Tuesday, 4 October 2022

इंदौर से प्रेरणा लें म.प्र के बाकी शहर : राज्य स्वच्छता सर्वेक्षण भी शुरू हो



हाल ही में 2022 के राष्ट्रीय स्वच्छता सर्वेक्षण के नतीजे आये जिनमें म.प्र के इंदौर को लगातार देश के सबसे साफ़ - सुथरे शहर का पुरस्कार तो मिला ही म.प्र को भी सबसे स्वच्छ प्रदेश चुने जाने का गौरव हासिल हुआ | ये निश्चित रूप से गौरव की बात है | शुरुआत में भोपाल ने दूसरा स्थान हासिल किया था | यद्यपि इस साल वह पीछे चला गया परन्तु अभी भी छटवें स्थान पर उसका बना रहना संतोषजनक है | प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने जिन प्रकल्पों को प्रमुखता से हाथ में लिया उनमें स्वच्छता भी है | उसकी आदत पैदा करने के लिए उन्होंने खुद भी प्रतीकात्मक तौर पर झाड़ू उठाई | यद्यपि उस मुहिम  का कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ये कहते हुए मजाक उड़ाया था कि जिन युवाओं के हाथ में काम देना था उनको प्रधानमंत्री ने झाड़ू पकड़ा दी | लेकिन विरोधी भी श्री मोदी के जिन कार्यों की प्रशंसा करते हैं उनमें शौचालय और स्वच्छता है | इसी तरह जब स्वच्छता के सर्वेक्षण को  प्रतिस्पर्धा की शक्ल दी गई तब भी उसकी व्यवहारिकता पर उंगलिया उठीं | लेकिन धीरे – धीरे यह प्रयास रंग दिखाने लगा | हालाँकि इसके साथ भी वे सभी विसंगतियां जुडी हुईं हैं जो सरकारी कार्यप्रणाली की पहिचान होती हैं | लेकिन  इस सर्वेक्षण की वजह से  न सिर्फ प्रशासन अपितु आम जनता में भी शहर को स्वच्छ रखने की मंशा पैदा हुई है | पहले सर्वेक्षण में जहां इंदौर को सबसे साफ़ शहर का दर्जा हासिल हुआ वहीं म.प्र का ही दमोह सबसे गंदे शहरों की सूची में अव्वल आया | ये निश्चित रूप से बड़ा विरोधाभास था क्योंकि उद्योग – व्यवसाय में आगे रहने और प्रदेश में  सबसे ज्यादा आबादी वाला शहर होने से इंदौर में  गंदगी ज्यादा अपेक्षित थी जबकि छोटे से दमोह को उस दृष्टि से स्वच्छ होना था | लेकिन नतीजा इसके विपरीत निकलने के बाद इंदौर ने जहां अपनी बादशाहत बनाए रखी वहीं दमोह ने भी सबसे गंदे शहर की शर्मिन्दगी से उबरने में सफलता हासिल की | हालाँकि उसे संतोषजनक नहीं कहा जा सकता लेकिन इस सर्वेक्षण से एक बात तो हुई कि स्वच्छता भी किसी शहर के विकास का पैमाना बन गयी | कुछ दशक पहले गुजरात के औद्योगिक शहर सूरत में प्लेग महामारी फ़ैली | इसका प्रमुख कारण चूहों को माना जाता है जो कचरे के ढेर के कारण पनपते हैं | महामारी पर नियन्त्रण होने के बाद सूरत नगर निगम के आयुक्त ने शहर की साफ - सफाई को अभियान बनाया और रात के समय कचरा उठाने के साथ ही सड़कों की सफाई को प्राथमिकता दी | उस कोशिश का नतीजा बेहद उत्साहवर्धक निकला और देखते ही देखते सूरत साफ़ - सफाई के मामले में नजीर बन गया | हालाँकि उस समय तक स्वच्छता सर्वेक्षण जैसी कोई बात नहीं सोची गयी थी | हो सकता है श्री मोदी के मन में भी सूरत का उदाहरण रहा हो जिससे प्रेरित होकर उन्होंने स्वच्छता को राष्ट्रीय अभियान की शक्ल दी | बहरहाल इंदौर की जनता को भी बधाई दी जानी  चाहिए जिसने एक सरकारी अभियान को प्रभावी जन अभियान में बदल दिया | इंदौर जाने वाले बताते हैं कि वहां के लोग अपने शहर को प्राप्त हुए इस गौरव को सुरक्षित रखने हेतु बेहद सतर्क रहते हैं | बाहर से आने वालों द्वारा सड़क पर कुछ भी फेंके जाने पर ऑटो या टैक्सी चालक टोक देता है | इससे  साबित होता है कि किसी सरकारी कार्यक्रम को सफल बनाने में केवल सरकारी मशीनरी और धन ही नहीं वरन आम जनता की सक्रिय भागीदारी नितांत  आवश्यक  है | इंदौर के साथ ही मैसूर जैसे और भी शहर हैं जिनकी जनता ने स्वच्छता सर्वेक्षण को अपनी परीक्षा मानकर उसमें सफलता हासिल करने जैसा प्रयास किया | इस बारे में सिंगापुर के निर्माता कहे जाने वाले ली कुआन यी का नाम लेना प्रासंगिक होगा | ब्रिटिश गुलामी में रहा सिंगापुर दूसरे महायुद्ध में जापान के कब्जे में चला गया | बाद में अमेरिका ने इस पर भारी बमबारी कर इसे मलबे में बदल दिया | लेकिन आजादी मिलने और मलेशिया से पूरी तरह अलग होने के बाद ली कुआन यी ने इस देश के पुनर्निर्माण के लिये सबसे पहले खुद झाड़ू उठायी और उनको देखकर पूरा देश साथ खडा हो गया | कभी झुग्गियों का शहर रहा सिंगापुर आज दुनिया के सबसे स्वच्छ और विकसित देश के तौर पर जाना जाता है | मुम्बई से भी आकार में छोटे इस शहरनुमा देश में भारत से ज्यादा पर्यटक आते हैं | इस लिहाज से स्वच्छता को पुरस्कार के साथ ही संस्कार से जोड़ना समय की मांग है | वैसे भी भारतीय जीवन शैली रोजमर्रे की ज़िन्दगी में भी स्वच्छता की  पक्षधर रही है | गरीब से गरीब परिवार के घर के सामने की लिपाई - पुताई देखकर ये लग जाता था कि स्वच्छता हमारे संस्कारों का अभिन्न हिस्सा रही है | लेकिन विकास  की अंधी दौड़ के साथ शुरू हुआ शहरीकरण गंदगी की समस्या का आधार बनता गया | धीरे – धीरे ये बीमारी ग्रामीण अंचलों तक फ़ैल गई और आज शहरों में जिस तरह प्लास्टिक बिखरी दिखती है वही आलम कस्बों और गावों का है | ये कहना भी गलत नहीं होगा कि प्लास्टिक से बनी चीजों ने गरीब – अमीर के साथ ही शहर और गाँवों का भेद मिटाकर रख दिया | उस दृष्टि से स्वच्छता के लिए शुरू की गई मुहिम केवल कचरा हटाने तक सीमित न रहकर देश के विकसित और व्यवस्थित स्वरूप को दुनिया के सामने रखने का प्रयास है | राष्ट्रीय स्तर पर सबसे स्वच्छ शहर और प्रदेश का गौरव हासिल होने के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान  को चाहिए कि स्वच्छता सर्वेक्षण जैसा अभियान प्रादेशिक स्तर पर  भी शुरू किया जावे | ऐसा होने से राष्ट्रीय सर्वेक्षण के समय म.प्र के अनेक शहर  बेहतर  परिणाम देने में सफल साबित होंगे | स्वच्छ रहने के संस्कार का विकास होने से आम  जनता की मानसिकता में भी सकारात्मक बदलाव आये बिना नहीं रहेगा | म.प्र के लोगों  को तो स्वच्छता की सीख के लिये सिंगापुर जाने की जरूरत ही नहीं है क्योंकि उनके पास तो इंदौर सबसे अच्छा उदाहरण है जिसने स्वच्छता को अपनी पहचान बना लिया है |

