Monday, 9 May 2022

विश्व युद्ध रोकने में भारत सक्षम : कूटनीतिक मजबूती का प्रभाव



 रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध को ढाई महीने हो चुके हैं | इसमें दो मत नहीं हैं कि रूसी आक्रमण से यूक्रेन में हर  तरफ तबाही का मंजर है | सभी बड़े शहर मलबे के ढेर बन चुके हैं | रूस  अपार सैन्य शक्ति का उपयोग करते हुए अपने इस पड़ोसी से घुटने टिकवाने की हरसंभव कोशिश कर रहा है | लेकिन अब तक वह ऐसा कुछ भी हासिल नहीं कर सका जिसे विजय कहा जा सके | वैसे  तो ये लड़ाई बेमेल है किन्तु यूक्रेन की सेना और जनता जिस साहस का परिचय दे रही है वह इस जंग का सबसे उल्लेखनीय पहलू है | हालाँकि इसके पीछे अमेरिका और उसके समर्थक देशों द्वारा दी जा रही आर्थिक और सैन्य सहायता का योगदान है | लगभग रोज बर्बादी की तरफ बढ़ रहे देश का हौसला टूटने का नाम नहीं ले रहा जिसके कारण रूस के राष्ट्रपति पुतिन की बौखलाहट बढ़ती जा रही है | यूक्रेन के विरुद्ध उनकी आक्रामकता ने पूर्वी यूरोप के देश हंगरी , रोमानिया आदि को तो भयभीत किया ही लेकिन स्केंडनेवियन देश फिनलैंड और स्वीडन को हाल ही में पुतिन ने जिस तरह धमकाया उसके बाद से ये लगने लगा है कि रूस   अब अन्य यूरोपीय देशों को भी  शिकार बनाना चाहता है | दरअसल पुतिन के गुस्से का कारण ये है कि तमाम यूरोपीय देश यूक्रेन के समर्थन में खुलकर सामने आ गये और अमेरिका के दबाव में उन सभी ने रूस पर बेहद कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए हैं | इसकी वजह से उसका आयात और निर्यात दोनों बुरी तरह प्रभावित हुए हैं | आर्थिक मामलों के जानकारों का आकलन ये है कि इस युद्ध में जहां यूक्रेन में  विध्वंस का आलम है वहीं रूस में  आर्थिक अराजकता फ़ैल गई है | जरूरी चीजों का आयात रुकने से जहां जनता परेशान हो रही है वहीं निर्यात पर रोक लग जाने से उद्योगपति भारी नुकसान उठाने मजबूर हैं | यद्यपि प. यूरोप के अनेक देश रूस से व्यापार करने के इच्छुक हैं क्योंकि कच्चे तेल और गैस के लिए वही उनका सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता था लेकिन अमेरिकी दबाव  के कारण वे आगे नहीं बढ़ पा रहे | इस लड़ाई से दुनिया शीतयुद्ध के पुराने दौर में तो वापिस लौट ही चुकी है लेकिन यदि जल्द शांति स्थापित न हुई तो बात विश्व युद्ध की तरफ बढ़ सकती है | भले ही वह द्वितीय विश्वयुद्ध जैसा  मैदानी न हो जिसमें थल सेना का काफी उपयोग हुआ था लेकिन तकनीक के इस दौर में युद्ध की भयावहता और दुष्प्रभाव पहले से कई गुना ज्यादा बढ़ गए हैं | मसलन रूस ढाई महीनों  में भले ही यूक्रेन को फतह न कर सका हो किन्तु उसने इस देश को बिना जीते ही जिस तरह तबाह किया उससे ये अंदाज लगाया जा सकता है कि युद्ध का विस्तार और भी देशों में हुआ तब दूसरे महा युद्ध के बाद न सिर्फ यूरोप वरन समूचे विश्व में जो आर्थिक विकास हुआ उस पर पानी  फिर जायेगा | दुर्भाग्य ये है कि कि जिस रूस ने हिटलर की विस्तारवादी सोच के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई जीती वही आज उसी तरह की नीतियों के साथ अपने पड़ोसियों को आतंकित करने पर आमादा है | हालाँकि इसके लिए अमेरिका भी कम कसूरवार नहीं है क्योंकि नाटो नामक सैन्य संधि का विस्तार रूस की सीमाओं तक करने के पीछे उसका इरादा इस विश्व शक्ति की घेराबंदी करना था | हालाँकि सोवियत संघ  के विघटन की टीस रूस के ह्रदय में बनी रहने से ही उसने अपने पुराने साथी देशों पर तरह – तरह के दबाव बना रखे हैं | विशेष रूप से पुतिन के सत्ता में आने के बाद से रूस की नीति सोवियत संघ के पुराने घटकों को अपना आर्थिक उपनिवेश बनाने की रही | यूक्रेन उसकी निगाह में ज्यादा ही खटकता रहा क्योंकि एक तो वह बड़ा देश है और दूसरा सैन्य तथा आर्थिक दृष्टि