण नजर आने लगे थे | लेकिन दो महीने के बाद ही समस्या और जटिल हो गई | कोरोना का संक्रमण गत वर्ष की अपेक्षा दोगुनी रफ्तार से फैला और बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने की खबरों ने जनता में डर पैदा कर दिया | कुछ दिनों तक तो ऐसा लगा जैसे हालात बेकाबू हो गये हैं | लेकिन जल्द ही स्थिति नियन्त्रण में आ गई  जिसके बाद  लॉक डाउन भी खत्म किया जाने लगा | शुरू में जो  बंदिशें थीं उनको भी क्रमशः घटाया जा रहा है | इस सबका सुपरिणाम अर्थव्यवस्था की सेहत में सुधार के तौर पर सामने आने लगा जिसका पैमाना जीएसटी संग्रह को  माना जाने लगा है | सबसे उत्साहजनक बात ये है कि बीते नौ महीनों में जून को छोड़कर जीएसटी की वसूली लगातार एक लाख करोड़ से  ज्यादा रही | जुलाई में आयात बढ़ने से भी जीएसटी की  आय बढ़ी वहीं घरेलू कारोबार से भी 32 प्रतिशत ज्यादा वसूली उत्साहवर्धक है | उद्योग प्रधान राज्यों में वृद्धि दर काफी अच्छी रही | जिसके कारण  ये आशा जागी  है कि आगामी त्यौहारी मौसम  में जीएसटी संग्रह पिछले कीर्तिमान ध्वस्त कर देगा | अर्थव्यस्था से जुड़े जो तथ्य सामने आ रहे हैं उनके अनुसार ऑटोमोबाइल और रियल एस्टेट के कारोबार में आई तेजी से विकास दर में गिरावट की आशंका लगातार कम हो रही है | चौपहिया  वाहनों की बिक्री आश्चर्यजंनक तरीके से बढ़ने के कारण उससे जुड़े अनेक छोटे उद्योग भी सक्रिय हो उठे हैं | कच्चे माल के आयात से वाहनों के उत्पादन में आ रही दिक्कतें दूर होने लगी हैं | इसी तरह भवन निर्माण के कारोबार में भी रौनक नजर आ रही  है | आवासीय फ़्लैट और ड्यूप्लेक्स के ग्राहक  तेजी से खरीदी कर रहे हैं | बाजार खुलने के बाद उपभोक्ता चीजों की बिक्री भी बढ़ने लगी है | कुल मिलाकर ये कहना गलत न होगा कि कोरोना की तीसरी लहर की आशंका के बावजूद अर्थव्यवस्था रंगत पर आ रही है | निश्चित तौर पर ये राहत का विषय है | वैश्विक स्तर पर भी  मान  लिया गया है कि कोरोना के बाद का दौर भारत का होगा और इस दौरान तमाम अवरोधों के बावजूद उसकी अर्थव्यवस्था प्रतिवर्ष तकरीबन 10 फीसदी की दर से आगे बढ़ेगी | परन्तु उसका संतुलित स्वरूप वही है जिसमें सरकार के साथ ही आम आदमी की भी आय बढ़े जो कम से कम मौजदा स्थितियों में तो नहीं हो रहा | जीएसटी आय में वृद्धि से वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण बहुत ही खुश हैं लेकिन सही बात ये है कि बीते एक साल में महंगाई ने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं | दाल , खाने के तेल , मसाले जैसी चीजों की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि होने से घरेलू बजट बिगड़ गया है जिसका प्रमुख कारण पेट्रोल और डीजल के दाम बेरोकटोक बढ़ते जाना है | सरकार इसके लिए वैश्विक कारणों को आधार बता रही है लेकिन उसे इस बात को मानना चाहिए कि उन पर केंद्र और राज्य मिलकर जिस बेरहमी से टैक्स वसूल रहे हैं वह महंगाई का मुख्य कारण है | ऐसे में यदि जीएसटी की वसूली आशानुरूप होने लगी है तो उसका लाभ आम जनता को पेट्रोल , डीजल और रसोई गैस की कीमतें घटाकर  दिया जाना चाहिये | सरकार को ये सोचना होगा कि जीएसटी संग्रह बढ़ने में सबसे बड़ा योगदान उपभोक्ताओं का है और इसीलिये न्यायसंगत  होगा कि केंद्र और राज्य दोनों की सरकार अपना खजाना भरने के साथ ही जनता को भी मालामाल करें क्योंकि बिना उसके अर्थव्यवस्था में उछाल की खुशी अधूरी है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी 



घुघवा राष्ट्रीय उद्यान में करोड़ों वर्ष पुराने जीवाश्म कुत्ते के भरोसे


 