-रवीन्द्र वाजपेयी



Monday, 3 October 2022

राजस्थान में शह पर शह के खेल में बाजी तेजी से पलट रही



 राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत  नेतागिरी करने से पहले अपने पिता के साथ जादू किया करते थे | उनके करीबी आज भी उनको जादूगर कहकर पुकारते हैं | हालाँकि संगठन के प्रारंभिक स्तर से ऊपर उठकर राष्ट्रीय पदों को सुशोभित करने के साथ ही मुख्यमंत्री तक की उनकी यात्रा उनके राजनीतिक कौशल और परिश्रम का परिणाम है लेकिन इसी के साथ उन्हें गांधी परिवार का भरपूर समर्थन और सहयोग भी मिला | और इसी के चलते उनको कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया जा रहा था | लेकिन अचानक जादुई अंदाज में सब कुछ उलट - पुलट हो गया | अपना त्यागपत्र सोनिया गांधी के पास रखा होने की  बात कहने वाले श्री गहलोत ने मुख्यमंत्री पद से हटाये जाने की भनक लगते ही जिस तरह के पांसे चले उससे न सिर्फ गांधी परिवार वरन पूरी कांग्रेस पार्टी हतप्रभ  रह गई |  यद्यपि उसके बाद उन्होंने दिल्ली जाकर सोनिया गांधी  से क्षमा मांगने के बाद अपने भविष्य का निर्णय उन्हीं को सौंपने का बयान भी दे डाला जिससे लगने लगा कि अध्यक्ष बनने से बचने के बावजूद उनका मुख्यमंत्री पद सुरक्षित रहेगा | लेकिन जिस तरह की खबरें आ रही हैं उनके अनुसार राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा  राजस्थान में गहलोत समर्थक कांग्रेस विधायकों द्वारा पर्यवेक्षकों के रहते हुए की गई अनुशासनहीनता से भन्नाये होने से उन्हें किसी भी कीमत पर बर्दाश्त करने राजी नहीं है | हालाँकि बीते कुछ समय से पार्टी के भीतर जो कुछ हो रहा है उसके बाद अब ये चर्चा  होने लगी है कि सोनिया जी की राहुल तथा प्रियंका के साथ विभिन्न मुद्दों पर मतभिन्नता बढ़ी है | राजस्थान में माताजी जहां श्री गहलोत को बनाये रखने की पक्षधर रहीं हैं वहीं  बेटा और बेटी सचिन पायलट की ताजपोशी के लिए अड़े हुए हैं | कहा जा रहा है यदि उनकी जगह किसी और को मुख्यमंत्री बनाये जाने की बात आती तब श्री गहलोत एक व्यक्ति एक पद के फार्मूले के मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष बनने राजी हो जाते | लेकिन जब उन्हें लगा कि उनके साथ हाथ की सफाई हो रही है तब उन्होंने भी वह कर दिखाया जो उनके खुद के अनुसार कांग्रेस में अभूतपूर्व था | दिल्ली में माफीनामा पेश   किये जाने के बाद उनको लगने लगा था कि भले ही उन्होंने गांधी परिवार का विश्वास खो दिया लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाने में वे कामयाब हो गये | लेकिन बीते दो तीन दिनों के भीतर जिस तरह के संकेत आये उनके बाद उनके सुर बदलने लगे | गत दिवस उन्होंने सांकेतिक शैली में पर्यवेक्षकों की आड़ में हाईकमान पर निशाना साधते हुए जिस तरह की टिप्पणियाँ कीं उससे लगता है वे आने वाले खतरों के प्रति सतर्क हो उठे हैं | उनका ये कहना बेहद अर्थपूर्ण है कि 102 विधायकों के अभिभावक होने के नाते उनके हितों का संरक्षण करना उनका फर्ज़ है | यहाँ तक तो ठीक है लेकिन जिस तरह मुख्यमंत्री ने पत्रकारों के सामने पायलट समर्थक विधायकों की केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ मिलकर सरकार गिराने की कथित योजना का बार - बार जिक्र किया , वह राहुल और प्रियंका के लिए एक तरह की चुनौती है | कांग्रेस के भीतर चल रही चर्चाओं के अनुसार श्रीमती गांधी जहाँ राजस्थान के  मामले में फूंक – फूंककर कदम बढ़ाने की पक्षधर हैं वहीं राहुल – प्रियंका का मत है कि श्री पायलट की ताजपोशी अविलम्ब की जानी चाहिए जिससे श्री गहलोत को संभलने का अवसर न मिले | इसके पीछे सोच ये है कि मुख्यमंत्री बदलने की कार्रवाई शुरू होते ही उनके विधायक भी पाला बदलने में देर नहीं करेंगे | इसी रणनीति के अंतर्गत श्री गहलोत और उनके समर्थकों द्वारा कही गईं तीखी बातों के जवाब में न तो श्री पायलट ने जुबान खोली और न ही उनके साथ खड़े विधायकों ने | लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव के पहले ये सब होगा या उस तक रुकने की श्रीमती गांधी की सलाह मानी जावेगी ये अनिश्चित है | उधर अध्यक्ष के चुनाव में भी श्री गहलोत की जगह दिग्विजय सिंह को उतारने की जो कोशिश राहुल द्वारा की गई थी उसे रातों - रात जिस तरह विफल किया गया उससे भी गांधी परिवार के भीतर मतभेद  सामने आया है | संभवतः यही देखकर श्री गहलोत ने भी अचानक तेवर  बदल डाले |  गत दिवस उनके द्वारा खोला गया मोर्चा सीधे – सीधे आला कमान को भेजा गया  सन्देश है कि श्री पायलट द्वारा सत्ता पलटने की पिछली कोशिश के दौरान जिन विधायकों ने उनके प्रति अपनी निष्ठा साबित की वे उनके हितों पर आघात करने वाले किसी भी व्यक्ति को मुख्यमंत्री बर्दाश्त नहीं करेंगे | उन्होंने आलाकमान से  आने वाले वाले पर्यवेक्षकों को भी नसीहत दे डाली कि उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष के प्रतिनिधि के तौर पर गरिमामय आचरण करना चाहिए | राजस्थान के घटनाचक्र पर नजर रख रहे विश्लेषक इस आशंका  को भी टटोल रहे हैं कि विधानसभा अध्यक्ष सी.पी, जोशी को दिए गए विधायकों के स्तीफे मंजूर हो सकते हैं  | ऐसा कहा जा रहा है श्री पायलट को गद्दीनशीन न कर पाने की खुन्नस में राहुल राज्य में मध्यावधि चुनाव करवाने की  नौबत पैदा करने तक की हद तक जाने से परहेज नहीं करेंगे | कुल मिलाकर राजस्थान कांग्रेस के गले में हड्डी की तरह जाकर फंस गया है | निश्चित रूप से इसके कारण एक तरफ तो राहुल की यात्रा पर असर पड़ रहा है वहीं दूसरी तरफ पार्टी अध्यक्ष के चुनाव के जरिये आंतरिक लोकतंत्र का डंका पीटने की कोशिश भी मजाक बनकर रह गई है | हालाँकि इस बारे में पक्के तौर पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी किन्तु इतना तय है कि अशोक गहलोत विशुद्ध जादूगर की तरह नए – नए करतब दिखा रहे हैं | कुछ समय पहले तक उन्हें गांधी परिवार का सबसे विश्वस्त कांग्रेस नेता माना  जाता था लेकिन महज कुछ दिन के भीतर वे सबसे बड़े गद्दार करार दिए जा रहे हैं | शह पर शह का ये दौर कब तक चलेगा  और अंत में किसकी मात होगी ये आने वाले दिनों में साफ़ हो जाएगा | फ़िलहाल तो बाजी तेजी से पलटी खा रही है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 1 October 2022