से  काफी विकसित भी था | पूर्वी और प. यूरोप के साथ भौगोलिक निकटता की वजह से उसकी अंतरर्राष्ट्रीय स्थिति भी बेहद मजबूत बनती गयी | रूस को ये बर्दाश्त नहीं हो रहा था और इसीलिए उसने क्रीमिया नामक यूक्रेनी बंदरगाह पर बलात कब्ज़ा कर लिया | उसके बाद से पुतिन के हौसले और बुलंद हुए जिनकी भनक लगते ही यूक्रेन ने नाटो की सदस्यता ग्रहण कर अमेरिकी सैन्य सुरक्षा का इंतजाम करना चाहा और वहीं से इस युद्ध के बीज अंकुरित होने लगे | अब तक जो हुआ उसमें संरासंघ की लाचारी खुलकर सामने आ चुकी है | रूस के वीटो की वजह से सुरक्षा परिषद उसकी निंदा करने तक में असमर्थ रही है |  चीन और भारत के तटस्थ हो जाने से भले ही रूस को सीधी सहायता न मिली हो लेकिन अमेरिकी पक्ष अपने दबदबे को पूरी तरह कायम नहीं कर सका | हालाँकि राष्ट्रपति बाइडेन सहित ब्रिटेन और अन्य अमेरिकी देशों के राष्ट्रप्रमुखों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके साथ आने का अनुरोध भी किया और दबाव भी बनाया लेकिन भारत ने अपने रुख में बदलाव नहीं किया | उसने साफ़ कर दिया कि वह यूक्रेन पर रूस के हमले का समर्थन नहीं करता किन्तु निंदा भी नहीं करेगा | यद्यपि संरासंघ में भारत ने लड़ाई रोके जाने की वकालत भी की | गत सप्ताह अपने यूरोपीय दौरे में श्री मोदी ने साफ़ – साफ़ कहा कि इस युद्ध में किसी की जीत नहीं होगी इसलिए इसे रोकना दुनिया के हित में होगा | उसके बाद ही संरासंघ में रूस ने भी शांति स्थापना के लिए विश्व जनमत के साथ चलने की बात कहकर अपने रुख में नरमी का संकेत तो दिया | लेकिन बीते दो दिनों में नागरिक ठिकानों पर उसके हमले जिस तरह हुए उनके बाद  इस जंग के रुकने की ऊमीदें टूट रही हैं | धीरे – धीरे ये भी स्पष्ट होता जा रहा है कि पुतिन को उन्मादी साबित करने वाला अमेरिका भी इस युद्ध को जारी रखे जाने का हिमायती है | लेकिन वह मैदान में आने की बजाय यूक्रेन को मोहरा बनाये हुए है जिसके राष्ट्रपति जेलेंस्की  अमेरिकी जाल में फंसकर बड़े पहलवान से जबरन लड़ने की मूर्खता कर बैठे | आज यूक्रेन जिस  स्थिति में पहुंच गया है वहां से न पीछे लौटना संभव है और न ही आगे बढ़ने का सामर्थ्य उसके पास है | लेकिन दुनिया के हित में अब इस जंग को रोका जाना जरूरी हो गया है क्योंकि इससे कोरोना के बाद संभलती जा रही वैश्विक अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने लगी है |   अमेरिका सहित लगभग सभी देशों में महंगाई  चरम पर है | आयात करने वाले देशों की कमर टूट रही है वहीं निर्यात पर टिके देश भी तरह – तरह की परेशानी  से जूझ रहे हैं | भले ही  कहने को अब तक विश्वयुद्ध की नौबत नहीं आई लेकिन धीरे – धीरे दुनिया उस ओर बढ़ती लग रही है क्योंकि रूस और अमेरिका के सत्ताप्रमुख  अपने – अपने  वर्चस्व की  खातिर ऐसे हालात  पैदा करने पर आमादा हैं जिनमें युद्ध की लपटें पूरी दुनिया को अपनी लपेट में लिए बिना  नहीं रहेंगी | भारत की भूमिका ऐसे में बहुत ही महत्वपूर्ण हो गयी है क्योंकि श्री मोदी ही उन चंद विश्व नेताओं में हैं जो पुतिन , बाइडेन , जॉन्सन , मेक्रों और जिनपिंग से बात कर सकते हैं | चीन भी हालाँकि इस लड़ाई में तटस्थ है लेकिन उसकी विश्वसनीयता निरंतर कम होने से भारत काफी मजबूत स्थिति  में है | श्री मोदी की ताजा यूरोप यात्रा की सफलता ने कूटनीतिक जगत में भारत की प्रतिष्ठा में जो वृद्धि की है उसकी वजह से इस युद्ध को विश्व युद्ध में परिवर्तित होने से रोकने के लिए दुनिया श्री मोदी से उम्मीदें लगा रही है  | विदेश मंत्री एस. जयशंकर द्वारा किये गए विदेशी दौरों के दौरान भारत के पक्ष को जिस दबंगी के साथ प्रस्तुत किया गया उसकी भी सर्वत्र चर्चा है |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 7 May 2022