जबलपुर के पड़ोसी जिले डिंडोरी  में निवास के समीप  स्थित घुघवा जीवाश्म ( फासिल्स )  पार्क की प्रसिद्धि यूँ तो  वैश्विक स्तर पर है क्योंकि यहाँ 6.5  करोड़ वर्ष  पुराने पेड़ , पौधों , पत्तियों , फल , फूल एवं बीजों के जीवाश्म पाए जाते हैं | ये जीवाश्म जिस दौर के हैं उसमें पृथ्वी पर डायनासोर होने की बात वैज्ञानिक शोधों में प्रमाणित होती रही है | आस पास के अनेक इलाकों से संग्रहित जीवाश्म भी घुघवा में रखे गए हैं जिसे 1983 में राष्ट्रीय उद्यान भी घोषित कर  दिया गया | तकरीबन 0. 27 किलोमीटर क्षेत्र में फ़ैले इस उद्यान में अनमोल जीवाश्म संपदा बिखरी पड़ी है | यहाँ एक छोटा सा संग्रहालय , ठहरने के काटेज , कैंटीन भी है | वन विभाग के कर्मचारी और चौकीदार भी रखे गये हैं | लेकिन इस उद्यान की व्यवस्था पूरी तरह से अव्यवस्था का पर्याय बन चुकी है | गत दिवस इसके  भ्रमण  का  अवसर मिला | 

चंडीगढ़ से आये मेरे 8 वर्षीय नाती दिव्यांश शुक्ला  के आग्रह पर गूगल सहित अन्य स्रोतों से मिली जानकारी ने मन में उत्सुकता और उत्साह काफी  बढ़ा दिया था | जबलपुर से मनेरी और निवास होते हुए अधिकतम दो घंटे में घुघवा पहुंचा जा  सकता  है | बरसात के बावजूद अभी तक सड़क बहुत ही अच्छी स्थिति में मिली और फिर समूचे मार्ग में हरियाली , पहाड़ियां , घाट और  जलधाराओं  ने आनंदित कर दिया | घुमावदार और उतार – चढ़ाव से भरपूर मार्ग रोमांच  प्रिय वाहन चालकों को भी रास आये बिना नहीं रहेगा | इस सबका आनंद लेते हुए मैं , दामाद सचिन और दिव्यांश दोपहर दो बजे घुघवा राष्ट्रीय उद्यान पहुंचे |

प्रवेश द्वार पर दोनों ओर डायनासोर की दो बड़ी मूर्तियाँ आकर्षित  करती हैं | लेकिन भीतर जाने के बाद वहां कोई कर्मचारी नहीं दिखा | कार्यालय और कैंटीन की इमारत में भी ताला लटका था | उद्यान के भीतर जाने के रास्ते पर एक चौकी  है जिस पर प्रति व्यक्ति 50 रु. प्रवेश शुल्क की सूचना भी अंकित है लेकिन चौकी में कोई नहीं था | एक जंजीर अवश्य सड़क के दोनों सिरों से बंधी हुई रही जिसका उद्देश्य वाहनों के प्रवेश को रोकना मात्र है | अन्यथा कोई उसे थोड़ा सा सरकाकर बेरोकटोक उद्यान के भीतर जा सकता है |

कुछ देर तक किसी सरकारी व्यक्ति की  तलाश करने के पश्चात देखा कि संग्रहालय खुला पड़ा था तो हम उसके अवलोकन हेतु भीतर गये | उम्मीद थी कि वहां कोई गाईड होगा जिससे जरूरी जानकारी मिलेगी किन्तु उसकी जगह बाहर से एक कुत्ता आ गया जो उसके बाद पूरे समय हमारे साथ बना रहा | संग्रहालय में घुसते ही एक बड़े से जीवाश्म के ऊपर छत पर रोशनी के लिए लगाये गये कांच से बरसाती पानी की धार लगातार गिरती जा रही थी | भीतर  जो दर्जनों   जीवाश्म रखे थे उनके सामने लगी विवरण पट्टिकाएं धुंधली हो जाने से उन पर लिखी जानकारी समझ में नहीं आती |  रोशनी भी बेहद कम थी और बिजली के स्विच भी काम नहीं कर रहे थे | कुत्ता हमारे साथ ही एक कक्ष से दूसरे में जिस तरह साथ चला उससे लगा मानों उसने ही उस  संग्रहालय की सुरक्षा का दायित्व ले रखा हो |