सबके विश्वास का दावा तब तक अधूरा है जब तक ...



अपने देश में राजनीति की चर्चा ज्यादा होने से  अन्य विषय दबकर रह जाते हैं | यद्यपि महंगाई और  बेरोजगारी का जिक्र  छोटे – बड़े सभी करते हैं लेकिन देश की माली हालत बेहतर बनाने के लिए उठाये जाने वाले कदमों को राजनीति जिस तरह रोकती है उस तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता |  दूरगामी आर्थिक लक्ष्य निर्धारित करने में शासनतंत्र इसलिए विफल रहता है क्योंकि जमीनी सच्चाई की बजाय तात्कालिक फायदों पर ही ध्यान केन्द्रित रखा जाता है |  पहले तो चुनाव पांच साल बाद आते थे इसलिए  नीतियों का क्रियान्वयन बीरबल की खिचड़ी जैसा होता था | पंचवर्षीय योजनाओं के जरिये विकास के लक्ष्य प्राप्त करने जो विलम्ब होता रहा उसकी वजह से अर्थव्यवस्था  भारतीय रेल की  तरह विलम्ब से चलने की आदी हो गई |  लेकिन बीते तीन दशक से आर्थिक मामले भी राजनीति के समानांतर चर्चा में आने लगे हैं | शिक्षा के प्रसार के अलावा सूचना तंत्र , विशेष रूप से सोशल मीडिया के फैलाव के कारण अब आम जनता भी अपनी खुशी और नाराजगी के साथ ही  अपेक्षाओं  को  खुलकर व्यक्त करने लगी है | सबसे बड़ी बात जिसकी वजह से राजनेता आर्थिक मामलों में रूचि लेने लगे  वह है हर समय चुनावी मौसम  | एक भी साल ऐसा नहीं जाता जिसमें किसी न किसी राज्य में चुनाव न होता हो | गठबंधन राजनीति के उदय के उपरान्त सभी क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक दलों को अपने दम पर या फिर साझेदार के तौर पर सत्ता सुख प्राप्त हुआ है | लेकिन विभिन्न विचारधाराओं के बावजूद  सभी का आर्थिक चिंतन कमोबेश एक समान हो चुका है | यहाँ तक कि वामपंथी दल भी पूंजी आधारित नीतियों को लागू करने में नहीं हिचकते | आम आदमी पार्टी ने मुफ्त बिजली और पानी देकर सत्ता हासिल की तो  मोदी सरकार ने मुफ्त मकान , रसोई गैस और अनाज के बलबूते अपने जनाधार को सुदृढ़ कर लिया | चुनाव प्रचार के दौरान  गांधी , लोहिया , दीनदयाल और मार्क्स के अनुयायी  विचारधारा के प्रचार  की बजाय मुफ्त उपहारों की प्रतिस्पर्धा करते नजर आते हैं | सबसे बड़ी बात ये है कि तमाम दावों के बाद भी देश और प्रदेश की सरकारों का खजाना खाली ही है | कर्ज के बोझ से झुके कन्धों के बावजूद जिस तरह की दरियादिली दिखाई जा रही है वह अर्थशास्त्र के मान्य सिद्धांतों के सर्वथा विरुद्ध है | चार्वाक ऋषि ने हजारों साल पहले कर्ज लेकर घी पीने का सुझाव  दिया था | हमारे देश में सरकारें उसी राह पर चलते हुए कर्ज लेकर घी बांटने की रईसी दिखा रही हैं | गरीबी दूर करने के नारे पर 1971 में  लोकसभा चुनाव जीता गया | उसके पहले बैंक राष्ट्रीयकरण और राजा – महाराजाओं के प्रीवीपर्स समाप्त कर आम जनता के मन में आशाएं जगाई जा चुकी थीं | ये कहना गलत  न होगा कि उसके पहले तक के चुनाव में नेता का चेहरा और भावनात्मक अपीलें जादुई असर मतदाता पर छोड़ा करती थीं | नेहरु जी और इंदिरा जी की एक सभा मात्र से ही चुनावी नैया आसानी से पार लग जाती थी | लेकिन 1971 में गरीबी  हटाओ नारे का चमत्कारी असर हुआ | हालाँकि उसके बाद कुछ दशक तक राजनीति को  सम – सामयिक परिस्थितियां प्रभावित करती रहीं किन्त्तु 1991 में पी.वी . नरसिम्हा राव और डा. मनमोहन सिंह की जोड़ी ने अर्थव्यवस्था को  आम विमर्श का विषय बनाया | इसकी वजह से  मध्यम वर्ग के मन में उम्मीदें जगाने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह आज तक जारी है |  देश में होने वाली आर्थिक हलचलों के पीछे इसी वर्ग की सोच में आया परिवर्तन है | कुल मिलाकर ये कहना गलत न होगा कि राजनीति करने वाले जहां मतदाता को ग्राहक समझकर  लुभाने की कोशिश करने लगे  हैं वहीं  मतदाता भी उपभोक्तावादी मानसिकता के वशीभूत मतदान करते समय ज्यादा छूट पर ध्यान देता है | ये प्रवृत्ति जिस तेजी से समूचे राजनीतिक प्रतिष्ठान पर हावी हो चुकी है उसकी वजह से एक तरफ हम दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था के गौरव की अनुभूति में डूबे हैं वहीं दूसरी तरफ हमारी मुद्रा तेजी से गिर रही है | वैकल्पिक ऊर्जा के क्षेत्र में तेज गति से कदम बढ़ाये जाने के बावजूद कच्चे तेल का आयात अर्थव्यवस्था का  तेल निकालने की वजह बना हुआ है | उधर निर्यात के मोर्चे पर आगे बढ़ने की रफ़्तार अपेक्षानुरूप न होने से रूपये की गिरती कीमत का लाभ लेना भी सम्भव नहीं हो रहा | हालाँकि हमारा बड़ा उपभोक्ता बाजार औद्योगिक उत्पादन को खपाने में सहायक है | लेकिन चौतरफा चमक के बावजूद यदि 80 करोड़ लोगों को इसलिए मुफ्त या सस्ता अनाज देने की मजबूरी बनी हुई है कि अन्यथा वे अपना पेट नहीं भर सकेंगे , तब ये सोचना पड़ जाता है कि या तो आर्थिक नियोजन दिशाहीन है या फिर उसे तय करने वाले सच्चाई से आँखें चुराते हैं | इसमें दो राय नहीं है कि कोरोना महामारी का मुकाबला करने में हम पूरी तरह सफल रहे | और ये भी कि वैश्विक उथलपुथल से हमारी अर्थव्यवस्था काफी हद तक बची रही | यूक्रेन संकट से उत्पन्न हालात में भी सुलझी हुई कूटनीति की वजह से नुकसान कम से कम हुआ | देश में आर्थिक गतिविधियां भी रफ़्तार पकड़  चुकी हैं | चुने हुए क्षेत्रों में रोजगार सृजन भी हो रहा है | इस वर्ष मानसून की मेहरबानी से खेतों से भी अच्छी खबर आ रही है | बावजूद इसके महंगाई का प्रकोप तेजी से बढ़ता जा रहा है | कोरोना काल में तो उत्पादन घटने पर दाम बढ़ाये जाने का औचित्य भी था लेकिन स्थितियां सामान्य होने के बाद भी उनका और बढ़ता जाना चौंकाता है | चालू वित्तीय वर्ष में जीएसटी की मासिक वसूली कीर्तिमान बना रही है तो उसका कारण पेट्रोल – डीजल सहित रोजमर्रे की चीजों की आसमान छूती कीमतें हैं | वोटों के लालच में मुफ्त , बिजली , पानी , खाद्यान्न के अलावा अनेक चीजों का मुफ्त वितरण जनहित में कहा जा सकता है किन्तु सरकार को उस तबके पर भी देना चाहिए जो  भरपूर टैक्स देने के बावजूद पूरी तरह उपेक्षित ही नहीं अपितु स्वयं को प्रताड़ित भी महसूस करता है | हाल ही में केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनधारियों का महंगाई भत्ता बढ़ा दिया गया | साथ ही मुफ्त खाद्यान्न योजना भी तीन माह के लिए बढ़ गई | लेकिन इससे इतर जो वर्ग है उसे भी तो कुछ राहत मिलनी चाहिए थी | चाहे सरकार के निर्णय हों या रिजर्व बैंक की नीतियां उनका भार जिस करदाता पर पड़ता है उसके बारे में सोचे बिना सबका साथ , सबका विकास के साथ सबका विश्वास का नारा बेमानी रहेगा |

-रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 30 September 2022

कांग्रेस का मौजूदा संकट गांधी परिवार के प्रति असंतोष का परिणाम



 कांग्रेस के भीतर हालिया राजनीतिक घटनाचक्र जिस तेजी से घूमा वह पार्टी के लिए नई बात है क्योंकि अब तक  छोटे से छोटे निर्णय को भी गांधी परिवार के जिम्मे छोड़ने की परिपाटी रही है | राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से बचने के लिये राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने जिस तरह का खेल रचा उसके बाद  पूरे देश में कांग्रेसजन उनको गद्दार बताने लगे |  बीते रविवार जयपुर में आलाकमान द्वारा भेजे गए पर्यवेक्षकों के साथ मुख्यमंत्री समर्थक विधायकों और मंत्रियों ने बहुत ही अपमानजनक व्यवहार किया परन्तु पार्टी नेतृत्व ने केवल तीन नेताओं को नोटिस देने की औपचारिकता निभाई | हालाँकि सर्वविदित है कि बिना श्री गहलोत के किसी मंत्री  या विधायक की हिम्मत नहीं थी जो  पर्यवेक्षकों को ठेंगे पर रखते हुए विधायक दल की बैठक का बहिष्कार करता  | बहरहाल सोनिया गांधी से माफी मांगने के बाद श्री गहलोत ने  अध्यक्ष का चुनाव नहीं लड़ने की घोषणा करते हुए ये भी कह  दिया कि उन्होंने मुख्यमंत्री बने रहने का फैसला श्रीमती गांधी पर ही छोड़ दिया है | दूसरी तरफ दिग्विजय सिंह राहुल गांधी की भारत  जोड़ो यात्रा छोड़कर दिल्ली आ पहुंचे और आज नामांकन भरने वाले थे  | कहा जा रहा था  कि श्री गहलोत के पीछे हट जाने के बाद गांधी परिवार के विश्वस्त होने के कारण उन्हें ये दायित्व सौंपा जायेगा |  गांधी परिवार का ठप्पा लगा होने से उनकी जीत में संदेह भी नहीं था  | लेकिन बात यहीं नहीं थमी क्योंकि जी 23 के नेता आनंद शर्मा के घर हुए जमावड़े में मनीष तिवारी , पृथ्वीराज चव्हाण , भूपिंदर सिंह हुड्डा ने  तय  किया कि  गांधी परिवार की कठपुतली प्रत्याशी का विरोध किया जावेगा | संभवतः मनीष को असंतुष्ट गुट मैदान में उतारेगा | इस बैठक के बाद आनंद शर्मा ने  दिल्ली में श्री गहलोत  के ठिकाने पर जाकर उनसे मुलाकात भी की | यदि असंतुष्ट गुट श्री तिवारी अथवा किसी अन्य को उतारता है तब मुकाबला रोचक  हो जायेगा | इसीलिए आनंद शर्मा और  श्री गहलोत की भेंट को लेकर पार्टी के भीतर काफी सुगबुगाहट है क्योंकि मुख्यमंत्री बने रहने का फैसला श्रीमती गांधी पर छोड़ने की बात कहने के बावजूद  श्री गहलोत ने पद छोड़ने का कोई  संकेत न देकर अनिश्चितता बनाये रखी है | श्रीमती गांधी ने उन्हें मिलने के  लिए दिन भर जिस तरह से इंतजार करवाया उससे  उनको निश्चित रूप से नीचा देखना पड़ा | लेकिन श्री पायलट को भी श्रीमती गांधी की तरफ से कोई आश्वासन मिलने के संकेत नहीं आये | श्री गहलोत ने माफीनामे रूपी चाल से अपनी गद्दी बचाने का जो प्रयास किया वह कितना कारगर होगा ये फ़िलहाल स्पष्ट नहीं है | लेकिन उनको  गांधी परिवार की नजरों में गिरने का एहसास हो गया  है क्योंकि कहाँ तो उनको पार्टी का मुखिया बनाया जा रहा था और कहाँ श्रीमती गांधी ने उन्हें मिलने का समय देने में 12 घंटे लगाये | ये भी  हो सकता है कि अध्यक्ष का चुनाव होने तक गांधी परिवार राजस्थान में यथास्थिति बनाये रखे ताकि गहलोत खेमा गड़बड़ न कर पाए | लेकिन आनंद शर्मा का गत दिवस दिल्ली में उनसे मिलना नयी पटकथा का आधार बन सकता है | इसी के साथ ये खबर भी आ गई कि दिग्विजय सिंह की बजाय गांधी परिवार ने मल्लिकार्जुन खडगे पर दांव लगाने की सोची है क्योंकि श्री सिंह अपने विवादस्पद बयानों के कारण पार्टी को मुसीबत में डालते रहे हैं | और  कल तक जोर - शोर से मैदान में उतरने का हौसला दिखा रहे दिग्विजय आज श्री खडगे के प्रस्तावक बनने राजी हो गये | नामांकन का आज आखिरी दिन है | चूंकि शशि थरूर ने भी चुनाव लड़ने का पक्का इरादा जताया है इसलिए 8 अक्टूबर को नाम वापसी के बाद  ही स्थिति साफ़ होगी | बहरहाल इस समूचे घटनाक्रम से कांग्रेस कितनी ताकतवर हुई ये तो समय बताएगा लेकिन गांधी परिवार की धाक को जबरदस्त धक्का पहुंचा है |  एक तरफ तो राहुल गांधी आंतरिक लोकतंत्र लाने की बात करते हैं दूसरी तरफ उनका परिवार अपनी मर्जी के विरुद्ध एक बात भी  सहने राजी नहीं है | राजस्थान में जो हुआ उसका ठीकरा  कुछ विधायकों और मंत्रियों पर फूटे या श्री गहलोत पर परन्तु  जिस तरह से केन्द्रीय पर्यवेक्षकों की उपेक्षा हुई वह सीधे – सीधे इस बात का संकेत थी कि प्रथम परिवार की अवहेलना करने वाली मानसिकता पार्टी में जड़ें जमा चुकी है | शायद यही सोचकर दिग्विजय से कहलवाया गया कि जो भी अध्यक्ष बने उसे गांधी परिवार के अधीन रहकर ही काम करना होगा | दरअसल कांग्रेस में आज जो आंतरिक खींचतान है वह सैद्धांतिक न होकर गांधी परिवार के वर्चस्व के प्रति उपजी असहमति का परिणाम है | जी 23 में शामिल नेताओं ने कभी भी पार्टी की नीतियों से नाराजगी नहीं जताई | उनकी मांग सदैव ये रही कि संगठन के विधिवत चुनाव कराये जावें | कांग्रेस कार्यसमिति में होने वाले मनोनयन पर भी उँगलियाँ उठती रही हैं | ऐसे में जब श्री गांधी भारत जोड़ो यात्रा में व्यस्त हों तब अध्यक्ष के चुनाव के समानांतर राजस्थान में पैदा हुआ राजनीतिक संकट केवल श्री गहलोत और श्री पायलट के बीच का शीतयुद्ध नहीं  अपितु गांधी परिवार की पसंद को खुलकर नकारे जाने के दुस्साहस के तौर पर सामने आया है | गांधी परिवार से अध्यक्ष नहीं बनाने का राहुल का निर्णय वाकई लाभदायक होता लेकिन चुनाव शुरू होने के पहले ही जिस तरह की घटनाएँ घट गईं उनकी वजह से सारा किया धरा व्यर्थ हो रहा है | श्री गहलोत का अध्यक्ष बनना सुनिश्चित होने के बाद जिस तरह से बाजी पलटती जा रही है वह आज नहीं तो कल जी 23 के विस्तार  के रूप में सामने आ सकती है | और यदि इस गुट की तरफ से कोई मैदान में उतरा तो बड़ी बात नहीं 1969 में हुए कांग्रेस विभाजन की कहानी फिर दोहराई जाए | संयोग ये है कि तब भी उसका कारण गांधी परिवार था और मौजूदा संकट भी उसी के इर्द  - गिर्द मंडरा रहा है |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 29 September 2022