कान फोडू शोर पर रोक लगाना हर दृष्टि से सही निर्णय



उ.प्र के बदायूं जिले की एक मस्जिद पर ध्वनि विस्तारक लगाकर अजान की अनुमति न देने के विरुद्ध प्रस्तुत याचिका को रद्द करते हुए राज्य के उच्च न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ध्वनि  विस्तारक के जरिए अजान देना मौलिक अधिकार नहीं है | उल्लेखनीय है उ.प्र सरकार ने मंदिरों और मस्जिदों में लगे हजारों लाउड स्पीकर हटवा दिए हैं | मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जिस गोरखनाथ पीठ के प्रमुख हैं उसके परिसर में लगे ध्वनि विस्तारकों की आवाज परिसर के बाहर न आने पाए इसकी पुख्ता व्यवस्था भी कर दी गयी है | काफी समय से ये मसला अदालतों के सामने विचाराधीन रहा है | महाराष्ट्र में तो इसे लेकर राजनीतिक विवाद भी छिड़ गया है | विभिन्न अदालतों ने ध्वनि प्रदूषण पर चिंता व्यक्त करते हुए समय – समय पर आदेश पारित किये लेकिन कहीं धार्मिक भावनाएं हावी हो गईं तो कहीं प्रशासनिक उदासीनता उन आदेशों को लागू करने में बाधक बन गई | लेकिन बीते कुछ समय से ये मसला काफी चर्चा में है | महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री के चचेरे भाई राज ठाकरे ने ध्वनि विस्तारक न हटाये जाने पर अजान के समय ही मस्जिद के सामने हनुमान चालीसा का पाठ करने की जिद ठान ली है | देश के दूसरे हिस्सों में भी ध्वनि विस्तारकों से होने वाले शोर के विरुद्ध जनभावनाएं मुखरित हो रही हैं | दुर्भाग्य से ये मुद्दा धार्मिक बना दिया गया है जबकि  इसका सीधा सम्बन्ध जनता को  होने वाली परेशानी से है | केवल मस्जिदों में लगे ध्वनि विस्तारक ही शोर मचाते हों ऐसा नहीं है | अन्य धार्मिक स्थलों को लेकर भी ये शिकायत है  | यही नहीं तो सड़कों पर निकलने वाले राजनीतिक और धार्मिक जुलूस भी लोगों के कान फोड़ने में सहायक बनते हैं | बारातों में बजाये जाने वाले डीजे तो कर्कशता के प्रतीक बन गये हैं | इसके अलावा किसी महापुरुष की जयन्ती पर भी ध्वनि विस्तारकों के जरिये शोर होने की शिकायतें आम हैं | घरों में होने वाले धार्मिक आयोजनों में भी ध्वनि  विस्तारक लगाकर अगल - बगल के घरों में रहने वालों के लिए परेशानी पैदा की जाती है | अखंड रामायण का आयोजन तो पूरे 24 घंटे मोहल्ले भर को सोने नहीं देता | कहने का आशय ये है कि ध्वनि विस्तारक एक संस्कृति के तौर पर हमारे सामाजिक जीवन का हिस्सा बन गया है | कुछ विशिष्ट अवसरों या आयोजनों में तो इसका उपयोग उचित  कहा जा सकता है परन्तु बिना वजह महज शोर मचाने के लिए ऐसा करना बेहूदगी होती है , जिसका प्रदर्शन हमारे देश में निर्लज्जता के साथ किया जाता है | उच्च न्यायालय का संदर्भित फैसला न सिर्फ मस्जिदों अपितु अन्य धार्मिक स्थलों पर भी लागू होगा | इसलिए इसमें किसी भेदभाव की बात भी नहीं है | ध्वनि प्रदूषण को लेकर पूरी दुनिया में नियम हैं | सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी सार्वजनिक उपयोग के दौरान ध्वनि विस्तारक की आवाज अधिकतम कितनी होगी इसकी सीमा तय की जा चुकी  है | लेकिन ये कहना गलत नहीं होगा कि उसके फैसले का खुले आम उल्लंघन होता रहा है | धार्मिक और राजनीतिक आयोजनों में तो ध्वनि विस्तारक  प्रतिष्ठा का विषय बन गया है | वो तो भला हो टी.एन.शेषन का जिन्होंने चुनावों के दौरान ध्वनि विस्तारकों के उपयोग पर नियन्त्रण लगा दिया वरना लोगों का रहना - सोना मुश्किल होता था | नेताओं की सभाएं देर  रात तक चलने से भी शोर – शराबा जारी रहता था | ताजा फैसले में अजान हेतु ध्वनि विस्तारक के उपयोग को मौलिक अधिकार नहीं मानने की जो बात कही गयी है उसे धार्मिक नजरिये से न देखते हुए सामाजिक जिम्मेदारी के तौर पर लेना चाहिए क्योंकि धार्मिक स्वतंत्रता का पालन करने का ये अर्थ कदापि नहीं हो सकता कि उससे बाकी लोगों को तकलीफ पहुंचे | न सिर्फ मुस्लिम समाज वरन देश में रहने वाले प्रत्येक नागरिक के लिए जरूरी है कि वह धर्म की आड़ में मनमानी करने की जिद छोड़कर समय के साथ सुधार करने की मानसिकता  पैदा करे | चूंकि उक्त फैसला  सभी धार्मिक स्थलों पर समान रूप से लागू होगा इसलिए मुस्लिम मौलवियों सहित समाज के जिम्मेदार लोगों को संकीर्ण दृष्टिकोण त्यागकर स्वेच्छा से मुख्यधारा में शमिल होने की बुद्धिमत्ता दिखानी चाहिए | उनको ये बात भी समझनी होगी कि अपनी विशिष्ट स्थिति को बनाये रखने की उनकी जिद ही उनके लिए नुकसानदेह साबित हो रही है | आजादी के 75 साल बाद देश जिस दिशा में बढ़ रहा  है उसमें धार्मिक स्वतंत्रता के लिए तो स्थान है लेकिन स्वछंदता के लिये नहीं | मुस्लिम समाज को यह वास्तविकता भी समझ लेना चाहिए कि  तुष्टीकरण कर चुनाव जीतने वाला फार्मूला अब कारगर नहीं रहा और इसलिए अब किसी के लिए भी सौदेबाजी की स्थिति नहीं रह गई है  | लिहाजा सभी को  देश के कानून के मुताबिक चलने की आदत डाल लेनी चाहिए | तीन तलाक पर रोक के बाद  समान नागरिक संहिता  आने की चर्चा तुष्टीकरण की अंतिम यात्रा की शुरुवात का संकेत हैं | ऐसे में उ.प्र के उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया उक्त निर्णय पूरी तरह निष्पक्ष है और उसे उसके सही परिप्रेक्ष्य में स्वीकार किया जाना चाहिए |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 6 May 2022