 संग्रहालय से बाहर आते ही एक  व्यक्ति छाता  लगाये हुए आता दिखा | उसे पास बुलाने पर पता लगा वह  चौकीदार है | जब उससे पूछा कि इतनी बेशकीमती चीजों की सुरक्षा करने वाला कोई नहीं है तो वह लापरवाही के साथ बोला कि मैं ही तो सुबह इसका ताला खोलकर गया था | पानी टपकने की बात पर बोला , हाँ वो तो टपकता ही है | किसी अधिकारी के बारे में पूछने पर उसने कुछ कहने से बचना  चाहा किन्तु ज्यादा कुरेदने पर बोला कि रेंजर आकर चले गये |  

तब तक ये साफ़ हो चला  था कि पृथ्वी के इतिहास से जुड़ी उस अनमोल धरोहर के रखरखाव के प्रति सरकारी महकमा कितना गैर जिम्मेदार है | पार्क का रास्ता पूछने पर उक्त चौकीदार ने इशारे से बता दिया | हल्की बरसात के कारण छाता लगाए हुए हम पार्क के भीतर प्रविष्ट हुए तो लोहे के दरवाजे को स्वयं खोलना पड़ा | अचानक पीछे देखा तो वह कुत्ता भी साथ चला आ रहा था | जीवाश्म पार्क में चारों  तरफ अनेक  चबूतरों पर एकत्र किये गए हजारों जीवाश्म रखे हैं | कुछ में ऊपर टीन  के शेड भी हैं | उनके अलावा भी जमीन पर बड़ी संख्या में जीवाश्म फैले हुए हैं | जिस जगह भी हम गए वह कुत्ता साथ चलता रहा | तकरीबन 45  मिनिट तक अद्भुत माहौल में उस समय की कल्पना करते रहे जब मानव  सभ्यता  का नामो – निशान  तक न था |  उन खोजकर्ताओं के प्रति भी मन में आभारयुक्त सम्मान का भाव लागातार बना रहा जिन्होंने करोड़ों वर्ष पहले के उन प्रतीक चिन्हों को तलाशकर सहेजने का अकल्पनीय कार्य किया | संग्रहालय में एक मॉडल के जरिये ये बताया गया है कि किस तरह पृथ्वी टुकड़े – टुकड़े होकर महाद्वीपों में बदली |

 
जबलपुर से घुघवा जाते समय मार्ग में अनेक जगह चट्टानों को देखकर करोड़ों वर्ष पूर्व हुई प्राकृतिक  उथलपुथल का एहसास भी अनोखा अनुभव देता है | लेकिन घुघवा पहुँचने के पहले तक जो उत्साह और उत्कंठा मन  में थी , वहां की सरकारी अव्यवस्था देखकर काफूर हो गई | जिन शोधकर्ताओं ने बरसों की मेहनत के बाद उन जीवाश्मों की खोज और पहिचान करते हुए पृथ्वी के विकास से गोंडवाना अंचल के करीबी रिश्ते से दुनिया भर को अवगत करवाया उनके योगदान के प्रति वन विभाग के कर्ताधर्ताओं की  उपेक्षा वृत्ति अक्षम्य अपराध की श्रेणी में रखे जाने योग्य ही है |

डिंडोरी जिला प्रशासन के साथ ही वन विभाग के उच्च  अधिकारियों को भी इस अनमोल धरोहर की सुरक्षा और समुचित व्यवस्था पर ध्यान देना चहिये जो एक कुत्ते के  भरोसे छोड़ रखी गई है | क्या पता वहां आने वाले सैलानी अज्ञानतावश कुछ जीवाश्म उठाकर घर में सजाने ले भी  जाते हों | यदि ये जीवाश्म संपदा किसी  दूसरे देश में हो तो इसकी साज - सज्जा और सुरक्षा खजाने की तरह की जाती किन्तु अपने अतुल्य भारत में ऐसी बातों को फिजूल समझा जाता है | वन विभाग के अमले को भी चूंकि घुघवा के जीवाश्मों में कमाई का कोई अवसर नहीं दिखता इसलिए उनको भी इसमें कोई रूचि नहीं है |
यद्यपि दिव्यांश के बालमन पर  डायनासोर युग से जुड़े उन अवशेषों की छवि अमिट तौर पर  अंकित हो चुकी है और वह उन्हें दोबारा देखने की इच्छा भी रखता है।