उधमपुर में धमाके : विधानसभा चुनाव में व्यवधान की कोशिश



कल सुबह इस्लामिक संगठन पी.एफ.आई पर प्रतिबंध लगा और कल ही रात और  आज सुबह जम्मू के निकट उधमपुर में बम विस्फोट हुए | हालाँकि इसमें किसी की मौत की खबर तो नहीं हैं | कश्मीर घाटी के प्रवेश द्वार पर किये गये धमाके पी.एफ.आई की करतूत है या किसी अन्य आतंकवादी संगठन की , ये तो जांच में पता चल सकेगा लेकिन ऐसे समय जब जम्मू कश्मीर में होने जा रहे विधानसभा चुनाव के कारण प्रशासनिक और राजनीतिक गतिविधियाँ तेजी पर हों तब हिन्दू बहुल ऊधमपुर में हुए बम विस्फोट साधारण नहीं माने जा सकते | स्मरणीय है अबकी बार वहां के राजनीतिक समीकरण काफी बदले हुए होगे | मसलन कांग्रेस  के सबसे बड़े नेता गुलाम नबी आजाद ने पार्टी छोड़ने के बाद अपना नया दल गठित कर लिया है | और जो नया परिसीमन हुआ उसके अनुसार जम्मू अंचल में सीटों की संख्या बढ़ने से मुस्लिम बहुल घाटी का वर्चस्व पहले जैसा नहीं रहेगा | इसके अलावा केंद्र सरकार ने वाल्मीकि समाज के उन लोगों को मताधिकार दे दिया जो तीन पीढ़ी पहले पंजाब से सफाई मजदूर के तौर पर लाये गये थे |  उनके परिजन सफाई कर्मी की सरकारी नौकरी तो पाते रहे लेकिन आज तक इस वर्ग को मत देने का अधिकार नहीं मिला | इसी तरह जो शरणार्थी विभाजन के बाद पाकिस्तान से आये उनको भी जम्मू कश्मीर का नागरिक नहीं माना गया |  अब इनके नाम भी मतदाता सूची में दर्ज हो गए हैं | यही नहीं तो जिन कश्मीरी पंडितों को 1990 में घाटी छोड़ने पर मजबूर किया गया था वे भी बाहर से आकर मतदान कर सकेंगे | ताजा खबर ये है कि बकरवाल और गुज्जर जैसी घुमंतू जातियों को आरक्षण दिए जाने की व्यवस्था भी की जा रही है | जैसी कि खबर है घाटी के भीतर नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के अलावा अन्य छोटी  – छोटी पार्टियों में गठबंधन के प्रयास कारगर नहीं हो पा रहे | गुलाम नबी के अलग दल बना लेने के बाद ये संभावना भी बन रही है कि उनका भाजपा से गठबंधन हो सकता है | यदि ऐसा हुआ तब घाटी के भीतर अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार के दबदबे में कमी आना तय है | कांग्रेस के ज्यादातर नेता श्री आजाद के साथ आ जाने से पार्टी के पास कोई बड़ा प्रभावशाली चेहरा बचा ही नहीं है | धारा 370 हटने के बाद कोरोना आ गया जिसकी वजह से  पर्यटन उद्योग पर बुरा असर पड़ा | लेकिन हालात सामान्य होते ही सैलानी टूट पड़े जिससे दो दशक का रिकॉर्ड टूट गया | अमरनाथ यात्रा भी एक प्राकृतिक विपदा को छोड़कर निर्विघ्न सम्पन्न होने से धरती का स्वर्ग कही जाने वाली घाटी में चिर – परिचित बहार लौट आई है | कानून व्यवस्था की स्थिति काफी सुधरी  है | यद्यपि अभी भी आतंकवादी यदा - कदा घाटी में रह रहे हिन्दुओं  की हत्या कर देश के बाकी हिस्सों में बसे कश्मीरी पंडितों को घाटी में लौटने का इरादा त्यागने की चेतावनी देने से बाज नहीं आते लेकिन सुरक्षा बल भी आये दिन उन्हें मारकर उनकी कमर तोड़ रहे हैं | इस वजह से जुमे की नमाज के बाद मस्जिदों से निकली भीड़ न तो पाकिस्तानी झंडा लहराती है और न ही भारत विरोधी नारे लगाने का साहस कोई करता है | श्रीनगर के हृदयस्थल लाल चौक पर स्वाधीनता दिवस के दिन तिरंगा उतारकर पाकिस्तानी ध्वज फहराने की हिम्मत किसी की नहीं पड़ी |  इस वर्ष तो श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर शोभा यात्रा भी निकली और खीर भवानी में पूजा करने कश्मीर के साथ ही बाहर से भी हिन्दू श्रृद्धालु बड़ी संख्या में एकत्र हुए | इस तरह  कश्मीर घाटी पूरी तरह न सही किन्तु काफी हद तक नियन्त्रण में आ चुकी है | अब तो पाक नियंत्रित कश्मीर  के निकट तक पर्यटकों को जाने की अनुमति दी जा रही है | सरकारी नौकरियों के लिए आयोजित परीक्षाओं में कश्मीरी युवा खुलकर भाग ले रहे हैं | केंद्र सरकार द्वारा संचालित विकास योजनाओं के लिए मिल रहे धन की वजह से घाटी में उत्साह का संचार हुआ है | राष्ट्रपति शासन लगने के बाद श्रीनगर से दिल्ली तक के राष्ट्रीय राजमार्ग का निर्माण तीव्र गति से चलने से  घाटी का शेष भारत से सम्पर्क और करीबी हो रहा है | रेल सुविधा से भी घाटी को जोड़ने का काम तेजी पर  है | हालाँकि बीच में हुई  सिलसिलेवार घटनाओं के बाद घाटी में रहने वाले हिन्दू सरकारी अमले ने जम्मू स्थानान्तरण करने की जिद ठान ली थी | इसे लेकर भाजपा को उनका विरोध भी झेलना पड़ा | बड़ी संख्या ऐसे कर्मचारियों की है जो घाटी छोड़कर जम्मू में आने के बाद वापस जाने का नाम नहीं  ले रहे | यही बात देश भर में फैले कश्मीरी पंडितों के साथ भी है जो तमाम आश्वासनों के बाद भी घाटी आकर अपने उजड़े आशियाने को आबाद करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे | इस बारे में ये कहना भी गलत न होगा कि राज्य में चुने हुए जनप्रतिनिधि न होने से जनता और प्रशासन के बीच संवादहीनता भी अनेक समस्याओं का कारण बनती है | इसलिए ये अपेक्षा की जा रही है कि चुनी हुई सरकार बनने के बाद हालात और सुधरेंगे | इसी डर से आतंकवादी संगठन चुनाव प्रक्रिया में व्यवधान डालने से बाज नहीं आयेंगे | उन्हें पता है कि राज्य में स्थायी तौर  पर शान्ति - व्यवस्था कायम हो गयी  तब उनका कारोबार सिमटते देर नहीं लगेगी | सैयद अली शाह गिलानी की मौत और यासीन मलिक के जेल जाने के बाद से घाटी में अलगाववादी ताकतें पूर्व की तरह ताकतवर नहीं रहीं |  उनकी स्थिति दरअसल बिना राजा की फौज जैसी हो गई जिसे आतंकवादी हजम नहीं कर पा रहे और इसीलिए वे विधानसभा चुनाव में व्यवधान डालने का हरसंभव प्रयास करेंगे | उधमपुर में किये गये धमाके उसी की शुरुआत हो सकती है | सुरक्षा बलों को इस बारे में काफी सतर्कता बरतनी होगी क्योंकि अलगाववाद रूपी दिए की लौ का बुझने से पहले तेज होना अस्वाभाविक नहीं है |

-रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 28 September 2022

पीएफआई पर प्रतिबंध : सही समय पर उठाया गया सही कदम



आज सुबह भारत सरकार ने पीएफ़आई (पापुलर फ्रंट ऑफ इण्डिया) सहित कुछ और संगठनों को पांच सालों के लिए प्रतिबंधित कर दिया | बीते कुछ दिनों से चल रही देशव्यापी छापेमारी में बड़ी संख्या में उक्त संगठनों के कार्यकर्ता गिरफ्तार हो चुके हैं | उनसे बरामद चीजों से ये संदेह पुख्ता हो गया है कि उनकी गतिविधियों का दूरगामी उद्देश्य इस देश में इस्लामी राज स्थापित करना था  | देश भर में फैला इनका नेटवर्क मुस्लिम युवकों को संगठित उपद्रव करने हेतु प्रेरित और प्रशिक्षित करता रहा है | सी.ए.ए और एन.आर.सी के विरोध में  दिल्ली के शाहीन बाग़ के अलावा जामिया मिलिया विवि , जेएनयू , अलीगढ़ मुस्लिम विवि , उस्मानिया विवि. और जादवपुर विवि के अलावा देश के विभिन्न शहरों में जो हिंसक आन्दोलन और हिंसक वारदातें हुईं उनमें उक्त संगठनों की भूमिका का संदेह था | इसी तरह कर्नाटक से उठे हिजाब विवाद को भड़काने में भी पीएफआई का हाथ स्पष्ट है  | उल्लेखनीय है सिमी जैसे मुस्लिम संगठन पर 2014 में मनमोहन सरकार ने जो रोक लगाई थी उसे मोदी सरकार ने जारी रखा है | सिमी पर भी ये आरोप था कि वह सामाजिक संगठन होने की आड़ में इस्लामिक आतंकवाद की जड़ों को सींच रहा था | शुरुआत में पीएफआई ने भी खुद को सामाजिक संगठन बताया था | लेकिन धीरे – धीरे ये पता चला कि उसकी गतिविधियाँ सिमी जैसी ही हैं | बावजूद उसके पुख्ता सबूत नहीं मिलने की वजह से जांच  एजेंसियां और सरकार कुछ कर पाने में असमर्थ थे | लेकिन हालिया छापों में जो प्रमाण मिले उनके बाद केंद्र सरकार ने आज ये कड़ा निर्णय लिया | पीएफआई और उसके साथ प्रतिबंधित सहयोगी संगठनों को विदेशी सहायता मिलने के साक्ष्य भी जाँच एजेंसियों के हत्थे लगे हैं | ये जानकारी भी मिली कि निकट भविष्य में उनके द्वारा बड़े नेताओं की हत्या जैसी साजिश रची जा रही थी | इसमें दो राय नहीं है कि देश भर में अनेक इस्लामिक संगठनों की गतिविधियाँ संदेहास्पद हैं | अल्पसंख्यकों को मिलने वाली सुविधाओं का लाभ उठाकर ये संगठन देश में अस्थिरता फैलाने का काम कर रहे हैं | विशेष तौर पर सीमावर्ती राज्यों में उनकी गतिविधियाँ पूरी तरह से देश हित के विरुद्ध हैं | ये कहना भी गलत न होगा कि देश में लालू , मुलायम ,  ममता और दिग्विजय जैसे राजनेता महज वोटों के लालच में मुस्लिम संगठनों को अपने कन्धों पर बिठाने में रत्ती भर संकोच नहीं करते | यही वजह है कि पीएफ़आई  सरीखे संगठनों  के विरुद्ध इनके मुंह से एक शब्द नहीं निकलता | बीते कुछ समय से पीएफआई पर छापे मारकर उसके सैकड़ों कार्यकर्ताओं को जेल भेजा गया लेकिन विपक्ष ने उस पर कोई प्रतिक्रया नहीं दी क्योंकि वैसा करने पर मुस्लिम मतों की नाराजगी का अंदेशा था | तुष्टीकरण की इसी प्रवृत्ति ने देश के अनेक हिस्सों में जनसँख्या का संतुलन इस हद तक बिगाड़ दिया है कि विधानसभा और लोकसभा चुनाव में कोई गैर मुस्लिम वहां से चुनाव जीत ही नहीं सकता | लोकतान्त्रिक देश होने से भारत में सभी को अपने धर्म के पालन की सुविधा है | लेकिन ये प्रमाणित हो चुका है कि जिस भी हिस्से में हिन्दू  अल्पसंख्यक होते हैं वहां अलगाववादी ताकतें पैर ज़माने लगती हैं | ये बात केवल मुस्लिमों पर ही लागू होती हो ऐसा नहीं है | कुछ उत्तर पूर्वी राज्यों में जहां ईसाई आबादी की बहुलता है वहां