आरक्षण : मर्ज बढ़ता गया ज्यों – ज्यों दवा दी



म.प्र में पंचायत एवं नगरीय चुनाव में ओबीसी  ( अन्य पिछड़ा वर्ग ) के आरक्षण की सीमा कितनी रखी जावे इसे लेकर सर्वोच्च न्यायालय में चल रही सुनवाई गत दिवस रोचक मोड़ पर जा पहुंची जब न्यायालय ने राज्य सरकार को हड़काते हुए कहा कि वह ओबीसी की संख्या संबंधी आंकड़े आज उसके समक्ष पेश करे अन्यथा वह बिना आरक्षण के चुनाव करवाने का आदेश पारित कर देगा | इसके बाद सरकार हरकत में आई और पिछड़ा वर्ग कल्याण आयोग सहित मतदाता सूचियां अदालत में पेश करने की तैयारी कर ली गई | ओबीसी को 35 फीसदी आरक्षण की सिफारिश के साथ जरूरी दस्तावेज आज अदालत में पेश होंगे | समूचे विवाद के पीछे ओबीसी की जनसँख्या के अनुपात में आरक्षण दिये जाने की मांग है | इसमें सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अतीत में दी गई वह व्यवस्था बाधा बन रही है जिसके अनुसार आरक्षण 50 फीसदी से अधिक नहीं हो सकता | ऐसे में यदि 35 प्रतिशत आरक्षण दिया जाना है तब संविधान में संशोधन करना होगा जो संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है | सर्वोच्च न्यायालय इस ,मामले में क्या फैसला देगा ये आने वाले दिनों में स्पष्ट हो जायेगा | यदि वह राज्य सरकार द्वारा पेश किये गए दस्तावेजों से संतुष्ट न हुआ तब हो सकता है वह बिना आरक्षण के निर्वाचन करवाने का आदेश दे जैसा कि महाराष्ट्र को लेकर वह कर चुका है | जाहिर है उस पर भी राजनीति होगी क्योंकि तब विपक्ष सरकार पर आरोप लगाएगा कि उसने ओबीसी को उसका हक दिलवाने में लापरवाही की | और यदि सर्वोच्च न्यायालय ने 35 प्रतिशत आरक्षण ओबीसी हेतु निर्देशित कर दिया तब पूरा मामला संविधान संशोधन पर जाकर टिक जावेगा | कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि आरक्षण नामक व्यवस्था  राजनीति के जाल में फंसकर रह गई है | राजनीतिक दलों के मन में यदि आर्थिक , सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े रह गये वर्गों के उन्नयन के प्रति ईमानदारी होती तो कोई कारण नहीं है जो आजादी के 75 साल बाद भी पिछड़ेपन का रोना रोया जाता | जाति को अलग रखकर  देखें तो ये लगेगा कि सामाजिक के साथ ही  आर्थिक और शैक्षणिक  पिछड़ापन एक बड़े वर्ग के साथ जुड़ा हुआ है | सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो लेकिन उसका पूरा ध्यान वोटों पर लगा रहता है | वरना आरक्षित वर्ग के नेताओं की स्थिति में हुए सुधार से उनके सजातीय वंचित न रहते | ये देखते हुए लगता है कि आरक्षण अपने असली उद्देश्य से भटक चुका है | निश्चित तौर पर आजादी के समय अजा , अजजा को आरक्षण रूपी बैसाखी की जरूरत थी |  इस वर्ग को मुख्यधारा में लाना समाज का मानवीय दायित्व था | कालान्तर में ओबीसी को भी आरक्षण का लाभ जब दिया गया तब कुल आरक्षण के प्रतिशत का विवाद उठा | जिसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने अधिकतम सीमा तो तय कर दी लेकिन हर चुनाव के पहले नई – नई जातियां आरक्षण की सूची में शामिल हो जाती हैं | अब तो बात अति पिछड़े और अति दलित तक जा पहुँची है | इसका आशय ये भी है कि बीते 75 साल में आरक्षित वर्ग का सम्पूर्ण उत्थान तो हुआ नहीं उलटे उसके कुछ हिस्से और भी बुरी हालत में पहुँच गये जो आरक्षण नामक व्यवस्था की सार्थकता पर सवाल खड़े करने के लिए पर्याप्त है | दरअसल जिन लोगों ने आरक्षण के नाम पर अपनी नेतागिरी चमकाई वे ही इस वर्ग के सबसे बड़े शत्रु साबित हुए | कभी – कभी तो लगता है अजा , अजजा और ओबीसी समुदाय की बदहाली के लिए उसके रहनुमा कहलाने वाले ही जिम्मेदार हैं | वरना बीते 75 साल में सामाजिक और आर्थिक विषमता पूरी तरह खत्म की जा सकती थी | म.प्र के स्थानीय निकाय एवं पंचायत चुनाव में ओबसी आरक्षण बढाने मात्र से यदि इस वर्ग का कल्याण होता हो तो संविधान में संशोधन करना भी उचित रहेगा लेकिन ये बात पूरी तरह सही है कि जातिगत आरक्षण अपने असली उद्देश्य में कामयाब नहीं हो सका | आज जब भारत दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का सामर्थ्य हासिल कर रहा है तब इस तरह के विवाद हमारी प्रगति में रोड़ा बनते हैं | सर्वोच्च न्यायालय ने यदि बिना आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाये चुनाव   करवाने का आदेश दिया तब उसे लेकर भी राजनीतिक रस्साकशी चलेगी | लेकिन इस सबसे ओबीसी का पिछड़ापन दूर होगा , इसकी सम्भावना नहीं लगती | कभी – कभी तो ऐसा लगता है मानों आरक्षण के नाम पर समाज को बांटने की मुहिम एक षडयंत्र है जिसका उद्देश्य जातिगत भेदभाव को मजबूत करते हुए सामाजिक सद्भाव को क्षति पहुँचाना है | आजादी के अमृत महोत्सव में बीते 75 साल के दौरान क्या खोया , क्या पाया का आकलन हो रहा है | लेकिन आरक्षण की समीक्षा करने के नाम पर ही बवाल होने लगता है | आरक्षण बेशक एक दवाई थी सदियों पुरानी सामजिक बुराई के इलाज की किन्तु ऐसा लगता है कि समय के साथ मर्ज बढ़ता गया ज्यों – ज्यों दवा दी वाली कहावत साबित हो रही है | यदि इसका लाभ हुआ होता तब आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाये जाने की बजाय घटाने की बात सोची जाती | लाख टके का सवाल ये है कि दलित और पिछड़े आखिर हैं ही क्यों ?