आलेख :  रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 31 July 2021

लाल किले के उपद्रवियों को सहायता : एक पूर्व सैनिक से ये अपेक्षा नहीं थी



जब नवजोत सिंग सिद्धू प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का कार्यभार ग्रहण कर रहे थे उसी आयोजन  में पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह ने अपने भाषण में कहा था कि जब नवजोत पैदा हुए थे तब वे सेना में रहते हुए देश की रक्षा कर रहे थे | कैप्टेन की वह टिप्पणी सिद्धू को अपने सामने बच्चा साबित करना था या कुछ और ये तो वही बेहतर जानते होंगे किन्तु पटियाला जैसी बड़ी रियासत के उत्तराधिकारी होने के बावजूद उनका सेना में शामिल होना निश्चित तौर पर सम्मान का भाव उत्पन्न करता है | लेकिन पंजाब सरकार द्वारा बीती 26 जनवरी को  किसान आन्दोलन के दौरान दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले पर चढ़े उपद्रवियों को  दिल्ली पुलिस द्वारा दायर मुकदमे में  कानूनी सहायता प्रदान करने के ऐलान से मुख्यमंत्री का दोहरा चरित्र सामने आ गया है | लाल किले की प्राचीर पर  चढ़कर तिरंगे का अपमान करने और  तलवारें घुमाने के दृश्य पूरे देश ने देखे | हर देशभक्त को उस हरकत ने क्रोधित कर दिया | यहाँ तक कि सिख समुदाय के भी अनेक लोगों ने उस घटना को सिख धर्म के  आदर्शों के विरुद्ध बताते हुए कड़ी निंदा करने में संकोच नहीं किया | किसान आन्दोलन का नेतृत्व करने वालों ने भी ये स्वीकार किया कि लालकिले  पर चढ़ना  उनके आन्दोलन का हिस्सा  नहीं था और ऐसा करने वाले उनके लोग नहीं थे | राकेश टिकैत जैसे कुछ नेताओं ने तो भाजपा पर ही ये आरोप लगा दिया कि उक्त घटना का तानाबाना उसी ने बुना था किसान आन्दोलन को बदनाम करने के लिए |  ये तर्क भी दिया गया कि इसीलिये सुरक्षा कर्मियों ने  उपद्रवियों को रोका ही नहीं | प्राचीर पर हंगामा करने के अलावा  भूतल पर भी तोड़फोड़ की गई | वह तो सुरक्षा बल के जवानों ने समझदारी से काम लिया नहीं तो बात खूनखराबे तक पहुँच  सकती थी | निश्चित तौर पर वह  साधारण अपराध न होकर राष्ट्रीय  सम्मान के साथ खिलबाड़ था और ऐसा करने वालों को कड़ा दंड देना किसी भी स्थिति में गलत नहीं होगा | लेकिन किसान आन्दोलन में घुस आये खलिस्तान समर्थकों ने उपद्रवियों को महिमामंडित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी | पंजाब सरकार द्वारा ऐसे लोगों को कानूनी सहायता उपलब्ध कराना राष्ट्रीय सम्मान के प्रतीकों का अपमान करने वालों की पीठ ठोंकने जैसा है | कैप्टेन अमरिंदर पूर्व फ़ौजी हैं  और उस आधार पर उनसे ये अपेक्षा थी  कि वे  देश की आन – बान – शान कहलाने वाले  लाल किले का अपमान करने वालों के विरुद्ध खुलकर खड़े होते | पंजाब देश का सीमावर्ती राज्य है जहां के लोग भारत की एकता और अखंडता के लिए सदैव एकजुट होकर खड़े रहे हैं | भारतीय सेना की तो कल्पना तक बिना पंजाबियों के नहीं की जा सकती | यही वजह रही कि जब खलिस्तान के नाम पर वहां आतंक का दौर आया तब  पंजाब के लोगों  ने देश की अखंडता को ही महत्व दिया जिसके कारण देश विरोधी ताकतें पराभूत हुईं | लम्बे समय बाद किसान आन्दोलन की आड़ लेकर खालिस्तानी फिर सक्रिय हो उठे और पूर्व की तरह उनको विदेशों से भी समर्थन मिलने लगा | उसी से उत्साहित होकर लाल किले वाली जुर्रत की गई | ये बात भी बिना  लाग - लपेट के स्वीकार करनी होगी कि गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर लाल किले में की गई देश विरोधी करतूत से किसान आन्दोलन की गम्भीरता तार – तार हो गई और उसके बाद वह पहले जैसी तेजी  नहीं पकड़ सका | ये देखते हुए कैप्टेन अमरिंदर सिंह की सरकार द्वारा उन उपद्रवियों को कानूनी सहायता देने का फैसला बहुत ही ओछी हरकत है | इस फैसले के दूरगामी परिणाम बहुत ही खतरनाक हो सकते हैं | अमरिंदर केवल राजनेता होते तब भी उनसे ऐसे निर्णय की अपेक्षा नहीं थी लेकिन वे तो एक पूर्व सैन्य अधिकारी भी हैं और इसलिये उनसे ऐसे लोगों को कानूनी सहायता प्रदान करने की उम्मीद नहीं की जा सकती जिन्होंने राष्ट्रीय स्वाभिमान के प्रतीक चिन्ह का अपमान करने जैसा अक्षम्य अपराध किया हो |  

- रवीन्द्र वाजपेयी