भी अलगाववादी मानसिकता पनपी | सही बात तो ये है कि भारत की अखंडता को भंग करने वाली विदेशी शक्तियां इस मानसिकता को पोषित करने में सहायक है | जिस तरह धर्मांतरण के लिए ईसाई सगठनों को विदेशी मदद मिलती है उसी तरह इस्लामी देश भारत को  इस्लाम के रंग में रंगने हेतु भरपूर धन भेजते हैं | पीएफआई जैसे संगठन उसी के बल पर इतने सक्रिय और शक्तिशाली बन बैठे | इस बारे में कश्मीर घाटी का उदाहरण प्रासंगिक होगा जहाँ के अलगाववादी नेताओं को मिलने वाली विदेशी सहायता के रास्ते बंद किये जाते ही उनकी कमर टूटने लगी | पीएफआई जैसे संगठनों ने ही मस्जिदों से नमाज पढ़कर निकलते समय पत्थरबाजी और आगजनी जैसी हरकतों को प्रायोजित किया | सिर तन से जुदा जैसे उन्मादी कृत्य को अंजाम देने के पीछे ऐसे ही संगठन काम करते हैं | मुस्लिम समाज के धर्मगुरु भी इन संगठनों की करतूतों की जैसी  अनदेखी करते हैं उससे भी संदेह पैदा होता है | मदरसों की जांच में जो  खुलासे हो रहे हैं उनकी वजह से भी मुस्लिम समाज की छवि पर दाग लगे हैं | ये सही है कि अशिक्षा के कारण मुस्लिम समुदाय मुल्ला – मौलवियों के साथ ही आतंकवाद को  बढ़ावा देने वाले पीएफआई सरीखे संगठनों के शिकंजे में जकड़  जाता है | | कश्मीर घाटी में हुर्रियत कान्फ्रेंस के नेता सैयद अली शाह गिलानी ने युवकों को पैसे देकर सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकने के लिए उकसाया जिसकी देखा - सीखी देश भर में पत्थरबाजी मुस्लिम समुदाय की पहिचान बन गई | भले ही इस समाज के कुछ धर्मगुरु और बुद्धिजीवी दिखावे के लिए इन घटनाओं की निंदा कर देते हों किन्तु उसे रोकने के लिए जैसे कदम उठाये जाने चाहिए थे उनसे वे सदैव बचते रहे |  दुर्भाग्य की बात ये है कि मुस्लिम समाज में शिक्षा ग्रहण करने के बाद आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से सुदृढ़ हो चुके लोग भी अलगवावादी मानसिकता के विरुद्ध खुलकर बोलने का साहस नहीं करते | पीएफआई पर प्रतिबंध लगने का स्वागत मुस्लिम समुदाय के पढ़े – लिखे लोगों द्वारा किया जाए तो निश्चित तौर पर वह मुसलमानों के हित में ही होगा | काग्रेस नेता दिग्विजय सिंह रास्वसंघ के विरुद्ध तो बहुत कुछ बोला करते हैं लेकिन बीते अनेक दिनों से पीएफआई पर हो रही छापों की कार्रवाई पर उन्होंने एक शब्द तक नहीं कहा | और तो और छापों के विरोध में पीएफआई द्वारा आयोजित केरल बंद के दिन राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा स्थगित रखी गयी | आतंकवाद की समस्या किसी एक या कुछ राजनीतिक दलों की नहीं , अपितु समूचे  देश की है | कश्मीर में हिन्दुओं की हत्याओं का जिक्र आने पर अनेक लोग ये सफाई देते है कि आतंकवादियों के हाथों मरने वालों में कश्मीरी मुसलमान भी कम न थे | लेकिन उसके बावजूद घाटी के मुसलमान कभी आतंकवादियों के विरुद्ध खुलकर सड़कों पर नहीं उतरे | उलटे किसी आतंकवादी को सुरक्षा बलों द्वारा घेरे जाने पर वे उसे बचकर निकलने का अवसर देने के लिए पत्थर फेंकने जैसी हरकत में जुट जाते | केंद्र सरकार ने पीएफआई और उसके सहयोगी संगठनों पर प्रतिबंध लगाकर सही काम किया गया है जिसका राजनीति से ऊपर उठकर स्वागत किया जाना जाना चाहिये | लेकिन ऐसा संभव नहीं लगता क्योंकि कांग्रेस के सांसद के. सुरेश ने पीएफआई के साथ ही रास्वसंघ पर भी प्रतिबन्ध लगाये जाने की मांग जो कर डाली | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 27 September 2022