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 5 May 2022

संस्कृत को प्रोत्साहन देना बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय



बीते कुछ समय से देश में हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के मसले पर विवाद की स्थिति बनी हुई है | दक्षिण के राज्यों के अलावा प. बंगाल से भी हिन्दी के विरोध में आवाजें उठी हैं | क्षेत्रीय भाषाओं के पैरोकार भी इस मामले में मुखर हो उठे हैं | लेकिन इस सबके बीच म.प्र की शिवराज सरकार ने संस्कृत को बढ़ावा देने के लिए उसका अध्ययन करने वाले छात्रों को छात्रवृत्ति देने की घोषणा कर डाली | अक्षय तृतीया के दिन मुख्यमंत्री ने परशुराम चरित्र को पाठ्यक्रम में शामिल किये जाने का ऐलान किया था | राजनीतिक चश्मे से देखें तो श्री चौहान का उक्त फैसला आगामी विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण मतदाताओं को खुश करने का दांव है | उल्लेखनीय है 2018 के चुनाव में कोई माई का लाल आरक्षण खत्म नहीं कर सकता जैसे उनके बयान ने सवर्ण मतदाताओं को नाराज कर दिया था |  मुख्यमंत्री स्वयं अन्य पिछड़ा वर्ग से हैं और गाहे – बगाहे प्रदेश में 62 फीसदी ओबीसी जनसंख्या का आंकड़ा उनके द्वारा बताया जाता है | भाजपा के भीतर भी परम्परागत सवर्ण  समर्थक वर्ग इस बात से आहत अनुभव करने लगा है कि उसकी मेहनत से उठी पार्टी ओबीसी , अजा / अजजा को ज्यादा महत्व देने लगी है | सत्ता में बने रहने के लिए लिए सामाजिक न्याय वाली राजनीति का सफल प्रयोग उ.प्र में करने के बाद भाजपा का हौसला काफ़ी बुलंद है | अधिकतर ओबीसी और अजा / अजजा उसके साथ आ जाने से ही वह देश और अनेक प्रदेशों की सत्ता पर काबिज हो सकी | हालांकि  स्थायी रूप से उससे जुड़े रहे सवर्ण मतदाता भले ही उसके साथ बने हुए हैं लेकिन उनके मन में अपनी उपेक्षा के कारण नाराजगी तो है | शिवराज सिंह चूँकि अतीत में इसका नुकसान उठा चुके हैं इसलिए आगामी चुनाव में किसी भी तरह का जोखिम उठाने से बचते हुए वे ब्राह्मणों को रिझाने में जुट गए हैं | भोपाल में परशुराम की  विशालकाय प्रातिमा के अनावरण के दौरान ही उनके चरित्र को पाठ्यकम का हिस्सा बनाने के बाद संस्कृत पढने के इच्छुक छात्रों को छात्रवृत्ति प्रदान करने के साथ ही उसके शिक्षकों की भर्ती जैसे फैसले भी लिए गए | वोट बैंक की राजनीति से अलग हटकर देखने पर राज्य सरकार के इस निर्णय में सार्थकता प्रतीत होती है | संस्कृत को देव भाषा मानते हुए अधिकतर भारतीय भाषाओँ की जननी कहा जाता है | हमारे देश का ज्यादातर पौराणिक साहित्य मूल रूप से संस्कृत में होने से यह धार्मिक कर्मकांड की भी भाषा है | इससे भी बढ़कर अब ये साबित होता जा रहा है कि कम्प्यूटर की भाषा के तौर पर संस्कृत बेहद उपयोगी है | ऐसे में यदि उसके अध्ययन हेतु छात्रों को छात्रवृत्ति दी जाती है और उसे पढ़ाने के लिए शिक्षक नियुक्त होते हैं तब इस प्राचीन भाषा को उपेक्षा की खाई से निकालकर पुनः प्रतिष्ठित किया जा सकता है | कुछ दशक पूर्व तक विद्यालयीन पाठ्यक्रम में संस्कृत में उत्तीर्ण होना अनिवार्य था | लेकिन कालान्तर में उसे गैर जरूरी बना दिया गया | अंकसूची के  कुल अंकों में संस्कृत के अंक नहीं जोड़े जाने से उसके अध्ययन के प्रति रूचि में कमी आई | ये कहना भी गलत न होगा कि उसे दोयम दर्जे की भाषा समझा जाने लगा | म.प्र सरकार के इस निर्णय पर भी नाक सिकोड़ने वाले निकल आयें तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए |  लेकिन वर्तमान  हालातों पर दृष्टिपात करने पर  महसूस किया जा सकता है कि संस्कृत के जानकारों को देश के साथ विदेशों में भी उसी तरह सम्मान सहित रोजगार हासिल हो सकता है जैसा बीते कुछ सालों से योग का शिक्षण लेकर निकले छात्रों को हुआ  है | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब योग को  वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित करने का बीड़ा उठाया और उसके बाद विद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में योग के पाठ्यक्रम प्रारम्भ करवाए तब शुरुवात में वह निर्णय  उपहास का पात्र बना | लेकिन बीते कुछ  सालों के भीतर हजारों योग प्रशिक्षक विदेशों में जाकर अच्छा ख़ासा कमा रहे हैं | इसी तरह भारत में योग की विधिवत शिक्षा प्राप्त किये युवा नौकरी अथवा निजी प्रशिक्षक के तौर पर आजीविका चलाने में सक्षम हुए हैं | उल्लेखनीय है कि संस्कृत की उपेक्षा के कारण  अच्छे कर्मकांडी पुरोहितों का अभाव नजर आने लगा है | इस दृष्टि से म.प्र  सरकार ने भाषा के  तौर पर संस्कृत को प्रोत्साहित करने को जो फैसला किया वह हर दृष्टि से समयोचित है | इसे केवल सनातन धर्म से जोड़कर देखना मूर्खता होगी क्योंकि भारतीय आध्यात्म , दर्शन और ज्ञान कोष  के अध्ययन के लिए इस भाषा का ज्ञान किसी के लिए भी उपयोगी हो सकता है | यूँ भी भाषा की जानकारी व्यक्तित्व की चमक में वृद्धि करती है | मसलन स्व. हरिवश राय बच्चन हिंदी भाषी होने के बाद भी अंग्रेजी के प्राध्यापक थे किन्तु उनकी प्रतिष्ठा हिंदी  कवि के तौर पर थी | इसी प्रकार स्व. रघुपति सहाय जो  फिराक गोरखपुरी के नाम से लोकप्रिय हुए , हिन्दी भाषी होने के बाद भी अंग्रेजी के प्राध्यापक हुए किन्तु उनकी समूची साहित्य साधना उर्दू में थी | उक्त दोनों विभूतियों ने साबित कर दिया कि भाषा का ज्ञान आपको कितनी ऊंचाइयों तक पहुँचा सकता है | इसलिए शिवराज सरकार ने  संस्कृत  के शिक्षण के लिए जो कदम उठाया वह स्वागतयोग्य है | पाठ्यक्रम से उपेक्षित होती जा रही यह प्राचीन भाषा अपने व्याकरण और वैज्ञानिकता के लिए किसी प्रशंसा या प्रमाणपत्र की मोहताज नहीं रही | जर्मनी में तो अनेक दशकों से संस्कृत के साथ ही प्राचीन भारतीय ग्रंथों का अध्ययन होता आ रहा है | म.प्र की तरह अन्य राज्य भी यदि संस्कृत को प्रोत्साहित करने के लिए ऐसे ही कदम  उठायें तो बड़ी बात नहीं कि आने वाले कुछ सालों के बाद विश्व संस्कृत दिवस का आयोजन भी होने लगेगा | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 4 May 2022

दंगे : समान नागरिक संहिता के विरोध में अग्रिम दबाव बनाने की कोशिश



राजस्थान के करौली में हुए दंगे की तपिश कम भी नहीं हुई थी कि गत दिवस जोधपुर में सांप्रदायिक फसाद हो गया | अक्षय तृतीया और परशुराम जयन्ती के साथ ईद का संयोग होने से पूरे देश में प्रशासन काफी सतर्क था | उ.प्र में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने तो किसी भी प्रकार के धार्मिक जुलूस की अनुमति नहीं दी | म.प्र के खरगौन में भी हाल ही में हुए दंगे की पुनरावृत्ति रोकने के लिए कर्फ्यू लगा दिया गया | अक्षय तृतीया पर हिन्दू समाज में बड़ी संख्या में विवाह एवं अन्य मांगलिक कार्यों के साथ ही  परशुराम जयंती के कारण अनेक स्थानों पर जुलूस निकालने की परम्परा भी है | दूसरी तरफ ईद पर मुस्लिम समुदाय के लोग भी नमाज हेतु ईदगाह जाते हैं | ऐसे में अपेक्षित तो यही था कि दोनों धर्मावलम्बी शान्ति और सद्भाव  के साथ अपने – अपने त्यौहार मनाते किन्तु जोधपुर में जो कुछ हुआ उससे स्पष्ट हो गया कि दंगों की ये श्रृंखला किसी योजना का हिस्सा है | उसके चित्र संचार माध्यमों पर प्रसारित होने के बाद दोषियों की पहिचान आसानी से की जा सकती है | दंगाइयों ने पुलिस वालों पर जिस तरह से घातक हमले किये उनसे उनकी प्रवृत्ति समझ में आ गयी | जो कारण बताया गया है वह इतना बड़ा नहीं था कि दंगे का रूप ले ले | ये कहना भी गलत न होगा कि हमारे देश में धारा 144 पूरी तरह से मजाक बनकर रह गई है | सामान्य परिस्थितियों तक में पुलिस बल का भय लगातार घटता जा रहा है | वरना निषेधाज्ञा लागू होने के बाद भी लोग हुजूम बनाकर सड़कों पर उत्पात मचाने की जुर्रत नहीं करते | जहाँ – जहाँ भी हाल ही में दंगे हुए उनका किसी त्यौहार के दिन ही होना इस बात का संकेत है कि जान बूझकर ऐसा किया गया जिससे समाज में तनाव बढ़े और शांति व्यवस्था के लिये खतरा पैदा हो | सतही तौर पर तो हर कोई ये कहते हुए दिखता है कि दोनों सम्प्रदायों के लोगों को मिल - जुलकर रहना चाहिए | गंगा – जमुनी संस्कृति की भी खूब  दुहाई दी जाती है , लेकिन वास्तविकता के धरातल पर देखें तो तस्वीर कुछ और ही है | जोधपुर में दंगे का जो कारण बताया गया ,  ठीक वैसा ही करौली , खरगौन और दिल्ली के जहांगीरपुरी इलाके में देखने मिला था |  इसका मतलब यही है कि दंगा करवाने वालों के बीच जीवंत संपर्क और सामजंस्य  है | पुलिस और सुरक्षा बल किसी भी वारदात को अंजाम देने वालों की पृष्ठभूमि , संपर्क और तौर – तरीकों का अध्ययन करते हैं | उस आधार पर ये कहना गलत न होगा कि बीते एक माह के दौरान जितने भी सांप्रदायिक उपद्रव हुए उन सबके लिए बनाया गया बहाना लगभग एक समान ही है | पत्थर फेंकने की शैली एक जैसी होने से  भी लगता है जैसे उसके लिए बाकायदा प्रशिक्षण दिया गया हो | कुल मिलाकर बात राजनीतिक संरक्षण की आ जाती है | जिस राज्य की सरकार तुष्टीकरण से ऊपर उठकर दंगाइयों में भेद नहीं करती वहां स्थितियां नियन्त्रण में रहती हैं परन्तु  जहाँ राजनीति हावी रहती है वहां असली अपराधी बच जाते हैं | म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह जैसे वरिष्ट नेता जब ये कहते हैं कि गरीब मुस्लिम युवकों से भाजपा पत्थर फिकवाती है तो आश्चर्य के साथ दुःख होता है | करौली , खरगौन और जहांगीरपुरी में किसके जुलूस पर हमला हुआ और किसने किया ये किसी से छिपा नहीं है | लेकिन देश का एक वर्ग सत्य से नजरें चुराने की आदत से बाज नहीं आ रहा जिससे उपद्रवी तत्वों का हौसला बुलंद हो रहा है | करौली के बाद राजस्थान  के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के गृहनगर में गत दिवस हुआ सांप्रदायिक दंगा केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि उसके लिए प्रदेश सरकार में बैठे नेतागण भी जिम्मेदार हैं जो करौली दंगे के दोषियों को  दंडित करवाने की बजाय राजनीतिक नफे – नुकसान का आकलन करते रहे  | जिस तरह खरगौन और जहांगीरपुरी में दंगा करवाने वालों पर प्रहार किया गया , वैसा ही करौली में किया जाता तब जोधपुर को जलाने का दुस्साहस न हुआ होता |  वैसे ये कहना गलत नहीं होगा कि उपद्रवी मानसिकता के लोग भी सभी धर्मों में होते हैं | लेकिन शासन में जमे नेताओं द्वारा दोषियों को बख्शने की हिदायत दिये जाने से इस मानसिकता को बढ़ावा मिलता है |  करौली दंगे के दोषियों को बचाने की गहलोत सरकार की गलती का खामियाजा जोधपुर ने भोगा | बीते कुछ समय से देश में एक सोची – समझी साजिश के अंतर्गत मुस्लिम समाज को मौजूदा व्यवस्था के विरुद्ध भड़काने का काम राजनीतिक नेताओं के अलावा मजहबी लोग कर रहे हैं | मुसलमानों के मन में बेवजह डर भी पैदा किया जा रहा है | सामाजिक सुधारों को धर्म विरोधी बताकर साम्प्रदायिक उन्माद की जमीन तैयार की जा रही है | भ्रम फ़ैलाने वाले ये कहने तक से बाज नहीं आ रहे कि जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाया जाना मुस्लिम विरोधी फैसला था | तीन तलाक पर रोक का हालाँकि मुस्लिम महिलाओं ने स्वागत किया लेकिन उसे लेकर भी तरह – तरह के बातें कही जाती रहीं | कुछ दिनों से समान नागरिक संहिता  लागू किये जाने की चर्चा चल रही  है |  ऐसा लगता है दंगों की ये श्रृंखला उसके विरोध में अग्रिम दबाव बनाने के लिये रची गई है | ऐसे में ये कहना गलत नहीं है कि देश को आंतरिक तौर पर कमजोर करने की कोशिश इनके जरिये की जा रही है | राजनीतिक जमात  से यही अपेक्षा है कि अगर वह दंगों को रोकने में मददगार नहीं हो सकती तो कम से कम उन्हें भड़काने का पाप तो न करे क्योंकि इनकी आग ये नहीं  देखती कि जलने वाले का धर्म क्या है ? 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 3 May 2022