पंजाब की गलती राजस्थान में भी दोहरा रही कांग्रेस



दो साल पहले जब सचिन पायलट अपने साथी विधायकों को लेकर हरियाणा के एक होटल में जा बैठे थे तब उन्हें गद्दार की जिस उपाधि से विभूषित किया गया वह आज भी उनके माथे पर चस्पा है | लेकिन उस समय जिन अशोक गहलोत ने राजनीतिक कौशल से न सिर्फ अपनी सरकार बचाई  अपितु कांग्रेस हाईकमान का विश्वास भी अर्जित किया , वे  आज की  तारीख में उनसे भी बड़े गद्दार माने जा रहे हैं | फर्क इतना है कि सचिन की बगावत मुख्यमंत्री बनने के लिए थी वहीं श्री गहलोत का विद्रोह मुख्यमंत्री बने रहने के लिए है | दूसरा अंतर ये है कि श्री पायलट पर  आरोप था कि वे सत्ता की खातिर भाजपा की गोद में जा बैठे हैं और इसीलिए उन्होंने भाजपा शासित हरियाणा में डेरा जमाया जबकि  उस संकट के समय श्री गहलोत ने अपने साथ वाले विधायकों को राजस्थान में ही रखा था | जाहिर है संख्याबल न जुटा पाने के कारण सचिन को हथियार डालने पड़े | प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री जैसे ओहदे से हटकर वे महज विधायक रह गये | उनकी नाराजगी इस बात पर थी कि 2018 में उनकी अध्यक्षता में कांग्रेस ने राज्य की सत्ता हासिल की थी इसलिए मुख्यमंत्री पद भी उन्हीं को मिलना था परन्तु आखिर में श्री गहलोत ने उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया | हालाँकि उन्हें उपमुख्यमंत्री पद दे दिया गया लेकिन श्री गहलोत ने उनके पर कतरने में कोई गुंजाईश नहीं छोड़ी | वे अपनी शिकायतें राहुल गांधी तक पहुंचाते रहे जो पार्टी में युवाओं को आगे लाने की मानसिकता से काम कर रहे थे किन्तु श्री  गहलोत को हिलाने का साहस वे नहीं कर सके | उसी  समय पंजाब में भी  अमरिंदर सिंह और नवजोत सिद्धू के बीच शीत युद्ध जोरों पर था | कांग्रेस हाईकमान ने वहां पहले तो श्री सिद्धू को प्रदेश संगठन की बागडोर सौंप दी और बाद में मुख्यमंत्री भी बदल दिया | लेकिन राजस्थान में श्री पायलट की महत्वाकांक्षाओं  को शांत करने की दिशा में कारगर कदम उठाने में वह असफल रहा | एक बात  स्पष्ट तौर पर देखी गई कि राहुल और प्रियंका वाड्रा का झुकाव सचिन के प्रति था लेकिन श्री गहलोत ने सोनिया गांधी का भरोसा हासिल कर रखा था | ये भी कहा जाता है कि कांग्रेस का खर्चा - पानी श्री गहलोत ही उठाते रहे हैं | हकीकत जो भी हो लेकिन सचिन की बगावत के बाद कांग्रेस  हाईकमान ने उनको न सिर्फ माफ़ कर दिया  अपितु उन्हें दुलारा – पुचकारा भी | जिसकी वजह से श्री गहलोत को ये लग गया कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अनुशासनहीनता को दबाने में विफल रहा | जी – 23  नामक असंतुष्टों के ऐलानिया विरोध पर भी जिस तरह का मौन गांधी परिवार ने साधा  उससे भी ये बात  साबित हो गई कि उसका दबदबा पहले जैसा नहीं रहा | इसीलिये जब राहुल ने अध्यक्ष पद पर दोबारा बैठने से इंकार किया तब सोचा गया  कि किसी ऐसे व्यक्ति को पार्टी अध्यक्ष बनाया जाए जो परिवार का वफादार  रहे | लेकिन सवाल ये है कि इस हेतु श्री गहलोत को ही क्यों चुना गया जबकि आगामी साल राज्य में चुनाव होने वाले हैं | पार्टी के पास अनेक ऐसे वरिष्ट नेता हैं जिनके पास  बड़ी  जिम्मेदारी नहीं होने से वे इस पद का दायित्व अच्छी तरह संभाल सकते थे | वैसे भी सब कुछ करना तो सोनिया जी , राहुल और प्रियंका को ही है | श्री गहलोत ने जब अध्यक्ष बनने हामी भरी तब उन्हें ये उम्मीद थी कि वे मुख्यमंत्री भी बने  रहेंगे | लेकिन भारत जोड़ो यात्रा के प्रबंधक दिग्विजय सिंह के ज़रिये जैसे ही ये सुरसुरी छुड़वाई गई कि एक व्यक्ति एक पद का  निर्णय लागू होने के कारण उनको सत्ता त्यागनी होगी वैसे ही  रायता फैलना शुरू हुआ |  और जिस व्यक्ति को गांधी परिवार का सबसे विश्वस्त समझकर राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाये जाने की योजना मूर्तरूप लेने जा रही थी उसी ने बागी तेवर दिखा दिए | दरअसल गांधी परिवार ने सबसे बड़ी गलती ये की कि एक व्यक्ति एक पद के बारे में उसे सीधे श्री गहलोत से चर्चा करनी थी किन्तु उसने दिग्विजय जैसे विघ्नसंतोषी को आगे किया जिनके कारण पार्टी ने म.प्र में सरकार गंवा दी | साथ ही उनसे उनके उत्तराधिकारी के बारे में बात करनी थी लेकिन ऐसा न करते हुए सीधे मुख्यमंत्री बदलने की कवायद शुरू कर दी जबकि विधायक दल की बैठक बुलाये जाने तक तो श्री गहलोत ने अध्यक्ष पद का नामांकन तक नहीं भरा था | चुनाव होने के पहले ही उनको हटाये जाने की जल्दबाजी क्यों की गई इसका उत्तर किसी के पास नहीं है | पंजाब में अमरिंदर जैसे वरिष्ट नेता को अस्थिर करने के लिए नवजोत जैसे नौसिखिया को लाने का दुष्परिणाम देखने के बाद भी कांग्रेस आलाकमान ने कुछ  नहीं सीखा | सुनील  जाखड़ को हटाकर श्री सिद्धू को प्रदेश अध्यक्ष बनाना और कैप्टन की जगह चरनजीत चन्नी की ताजपोशी ने पंजाब में कांग्रेस को कहीं का नहीं  छोड़ा | ऐसे में वही कहानी राजस्थान में दोहराने का कोई मतलब नहीं था | सचिन की बगावत के बावजूद उन्हें आश्वासन देते रहना गलत था | श्री गहलोत विधायक दल और सरकार पर अपनी पकड़ साबित कर चुके थे जबकि सचिन के साथ इतने विधायक भी नहीं जुट सके कि वे   सरकार के लिये खतरा बन  सकते | वरना तो दो साल पहले ही श्री  गहलोत भूतपूर्व हो चुके होते | राजस्थान में कांग्रेस का ये संकट सुलझेगा या और उलझेगा ये गांधी परिवार की निर्णय क्षमता पर निर्भर  है | हालाँकि इस बारे में अब तक का अनुभव तो निराश करने वाला रहा है | दो साल पहले इस राज्य में श्री पायलट ही बागी थे लेकिन अब श्री गहलोत भी उसी जमात में शामिल  हो गये हैं | पार्टी के सामने निश्चित रूप से बड़ी दुविधा है | इस विवाद से राजस्थान में जो नुकसान होगा वह तो अपनी जगह है लेकिन दूसरे राज्यों में भी आलाकमान की कमजोरी के चलते नाराज नेता बगावत का झंडा उठा लें तो अचरज नहीं होगा | छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और स्वास्थ्य मंत्री टी.एस सिंहदेव का झगड़ा जारी है | पुरानी कहावत है जब केन्द्रीय सत्ता कमजोर होती है तब सूबे सिर उठाते हैं | कांग्रेस भी आज उसी स्थिति से गुजर रही है | जिसे आज्ञाकारी मानकर पार्टी की कमान सौंपने की तैयारी की जा रही थी उसने तो पहले ही उद्दंडता का परिचय दे डाला | गांधी परिवार कहने को तो आज भी कांग्रेस में सबसे ताकतवर कहा जाता है परन्तु  राजस्थान जैसी एक दो घटनाएँ और हो गईं तब 2024 आते – आते तक उसके राष्ट्रीय विकल्प बनने की संभावनाएं लगभग समाप्त हो चुकी होंगी |

- रवीन्द्र वाजपेयी