और भी दर हैं ज़माने में सियासत के सिवा ....



एक जमाना था जब बाहुबली या रंगदार किस्म के लोग नेताओं की चुनाव में मदद करने के एवज में उनसे संरक्षण प्राप्त किया करते थे | कालान्तर में उन्हें लगा कि वे जब उनको जितवा सकते हैं तब खुद ही क्यों न विधायक - सांसद बन जाएँ | और उसके बाद भारतीय राजनीति की  चाल , चरित्र और चेहरा न सिर्फ बदला अपितु विकृत होता गया | दरअसल हमारा समाज इतना ज्यादा राजनीतिमय होकर रह गया है कि हर तबके के भीतर उसमें घुसने की ललक दिखाई देने लगी है | प्रशासनिक अधिकारी सेवा निवृत्त होते ही सियासत में ठिकाना तलाशने लगे हैं | उद्योगपति , कलाकार , सामाजिक कार्यकर्ता , लेखक , पत्रकार . अधिवक्ता और अभिनेता सभी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष तौर पर राजनीति के मैदान में उतरने की लालसा पाल बैठे हैं | दरअसल समूची व्यवस्था पर राजनेता जिस प्रकार कुंडली मारकर बैठ गए हैं उससे ये अवधारणा मजबूत होती जा रही है कि राजनीति में आने से आपके हाथ में निर्णय क्षमता आ जाती है | वरना बतौर साधारण कानून पसंद नागरिक  आप मक्खी – मच्छर से ज्यादा कुछ भी नहीं | इसीलिये सार्वजानिक जीवन में कुछ अपवाद छोड़कर हर किसी की अंतिम मंजिल राजनीति बन जाती है | 1974 का छात्र आन्दोलन जिन समस्याओं को लेकर शुरू हुआ वे आज भी यथावत हैं जबकि उसी आन्दोलन से निकले अनेक युवा नेताओं ने सत्ता में आकर  अपनी भावी पीढ़ियों तक का उद्धार कर लिया | गुजरात में हार्दिक पटेल पाटीदार समाज के लिए बड़ा आन्दोलन खड़ा करने के बाद आखिरकार राजनीति के जंजाल में आकर उलझ गए | आम आदमी पार्टी के रूप में दिल्ली में जो दल सत्ता में आया वह भी अन्ना हजारे के उस आन्दोलन की कोख से  निकला जो बड़े सामाजिक बदलाव के लिए किया गया था | आज अन्ना तो अपने गाँव में बुढ़ापा काट  रहे हैं वहीं  उनके नाम के सहारे सत्ता में आये अरविन्द केजरीवाल को इतनी भी फुर्सत नहीं कि कभी जाकर उनके हालचाल पूछ आयें | कहने का आशय ये है कि राजनीति ने हमारी सोच को इस हद तक जकड़ लिया है कि योग्य से योग्य व्यक्ति तक को  लगने लगा है कि उसकी काबिलियत तब तक बेकार है जब तक उसके पास राजनीति नामक ब्रह्मास्त्र न हो | हालाँकि ये भी उतना ही सही है कि उसमें अच्छे लोगों का आना ही नहीं अपितु बने रहना बेहद जरूरी है | लेकिन कटु सत्य ये है कि जिस तरह खराब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है उसी तरह खराब लोगों की वजह से अच्छे लोग राजनीति में घुटन महसूस करने लगते हैं | लेकिन इसका दूसरा पहलू ये भी है कि समाज ने राजनीति को ही अपना भाग्य विधाता मान लिया है | यही वजह है कि दूसरों के लिए चुनावी रणनीति बनाने के लिए प्रसिद्ध हुए प्रशांत किशोर ने भी अंततः राजनीतिक दल बनाने का निर्णय कर डाला | कुछ दिन पहले तक उनके कांग्रेस में शामिल होने की चर्चा जोरों पर थी लेकिन अब अपने गृह राज्य से वे नई पार्टी की शुरुवात करते हुए जल्द ही लोगों के बीच जाकर आगे की रूपरेखा तय करेंगे | वे बिहार तक ही सीमित रहेंगे या राष्ट्रीय स्तर पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराएँगे ये तो आने वाला समय ही बताएगा  | वैसे जहां तक बात आम आदमी पार्टी की है तो वह दिल्ली जैसे महानगर से ऊपर उठी और उसके चुनावी मुद्दे भी नगरीय स्तर के ही थे | आज भी उसका चिंतन मुफ्त बिजली – पानी जैसे मुद्दों में ही उलझा हुआ है |  पंजाब में मिली सफलता के पीछे भी मुफ्त संस्कृति का ही योगदान है | ऐसे में प्रशांत किस बात को लेकर जनता के बीच जायेंगे ये बड़ा सवाल है क्योंकि  दूसरों को चुनाव जीतने के गुर सिखाना अलग बात है और खुद मैदान फतह करना अलग | श्री किशोर के मन में ये पीड़ा हो सकती है कि उनका सहारा लेकर सत्ता तक पहुँचे नेता भी  उन्हीं  घिसे - पिटे तरीकों से काम कर रहे हैं जिनके विरुद्ध उन्हें जनादेश प्राप्त हुआ | लेकिन इसमें उनका दोष भी कम नहीं हैं क्योंकि वे राजनीतिक नेताओं को सत्ता में आने के तौर - तरीके तो सिखाते रहे लेकिन आदर्शवादी शासन व्यवस्था कायम करने के बारे में कोई सीख  किसी को दी हो ये शायद ही किसी ने सुना होगा | वरना वे बिहार में नीतिश के साथ लालू के गठबंधन को विजयी बनाने में सहायक न बनते | यही बात प. बंगाल के बारे में कही जा सकती है | और फिर ममता को प्रधानमंत्री बनवाने की मुहिम को बीच में छोड़कर वे कांग्रेस के पुनरुद्धार में क्यों लग गये इसका भी संतोषजनक जवाब उनके पास नहीं होगा | 2014 में नरेंद्र मोदी की चुनावी रणनीति बनाने के बाद से वे प्रकाश में आये और फिर  अनेक पार्टियों ने उनकी  सेवाएं लीं | उन सभी के साथ उन्होंने जुड़ने का प्रयास भी किया परन्तु ज्यादा देर तक  टिके नहीं और अंततः अपनी पार्टी बनाकर उन  महत्वाकांक्षाओं को जमीन पर उतारने का मन बना बैठे जिससे वे अब तक इंकार किया करते थे | लेकिन उन जैसे तीक्ष्ण बुद्धि सम्पन्न व्यक्ति को ये बात क्यों नहीं समझ में आ रही  कि जिस तरह उन्होंने कहा था कि कांग्रेस को नए नेता की नहीं अपितु बड़े बदलाव की जरूरत है , उसी तरह देश को नए राजनीतिक दल की बजाय एक बड़े सामाजिक आन्दोलन की आवश्यकता है , जो राजसत्ता पर अंकुश का काम कर सके |  आजादी के बाद महात्मा गांधी भी इसी भूमिका में आना चाहते थे किन्तु जल्दी ही उनका अवसान हो गया | लम्बे अन्तराल के बाद जयप्रकाश नारायण सम्पूर्ण क्रांति के नारे के साथ मैदान  में उतरे परन्तु उनकी मुहिम भी सत्ता परिवर्तन के साथ दम तोड़ बैठी और ऐसा ही कुछ हुआ अन्ना हजारे के आन्दोलन के साथ जिसके कन्धों पर चढ़कर केजरीवाल एंड कम्पनी ने सत्ता हथिया ली लेकिन उनको दूर धकेल दिया | मौजूदा व्यवस्था के प्रति प्रशांत की निराशा समझ में आती है किन्तु वे अपनी प्रतिभा और क्षमता का उपयोग राजनीति के दलदल में उतरकर करेंगे तो उसमें फंसकर रह जायेंगे | बेहतर हो अपने अध्ययन और अनुभव के आधार पर वे  एक गैर   राजनीतिक मंच तैयार करें जो सत्ता पर दबाव बनाने में सक्षम हो | समाज में आज भी ऐसा एक तबका है जो पद , प्रतिष्ठा और पैसे की भूख  से निर्लिप्त रहकर देश की भलाई के लिए कुछ करना चाहता है लेकिन उचित  मंच न मिलने से वह बुद्धिविलास तक सीमित है | प्रशांत को चाहिए ऐसे लोगों को अपने साथ जोड़ें जो सत्ता के आकर्षण से मुक्त हैं  | यदि वे ऐसा करते हैं तब उनकी आवाज देश भर में फैलते देर नहीं  लगेगी | उनको अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि नई पार्टी बनाने के बाद सामाजिक परिवर्तन  के लिए उनको चुनाव लड़ना ही नहीं अपितु जीतना भी पड़ेगा और उसके लिए किये जाने वाले धतकरमों से वे बखूबी परिचित हैं |  इसलिए बेहतर तो यही होगा वे एक सामाजिक आन्दोलन का सूत्रपात करें जिसकी वर्तमान हालात में सख्त जरूरत है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 2 May 2022

जीएसटी से रिकॉर्ड कमाई का लाभ जनता को भी मिलना चाहिए



कोरोना के कहर से उबर रही अर्थव्यवस्था के लिए नए वित्तीय वर्ष का पहला महीना खुशनुमा हवा का झोका लेकर आया | गत दिवस अप्रैल महीने में हुए जीएसटी संग्रह के जो आंकड़े आये उनसे सरकार बेहद खुश होगी | 1.67 लाख करोड़ की मासिक जीएसटी आमदनी अब तक की सर्वोच्च है | जबसे ये कर प्रणाली लागू हुई है तबसे लेकर मार्च 2022 तक किसी भी महीने में जीएसटी की वसूली 1.5 लाख करोड़ से अधिक नहीं हुई | कोरोना के दो साल तो अर्थव्यवस्था के लिए किसी दु:स्वप्न से कम नहीं थे  | लेकिन उसके बाद आर्थिक जगत में हलचल बढ़ी और कुछ क्षेत्रों को छोड़कर बाकी पुरानी रंगत पर लौट आये | हमारे देश की अर्थव्यवस्था में खेती और शादियों का बड़ा ही अनूठा गठजोड़ है | कोरोना काल में लॉक डाउन तथा अतिथियों की संख्या सीमित किये जाने से शादियों में परम्परागत रौनक दिखाई नहीं दी जिसका सीधा असर खाने – पीने की चीजों के साथ ही आभूषण , कपड़ा और परिवहन व्यवसाय पर पड़ा | यद्यपि कृषि क्षेत्र ने उत्पादन के रिकॉर्ड तोड़ दिए लेकिन बाजार बंद रहने से कृषक  समुदाय जिस उत्साह के साथ खर्च करता है , उस पर भी रोक सी लग गयी | निजी क्षेत्रों में कार्यरत लाखों कर्मचारी बेरोजगार हो गए , मजदूर वर्ग के सामने तो पेट भरने तक का संकट आ खड़ा हुआ |  स्वरोजगार पर आधारित पेशेवर वर्ग भी उस दौरान तकलीफ  सहने बाध्य हुआ | व्यापारी और उद्योगपति को तो दोहरी मार पड़ी | रोज कमाने वाला उद्यमी  हाथ पर हाथ धरे बैठने मजबूर हो गया | ऐसे में जीएसटी के रूप में आने वाला कर घटता गया | लेकिन ज्योंही कोरोना का प्रकोप कम हुआ त्योंही भारतीय अर्थव्यवस्था जिस तेज गति से आगे बढ़ी वह वाकई उत्साहवर्धक है | बीते साल के उत्तरार्ध से हर महीने जीएसटी की आय में हुई उत्तरोत्तर वृद्धि से इस बात की पुष्टि होने लगी कि उद्योग , व्यापार और उपभोक्ता के बीच का आर्थिक व्यवहार अपने मूल स्वरूप में आ चुका है | कार और दोपहिया वाहनों की अचानक बढ़ी मांग का कारण भी यही समझ में आया कि महामारी के दौरान लंबित पड़ी मांग बाजार खुलते ही सामने आई | ऐसा ही कुछ पर्यटन के क्षेत्र में महसूस किया गया | कश्मीर घाटी में बीते कुछ महीनों में सैलानियों की संख्या ने घाटी की अर्थव्यवस्था को मानो प्राणवायु प्रदान कर दी | विवाह समारोह में अतिथियों की संख्या पर लगी पाबंदी हट  जाने से भी इस व्यवसाय से जुड़े कारोबारियों के चेहरे पर चमक लौटी | गत वर्ष दीपावली पर उपभोक्ताओं के उत्साह ने भी आर्थिक जगत की  खुशियां बढ़ाईं | लेकिन इस सबके साथ ही महंगाई भी जिस तेजी से बढ़ी वह ऐसा  नकारात्मक पक्ष है जो आम उपभोक्ता की खुशियों को कम करने का काम कर रहा है | ये अच्छी बात है कि जनता ने बीते दो वर्ष के दौरान आई असाधारण परिस्थितियों के दौरान पूरी तरह धैर्य और अनुशासन का परिचय दिया | इसके साथ ही ये भी कहना होगा कि सरकार ने भी उस अभूतपूर्व संकट के दौरान अपने कर्तव्य का पालन बखूबी करते हुए लोगों का मनोबल बनाये रखा , वरना अराजकता फैलते देर न लगती | बहरहाल अब जब सरकार के पास बीते वित्तीय वर्ष में करों से अनुमानित आय का आंकड़ा अपेक्षा से अधिक होने की वजह से सुविधाजनक स्थिति बन गई तब ये जनापेक्षा भी है और सरकार का नैतिक दायित्व भी कि  महंगाई से हलाकान हुई जा रही जनता की तकलीफों पर राहत की बरसात की जाए | प्रधानमंत्री ने बीते सप्ताह राज्यों से पेट्रोल – डीजल पर करों में कमी करने की गुजारिश की थी | उस पर महाराष्ट्र और प.बंगाल से तो काफी तीखी प्रतिक्रिया आई किन्तु अब तक भाजपा शासित किसी राज्य ने भी प्रधानमंत्री की बात का मान रखते हुए  करों में कटौती करने की सौजन्यता प्रदर्शित नहीं की | लेकिन मौजूदा सन्दर्भ में बात  केवल पेट्रोल – डीजल तक ही सीमित नहीं रही क्योंकि आम जनता के दैनिक उपयोग में आने वाली तकरीबन हर चीज के दाम बेतहाशा बढ़े हैं | ये देखते हुए ये आवश्यक प्रतीत होता है कि आसमान छू रही महंगाई से जन साधारण को राहत दिलवाने कुछ न कुछ किया जाना चाहिये | आर्थिक मामलों के जानकार इस तथ्य से भली- भाँति  परिचित होंगे कि जीएसटी की रिकॉर्ड तोड़ वसूली दरअसल महंगाई की वजह से संभव हो सकी क्योंकि यह कर प्रणाली  मूल्यों की घट -  बढ़ पर आधारित है | प्रधानमंत्री ने राज्यों से पेट्रोल  – डीजल पर कर घटाने  का जो आग्रह किया वह सर्वथा उचित है लेकिन दैनिक उपयोग की तमाम अन्य चीजें भी हैं जिन पर करों में  कटौती करते हुए केंद्र सरकार राज्यों पर नैतिक दबाव बना सकती है | इस बारे में एक बात समझ लेनी चाहिए कि किसी  भी अर्थव्यवस्था की मजबूती तभी तक कायम रहती है जब तक बाजार में मांग रहे | उस दृष्टि से यदि सरकार चाहे केंद्र की हो या राज्य की , उसे ये देखना चाहिए कि बाजार में गतिशीलता बनाये रखने के लिए आम उपभोक्ता की ज़िन्दगी तनावरहित और सरल हो | वर्तमान स्थितियों में ये आवश्यक लगता है कि लोगों  की क्रय शक्ति किसी भी स्थिति में कम न होने दी जाये और उसके लिए सरकार को महंगाई से निजात दिलवाने के लिए जो कुछ भी जरूरी हो करना चाहिए | भले ही  ऐसा करने से जीएसटी की वसूली पर असर पड़े परन्तु उपभोक्ता की बचत अंततः घूम - फिरकर बाजार में ही आयेगी जिससे करों की आय में फर्क शायद ही पड़े | ये सही समय है जब सरकार जनता के मन में इस विश्वास को मजबूत  करे कि वह सबका साथ और सबका विकास के अपने वायदे को भूली नहीं है  | भले ही गरीब वर्ग को मुफ्त खाद्यान्न देकर वह अपने  कर्तव्य का निर्वहन कर रही है किन्तु समाज के दूसरे वर्गों की भी कुछ अपेक्षाएं हैं जिनके बारे में उसे संजीदगी के साथ विचार करना चाहिए | सर्वाधिक ध्यान देने योग्य बात ये है कि भारत का मध्यम वर्ग ही अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और जीएसटी की बढ़ती आय का बड़ा श्रेय उसी के खाते में जाता है | उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्द ही सरकार की तरफ से ऐसा कुछ किया जावेगा जिससे आम जनता को भीषण गर्मी में भी ठंडक का एहसास हो सके |

- रवीन्द्र वाजपेयी